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	<title>फ़िल्म-समीक्षा &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/फ़िल्म-समीक्षा/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "फ़िल्म-समीक्षा"</description>
	<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 13:21:47 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[हनीमून ट्रेवल्स.]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/02/25/honeymoon-travels/</link>
<pubDate>Sun, 25 Feb 2007 11:13:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2007/02/25/honeymoon-travels/</guid>
<description><![CDATA[प्रेमी प्रेमिका, प्यार तकरार, घरवालों/]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>प्रेमी प्रेमिका, प्यार तकरार, घरवालों/खलनायक से जंग, थोडी धां धूं और थोडी फ़ां फूं और अन्त में हीरो हिरोइनी का मिलन..और पिक्चर समाप्त।  १०० में ८० बेईमान वाले देस की फ़िल्म इन्डस्ट्री की १०० में ८० फिल्में भी शादी पर आकर खत्म हो जाती है । लेकिन जिन्दगी...सही मायनों में वो तो शादी के बाद शुरु होती है।</p>
<p>शादी के बाद की जिन्दगी तो नही, पर तुरन्त बाद का एक छोटा सा हिस्सा, जहाँ पति पत्नि एक दूसरे को समझने की पहली कोशिश करते हैं और पहली बार एक दूसरे को जानते हैं (बोले तो <em>ह्ल्दीनून</em> या हनीमून) लेकर आयी हैं रीमा कागती, फिल्म "हनीमून ट्रेवल्स प्रा. लि. " में । फिल्म में छः जोडे हैं, अगर सलाम-ऐ-इश्क देखी हो तो छः जोडों के नाम पे घबराइयेगा नही..ना तो फिल्म उतनी लम्बी है और ना ही कहानी को इतना उलझाया कि सुलझ ही ना सके ।</p>
<p>हाँ तो साहब फिल्म के मुख्य किरदार हैं छः शादी शुदा जोडे, एक टाटा स्टारट्रेक बस और रेडियो मिर्ची (अच्छी "visibility" मिली दोनो को) । सब कलाकारों के नाम यहाँ लिख नही पाऊँगा, मुझे याद भी नही हैं । जो चीज इन सभी को जोडती है वो है शादी के बाद रिश्तों में आने वाला परिवर्तन।  ऐसा क्यों होता है कि शादी के बाद बहुत कुछ 'बदल' जाता है । तुम पहले तो ऐसे ना थे, पहले तो ऐसे करते थे, पहले तो ये था अब वो है आदि आदि... । हमारी अभी नही हुई है सो हमे इस बारे में कुछ नही मालूम :) ।</p>
<p>हर किरदार की अपने कुछ उलझने है, कुछ सपने हैं और कुछ हकीकते हैं । एक अधेड जोडा है जिसकी दूसरी शादी है, और जो अपनी जिन्दगी में हुए पुराने दर्दनाक वाकयों को भूलना चाहता है,  एक खालिस पंजाबी लडकी जो खूब सपने देखती है और खूब बोलती है, पर पति है कि उसे कोई 'और' ही गम है, एक बंगाली जोडा जहाँ पति कुछ 'कंजरवेटिव' किस्म का है, और पत्नि है कि खुले आसमान में उडना चाहती है, एक गुजराती जोडा जहाँ लडकी की शादी उसकी मर्जी के खिलाफ हुई है, एक जोडा जो इन्टरनेट के जरिये मिले थे पर जहाँ लडकी एक बार अपना दिल तुडा चुकी है तो लडके को कोई 'और' ही आदत है और एक जोडा जो कभी नही लडता हमेशा खुश रहता है और सिर्फ प्यार करना जानता है ।</p>
<p>कहीं कहीं फिल्म यह संदेश देती हुई दिखी कि शादी हमे हकीकत से रू ब रू कराती है और वहाँ सब कुछ रंगीन नही होता । प्यार के साथ तकरार,  कभी चमाचम कभी भंगार, कभी छप्पन भोग तो कभी फलाहार होता ही है, अगर ऐसा नही है, अगर सिर्फ प्यार ही प्यार है तो वो परामानवीय है, साधारण इंसान के लिये नही है, सुपर हीरोज़ (जी हाँ, वो भी है फिल्म में) के लिये है ।</p>
<p>एक दो जगह पर कुछ झोल और अतिनाटकीयता छोड दें तो हमे फिल्म अच्छी लगी, एक बार देखने लायक । अच्छी बात, कलाकारों का अभिनय और कहानी का नयापन । साथ ही यह भी कि बस दो घन्टे की फिल्म है, पकने लगें उसके पहले खत्म हो जाती है ।</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[मान गये 'गुरू' !]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/01/12/guru/</link>
<pubDate>Fri, 12 Jan 2007 20:33:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2007/01/12/guru/</guid>
