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	<title>संवेदना &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/संवेदना/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "संवेदना"</description>
	<pubDate>Tue, 13 May 2008 19:12:26 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[बिना शक्ति दिखाये कौन यकीन करेगा-आलेख]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=374</link>
<pubDate>Tue, 13 May 2008 16:43:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=374</guid>
<description><![CDATA[
बहुत सरल भाव रखने पर लोग सीदा-सादा समझ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h3>
बहुत सरल भाव रखने पर लोग सीदा-सादा समझकर अपमान करने लगते हैं। अगर मान का मोह छोड़कर किसी के अभियान में निष्काम भाव से सहायता की जाये तो फिर वह लोग  लाभ उठाकर भी अपमान करने से नहीं चूकते।</h3>
<h3>हां, यह दोष कई लोगों को इस बात की अनुभूति होती  है कि वह जितना सहज  होकर अपना कार्य करते हुए दूसरों को प्रसन्नता प्रदान करते  है उतना ही लोग उनको लाचार समझने लगते हैं। कहते हैं जो शांत रहता है उसका क्रोध बहुत विकट होता है जो मौन है उसकी शक्ति बहुत अधिक होती है। यह तभी प्रमाणि हो सकता है जब शांति से रहने वाला व्यक्ति अपने कार्य में बाधा आने पर क्रोध का प्रदर्शन करे और मौन रहकर जीवन साधना में रहने वाला व्यक्ति समय पड़ने पर उसकी शक्ति दिखाये।</h3>
<h3>जीवन के प्रति सरल, सहज और सकारात्मक भाव रखो पर यह भी मत भूलो कि लोगों के लिये तभी आदर्श बन पाओगे जब सतर्क, सजग, और सक्षम होकर अपने सामने आने वाली चुनौतियों  और व्यक्तियों के आक्रमण अपनी शक्ति से  प्रतिकार करोगे। अगर हमने सरलता और सहजता से किसी का उपकार किया अच्छी बात है पर अगर वह पीठ पीछे वार करता है और हम  उसका प्रतिकार नहीं करते तो फिर हमारी शक्ति पर कौन यकीन करेगा? हमें अपनी संघर्ष क्षमता और  शक्ति का उपयोग कर उनका प्रतिवाद और प्रतिकार करना चाहिए ताकि दूसरे देख सकें कि सरलता, सहजता और सकारात्मकता की क्या शक्ति होती है।<br />
आजकल तप और ज्ञान यज्ञ से शक्ति अर्जित करने वाले गुरू नहीं मिलते। धर्मग्रंथों में से ज्ञान को रटकर दूसरों को ज्ञान देने वाले गुरू ऐसे सक्षम शिष्य नहीं दे सकते जो समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए तत्पर हों। उन्हें तो ऐसे शिष्य चाहिए जो उनको दान देते रहें-हमारे धर्म ग्रंथों के अनंुासार ज्ञान केवल सुपात्र को ही दिया जाता है-और उनकी महिमा दूसरों को सुनाकर अन्य शिष्य जुटाते रहें। ऐसे में सात्विक प्रवृत्ति के लोगों का मिलना अत्यंत कठिन है और जो मिलते है वह कुछ देर सौम्यता दिखाकर ठगने का प्रयास करते हैं। उसके बाद सारी दुनियां में ढिंढोरा पीटते हैं कि देखो अमुक को हमने कैसे मूर्ख बनाया या हमने कैसे अपना काम निकलवाया।</h3>
<h3>सामूहिक रूप से अभियान चलाने की बातें तो केवल धोखा देने के लिये होती हैं। अमुक जगह धार्मिक स्थान बनाना है या अमुक जगह कोई सामाजिक  कार्यक्रम कराना है, भाषा, जाति और वर्ग के आधार पर कोई लक्ष्य पूरा करना है या कोई ऐसी बात जिससे हमारे मन में  मोह पैदा हो और हम तन, मन और धन से त्याग करने के तैयार हो जायें। यहां हर व्यक्ति अपने आपको त्यागी और परमार्थी साबित करने का प्रयास करता है पर उनको  परखे बिना कर हम उन पर विश्वास कर भारी भूल कर बैठते है।ं वह हमारे से प्राप्त सहयोग का दुरूपयोग दूसरों को हानि पहुंचाने और अन्य पापकर्म में भी कर सकते हैं और उसका पाप हमारे माथे ही आता है-इसलिये ही शायद कहा जाता है कि सुपात्र को दान दो।</h3>
<h3>लोगों के चरित्र ठीक नहीं है। कला, साहित्य, फिल्म और अन्य जो भी आकर्षण का क्षेत्र हैं वहां ऐसे लोगों की भरमार है जो वहां शिखर पर  विराजमान होकर अभियान या आंदोलन चलाकर हमें भीड़ में भेड़ की तरह एकत्रित करते हैं। नारे लगाते हैं</h3>
<h3>‘आओ जुट जाओ। यह आंदोलन संफल करना है’<br />
‘आओ कुछ ऐसा करो कि यह अभियान सफल हो जाये’</h3>
<h3>ऐसे नारे लगाने वाले स्वयं कुछ नहीं करते। अपने परिवार की रोटी जुटायें तो ठीक वह अपने लिये अय्याशी के साधन जुटाते हैं। अपना नाम रोशन करने के लिये वह अपनी सूरतें मासूम बना लेते पर उनके मन में क्रूरता का भाव होता है। हम सोचते हैं कि मनुष्य हैं पर वह ऐसे देखते हैं जैसे कि उनके लिये कोई  शिकार है। सदियों से चलता आ रहा है यह सिलसिला। कभी नहीं थमेगा। लड़ता सिपाही है नाम सेनापति का होता है। गाता है गवैया नाम बादशाह का होता है। लिखता है लेखक नाम संपादक का होता है। बनाते हैं मजदूर महल नाम शाहजहां का होता है।</h3>
<h3>कर्म करो। स्वतंत्र भाव से करो। निष्काम होकर करो। हंसते रहो ऐसे लोगों को देखकर। जो मन में आये करो पर किसी की हानि न करो तो किसी ऐसे को भी लाभ नहीं लेने दो उसका लाभ उठाकर समाज और राष्ट्र के साथ छल करे। खुलकर लिखो, खुलकर बोला और खुलकर देखो ऐसे लोगों के नाटक । परिवार हो या बाहर लोग एक दूसरे का उपयोग करना चाहते हैं। अपने कर्तव्य का निर्वाह करो पर फल को भूल जाओ। अपने मन को स्वतंत्र और पुष्ट कर लो। भीड़ में चलो मगर भेड़ की तरह नहीं। बोलो तो चूहे की तरह चीं-चीं नहीं वरन् शेर की तरह गरजो। अपने सार्वजनिक रूप से किये गये अपमान पर शोर मचा दो। लोग तभी विश्वास करेंगे तुम्हारी भक्ति और शक्ति पर।</h3>
<h3></h3>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इस ब्लाग (पत्रिका) की पाठक संख्या बीस हजार के पार]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=371</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 14:15:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=371</guid>
<description><![CDATA[12 दिसंबर 2007 को इस हजार की संख्या पार कर च]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>12 दिसंबर 2007 को इस हजार की संख्या पार कर चुके इस ब्लाग ने कल बीस हजार की पाठक संख्या को पार कर लिया। इस संख्या को पार करने वाला यह मेरा  दूसरा ब्लाग है।<br />
इस ब्लाग के साथ मेरी दिलचस्प याद जुड़ी हुई है। ब्लागस्पाट पर टाईप करते हुए यूनिकोड में अपनी पहली पोस्ट छोटी कविता के रूप  में इसी पर रखी-क्योंकि मुझे उसमें बड़ी पोस्ट लिखने में दिक्कत आ रही थी-और सबसे पहला कमेंट भी इस पर आया। उससे पहले मैंने सभी तीनों ब्लाग पर कृतिदेव की पोस्ट रखी थी और मैं मानकर चल रहा था कि अब उसी से आगे जाना है। जब कुछ ब्लाग  लेखक उन ब्लाग पर मुझसे यूनिकोड में लिखने को कह रहे थे तो भी मैं उसकी परवाह नहीं कर रहा था। ऐसे में कोई महिला ब्लाग लेखिका (जिससे  बाद में  फिर संपर्क नहीं हो सका) ने मुझे इस  बारे में ईमेल भेजकर रोमन हिंदी में लिख रही थी कि मेरे ब्लाग पढ़ने मेंे नही आ रहे तब मैंने उसे इस ब्लाग का पता दिया। उसने लिखा-‘वहां तो सब पढ़ने में आ रहा है। वाह,वाह बढ़िया  । मगर उसने कोई कमेंट इस पर नहीं लिखी। हां, मैने तब यूनिकोड में लिखने का निर्णय लिया।</p>
<p>नारद पर उसी समय इसे पंजीकृत नहीं कराया पर ब्लागवाणी के अभ्युदय के साथ ही दोनों जगह इसे पहुंचाया और हिंदी ब्लाग पर तो यह पहले से ही था। यह मेरा ऐसा ब्लाग रहा है जो बिना फोरम पर दिखे भी वर्डप्रेस के डेशबोर्ड पर नंबर एक पर आया था। फोरमों पर दिखने से पहले ही यह ब्लाग अपने लिये तीन  हजार पाठक जुटा चुका था। तब अनुभव की कमी के कारण मुझे समझ में कुछ नहीं आता था पर बाद में यह बात समझ में आयी कि ब्लाग का मार्ग फोरमों से आगे भी जाता है। ब्लाग की डालरों में बताने वाली वेब साईट के मुताबिक यह मेरा सबसे महंगा ब्लाग है। हालांकि फिर भी यह अन्य ब्लाग लेखकों के ब्लाग के मुकाबले बहुत सस्ता है पर फिर भी मैं इससे संतुष्ट हूं। मुझे इस ब्लाग से एक ही संदेश मिलता है‘डटे रहो, तुम जिस रास्ते पर चल रहे हो उससे विचलित नहीं हो’। जिस तरह से पिछले पंद्रह दिन से यह ब्लाग व्यूज ले रहा था उससे मुझे लग रहा था कि  आज शाम तक यह जादूई आंकड़ा पार करेगा पर कल इसने अपने पुराने तेवर दिखाये जब मैं इस पर पोस्ट डालने लगा तो उसी समय यह इस आंकड़े को पार करने की तैयारी में लग रहा  था और आज तो यह उससे भी आगे जा रहा है।</p>
<p>नीचे इस ब्लाग की प्रथम बीस पोस्ट जिन्हें अधिक पाठकों ने देखा और विभिन्न फोरमों से मिलने वाले व्यूज की संख्या। यह स्पष्ट संदेश कि अध्यात्म और व्यंग्य पर ही मुझे लिखते रहना चाहिए। अपने ब्लाग लेखक मित्रों, पाठकों और समय समय पर तकनीकी विषय पर सहायता देने वाले मित्रों का मैं हृदय से आभारी रहूंगा। दूसरों को बहुत लघु लगने वाली यह उपलब्धि मेरे लिये बहुत महत्वपूर्ण है।</p>
<p><strong>प्रथम बीस पोस्ट</strong></p>
<p><strong>------------------</strong><br />
