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	<title>समाज &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/समाज/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "समाज"</description>
	<pubDate>Mon, 12 May 2008 12:38:43 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[आम आदमी बने रहने की कोई नहीं सोचता-आलेख]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=404</link>
<pubDate>Sun, 11 May 2008 09:58:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=404</guid>
<description><![CDATA[कहने को कई लोग आपसी वार्तालाप में ऐसी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कहने को कई लोग आपसी वार्तालाप में ऐसी टिप्पणियां कर जाते हैं जो उनके स्वयं के समझ में नहीं आतीं तो किसी अन्य व्यक्ति के समझ में क्या आ जातीं  हैं।</p>
<p>एक सज्जन ने कहा कि‘नेता बनने की बजाय मैं भिखारी बनना चाहूंगा।’</p>
<p>एक सज्जन को मैने कहते सुना-‘मैं संत की बजाय वैश्या बनना चाहूंगा।’</p>
<p>किसी ने कहा-‘मैं पुलिस वाला बनने की बजाय मूंगफली बेचने वाला बनना चाहूंगा।</p>
<p>मतलब यह कि किसी खास आदमी से नाराज होने के कारण  कोई व्यक्ति वैसा नहीं बनना चाहता-इस बात की घोषणा तो वह करता है पर आम आदमी बने रहने की कोई इच्छा छोड़कर वह कुछ बनना चाहता है।<br />
हर कोई अपने पास शक्ति के स्त्रोत बनाये रखना चाहता है। पद, पैसा और प्रतिष्ठा पाने के मोह में सब अंधी दौड़ प्रतियोगिता के धावक है। हर कोई आम आदमी की जमात से बाहर  निकलकर खास आदमी की तरह चमकना चाहता है। अपने से दूर उसे आकर्षण का केंद्र दृष्टिगोचर होता है। वहां पहुंचता है तो उसे फिर वही अंधेरा दिखाई देता है। वह फिर दूसरी जगह आकर्षण की तलाश करता है। कोई पद मिल गया तो उससे संतोष नहीं होता उसके साथ अन्य लाभ भी होना चाहिए। धन का लाभ होता है तो वह अन्य प्रकार के लालच भी करता है। घर के बाहर किसी अन्य महिला से संपर्क बने यह भी कुछ लोग अपने अंदर विचार करते हैं। कोई व्यक्ति उसके सामने सच न कहे यह अहंकार का भाव उसमें आता है। अपने ही बनाये गये जाल में पकड़ा   जाता है और फिर  कहता है कि ‘‘मेरे पास सब है पर शांति नहीं है जिसके पास शांति है वही सुखी है।‘</p>
<p>जिसके पास धन प्रचुर मात्रा में नहीं है, न वह किसी उच्च  पद पर विराजमान है, न किसी उच्च पद वाले व्यक्ति का हाथ उसके ऊपर है और न ही वह देह से बलवान होता  है, उसे भी अपने ऐसे गुणों का बखान करने की आदत होती है जो उसमें है ही नहीं। वह अपने को खास आदमी साबित करना चाहता है। हर आदमी  आम है पर खास कहलाना चाहता है। यह भाव  है आदमी के चरित्र और विचारों में पतन का कारण ।</p>
<p>एक बार आम आदमी होने का बोध धारण कर लो और खास आदमी को दूर से देखकर ही अपनी नजर फेर लो। ऐसा नहीं कर सकते  तो पहले उस खास आदमी की दिनचर्या देखो उसमें ऐसा कुछ नहीं होता जो आम आदमी में नहीं होता। उसमें भी  वैसे ही गुण और अवगुण होते हैं जैसे आम आदमी में होते हैं। जब अपने आम आदमी की तरह अनुभव करोगे तुम्हारे ज्ञान चक्षु खुल जायेंगे। यह अनुभव कर सकते हो कि उसके और तुम्हारे अंतर्मन में कोई अंतर नहीं है। आम आदमी होने को अर्थ है जीवन के प्रति दृष्टा भाव रखना। जब हम दृष्टा भाव से देखेंगे तब हमारे मन की बेचैनी दूर हो जायेगी। हमारे जैसी हालत में सब जी रहे हैं। हां, कुछ बाहरी दिखावा करते हैं और उनके देखकर हम भी उन जैसा करने लग जाते हैं फिर अपने अंदर ही यह अहसास होता हैं कि हम केवल अपने मुख से अपनी झूठी प्रशंसा  कर रहे हैं। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इंसान तो कठपुतली है-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=153</link>
<pubDate>Sun, 11 May 2008 06:55:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=153</guid>
<description><![CDATA[आदमी के पंख नहीं होते
जो वह आसमान में उ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;">आदमी के पंख नहीं होते<br />
जो वह आसमान में उड़ सके<br />
पर उसका मन बिना पंख के ही<br />
उड़ता चला जाता है<br />
उसके पांव आदमी की काबू में होते नहीं<br />
पंरिदे बनाते हैं लोगों के घर में भी घरोंदे<br />
पर उनके बिस्तर पर सोते नहीं<br />
खुशी में झूमकर नाचता इंसान<br />
दुःख  में अपने ही आंखो से बहती<br />
अश्रुधारा में करता स्नान<br />
पर परिंदे कभी रोते नहीं<br />
अपने मन के इशारे पर<br />
कठपुतली की तरह नाचता<br />
कितने भी दावे करे कि<br />
खुद ही चल रहा है इस जीवन पथ पर<br />
अपनी अक्ल पर है उसका काबू<br />
कराती है इंसान की  जुबान दावे आजाद होने के<br />
पर कभी वह सच्चे होते नहीं<br />
अपनी जरूरतों से आगे नहीं उड़ते<br />
इसलिये परिंदे कठपुतली नहीं होते<br />
यह सच है<br />
अपनी ख्वाहिशों के हमेशा गुलाम<br />
रहने वाले  इंसानों के लिये<br />
साबित करना बहुत मुश्किल है कि<br />
वह कठपुतली होते नहीं<br />
..............................................................</span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;">कठपुतली ने चिडि़या से कहा<br />
‘देखो, मैं नाच  और गा सकती हूं<br />
पर तुम ऐसा नहीं कर सकती<br />
मुझे तुम पर तरस आता है’</span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;">चिडि़या ने उसकी डोर पकड़ने वाल  नट की<br />
गर्दन पर चांेच मारी तो वह चिल्लाया<br />
छूट गयी उसके हाथ से  डोर<br />
उसने कठपुतली को इस तरह नीचे गिराया<br />
चिडि़या ने लौटकर चिड़े से कहा<br />
‘आदमी कठपुतली को आगे कर बोलता<br />
अपने मन के इशारे पर डोलता <br />
बोलने से पहले कभी शब्द नहीं तोलता <br />
दावे करता है आकाश में उड़ने का<br />
कभी ऐसा नहीं करता तब  मचा रहा है शोर<br />
उड़ता तो क्या हाल करता<br />
सर्वशक्तिमान ने इसलिये इसको पंख नहीं लगाया<br />
उड़ने के ख्वाब देखता रहे इसलिये<br />
इंसान को मन की कठपुतली बनाया<br />
..............................................................</span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;">दीपक भारतदीप</span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;">my other web page</span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;"><a href="http://dpkraj.blogspot.com">http://dpkraj.blogspot.com</a> </span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;"><a href="http://deepkraj.blogspot.com">http://deepkraj.blogspot.com</a></span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;"><a href="http://teradipak.blogspot.com">http://teradipak.blogspot.com</a></span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;"><a href="http://terahdeep.blogspot.com">http://terahdeep.blogspot.com</a></span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;"><a href="http://zeedipak.blogspot.com">http://zeedipak.blogspot.com</a>  </span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कुछ दृश्य निगाहों से पढ़े जाते हैं-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=373</link>
<pubDate>Sat, 10 May 2008 18:14:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=373</guid>
<description><![CDATA[
कुछ दृश्य इस तरह सामने आते हैं
कि शब्द ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="padding-left:30px;">
<strong><span style="color:#003300;">कुछ दृश्य इस तरह सामने आते हैं<br />
कि शब्द हो जाते  खामोश<br />
निगाहों से वह पढ़े जाते हैं<br />
लिखकर कोई क्या बतायेगा<br />
तस्वीरों में चेहरे<br />
सारा माजरा बयां कर जाते हैं<br />
जो देखकर भी न समझे<br />
वह पढ़कर भी क्या समझेंगे<br />
हृदय में बसता हो जीवन<br />
संवेदनाओं की बहती हो जब पवन<br />
चक्षुओं से देखकर ही<br />
स्पर्श अनुभव किये जाते हैं<br />
जागते हुए भी सोते हैं कई लोग<br />
उनको समझाने से मतलब बेमानी हो जाते हैं</span></strong></p>
<p style="padding-left:30px;"><strong><span style="color:#003300;">..........................<br />
दीपक भारतदीप<br />
</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[महिला बुद्धिजीवी सम्मेलन-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=152</link>
<pubDate>Sat, 10 May 2008 13:16:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=152</guid>
<description><![CDATA[सम्मेलनों के आयोजने करने के आदी लोगों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सम्मेलनों के आयोजने करने के आदी लोगों की संस्था के पदाधिकारियों के  दिमाग  में ‘बुद्धिजीवी महिला सम्मेलन’ करवाने का विचार आया। कुछ लोगों ने इसका विरोध किया और कुछ लोगों ने समझाया। एक समझदार ने कहा-‘‘इस देश की शिक्षा पद्धति ने लोगों को गहरे ज्ञान से वंचित किया है और सभी प्रकार के बुद्धिजीवी चाहे वह  महिला हो या पुरुष केवल वाद का नाम और नारे लगाकर ही चलते हैं और फिर आपस में झगड़ा करते हैं। सामान्य आदमी तो बैठक आदि में जाता नहीं और जाता है तो खामोशी से चला जाता है और चार बुद्धिजीवी पूरुष जहां मिलते है लड़ पड़ते है, उनको हाथ पकड़ कर या धमकी देकर समझाया जा सकता है  कहीं महिला बुद्धिजीवी कहीं झगड़ा कर बैठीं  तो उनको समझाना कठिन हो जायेगा।’</p>
