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	<title>हिन्दी-पत्रिका &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "हिन्दी-पत्रिका"</description>
	<pubDate>Mon, 12 May 2008 12:41:00 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[इंसान तो कठपुतली है-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=153</link>
<pubDate>Sun, 11 May 2008 06:55:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[आदमी के पंख नहीं होते
जो वह आसमान में उ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;">आदमी के पंख नहीं होते<br />
जो वह आसमान में उड़ सके<br />
पर उसका मन बिना पंख के ही<br />
उड़ता चला जाता है<br />
उसके पांव आदमी की काबू में होते नहीं<br />
पंरिदे बनाते हैं लोगों के घर में भी घरोंदे<br />
पर उनके बिस्तर पर सोते नहीं<br />
खुशी में झूमकर नाचता इंसान<br />
दुःख  में अपने ही आंखो से बहती<br />
अश्रुधारा में करता स्नान<br />
पर परिंदे कभी रोते नहीं<br />
अपने मन के इशारे पर<br />
कठपुतली की तरह नाचता<br />
कितने भी दावे करे कि<br />
खुद ही चल रहा है इस जीवन पथ पर<br />
अपनी अक्ल पर है उसका काबू<br />
कराती है इंसान की  जुबान दावे आजाद होने के<br />
पर कभी वह सच्चे होते नहीं<br />
अपनी जरूरतों से आगे नहीं उड़ते<br />
इसलिये परिंदे कठपुतली नहीं होते<br />
यह सच है<br />
अपनी ख्वाहिशों के हमेशा गुलाम<br />
रहने वाले  इंसानों के लिये<br />
साबित करना बहुत मुश्किल है कि<br />
वह कठपुतली होते नहीं<br />
..............................................................</span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;">कठपुतली ने चिडि़या से कहा<br />
‘देखो, मैं नाच  और गा सकती हूं<br />
पर तुम ऐसा नहीं कर सकती<br />
मुझे तुम पर तरस आता है’</span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;">चिडि़या ने उसकी डोर पकड़ने वाल  नट की<br />
गर्दन पर चांेच मारी तो वह चिल्लाया<br />
छूट गयी उसके हाथ से  डोर<br />
उसने कठपुतली को इस तरह नीचे गिराया<br />
चिडि़या ने लौटकर चिड़े से कहा<br />
‘आदमी कठपुतली को आगे कर बोलता<br />
अपने मन के इशारे पर डोलता <br />
बोलने से पहले कभी शब्द नहीं तोलता <br />
दावे करता है आकाश में उड़ने का<br />
कभी ऐसा नहीं करता तब  मचा रहा है शोर<br />
उड़ता तो क्या हाल करता<br />
सर्वशक्तिमान ने इसलिये इसको पंख नहीं लगाया<br />
उड़ने के ख्वाब देखता रहे इसलिये<br />
इंसान को मन की कठपुतली बनाया<br />
..............................................................</span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;">दीपक भारतदीप</span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;">my other web page</span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;"><a href="http://dpkraj.blogspot.com">http://dpkraj.blogspot.com</a> </span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;"><a href="http://deepkraj.blogspot.com">http://deepkraj.blogspot.com</a></span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;"><a href="http://teradipak.blogspot.com">http://teradipak.blogspot.com</a></span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;"><a href="http://terahdeep.blogspot.com">http://terahdeep.blogspot.com</a></span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;"><a href="http://zeedipak.blogspot.com">http://zeedipak.blogspot.com</a>  </span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कुछ दृश्य निगाहों से पढ़े जाते हैं-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=373</link>
<pubDate>Sat, 10 May 2008 18:14:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=373</guid>
<description><![CDATA[
कुछ दृश्य इस तरह सामने आते हैं
कि शब्द ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="padding-left:30px;">
<strong><span style="color:#003300;">कुछ दृश्य इस तरह सामने आते हैं<br />
कि शब्द हो जाते  खामोश<br />
निगाहों से वह पढ़े जाते हैं<br />
लिखकर कोई क्या बतायेगा<br />
तस्वीरों में चेहरे<br />
सारा माजरा बयां कर जाते हैं<br />
जो देखकर भी न समझे<br />
वह पढ़कर भी क्या समझेंगे<br />
हृदय में बसता हो जीवन<br />
संवेदनाओं की बहती हो जब पवन<br />
चक्षुओं से देखकर ही<br />
स्पर्श अनुभव किये जाते हैं<br />
जागते हुए भी सोते हैं कई लोग<br />
उनको समझाने से मतलब बेमानी हो जाते हैं</span></strong></p>
<p style="padding-left:30px;"><strong><span style="color:#003300;">..........................<br />
दीपक भारतदीप<br />
</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[महिला बुद्धिजीवी सम्मेलन-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=152</link>
<pubDate>Sat, 10 May 2008 13:16:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=152</guid>
<description><![CDATA[सम्मेलनों के आयोजने करने के आदी लोगों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सम्मेलनों के आयोजने करने के आदी लोगों की संस्था के पदाधिकारियों के  दिमाग  में ‘बुद्धिजीवी महिला सम्मेलन’ करवाने का विचार आया। कुछ लोगों ने इसका विरोध किया और कुछ लोगों ने समझाया। एक समझदार ने कहा-‘‘इस देश की शिक्षा पद्धति ने लोगों को गहरे ज्ञान से वंचित किया है और सभी प्रकार के बुद्धिजीवी चाहे वह  महिला हो या पुरुष केवल वाद का नाम और नारे लगाकर ही चलते हैं और फिर आपस में झगड़ा करते हैं। सामान्य आदमी तो बैठक आदि में जाता नहीं और जाता है तो खामोशी से चला जाता है और चार बुद्धिजीवी पूरुष जहां मिलते है लड़ पड़ते है, उनको हाथ पकड़ कर या धमकी देकर समझाया जा सकता है  कहीं महिला बुद्धिजीवी कहीं झगड़ा कर बैठीं  तो उनको समझाना कठिन हो जायेगा।’</p>
<p>   मगर संस्था के लोग नहीं माने। सम्मेलन कराने का नशा उन पर सवार था। उनका विचार था कि इस बहाने संस्था का नाम पुनः चमकेगा जो पहले ही डूब रहा है।</p>
<p>सम्मेलन घोषित हो गया। ढूंढ-ढूंढकर बुद्धिजीवी महिलाओं को आमंत्रण भेजा गया और फिर विषय रखा गया ‘सास-बहु और ननद-भाभी  के मधुर संबंध कैसे हों’?</p>
<p>संस्था के सभी लोग आयोजन कर चंदा वसूलने और फिर आत्मप्रचार के काम में महारात हासिल किये हुए थे पर फिर भी उनमें से कुछ कच्चे पड़ गये और उन्होंने फैसला किया कि वह इस आयोजन से दूर रहेंगे। वजह यह थी कि उनके घर की महिलायें भी इन आयोजनों में आतीं थीं और उनको लगा कि इस तरह के आयोजन से उनके घरेलू विवाद सबके सामने आयेंगे।</p>
<p>हालांकि संस्था के लोगों ने इस बात का पुख्ता इंतजाम किया कि उनके घर की महिला सदस्य इनमें शामिल न हों और वह बुद्धिजीवी भी हों तो उनको सूचना नहीं भेजी जाये। इसलिये जिसका नाम भी आमंत्रण पत्र पर लिखा जाता था पहले इस बात की तस्दीक कर ली जाती थीं कि वह संस्थो के सदस्यों की घर से संबद्ध न हों।</p>
<p>सम्मेलन का दिन आया तमाम महिलायें कार्यक्रम में पहुंची। कुछ को भाषण देना था तो कुछ को केवल सुनकर तालियां बजानीं थीं। तालियां बजाने के लिये भी बकायदा पैसे देने का आश्वासन दिया गया था। आयोजक जानते थे कि बोलने के लिये बुद्धिजीवी महिलायें तो मिल जायेंगी पर ताली बजाने के लिये उनकी उपलब्धता संदिग्ध है। इसलिये कुछ पुरुंष भी किराये पर बुलाये गये और उनको महिला अधिकारों के लिये लड़ने वाले जुझारू कार्यकर्ता कर प्रचारित किया गया।</p>
<p>तमाम सावधानियों के बावजूद आयोजक आमंत्रण पत्र भेजने में गल्तियां कर गये। उन्होने कई ऐसी बुद्धिजीवी महिलाओं को बोलने के लिये आमंत्रण भेज दिया जिनके आपस में सास बहु और ननद-भाभी के रिश्ते थे। उनको इस बात का ध्यान ही नहीं रहा कि बुद्धिजीवी घरों में ‘बुद्धिजीवी’ बहु की मांग ही होती है यह अलग बात है कि कोई भी बुद्धिजीवी सास दहेज की राशि को लेकर वैसे ही कोई समझौता नहीं करती जैसे कि कोई सामान्य सास।</p>
<p>सम्मेलन शूरू कराने के लिये एक पुरुष सदस्य माइक पर आया और बोला-‘‘आज हम अपने पहले बुद्धिजीवी सम्मेलन.........................’’</p>
<p>उसकी बात पूरी होने से पहले ही एक महिला कुर्सी से उठ कर खड़ी हो गयी और बोली-‘क्या इस काम के लिये कोई महिला नहीं थी। हटो मैं संचालन करती हूं।’</p>
<p>वह मंच पर चढ़कर आ गयी और उससे माइक लेकर स्वयं डट गयी।उस संचालक पर तो जैसे वज्रपात हुआ क्योंकि वह उस संस्था का अध्यक्ष था और उसी ने ही इस सम्मेलन के प्रस्ताव को रखा था और पास कराया था। उसका मूंह उतर गया तो संस्था में उसके वह प्रतिद्वंद्वी खुश हो गये जो इस सम्मेलन को कराने के विरोधी थे।</p>
<p>उस महिला ने अखबारों की कटिंग दिखाकर  कुछ ऐसी खबरें जिनमें महिलाओं के खिलाफ अपराध किये गये थे उनको पढ़ना और उसके लिये पुरुष प्रधान समाज को जिम्मेदार ठहराने का सिलसिला शुरू किया। </p>
<p>तब एक दूसरी महिला खड़ी होकर बोली-‘‘यहां हमें  बताया गया है कि आज की चर्चा का विषय है ‘सास-बहु और ननद-भाभी  के मधुर संबंध कैसे हों’? आप तो विषय से हटकर बोल रहीं हैं।’</p>
<p>उसके पास ही उसकी बहु भी बैठी थी वह अपनी सास से बोली-‘‘अत्याचार तो अत्याचार है। खबर बतायेंगी तभी तो यह पता लगेगा कि कहां-कहां बहुओं पर अत्याचार हुए।’</p>
<p>तब दूसरी बुद्धिजीवी महिला भी माइक पर पहुंच गयी और उससे छीनकर बोली-‘हम पुरुषों द्वारा तय किये गये विषय पर नहीं बोलेंगे। हमें अपना विषय तय स्वयं करना चाहिए।’</p>