रहीम के दोहे:सुख में अंहकार दु:ख में कुं 244 <br />
चाणक्य नीति:विद्या की शोभा उसकी सिद्धि  205 <br />
मेरा परिचय=दीपक भारतदीप, ग्वालियर  202 <br />
चाणक्य नीति:परोपकार मधुमक्खी से सीखें  175 <br />
पहले आतंकवाद आया कि पर्यावरण प्रदूषण  175 <br />
रहीम के दोहे:जहाँ उम्मीद हो वहीं जाएं  146 <br />
रहीम के दोहे:मछली का जल प्रेम प्रशंसनीय  142 <br />
चाणक्य नीति: कुत्ते और कौवे से गुण ग्रहण 126 <br />
चतुराई से मुट्ठी में कर लो-हास्य कविता  123 <br />
चलना ज़रा संभल कर-हास्य कविता  119 <br />
आज नवमी-भक्तों के रक्षक हैं भगवान् श्रीर 117 <br />
रहीम के दोहे:परिश्रम कर भोजन ग्रहण करें  115 <br />
चाणक्य नीति:पांच वस्तुओं का संग्रह अवश्य 115 <br />
चाणक्य नीति:बेमौसम राग अलापना हास्यास्पद 115 <br />
दादा-पोते की राजनीति और मनोरंजन  112 <br />
मन के बहरों के आगे क्या बीन बजाना  111 <br />
चाणक्य नीति:क्रोध उतना ही करें जितना निभ 104 <br />
दिल हुआ इधर से उधर  103 <br />
असल पर नक़ल का राज  101 <br />
चाणक्य नीति:प्रेम और व्यवहार बराबरी वाले १००<br />
चाणक्य नीति:मनुष्य को हर विधा में पारंगत 100</p>
<p><strong>Referrer Views (पाठकों के आने के मार्ग)</strong></p>
<p><strong>---------------------------------</strong><br />
blogvani.com 718<br />
narad.akshargram.com 369<br />
hi.wordpress.com/tag/%E0%A4%9A%E0%A4%… 223<br />
filmyblogs.com/hindi.jsp 187<br />
botd.wordpress.com 165<br />
chitthajagat.in 151<br />
 </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दर्द की बजाय  लिखना  पसंद है संघर्ष पर]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=370</link>
<pubDate>Tue, 06 May 2008 15:18:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=370</guid>
<description><![CDATA[अंतर्र्जाल पर मैं लिखता हूं इसका अर्थ ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अंतर्र्जाल पर मैं लिखता हूं इसका अर्थ यह कदापि नहीं लिया जाना चाहिए कि मै किसी उच्च मध्यम परिवार से हूं। सत्य तो यह है कि मेरा जन्म निम्न मध्यम वर्ग में हुआ और बोर्ड की परीक्षा के बाद भी मैंने मजदूरी की और ठेला चलाया। जिस दुकान पर मैं नौकरी  करता था वह थोक की दुकान थी और सामान दूसरी दुकान पर पहुंचाने  के लिये मुझे कई बार ठेला चलाना पड़ता था। यह बात मैने अपने पिताजी से भी छिपाई थी। कई बार मेरे पैरों में कीलें घुसकर खून निकाल चुकीं हैं। अपने उस नौकरी के दौरान भी दोपहर जब मैं घर पर आता था तो लिखता था-उसमें कोई पीड़ा नहीं बल्कि जीवन के प्रति आशावाद होता था। आज नहीं तो कल मेरा होगा-यह विश्वास मेरे जीवन की अनमोल पूंजी रहा है।  </p>
<p>मैं आजकल आपने काम पर स्कूटर पर जाता हूं पर मेरा साइकिल से अभी भी नाता हैं। मेरा काम भी अब शारीरिक श्रम करने का नहीं है पर फिर मैं उसमें कोई अपनी तरफ से नहीं रखता। शारीरिक श्रम करने वाले  को बेचारा या गरीब कहना शायद  कुछ लोगों को सहज लगता है पर मुझे नहीं। इसलिये जो लोग गरीब के दर्द पर कहानियां या कविताएं लिखकर वाह’-वाह जुटाते हैं उनमें मेरी रुचि नहीं रही। इस देश में परिश्रम करने वालों की कमी नहीं है पर वह भी ऐसे दर्द भरी रचनाओं को पसंद नहीं करते। हां, एसी कमरों तथा होटलों के भोजन करने वालों को एकांत में बैठकर उनके हृदय में ऐसी संवेदनशील रचनाएं दर्द का रस पैदा करतीं हैं तो वह खुश हो जाते हैं।  दर्द भी एक रस है और जिनके पास सब कुछ है पर दर्द नहीं है वह इस रस से वंचित रहते हैं और इसी कारण उनको गरीबों के दर्द पर बनीं फिल्में और रचनाएं पसंद आती हैं। हमारे देश के कुछ विख्यात फिल्मकार और लेखक इसी दर्द के सहारे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर चुके हैं पर उनको यहां कोई पूछता भी नहीं था। हां, जब उनको इस देश से बाहर ख्याति मिली तो यहां भी उनको पुरस्कारों प्रदान किये गये पर आम आदमी भावनात्मक रूप से कभी उनसे नहीं जुड़ा।</p>
<p>मैने एक मजदूर के रूप में देखा है मुझे रोटी या सहानुभूति की नहीं सम्मान और प्यार की आवश्यकता  होती है और ऐसे में और लोगों की बात क्या करें  अपने भी पीछे हट जाते हैं।  अपने जीवन में हर चीज अपने परिश्रम से बनाते हुए मैंने एक बात देखी है कि गरीब और मजदूर के दर्द और भावनाओं पर कुछ लोग व्यापार करते हैं। भले ही उनको पैसा अधिक नहीं मिलता पर सम्मान और नाम उन्होंने खूब कमाया। किसी गरीब मजदूर के बीमार होने पर उस पर कुछ असली तो कुछ नकली कथा लिखकर लोगों को दर्द का रस बेचा।<br />
मैं अपनी कविताओं और कविताओं के हमेशा संघर्ष के भाव इसलिये स्थापित कर पाता हूं क्योंकि मेरा यह अनुभव रहा है कि परिश्रम करने से आत्मविश्वास बढ़ता है। इस देश में गरीब और मजदूर के कल्याण के नारे लगाने वाले बुद्धिजीवियों का लंबे समय तक वर्चस्व रहा है और उन्होंने शैक्षणिक तथा सामाजिक संस्थानों इस तरह घुसपैठ कर ली कि उनके ढांचे से बने समाज में लोग आज भी दर्द  के रस में प्रफुल्लित  होना चाहते हैं-उनमें आत्मविश्वास की कमी है क्योंकि वह परिश्रम नहीं करते और इसलिये दर्द का रस उनमे पैदा ही नहीं होता। जिनके पास धन की कमी है उन्हें जीवित रहने के लिये संघर्ष करना पड़ता है और बीमारी और अन्य सामाजिक संकटों में भी उसे कोई संवेदना न तो कोई देता है न वह चाहता है। वह थोड़ा सम्मान और प्रेम चाहता है और वह कोई नहीं देता। </p>
<p>मेरी पत्नी कई बार ठेला वालों से सामान खरीदते समय मोलभाव करती है तो मैं उसे मना करते हुए कहता हूं कि-‘यह मेहनत कर रहा है तो समाज पर उसे उपकार ही समझो क्योंकि अगर वह ऐसा न करता तो पेट पालने के लिये अपराध भी कर सकता है।’</p>
<p>यह मेरे अंदर मौजूद कोई दर्द नहीं है बल्कि यह अपने जीवन संघर्ष के अनुभव से मिला  एक यथार्थ है। अपने जीवन के संघर्ष में मैंने इस बात का अनुभव किया है कि अधिकतर लोग परिश्रम इसलिये करते हैं कि उनका सम्मान किसी के पैरो के तले कुचला न जाये। मैं यह दावा भी नहीं करता कि मैं परिश्रम करने वालों के प्रति मै बहुत संवेदनशील  हैं क्योंकि इसका अर्थ यह है कि उनके श्रम को कम कर  देखना।<br />
मै आजकल इतना शारीरिक श्रम नहीं करता। जब मैं जमकर शारीरिक श्रम करता था तब भी मै हास्य व्यंग्य लिखता था और जब भी कभी पसीना नहा जाता  हूं तब भी मुझे वैसा ही लिखने में मजा आता है। इसलिये जिन लेखकों को यह भ्रम हो कि वह दर्द पर लिखकर लोकप्रियता अर्जित करेंगे उन्हें इस भ्रम का निवारण कर लेना चाहिए। इस देश के परिश्रम करने वाला भी वैसा ही अच्छा पढ़ना चाहता है जैसा कभी कभी कुर्सियों पर काम करने वाले लोग-जो दर्द की फिल्म देखकर या रचना पढ़कर उसके रस से प्रफुल्लित  हो जाते है-कभी पढ़ने को इच्छुक होते हैं। इसलिये मुझे दर्द की बजाय संघर्ष पर लिखना पसंद है। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पटकथा लिखने वाले ने कमाल किया-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=365</link>
<pubDate>Wed, 30 Apr 2008 15:01:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=365</guid>
<description><![CDATA[बगल में अखबार दबाकर
घर आया फंदेबाज और ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">बगल में अखबार दबाकर<br />
घर आया फंदेबाज और बोला<br />
‘दीपक बापु तुमने<br />
पहले अखबारों  और अब ब्लाग पर<br />
क्रिकेट पर ही लिखना शुरू किया<br />
फिर क्यों अब मूंह फेर लिया<br />
देखो क्रिकेट में फिल्म के एक्शन का<br />
मजा भी आ रहा है<br />
पहले पिटा  हीरो<br />
अब पीटकर बाहर जा रहा है<br />
क्यों नहीं तुम भी देखा करते<br />
बैट-बाल के खेल में<br />
मारधाड़ की भी मजा क्यों नहीं लिया करते<br />
ऐसे क्रिकेट से क्यों किनारा किया’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">सुनकर पहले हैरान हुए फिर बोले<br />
‘‘हम फिल्म के वक्त फिल्म और<br />
क्रिकेट के वक्त क्रिकेट देख करते हैं<br />
यह टू-इन-वन मजा तुम ही लो<br />
हमें तो अब इससे दूर ही समझ लो<br />
हमने पहले भी कहा था<br />
क्रिकेट अब कम खेली जायेगी<br />
पर उससे पहले उसकी पटकथा लिखा जायेगी<br />
फिल्म वालों ने लिया है मोर्चा<br />
क्रिकेट को चमकान का<br />
तो उनकी कला यहां भी नजर आयेगी<br />
आस्ट्रेलिया में किया था जिसने हीरो को रोल<br />
उसे अब विलेन बनाकर पेश किया<br />
उस समय के विलेन को दे रहे थें जो गालियां<br />
अब बजा रहे उनके लिये तालियां<br />
यह हीरो-हीरोइन भला कब  डायरेक्टर के<br />
 हुक्म के बिना एक्शन के कब होते है<br />
जरूर लिखी होगी किसे ने पटकथा<br />
जो झगड़े की फोटो कैमरे से लेने में रोकते हैं<br />