<p>   मगर संस्था के लोग नहीं माने। सम्मेलन कराने का नशा उन पर सवार था। उनका विचार था कि इस बहाने संस्था का नाम पुनः चमकेगा जो पहले ही डूब रहा है।</p>
<p>सम्मेलन घोषित हो गया। ढूंढ-ढूंढकर बुद्धिजीवी महिलाओं को आमंत्रण भेजा गया और फिर विषय रखा गया ‘सास-बहु और ननद-भाभी  के मधुर संबंध कैसे हों’?</p>
<p>संस्था के सभी लोग आयोजन कर चंदा वसूलने और फिर आत्मप्रचार के काम में महारात हासिल किये हुए थे पर फिर भी उनमें से कुछ कच्चे पड़ गये और उन्होंने फैसला किया कि वह इस आयोजन से दूर रहेंगे। वजह यह थी कि उनके घर की महिलायें भी इन आयोजनों में आतीं थीं और उनको लगा कि इस तरह के आयोजन से उनके घरेलू विवाद सबके सामने आयेंगे।</p>
<p>हालांकि संस्था के लोगों ने इस बात का पुख्ता इंतजाम किया कि उनके घर की महिला सदस्य इनमें शामिल न हों और वह बुद्धिजीवी भी हों तो उनको सूचना नहीं भेजी जाये। इसलिये जिसका नाम भी आमंत्रण पत्र पर लिखा जाता था पहले इस बात की तस्दीक कर ली जाती थीं कि वह संस्थो के सदस्यों की घर से संबद्ध न हों।</p>
<p>सम्मेलन का दिन आया तमाम महिलायें कार्यक्रम में पहुंची। कुछ को भाषण देना था तो कुछ को केवल सुनकर तालियां बजानीं थीं। तालियां बजाने के लिये भी बकायदा पैसे देने का आश्वासन दिया गया था। आयोजक जानते थे कि बोलने के लिये बुद्धिजीवी महिलायें तो मिल जायेंगी पर ताली बजाने के लिये उनकी उपलब्धता संदिग्ध है। इसलिये कुछ पुरुंष भी किराये पर बुलाये गये और उनको महिला अधिकारों के लिये लड़ने वाले जुझारू कार्यकर्ता कर प्रचारित किया गया।</p>
<p>तमाम सावधानियों के बावजूद आयोजक आमंत्रण पत्र भेजने में गल्तियां कर गये। उन्होने कई ऐसी बुद्धिजीवी महिलाओं को बोलने के लिये आमंत्रण भेज दिया जिनके आपस में सास बहु और ननद-भाभी के रिश्ते थे। उनको इस बात का ध्यान ही नहीं रहा कि बुद्धिजीवी घरों में ‘बुद्धिजीवी’ बहु की मांग ही होती है यह अलग बात है कि कोई भी बुद्धिजीवी सास दहेज की राशि को लेकर वैसे ही कोई समझौता नहीं करती जैसे कि कोई सामान्य सास।</p>
<p>सम्मेलन शूरू कराने के लिये एक पुरुष सदस्य माइक पर आया और बोला-‘‘आज हम अपने पहले बुद्धिजीवी सम्मेलन.........................’’</p>
<p>उसकी बात पूरी होने से पहले ही एक महिला कुर्सी से उठ कर खड़ी हो गयी और बोली-‘क्या इस काम के लिये कोई महिला नहीं थी। हटो मैं संचालन करती हूं।’</p>
<p>वह मंच पर चढ़कर आ गयी और उससे माइक लेकर स्वयं डट गयी।उस संचालक पर तो जैसे वज्रपात हुआ क्योंकि वह उस संस्था का अध्यक्ष था और उसी ने ही इस सम्मेलन के प्रस्ताव को रखा था और पास कराया था। उसका मूंह उतर गया तो संस्था में उसके वह प्रतिद्वंद्वी खुश हो गये जो इस सम्मेलन को कराने के विरोधी थे।</p>
<p>उस महिला ने अखबारों की कटिंग दिखाकर  कुछ ऐसी खबरें जिनमें महिलाओं के खिलाफ अपराध किये गये थे उनको पढ़ना और उसके लिये पुरुष प्रधान समाज को जिम्मेदार ठहराने का सिलसिला शुरू किया। </p>
<p>तब एक दूसरी महिला खड़ी होकर बोली-‘‘यहां हमें  बताया गया है कि आज की चर्चा का विषय है ‘सास-बहु और ननद-भाभी  के मधुर संबंध कैसे हों’? आप तो विषय से हटकर बोल रहीं हैं।’</p>
<p>उसके पास ही उसकी बहु भी बैठी थी वह अपनी सास से बोली-‘‘अत्याचार तो अत्याचार है। खबर बतायेंगी तभी तो यह पता लगेगा कि कहां-कहां बहुओं पर अत्याचार हुए।’</p>
<p>तब दूसरी बुद्धिजीवी महिला भी माइक पर पहुंच गयी और उससे छीनकर बोली-‘हम पुरुषों द्वारा तय किये गये विषय पर नहीं बोलेंगे। हमें अपना विषय तय स्वयं करना चाहिए।’</p>
<p>अब तो वहां हलचल मच गयी। बहुएं और भाभियां चाहतीं थीं कि उनके साथ जो दुव्र्यवहार घर में होता है उस पर चर्चा की जाये और सास और ननदें चाहतीं थीं कि इसमें बहुओं द्वारा अपने अधिकारों के दुरुपयोग पर विचार किया  जाये।</p>
<p>माहौल गर्मा गया था और आयोजकों की घिग्घी बंध गयी थी। संस्था के एक सदस्य ने कहा-‘आज का किसी के मरने की खबर देकर स्थगित करते हैं और अगली तारीख पर आयोजित करेंगे। अभी जो नाश्ते का समय घोषित करते हैं फिर इसे स्थगित कर देते हैं।’</p>
<p>संस्था का अध्यक्ष बोला-‘‘पर वहां यह घोषित करने के लिये भी तो कोई महिला चाहिए। देखा नहीं मुझे किस तरह वहां से भगा दिया।</p>
<p>माहौल तनाव से भरा था। अब आयोजकों के समझ में नही आ रहा था कि क्या करें? किसकी मदद लें? सब बुद्धिजीवी महिलायें तो जोर-जोर से बोल रहीं थीं। अचानक उनकी नजर एक व्यंग्यकार महिला पर पड़ गयी। उस सभा में वही एक खामोश बैठी थी और मंद-मंद मुस्करा रही थी। मजे की बात यह कि उसे नहीं बुलाया गया था वह तो कहीं से सुनकर वहां आयी थी। अध्यक्ष उसके पास गया और बोला-‘‘आप हमारी कुछ मदद करे। पहले सबके लिये नाश्ते की घोषणा करें थोड़ी देर बाद किसी बहाने इस स्थगित कर दें।’</p>
<p>व्यंग्यकार महिला ने कहा-‘‘पर मैं तो यहां बिना बुलाये आयी हूं।  वैसे भी मैं केाई बुद्धिजीवी नहीं हूं बल्कि व्यंग्यकार हूं। नहीं.....नहीं............तुम क्या समझते हो कि मेरा कोई सम्मान नहीं है।’</p>
<p>उसने जब अधिक याचना की तो वह तैयार हो गयी। उसने मंच संभाला और पहले नाश्ते की घोषणा कर माहौल को ठंडा किया फिर थोड़ी देर बाद माइक पर आयी और बोली-‘‘ अब हम सब लोगों ने नाश्ता कर लिया है पर हमारा विषय तय नहीं है इसलिये अगली तारीख पर विषय तय कर लेंगे तब आपको सूचना दी जायेगी। हम फिर मिलेंगे।’</p>
<p>सब महिलायें  थोड़ा बहुत विरोध कर वहां से चलीं गयीं। थोड़ी देर बाद वह व्यंग्यकार महिला बाहर निकली तो देखा एक खाकी पेंट, सफेद शर्ट और सिर पर टोपी पहने एक आदमी खड़ा उसे देख रहा था और जैसे ही नजरें मिलीं तो वह खिसकने को हुआ तो वह पीछे से चिल्लाकर  बोली-‘अरे, तुम व्यंग्यकार होकर इस तरह यहां क्यों खड़े हो। अच्छा अपने लिये विषय तलाशने चपरासी की भूमिका में आये हो। अगर मुझे पता होता तो सब महिलाओं को बता देती और तुम्हारी धुलाई करवाती। तुम्हारे व्यंग्य वैसे ही मेरे समझ में नहीं आते पर तुम हो कि लिखना बंद नहीं करते।</p>
<p>वह अपनी साइकिल उठाकर बोला-‘‘अब हम दोनों ही यहां से निकल लें तो अच्छा रहेगा। मै इस वेश में इसलिये आया था कि चपरासी तो चपरासी होता है उसकी उपस्थिति पर भला कौन आपत्ति करता है पर अगर सूटबूट पहनकर आता तो हो सकता है कि बाहर भी कोई खड़ा नहीं रहने देता। यहां दोनों ही बिना बुलाये आये हैं अगर मैं इस पर व्यंग्य लिख दूं और महिलाओं का तुम्हारे बिना आमंत्रण के यहां आगमन की बात बता दू तो कैसा रहेगा? और बुद्धिजीवी और व्यंग्यकार में अंतर होता है ऐसा मैंने तुम्हारे व्यंग्यों में ही पढ़ा है।</p>
<p>महिला व्यंग्यकार ने कहा-‘ महिलायें अभी भी दूर नहीं हैं बुलवा लूं। खैर छोड़ो..............फिर उनको भी यह पता चल जायेगा कि मैं भी यहां बिना बुलाये आयी हूं और आयोजकों कहने से उनका सम्मेलन खत्म कराया गया है।’’</p>
<p>अगले दिन अखबार में सम्मेलन के उल्लास से संपन्न होने का समाचार था और व्यंग्यकार महिला का नाम तक उसमें नहीं था। <br />
<strong>यह हास्य व्यंग्य काल्पनिक रचना है और किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई लेना देना नहीं हैं अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा। इन पंक्तियों को लेखक किसी भी महिला व्यंग्यकार से कभी नहीं मिला<br />
</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अंग्रेजी नाम, हिंदी नाम-आलेख ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=151</link>
<pubDate>Fri, 09 May 2008 17:08:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=151</guid>
<description><![CDATA[अंतर्र्जाल पर हिंदी लिखते हुए मुझे एक ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h3>अंतर्र्जाल पर हिंदी लिखते हुए मुझे एक बात अनुभव हो रही है कि यहां रूढ़ता का भाव अपने हृदय में रखने को कोई मायने नहीं है। अंतर्जाल पर अनेक वेब साइटों और ब्लाग पर निकल रही हिंदी  पत्र-पत्रिकाओं के नाम हिंदी में है तो अंग्रेजी में नहीं और अंग्रेजी में है तो हिंदी में नहीं। मैं दोनों से संबंध रखता हूं और मेरी रुचि इस बात में है कि किस तरह अंतर्जाल पर हिंदी के पाठक अधिक से अधिक सक्रिय हों। मेरी कुछ पत्रिकाएं ब्लाग पर हैं और कुछ वेब साईटों की पत्रिकाओं पर मैं लिखता हूं। मैंरे अपने वेब पृष्ठों (ब्लाग) पर बनी पत्रिकाओं के नाम हिंदी में रखे हैं। बीच में मैंने अपनी इन पत्रिकाओं का अंग्रेजी नाम भी रखा था पर हिंदी एग्रीगेटरों से उनके जुड़ने  के बाद अंग्रेजी नाम हटा लिये। इसका पछतावा मुझे आज तक है।</h3>