<p>अब तो वहां हलचल मच गयी। बहुएं और भाभियां चाहतीं थीं कि उनके साथ जो दुव्र्यवहार घर में होता है उस पर चर्चा की जाये और सास और ननदें चाहतीं थीं कि इसमें बहुओं द्वारा अपने अधिकारों के दुरुपयोग पर विचार किया  जाये।</p>
<p>माहौल गर्मा गया था और आयोजकों की घिग्घी बंध गयी थी। संस्था के एक सदस्य ने कहा-‘आज का किसी के मरने की खबर देकर स्थगित करते हैं और अगली तारीख पर आयोजित करेंगे। अभी जो नाश्ते का समय घोषित करते हैं फिर इसे स्थगित कर देते हैं।’</p>
<p>संस्था का अध्यक्ष बोला-‘‘पर वहां यह घोषित करने के लिये भी तो कोई महिला चाहिए। देखा नहीं मुझे किस तरह वहां से भगा दिया।</p>
<p>माहौल तनाव से भरा था। अब आयोजकों के समझ में नही आ रहा था कि क्या करें? किसकी मदद लें? सब बुद्धिजीवी महिलायें तो जोर-जोर से बोल रहीं थीं। अचानक उनकी नजर एक व्यंग्यकार महिला पर पड़ गयी। उस सभा में वही एक खामोश बैठी थी और मंद-मंद मुस्करा रही थी। मजे की बात यह कि उसे नहीं बुलाया गया था वह तो कहीं से सुनकर वहां आयी थी। अध्यक्ष उसके पास गया और बोला-‘‘आप हमारी कुछ मदद करे। पहले सबके लिये नाश्ते की घोषणा करें थोड़ी देर बाद किसी बहाने इस स्थगित कर दें।’</p>
<p>व्यंग्यकार महिला ने कहा-‘‘पर मैं तो यहां बिना बुलाये आयी हूं।  वैसे भी मैं केाई बुद्धिजीवी नहीं हूं बल्कि व्यंग्यकार हूं। नहीं.....नहीं............तुम क्या समझते हो कि मेरा कोई सम्मान नहीं है।’</p>
<p>उसने जब अधिक याचना की तो वह तैयार हो गयी। उसने मंच संभाला और पहले नाश्ते की घोषणा कर माहौल को ठंडा किया फिर थोड़ी देर बाद माइक पर आयी और बोली-‘‘ अब हम सब लोगों ने नाश्ता कर लिया है पर हमारा विषय तय नहीं है इसलिये अगली तारीख पर विषय तय कर लेंगे तब आपको सूचना दी जायेगी। हम फिर मिलेंगे।’</p>
<p>सब महिलायें  थोड़ा बहुत विरोध कर वहां से चलीं गयीं। थोड़ी देर बाद वह व्यंग्यकार महिला बाहर निकली तो देखा एक खाकी पेंट, सफेद शर्ट और सिर पर टोपी पहने एक आदमी खड़ा उसे देख रहा था और जैसे ही नजरें मिलीं तो वह खिसकने को हुआ तो वह पीछे से चिल्लाकर  बोली-‘अरे, तुम व्यंग्यकार होकर इस तरह यहां क्यों खड़े हो। अच्छा अपने लिये विषय तलाशने चपरासी की भूमिका में आये हो। अगर मुझे पता होता तो सब महिलाओं को बता देती और तुम्हारी धुलाई करवाती। तुम्हारे व्यंग्य वैसे ही मेरे समझ में नहीं आते पर तुम हो कि लिखना बंद नहीं करते।</p>
<p>वह अपनी साइकिल उठाकर बोला-‘‘अब हम दोनों ही यहां से निकल लें तो अच्छा रहेगा। मै इस वेश में इसलिये आया था कि चपरासी तो चपरासी होता है उसकी उपस्थिति पर भला कौन आपत्ति करता है पर अगर सूटबूट पहनकर आता तो हो सकता है कि बाहर भी कोई खड़ा नहीं रहने देता। यहां दोनों ही बिना बुलाये आये हैं अगर मैं इस पर व्यंग्य लिख दूं और महिलाओं का तुम्हारे बिना आमंत्रण के यहां आगमन की बात बता दू तो कैसा रहेगा? और बुद्धिजीवी और व्यंग्यकार में अंतर होता है ऐसा मैंने तुम्हारे व्यंग्यों में ही पढ़ा है।</p>
<p>महिला व्यंग्यकार ने कहा-‘ महिलायें अभी भी दूर नहीं हैं बुलवा लूं। खैर छोड़ो..............फिर उनको भी यह पता चल जायेगा कि मैं भी यहां बिना बुलाये आयी हूं और आयोजकों कहने से उनका सम्मेलन खत्म कराया गया है।’’</p>
<p>अगले दिन अखबार में सम्मेलन के उल्लास से संपन्न होने का समाचार था और व्यंग्यकार महिला का नाम तक उसमें नहीं था। <br />
<strong>यह हास्य व्यंग्य काल्पनिक रचना है और किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई लेना देना नहीं हैं अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा। इन पंक्तियों को लेखक किसी भी महिला व्यंग्यकार से कभी नहीं मिला<br />
</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अंग्रेजी नाम, हिंदी नाम-आलेख ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=151</link>
<pubDate>Fri, 09 May 2008 17:08:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=151</guid>
<description><![CDATA[अंतर्र्जाल पर हिंदी लिखते हुए मुझे एक ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h3>अंतर्र्जाल पर हिंदी लिखते हुए मुझे एक बात अनुभव हो रही है कि यहां रूढ़ता का भाव अपने हृदय में रखने को कोई मायने नहीं है। अंतर्जाल पर अनेक वेब साइटों और ब्लाग पर निकल रही हिंदी  पत्र-पत्रिकाओं के नाम हिंदी में है तो अंग्रेजी में नहीं और अंग्रेजी में है तो हिंदी में नहीं। मैं दोनों से संबंध रखता हूं और मेरी रुचि इस बात में है कि किस तरह अंतर्जाल पर हिंदी के पाठक अधिक से अधिक सक्रिय हों। मेरी कुछ पत्रिकाएं ब्लाग पर हैं और कुछ वेब साईटों की पत्रिकाओं पर मैं लिखता हूं। मैंरे अपने वेब पृष्ठों (ब्लाग) पर बनी पत्रिकाओं के नाम हिंदी में रखे हैं। बीच में मैंने अपनी इन पत्रिकाओं का अंग्रेजी नाम भी रखा था पर हिंदी एग्रीगेटरों से उनके जुड़ने  के बाद अंग्रेजी नाम हटा लिये। इसका पछतावा मुझे आज तक है।</h3>
<h3>एक बात तय है कि विश्व में भाषा की दूरियां अब कम हो रही हैं और ऐसे में वेब साइटों और वेब पृष्ठोंं पर बनी पत्र-पत्रिकाओं को किसी भाषाई रूढ़ता से उबरना होगा तो साथ ही अपनी मौलिकता से निर्वाह करना होगा। मैं बात कर रहा हूं उनके वेब साईटों और वेब पृष्ठों पर बने पत्र-पत्रिकाओं के शीर्षक और  नाम की। कई जगह पत्र-पत्रिकाओं का नाम अंग्रेजी है पर हिंदी में न होने के कारण उसके शब्द सर्च इंजिन में डालने पर वह उसके सामने नहीं आती तो अंग्रेजी मेें न होने के कारण उसका भी यही हश्र होता है। अब अनुवाद  टूल आने से हमें अब इस संभावना पर भी विचार करना चाहिए कि देश विदेश के अन्य भाषी लोग हिंदी के लेखकों और संपादकों से अपना संपर्क रखना चाहेंगे और यकीन मानिए वह हिंदी शब्द सर्च इंजिन में डालकर तलाश नहीं करेंगे। ऐसे में कोई हिंदी भाषी पत्र-पत्रिका (जो वेब साईट या वेब पृष्ठों   पर हैं) अगर अपना नाम अंग्रेजी में रखती है तो उस पर आपत्ति नहीं है पर अगर वह हिंदी में भी रखें तो अच्छी बात है। वैसे यह आवश्यक नहीं है कि अंग्रेजी के पाठक हिंदी की अंतर्जाल पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ना चाहें पर यह एक संभावना है जो हाल ही में बनी है। वैसे  अंग्रेजी नाम की वजह से कई पत्र-पत्रिकाएं  अन्य भाषियों में ही क्या अपनी भाषा वालों मे भी पैठ भी नहीं बना पाईं।</h3>
<h3>एक बात और है कि हिंदी भाषी पत्र-पत्रिकाओं के अंग्रेजी शीर्षक या नाम रखने वालों को यह समझना चाहिए कि ‘हिंदी’ में नाम होने से ही उनकी मौलिकता प्रकट होगी न कि अंग्रेजी से। अगर कोई विदेशी पाठक हिंदी सामग्री  को पढ़ना चाहेगा तो उसकी दृष्टि में सम्मान तभी बढ़ेगा जब हिंदी में शीर्षक होगा भले ही वह सर्च इंजिन में अंग्रेजी शब्द डालकर वहां तक आया हो। इसलिये अंतर्जाल पर वेब साईटों और वेब पृष्ठों (ब्लाग) पर चल रहीं पत्र-पत्रिकाओं को अपने नाम अंग्रेजी नाम के साथ हिंदी में रखना चाहिए, जिनके शीर्षक हिंदी में है वह अगर सोचते हैं कि अन्य भाषियों तक उनके लिए पहुंचना संभव है तो वह उसमें अंग्रेजी नाम भी जोड़ सकते हैं। वैसे श्रेणियों और टैग लगाकर भी यह काम हो ही रहा है। </h3>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[उनका नाम ही दरियादिल हो जाता-कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=372</link>
<pubDate>Fri, 09 May 2008 16:16:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=372</guid>
<description><![CDATA[अपने दिल का बयां कभी कभी
दूसरे के अल्फ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">अपने दिल का बयां कभी कभी</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">दूसरे के अल्फाजों में नजर आता है</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">वह दिल को छू जाता है</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">इसलिए कहते हैं </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">दर्द और खुशी दोनो ही</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">बांट लिया करो दोस्तों से<br />
 <br />
जश्न का मौका हो तो </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">मजा हो जाता दुगुना </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">गम आधा रह जाता है </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">खोये रहोगे अपने ही दिल में </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">तो रोशनी कहीं से नहीं आयेगी</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">जो सुनोगे किसी और की आवाज </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">तभी कोई मिलेगा आसरा </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">वरना कहते हैं कि </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">अकेला चना कभी भाड़ नहीं फोड़ पाता है</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">अपने लिये तो जिंदा हैं सब</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">बांटकर खाते हैं जो लोगों से मिलकर</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">उनका नाम ही दरियादिल हो जाता है<br />
............................<br />
</span></h3>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जो समझ में आया वही लिख दिया-आलेख ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=521</link>