<description><![CDATA[&#8220;साहब..खडा हो सकता हूँ, या उसके लिये भ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>"साहब..खडा हो सकता हूँ, या उसके लिये भी लाइसेन्स लेना होगा ?"<br />
उस जमाने की फ़िल्म है गुरू, जब आपको हर काम, हर फ़ेक्ट्री, हर धन्धे के लिये लाइसेन्स चाहिये होता था । हमने वो जमाना से देखा नही, जब तक सोंचने समझने लायक हुए तब तक ९० का दशक आ चुका था । लेकिन वाकई में गुजरात के एक गाँव से आये हुए, दसवीं फेल आदमी के लिये आसान नही रहा होगा । पर अपने दिमाग, लगन और जोड तोड से उसने कर दिखाया और इन सबसे बढ कर था, सपने देखना । मैं 'गुरू' की ही बात कर रहा हूँ, धीरू भाई अंबानी की नही, पर क्या फ़र्क पडता है ।</p>
<p>'गुरू' की कहानी में आप ऐसा नया शायद ही कुछ पायेंगे जो आप ना जानते हों, लेकिन अभिषेक बच्चन के लिये ये फ़िल्म जरूर देखियेगा । अभिनय, हावभाव, मेकअप....शानदार... ।और इन सबके ऊपर, आवाज....दम है भाई । कहीं कहीं बडे बच्चन नजर आते हैं । फ़िल्मांकन खूबसूरत है, खास तौर पर कुछ शुरुआती दृश्य तो मुझे गाडफ़ादर(शायद भाग २) की याद दिलाते हैं । और तीसरी तारीफ़ेकाबिल बात, संवाद । छोटे छोटे संवाद जो एक दम निशाने पर जाकर बैठते हैं ।</p>
<p>ऐश्वर्या राय, ठीक ठाक हैं, 'बरसो रे मेघा' गाने की बारिश में मैं ताल वाली ऐश्वर्या को देखने की कोशिश कर रहा था...पर असफल रहा, गलत जगह और समय पर गलत चीज ढूंढ रहा था । साथी कलाकार सब अपनी अपनी जगह फ़िट बैते हैं , वैसे माधवन-विद्या बालन की प्रेम कहानी की जरूरत नही थी । मिथुन दा को बहुत दिन बाद बडे पर्दे पर देखा ।</p>
<p>गुलजार साहब के गाने, हमेशा की तरह धीरे धीरे जुबान पर चढे, और हमेशा की ही तरह कई बोल अभी भी समझ में नही आये हैं। पर गाने कहीं कहीं गैर जरूरी महसूस हुए, १-२ ना होते तो भी ठीक था, करीब पौने तीन घंटे से ऊपर की फ़िल्म है ।</p>
<p>कुल मिला कर जरूर देखने लायक फ़िल्म, अभिषेक बच्चन की अब तक की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म ।......"आज खुश तो बहुत होंगे तुम..ऐं..???" :)</p>
<p>पुनश्चः -<br />
बहुत दिन पहले एक मेल फ़ारवर्ड में पढा था,<br />
प्र.- MBA के क्या मायने है ?<br />
उ.- एक छोटे से गाँव से आया हुआ स्कूल फेल आदमी, अपनी मेहनत और लगन से ६४,००० करोड रुपये की कंपनी खडी करता है, दो MBA धारी आकर उसके २ टुकडे कर डालते हैं ।</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[फिर छा गये मामू!!!]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2006/09/01/chaa_gaye_maamoo/</link>
<pubDate>Fri, 01 Sep 2006 20:28:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2006/09/01/chaa_gaye_maamoo/</guid>
<description><![CDATA[ये पोस्ट लिखते हुए डर तो लग रहा है..कारण]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ये पोस्ट लिखते हुए डर तो लग रहा है..कारण..अजी आजकल जो फिल्म मुझे अच्छी लगती है वो <a target="_blank" href="https://saptrang.wordpress.com/2006/08/18/%e0%a4%90%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-2/">फ्लाप जो हो जाती है</a>..पर क्या करूं मामू...बोले तो..अपने आप को रोक नही पाये...उम्मीद पूरी है कि इस बार ऐसा नही होगा</p>
<p>सबसे पहले, पहली बात, पार्ट -१ के मुकाबले कैसी है, तो अपना कहना ये है कि इक्कीस नही है...पर उन्नीस भी नही है..इक्कीस नही लगने की वजह ये हो सकती हैं कि पहले भाग को देखने के पहले कोई अपेक्षा थी नही, और इस बार फिल्म अपेक्षाओं के बोझ तले दबी थी..<br />
पिछली बार मुन्ना ने डाक्टर बन कर लोगों के दिल का खुश किया था, इस बार मुन्ना की जोडी बनी है(सर्किट के अलावा)...अपने बापू के साथ, बापू..बोले तो गाँधी जी.और हाँ,,जादू की झप्पी इस बार अपको नही मिलेगी..पर हाँ, गाँधीगिरी है ना..वो क्या है..ये तो आप खुद ही देख लीजियेगा<br />