<h3>एक बात तय है कि विश्व में भाषा की दूरियां अब कम हो रही हैं और ऐसे में वेब साइटों और वेब पृष्ठोंं पर बनी पत्र-पत्रिकाओं को किसी भाषाई रूढ़ता से उबरना होगा तो साथ ही अपनी मौलिकता से निर्वाह करना होगा। मैं बात कर रहा हूं उनके वेब साईटों और वेब पृष्ठों पर बने पत्र-पत्रिकाओं के शीर्षक और  नाम की। कई जगह पत्र-पत्रिकाओं का नाम अंग्रेजी है पर हिंदी में न होने के कारण उसके शब्द सर्च इंजिन में डालने पर वह उसके सामने नहीं आती तो अंग्रेजी मेें न होने के कारण उसका भी यही हश्र होता है। अब अनुवाद  टूल आने से हमें अब इस संभावना पर भी विचार करना चाहिए कि देश विदेश के अन्य भाषी लोग हिंदी के लेखकों और संपादकों से अपना संपर्क रखना चाहेंगे और यकीन मानिए वह हिंदी शब्द सर्च इंजिन में डालकर तलाश नहीं करेंगे। ऐसे में कोई हिंदी भाषी पत्र-पत्रिका (जो वेब साईट या वेब पृष्ठों   पर हैं) अगर अपना नाम अंग्रेजी में रखती है तो उस पर आपत्ति नहीं है पर अगर वह हिंदी में भी रखें तो अच्छी बात है। वैसे यह आवश्यक नहीं है कि अंग्रेजी के पाठक हिंदी की अंतर्जाल पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ना चाहें पर यह एक संभावना है जो हाल ही में बनी है। वैसे  अंग्रेजी नाम की वजह से कई पत्र-पत्रिकाएं  अन्य भाषियों में ही क्या अपनी भाषा वालों मे भी पैठ भी नहीं बना पाईं।</h3>
<h3>एक बात और है कि हिंदी भाषी पत्र-पत्रिकाओं के अंग्रेजी शीर्षक या नाम रखने वालों को यह समझना चाहिए कि ‘हिंदी’ में नाम होने से ही उनकी मौलिकता प्रकट होगी न कि अंग्रेजी से। अगर कोई विदेशी पाठक हिंदी सामग्री  को पढ़ना चाहेगा तो उसकी दृष्टि में सम्मान तभी बढ़ेगा जब हिंदी में शीर्षक होगा भले ही वह सर्च इंजिन में अंग्रेजी शब्द डालकर वहां तक आया हो। इसलिये अंतर्जाल पर वेब साईटों और वेब पृष्ठों (ब्लाग) पर चल रहीं पत्र-पत्रिकाओं को अपने नाम अंग्रेजी नाम के साथ हिंदी में रखना चाहिए, जिनके शीर्षक हिंदी में है वह अगर सोचते हैं कि अन्य भाषियों तक उनके लिए पहुंचना संभव है तो वह उसमें अंग्रेजी नाम भी जोड़ सकते हैं। वैसे श्रेणियों और टैग लगाकर भी यह काम हो ही रहा है। </h3>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[उनका नाम ही दरियादिल हो जाता-कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=372</link>
<pubDate>Fri, 09 May 2008 16:16:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=372</guid>
<description><![CDATA[अपने दिल का बयां कभी कभी
दूसरे के अल्फ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">अपने दिल का बयां कभी कभी</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">दूसरे के अल्फाजों में नजर आता है</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">वह दिल को छू जाता है</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">इसलिए कहते हैं </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">दर्द और खुशी दोनो ही</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">बांट लिया करो दोस्तों से<br />
 <br />
जश्न का मौका हो तो </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">मजा हो जाता दुगुना </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">गम आधा रह जाता है </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">खोये रहोगे अपने ही दिल में </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">तो रोशनी कहीं से नहीं आयेगी</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">जो सुनोगे किसी और की आवाज </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">तभी कोई मिलेगा आसरा </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">वरना कहते हैं कि </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">अकेला चना कभी भाड़ नहीं फोड़ पाता है</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">अपने लिये तो जिंदा हैं सब</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">बांटकर खाते हैं जो लोगों से मिलकर</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">उनका नाम ही दरियादिल हो जाता है<br />
............................<br />
</span></h3>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मोबाइल मोहब्बत हो गई-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=150</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 17:50:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=150</guid>
<description><![CDATA[प्रेमी ने प्रेमिका के मोबाइल की
घंटी ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">प्रेमी ने प्रेमिका के मोबाइल की<br />
घंटी बड़ी उम्मीद से बजाई<br />
जा रही थी वह गाड़ी पर<br />
चलते चलते ही उसने<br />
अपने मार्ग में होने की बात उसे बताई<br />
फिर भी वह बातें करता रहा<br />
वह भी सुनती रही<br />
सफर गाड़ी पर उसका चलता रहा<br />
अचानक वह कार  से टकराई<br />
प्रेमी को भी फोन पर आवाज आई<br />
प्रेमी ने पूछा<br />
‘क्या हुआ प्रिये<br />
यह कैसी आवाज आई<br />
कोई ऐसी बात हो तो मोटर साइकिल पर<br />
चढ़कर वहीं आ जाऊं<br />
मुझे बहुत चिंता घिर आई’<br />
प्रेमिका ने कहा<br />
‘घबड़ाओ नहीं कार से<br />
मेरी गाड़ी यूं ही टकराई<br />
अपनी मरहम पट्टी कराकर अभी आई<br />
करा देगा यह कार वाला उसकी भरपाई+’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">प्रेमी करता रहा इंतजार<br />
फिर नहीं प्रेमिका की कोई खबर आई<br />
एक दिन भेजा संदेश<br />
‘जिससे मेरी गाड़ी टकराई<br />
उसी कार वाले से हो गयी  मेरी सगाई<br />
बहुत हैंडसम और स्मार्ट है<br />
उसने मुझ पर बहुत दया दिखाई<br />
इन दो पहियों की गाड़ी से<br />
तो अब हो गयी ऊब<br />
चार पहियों वाली गाड़ी में ही<br />
अब घूमने की इच्छा आई’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">प्रेमी सुनकर चीखा<br />
‘यह कैसा मोबाइल है<br />
जिसने मोहब्बत को भी बनाया<br />
अपने जैसा<br />
कितना बुरा किया मैंने जो<br />
उस दिन मोबाइल की घंटी बजाइ<br />
..............................................</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">नोट-यह हास्य कविता काल्पनिक है तथा इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।<br />
</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पसीना ही कविता लिखवाता है]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=520</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 16:51:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=520</guid>
<description><![CDATA[बदलते मौसम के साथ
मन भी यूं बदल जाता है
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बदलते मौसम के साथ<br />
मन भी यूं बदल जाता है<br />
जैसे उसके साथ बंधे हों हाथ<br />
ग्रीष्म के जलती दोपहर में<br />
व्यग्रता इतनी बढ़ जाती है<br />
नरक लगता हो  जीवन<br />
शाम होते बहती ठंडी हवा का<br />
एक झौंका भी शीतल कर देता है<br />
मौसम और मन के पहिये<br />
घूमते देख कौन कह सकता है<br />
हमारा मन भी होता है कभी हमारे साथ<br />
..........................</p>
<p>गर्मी की दोपहर में<br />
साइकिल पर चलते हुए<br />
पसीने में नहाए मैंने उसे देखा है<br />
लिखता है कविता वह हसंते  हुए<br />
कभी  उसे रोते नहीं देखा है<br />
पूछने पर बताता है<br />
उसके दोपहर का पसीना ही<br />
रात में शीतलता देकर उससे कविता लिखवाता है<br />
मैं उसे केवल आईने में ही देख पाता हूं<br />
क्योंकि वह चेहरा<br />
केवल उसी में नजर आता है </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इस ब्लाग (पत्रिका) की पाठक संख्या बीस हजार के पार]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=371</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 14:15:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=371</guid>
<description><![CDATA[12 दिसंबर 2007 को इस हजार की संख्या पार कर च]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>12 दिसंबर 2007 को इस हजार की संख्या पार कर चुके इस ब्लाग ने कल बीस हजार की पाठक संख्या को पार कर लिया। इस संख्या को पार करने वाला यह मेरा  दूसरा ब्लाग है।<br />
इस ब्लाग के साथ मेरी दिलचस्प याद जुड़ी हुई है। ब्लागस्पाट पर टाईप करते हुए यूनिकोड में अपनी पहली पोस्ट छोटी कविता के रूप  में इसी पर रखी-क्योंकि मुझे उसमें बड़ी पोस्ट लिखने में दिक्कत आ रही थी-और सबसे पहला कमेंट भी इस पर आया। उससे पहले मैंने सभी तीनों ब्लाग पर कृतिदेव की पोस्ट रखी थी और मैं मानकर चल रहा था कि अब उसी से आगे जाना है। जब कुछ ब्लाग  लेखक उन ब्लाग पर मुझसे यूनिकोड में लिखने को कह रहे थे तो भी मैं उसकी परवाह नहीं कर रहा था। ऐसे में कोई महिला ब्लाग लेखिका (जिससे  बाद में  फिर संपर्क नहीं हो सका) ने मुझे इस  बारे में ईमेल भेजकर रोमन हिंदी में लिख रही थी कि मेरे ब्लाग पढ़ने मेंे नही आ रहे तब मैंने उसे इस ब्लाग का पता दिया। उसने लिखा-‘वहां तो सब पढ़ने में आ रहा है। वाह,वाह बढ़िया  । मगर उसने कोई कमेंट इस पर नहीं लिखी। हां, मैने तब यूनिकोड में लिखने का निर्णय लिया।</p>