<pubDate>Fri, 09 May 2008 15:21:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=521</guid>
<description><![CDATA[मेरे मित्र और उड़न तश्तरी ब्लाग के लेख]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मेरे मित्र और उड़न तश्तरी ब्लाग के लेखक श्री समीर लाल वाकई हिंदी ब्लाग जगत के उत्थान के लिए प्रयत्नशील हैं इसमें कोई संदेह नहीं है। वह मेरे ब्लागों पर सबसे अधिक टिप्पणी रखने वाले व्यक्ति हैं और मैं हृदय में उनके प्रति आत्मीयता का भाव रखता हूं पर उसका प्रदर्शन करना मुझे ठीक नहीं लगता। उनकी टिप्पणियां आमतौर से संक्षिप्त और औपचारिक  होती हैं पर उससे अपने अंदर एक प्रसन्नता की लहर दौड़ती है। मैं यह लेख उनकी प्रशंसा या समीक्षा के लिये नहीं लिख रहा हूं बल्कि कल उनकी टिप्पणी में जिस तरह दूसरे ब्लाग और टिप्पणियां लिखने के लिये अभियान चलाने की बात कही है उसी परिप्रेक्ष्य में मेरे मस्तिष्क में कुछ विचार आये जो शायद अलग प्रतीत हों पर  उनको रखना जरूरी समझता हूं। </p>
<p>श्री समीरलाल जी ने हिंदी में ब्लाग बढ़ाने तथा उन पर टिप्पणियां लिखने  की बात कहीं है वह मेरे अभियान का एक भाग है पर मैं हिंदी ब्लाग जगत लिये पाठक जुटाने के अभियान को भी कम वरीयता नहीं देता।  हिंदी ब्लाग में निराशाजनक स्थिति को मैं भी अनुभव करता हूं पर इसके लिये पाठकों की कमी भी एक महत्वपूर्ण पक्ष है। अंतर्जाल  हिंदी ब्लाग के लिये पाठकों की संख्या नगण्य है। इसलिये अनेक ब्लाग लेखक केवल हिंदी के ब्लाग सभी एक जगह दिखाने वाले एग्रीगेटरों पर हिंट पाने के लिये लिखते हैं और वहां साहित्य सृजन जैसा वातावरण अभी नहीं बन पाया है। अनेक ब्लाग लेखक अपने पाठों में यह बात लिख चुके हैं कि वह लिखने तो आये थे साहित्य और यहां अब कुछ अन्य लिख रहे हैं। मैं उनका लिखा पढ़कर यह बात मानता भी हूं कि वह वाकई साहित्य लिखते होंगे। देव और कृतिदेव फोंट में टाईप करने वाले अनेक लेखक यूनिकोड में लिखते हुए ब्लाग पर आये तो स्वयं मूल स्वरूप खो बैठे जिनमें मैं भी स्वयं भी शामिल हूं। अब देव और कृतिदेव को यूनिकोड मेंे बदलने वाला टूल आया है तब अनेक लोग खुश हुए क्योंकि उनको लगा कि वह अब पहले से अच्छे परिणाम निकाल सकते हैं। आज इतना बड़ा लेख लिखने का साहस मेरे अंदर केवल इसीलिये आया क्योंकि  सीधे कृतिदेव में लिख रहा हूं और यह टूल आये अभी अधिक वक्त नहीं हुआ। ऐसे में मुझे विश्वास है कि आगे और ब्लाग लेखक बेहतर लिखकर लेखक जुटाने का प्रयास करेंगे। इस समय जो हिंदी ब्लाग जगत पर लिखा जा रहा है उस पर दृष्टिपात किये बिना हम अगर किसी अभियान पर निकलेंगे तो शायद वहीं होंगे जहां अभी हैं। </p>
<p>शुरूआती दिनों में मैंने भी एग्रेगेटरों पर हिट पाने के लिये ऐसी पोस्टें लिखीं पर मुझे ध्यान आया कि एक लेखक के लिये अपने पाठकों की संख्या बढ़ाने वाले  व्यापक आधार वाले विषयों पर लिखना आवश्यक है। मैने हास्य कविताएं, आलेख, हास्य व्यंग्य, कहानियां, लघु कथाएं बहुत कठिनाई से यूनिकोड में लिखीं पर एग्रीगेटरों पर उनके हिट ने मुझे निराश किया।  फिर भी मैं आगे बढ़ता रहा यह सोचकर कि देखा जायेगा कि आगे क्या होता है? ब्लाग लेखक साथी हो सकते हैं पाठक नहीं यह बात मुझे अपने बढ़ते पाठक देखकर बहुत बाद में समझ आयी। तब मैंने तय किया कि अब आम पाठक को लक्ष्य कर लिखना चाहिए। फिर यह भी देखा कि मेरे ब्लाग पर आने वाला पाठक अन्य ब्लाग भी देखे ताकि वह अधिक से अधिक हिंदी भाषा के ब्लागों से परिचित हो सके इसलिये मैंने दूसरे ब्लाग लेखकों के भी ब्लाग लिंक किये ताकि अगर पाठक मुझसे  असंतुष्ट हो तो वह दूसरे का ब्लाग लेखकों  का लिखा पढ़कर वह यह समझ सके कि अंतर्जाल पर हिंदी में लिखने वाले भी कम नहीं है। यह मैने बहुत देर से किया फिर भी मेरे ब्लाग दूसरे ब्लागों  पर पाठक भेजते हैं। यह मैं बीस हजार की पाठक संख्या पार करने वाले ब्लाग की सूचनाओं में बता चुका हूं। उसमें यह भी बता चुका हूं कि किस तरह लोग जहां हास्य की सामग्री देखते ही  झपट पड़ते हैं। उसमें ‘हंसते रहो’ और ‘ठहाका’ ब्लाग को अधिक संख्या में मेरे ब्लाग से पाठक मिलना इसी बात का प्रमाण हैं। मेरे  ब्लाग से उड़न तश्तरी ब्लाग पर  भी पाठक जाते हैं और श्रीसमीरलाल जी के पास कोई काउंटर हो तो वह इसे देख सकते हैं। मैं श्रीसमीरलाल को बहुत पसंद करता हूं पर मेरे अज्ञात पाठक मेरी इस राय को नहीं जानते इसलिये उड़न तश्तरी के बाद लिंक किये गये ब्लागों पर अधिक गये-केवल इसलिये ही न कि  उसका नाम वहां किसी हास्य सामग्री होने का संदेश नहीं देता।<br />
केवल  नये ब्लाग बनवाने और टिप्पणियां लिखने से हिंदी ब्लाग जगत के लाभ की मैं संभावना नहीं देखता। सबसे बड़ी बात यह है कि विषय भी आम पाठक से सरोकार रखने वाला होना चाहिए। इस हिंदी ब्लाग जगत में मेरे कुछ मित्र हैं जो हमेशा ही कमेंट देते हैं और कुछ ब्लाग लेखक जब कोई जोरदार विषय होता है तो इस बात की परवाह नहीं करते कि मैंने उनको कभी टिप्पणी दी कि नहीं वह लिख जाते हैं।<br />
श्री समीरलाल जी अकेले ऐसे ब्लाग लेखक हैं जो ब्लाग से हटकर लिखे गये विषयों पर भी बहुत सारी टिप्पणियां प्राप्त कर लेते हैं पर इसका श्रेय उनके मधुर व्यवहार को जाता  है और टिप्पणियां तो इतनी करते हैं कि मैं भी सोचता हूं कि  यह व्यक्ति अगर ऐसा न करे तो मैं लिखूंगा कि नहीं। वह बहुत अच्छा लिखते हैं पर इतनी सारी हिट दिलाने के लिये यह अकेला कारण नहीं है। </p>
<p>        इस अंतर्जाल पर जो ब्लाग लेखक लंबे समय तक  लिखना चाहते हैं उनको सोचना अंतर्मुखी होगा पर लिखना बहिर्मुखी होगा। मेरे दिमाग में कुछ विचार हैं जो इस प्रकार हैं।</p>
<p>(1) अपने ब्लाग पर दूसरे के ब्लाग को भी लिंक दे। अकेले सफलता पाने का का विचार त्याग दें। कोई हमारा मित्र है या नियमित रूप से टिप्पणी करने वाला ब्लाग लेखक  तो लिंक दें अच्छी बात है पर यह भी देखें कि क्या कोई ऐसे ब्लाग लेखक भी हैं जो आपको कमेंट नहीं देते पर उनकी सामग्री पठनीय है तो उसे भी लिंक दें। हो सकता है उसकी वजह से  आपका ब्लाग पढ़ने आम पाठक आये क्योंकि वह सोचेगा कि यह आपके ब्लाग में लगा ब्लाग है वह ऊपर उसका पता थोड़े ही देखता है। मेरे मित्र उड़न तश्तरी और ममता श्रीवास्तव को पढ़ते हैं पर वह जाते मेरे ही ब्लाग से ही हैं-उनके ब्लाग का कोई अपने कंप्यूटर पर पता नहीं रखता।  हो सकता है कोई ऐसे भी लोग हैं जो मेरे ब्लाग पर इसलिये आते हों कि किसी दूसरे ब्लाग लेखक का ब्लाग मेरे ब्लाग से चिपका समझते होंं। जब तक नारद अभिव्यक्ति  पत्रिका से लिंक था मैं वहीं से उस पर जाता था-हो सकता है कि कुछ पाठक मेरे जैसे ही हों। अगर कोई अच्छा लिखने वाला ब्लाग लेखक है तो बिना किसी पूर्वाग्रह के उसका ब्लाग लिंक करें। इसके लिये आपको सभी ब्लाग पढ़ना पढ़ेंगे।<br />
(2)ब्लाग लेखकों को ऐसे विषयों पर ही ध्यान देना चाहिए जो सार्वजनिक हों। अगर कोई समाचार दे रहें हैं तो उसके साथ एक संपादक के रूप में भी विचार व्यक्त करें। याद रखिये जो आम पाठक यहां आते हैं वह उस ब्लाग लेखक की मौलिकता देखना चाहते हैं। महापुरुषों के संदेश लिखने वाली पोस्टों पर अनेक लोगों ने टिप्पणी लिखी थी कि अगर आप इनके साथ अपने विचार रखते तो बहुत अच्छा होता।<br />
(3)अपनी पोस्ट के साथ अधिकतम श्रेणियां रखें। कभी-कभी अंग्रेजी में भी टिप्पणियां रखें। हमारा  ब्लाग अंग्रेजी वालें भी पढ़ें यह तो चाहते हैं पर इस बात का ध्यान नहीं रखते कि अंग्रेजी वाले वहां कैसे आयेंगे। इसके अलावा अंग्रेजी शब्दों से भी हिंदी पाठक ब्लाग पर आते हैं<br />
(4)आलेख, निबंध, कविता, हास्य कविता, व्यंग्य और कहानी जैसे शब्द शीर्षक में लिख दें तो बढिया। मेरी वही हास्य कविताएं लोग पढ़ रहे हैं जिन पर मैंने ऊपर ही लिख दिया है।<br />
मैं जैसा हूं सबके सामने हैं। एग्रीगेटरों पर मैं हिट नहीं पाता यह सच है पर मुझे लगता है कि आम पाठकों का कुछ रुझान मेरी तरफ है। आम पाठकों की बात तो मैं ही लिखता हूं बाकी तो कोई नहीं बताता कि उसकी तरफ कैसा रुझान है? यह सबसे महत्वपूर्ण है। एग्रीगेटरों पर अनेक ब्लाग लेखकों से मित्रता मेरे लिए एक बोनस है क्योंकि मेरा मुख्य लक्ष्य पाठकों तक पहुंचना है। अभी सफलता दूर है पर मैंने भी ऐसा क्या लिख दिया है कि उछलता फिरूं। सच तो यह है कि कृतिदेव का यूनिकोड टूल मिलने के बाद तो मैंने सहज भाव से लिखना शुरू किया है और मैं जानता हूं कि यह सफलता अकेले चलने से नहीं मिलेगी इसलिये चाहता हूं कि अन्य ब्लाग लेखक भारी सफलता पायेंगे तो कुछ मेरे हिस्से में भी आयेगी। आखिरी बात यह है कि मैं कोई सिद्ध व्यक्ति नहीं हूं जो यह कहूं कि जो मैने लिखा है वही सही है। जो अनुभव किया वही लिख रहा हूं और हो सकता है कई इससे सहमत न हों और इसकी संभावना रहेगी भी क्योंकि ब्लागवाणी के हिट इस बात का प्रमाण है कि मेरे हाथ से कोई हिट पोस्ट नहीं निकली। वैसे भी मैं अपने कंप्यूटर की समस्याओं से एक महीने से परेशान हूँ और इधर कही बिजली तो कभी आंधी मेरी पोस्ट को रोक देती हैं।शेष फिर कभी	</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मोबाइल मोहब्बत हो गई-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=150</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 17:50:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=150</guid>
<description><![CDATA[प्रेमी ने प्रेमिका के मोबाइल की
घंटी ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">प्रेमी ने प्रेमिका के मोबाइल की<br />
घंटी बड़ी उम्मीद से बजाई<br />
जा रही थी वह गाड़ी पर<br />
चलते चलते ही उसने<br />