झगड़ा करने वाले खिलाड़ी<br />
बाद में ऐसे होकर मिलते हैं<br />
जैसे कोई बढिया अभिनय किया<br />
कह तो रहे है सभी<br />
पर किसने देखा यह कि <br />
थप्पड़ मारने वाले ने अपना कितना नुक्सान किया<br />
हमने ने देखा न मैच न झगड़ा<br />
पर एक बात मानते हैं कि<br />
क्रिकेट मैच में एक्शन का सीन लिखकर<br />
पटकथा लिखने वाले ने कमाल किया<br />
...........................</span></strong></p>
<p><strong><br />
</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मशहूर होने से शऊर नहीं आ जाता-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=361</link>
<pubDate>Sun, 27 Apr 2008 11:54:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=361</guid>
<description><![CDATA[मशहूर होने की ललक सबमें होती है और इसक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">मशहूर होने की ललक सबमें होती है और इसके लिये आदमी अपने स्वार्थ के काम भी इस तरह करते हैं कि जैसे वह परमार्थ का कर रहे हैं। और नहीं तो कई काम ऐसे जिन्होंने किए ही नहीं अपने नाम से बताकर आत्मप्रवंचना करते हैं। दूसरों का कम बिना किसी स्वार्थ के करना या अपनी जिंदगी में ही कुछ ऐसा करना जो दूसरे न करते हों यह कोई नहंी करता।  मतलब यह है कि मशहूर होने का आशय यह कतई नहीं है कि जीने का भी शऊर हो।</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हमारी मुलाकात एक मशहूर आदमी से हुई दूसरे सज्जन के घर हुई थी। उस दिन वह सज्जन एक आम और खास आदमी के एक साथ मेजबान बने थे। हम बिना बुलाये गये थे और वह मशहूर आदमी विशेष आमंत्रित थे।</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हम जब पहुंचे तो मेजबान ने हमें देखते ही मूंह बना लिया-‘‘यार, तुम्हें भी अभी आना था! कल आ जाते। खैर आ ही गये तो रुक जाओ, और मेरी मदद करना। आखिर इतना मशहूर आदमी हमारे घर आ रहा है।’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हमने कहा-‘ठीक है। अब बताओं हम क्या करें?‘</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">वह बोले-‘‘आज ड्राइंग रूम में न बैठकर इधर बाहर कुर्सी पर बैठ जाओ।’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हम वहीं बैठ गये। वह मशहूर आदमी आया। पूरा घर उसके स्वागत के लिए बाहर उमड़ पड़ा। हम अपनी कुर्सी से उठकर वहीं डटे रहे। सम्मान के लिये आगे नहीं गये क्योंकि मेजबान ने हमसे ऐसा कोई आग्रह नहीं किया था। उन मशहूर आदमी को अंदर ले जाया गया। पूरे घर में हलचल मची थी। कोई शरबत बना रहा था तो कोई पानी ला रहा था। उन पर मनमोहक शब्द वर्षा हो रही थी। </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हम दृष्टा बन कर डट गये। देखें आखिर क्या होता है? इतने में वह मेजबान सज्जन आये और बोले-‘‘आओ, जरा तुम बैठकर उनसे बात करो। मै थोड़ा अपने आपको  अकेला महसूस कर रहा हूं।’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हम समझ गये कि वह भले ही स्वयं भी प्रसिद्ध है पर बोलने को शऊर उनमे भी  नहीं है। बहरहाल हम ड्राइंग रूम में जाकर उस मशहूर आदमी के सामने बैठ गये। वह मेजबान हमारा परिचय कराते हुए बोले-‘यह हमारे मित्र हैं। अच्छे लेखक हैं।’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">उन मशहूर सज्जन ने खीसें निपोरते हुए पूछा-‘क्या लिखते हो?’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हमने कहा-‘अधिक कुछ नहीं बस कभी कभार व्यंग्य लिखते है। अधिक मशहूर नहीं है।’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">वह हंसकर बोले-‘चिंता मत करो। कभी हो जाओगे। हां, हम पर व्यंग्य लिखने का दुस्साहस नहीं करना।’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हमने हंसते हुए कहा-‘‘आप तो बहुत गंभीर आदमी हैं। चिंतक और विचारशील हैं। आप पर तो कभी अच्छा आलेख लिखना चाहिए पर हमें लिखना नहीं आता।’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">वह एकदम गंभीर होकर बोले-‘वह भी आ जायेगा। कभी हमसे मिलना तो फिर तुम्हें मिलकर अपने बारे में बतायेंगे फिर हम पर लिखना।’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हमने देखा कि  मेजबान उन मशहूर आदमी के स्वागत के लिए परिवार के महिलाएं और बच्चे इधर-उधर  भागमभाग कर रहे थे और हमें इसीलिये वहंा बिठा गये थे कि हम उनको बातचीत में व्यस्त रख सकें। </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">इतनी सी बात के बाद दोनों तरफ खामोशी छा गयी। हमने सोचा-‘कौन अपने को इनसे कोई जुगाड़ लगानी है जो अधिक चाटुकारिता करें।’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">जब मेजबान अंदर आये तो खामोशी देखकर उनसे बोले-‘हां साहब, आप आये तो हमारा घर पवित्र हो गया।’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हमने देखा कि मशहूर आदमी का उस पर कोई प्रभाव नहंी हुआ वह बोले-‘सुनो यह अधिक तामझाम कर हमें बहलाओ नहीं। साफ-साफ बताओं हमारे पैसे कब लौटा रहे हो। यह तो तुमने हमें बुलाया पर हम तो खुद भी आते। आखिर पैसे का मामला है इसमें कोई समझौता नहीं हो सकता।’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">मेजबान का मूंह उतर गया और बोले-‘‘अभी तो यह मकान बनाया है। मैने पहले ही बता दिया था कि कम से कम दो वर्ष लगेंगे। फिर उन लोगों ने जितना ब्याज बताया था उसक दूना ले रहे हैं। मेरी तो आपसे सीधे बातचीत हुई थी पर अब वह आपके लोग मुझे तंग कर रहे हैं।’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">मशहूर सज्जन रुखे स्वर में बोले-‘ तुम्हें पता है कि हम अपना काम स्वयं तो देखते नहीं। उन्हीं लोगों पर निर्भर है तो हम तो उनकी बात ही मानेंगे। हां यह मुझे अब ध्यान आया कि तुमने दो साल कहे थे। अभी कितना समय हुआ है?’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">‘उसने कहा अभी तो 11 महीने हुए हैं।’’ मेजबान सज्जन ने कहा।</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">अब मशहूर आदमी ठंडे हुए और बोले-‘‘हो सकता है उन लोगों से कोई कागज पत्र पढ़ने में गलती हुई हो, पर तुमने छह महीने का ब्याज नहीं दिया है वह तो तय हुआ था कि हर महीने दोगे।’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">मेजबान सज्जन ने कहा-‘‘आपके लोग मान कहां रहे हैं। वह तो ब्याज अधिक लगा रहे हैं। जितना आपसे तय हुआ था उससे दूना लगा रहे हैं।’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">मशहूर आदमी ने कहा-‘‘ठीक है जितनी मेरे से बात हुई थी उतना दे दो फिर मैं उनको समझा दूंगा। नहीं तो वह फिर तुम पर गुस्सा कर बैठेंगे।’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">मेजबान अंदर गये और नोटों की गड्डी ले आये और उनको थमा दी। उसके बाद वह चले गये तो मेजबान ने चैन की सांस ली। फिर हमसे बोले-‘यार, अच्छा ही हुआ तुम थे। वरना जाने क्या-क्या सुनाता?’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हमने कहा-‘पर यह मशहूर आदमी तो नैतिकता और परोपकार की बातें करता है। अगर मैं गलती पर नहीं हूं तो यह आदमी सूदखोरी का विरोध भी करता है।’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">मेजबान ने कहा-‘‘यार, जो जिस बात के लिये मशहूर हो समझो उस काम का   उसे शऊर भी हो यह जरूरी नहीं है।  इनका सच वही है जो तुमने देखा पर किसी से कहोगे भी तो कौन मानेगा?’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हम भी उठकर चलने को हुए और कहा-‘‘अभी नहीं तो कभी इस पर लिखेंगे तो सही।’<br />
उसने कहा-‘क्या लिखोगे?’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हमने कहा-‘‘मशहूर होने से शऊर नही आ जाता।’’</span></strong></p>
<p><strong><br />
</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[यह नहीं बता सकते कि हिट होगा कि फ्लाप-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=355</link>
<pubDate>Thu, 17 Apr 2008 14:24:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[फंदेबाज के घर के दौरे पर
पहूंचे तो उसक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">फंदेबाज के घर के दौरे पर<br />
पहूंचे तो उसकी मां अपना नवजात  पोता<br />
दिखाते हुए बोली<br />
‘‘ दीपक बापू.मेरा यह पोता है<br />
तुम्हारे इस दोस्त के बेटे से<br />
हम सास-बहु परेशान हो गये हैं<br />
जब  भी चलते है रात को<br />
टीवी पर अच्छे कार्यक्रम<br />
तब मचाता है चीख पुकार<br />
बाकी समय  सोता है<br />
इसका बाप भी उस समय<br />
तुम्हारे घर पर गप्पें हांक रहा होता है<br />
तुम्हारे कंप्यूटर पर ज्योतिष  हो तो<br />
बता दो इसका आगे क्या होता है’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">सुनकर पहले टोपी उतारी और फिर<br />