<p>नारद पर उसी समय इसे पंजीकृत नहीं कराया पर ब्लागवाणी के अभ्युदय के साथ ही दोनों जगह इसे पहुंचाया और हिंदी ब्लाग पर तो यह पहले से ही था। यह मेरा ऐसा ब्लाग रहा है जो बिना फोरम पर दिखे भी वर्डप्रेस के डेशबोर्ड पर नंबर एक पर आया था। फोरमों पर दिखने से पहले ही यह ब्लाग अपने लिये तीन  हजार पाठक जुटा चुका था। तब अनुभव की कमी के कारण मुझे समझ में कुछ नहीं आता था पर बाद में यह बात समझ में आयी कि ब्लाग का मार्ग फोरमों से आगे भी जाता है। ब्लाग की डालरों में बताने वाली वेब साईट के मुताबिक यह मेरा सबसे महंगा ब्लाग है। हालांकि फिर भी यह अन्य ब्लाग लेखकों के ब्लाग के मुकाबले बहुत सस्ता है पर फिर भी मैं इससे संतुष्ट हूं। मुझे इस ब्लाग से एक ही संदेश मिलता है‘डटे रहो, तुम जिस रास्ते पर चल रहे हो उससे विचलित नहीं हो’। जिस तरह से पिछले पंद्रह दिन से यह ब्लाग व्यूज ले रहा था उससे मुझे लग रहा था कि  आज शाम तक यह जादूई आंकड़ा पार करेगा पर कल इसने अपने पुराने तेवर दिखाये जब मैं इस पर पोस्ट डालने लगा तो उसी समय यह इस आंकड़े को पार करने की तैयारी में लग रहा  था और आज तो यह उससे भी आगे जा रहा है।</p>
<p>नीचे इस ब्लाग की प्रथम बीस पोस्ट जिन्हें अधिक पाठकों ने देखा और विभिन्न फोरमों से मिलने वाले व्यूज की संख्या। यह स्पष्ट संदेश कि अध्यात्म और व्यंग्य पर ही मुझे लिखते रहना चाहिए। अपने ब्लाग लेखक मित्रों, पाठकों और समय समय पर तकनीकी विषय पर सहायता देने वाले मित्रों का मैं हृदय से आभारी रहूंगा। दूसरों को बहुत लघु लगने वाली यह उपलब्धि मेरे लिये बहुत महत्वपूर्ण है।</p>
<p><strong>प्रथम बीस पोस्ट</strong></p>
<p><strong>------------------</strong><br />
रहीम के दोहे:सुख में अंहकार दु:ख में कुं 244 <br />
चाणक्य नीति:विद्या की शोभा उसकी सिद्धि  205 <br />
मेरा परिचय=दीपक भारतदीप, ग्वालियर  202 <br />
चाणक्य नीति:परोपकार मधुमक्खी से सीखें  175 <br />
पहले आतंकवाद आया कि पर्यावरण प्रदूषण  175 <br />
रहीम के दोहे:जहाँ उम्मीद हो वहीं जाएं  146 <br />
रहीम के दोहे:मछली का जल प्रेम प्रशंसनीय  142 <br />
चाणक्य नीति: कुत्ते और कौवे से गुण ग्रहण 126 <br />
चतुराई से मुट्ठी में कर लो-हास्य कविता  123 <br />
चलना ज़रा संभल कर-हास्य कविता  119 <br />
आज नवमी-भक्तों के रक्षक हैं भगवान् श्रीर 117 <br />
रहीम के दोहे:परिश्रम कर भोजन ग्रहण करें  115 <br />
चाणक्य नीति:पांच वस्तुओं का संग्रह अवश्य 115 <br />
चाणक्य नीति:बेमौसम राग अलापना हास्यास्पद 115 <br />
दादा-पोते की राजनीति और मनोरंजन  112 <br />
मन के बहरों के आगे क्या बीन बजाना  111 <br />
चाणक्य नीति:क्रोध उतना ही करें जितना निभ 104 <br />
दिल हुआ इधर से उधर  103 <br />
असल पर नक़ल का राज  101 <br />
चाणक्य नीति:प्रेम और व्यवहार बराबरी वाले १००<br />
चाणक्य नीति:मनुष्य को हर विधा में पारंगत 100</p>
<p><strong>Referrer Views (पाठकों के आने के मार्ग)</strong></p>
<p><strong>---------------------------------</strong><br />
blogvani.com 718<br />
narad.akshargram.com 369<br />
hi.wordpress.com/tag/%E0%A4%9A%E0%A4%… 223<br />
filmyblogs.com/hindi.jsp 187<br />
botd.wordpress.com 165<br />
chitthajagat.in 151<br />
 </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दर्द की बजाय  लिखना  पसंद है संघर्ष पर]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=370</link>
<pubDate>Tue, 06 May 2008 15:18:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=370</guid>
<description><![CDATA[अंतर्र्जाल पर मैं लिखता हूं इसका अर्थ ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अंतर्र्जाल पर मैं लिखता हूं इसका अर्थ यह कदापि नहीं लिया जाना चाहिए कि मै किसी उच्च मध्यम परिवार से हूं। सत्य तो यह है कि मेरा जन्म निम्न मध्यम वर्ग में हुआ और बोर्ड की परीक्षा के बाद भी मैंने मजदूरी की और ठेला चलाया। जिस दुकान पर मैं नौकरी  करता था वह थोक की दुकान थी और सामान दूसरी दुकान पर पहुंचाने  के लिये मुझे कई बार ठेला चलाना पड़ता था। यह बात मैने अपने पिताजी से भी छिपाई थी। कई बार मेरे पैरों में कीलें घुसकर खून निकाल चुकीं हैं। अपने उस नौकरी के दौरान भी दोपहर जब मैं घर पर आता था तो लिखता था-उसमें कोई पीड़ा नहीं बल्कि जीवन के प्रति आशावाद होता था। आज नहीं तो कल मेरा होगा-यह विश्वास मेरे जीवन की अनमोल पूंजी रहा है।  </p>
<p>मैं आजकल आपने काम पर स्कूटर पर जाता हूं पर मेरा साइकिल से अभी भी नाता हैं। मेरा काम भी अब शारीरिक श्रम करने का नहीं है पर फिर मैं उसमें कोई अपनी तरफ से नहीं रखता। शारीरिक श्रम करने वाले  को बेचारा या गरीब कहना शायद  कुछ लोगों को सहज लगता है पर मुझे नहीं। इसलिये जो लोग गरीब के दर्द पर कहानियां या कविताएं लिखकर वाह’-वाह जुटाते हैं उनमें मेरी रुचि नहीं रही। इस देश में परिश्रम करने वालों की कमी नहीं है पर वह भी ऐसे दर्द भरी रचनाओं को पसंद नहीं करते। हां, एसी कमरों तथा होटलों के भोजन करने वालों को एकांत में बैठकर उनके हृदय में ऐसी संवेदनशील रचनाएं दर्द का रस पैदा करतीं हैं तो वह खुश हो जाते हैं।  दर्द भी एक रस है और जिनके पास सब कुछ है पर दर्द नहीं है वह इस रस से वंचित रहते हैं और इसी कारण उनको गरीबों के दर्द पर बनीं फिल्में और रचनाएं पसंद आती हैं। हमारे देश के कुछ विख्यात फिल्मकार और लेखक इसी दर्द के सहारे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर चुके हैं पर उनको यहां कोई पूछता भी नहीं था। हां, जब उनको इस देश से बाहर ख्याति मिली तो यहां भी उनको पुरस्कारों प्रदान किये गये पर आम आदमी भावनात्मक रूप से कभी उनसे नहीं जुड़ा।</p>
<p>मैने एक मजदूर के रूप में देखा है मुझे रोटी या सहानुभूति की नहीं सम्मान और प्यार की आवश्यकता  होती है और ऐसे में और लोगों की बात क्या करें  अपने भी पीछे हट जाते हैं।  अपने जीवन में हर चीज अपने परिश्रम से बनाते हुए मैंने एक बात देखी है कि गरीब और मजदूर के दर्द और भावनाओं पर कुछ लोग व्यापार करते हैं। भले ही उनको पैसा अधिक नहीं मिलता पर सम्मान और नाम उन्होंने खूब कमाया। किसी गरीब मजदूर के बीमार होने पर उस पर कुछ असली तो कुछ नकली कथा लिखकर लोगों को दर्द का रस बेचा।<br />
मैं अपनी कविताओं और कविताओं के हमेशा संघर्ष के भाव इसलिये स्थापित कर पाता हूं क्योंकि मेरा यह अनुभव रहा है कि परिश्रम करने से आत्मविश्वास बढ़ता है। इस देश में गरीब और मजदूर के कल्याण के नारे लगाने वाले बुद्धिजीवियों का लंबे समय तक वर्चस्व रहा है और उन्होंने शैक्षणिक तथा सामाजिक संस्थानों इस तरह घुसपैठ कर ली कि उनके ढांचे से बने समाज में लोग आज भी दर्द  के रस में प्रफुल्लित  होना चाहते हैं-उनमें आत्मविश्वास की कमी है क्योंकि वह परिश्रम नहीं करते और इसलिये दर्द का रस उनमे पैदा ही नहीं होता। जिनके पास धन की कमी है उन्हें जीवित रहने के लिये संघर्ष करना पड़ता है और बीमारी और अन्य सामाजिक संकटों में भी उसे कोई संवेदना न तो कोई देता है न वह चाहता है। वह थोड़ा सम्मान और प्रेम चाहता है और वह कोई नहीं देता। </p>
<p>मेरी पत्नी कई बार ठेला वालों से सामान खरीदते समय मोलभाव करती है तो मैं उसे मना करते हुए कहता हूं कि-‘यह मेहनत कर रहा है तो समाज पर उसे उपकार ही समझो क्योंकि अगर वह ऐसा न करता तो पेट पालने के लिये अपराध भी कर सकता है।’</p>
<p>यह मेरे अंदर मौजूद कोई दर्द नहीं है बल्कि यह अपने जीवन संघर्ष के अनुभव से मिला  एक यथार्थ है। अपने जीवन के संघर्ष में मैंने इस बात का अनुभव किया है कि अधिकतर लोग परिश्रम इसलिये करते हैं कि उनका सम्मान किसी के पैरो के तले कुचला न जाये। मैं यह दावा भी नहीं करता कि मैं परिश्रम करने वालों के प्रति मै बहुत संवेदनशील  हैं क्योंकि इसका अर्थ यह है कि उनके श्रम को कम कर  देखना।<br />
मै आजकल इतना शारीरिक श्रम नहीं करता। जब मैं जमकर शारीरिक श्रम करता था तब भी मै हास्य व्यंग्य लिखता था और जब भी कभी पसीना नहा जाता  हूं तब भी मुझे वैसा ही लिखने में मजा आता है। इसलिये जिन लेखकों को यह भ्रम हो कि वह दर्द पर लिखकर लोकप्रियता अर्जित करेंगे उन्हें इस भ्रम का निवारण कर लेना चाहिए। इस देश के परिश्रम करने वाला भी वैसा ही अच्छा पढ़ना चाहता है जैसा कभी कभी कुर्सियों पर काम करने वाले लोग-जो दर्द की फिल्म देखकर या रचना पढ़कर उसके रस से प्रफुल्लित  हो जाते है-कभी पढ़ने को इच्छुक होते हैं। इसलिये मुझे दर्द की बजाय संघर्ष पर लिखना पसंद है। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अनुवाद टूल से सभी भाषाओं के लेखक करीब आयेंगे-आलेख]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=403</link>
<pubDate>Sun, 04 May 2008 13:14:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=403</guid>