अपने मार्ग में होने की बात उसे बताई<br />
फिर भी वह बातें करता रहा<br />
वह भी सुनती रही<br />
सफर गाड़ी पर उसका चलता रहा<br />
अचानक वह कार  से टकराई<br />
प्रेमी को भी फोन पर आवाज आई<br />
प्रेमी ने पूछा<br />
‘क्या हुआ प्रिये<br />
यह कैसी आवाज आई<br />
कोई ऐसी बात हो तो मोटर साइकिल पर<br />
चढ़कर वहीं आ जाऊं<br />
मुझे बहुत चिंता घिर आई’<br />
प्रेमिका ने कहा<br />
‘घबड़ाओ नहीं कार से<br />
मेरी गाड़ी यूं ही टकराई<br />
अपनी मरहम पट्टी कराकर अभी आई<br />
करा देगा यह कार वाला उसकी भरपाई+’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">प्रेमी करता रहा इंतजार<br />
फिर नहीं प्रेमिका की कोई खबर आई<br />
एक दिन भेजा संदेश<br />
‘जिससे मेरी गाड़ी टकराई<br />
उसी कार वाले से हो गयी  मेरी सगाई<br />
बहुत हैंडसम और स्मार्ट है<br />
उसने मुझ पर बहुत दया दिखाई<br />
इन दो पहियों की गाड़ी से<br />
तो अब हो गयी ऊब<br />
चार पहियों वाली गाड़ी में ही<br />
अब घूमने की इच्छा आई’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">प्रेमी सुनकर चीखा<br />
‘यह कैसा मोबाइल है<br />
जिसने मोहब्बत को भी बनाया<br />
अपने जैसा<br />
कितना बुरा किया मैंने जो<br />
उस दिन मोबाइल की घंटी बजाइ<br />
..............................................</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">नोट-यह हास्य कविता काल्पनिक है तथा इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।<br />
</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पसीना ही कविता लिखवाता है]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=520</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 16:51:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=520</guid>
<description><![CDATA[बदलते मौसम के साथ
मन भी यूं बदल जाता है
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बदलते मौसम के साथ<br />
मन भी यूं बदल जाता है<br />
जैसे उसके साथ बंधे हों हाथ<br />
ग्रीष्म के जलती दोपहर में<br />
व्यग्रता इतनी बढ़ जाती है<br />
नरक लगता हो  जीवन<br />
शाम होते बहती ठंडी हवा का<br />
एक झौंका भी शीतल कर देता है<br />
मौसम और मन के पहिये<br />
घूमते देख कौन कह सकता है<br />
हमारा मन भी होता है कभी हमारे साथ<br />
..........................</p>
<p>गर्मी की दोपहर में<br />
साइकिल पर चलते हुए<br />
पसीने में नहाए मैंने उसे देखा है<br />
लिखता है कविता वह हसंते  हुए<br />
कभी  उसे रोते नहीं देखा है<br />
पूछने पर बताता है<br />
उसके दोपहर का पसीना ही<br />
रात में शीतलता देकर उससे कविता लिखवाता है<br />
मैं उसे केवल आईने में ही देख पाता हूं<br />
क्योंकि वह चेहरा<br />
केवल उसी में नजर आता है </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इस ब्लाग (पत्रिका) की पाठक संख्या बीस हजार के पार]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=371</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 14:15:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=371</guid>
<description><![CDATA[12 दिसंबर 2007 को इस हजार की संख्या पार कर च]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>12 दिसंबर 2007 को इस हजार की संख्या पार कर चुके इस ब्लाग ने कल बीस हजार की पाठक संख्या को पार कर लिया। इस संख्या को पार करने वाला यह मेरा  दूसरा ब्लाग है।<br />
इस ब्लाग के साथ मेरी दिलचस्प याद जुड़ी हुई है। ब्लागस्पाट पर टाईप करते हुए यूनिकोड में अपनी पहली पोस्ट छोटी कविता के रूप  में इसी पर रखी-क्योंकि मुझे उसमें बड़ी पोस्ट लिखने में दिक्कत आ रही थी-और सबसे पहला कमेंट भी इस पर आया। उससे पहले मैंने सभी तीनों ब्लाग पर कृतिदेव की पोस्ट रखी थी और मैं मानकर चल रहा था कि अब उसी से आगे जाना है। जब कुछ ब्लाग  लेखक उन ब्लाग पर मुझसे यूनिकोड में लिखने को कह रहे थे तो भी मैं उसकी परवाह नहीं कर रहा था। ऐसे में कोई महिला ब्लाग लेखिका (जिससे  बाद में  फिर संपर्क नहीं हो सका) ने मुझे इस  बारे में ईमेल भेजकर रोमन हिंदी में लिख रही थी कि मेरे ब्लाग पढ़ने मेंे नही आ रहे तब मैंने उसे इस ब्लाग का पता दिया। उसने लिखा-‘वहां तो सब पढ़ने में आ रहा है। वाह,वाह बढ़िया  । मगर उसने कोई कमेंट इस पर नहीं लिखी। हां, मैने तब यूनिकोड में लिखने का निर्णय लिया।</p>
<p>नारद पर उसी समय इसे पंजीकृत नहीं कराया पर ब्लागवाणी के अभ्युदय के साथ ही दोनों जगह इसे पहुंचाया और हिंदी ब्लाग पर तो यह पहले से ही था। यह मेरा ऐसा ब्लाग रहा है जो बिना फोरम पर दिखे भी वर्डप्रेस के डेशबोर्ड पर नंबर एक पर आया था। फोरमों पर दिखने से पहले ही यह ब्लाग अपने लिये तीन  हजार पाठक जुटा चुका था। तब अनुभव की कमी के कारण मुझे समझ में कुछ नहीं आता था पर बाद में यह बात समझ में आयी कि ब्लाग का मार्ग फोरमों से आगे भी जाता है। ब्लाग की डालरों में बताने वाली वेब साईट के मुताबिक यह मेरा सबसे महंगा ब्लाग है। हालांकि फिर भी यह अन्य ब्लाग लेखकों के ब्लाग के मुकाबले बहुत सस्ता है पर फिर भी मैं इससे संतुष्ट हूं। मुझे इस ब्लाग से एक ही संदेश मिलता है‘डटे रहो, तुम जिस रास्ते पर चल रहे हो उससे विचलित नहीं हो’। जिस तरह से पिछले पंद्रह दिन से यह ब्लाग व्यूज ले रहा था उससे मुझे लग रहा था कि  आज शाम तक यह जादूई आंकड़ा पार करेगा पर कल इसने अपने पुराने तेवर दिखाये जब मैं इस पर पोस्ट डालने लगा तो उसी समय यह इस आंकड़े को पार करने की तैयारी में लग रहा  था और आज तो यह उससे भी आगे जा रहा है।</p>
<p>नीचे इस ब्लाग की प्रथम बीस पोस्ट जिन्हें अधिक पाठकों ने देखा और विभिन्न फोरमों से मिलने वाले व्यूज की संख्या। यह स्पष्ट संदेश कि अध्यात्म और व्यंग्य पर ही मुझे लिखते रहना चाहिए। अपने ब्लाग लेखक मित्रों, पाठकों और समय समय पर तकनीकी विषय पर सहायता देने वाले मित्रों का मैं हृदय से आभारी रहूंगा। दूसरों को बहुत लघु लगने वाली यह उपलब्धि मेरे लिये बहुत महत्वपूर्ण है।</p>
<p><strong>प्रथम बीस पोस्ट</strong></p>
<p><strong>------------------</strong><br />
रहीम के दोहे:सुख में अंहकार दु:ख में कुं 244 <br />
चाणक्य नीति:विद्या की शोभा उसकी सिद्धि  205 <br />
मेरा परिचय=दीपक भारतदीप, ग्वालियर  202 <br />
चाणक्य नीति:परोपकार मधुमक्खी से सीखें  175 <br />
पहले आतंकवाद आया कि पर्यावरण प्रदूषण  175 <br />
रहीम के दोहे:जहाँ उम्मीद हो वहीं जाएं  146 <br />
रहीम के दोहे:मछली का जल प्रेम प्रशंसनीय  142 <br />
चाणक्य नीति: कुत्ते और कौवे से गुण ग्रहण 126 <br />
चतुराई से मुट्ठी में कर लो-हास्य कविता  123 <br />
चलना ज़रा संभल कर-हास्य कविता  119 <br />
आज नवमी-भक्तों के रक्षक हैं भगवान् श्रीर 117 <br />
रहीम के दोहे:परिश्रम कर भोजन ग्रहण करें  115 <br />
चाणक्य नीति:पांच वस्तुओं का संग्रह अवश्य 115 <br />
चाणक्य नीति:बेमौसम राग अलापना हास्यास्पद 115 <br />
दादा-पोते की राजनीति और मनोरंजन  112 <br />
मन के बहरों के आगे क्या बीन बजाना  111 <br />
चाणक्य नीति:क्रोध उतना ही करें जितना निभ 104 <br />
दिल हुआ इधर से उधर  103 <br />
असल पर नक़ल का राज  101 <br />
चाणक्य नीति:प्रेम और व्यवहार बराबरी वाले १००<br />
चाणक्य नीति:मनुष्य को हर विधा में पारंगत 100</p>
<p><strong>Referrer Views (पाठकों के आने के मार्ग)</strong></p>
<p><strong>---------------------------------</strong><br />
blogvani.com 718<br />
narad.akshargram.com 369<br />
hi.wordpress.com/tag/%E0%A4%9A%E0%A4%… 223<br />
filmyblogs.com/hindi.jsp 187<br />
botd.wordpress.com 165<br />
chitthajagat.in 151<br />
 </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गरीबों का खाना सहता कौन है? हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=149</link>
<pubDate>Sat, 03 May 2008 16:18:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=149</guid>
<description><![CDATA[अमेरिका के राष्ट्रपति जार्जबुश ने कह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#800080;">अमेरिका के राष्ट्रपति जार्जबुश ने कहा है कि विश्व में खाद्यान्न संकट के लिये भारत के लोग ही जिम्मेदार हैं क्योंकि वह ज्यादा खाते हैं। उनके इस बयान पर यहां बवाल बचेगा यह तय बात है और यह भी  कि अमेरिका में रहने वाले भारतीय भी अब वहां संदेह की दृष्टि से देखें जायेंगे। अगर कहीं अकाल यह बाढ़ की वजह से  अमेरिका में कभी खाद्याान्न का संकट आया तो उसके लिये भारतीयों पर ही निशाना साधा जायेगा। वैसे तो वहां पाकिस्तान और बांग्लादेश के लोग भी हैं पर अब वह बच जायेंगे और कभी ऐसा अवसर आया तो वह भी भारतीयों पर चढ़ दौड़ेंगे कि यही लोग सब जगह ज्यादा खाकर संकट खड़ा करते हैं। </span></p>
<p><span style="color:#800080;">ऐसा लगता है कि लोकतंत्र बहाल होने के बाद अमेरिका अब पाकिस्तान पर मेहरबान हो रहा है और उसे किसी तरह अपने कैंप में रखना चाहता है इसलिये उसे अब विश्व का संकट वहां पनप रहा आतंकवाद नहीं बल्कि भारतीयों द्वारा अधिक खाने के कारण खाद्यान्न संकट  दिख रहा है। ऐसा भी हो सकता है कि भारत और पाकिस्तान के लोगों का  करीब आना अमेरिका को सहन नहीं हो रहा है और परोक्ष रूप से पाकिस्तान के लोगों को यह संदेश दिया जा रहा हो कि इन भारत के लोगों से बचने का प्रयास करें क्योंकि अधिक खाते हैं और तुम्हारा अनाज भी खा जायेंगे। </span></p>