सिर खुजलाया<br />
पर कुछ समझ में नहीं आया<br />
तब फंदेबाज बोला-‘‘ अब यहां तो कंप्यूटर है नहीं<br />
तुम्हारा दिमाग तो बस वहीं चलता है<br />
जब देखो वहीं जाने को मचलता है<br />
 असामजिक हो गये हो<br />
जब से यह ब्लाग बनाया<br />
पता नहीं हमारी माताश्री का<br />
प्रश्न तुम्हारी समझ में आया कि नहीं आया<br />
मैरे ही सबको बताया कि<br />
तुम्हारे कंप्युटर में ज्योतिष भी होता है</span></strong><br />
<strong><span style="color:#003300;">ब्लाग का नाम सुनते ही बाछें खिल उठीं<br />
और कुर्ते में हाथ डालकर<br />
कंप्यूटर की तरह नचाते हुए बोले<br />
‘‘मित्र देखो<br />
ब्लाग का नाम सुनकर यह भी खामोश हो गया<br />
और हमारा मस्तिष्क भी शूरू हो गया<br />
एक बरस से हमारे ब्लाग लिखते समय<br />
आकर तुम बैठ जाते हो<br />
फिर उसी पर अपनी पत्नी से बतियाते हो<br />
उसका ही असर हुआ है<br />
सास-बहु के धारावाहिकों से उकताऐ<br />
कई लोग ब्लाग लिखने आ गये ं<br />
हम और तुम भी तो कोई रास्ता न मिलने पर<br />
वहीं विचरने आ गये<br />
शायद यह भी बहुत बोर हुआ होगा<br />
जब इन सीरियलों को शोर हुआ होगा<br />
सामाजिकता के नाम  पर अपराध की कथा दिखाते<br />
पता नहीं किससे लिखवाते<br />
तुम्हारा यह लड़का ब्लाग प्रिय लगता है<br />
और भविष्य में चमकेगा<br />
अ-आ पढ़ते ही वहां आ धमकेगा<br />
तुम हम पर कसते हो रोज फब्तियां<br />
यह लगा देगा अंतर्जाल पर अपने नाम की तख्तियां<br />
मगर तुम्हारा क्या होगा<br />
अगर लिखने लगा यह तुम पर<br />
हमारी तरह हास्य कविताएं<br />
बाकी आगे इस भविष्य हम क्या बताएं<br />
अब यह तो हम नहीं कह सकते कि<br />
यह पाएगा जोरदार हिट<br />
या हमारी तरह फ्लाप होता है<br />
..........................................................</span></strong></p>
<p><strong></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पुरुष क्यों नही कर रहे महिलाओं की अस्मिता की रक्षा-आलेख]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=343</link>
<pubDate>Fri, 04 Apr 2008 14:11:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=343</guid>
<description><![CDATA[आचार्य चाणक्य ने कहा है कि स्त्री को द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आचार्य चाणक्य ने कहा है कि स्त्री को दीपक की तरह आवरण में रखना चाहिए। इसका आशय यह है कि पुरुष पर यह जिम्मदारी है कि अपने घर-परिवार की स्त्रियों की मान मर्यादा की रक्ष करे। स्त्री स्वातंत्र्य के हिमायती इस बात पर नाराज हो सकते हैं पर बारे में अलग से कभी लिखूंगा। हां,  आजकल के वातावरण में चाणक्स का  यह कथन और  अधिक  प्रासंगिक हो गया है। किसी भी स्त्री के विरूद्ध सामूहिक रूप के  तभी अत्याचार संभव है जब उसके पास किसी भी प्रकार के  निज  रूप पुरूष के संरक्षण का अभाव है। कहीं कहीं तो यह हालत यह है कि उसे अपने ही लोगों की नफरत का शिकार बनना पड़ता है। जिस तरह हर पुरु्र्र्रष के साथ मां और पत्नी के रूप में स्त्री होती है उसी  तरह हर स्त्री के पास पिता या पति के रूप में पुरूष का संरक्षण होता है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो बहुत कम लोगों को अपना जीवन अकेले गुजारना पड़ता है। </p>
<p>       ऐसे में जहां किसी स्त्री के सामूहिक रूप से  अपमान की घटना होती है तो किसी भी आदमी के जेहन में सबसे बड़ा सवाल यह आता है कि इस तरह उनका अपमान होने पर उसके साथ जुड़े पुरुष सदस्य क्या कर  रहे थे? यह  आश्चर्य की बात है कि मीडिया ने बड़ी चालाकी से अपने ऊपर महिला की प्रतिष्ठा के नाम पर उसका परिचय छिपाने की नीति अपना रखी है और इधर एक से एक खबरें भी दे रहा है।  लोग पीडि़त महिलाओं के प्रति सहानुभूति रखते हैं पर उनके दिमाग के यह बात  बराबर घूमती है कि आखिर उसके परिवार पुरुष सदस्य उस समय  कहां होते हैं, जब महिलाओं के साथ सामहिक रूप से अपमानजनक व्यवहार किया जाता है। कोई भी आदमी अपने घर की महिला सदस्य का अपमान नहीं सह सकता और कुछ लोग बिल्कुल ही इंसानों की श्रेणी में नहीं है और वह अपने घर की महिला सदस्यों का अपमान सह जाते हैं  तो हमें  कुछ नहीं  कहना है।  ऐसे में एक सवाल यह भी है कि मीडिया तमाम तरह की कीचड़ तो उछालता है पीडि़त महिला के पुरुष सदस्यों को सामने क्यों नहीं लाता?जबकि महिला की तरह  उनका चेहरा और नाम भी छिपाया जा सकता है। </p>
<p>ऐसी घटनाओं में  महिलाओं के साथ जुड़े पुरुष सदस्यों की अनुपस्थिति  से पीडि़ताओं के प्रति भी लोगों के मन में कई सवाल उठने लगते हैं जैसे-क्या वह अपनी किसी गलती के कारण ही अपनी मुसीबत में आ फंसी है यह निर्दोष होने के बावजूद वह अपनी बातचीत में ऐसी बातें कह जातीं है जो उन पर संकट आ जाता है तब उनके घर-परिवार के पुरुष उनके आसपास उस समय मौजूद नहीं होते या फिर शर्म और डर के मारे सामने नहीं आते। कहीं वह महिलाएं अपने घर में ही तिरस्कृत होने के कारण तो ऐसी स्थिति का सामना नहीं करतीं।<br />
मैने देखा है कि कई औरतें  अपनी घरेलू परेशानियों के हल के लिये  टोने-टोटके करने वाले ओझाओं और बाबाओं के पास जातीं है। इतना ही नहीं वह आकर अपने रिश्तदारों में यह भी बात बतातीं हैं उनके सामने भले ही कोई कहता नहीं है पर उनके पीठ पीछे लोग अपने परेशानियों के लिये उन पर जादू टोने को संशय करने लगते हैं। एक दूसरे को उस महिला से बचने की सलाह देते हैं। यह तो शहरों की बात है गावों में तो इन बातों पर ही वैमनस्य होता है। भारत की अधिकांश ग्रामीण जनता टोनो-टोटकों पर यकीन करती है और इस कारण  गावों इसी कारण तनाव बना रहता है। ऐसे में अपने परिवार के पुरुष सदस्यों से सुरक्षित महिलाओं की तो रक्षा हो जाती है पर जो अकेली है उन पर मुसीबत आ जाती है। कुछ महिलाओं को पुरुष सदस्यों द्वारा संरक्षण देने की बात पुरातनपंथी लग सकती है पर इस मामले में मैं उनके सहमत नहीं हो सकता क्योंकि जिस तरह पुरुष अपनी स्त्री को बाहरी खतरों से संरक्षण देता है वैसे ही स्त्री भी घर में अपने पुरुष को संरक्षण देती है। इस तरह संरक्षण देना और लेना बराबरी की बात है।  </p>
<p>कुछ महिलाएं भोले स्वभाव की होतीं है और वह भले ही टोटकों में यकीन नहीं करतीं पर लोगों का दिखाने के लिये मान लेतीं हैं और जादू टोने वालों के पास जातीं हैं, पर लोगों का फिर उनसे यह भय लग जाता है कि कहीं वह उन पर जादू कर उनको हानि न पहुंचाये। ऐसे में घर के पुरुष सदस्यों को सतर्क रहना चाहिए। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नाम, छद्मनाम और बेनाम-आलेख ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=335</link>
<pubDate>Wed, 26 Mar 2008 17:07:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=335</guid>
<description><![CDATA[नाम दोस्तों के होते हैं और वह पहचान लि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>नाम दोस्तों के होते हैं और वह पहचान लिए जाते हैं इसलिए जब वह किसी को निपटाना चाहते हैं तो उसकी कमिया किसी और को बता देते हैं. अंतर्जाल पर तो उसकी जरूरत नहीं है. बेनाम हो जाओ और अपने दोस्त को जमकर गालिया दे आओ तो कौन पहचानता है और अधिक परेशान करना हो तो दोस्त का नाम लेकर किसी और से झगडा कर आओ. ईमेल हो या  ईमेल का विस्तार ब्लोग दोनों काम आसानी से किये जा सकते हैं.<br />
अंतर्जाल पर तो आजकल ब्लोगरों के अनाम वाले कमेन्ट कम बेनाम अधिक होते जा रहे हैं-यह स्थिति ब्लागस्पाट.कॉम के ब्लोग पर है तो वर्डप्रेस के ब्लोग पर छद्म नाम  रखकर यह काम किया जाता है. ब्लोग जगत में हमारे जो दोस्त हैं जिनकी संख्या तीन चार से अधिक नहीं और वह हमारी तरह ही हैं. हाँ कुछ ऐसे दोस्त भी हैं जिनके नाम वह नहीं है जो बताते हैं पर उन्होने कभी हमसे कोई बदतमीजी नहीं की. अब यह कहना मुश्किल है  कि वह एक ही है या चार. कभी तो लगता है कि ब्लोगजगत के ही कोई एक या दो  प्रतिबद्ध ब्लोगर हैं जो सोचते हैं कि इस बिचारे के पास कोई अधिक कमेन्ट होते हैं नहीं और दो चार नाम से बोर हो जाता होगा इसलिए नाम बदलकर इसका मन बनाए रखें. एक-दो ब्लोगर हैं जिनके बारे में हमारा विश्वास(संदेह नहीं) है कि वह हो सकते हैं. </p>