फिल्म की कहानी यहाँ ज्यादा लिख कर आपका मजा खराब नही करूंगा बस इतना ही कि मुन्ना इस बार अपने प्यार को पाने के लिये नाटक करता है, इतिहास का प्रोफेसर बनने का, प्यार है जान्हवी(विद्या बालन), जो ग्रेसी सिह से कहीं अच्छी दिखती है(जब विद्या बालन <em>हम पाँच</em> में आती थी तो सोंच भी नही सकते थे कि इतनी खूबसूरत दिख सकती है)...और जब <em>लोचा</em> हो जाता है, तो मुन्ना की मदद के लिये आते हैं गाँधी जी..बोले तो इस बार भाईगिरी/दादागिरी नही, गाँधीगिरी चलेगी&#124;<br />
फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष है कहानी, जो बिना बोर किये और प्रवचन दिये, कई सारे समसामयिक मुद्दों को छू जाती है..और हास्य तो अपनी जगह है ही...हैदराबाद में पब्लिक इतनी तालियाँ और सीटियाँ बजा रही थी, तो उत्तर भारत की तो मैं कल्पना ही कर सकता हूँ&#124;<br />
फिल्म की कहानी,निर्देशन और संपादन राजकुमार हीरानी का है..और हर पहलू पर उन्होने वाकई मेहनत की है, कोई विदेशी लोकेशन नही,महँगे-चकाचौंध भरे सेट नही, पर एक शानदार कहानी और कन्सेप्ट(करण जौहर शायद सुन रहे हों)..और पात्र चयन के बारे में तो कुछ कह ही नही सकते...Everybody just made for the role he is performing.और हाँ आप अपने पूरे परिवार के साथ बैठ कर फिल्म देख सकते हैं,कोई टेन्शन नही.<br />
अपनी माने तो..जरूर देखना मामू..</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एन्थोनी क्यों है????]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2006/08/06/anthony_kyo_hai/</link>
<pubDate>Sun, 06 Aug 2006 12:34:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2006/08/06/anthony_kyo_hai/</guid>
<description><![CDATA[जी हां, फ़िल्म का नाम तो है &#8216;एन्थोनी कौ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जी हां, फ़िल्म का नाम तो है 'एन्थोनी कौन है?'...पर पूरे दो ढाई घन्टे मैं बैठ कर यही सोंचता रहा कि ये 'क्यों है.??' भाई राजकौशल जी क्या बनाना चाहते थे, क्यों बनाना चहते थे और क्या बना गये ये शायद वो भी नही समझ पाये..और हम तो मूढ हैं ही।</p>
<p>पहले सोंचा होगा कि चलो एक कोमेडी बनाई जाये, अरशद-संजय की जोडी ठीक रहेगी, काम शुरु करते हैं...फ़िर मूड बदला, खयाल भी बदले....चलो एक थ्रिलर बनाने की कोशिश करते हैं...एक काम करते हैं..साथ में थोडी प्रेम कहानी भी डाल देते हैं..ह्म्म, जम नही रहा यार..चलो सबको मिला के एक खिचडी बना देते हैं...कहानी का क्या है...वो तो वैसे भी शुरू से अपने पास थी ही नही!!!और हां...२-४ गाने भी तो रखने होंगे ना फ़िल्म में.....जरूरत तो नही है, पर डाल दो यार, बिना कहानी की फ़िल्म, बिना गानों के अच्छी नही लगेगी...मार्केट में एक टोपी वाला बहुत चल रहा है आजकल, बनाता तो वो भी खिचडी ही है, पर अपनी खिचडी में उसकी खिचडी मिल जायेगी तो स्वाद शायद अच्छा बन पडे...तो ले लो उसे ही...उउउउउउउउउउउउउउउउउउ   ..नही निर्माता के रोने की आवाज नही है, रेशमिया का संगीत है ये तो...</p>
<p>फ़िल्म की कहानी चूंकि है ही नही, सो उसके बारे में यहां कुछ नही लिखूंगा, कलाकारों के बारे में कुछ बता देते हैं..अगर आप फ़िल्म, संजय दत्त को देखने जा रहे हैं...तो ना ही जायें...अतिथी भूमिका है उनकी,फ़िल्म में उनसे ज्यादा रोल तो कबूतरों का है..अब कबूतर आपको पसंद हों तो बात अलग है। अरशद वारसी, फ़िल्म के नायक हैं...पर चूंकि फ़िल्म का कन्सेप्ट ही क्लीयर नही था, सो ना तो वो सर्किट्नुमा कोमेडी कर पाये, ना ही कुछ और..और हां, बहुत मोटे लगते हो कुछ जगहों पर यार...या तो तो बनियान पहना ना करो फ़िल्म में..या थोडी कसरत करना शुरू कर दो. हीरोइन मनीषा लाम्बा ..अच्छी हैं(वो क्या है, मैं महिलाओं की बुराई नही करता), और राजपाल यादव ने अपना रोल क्या सोंच कर स्वीकर किया, वो ही जाने..</p>
<p>शायद फ़िल्म की(या शायद हमारी) सबसे बडी समस्या ये थी, कि संजय-अरशद की जोडी से हम कुछ ज्यादा ही उम्मीद लगाये बैठे थे, और इसी वजह से हमारा  गुस्सा यहां निकल रहा है। कुलमिला कर,मजा नही आया मामू!!! हम ये सलाह देंगे कि DVD मिल जाये तो ठीक पर थियेटर में जाके इस फ़िल्म पर पैसे बरबाद करने की गलती कतई ना करें....</p>
]]></content:encoded>
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