<description><![CDATA[मैंने कुछ अंग्रेजी ब्लाग के पाठों को ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मैंने कुछ अंग्रेजी ब्लाग के पाठों को हिंदी में अनुवाद कर उन्हें पढ़ा। इसमें कुछ भारतीय लेखकों द्वारा भी लिखे गये हैं। ऐसा लगता है कि विश्व का पूरा ब्लाग जगत एक समय एक जैसा ही दिखाई देगा हालांकि उनमें लिखी गयी विषय सामग्री अपने देश और क्षेत्र के कारण पृथक-पृथक दिखाई देगी पर मूल तत्व एक समान नहीं परिलक्षित होगा। </p>
<p>हिंदी अंग्रेजी अनुवाद टूल का उपयोग करने से वह ब्लाग लेखक भी अपनी भाषाई सीमाओं से निकलकर बाहर  प्रतिष्ठित हो सकते हैं जो अंग्रेजी नहीं जानते।  हिंदी फोरमों पर अपंजीकृत ब्लाग पर मैं अपने पाठों के अंग्रेजी अनुवाद भी प्रस्तुत कर रहा हूं। अंग्रेजी में मेरे आलेख साफ पढ़े जा सकें इसलिये अनुवाद टूल पर मुझे मेहनत तो होगी पर जिज्ञासावश मै यह कर रहा हूं। इस अंग्रेजी-हिंदी टूल की जानकारी अभी मिली पर यह पहले से ही कहीं उपयोग में लाया जा रहा है। एक  ब्लाग लेखक ने मुझे उस दिन अपनी एक पोस्ट पर टिप्पणी  दी थी और जब मैं उसके ब्लाग पर गया तो वहां हिंदी में पोस्ट थी। ब्लाग लेखक का नाम अंग्रेजी में था। पहले भी कई  अंग्रेजी नामों वाले टिप्पणी लिखते रहे पर मैं सोचता था कि यह ऐसे ही रख रहे होंगे। एक ब्लाग लेखक  ने मेरे ब्लाग पर अपनी टिप्पणी में ऐसे हिंदी-अंग्रेजी  टूल की चर्चा की थी तब मुझे लगा था कि एक दिन ऐसा टूल आयेगा पर इतनी जल्दी आयेगा ऐसी अपेक्षा मुझे नहीं थी। </p>
<p>मुख्य बात है कि अनुवाद का परिणाम शतप्रतिशत नहीं है पर उससे अंग्रेजी को पढ़ने के सहायता तो मिल ही रही है। इसलिये उसका लिखने के लिये भी उपयोग कर रहा हूं। मैं जब अपना पाठ उस पर अनुवाद के लिये लाता हूं तो कई शब्द वह स्वीकार नहीं करता पर फिर उसके लिये  वैकल्पिक शब्द रखता हूं। मेरी रचना अंग्रेजी में थोड़ा बहुत समझी जाये तो वह भी मुझे अच्छा लगेगा। ऐसा लग रहा है कि उसकी प्रतिक्रिया सकारात्मक होने वाली है। कुछ अंग्रेजी ब्लाग लेखक भी हिंदी ब्लाग लेखकों से संपर्क बनाने के लिये प्रयासरत दिख रहे हैं। हिंदी ब्लाग लेखक  को अब अपन  मनःस्थिति विदेशी भाषी ब्लाग लेखकों से अपने संपर्क रखने के लिये बना लेनी चाहिए। यह ब्लाग यहीं घूमने वाले नहीं है और अनुवाद टूल के माध्यम से  अन्य भाषी ब्लाग लेखकों  से इनके संपर्क में आने की पूरी संभावना है।</p>
<p>ब्लाग शब्द का किसी भाषा में कोई अनुवाद नहीं है और  ब्लाग लेखकों के लिये भाषाई दीवार भी खत्म होती नजर आ रही है। कल एक अंग्रेजी ब्लाग लेखिका  ने एक पोस्ट पर प्रतिक्रिया दी तो बात समझ में आ गयी कि वह मेरी पोस्ट पढ़कर ही वह लिख रही है Jennifer Lancey ने लिखा Hello there. I was sent a link to your blog by a friend a while ago. I have been reading a long for a while now. Just wanted to say HI. Thanks for putting in all the hard work। अब है न आश्चर्य की बात कि मैं लिख रहा हूं हिंदी में पढ़ रहे है वह लोग जो केवल अंग्रेजी ही जानते हैं। उसने मेरे अंग्रेजी अनुवाद को पढ़ा और उसके बारे में उसकी राय पता नहीं चलती, पर हम लोग भी भला कहां ऐसी टिप्पणियां लगाते हैं जिससे स्पष्ट होता है कि हमारे समझ में आया कि नहीं। हां, मैं इस बात का इंतजार नहीं कर रहा कि कोई मेरे हिंदी ब्लाग को अनुवाद टूल से पढ़े बल्कि स्वयं ही अनुवाद भी रख रहा हूं। अनुवाद में अशुद्धियों को ठीक करने पर इसलिये मेहनत कर रहा हूं ताकि मेरी पोस्ट और अधिक स्पष्ट पठनीय हो। अब लिखते समय इस बात का भी ध्यान रख रहा हूं कि मेरा ब्लाग अन्य भाषाओं के भी अनुवाद होगा। विश्व के सभी भाषाओं के ब्लाग लेखक एक दिन इतने करीब आ जायेंगे कि उनमें दूरियां नाम की रह जायेंगी। मैं चाहता हूं कि हिंदी के ब्लाग लेखक  भी विश्व पर प्रतिष्ठित हों और उन्हें अपनी पोस्टों को समय होने पर कभी कभी  अनुवाद टूल पर देखना चाहिये कि वह अंग्रेजी में पूरी तरह अनुवाद से पढ़ने में आती  है कि नहीं। जो शब्द अनुवाद न हों उसके लिये वैकल्पिक शब्द चुन कर रखें। जरूरी नहीं हैं कि हम अंग्रेजी अनुवाद रखें पर उसे इस लायक तो बना सकते हैं कि उसका अंग्रेजी में अधिकतम शुद्ध अनुवाद हो जाए। इसमें कोई आपत्तिजनक नहीं है क्योंकि हम हिंदी में लिख रहे हैं और अगर अन्य भाषाओं के ब्लाग लेखक हमसे संपर्क रखने के इच्छुक हों तो उन्हें सुविधा हो जायेगी। एक बात का अनुभव हुआ कि अपने पाठों में हम जितने अधिकतम शुद्ध हिंदी शब्दों का उपयोग करेंगे उतना ही इसका अंग्रेजी अनुवाद शुद्ध होगा। </p>
<p>Google's translation of the text has been presented here to <a href="http://rajdpk1.wordpress.com">http://rajdpk1.wordpress.com  </a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अच्छा हुआ खबर नहीं पढ़ी-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=369</link>
<pubDate>Sun, 04 May 2008 10:08:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=369</guid>
<description><![CDATA[श्रीमतीजी ने रात को पूछा-‘‘क्या खाना ख]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>श्रीमतीजी ने रात को पूछा-‘‘क्या खाना खाओगे?’’<br />
हमने कहा-‘‘हम रात को कहां खाते हैं?तुम दूध का एक कप ले आओ तो उसके साथ एक छोटा टोस्ट खाकर सो जायेंगे। वैसे तुमने यह पूछा क्यों?’<br />
कहने लगीं-‘तुम अभी कुछ खाने पर लिख रहे थे। मैने देखा तो सोचा कि शायद तुम्हें भूख लग जाये। जब रात को खाना नहीं खाते तो उस पर लिखते क्यों हो?’<br />
मैने कहा-‘अपने लिये तो लिखते नहीं है जो यह सोचें। पढ़ने वाले तो रात को खाते होंगे न! फिर कितनी गंभीर बात है कि अपने देश के लोगों पर अधिक खाने का आरोप लग रहा है तो यह समझाना जरूरी है कि ऐसी कोई बात नहीं है।’<br />
हमारी श्रीमती जी बोली-‘‘लगाने वाला भी तुम जैसा कोई आदमी रहा होगा। सारी दुनियां से कहते हो कि एक समय खाना खाता हूं पर तुम रात को घर आते ही चाय के साथ  दो से चार बिस्कुट  खाते हो और रात को दूध के कप के साथ एक दो टोस्ट उदरस्थ कर जाते हो। यह खाना नहीं तो और क्या है? और लोगों से कहते हो कि एक समय खाता हूं।’</p>
<p>हमने कहा-‘‘तो क्या लोगों का बताता फिरूं कि मैं यह खाता हूं और वह खाता हूं। यह तो तय बात है कि रात को हमारे घर पर खाना नहीं बनता।’’</p>
<p>हमारी श्रीमती जी चुप हो गयीं। सुबह ही एक सज्जन आये और बोले-‘‘देखो यार, अपने देश के  बाहर के लोग क्या कह रहे हैं  भारत के लोग अधिक खाते हैं इसलिये दुनियां में खाद्यान्न का संकट है। अब बताओ, इस देश के लोग गरीब थे तो झंडे और डंडे लेकर इस देश पर विचाराधाराओं के साथ हमला करते थे। सरकारीकरण खत्म करो उदारीकरण चलो। अब कह रहे हैं कि अधिक खाते हैं। अब क्या रोटी भी पेट भरकर  नहीं खायें?’</p>
<p>हमने कहा-‘‘भरपेट तो खाना नहीं चाहिए। जरूरत से एक रोटी कम खाना चाहिए।<br />
वह सज्जन बोले-‘‘यार तुम जैसा तो कोई हो नहीं सकता कि एक समय खाना खाये।’<br />
हमने कहा-‘‘हम आजकल शारीरिक मेहनत कम कर रहे हैं इसलिये कम खाते हैं।<br />
हमारी श्रीमती उनसे परिचित थीं और उनसे बोलीं-‘‘कहां एक समय खाते हैं? रात को आते ही चाय के साथ बिस्किट और रात को दूध के कप के साथ टोस्ट जरूर खाते हैं। वह क्या खाने से कम है?’</p>
<p>हमने सोचा झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है और हमने कहा-‘हम कम कहते हैं कि नहीं लेते?’<br />
वह सज्जन बोले-‘यह तो हम भी करते है पर फिर भी खाना खाते हैं। खाने के बाद दूध का ग्लास जरूर लेते हैं। हा, उसके साथ टोस्ट वगैरह नहीं लेते। भाभीजी, आप क्या समझ रही हो कि केवल आप लोग ही दूध पीते हैं। खाने के बाद हम दूध न पियें तो नींद ही नहीं आये।’<br />
हमने कहा-‘पर आप खाने को लेकर इतने परेशान क्यों हो रहे हैं? आपके लड़के की शादी में आयेंगे तो जरूर हम भी जमकर खायेंगे जैसे दूसरे। ऐसी कोई कसम नहीं खा रखी कि रात को कभी नहीं खायेंगे। हां, जबसे योग साधना शूरू की है तब से रात को खाने की चिंता से मुक्त हो गये हैं पर आपको कभी यह नहीं कहेंगे कि रात का भोजन लेना छोड़ दें। कहने वाला कुछ भी कहता रहे।’</p>
<p>वह बोले-‘मुद्दे की बात यह है कि क्या वाकई हम बहुत खाते हैं?’<br />
हमने कहा-‘‘अधिक मत सोचो? पहले ही तुम मधुमेह की शिकायत करते हो  और उसमें फायदा उन कंपनियों का ही होगा जो बाहर की हैं क्योंकि उनकी गोलियों से ही तुम खाना पचा पाते हो। हो सकता है कि योग साधना के प्रचार से  अब स्वस्थ लोगों की संख्या बढ़ रही हो और उन पर ‘अधिक खाने’ के शगूफे से तनाव बढ़ाकर फिर उनको बीमार बनाया जाये यही इसके पीछे यही चाल हो सकती है।<br />
वह सज्जन बोले-‘‘पर तुमने यह अभी तक नहीं बताया कि क्या हम भारतीय अधिक खाते हैं?’<br />
हमने कहा-‘‘इस देश में एक सौ पांच करोड़ लोग रहते हैं। कहीं लोग गेंहूं अधिक खाते हैं तो कही चावल तो कहीं कुछ और। किसी के पास कोई पैमाना नहीं है। घर में चार एक आयु वर्ग के चार सदस्य होते हैं पर उनके खाने की मात्रा अलग-अलग होती है। अब कैसे कहें कि इस देश के लोग अधिक खाते हैं या कम।’<br />
वह सज्जल बोले-‘हम तो पिछले दस साल से देख रहे हैं कि अपने घर में जितना गेंहूं आता है उससे अधिक कभी लेते नहीं है। बल्कि बाहर के खाने से उसकी खपत कम होती जा रही है। छोटे बच्चे तो तमाम तरह की चिप्स वगैरह खाकर पेट भरते हैं, पीजा, बर्गर और पैट्रीज खाकर पेट भरेंगे तो फिर घर में कहां खायेंगे?’<br />