<p>आम तौर से मैं सीमित मात्रा में ही कमेन्ट लगा पाता हूँ इसलिए मुझे कमेन्ट भी कम मिलते हैं. जो भी मिलते हैं उनको भी मैं ऐसे ही मानता हूँ जैसे कि मित्रों की दुआ सलाम. हाँ कुछ पोस्टें जो बहिर्मुखी (जो ब्लोगिंग के विषयों से हटकर होतीं हैं) उन पर कुछ लोग अपने को रोक नहीं पाते और अपनी बात अधिकार से कह देते हैं और मुझे उन पर विचार करना पड़ता है कि क्या वह मेरे से सहमत हैं या नहीं और उसके अलावा उनमें कोई नयी जानकारी तो नहीं है. बेनामों से वास्ता तब पड़ता है जब ब्लोग स्पॉट पर कोई विवादास्पद पोस्ट हो. वैसे बदतमीजी करने वाले तो नाम लिखकर भी  कर गए हैं उनमें दो तो मित्र हो गए हैं पर एक हैं जिसका नाम मेरे जेहन में है और किसी दिन पोस्ट लिखकर उसको निशाने पर लूंगा. अफ़सोस इस बात का है कि उसकी ईमेल  मैंने हटा दिए हैं-इस बात की  संभावना है कि वह फिर गलती  करेगा क्योंकि वह एक कुंठित विद्वान है. जवाबी शाब्दिक प्रहार के उसका कोई इलाज मुझे नजर नहीं आता.  </p>
<p>कभी तो लगता है कि कुछ अच्छे ब्लोगर अब बोर होकर अपने को बेनाम हो  रहे हैं ताकि हिन्दी ब्लोग जगत में रस बना रहे तो कुछ ऐसे भी हैं जो अच्छी नियमित  कमेन्ट लिखते हुए बोर हो गए हैं और अब वह बेनाम होकर कोई नया  सुधार लाना चाहते हैं. असल बात यह है कि एग्रीगेटरों के फोरमों पर वही पोस्ट हिट रहती है जो ब्लोग सिर्फ ब्लोग के विषय पर लिखी होती है ऐसे में कुछ ब्लोगर उससे नाखुश हैं और वह कुछ ऐसा चाहते हैं जो उनको बदलाव की तरफ ले जाये.<br />
  मैंने जब लिखना शुरू किया था तो मुझे यह पता नहीं था कि कोई कमेन्ट भी यहाँ होती है. इसलिए ब्लोग बनाने के दो महीने  तक मैं ऐसे ही लिखता रहा. आज के अपने  मुख्य ब्लोग पर मैं सादा हिन्दी फॉण्ट में  पोस्ट रख रहा था और यूनिकोड में कुछ कवितायेँ दो ब्लोग पर रख दी थी. एक महिला ब्लोगर ने मुझे कई सन्देश लिखे थे और वह जानना चाहती थी कि मेरी पोस्ट पढाई क्यों नहीं आ रही हैं. मैंने उसे रोमन हिन्दी में  ईमेल किये तो वह फिर उसने पूछा कि मैं कौनसे फॉण्ट में लिख रहा हूँ. मैंने उसे अपने दो ब्लोग के पते दिए और बताया कि वहाँ मेरी कवितायेँ हैं आप पढ़ सकतीं है. उसका उत्साहजनक सन्देश आया तब मैंने यूनिकोड के रास्ते पर चलने का फैसला किया पर वह महिला ब्लोगर मुझे दिखाई नहीं दी. कालांतर में मुझे लगा कि वह कोई छद्म नाम था और मुझे बडे प्यार से इस रास्ते ले गया था. उसके बाद मैंने उसे कई ईमेल किये पर जवाब नहीं आया. आज जब कहीं बेनाम शब्द पढता हूँ तो उसका नाम याद आता है. नाम था पर छद्म नाम और वैसे भी छद्म नाम और बेनाम में अंतर क्या है?<br />
अगर वह छद्म नाम था और वह वास्तविक रूप में मेरे सामने आये तो मेरे से सम्मान पाएगा. एक बात और वह महिला नाम था इसलिए मैंने यूनिकोड में लिखना शुरू नहीं किया था बल्कि नारद से मिली धमकी की बाद मैंने एकला चलो के रास्ते पर चलने का निर्णय किया था और यूनिकोड में भी तब तक मेरी तीस पोस्टें मेरे उन ब्लोग पर थी. मतलब मुझे तो लिखना ही था नारद पर आने से मित्रों का मिलना मेरे लिए एक बोनस की तरह रहा और उसका श्रेय उसे छद्म नाम को जाता है.     </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपना तनाव  और थकावट बढाते हैं खुद लोग-आलेख ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=328</link>
<pubDate>Wed, 19 Mar 2008 17:21:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=328</guid>
<description><![CDATA[हमारे दर्शन के अनुसार मनुष्य योनि बहु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>हमारे दर्शन के अनुसार मनुष्य योनि बहुत पुण्य करने पर मिलती है और अगर कोई इस योनि में दान-पुण्य और धर्म का निर्वाह नहीं करेगा तो उसे चौरासी लाख योनियों में भटकना पडेगा। नित-प्रतिदिन चाहे किसी सत्संग में जाये यही सुनने को मिलेगा।</strong></p></blockquote>
<p>मगर ज़रा समाज की हालत देखिये तो किस हाल में पहुंच गया है। बचपन से लेकर आज तक मैंने यहाँ लोगों के रंग-ढंग देखे हैं  उससे मुझे हंसी आती है शायद यही कारण है की कभी गंभीर लेख लिखने बैठता हूँ तो व्यंग्य लिख जाता हूँ। कई लोगों को मैंने अपनी जिन्दगी में सघर्ष करते देखा। अपने परिवार और बच्चों के लिए रोटी  जुटाने के लिए उन्होने जमकर संघर्ष किया और फिर लक्ष्मी जी की उन पर कृपा हुई तो सरस्वती ने विदा ले ली। उम्र के उस मोड़ पर उन्हें शराब पीते देखा जिसमें उसे छोडा जाता है।</p>
<p>उस दिन एक  सगाई में गया। वहाँ लड़के के नाना को दारू पीते देखा। मेरे दादाजी से उनकी मित्रता थी और कई बार मैं अपने पिताजी के साथ उनके घर  गया था। वह व्यापार के लिए बाहर जाते थे और कहीं से  कुछ सामान लाते थे जो हमें सौंपते थे। वह शराब आदि नशे से दूर थे यह बात मैंने अपने बडे लोगों के मुख से सुनीं थी। उनको शराब पीता देख कर  मैंने लड़के के पिता अपने मित्र से पूछा-''इन्होने  कब से पीना शुरू की।''</p>
<p>उसने इधर-उधर देखा और बोला-''तुमने पीना कब बंद किया?''<br />
उस समय मेरे सामने तीन लोग और थे और वहाँ मेरे लिए भी ग्लास तैयार किया गया था और मैंने उसे लेने से इनकार कर दिया। मैंने अपने मित्र से कहा--''अगर तुम यह  सोचते हो कि  में इसे पीने वाला हूँ तो भूल  जाओ। मैंने पांच साल पहले  पीना छोड़ दिया है। कभी कभार पी लेता था और वह भी एक वर्ष  से बंद है। हाँ, तुम इस बात  को टालों मत के तुम्हारे ससुर ने कब से पीना शुरू कर दिया है।''<br />
मेरा मित्र वहाँ से खिसक गया तो एक अन्य दोस्त बोला-''इनको पीते हुए पंद्रह वर्ष हो गए हैं।''</p>
<p>मैंने हिसाब लगाया  तो उन्होने पचपन वर्ष की आयु में  पीना शुरू किया होगा। मेरा मेजबान मित्र फिर हमारे पास से गुजरा तो मैंने उसे बुलाया और कहा-''पर मेरी उम्र अभी पचपन नहीं हुई है तो पांच वर्ष पहले कैसे  हो सकती थी। ऐसा लगता है कि तुम्हारे ससुर को गलत संगत  लग गयी है।''</p>
<p>मेरा मित्र बोला ''तुमने अधिक पी ली है।<br />
दूसरे मित्र ने कहा-''यह तो ले ही नहीं रहा है?''<br />
मेरे मित्र ने कहा-''क्यों आज कैसे साधू बन रहे हो।''<br />
मैंने कहा-''आखिर इमेज भी कोई चीज है। तुम खुद नहीं पीते हो और दूसरों को पथभ्रष्ट कर रहे हो। वैसे भी तुम बहुत चालाकी करते रहे हो पर अब नहीं चलेगी।''<br />
वह हंसकर चला गया तो दूसरा मित्र बोला-''तो तुम्हें भी बाकी लोगों की तरह इसके बारे में गलतफहमी है कि यह  पीता नहीं है। आओ चलो दिखाऊँ।''<br />
वह मेरे कंधे पर हाथ रख कर बगीचे के पास बनी  इमारत  के एक कमरे में ले गया। मैंने देखा मेरा मित्र अपने कुछ खास लोगों में एक सज्जन के हाथ से ग्लास लेकर पी रहा था। मैंने अपने दोस्त को खींचा और वापस अपनी टेबल पर आ गया। दरासल मेरा वह मित्र बाहर काम करता था पर अपने अधिकतर रिश्तेदार हमारे शहर में होने के कारण यहीं सगाई कर रहा था।<br />
बाद में मैंने उसे पाउच से कुछ निकाल कर जब धीमा जहर खाते देखा तो मुझे हैरानी हुई। मैंने अपने दूसरे दोस्त से कहाँ-''शराब तो ठीक! यह पाउच तो एकदम जहर जैसा है। कमाल यह लोग इसे खाते कैसे हैं?'' </p>
<p>मेरे मित्र ने अपनी जेब से एक पाउच निकला और उसमें से दाने अपनी मुहँ में दाल दिए। और बोला-ऐसे। </p>
<blockquote><p><strong>शराब और  अन्य व्यसन जिस तरह समाज का हिस्सा बन गए हैं उसे देखकर मैं  सोचता हूँ कि हम जिस स्वस्थ भारत की बात करते हैं वह एक कल्पना है। लोग शारीरिक और मानसिक  रूप से स्वस्थ दिखते हैं पर क्या वाकई  होते हैं।</strong></p></blockquote>
<p> मैं जब पीता था तो किसी महफ़िल में जाने से पहले पीकर जाता था और वहाँ पीता था तो थोडी पीता था। उसमें भी मैंने कभी किसी से बदतमीजी  नहीं की। कई बार लोग महफिलों में  उधम मचा देते हैं। शराब पीने से आदमी के खून में तेजी  आती  है पर उसका फायदा उठाकर लोग बदतमीजी उसी से करते हैं जिससे डरते नहीं है। वरना अपने से ताक़तवर आदमी के आगे वह वैसे ही क्यों मिमियाते  हैं जैसे बिना शराब के मिमियाते हैं, हालांकि यह एक अलग विषय है पर हम समाज की रीतियों को चला रहे हैं उसमें  शराब और अन्य व्यसन कैसे शामिल किये गए हैं उसका कोई जवाब नहीं दे  सकता है।</p>
<p>उस पर जिस  तरह पाउचों का सेवन बढ़ रहा है वह आने वाले कॉम को किस हालत में पहुँचायेगा  कहा नहीं  जा सकता। उस दिन एक लड़का घर आया। वह पाउच खाता है। थोडी देर बैठने के बाद बोला-''मेरे सिर में दर्द हो रहा है। आपके पास कोई गोली है?''<br />
मैंने कहा-''गोली तो नहीं है और होती तो  भी देता नहीं। तुम अपनी जींस पर कसकर बंधा हुआ बेल्ट  थोडा ढीला कर लो। तुम्हारा सिर दर्द थोडी देर में ख़त्म हो जायेगा नहीं तो फिर तुम्हें दूसरा उपाय बताऊंगा।''</p>
<p>उसने बेल्ट   ढीला किया, उसके कुछ देर बाद भी वह बात करता रहा और फिर बोला--''मेरा सिर दर्द कम  हो रहा है। पर कमाल है यह  आपने  सब कैसे सोचा?।''</p>
<p>मैंने उसे कहा-''तुमने मेरे सामने ही तीन पुडिया खाईं है और तुम्हारा कसा हुआ बेल्ट देखर मुझे लगा कि कहीं हवा का चक्कर है। तुम्हें बहुत जल्दी पता लग गया पर मुझे बहुत देर बाद समझ में आयी।''</p>