<p><span style="color:#800080;">अमेरिका की स्थिति अब डांवाडोल होती जा रही है क्योंकि इराक और अफगानिस्तान उसका बहुत बड़ा सिरदर्द साबित होने वाले हैं। अमेरिका भारत से जैसी  अपेक्षा कर रहा है वह पूरी नहीं हो रहीं हैं क्योंकि यहां की आंतरिक स्थिति भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। जार्जबुश का यह बयान किसी ऐसे ही तनाव  का  परिणाम प्रतीत  होती  है क्योंकि उनको अपने राष्ट्रपति  चुनाव से पहले यह भी पता नहीं था कि भारत है किस दिशा में। उनकी विदेशमंत्री कोंडला राइस भारत आती रहतीं है और फिर चली जातीं हैं। भारत की विविधताओं और विशेषताओं का उनको पता हो इस पर संदेह है। उनके बयान के बाद ही उसके समर्थन में जार्जबुश का यह कथन सामने आया है।</span></p>
<p><span style="color:#800080;">जार्जबुश के इस कथन में हमें इसमे कोई दोष नहीं देखना चाहिए क्योंकि वह एक अमीर राष्ट्र के प्रधान हैं। अमीरों की यह मनोवृत्ति होती है कि उनको गरीब का खाना, पीना और चैन से सोना  पसंद नहीं है-क्योंकि उनके नसीब से  यह चीजें चलीं जातीं हैं जब धन उनके पास आता है। मेरी नहीं तो कविवर रहीम के बात तो आप मानेंगे ही जो कह गये हैं कि अमीरों की पाचन शक्ति कम होती है। अब यह तो सब जानते हैं कि इस देह का सारा खेल भोजन की पाचन शक्ति पर निर्भर करता है। अगर वह नहीं है तो नींद अच्छी नहीं आयेगी और उसकी वजह से तनाव रहेगा।  अमेरिका के लोग भारतीय अध्यात्म इतने फिदा क्यों हैं? भारत के योग का प्रचार वहां क्यों बढ़ा है? क्योंकि अमेरिका में सुख-सुविधाओं के चलते शारीरिक परिश्रम का प्रचलन कम होता जा रहा है। हालत यह है के ढोंगी और पाखंडी बाबा भी वहां अपने चेले बनाकर अपना काम चला रहे हैंं।  मतलब यह कि भारतीयों के खाने पर यह की गयी टिप्पणी उनके ऐसे ही किसी तनाव का परिणाम लगती है जो इस समय उनके दिमाग में है।<br />
इस देश में कई बार ऐसे भी दृश्य देखने को मिल जाते हैं कि सड़क पर लोग अपने ट्रकों और ट्रालियो के नीचे गर्मियों की दोपहर में मजदूर लोग खाना खाकर ऐसी नींद लेते हैं कि अमीरों को एसी में भी वह नसीब नहीं होती। </span></p>
<p><span style="color:#800080;">अमीरों को इस बात से सुख नहीं मिलता कि उनके पास संपत्ति, वैभव और प्रतिष्ठा है उनको यह दुःख सताता है कि उनके सामने रहने वाले गरीब उसके बिना कैसे जिंदा है? वह इतने आराम की नींद कैसे लेते है जबकि उनको इसके लिये गोलियां लेनी पड़ती है। हम जार्ज बुश का क्या कहें अपने देश के अमीर लोग भी क्या इससे अलग सोचते हैं और अब तो ऐसे राष्ट्राध्यक्ष का बयान आया है जिसको यहां का धनवान वर्ग बहुत मानता है और अब यहां गरीबों के खाने पर आक्षेप होंगे। अब यह भला कौन समझाए कि मेहनत करने से भूख अच्छी लगती है तो खाना भी आदमी खाएगा और खाएगा तो मेहनत भी करेगा। अच्छी भूख लगना और ईमानदारी से आय अर्जित करना  प्रत्येक व्यक्ति के भाग्य में नहीं होता।  </span></p>
<p><span style="color:#800080;">अमेरिका द्वारा सुझाये गये आर्थिक मार्ग पर यह देश चलता जा रहा है पर अभी भी किसानों की मेहनत पर ही इस देश की अर्थव्यवस्था जिंदा है। उद्योग की चमक जो शहरों में दिख रही है वह केवल कृत्रिम है यह सत्य तो कोई भी देख सकता है। अमीरों के पास राज है तो रोग भी हैं और उसके इलाज के लिये धन भी है पर गरीब के पास सिवाय अपनी देह के और क्या होता है और वह अगर उसे भी न बचाने तो जाये कहां। जिस औद्योगिक और तकनीकी विकास की बात कर रहे हैं उसमें गैर तकनीकी श्रमिकों और कर्मचारियों के लिये कोई जगह दिखती भी नहीं है और ऐसे संघर्ष में जो आदमी अगर रोटी कमा कर अपना चला रहा है उसके पास इतना समय भी नहीं होता कि अपने मन का दर्द किसी को सुना सके-वह तो उसके पसीने की बूंदों के साथ बाहर निकल जाता है। ऐसे में कई अमीर भी आक्षेप करते हैं कि गरीब अधिक खाते हैं इसलिये गरीब हैं ऐसे में अगर बुश साहब ने भी यह कह दिया तो उस पर अधिक परेशान होने की जरूरत नहीं है।</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ कम दर्शकों द्वारा फिल्म देखने की शिकायत बेमानी-आलेख]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=368</link>
<pubDate>Sat, 03 May 2008 12:11:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=368</guid>
<description><![CDATA[आज मैने एक अंग्रेजी ब्लाग पर पाकिस्ता]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आज मैने एक अंग्रेजी ब्लाग पर पाकिस्तानी फिल्म ‘खुदा के लिये’ के बारे में चर्चा पढ़ी। अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद के जरिये पढ़ी इस चर्चा में भारत में इसे अधिक दर्शकों द्वारा न देखने का उल्लेख किया गया। इसकी तारीफ में बहुत सारे कसीदे भी पढ़े गये। मुझे वहां एक अनाम व्यक्ति की टिप्पणी भी दिखी जिसमें उसने इस बात का उल्लेख किया कि फिल्म में कोई बड़ा भाई है जो अपने एक गोरे  छात्र को बता रहा है कि ताजमहल का निर्माण हम मुसलमानों ने किया है। उस टिप्पणी देने वाले ने यह बात भी स्पष्ट की कि यह पाकिस्तान की फिल्म न होकर एक धर्म के लोगों को संदेश देती है कि वह अपने धार्मिक भावनाओं को अपने देश से अधिक महत्व दें।  साथ ही यह भी दर्शाती है कि पाकिस्तान का एक बहुत बड़ा वर्ग अभी भी भ्रम का शिकार है। उस टिप्पणीकार ने लिख कि ताजमहल क निर्माण में आगरा और उसके आसपास के लोगों ने काम किया इसलिये उसे किसी विशेष से जोड़ना ठीक नहीं है। मै उसकी इस बात से सहमत था।</p>
<p>इसमें अमित नाम के व्यक्ति की टिप्पणी भी थी कि जिसने इसका उल्लेख किया गया था। मतलब यह है कि भारत के बुद्धिजीवी भी बहुत सारे भ्रमों के शिकार हैं। वह इस बात को नहीं समझ रहे कि जिस तरह विदेशों से आयातित विचारधाराओं और नारों से पूर्वाग्रहों से ग्रसित   हैं वैसे ही पाकिस्तानी भी मजहब की भावनाओं से बंधे हैं। दोनों तरफ एकता के नाम पर पाकिस्तानी ऐसी सामग्री इस देश में लायेंगे जो उनके पूर्वाग्रहों से सुसज्जित होंगी। </p>
<p>पहले ताजमहल की बात कर लें। ताजमहल शाहजहां ने बनवाया था-हालांकि कुछ लोग इस पर भी विवाद खड़ा करते हैं-ऐसा कहा जाता है पर उसमें खून पसीना बहाया था मजदूरों ने और उसकी कीमत चुकाई थी इस देश के किसानों और व्यापारियों ने। उस समय कोई उद्योग नहीं थे और न कोई आयकर था। सर्वाधिक वसूली किसानों की उपज और बाहर से आने वाले व्यापारियों से होती थी। शाहजहां ने कोई घर से पैसा नहीं लगाया बल्कि इस देश की गरीब जनता की खून पसीने से लगान के रूप में या जमीदारों और साहूकारों से कर उसे इस एतिहासिक इमारत में लगाया गया। कुछ इतिहासकार कहते हैं कि ताजमहल पर बहुत अधिक व्यय से भी राज्य की आर्थिक स्थिति खराब हो रही थी इसलिये उसके पुत्र औरंगजेब ने अपने पिता को हटाकर राज्य अपने कब्जे में ले लिया। मतलब उसे अपनी माता की स्मृति में बनाये गये इस स्मारक से अधिक अपने राज्य की दुर्दशा ने कष्ट पहुंचाया और उसने राज्य हथिया लिया।</p>
<p>पाकिस्तान के बुद्धिजीवियों की अगर ऐसी हालत है तो उनसे किसी प्रकार का संपर्क इस देश के लिये लाभदायक नहीं रहने वाला है। जो इतिहास ( जिसे कुछ विद्वान झूठ का पुलिंदा भी मानते हैं) का बोझ अपने सिर पर रखकर चलते हैं वह चिंतन और अध्ययन से परे होते हैं। पाकिस्तान के फिल्मकार और बुद्धिजीवियों भी इसका शिकार हैं। अगर वह विदेश में भारत की एतिहासिक इमारतों के निर्माण का गौरव अपने मजहब के नाम से दिखाते हैं तो फिर उनसे यह आशा करना बेकार है कि वह इस देश के आम लोगों के सच्चे सहानुभूति प्रदान करने वाले हैं।</p>
<p>मैंने वह फिल्म नहीं देखी। न उसमें मेरी रुचि है क्योंकि इस तरह की फिल्में मुझे किसी तरह का मनोरंजन नहीं देतीं। जहां तक ज्ञान की बात है तो अभी बहुत सारी किताबें हैं जिससे पढ़ना है और मनोरंजन तो साहित्य  या संगीत ही से हो पाता है और हिंदी में लिखा अभी पूरा पढ़ा भी नहीं हैं सो एक पाकिस्तानी फिल्म क्या दिखायेगी जबकि भारतीय फिल्में भी इससे परे हैं। इसी ब्लाग में मैंने पढ़ा कि उसमें कोई प्रेम कहानी है। भारत हो या पाकिस्तान की कोई भी फिल्म प्रेम कहानी के बिना बनती नहीं। हां कुछ फिल्मकार उसकी आड़ में अपने  के धनदाता के  विचारों के  के अनुसार कुछ धार्मिक और सांस्कृतिक पुट डालते हैं ताकि वह प्रसन्न रहें। यह भी कोई ऐसी फिल्म रही होगी। भारतीय दर्शक अगर उसमें कम रुचि ले रहे हैं तो इसका कारण यही है कि उनको पता चल गया था कि इस फिल्म में कला के नाम पर कुछ नहीं है। अब इस तरह कुछ लोग हमारे देश की मानसिकता पर प्रश्न उठा रहे हैं तो पहले उन्हें यह भी देखना चाहिए कि इस देश में सैंकड़ों फिल्में बनती हैं और उनसे भरपूर मनोरंजन होता है तब क्यों वह ऐसी साधारण फिल्म को देखना चाहेगा जिसका प्रचार केवल इसलिये हो रहा है कि उसे एक पाकिस्तानी ने बनाया है। जहां तक मेरी जानकारी है पाकिस्तान में भी भारतीय फिल्में इस पर भारी पड़ीं हैं। ऐसे में क्यों केवल भारत में इसको कम देखे जाने की शिकायत हो रही है। वैसे भी भारत के आम लोग इस बात को समझ गये हैं कि फिल्मों की आड़ में किस तरह उस पर  ऐसी संस्कृति और काल्पनिक घटनायें प्रस्तुत की जा रही है जो उसकी समझ से परे है और जो कथित विद्वान उस पर दाद चाहते है वह स्वयं भ्रमित हैं.</p>
<p><strong>it transtalshan by googl tool</strong></p>
<div id="result_box" dir="ltr"><strong>The complaint by the audience could reduce redundant - Stories</strong></div>
<div id="result_box" dir="ltr">