हमने कहा-‘फिर बाहर खाने से दूसरे लोगों को खाते दिखते हैं। पैसे की आवाजाही सड़क पर होने से बाहर के लोगों को दिख रही हैं इसलिये ऐसी बातें कर रहे हैं। उनको बाजार में खाने के स्थानों पर लोगों की भीड़ और पैसे का बहाव देखकर ऐसा  लगता है कि यह देश बहुत खाता है।’<br />
वह सज्जन चिंता में पड़े रहे तो आखिर हमारी श्रीमती जी ने कहा-‘भाई साहब, इतनी चिंता में आप पड़े क्यों हैं? इस देश के लोग खाते हैं तो किसी से छीनकर थोड़े ही खाते हैं। किसी के खाने में नजर तो नहीं डालते। किसी को सुखी देखकर उससे छीनते तो नहीं हैं? किसी के घर पर जाकर लूटपाट तो नहीं करते। आप यह बताईये हम आपके घर रात के खाने पर कब आयें? आप तो भाभीजी और बच्चों को लेकर कभी खाने पर लेकर  आते ही नहीं।’<br />
 <br />
वह सज्जन बोले-‘आप कमाल कर रही हो? इतनी बहस हो गयी खाने पर और आप फिर खाने की बात  लेकर बैठ गयीं। कभी आयेंगे चाय पीने पर आप खाने के जबरदस्ती करतीं हैं इसीलिये नहीं हम परिवार सहित आपके घर नहीं आते। हां, आप एक बार खाने पर आयें तो फिर सोचेंगे।’<br />
फिर हमने बातचीत का विषय बदला और वह चले गये तो श्रीमतीजी ने कहा-‘‘पर यह कहा किसने है कि भारत के लोग खाते अधिक हैं?’</p>
<p>हमने कहा-‘‘हमें पता है पर तुम जानने की कोशिश कर अपनी चिंता क्यों बढ़ा रही हो। अधिक चिंता शरीर को हानि पहुंचाती है।’<br />
वह बाहर जाते हुए बोलीं-हां यह तो बात है। वैसे आज अखबार में ऐसा कोई ऐसा शीर्षक तो देखा था पर खबर पूरी नहीं पढ़ी। अच्छा हुआ नहीं पढ़ी। बिना मतलब की खबर पढ़ने से क्या फायदा?’</p>
<blockquote><p><strong>The comic satire on </strong><a href="http://rajdpk1.wordpress.com"><strong>http://rajdpk1.wordpress.com</strong></a><strong> to be read in English</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गरीबों का खाना सहता कौन है? हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=149</link>
<pubDate>Sat, 03 May 2008 16:18:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[अमेरिका के राष्ट्रपति जार्जबुश ने कह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#800080;">अमेरिका के राष्ट्रपति जार्जबुश ने कहा है कि विश्व में खाद्यान्न संकट के लिये भारत के लोग ही जिम्मेदार हैं क्योंकि वह ज्यादा खाते हैं। उनके इस बयान पर यहां बवाल बचेगा यह तय बात है और यह भी  कि अमेरिका में रहने वाले भारतीय भी अब वहां संदेह की दृष्टि से देखें जायेंगे। अगर कहीं अकाल यह बाढ़ की वजह से  अमेरिका में कभी खाद्याान्न का संकट आया तो उसके लिये भारतीयों पर ही निशाना साधा जायेगा। वैसे तो वहां पाकिस्तान और बांग्लादेश के लोग भी हैं पर अब वह बच जायेंगे और कभी ऐसा अवसर आया तो वह भी भारतीयों पर चढ़ दौड़ेंगे कि यही लोग सब जगह ज्यादा खाकर संकट खड़ा करते हैं। </span></p>
<p><span style="color:#800080;">ऐसा लगता है कि लोकतंत्र बहाल होने के बाद अमेरिका अब पाकिस्तान पर मेहरबान हो रहा है और उसे किसी तरह अपने कैंप में रखना चाहता है इसलिये उसे अब विश्व का संकट वहां पनप रहा आतंकवाद नहीं बल्कि भारतीयों द्वारा अधिक खाने के कारण खाद्यान्न संकट  दिख रहा है। ऐसा भी हो सकता है कि भारत और पाकिस्तान के लोगों का  करीब आना अमेरिका को सहन नहीं हो रहा है और परोक्ष रूप से पाकिस्तान के लोगों को यह संदेश दिया जा रहा हो कि इन भारत के लोगों से बचने का प्रयास करें क्योंकि अधिक खाते हैं और तुम्हारा अनाज भी खा जायेंगे। </span></p>
<p><span style="color:#800080;">अमेरिका की स्थिति अब डांवाडोल होती जा रही है क्योंकि इराक और अफगानिस्तान उसका बहुत बड़ा सिरदर्द साबित होने वाले हैं। अमेरिका भारत से जैसी  अपेक्षा कर रहा है वह पूरी नहीं हो रहीं हैं क्योंकि यहां की आंतरिक स्थिति भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। जार्जबुश का यह बयान किसी ऐसे ही तनाव  का  परिणाम प्रतीत  होती  है क्योंकि उनको अपने राष्ट्रपति  चुनाव से पहले यह भी पता नहीं था कि भारत है किस दिशा में। उनकी विदेशमंत्री कोंडला राइस भारत आती रहतीं है और फिर चली जातीं हैं। भारत की विविधताओं और विशेषताओं का उनको पता हो इस पर संदेह है। उनके बयान के बाद ही उसके समर्थन में जार्जबुश का यह कथन सामने आया है।</span></p>
<p><span style="color:#800080;">जार्जबुश के इस कथन में हमें इसमे कोई दोष नहीं देखना चाहिए क्योंकि वह एक अमीर राष्ट्र के प्रधान हैं। अमीरों की यह मनोवृत्ति होती है कि उनको गरीब का खाना, पीना और चैन से सोना  पसंद नहीं है-क्योंकि उनके नसीब से  यह चीजें चलीं जातीं हैं जब धन उनके पास आता है। मेरी नहीं तो कविवर रहीम के बात तो आप मानेंगे ही जो कह गये हैं कि अमीरों की पाचन शक्ति कम होती है। अब यह तो सब जानते हैं कि इस देह का सारा खेल भोजन की पाचन शक्ति पर निर्भर करता है। अगर वह नहीं है तो नींद अच्छी नहीं आयेगी और उसकी वजह से तनाव रहेगा।  अमेरिका के लोग भारतीय अध्यात्म इतने फिदा क्यों हैं? भारत के योग का प्रचार वहां क्यों बढ़ा है? क्योंकि अमेरिका में सुख-सुविधाओं के चलते शारीरिक परिश्रम का प्रचलन कम होता जा रहा है। हालत यह है के ढोंगी और पाखंडी बाबा भी वहां अपने चेले बनाकर अपना काम चला रहे हैंं।  मतलब यह कि भारतीयों के खाने पर यह की गयी टिप्पणी उनके ऐसे ही किसी तनाव का परिणाम लगती है जो इस समय उनके दिमाग में है।<br />
इस देश में कई बार ऐसे भी दृश्य देखने को मिल जाते हैं कि सड़क पर लोग अपने ट्रकों और ट्रालियो के नीचे गर्मियों की दोपहर में मजदूर लोग खाना खाकर ऐसी नींद लेते हैं कि अमीरों को एसी में भी वह नसीब नहीं होती। </span></p>
<p><span style="color:#800080;">अमीरों को इस बात से सुख नहीं मिलता कि उनके पास संपत्ति, वैभव और प्रतिष्ठा है उनको यह दुःख सताता है कि उनके सामने रहने वाले गरीब उसके बिना कैसे जिंदा है? वह इतने आराम की नींद कैसे लेते है जबकि उनको इसके लिये गोलियां लेनी पड़ती है। हम जार्ज बुश का क्या कहें अपने देश के अमीर लोग भी क्या इससे अलग सोचते हैं और अब तो ऐसे राष्ट्राध्यक्ष का बयान आया है जिसको यहां का धनवान वर्ग बहुत मानता है और अब यहां गरीबों के खाने पर आक्षेप होंगे। अब यह भला कौन समझाए कि मेहनत करने से भूख अच्छी लगती है तो खाना भी आदमी खाएगा और खाएगा तो मेहनत भी करेगा। अच्छी भूख लगना और ईमानदारी से आय अर्जित करना  प्रत्येक व्यक्ति के भाग्य में नहीं होता।  </span></p>
<p><span style="color:#800080;">अमेरिका द्वारा सुझाये गये आर्थिक मार्ग पर यह देश चलता जा रहा है पर अभी भी किसानों की मेहनत पर ही इस देश की अर्थव्यवस्था जिंदा है। उद्योग की चमक जो शहरों में दिख रही है वह केवल कृत्रिम है यह सत्य तो कोई भी देख सकता है। अमीरों के पास राज है तो रोग भी हैं और उसके इलाज के लिये धन भी है पर गरीब के पास सिवाय अपनी देह के और क्या होता है और वह अगर उसे भी न बचाने तो जाये कहां। जिस औद्योगिक और तकनीकी विकास की बात कर रहे हैं उसमें गैर तकनीकी श्रमिकों और कर्मचारियों के लिये कोई जगह दिखती भी नहीं है और ऐसे संघर्ष में जो आदमी अगर रोटी कमा कर अपना चला रहा है उसके पास इतना समय भी नहीं होता कि अपने मन का दर्द किसी को सुना सके-वह तो उसके पसीने की बूंदों के साथ बाहर निकल जाता है। ऐसे में कई अमीर भी आक्षेप करते हैं कि गरीब अधिक खाते हैं इसलिये गरीब हैं ऐसे में अगर बुश साहब ने भी यह कह दिया तो उस पर अधिक परेशान होने की जरूरत नहीं है।</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ कम दर्शकों द्वारा फिल्म देखने की शिकायत बेमानी-आलेख]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=368</link>
<pubDate>Sat, 03 May 2008 12:11:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=368</guid>
<description><![CDATA[आज मैने एक अंग्रेजी ब्लाग पर पाकिस्ता]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आज मैने एक अंग्रेजी ब्लाग पर पाकिस्तानी फिल्म ‘खुदा के लिये’ के बारे में चर्चा पढ़ी। अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद के जरिये पढ़ी इस चर्चा में भारत में इसे अधिक दर्शकों द्वारा न देखने का उल्लेख किया गया। इसकी तारीफ में बहुत सारे कसीदे भी पढ़े गये। मुझे वहां एक अनाम व्यक्ति की टिप्पणी भी दिखी जिसमें उसने इस बात का उल्लेख किया कि फिल्म में कोई बड़ा भाई है जो अपने एक गोरे  छात्र को बता रहा है कि ताजमहल का निर्माण हम मुसलमानों ने किया है। उस टिप्पणी देने वाले ने यह बात भी स्पष्ट की कि यह पाकिस्तान की फिल्म न होकर एक धर्म के लोगों को संदेश देती है कि वह अपने धार्मिक भावनाओं को अपने देश से अधिक महत्व दें।  साथ ही यह भी दर्शाती है कि पाकिस्तान का एक बहुत बड़ा वर्ग अभी भी भ्रम का शिकार है। उस टिप्पणीकार ने लिख कि ताजमहल क निर्माण में आगरा और उसके आसपास के लोगों ने काम किया इसलिये उसे किसी विशेष से जोड़ना ठीक नहीं है। मै उसकी इस बात से सहमत था।</p>