<p>हम अपने शरीर को निरर्थक  कामों में अधिक लगा रहे हैं। शरीर के विकार तो दिखाई देते हैं पर मन के विकार तो कोई ही देख पाता  है। अपने शरीर से खिलवाड़  करते लोगों पर मुझे बहुत  तरस आता है क्योंकि एक समय मैं भी  इस दौर  से निकल चुका हूँ। वर्तमान हालत में लोगों पर तनाव अनेक कारणों से बढ़ रहा है पर उससे बचने के लिए जो उपाय करते हैं वह तनाव और बढा देते हैं। जब उस उपाय का असर ख़त्म होता है तो तनाव बढ़ने के साथ थकावट भी बढ़ जाती है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चलना ज़रा संभल कर-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=310</link>
<pubDate>Thu, 14 Feb 2008 16:40:21 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=310</guid>
<description><![CDATA[चिल्ला-चिल्लाकर करते हैं प्रेम
मजे के ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>चिल्ला-चिल्लाकर करते हैं प्रेम<br />
मजे के लिए चाहिए जैसे गेम<br />
आखों में बसाए रहते हैं<br />
पाश्चात्य सभ्यता वाली मेम<br />
जिससे होटलों और पाकों में<br />
नाच और गा सकें<br />
जैसे जिन्दगी में सब कुछ हो  प्रेम </p>
<p>पर जब आता है जिन्दगी की<br />
गाडी आगे बढाने का सवाल<br />
चौका, बरतन और कपडे धोने के<br />
बिना नहीं चल सकता<br />
घर में तब मचता बवाल<br />
पहले जिन हाथों में थमाते लवलेटर<br />
 बाद में घर लाकर  थमाते मैले कपडे<br />
और जहाँ खाते वहीं छोड़ जाते झूठे बरतन<br />
घर भला कैसे हो सकता है थियेटर<br />
जिन हाथों में वेलेंटाइन डे पर गुलाब<br />
सौंपकर करते हैं  इजहार<br />
बाद में कराते घर में बेगार<br />
फिर तो भूल जाते सब प्रेम </p>
<p>यह है भारत<br />
पश्चिम की नक़ल कितनी भी कर ले<br />
आदमी की जरूरतें बदल नहीं सकतीं<br />
बदल सकता है वह आसानी से<br />
घर की मालकिन<br />
पर औरत घर नहीं बदल सकती<br />
ओ वेलेंटाइन डे के रास्ते जाने वालों<br />
जाना हो तो जाओ तुम रोकेंगे नहीं<br />
जवान दिलों के धडकनों को टोकेंगे नहीं<br />
पर जिस्म की भूख<br />
बिना रोटी के बुझ नहीं सकती<br />
प्यार से रोटी पक नहीं सकती<br />
कसम क्यों नहीं खाता आदमी प्रेम में<br />
जिन हाथों में सौंप रहा हूँ गुलाब<br />
उनसे रोटी नहीं बनवाऊंगा<br />
कपडे नहीं धुलवाऊंगा<br />
घर में झाडूं नहीं लगवाऊंगा<br />
बस करूंगा प्रेम </p>
<p>रास्ता है धोखे और भ्रम का<br />
चलना ज़रा संभाल कर<br />
पर संभाल कर कहाँ होता है प्रेम<br />
भारत में पश्चिम जैसी सभ्यता<br />
अधिक देर नहीं चल सकती<br />
घर नहीं चला सकती कोई मेम<br />
------------------------------------- </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जैसा हम कहैं वैसा ही  दिख-कविता साहित्य ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=299</link>
<pubDate>Mon, 04 Feb 2008 17:44:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=299</guid>
<description><![CDATA[लोगों का समूह एकत्रिक कर
उसमें फूँकने ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>लोगों का समूह एकत्रिक कर<br />
उसमें फूँकने के लिए जजबात<br />
उनका सन्देश है<br />
''तू उधर से इधर आया है तो<br />
इधर जैसा ही हमको दिख<br />
हम जिस भाव कहैं उस भाव बिक''</p>
<p>एक हाथ में झंडा<br />
दूसरे हाथ में डंडा<br />
घुमा रहे<br />
जो दिखे  अकेला उसे धमका रहे<br />
''आजा इधर और जैसा हम कहते हैं वैसा दिख''</p>
<p>रंग-बिरंगी दुनिया में से<br />
चुन लिया एक रंग<br />
चल पड़े उसके संग<br />
बाकी रंगों पर पोता अपना रंग<br />
जो चेहरे बचे हैं उनको करते तंग<br />
नीतिशास्त्रों की बातें तो बहुत बडी-बड़ी<br />
न्याय के बोलबाले का दावा<br />
सब बन जाता है एक दिखावा<br />
जब खडा हो जाता सामने  अपना प्यारा रंग<br />
सन्देश यही देते<br />
''जिसमें हम कहें उसी रंग में दिख'</p>
<p>कागज़ पर लिखे नियम मंजूर नही<br />
पर उसमें खींची रेखाओं के<br />
इर्द-गिर्द ही सिमटा है उनका काम<br />
उनका सन्देश यही है<br />
''तू  रेखा के उस पार से आया<br />
इस पार  है हमारी बस्ती<br />
यहाँ है हमारी हस्ती<br />
वर्जित होगी  तेरी मस्ती<br />
जब हम कहैं तब ही हंसता दिख''</p>
<p>रीति-रिवाजों के बोझ तले<br />
उखड रही है हर कॉम<br />
जलते खंडहरों पर तापते आग<br />
आज तो जगह-जगह है नीरो<br />
जगह-जगह  बस गया है रोम<br />
ऐसे में सन्देश उनका यही है  की<br />
''जैसा हम कहें वैसा दिख<br />
भले ही तू दूसरी जगह से आया<br />
पर यहाँ तू हम जैसा दिख<br />
जिस भाव कहैं उसमें तू बिक''</p>
<p>दिल हैं कायर<br />
इसलिए थके-हारे<br />
रास्ते पर चलते लोगों पर बरसते<br />
लोहे के महलों में जो बैठे हैं जो लोग<br />
उनके तो दर्शनों को भी तरसते<br />
दावा यह कि अपनी कॉम के लोगों की<br />
गरीबी किसी भी तरह हटाएँगे<br />
पर सबूत के लिए एक भी अपने रंग के<br />
किसी गरीब को  सामने नहीं लायेंगे<br />
उनके कल्याण का नारा लगायेंगे<br />
सन्देश यही है कि<br />
''जैसा हम कहैं वैसा दिख<br />
हम जिस भाव कहैं उस भाव बिक' </p>
<p>पर कब तक चलेगा<br />
यह समाज पुराने वाद और नारों पर<br />
यह नहीं बतलायेंगे<br />
सोच में गहराई नही<br />
नीयत में सफाई नहीं<br />
अपने रास्ते का भी नहीं पता<br />
उन्हें तो चाहिए समाज पर सता<br />
इसलिए बस एक ही नारा<br />
'जैसा हम कहैं वैसा ही दिख<br />
जिस भाव कहैं उसमें ही बिक''<br />
 -----------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भ्रम कितना भी चमके, सच की तरह नहीं टिकता-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=298</link>
<pubDate>Sun, 03 Feb 2008 10:54:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=298</guid>
<description><![CDATA[काला बाजार में अब कुछ नहीं दिखता
सारा ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>काला बाजार में अब कुछ नहीं दिखता<br />
सारा काला माल खुले बाजार में बिकता<br />
काला पैसा अब कोई सम्मान की बात  नहीं<br />
क्योंकि उस पर भी गोरा रंग  चढा  दिखता<br />
इज्जतदार खानदान तो अब वही कहलाता<br />
जिसका हर सदस्य बाजार में महंगा   बिकता<br />
चलता है समाज उन्हीं के इशारे पर<br />
जिनके हाथ में खूनी खंजर दिखता<br />
धर्म अब वह नहीं जिस पर चलना<br />
जाते लोग  वहीं जहाँ स्वर्ग के लिए टिकट बिकता<br />
पर तुम अपना रास्ता नहीं बदलना, चाहे जो हो<br />
भ्रम कितना भी चमके, सच की तरह नहीं टिकता<br />
---------------------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:जिससे  कुछ मिलने की आशा हो उससे मधुर व्यवहार करें]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=297</link>
<pubDate>Sat, 02 Feb 2008 04:56:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=297</guid>
<description><![CDATA[1.जिसके मन में पाप है, वह सौ बार तीर्थ स्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.जिसके मन में पाप है, वह सौ बार तीर्थ स्नान करने के बाद भी पवित्र नहीं हो सकता, जिस प्रकार मदिरा का पात्र जल  पर भी शुद्ध नहीं होता.<br />
*यहाँ चाणक्य के कथन का आशय यह है कि बाहरी स्नान करने से मन मन शुद्ध नहीं होता, जब तक मन में पवित्रता नहीं हो.<br />
2.जिसके प्रति सच्चा प्रेम हैं वह दूर रहते हुए भी समीप रहता है। इसके विपरीत जिससे लगाव नहीं है वह आदमी पास रहते हुए भी दूर रहता है। यह एक वास्तविकता है कि मन के लगाव के बिना आत्मीयता का भाव बन ही नहीं सकता है।<br />
3.जिस किसी व्यक्ति से मिलने की संभावना है उससे सदैव मधुर व्यवहार करना चाहिऐ। उदाहरण के लिए मृग का शिकार करने की इच्छा रखने वाला चालाक शिकारी उसके आसपास रहकर मधुर स्वर में गीत गाता रहता है ।<br />
4.अगर तुम्हें लोगों में अपना सम्मान बनाए रखना है तो किसी के सामने किसी की बुराई नहीं करो .</p>
<p>5.विद्या की शोभा उसकी सिद्धि में है । जिस विद्या से कोई उपलब्धि प्राप्त हो वही काम की है।<br />
6.धन की शोभा उसके उपयोग में है । धन के व्यय में अगर कंजूसी की जाये तो वह किसी मतलब का नहीं रह जाता है, अत: उसे खर्च करते रहना चाहिऐ</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चजई-करें छोटे का अपमान-बेचें बडे को सम्मान ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/01/17/karen-chhote-kaa-apmaan-bechen-bade-ko-sammaan/</link>
<pubDate>Thu, 17 Jan 2008 17:30:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/01/17/karen-chhote-kaa-apmaan-bechen-bade-ko-sammaan/</guid>
<description><![CDATA[जो सच से लड़ना जानते हैं
कोई उनको सपने ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जो सच से लड़ना जानते हैं<br />
कोई उनको सपने बेच नहीं सकता<br />
जज्बातों के व्यापारी जो बेचते हैं<br />