<div id="result_box" dir="ltr">Today I on an English Blog Pakistani film 'for God' read about. Hindi translation from English to read through this discussion in India in more viewers by not see it mentioned. It also praised the many embroidered were read. There's an anonymous person I see a comment which he also noted that this is a film in a big brother who is a student tell the Europeans is that we Muslims have done to build the Taj Mahal. He made the comment it's also clear that this is Pakistan's film and not a religion of the people is that it gives a message to his religious feelings of more importance to his country. It also shows that a large section of Pakistan is still a victim of confusion. Has been a commentator writing that the construction of the Taj Mahal, Agra and nearby people have worked so it is not proper to link a particular. I agree with her.</p>
<p>The name of Amit person who commented that it was also mentioned. This means that India's intellectuals are also a lot of confusions of the victims. He does not understand the fact that the kind of slogans and ideologies imported from abroad prejudices are so obsessed with the feelings of Pakistanis also bound by religion. On both sides of unity in the name of the Pakistani such material in this country who will be equipped with their prejudices.</p>
<p>Before talking about the Taj Mahal. Shah Jahan built the Taj Mahal - even though some people are standing dispute - It is said of the blood and sweat of the workers had poured out his price was paid in this country, farmers and traders. At that time there were no industry and no income tax. The recovery of most farmers produce coming from outside and from traders. Shah Jahan had not put any money from the house but the poor people of this country's blood, sweat or rent in the form of landlord and capilist it was put up in this historical building. Some historians say that too much expenditure on the Taj Mahal, the state's economic situation was so bad that his son Aurangzeb to his father removed his capture in the state. It means to the memory of his mother made to the memorial over the plight of his state and he has brought pain and grabbed the state.</p>
<p>Pakistan's intelligentsia such circumstances, if any kind of contact with them for this country living is not profitable. The history (which some scholars believe the lies of the sheaf) burden to place on their heads walk beyond the thought and study them. Pakistan is also a victim of the filmmakers and intellectuals. India's Foreign If the historical buildings, the pride of building your faith in the name of the show, then expect him to waste to the country's ordinary people who provide genuine sympathy.</p>
<p>I have not seen the film. It is not my interest because this kind of films I do not let any kind of entertainment. As far as knowledge is concerned, it is still a lot of books that are read and entertainment, literature or the music gets to be written in Hindi and read are not yet complete So what a Pakistani film show, while Indian films are also beyond it. I read it in this Blog a love story. India, Pakistan or any film without the love story going. Yes, some of his screen his film-contributory, according to the views of some religious and cultural be happy to put it to kill. It is also a film will be. Indian audiences less interested if there are reasons, it is that they discover that the film was in the name of art is nothing. Now this kind of mentality of our country some people are taking the first question they should also see that this country hundreds of films made and they are full of entertainment then why is he wants to see a film simply because it is only a publicity That has made him a Pakistani. As far as I know the Indian films in Pakistan, also fell on heavy. So why in India, only to see it reduced the complaint is happening. The common people of India have to understand that this movie screen in a culture of how the fictional incidents and is being submitted beyond the understanding of his and which he allegedly learned he is wanted on ringworm are confused</p></div>
</div>
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<title><![CDATA[हिंदी-अंग्रेजी टूल बहुत दिलचस्प लगा-आलेख (2)]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=519</link>
<pubDate>Sat, 03 May 2008 11:44:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=519</guid>
<description><![CDATA[हिंदी -अंग्रेजी अनुवाद  टूल का मैं कल स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हिंदी -अंग्रेजी अनुवाद  टूल का मैं कल से उपयोग कर रहा देख रहा हूं तो उसमें सुखद आश्चर्य का  अनुभव हो रहा है। प्रथम तो यह कि यदि शुद्ध हिंदी भाषा को लिखेंगे तो ही वह स्वीकार करेगा। कहीं पाठ को लिखने के दौरान उर्दू या इंग्लिश शब्द का उपयोग किया तो वह उसे स्वीकार नहीं करेगा। जैसे भावनाओं को जजबात नहीं लिख सकते। धर्म को मजहब नहीं लिख सकते । भ्रम को गलतफहमी लिखेंगे तो वह कोई नहीं पढ़ पायेगा। अगर कोई हिंदी शब्द लिखने में गलती कर जाते हैं तो अंग्रेजी में अनुवाद करने वाला टूल उसे अनुवाद करने की बजाय वैसे का वैसे ही प्रस्तुत कर देता है। </p>
<p>मै अंग्रेजी में अनुवाद से पहले अपनी देवनागरी भाषा  में पाठ लिखने के बाद उसे यूनिकोड टूल में ले जाता हूं फिर उसे अनुवाद टूल में रखता हूं और जब उसमें कोई लिख गया शब्द नहीं बदला होता है तो उसे पहले अपने मूल पाठ में सही करता हूं। एक से अधिक शब्द होने पर सभी शब्दों को पुनः लिखने के बाद फिर उसे यूनिकोड में बदलने वाले टूल पर लाता हूं वहां से फिर अनुवाद वाले टूल पर कर देखता पड़ता है कि सही हुआ कि नहीं। बहरहाल अब यह तो इग्लिश में पढ़ने वाले ही तय करेंगे कि उसका परिणाम कैसा है पर एक बात निश्चित है कि वह अगर ऐसे टूलों से ही हिंदी पढ़ने वाले हैं तो उसके लिये मेरे द्वारा किये गये थोड़े प्रयास भी मेरे द्वारा रचित पाठ को अधिक पढ़ने योग्य बना देंगे बनिस्बत अन्य हिंदी ब्लाग के उन पाठों  के जो इस अनुवाद वाले टूल पर परीक्षण करके नहीं रखे गये। कल कुछ ब्लागर लिख रहे थे कि इसमें कुछ कमियां है और इसका उपाय यह है कि जो ब्लागर चाहते हैं तो उनके सामने दो रास्ते हैं कि वह अपने पाठ का इस अनुवाद टूल पर परीक्षण कर देखें कि उसमें पूरे शब्द अंग्रेजी में आ रहे हैं कि नहीं, जो नहीं आ रहे उनमें परिवर्तन कर फिर देखें और अपनी पोस्ट रखें दूसरा यह कि  छोड़ दे पढ़ने के इच्छुक पाठक के लिये जो इस टूल से वैसा ही पढ़ेगा जैसा कि अपने रखा है पर उसके लिये उसे यह टूल लाना पड़ेगा। ऐसे में वह शायद जहमत न उठाये तो आपने अगर अपना पाठ अंग्रेजी में रखा है तो वह पढ़ ही लेगा।</p>
<p>मैने कुछ पोस्टों पर प्रयोग किया और पाया कि वैसी भाषा किसी के लिये नहीं हो सकती जिसका वह पाठक है पर भाव तो समझा ही जा सकता है। मैंने आज कुछ इंग्लिश ब्लाॅगरों की पोस्ट को हिंदी में पढ़ा। उसमें बहुत दिक्कत है पर अंग्रेजी और हिंदी दोनों के पाठ मेरे सामने थे तो भाव और अर्थ मैंने एकदम समझ लिया। मैं यह कह सकता हूं कि मैंने आज जो इंग्लिश ब्लाग देखे वह पूरी तरह पढ़े और समझे हैं। उनकी विषय वस्तु पूरी तरह वैसे ही मेरे समझ में आयी जैसा उसका लेखक चाहता था। थोड़ी मेहनत हुई पर जिस तरफ विश्व का ब्लाग जगत बढ़ रहा है उसकी दृष्टि से वह कोई अधिक नहीं थी। इंग्लिश-हिंदी अनुवाद टूल का मतलब यह है कि आप दुनियां की पंद्रह भाषाओं में घुसपैठ कर सकते हैं और जब ऐसा करेंगे तो दूसरी भाषा के ब्लागर भी ऐसा ही करेंगे। भले ही अनुवाद के पाठ ऐसे नहीं आ रहे जैसे अपेक्षित हैं पर वह इतने बुरे नहीं है कि संवाद कायम करने के लिये काफी न हों। समय की कमी के कारण कुछ लोग इस पर अधिक काम न करें पर जिनके पास समय है वह पूरी दुनियां में अनेक भाषाओं में अपने मित्र बनायेंगे। क्या यह आश्चर्य नहीं होगा कि जब कोई चीनी अपनी हमारी पोस्ट को अपनी भाषा में पढ़ने का प्रयास करेगा।<br />
              हालांकि मैंने अपनी कुछ पोस्टों का अंग्रेजी अनुवाद कर उसे ब्लाग पर प्रस्तुत किया है पर हमेशा ऐसा नहीं करूंगा पर यह तय है कि उनको लिखने के बाद इंग्लिश अनुवाद टूल पर परीक्षण कर उसे इस लायक तो बनाऊंगा कि उसे कोई अहिंदी भाषी पढ़ना चाहे तो उसे दिक्कत न आये। इसके अलावा इंग्लिश ब्लाग भी पढ़ता रहूंगा ताकि उसे जानकारियां मिल सकें। आज तीन ब्लाग पढ़कर यह समझ में आ गया कि जितनी अंग्रेजी सीखी है वह पर्याप्त है।</p>
<p><strong>it translashan by google tool</strong><br />
<strong>Hindi - English tool seemed very interesting - Article (2)</strong></p>