<p>इसमें अमित नाम के व्यक्ति की टिप्पणी भी थी कि जिसने इसका उल्लेख किया गया था। मतलब यह है कि भारत के बुद्धिजीवी भी बहुत सारे भ्रमों के शिकार हैं। वह इस बात को नहीं समझ रहे कि जिस तरह विदेशों से आयातित विचारधाराओं और नारों से पूर्वाग्रहों से ग्रसित   हैं वैसे ही पाकिस्तानी भी मजहब की भावनाओं से बंधे हैं। दोनों तरफ एकता के नाम पर पाकिस्तानी ऐसी सामग्री इस देश में लायेंगे जो उनके पूर्वाग्रहों से सुसज्जित होंगी। </p>
<p>पहले ताजमहल की बात कर लें। ताजमहल शाहजहां ने बनवाया था-हालांकि कुछ लोग इस पर भी विवाद खड़ा करते हैं-ऐसा कहा जाता है पर उसमें खून पसीना बहाया था मजदूरों ने और उसकी कीमत चुकाई थी इस देश के किसानों और व्यापारियों ने। उस समय कोई उद्योग नहीं थे और न कोई आयकर था। सर्वाधिक वसूली किसानों की उपज और बाहर से आने वाले व्यापारियों से होती थी। शाहजहां ने कोई घर से पैसा नहीं लगाया बल्कि इस देश की गरीब जनता की खून पसीने से लगान के रूप में या जमीदारों और साहूकारों से कर उसे इस एतिहासिक इमारत में लगाया गया। कुछ इतिहासकार कहते हैं कि ताजमहल पर बहुत अधिक व्यय से भी राज्य की आर्थिक स्थिति खराब हो रही थी इसलिये उसके पुत्र औरंगजेब ने अपने पिता को हटाकर राज्य अपने कब्जे में ले लिया। मतलब उसे अपनी माता की स्मृति में बनाये गये इस स्मारक से अधिक अपने राज्य की दुर्दशा ने कष्ट पहुंचाया और उसने राज्य हथिया लिया।</p>
<p>पाकिस्तान के बुद्धिजीवियों की अगर ऐसी हालत है तो उनसे किसी प्रकार का संपर्क इस देश के लिये लाभदायक नहीं रहने वाला है। जो इतिहास ( जिसे कुछ विद्वान झूठ का पुलिंदा भी मानते हैं) का बोझ अपने सिर पर रखकर चलते हैं वह चिंतन और अध्ययन से परे होते हैं। पाकिस्तान के फिल्मकार और बुद्धिजीवियों भी इसका शिकार हैं। अगर वह विदेश में भारत की एतिहासिक इमारतों के निर्माण का गौरव अपने मजहब के नाम से दिखाते हैं तो फिर उनसे यह आशा करना बेकार है कि वह इस देश के आम लोगों के सच्चे सहानुभूति प्रदान करने वाले हैं।</p>
<p>मैंने वह फिल्म नहीं देखी। न उसमें मेरी रुचि है क्योंकि इस तरह की फिल्में मुझे किसी तरह का मनोरंजन नहीं देतीं। जहां तक ज्ञान की बात है तो अभी बहुत सारी किताबें हैं जिससे पढ़ना है और मनोरंजन तो साहित्य  या संगीत ही से हो पाता है और हिंदी में लिखा अभी पूरा पढ़ा भी नहीं हैं सो एक पाकिस्तानी फिल्म क्या दिखायेगी जबकि भारतीय फिल्में भी इससे परे हैं। इसी ब्लाग में मैंने पढ़ा कि उसमें कोई प्रेम कहानी है। भारत हो या पाकिस्तान की कोई भी फिल्म प्रेम कहानी के बिना बनती नहीं। हां कुछ फिल्मकार उसकी आड़ में अपने  के धनदाता के  विचारों के  के अनुसार कुछ धार्मिक और सांस्कृतिक पुट डालते हैं ताकि वह प्रसन्न रहें। यह भी कोई ऐसी फिल्म रही होगी। भारतीय दर्शक अगर उसमें कम रुचि ले रहे हैं तो इसका कारण यही है कि उनको पता चल गया था कि इस फिल्म में कला के नाम पर कुछ नहीं है। अब इस तरह कुछ लोग हमारे देश की मानसिकता पर प्रश्न उठा रहे हैं तो पहले उन्हें यह भी देखना चाहिए कि इस देश में सैंकड़ों फिल्में बनती हैं और उनसे भरपूर मनोरंजन होता है तब क्यों वह ऐसी साधारण फिल्म को देखना चाहेगा जिसका प्रचार केवल इसलिये हो रहा है कि उसे एक पाकिस्तानी ने बनाया है। जहां तक मेरी जानकारी है पाकिस्तान में भी भारतीय फिल्में इस पर भारी पड़ीं हैं। ऐसे में क्यों केवल भारत में इसको कम देखे जाने की शिकायत हो रही है। वैसे भी भारत के आम लोग इस बात को समझ गये हैं कि फिल्मों की आड़ में किस तरह उस पर  ऐसी संस्कृति और काल्पनिक घटनायें प्रस्तुत की जा रही है जो उसकी समझ से परे है और जो कथित विद्वान उस पर दाद चाहते है वह स्वयं भ्रमित हैं.</p>
<p><strong>it transtalshan by googl tool</strong></p>
<div id="result_box" dir="ltr"><strong>The complaint by the audience could reduce redundant - Stories</strong></div>
<div id="result_box" dir="ltr">
<div id="result_box" dir="ltr">Today I on an English Blog Pakistani film 'for God' read about. Hindi translation from English to read through this discussion in India in more viewers by not see it mentioned. It also praised the many embroidered were read. There's an anonymous person I see a comment which he also noted that this is a film in a big brother who is a student tell the Europeans is that we Muslims have done to build the Taj Mahal. He made the comment it's also clear that this is Pakistan's film and not a religion of the people is that it gives a message to his religious feelings of more importance to his country. It also shows that a large section of Pakistan is still a victim of confusion. Has been a commentator writing that the construction of the Taj Mahal, Agra and nearby people have worked so it is not proper to link a particular. I agree with her.</p>
<p>The name of Amit person who commented that it was also mentioned. This means that India's intellectuals are also a lot of confusions of the victims. He does not understand the fact that the kind of slogans and ideologies imported from abroad prejudices are so obsessed with the feelings of Pakistanis also bound by religion. On both sides of unity in the name of the Pakistani such material in this country who will be equipped with their prejudices.</p>
<p>Before talking about the Taj Mahal. Shah Jahan built the Taj Mahal - even though some people are standing dispute - It is said of the blood and sweat of the workers had poured out his price was paid in this country, farmers and traders. At that time there were no industry and no income tax. The recovery of most farmers produce coming from outside and from traders. Shah Jahan had not put any money from the house but the poor people of this country's blood, sweat or rent in the form of landlord and capilist it was put up in this historical building. Some historians say that too much expenditure on the Taj Mahal, the state's economic situation was so bad that his son Aurangzeb to his father removed his capture in the state. It means to the memory of his mother made to the memorial over the plight of his state and he has brought pain and grabbed the state.</p>
<p>Pakistan's intelligentsia such circumstances, if any kind of contact with them for this country living is not profitable. The history (which some scholars believe the lies of the sheaf) burden to place on their heads walk beyond the thought and study them. Pakistan is also a victim of the filmmakers and intellectuals. India's Foreign If the historical buildings, the pride of building your faith in the name of the show, then expect him to waste to the country's ordinary people who provide genuine sympathy.</p>
<p>I have not seen the film. It is not my interest because this kind of films I do not let any kind of entertainment. As far as knowledge is concerned, it is still a lot of books that are read and entertainment, literature or the music gets to be written in Hindi and read are not yet complete So what a Pakistani film show, while Indian films are also beyond it. I read it in this Blog a love story. India, Pakistan or any film without the love story going. Yes, some of his screen his film-contributory, according to the views of some religious and cultural be happy to put it to kill. It is also a film will be. Indian audiences less interested if there are reasons, it is that they discover that the film was in the name of art is nothing. Now this kind of mentality of our country some people are taking the first question they should also see that this country hundreds of films made and they are full of entertainment then why is he wants to see a film simply because it is only a publicity That has made him a Pakistani. As far as I know the Indian films in Pakistan, also fell on heavy. So why in India, only to see it reduced the complaint is happening. The common people of India have to understand that this movie screen in a culture of how the fictional incidents and is being submitted beyond the understanding of his and which he allegedly learned he is wanted on ringworm are confused</p></div>
</div>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हिंदी-अंग्रेजी टूल बहुत दिलचस्प लगा-आलेख (2)]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=519</link>