उनको कोई गरीब खरीद नहीं सकता<br />
शायद इसलिए बेचे जा रहे हैं<br />
टीवी पर अखबारों पर सपने<br />
क्योंकि गरीब उनको देख नहीं सकता </p>
<p>दिल हैं उनके काले<br />
जिनके बोलों में होता है<br />
जरूरत से अधिक सौदर्य<br />
इतना विष की सांप भी नहीं बिखेर सकता<br />
सजा रखे है हाड-मांस के<br />
 पुतले और पुतलियाँ सब जगह<br />
मोम का पुतला भी ऐसा सज नहीं सकता<br />
बात करें ईमानदारी  की<br />
दुहाही दें छोटे आदमी के बड़ा  बनाने की<br />
पीठ में छिपाए घुमते हैं खंजर<br />
मौका देखते ही दिखाए खून का मंजर<br />
कहीं दिखाएँ इनाम<br />
कहीं ऊंची महफ़िल में  सजाने का वादा<br />
करते हैं छोटे का अपमान<br />
बेचें  बडे को सम्मान<br />
जीवन से हारे-थके लोगों का जमघट हो जहाँ<br />
वहाँ बदलाव का बिगुल बज नहीं सकता<br />
-------------------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चजई-विकास  और विनाश-लघुकथा]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/01/16/vikas-aur-vinaash/</link>
<pubDate>Wed, 16 Jan 2008 15:21:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/01/16/vikas-aur-vinaash/</guid>
<description><![CDATA[गरीब किसान अपने खेत में हल जोत रहा था. उ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>गरीब किसान अपने खेत में हल जोत रहा था. उसी समय एक खूबसूरत चेहरे वाला सूट-बूट पहने एक  शख्स उसके सामने आकर खडा हो गया और बोला-''मैं विकास हूँ और तुम्हें भी विकसित करना चाहता हूँ. यह लो कुछ पैसे और अपनी जमीन मुझे दे दो.<br />
किसान ने कहा-''नहीं, यह मेरे बाप-दादों की जमीन है और मैं इसे किसी को नहीं दे सकता.<br />
विकास ने कहा-''देखो मैं पूरे विश्व में फ़ैल रहा हूँ तुम अपने इलाके को पिछडा क्यों रखा चाहते हो, तुम यह जमीन मुझे दे दो. यहाँ तमाम तरह के कारखाने, इमारत, मनोरंजनालय और तरणताल खुलने वाले हैं. तुम और तुम्हारे बच्चों का भविष्य सुधर जायेगा. उनको नौकरी मिलेगी और उनकी जवानी  बहुत ऐसे मजे लेते हुए गुजरेगी जैसी तुमने सोची भी नहीं होगी.</p>
<p>किसान सोच में पढ़ गया तो वह बोला-''सृष्टि का नियम है मैं हर जगह जाता हूँ. अभी तुमसे बडे प्यार से कह रहा हूँ, पैसे भी दे रहा हूँ और नहीं मानोगे तो इससे भी जाओगे और तुम्हारे बच्चों का भविष्य भी नहीं बन पाएगा.यहाँ मेरा आना तय है और उसे तुम रोक नहीं सकते.  </p>
<p>किसान ने इधर-उधर देखा और पैसे लेते हुए बोला-अब मैं फिर कब आऊँ आपसे मिलने?''<br />
वह कुटिलता से बोला-''एक साल बाद. अभी तो यह पैसा तुम्हारे पास है, जब यह ख़त्म हो जाये तब आना. यह लो और भी पैसा तुम अपना मकान भी खाली कर दो. मैं तुम्हें एक साल बाद अच्छा मकान भी दूंगा.''</p>
<p>एक  साल बाद जब  अपने पैसे ख़त्म होने के बाद लौटा तो उसने देखा वहाँ सब बदला हुआ था. वह सब वहाँ वह सब था जो विकास ने उसे बताया था. वह पता करता हुआ उसकी कोठी के पास पहुंचा और दरबान से कहा'-मुझे साहब से मिलना है.''</p>
<p>दरबान ने कहा-साहब से क्या तुम्हारी मुलाक़ात तय है तो दिखाओ कोई कागज़, ऐसे अन्दर नहीं जाने दिया जा सकता.''<br />
इतने  में उसने देखा कि कार में वही विकास बैठकर बाहर आ रहा है. जैसे ही कर बाहर आयी वह उसके सामने खडा हो गया. विकास बाहर निकला और चिल्लाया-''तुम्हें मरना है?"<br />
किसान बोला-''आपने मुझे नहीं पहचाना. मैं हूँ किसान. आपको यह जमीन दी थी.''<br />
विकास बोला-तो? मैंने तुम्हें पैसे दिए थे. हट जाओ यहाँ से.'<br />
विकास कार  में बैठ गया तो किसान उसकी कार के सामने आने की  करने लगा पर वह उसे धकियाते हुए निकला गया. कार के पहिये की चोट खाकर वह किसान गिर पडा. एक आदमी ने आकर उसे उठाया. वह आदमी पायजामा कुर्ता पहने हुए था. उसने रोते हुए किसान को उठाया. किसान ने पूछा-''आप कौन?</p>
<p>उसने कहा-''विकास?'<br />
किसान ने पूछा-'' वह कौन था"<br />
आदमी ने कहा-'विनाश! पर अपना नाम विकास बताता है. मैं तुम्हें अपने घर पहुंचा दूं. तुम्हारी मरहम पट्टी करवा दूं. चिंता न करो मैं पैसे खर्च करूंगा.''<br />
किसान ने कहा-''नहीं मैं खुद चला जाऊंगा.'<br />
किसान वहाँ से चला और कहता जा रहा था''विनाश और विकास'</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चजई-ब्लोगर रतन और खंजर ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/01/14/blogar-ratan-aur-khanjar/</link>
<pubDate>Mon, 14 Jan 2008 15:30:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/01/14/blogar-ratan-aur-khanjar/</guid>
<description><![CDATA[रतन-रतन कर सब उसे लेने
एक बाग़ की तरह भा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>रतन-रतन कर सब उसे लेने<br />
एक बाग़ की तरह भागे जा रहे थे<br />
कहीं लगी दो ब्लोगरों  को यह  खबर<br />
अपने स्थाई टिप्पणीकार को लेकर<br />
पहुंच गए  जहाँ सब अपने नाम से<br />
रतन तलाश रहे थे<br />
पेड़ पर लगे कागज़ के फल उखाड़ रहे थे </p>
<p>किसी ने उखाडा कवि रतन  का कागज़<br />
किसी ने विज्ञान रतन<br />
किसी ने साहित्य रतन<br />
किसी ने कलाकार   रतन<br />
किसी ने शहर रतन तो किसी ने  गाँव रतन<br />
पर दोनों ब्लोगर नहीं कर सके कोई जतन<br />
टिप्पणीकार को अन्दर जाने के लिए उकसा रहे थे </p>
<p>मचा हुआ था हां-हाकार<br />
सब बडे लोग आपस में टकरा रहे थे<br />
कई लोगों के सिर फटे<br />
तो कई रतन कागज़ भी न बचे<br />
घायल एक आदमी बाहर आया<br />
टिप्पणीकार ने उससे पूछा<br />
'क्या अन्दर कहीं ब्लोग रतन का कागज़ भी है<br />
तो इन दो भले मानसों के लिए ले आऊँ<br />
साथ लाया हूँ दो ब्लोगरो को<br />
यह बिचारे भी मरे जा रहे थे' </p>
<p>वह आदमी बोला<br />
''सब कागज़ लूटते-फटे  देखे<br />
पर ब्लोगर रतन का नही दिखा<br />
वैसे भी जिसको मिले  वह भी<br />
सब फटे चले जा रहे थे'</p>
<p>वह आदमी चला गया तो<br />
टिप्पणीकार दु:खी होकर लौटा<br />
और अपने हाथ में रखा खंजर फैंकते हुए बोला<br />
'वापस चलो नहीं है कोई तुम्हारे लिए रतन<br />
व्यर्थ है करना जतन<br />
बिचारे सब लोग परेशान हुए जा रहे थे'</p>
<p>एक ब्लोगर  ने पूछा<br />
''बाकी तो सब ठीक  पर तुम<br />
यह खंजर कहाँ से और क्यों  ला रहे थे'</p>
<p>टिप्पणीकार  बोला<br />
''सोचा था मिल गया ब्लोगर रतन तो<br />
तुम्हें धमकाकर छीन लूंगा<br />
अरे क्या तुम्हार ब्लोग पर<br />
मुफ्त में कमेन्ट लगता हूँ कि<br />
 मैं सोचता था शायद<br />
कभी कोई फायदा मिल जाये<br />
पर अब नहीं है इसकी जरूरत<br />
क्योंकि अभी तुम्हारी जाति पंजीकृत नहीं है<br />
तुम क्या मुझे मुफ्त का माल समझे जा रहे थे<br />
-------------------------------------------------<br />
<strong>नोट-यह एक काल्पनिक हास्य-व्यंग्य रचना है और इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है. </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कौटिल्य अर्थशास्त्र:शत्रु पर इन्द्रजाल का भी प्रयोग करें ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/23/kauti-artshastr/</link>
<pubDate>Sun, 23 Dec 2007 09:24:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/23/kauti-artshastr/</guid>
<description><![CDATA[1.विशेष ज्ञान से संपन्न सत्त्वगुण और द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.विशेष ज्ञान से संपन्न सत्त्वगुण और दैव की अनुकूलता लिए उधोग और सत असत का विचार का शत्रु पर उपाय का प्रयोग करे। चतुरंगिनी सेना को छोड़कर जहाँ कोष और मन्त्र से ही युद्ध होता वही श्रेष्ठ मन्त्र है, जिसमें कोष और मंत्री से ही शत्रु को जीता जा सकता है। * यहाँ आशय यह है कि अगर कहीं शत्रु के की सेनाओं के साथ सीधे युद्ध नहीं हो रहा पर उसकी गतिविधियां ऎसी हैं जिससे देश को क्षति हो रही हो तो वहां धन और अपने चतुर सहयोगियों की चालाकी(मन्त्र) से भी शत्रु को हराया जा सकता है३.साम, दाम, दण्ड, भेद, माया, उपेक्षा, इन्द्रजाल यह सात उपाय विजय के हैं।</p>
<p>संपादकीय अभिव्यक्ति- यहाँ कौटिल्य का आशय यह है साम, दाम, दण्ड और भेद के अलावा माया(छल-कपट और चालाकी) उपेक्षा का भाव दिखाकर और इन्द्रजाल (हाथ की सफाई) द्वारा भी शत्रु को हराया जा सकता है।<br />
2.मंत्री और मित्र राज्य के सहायक हैं पर राज्य के व्यसन से अधिक भारी राजा का व्यसन है।जो राजा स्वयं व्यसन से ग्रस्त न हो वही राज्य के व्यसन दूर कर सकता है। वाणी का दण्ड, कठोरता, अर्थ दूषण यह तीन व्यसन क्रोध से उत्पन्न बताये हैं।जो पुरुष वाणी की कठोरता करता है उससे लोग उतेजित होते हैं, वह अनर्थकारी है, इस कारण ऎसी वाणी न बोले। मधुर वाणी से जगत को अपने वश में करेजो अकस्मात ही क्रोध से बहुत कुछ कहने लगता है उससे लोग विपरीत हो जाते हैं जैसे चिंगारी उड़ाने वाली से अग्नि से लोग उतेजित हो जाते हैं।<br />