<p>Hindi - English translation tool use from tomorrow I am going to see if there is a feeling of pleasant surprise. First, the Hindi language to write the net if he will accept. During much of the text to write English or Urdu word used, it will not accept it. Such as feelings jajbat can not write. religion to religion can not write. Write to the confusion, misunderstanding that no one will read. If a mistake in writing the Hindi word to the English are translated into a tool to translate it so instead of just presenting them out. </p>
<p>I translated into English from its first published in the language of the text after writing it in Unicode tools it takes I am strongly in the translation tool and when it was writing a word, it is not changed before I correct in his original text. More than one word at all to re-write the words again after a change in the Unicode tool brought on from there, then I can see the translation of the tool that is not correct that. However, it is now in inglish determine that its reading of the results of what is certain is that if one thing from such टूलों Hindi, who read for him by my little efforts have been made to the text Created by me to read more qualified Blog other than the will of the Hindi translation of the texts of the tool on the test were not maintained. Yesterday that there were some blogger write some drawbacks and is the measure that ब्लागर who want that way, their front two of his trial on the text of the translation tool that it can see the whole word in English that are not , Which did not come back to see them change and keep his second post that leave the reader to read the willing tool of the things just want it kept as it is for him on this tool will bring. So perhaps he did not, you've taken into account if your English is, he will read it. </p>
<p>I used some of the posts and found that such a language for which the reader can not be understood, but the price may be. Today I have some English blogger the post read in Hindi. There is a lot of trouble both in English and Hindi text in front of me was the sense of meaning and I totally understood. I can say that I am today that he viewed the English Blog read and fully understood. Her subject matter so I fully understand his films, as was the author. A little hard on the side of the world's Blog world is increasing its terms, it was not any more. English - Hindi translation tool means is that you fifteen languages of the world can infiltrate and will do so when the other language blogger do the same. Even if such a translation of the text has not been as expected but it is not so bad, that is not enough to maintain dialogue. Due to time some of the people who do more work time is not on the whole world in several languages, create your friend. Is it any wonder that when the Chinese will not be posted to our own will try to read in their language.<br />
               However, I have some posts on the Blog of the English translation it is always presented on it so that I will not write them after the English translation tool on the testing that will make it worth it to a non-speaking, reading to go to trouble Do not come. Besides, I read the English blog information so that it can get. Today, the three Blog reading was in the understanding that it is learnt English as adequate.</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[धन आने से बुद्धि नहीं आ जाती-लेख Money is not coming to mind - article]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=367</link>
<pubDate>Fri, 02 May 2008 17:29:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=367</guid>
<description><![CDATA[पैसे में बहुत बड़ी ताकत होती है यह भी ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पैसे में बहुत बड़ी ताकत होती है यह भी बहुत समय से सुनते आ रहे हैं। बड़े बुजुर्ग यह भी कहते हैं कि पैसे से आदमी में बुद्धि नहीं आती। इस पर विचार करते हुए कई बार दिमाग ऊहापोह में फंस जाता है कि सत्य क्या है।</p>
<p>अब समझ में आने लगा है कि दोनों ही बातें सत्य के दो पहियों की तरह है जिन पर जीवन का रथ चल रहा है। अब देखिये जब देश गरीब कहलाता था तो यहां के कुछ लोग विश्व में चमकते थे। कुछ ने खेलों में तो कुछ ने अध्यात्म में नाम कमाया। मैं यहां खेलों के बारे में अधिक लिखना चाहता हूं। भारत हाकी में आठ बार ओलंपिक और विश्व कप में विजेता रहा चुका हैं। 1971 में हाकी में तो 1983 में भारत ने विश्व कप क्रिकेट कप जीता। उसके बाद तो सब थम सा गया। 1983 में भारत की आर्थिक रूप से कोई ताकत नहीं थी पर उसने विश्व कप जीता जिसने यहां इतनी लोकप्रियता पायी कि उसको नियंत्रण करने वाली संस्था बीसीसीआई दुनियां की सबसे अमीर संस्था बन गयी। मगर क्रिकेट! यहां के चयनकर्ता मानते हैं कि यहां अब प्रतिभाएं नहीं हैं।  अब उसके विकास का काम फिर शुरू करने के लिये विदेशी खिलाडियों को नीलामी में खरीद कर कुछ टीमों के मैच करवाये जा रहे हैं कि अब सीखो क्रिकेट। यानि 1983 के बाद पैसा खूब आता गया पर हमारी क्रिकेट प्रतिभा कम होती गयी। हाकी में 2010 के विश्वकप का आयोजन भारत करने जा रहा है जबकि विश्व में उसकी इस खेल में कोई हैसियत नहीं है और अपने पड़ौस में हो रहे ओलंपिक में हमारी भागीदार नगण्य हो गयी है।</p>
<p>अब सवाल उठता है कि विश्व कप की मेजबानी क्यों मिली? क्योंकि यहां खेलों पर पैसा खर्च किया जा सकता है प्रतियोगिताओं के लिये वह जरूरी है। मतलब अब हमारी पूछ विश्व में पैसे खर्च के कारण बढ़ी है न कि अपनी प्रतिभा के कारण। मैने एक पश्चिमी विशेषज्ञ का भारत में यह कथन कहीं पढ़ा था कि ‘ भारत एक ऐसा अमीर देश है जहां गरीब लोग अधिक रहते हैं‘। अगर आप देश में चल रहे नाटकों को देखें तो लगता है कि सब जगह पैसा बरस रहा है और ऐसा लग रहा है कि हर आदमी करोड़पति होने की तरफ बढ़ रहा है।<br />
महत्वहीन क्रिकेट मैचों को देखने के लिये लोग स्टेडियमों मे भागे जा रहे हैं। बैट-बाल को द्वंद्व देखने के लिये हजारों लोग टिकट खरीद कर मैदान में नाचते हैं। टीवी और रेडियों पर लोगों के लिये पुरस्कारों की भीड़ लगी जा रही है। एक अजीब सा माहौल है। एक तरफ बढ़ती महंगाई और जलसंकट और बिजली के अभाव से ग्रस्त देश में ऐसा वातावरण रहना अपने आप में आश्चर्यजनक लगता है।</p>
<p>इस देश में न तो धन पहले कम था न आज है समस्या उसके वितरण की है-अर्थशास्त्र पढ़ने वाला हर आदमी इस बात को जानता है। दूसरी समस्या है कुप्रबंध जो कि आज के समय में सबसे अधिक है। लोग कहते है कि भारत के लोग अपने देश में ठीक काम नहीं करते पर विदेश में उनका प्रदर्शन अच्छा है। यह बात नहीं है। सत्य तो यह है कि यहां प्रबंध कौशल के अभाव में उनका प्रदर्शन ठीक नहीं रहता  क्योंकि जो तकनीकी विशेषज्ञता या  किसी विशेष काम में योग्यता होने पर भी उसे जिस प्रकार के प्रबंधन की आवश्यकता है वह यहां नहीं मिल पाता। बाहर भी भारत के लोग जो हैं उनमें कोई प्रबंधन के कारण ख्याति अर्जित नहीं कर सका। सभी खेल संघों की हालत देखें तो वह कुप्रबंध (भ्रष्टाचार भी उसका ही हिस्सा है) का शिकार हैं। जिन लोगों का यहां पद मिल गया वह तो अपने आपको राजा और अपने से नीचे वाले को प्रजा समझने लगता है। याद करें अभी जो खिलाडियों की बोली लगी थी उसे लगवाने एक अंग्रेज विद्वान की सेवायें लीं गयी जिसने तमाम तरह के नियम भी बनाये। भारत के जो लोग विदेशों में अमीर बने हैं वह प्रबंध कौशल के कारण नहीं बल्कि व्यवसायिक कौशल के कारण हंै। उनको विदेशों के योग्य प्रबंध विशेषज्ञों की सेवायें मिलतीं हैं।<br />
हैरानी की बात यह है कि किसी समय गरीब कहलाने वाले इस देश के आर्थिक रूप से ताकतवर होने की बात तो हो रही है पर सामाजिक और क्रीड़ा के क्षेत्र में इसका पिछड़ापन बढ़ता ही जा रहा है। क्रिकेट प्रतियोगिताओं के हजारों करोड़ के लेनदेन की आंकड़े चकित कर देते हैं पर खेलने के नाम इसके खिलाडियों की हालत बहुत दयनीय है। आजकल जो प्रतियोगिता चल रही है उसमें विदेशी खिलाडियों के खेल को देखकर ऐसा लगता है कि भारतीय खिलाडी कभी-कभार ही अच्छा खेल सकते हैं वह भी इसलिये ताकि टीम में उनकी जगह बनी रहे।</p>