<pubDate>Sat, 03 May 2008 11:44:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=519</guid>
<description><![CDATA[हिंदी -अंग्रेजी अनुवाद  टूल का मैं कल स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हिंदी -अंग्रेजी अनुवाद  टूल का मैं कल से उपयोग कर रहा देख रहा हूं तो उसमें सुखद आश्चर्य का  अनुभव हो रहा है। प्रथम तो यह कि यदि शुद्ध हिंदी भाषा को लिखेंगे तो ही वह स्वीकार करेगा। कहीं पाठ को लिखने के दौरान उर्दू या इंग्लिश शब्द का उपयोग किया तो वह उसे स्वीकार नहीं करेगा। जैसे भावनाओं को जजबात नहीं लिख सकते। धर्म को मजहब नहीं लिख सकते । भ्रम को गलतफहमी लिखेंगे तो वह कोई नहीं पढ़ पायेगा। अगर कोई हिंदी शब्द लिखने में गलती कर जाते हैं तो अंग्रेजी में अनुवाद करने वाला टूल उसे अनुवाद करने की बजाय वैसे का वैसे ही प्रस्तुत कर देता है। </p>
<p>मै अंग्रेजी में अनुवाद से पहले अपनी देवनागरी भाषा  में पाठ लिखने के बाद उसे यूनिकोड टूल में ले जाता हूं फिर उसे अनुवाद टूल में रखता हूं और जब उसमें कोई लिख गया शब्द नहीं बदला होता है तो उसे पहले अपने मूल पाठ में सही करता हूं। एक से अधिक शब्द होने पर सभी शब्दों को पुनः लिखने के बाद फिर उसे यूनिकोड में बदलने वाले टूल पर लाता हूं वहां से फिर अनुवाद वाले टूल पर कर देखता पड़ता है कि सही हुआ कि नहीं। बहरहाल अब यह तो इग्लिश में पढ़ने वाले ही तय करेंगे कि उसका परिणाम कैसा है पर एक बात निश्चित है कि वह अगर ऐसे टूलों से ही हिंदी पढ़ने वाले हैं तो उसके लिये मेरे द्वारा किये गये थोड़े प्रयास भी मेरे द्वारा रचित पाठ को अधिक पढ़ने योग्य बना देंगे बनिस्बत अन्य हिंदी ब्लाग के उन पाठों  के जो इस अनुवाद वाले टूल पर परीक्षण करके नहीं रखे गये। कल कुछ ब्लागर लिख रहे थे कि इसमें कुछ कमियां है और इसका उपाय यह है कि जो ब्लागर चाहते हैं तो उनके सामने दो रास्ते हैं कि वह अपने पाठ का इस अनुवाद टूल पर परीक्षण कर देखें कि उसमें पूरे शब्द अंग्रेजी में आ रहे हैं कि नहीं, जो नहीं आ रहे उनमें परिवर्तन कर फिर देखें और अपनी पोस्ट रखें दूसरा यह कि  छोड़ दे पढ़ने के इच्छुक पाठक के लिये जो इस टूल से वैसा ही पढ़ेगा जैसा कि अपने रखा है पर उसके लिये उसे यह टूल लाना पड़ेगा। ऐसे में वह शायद जहमत न उठाये तो आपने अगर अपना पाठ अंग्रेजी में रखा है तो वह पढ़ ही लेगा।</p>
<p>मैने कुछ पोस्टों पर प्रयोग किया और पाया कि वैसी भाषा किसी के लिये नहीं हो सकती जिसका वह पाठक है पर भाव तो समझा ही जा सकता है। मैंने आज कुछ इंग्लिश ब्लाॅगरों की पोस्ट को हिंदी में पढ़ा। उसमें बहुत दिक्कत है पर अंग्रेजी और हिंदी दोनों के पाठ मेरे सामने थे तो भाव और अर्थ मैंने एकदम समझ लिया। मैं यह कह सकता हूं कि मैंने आज जो इंग्लिश ब्लाग देखे वह पूरी तरह पढ़े और समझे हैं। उनकी विषय वस्तु पूरी तरह वैसे ही मेरे समझ में आयी जैसा उसका लेखक चाहता था। थोड़ी मेहनत हुई पर जिस तरफ विश्व का ब्लाग जगत बढ़ रहा है उसकी दृष्टि से वह कोई अधिक नहीं थी। इंग्लिश-हिंदी अनुवाद टूल का मतलब यह है कि आप दुनियां की पंद्रह भाषाओं में घुसपैठ कर सकते हैं और जब ऐसा करेंगे तो दूसरी भाषा के ब्लागर भी ऐसा ही करेंगे। भले ही अनुवाद के पाठ ऐसे नहीं आ रहे जैसे अपेक्षित हैं पर वह इतने बुरे नहीं है कि संवाद कायम करने के लिये काफी न हों। समय की कमी के कारण कुछ लोग इस पर अधिक काम न करें पर जिनके पास समय है वह पूरी दुनियां में अनेक भाषाओं में अपने मित्र बनायेंगे। क्या यह आश्चर्य नहीं होगा कि जब कोई चीनी अपनी हमारी पोस्ट को अपनी भाषा में पढ़ने का प्रयास करेगा।<br />
              हालांकि मैंने अपनी कुछ पोस्टों का अंग्रेजी अनुवाद कर उसे ब्लाग पर प्रस्तुत किया है पर हमेशा ऐसा नहीं करूंगा पर यह तय है कि उनको लिखने के बाद इंग्लिश अनुवाद टूल पर परीक्षण कर उसे इस लायक तो बनाऊंगा कि उसे कोई अहिंदी भाषी पढ़ना चाहे तो उसे दिक्कत न आये। इसके अलावा इंग्लिश ब्लाग भी पढ़ता रहूंगा ताकि उसे जानकारियां मिल सकें। आज तीन ब्लाग पढ़कर यह समझ में आ गया कि जितनी अंग्रेजी सीखी है वह पर्याप्त है।</p>
<p><strong>it translashan by google tool</strong><br />
<strong>Hindi - English tool seemed very interesting - Article (2)</strong></p>
<p>Hindi - English translation tool use from tomorrow I am going to see if there is a feeling of pleasant surprise. First, the Hindi language to write the net if he will accept. During much of the text to write English or Urdu word used, it will not accept it. Such as feelings jajbat can not write. religion to religion can not write. Write to the confusion, misunderstanding that no one will read. If a mistake in writing the Hindi word to the English are translated into a tool to translate it so instead of just presenting them out. </p>
<p>I translated into English from its first published in the language of the text after writing it in Unicode tools it takes I am strongly in the translation tool and when it was writing a word, it is not changed before I correct in his original text. More than one word at all to re-write the words again after a change in the Unicode tool brought on from there, then I can see the translation of the tool that is not correct that. However, it is now in inglish determine that its reading of the results of what is certain is that if one thing from such टूलों Hindi, who read for him by my little efforts have been made to the text Created by me to read more qualified Blog other than the will of the Hindi translation of the texts of the tool on the test were not maintained. Yesterday that there were some blogger write some drawbacks and is the measure that ब्लागर who want that way, their front two of his trial on the text of the translation tool that it can see the whole word in English that are not , Which did not come back to see them change and keep his second post that leave the reader to read the willing tool of the things just want it kept as it is for him on this tool will bring. So perhaps he did not, you've taken into account if your English is, he will read it. </p>
<p>I used some of the posts and found that such a language for which the reader can not be understood, but the price may be. Today I have some English blogger the post read in Hindi. There is a lot of trouble both in English and Hindi text in front of me was the sense of meaning and I totally understood. I can say that I am today that he viewed the English Blog read and fully understood. Her subject matter so I fully understand his films, as was the author. A little hard on the side of the world's Blog world is increasing its terms, it was not any more. English - Hindi translation tool means is that you fifteen languages of the world can infiltrate and will do so when the other language blogger do the same. Even if such a translation of the text has not been as expected but it is not so bad, that is not enough to maintain dialogue. Due to time some of the people who do more work time is not on the whole world in several languages, create your friend. Is it any wonder that when the Chinese will not be posted to our own will try to read in their language.<br />
               However, I have some posts on the Blog of the English translation it is always presented on it so that I will not write them after the English translation tool on the testing that will make it worth it to a non-speaking, reading to go to trouble Do not come. Besides, I read the English blog information so that it can get. Today, the three Blog reading was in the understanding that it is learnt English as adequate.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[धन आने से बुद्धि नहीं आ जाती-लेख Money is not coming to mind - article]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=367</link>
<pubDate>Fri, 02 May 2008 17:29:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=367</guid>
<description><![CDATA[पैसे में बहुत बड़ी ताकत होती है यह भी ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पैसे में बहुत बड़ी ताकत होती है यह भी बहुत समय से सुनते आ रहे हैं। बड़े बुजुर्ग यह भी कहते हैं कि पैसे से आदमी में बुद्धि नहीं आती। इस पर विचार करते हुए कई बार दिमाग ऊहापोह में फंस जाता है कि सत्य क्या है।</p>
<p>अब समझ में आने लगा है कि दोनों ही बातें सत्य के दो पहियों की तरह है जिन पर जीव