<!--chitthajagat claim code--><br />
<a href="http://www.chitthajagat.in/?claim=0dngh9a51i68" title="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी"><img src="http://www.chitthajagat.in/images/claim.gif" border="0" alt="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी"/></a><br />
<!--chitthajagat claim code--></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ज्योतिष और संयुक्त खाता ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/18/jyotish-aur-sanyukt-khata/</link>
<pubDate>Tue, 18 Dec 2007 15:12:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/18/jyotish-aur-sanyukt-khata/</guid>
<description><![CDATA[पति पत्नी का बैंक में संयुक्त खाता था. ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पति पत्नी का बैंक में संयुक्त खाता था. पत्नी को रोज सुबह टीवी पर आने वाले ज्योतिष कार्यक्रम में बहुत दिलचस्पी थी. उस कार्यक्रम के बीच में ही पति ने कहा''आज मैं काम से जा रहा हूँ और अभी बैंक खुले नहीं होंगे इसलिए तुम जाकर पैसे निकालकर आना.'<br />
पत्नी ने इधर सिर हिलाकर हाँ की और उधर उसका भविष्य फल आ गया''आपकी राशि आज शुभ नहीं और आपको कोई आर्थिक लेनदेन नहीं करना चाहिए.''</p>
<p>बस पत्नी ने चिल्ला पडी'-आज मैं नहीं जाऊंगी क्योंकि मेरी राशि खराब है. कल जाऊंगी.'</p>
<p>पति ने पूछा-''अगर कल भी खराब आयी तो?'</p>
<p>''कल मैं यह कार्यक्रम ही नहीं देखूंगी?''पत्नी बोली<br />
इधर पास में बैठी बेटी बोल पडी-'पापा आपकी राशि अच्छी आ रही है इसलिए आप ही निकाल देना कल सुबह मेरे को फीस भरनी है और कल  आखिरी तारीख है. आखिर आप दोनों का जोईंट एकाऊंट है.यह जरूरी थोडे ही है की मम्मी हमेशा   निकालकर लाती है तो आप नहीं निकालों.''<br />
पिता   ने कहा-''हाँ, यह तो मैं भूल ही गया क्योंकि घर के पास है इसलिए तुम्हारी माँ ही निकलकर लाती है और मैं भूल जाता हूँ कि मैं भी निकल सकता हूँ. पर बेटी आज तो मैं पैसे तो निकाल लेता हूँ पर आइन्दा तुम मेरा भविष्यफल मत देखना. कभी मेरा खराब हुआ तो तुम्हारी मम्मी मेरे को भी पैसे नहीं निकालने देगी. इसकी यह अच्छी आदत है कि सिर्फ अपना ही भविष्य फल देखती है किसी और का नहीं.''<br />
वह चले गए तो बेटी ने माँ से कहा-''शुक्र है कि पापा का भविष्य मैंने गलत बताया. उनका भी खराब था.''<br />
माँ ने कहा--''ला मेरा  मोबाइल, मैं उनको भी बताती हूँ.<br />
लडकी घबडा गयी-''पर मैं तो ऐसी ही कह रही हूँ मुझे तो पापा की राशि भी पता नहीं.''<br />
माँ चुप हो गयी बेटी बाहर आकर अपने भाई  से बोली-''शुक्र है भगवान् का उसने ज्योतिष बनाया तो बैंक वालों ने भी जोइन्ट एकाउंट बनाया. वरना तो मेरा भविष्य चौपट हो जाता."   </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:बिना पढी पुस्तक और कमाया धन किसी दूसरे को न  दें]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/18/chankya-neetiapnee-pustak-aur-dhan-kisee-ko-n-den/</link>
<pubDate>Tue, 18 Dec 2007 04:14:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/18/chankya-neetiapnee-pustak-aur-dhan-kisee-ko-n-den/</guid>
<description><![CDATA[1.क्रोध यमराज के समान है, उसके कारण मनुष]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.क्रोध यमराज के समान है, उसके कारण मनुष्य मृत्यु की गोद में चला जाता है। तृष्णा वैतरणी नदी की तरह है जिसके कारण मनुष्य को सदैव कष्ट उठाने पड़ते हैं। विद्या कामधेनु के समान है । मनुष्य अगर भलीभांति शिक्षा प्राप्त करे को वह कहीं भी और कभी भी फल प्रदान कर सकती है। </p>
<p>2.संतोष नन्दन वन के समान है। मनुष्य अगर अपने अन्दर उसे स्थापित करे तो उसे वैसे ही सुख मिलेगा जैसे नन्दन वन में मिलता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:नये दिल वाले मानते नहीं ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/17/rahim-ke-dohenaye-dil-vale-mante-nahin/</link>
<pubDate>Mon, 17 Dec 2007 04:05:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/17/rahim-ke-dohenaye-dil-vale-mante-nahin/</guid>
<description><![CDATA[यह रहीम मानै नहीं, दिल से नया होय
चीता, ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>यह रहीम मानै नहीं, दिल से नया होय<br />
चीता, चोर, कमान के, नये ते अवगुण होय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि रहीम कहते हैं कि कोई व्यक्ति अगर किसी वस्तु, विषय या व्यक्ति से नया संपर्क करता है तो उसके दोषों को स्वीकार नहीं करता. जैसे पहली बार शिकार पर निकला चीता, चोरी पर निकला चोर और कमान से निकले तीर में कोइ गुण नहीं होता वैसे ही जो दिल से नया है  उसमें किसी को पहचाने गुण नहीं होता और उसको अपनी गलतियां भी नहीं दिखाई देतीं हैं.</p>
<p><strong>संपादकीय अभिमत</strong>-रहीम के इस कथन को आज हम और अधिक प्रासंगिक पाते हैं. आज कल अंतरजाल और मोबाइल  पर लोग संपर्क कर उस पर बिना किसी प्रमाण  यकीन कर लेते हैं. कोई उनसे थोडी देर मीठा वार्तालाप करता है तो उसे सच्चा समझ बैठते हैं उनको यह पता नहीं है कि कुछ लोगों का तो व्यवसाय है कि मीठा बोलकर अपनी वस्तु सामने वाले को बेचे और कुछ लोगों ने अपने मजे लेने के लिए आदत बना लिया है. ऐसे में जो नये लड़के-लडकियां है वह अपना नया दिल होने के कारण उनके जाल में फसं जाते हैं. बाद में जब अपने ठगे जाने का पता लगता है तो फिर उनको पछतावा होता है. ऐसे में अगर कोई उनका अनुभवी  मित्र या साथी उन्हें जब आगाह करते हैं तो वह उनकी बातों को अनसुना कर देते हैं. ऐसे में रहीम का यह कथन पढ़ने वाले लोग जिनका दिल नया है इसे पढ़कर यह समझ सकते हैं कि हमारे देश के महापुरुष ऐसे सन्देश दे गए हैं जो किसी भी युग में अपना महत्त्व नहीं खोते.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:मांस खाने वालों की मुक्ति नहीं ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/15/kabrimans-khane-valon-ki-mukti-nahin/</link>
<pubDate>Sat, 15 Dec 2007 05:44:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/15/kabrimans-khane-valon-ki-mukti-nahin/</guid>
<description><![CDATA[तिल भर मछली खायके, कोटि गऊ दे दान
कासी क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>तिल भर मछली खायके, कोटि गऊ दे दान<br />
कासी करवट ले मरै, तो भी नरक निदान</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि  जो तिल भर मछली-मांस खाकर उसको प्रायश्चित करने के लिए करोडों गायों का दान दे और काशी में करवट लेकर देह त्यागे तो भी वह अज्ञानी नरक यातना ही भोगेगा उसकी मुक्ति हो ही नहीं सकती.</p>
<p><strong>जीव हनै हिंसा करै, प्रगट पाप सिर होय<br />
पाप सबन जो देखिया, पुन्न न देखा होय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी  कहते हैं कि जो किसी जीव को मारता है, हिंसा कर्म करता है प्रत्यक्ष रूप से उसके सिर पर पाप का भार होता है. उसका हिंसा का कर्म तो सबको दिखाई देता है पर भले ही  वह पुण्य के काम भी  करता हो पर वह किसे को दिखाई नहीं  देते. </p>
<p><strong>सकल बरन एकत्र ह्वै, सकती पूजि मिली खाहिं<br />
हरिदासन की भ्रांति करि, केवल जमपुर जाहिं</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास कहते हैं कि सब वर्ण-जातियाँ  एकत्र होकर पशुओं की  बलि   कल्पित शक्तियों की पूजा के लिए देते  हैं  उसका मांस बडे चाव से प्रसाद मनाकर  खाते हैं और परमात्मा के प्रिय भक्तों को अपनी भ्रांति के कारण हीन मानकर दूर करते है ऐसे लोग नरक में जाते हैं. </p>
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<title><![CDATA[मरी  संवेदना का व्यापार जारी है]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/14/mari-sanvedna-ka-vyapar-jari-hai/</link>
<pubDate>Fri, 14 Dec 2007 16:29:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[संवेदना मर गयी है
फिर भी उसका  व्यापार
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>संवेदना मर गयी है<br />
फिर भी उसका  व्यापार<br />
अब भी जारी है<br />
फर्क बस यही आ गया कि<br />
पहले जिन्दों की गरीबी<br />
हटाने की कसम खाकर<br />
होते थे बाजार में सौदे<br />
अब उजाड़कर लोगों के घरोंदे<br />
छोड़ देते मरने के लिए<br />
फिर उनके ग़मों को बेचते हैं<br />
संवेदना से शून्य समाज<br />
बिना आँख खोले<br />
अपने कानों को बंद कर<br />
दिमागी कसरत से बचते लोग<b