<p>हाकी में तो इतनी हास्यास्पद स्थिति देश में ही देखी जा सकती है। 15-16 वर्षों से हाकी टीम गड्डे में जाती दिख रही थी पर कोई हाथ लगाने को तैयार नहीं था। आखिर विश्व ओलंपिक संघ ने जब धमकाया तब कहीं यहां के लोग अपनी निद्रा से जागे।  इससे यह समझ में आ सकती है कि हमारी बुद्धि आज भी विदेशों की तरफ बंधुआ मजदूरों की तरह देखती है। विश्व ओलंपिक महासंघ भी इसलिये जागा क्योंकि उसको यहां विश्व कप हाकी प्रतियोगिता करानी है और अगर भारत की टीम उसमें ऐसी ही रही तो उसकी प्रतियोगिता का मजा खराब हो जाता और फिर यहां से पैसे की उगाही शायद वैसी नहीं हो पाती-प्रायोजक भारतीय कंपनियों या यहां सक्रिय विदेशी कंपनियों को ही करना है और यहां भले ही दिखावे के हीरो हों पर होने तो चाहिए वरना उनके उत्पादों का विज्ञापन कैसे होगा? धन के बल पर प्रायोजन मिल गया पर प्रतिभा कहां से आयेगी? ऐसा नहीं है कि इस देश में प्रतिभाओं की कमी है पर उनको खोजने और उनका मार्ग प्रशस्त करने वाले प्रबंधकों का यहां अभाव है क्योंकि यहां के अमीर चाहे कितना भी पश्चिम का अनुकरण कर लें पर किसी नयी प्रतिभा को प्रोत्साहन वह तब तक नहीं देते जब तक कोई उनके सामने जाकर  मस्तक न झुकाये। सभी प्रदर्शन व्यवसायों (खेल, फिल्म और टीवी) में प्रभावशाली लोगों का बोलबाला है और सभी अपने लोगों को चमकाना चाहते हैं। फिल्म की हालत तो यह है कि आज देश का कोई युवक हीरो बनने की सोचता भी नहीं है क्योंकि वह तो पुराने हीरो के लिये सुरक्षित हो गयी हैं। कहने को इस देश के निर्माता दंभ भरते हैं कि हाॅलीवुड की बराबरी करेंगे पर उनमे व्यवसायिकता के भाव का अभाव है। फिल्में बनाते हैं और हिंदी फिल्में  देखने वाले लोग इतनी संख्या में हैं कि रद्दी फिल्म बनाने वाले को भी  आर्थिक  लाभ हो ही जाता है पर इसका मतलब यह नहीं कि उनकी फिल्में कोई ऊंची श्रेणी  की हैं। हाॅलीवुड में शुद्ध रूप से व्यवसायिक भाव से फिल्में बनती हैं और वहां कोई निर्माता या निर्देशक अपने बेटे या बेटी को फिल्म में इस तरह हीरो-हीरोइन नहीं बनाता जैसे यहां बनाते हैं।</p>
<p>मतलब यह है कि पैसा आने से बुद्धि नहीं आ जाती-यह बात भी हमारे बुजुर्ग सही कह गये हैं। इसके अलावा आर्थिक विकास का आशय यह भी नहीं है कि लोगों का बौद्धिक विकास हो जायेगा यह बात अच्छी तरह से समझी जा सकती है। भारत में तो एक बात और भी है कि यहां तो लोगों को बौद्धिक रूप से भ्रमित रखकर ही पैसा कमाया जा सकता है शायद इसलिये ही कथित आर्थिक विकास प्रचार में बहुत सुनाई देता है पर जमीन पर परिलक्षित नहीं होता।</p>
<p>Traasnlet by googal tool(Hindi writer has no knowledge of English, so he is not responsible for the lack of translation) </p>
<div id="result_box" dir="ltr">A large force of money is also a lot of time listening to come. It also says that the large elderly man of wisdom does not come from money. The idea of the mind at times confused the truth of what is caught.</p>
<p>Now, coming to understand that both the truth of things is like the two wheels of the chariot on which life is going on. Now, when our view was called the poor people in the world, here's some beads. Some of the games, some have earned a name of spirituality. Games here I wish to write more about. India hockey in the Olympics eight times and winning the World Cup is finished. Hockey in 1971, in 1983, India has won the World Cup Cricket Cup. After all, what was ceased. India in 1983 as an economic power was not on it who won the World Cup is so popular here that he found the body control to the BCCI to become the world's richest institution has been. But cricket! The selectors believe that the talents are not here now. Now, to resume development of foreign players in the auction for the purchase of some of the teams that are going to match dais now learn cricket. That was 1983, after the money comes a lot of talent on our cricket has been low. 2010 World Cup of Hockey in India is going to the event in the world while the game is not in a position to be in the Olympics and its neighbourhood, our partners have been negligible.</p>
<p>The question that arises is, why did host the World Cup? Games here because of the money can be used for the championships is important. Means we now ask for money in the world because of increased spending, not because of his talent. I was a specialist in India, the western statement read somewhere that India is a rich country where poor people are more '. If you look at plays in the country running everywhere, it is money that is years, and it seems that every man on behalf of millionaires is increasing.<br />
Unimportant to see cricket matches in the stadiums of people fled are going. BAT - for the child to see the conflict thousands of people buy tickets in the field dancing. TV and Radio awards for the people of the crowd is engaged. Like a strange environment. On the one hand and rising inflation suffer from lack of water and electricity in the country to live in their own environment so it seems surprising.</p>
<p>In this country, not less, money was not the first problem today is the distribution - economics read every word of this man knows. The other problem is that today's mismanagement of the most time. People say that the people of India do not work properly in our country abroad on their good performance. It is not. The truth is that in the absence of their performance management skills do not always because of the technical expertise or a special ability to work on it just as the management of the need to not get it here. The people of India are also outside the management of any of them could not earn a reputation. All sports federations to see the condition of mismanagement, it (corruption, his part is) a victim. The people's office here, he has found himself under the king and his people to understand it. The players still remember that it began to bid a British scholar of vaccination services did all kinds of rules which was also created. India's foreign people who have the management skills of the rich not because of professional skills but also because of हंै. For managing them abroad get services of experts.<br />
The surprise is that at any time, so-called poor in this country to be financially powerful thing, being on the field of sports and social backwardness, it is growing. Thousands of cricket competitions million of the transaction data baffled to play on the name of its players very poor condition. Today the competition is doing it is to see foreign players of the game it appears that the Indian Players ever - makes it too can play the better team, so that his place remains so.</p>
<p>Hockey, the situation is so ridiculous as can be seen in the country. 15-16 years in the hockey team is showing trouble was not ready to put on a hand. After all, the World Olympic Association has so far threatened when the people woke from his sleep. It is understood that our minds could still abroad on behalf of bonded labourers looks like. World Federation of the Olympics because it up because the World Cup hockey competition here and if India is to the team if there is such bad shape as the competition's fun here and then raised money from the same may not be deciduous - Indian companies or sponsors here Active foreign companies here and even if it is to show the hero, should be on how to advertise their products or else be? On the strength of sponsorship money received from Where will the talent? Not that the lack of talent in this country and find them on their path to the lack of managers, because even if the rich how to emulate the West take on a new talent, he will not give incentives until Faced with a visiting head झुकाये not. All businesses performance (sports, film and TV) in a couple of influential people and all its people want to irradiate. The film is that the condition of the country today is a young man to become a hero because he did not think it was safe for the old hero. The country's producer, said the arrogance of the match will enter the हाॅलीवुड ones on the sense of a lack of professionalism. Make films and Hindi movies to see the number of people so that the trash the film also is on the economic benefit it would not mean that his films are a high-class. hollywood purely commercial in the sense of the films are made there, a producer or director and his son or daughter of the hero of the film - like the heroine makes not make here.</p>
<p>This means that money is not coming to mind - it is also true to say we were elderly. In addition, economic growth has not meant that the people of this intellectual development will be well understandable. In India, and one thing here is that if people intellectually confused with the money earned can be put perhaps because the so-called economic development to hear a lot of publicity on the ground is not reflected.</p></div>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[यह टूल मुझे तो दिलचस्प लगा-आलेख It is interesting tool, I thought - Stories]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=518</link>
<pubDate>Fri, 02 May 2008 15:09:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[मेरी आदत है कि आते ही  अपने ई