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	<title>शेर &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/शेर/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "शेर"</description>
	<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 13:23:22 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[इश्क ने यहाँ कितनों को कोई और मुकद्दर दिया ]]></title>
<link>http://apurn.wordpress.com/?p=191</link>
<pubDate>Wed, 02 Jul 2008 11:35:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>Shubhashish Pandey</dc:creator>
<guid>http://apurn.wordpress.com/?p=191</guid>
<description><![CDATA[इश्क ने यहाँ कितनों को कोई और मुकद्दर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इश्क ने यहाँ कितनों को कोई और मुकद्दर दिया<br />
दिल को तन्हाई तो आँखों को समंदर दिया<br />
इबादत-ए-इश्क में जिसे पूजते रहे खुदा मान कर<br />
उस कातिल को इस इश्क ने ही तो खंजर दिया<br />
...................... Shubhashish</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हर रोज जंग का माडल, हर समय होता-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=192</link>
<pubDate>Tue, 01 Jul 2008 15:39:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=192</guid>
<description><![CDATA[हर इंसान के दिल की पसंद अमन है
पर दुनिय]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हर इंसान के दिल की पसंद अमन है<br />
पर दुनियां के सौदागरों के लिये<br />
इंसान भी एक शय होता<br />
जिसके जज्बातों पर कब्जा<br />
होने पर ही सौदा कोई तय होता<br />
बिकता है इंसान तभी बाजार में<br />
जब उसके ख्याल दफन होते<br />
अपने ही दिमाग की मजार में<br />
जब खुश होता तो भला कौन किसको पूछता<br />
सब होते ताकतवर तो कौन किसको लूटता<br />
ढूंढता है आदमी तभी कोई सहारा<br />
जब उसके दिल में कभी भय होता<br />
उसके जज्बातों पर कब्जो करने का यही समय होता </p>
<p>चाहते हैं अपने लिये सभी अमन<br />
पर जंग देखकर मन बहलाते हैं<br />
इसलिये ही सौदागर रोज<br />
किसी भी नाम पर जंग का नया माडल<br />
बेचने बाजार आते हैं<br />
खौफ में आदमी हो जाये उनके साथ<br />
कर दे जिंदगी का सौदा उनके हाथ<br />
सब जगह खुशहाली होती<br />
तो सौदागरों की बदहाली होती<br />
इसलिये जंग बेचने के लिये बाजार में<br />
हमेशा खौफ का समय होता </p>
<p>बंद कर दो जंग पर बहलना<br />
शुरू कर दो अमन की पगडंडी पर टहलना<br />
मत देखो उनके जंग के माडलों की तरफ<br />
वह भी बाकी चीजों की तरह<br />
पुराने हो जायेंगे<br />
नहीं तो तमाम तरह की सोचों के नाम पर<br />
रोज चले आयेंगे<br />
पर ऐसा सभी नहीं कर सकते<br />
आदमी में हर आदमी से बड़े बनने की ख्वाहिश<br />
जो कभी उसे जंग से दूर नहीं रहने देगी<br />
क्योंकि उसे हमेशा अपने छोटे होने का भय होता<br />
सदियां गुजर गयी, जंगों के इतिहास लिखे गये<br />
अमन का वास्ता देने वाले हाशिये पर दिखे गये<br />
इसलिये यहां हर रोज जंग का माडल हर समय होता<br />
......................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[किसी कोने में]]></title>
<link>http://apurn.wordpress.com/?p=190</link>
<pubDate>Mon, 30 Jun 2008 09:06:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>Shubhashish Pandey</dc:creator>
<guid>http://apurn.wordpress.com/?p=190</guid>
<description><![CDATA[ऐसा नहीं की अब सब कुछ बदल गया
पर हाँ हमन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ऐसा नहीं की अब सब कुछ बदल गया<br />
पर हाँ हमने खुद को जरुर बदल डाला है</p>
<p>कुछ हासिल नहीं होता छटपटाने से<br />
सो खुद से ही खुद को संभाला है</p>
<p>ऐसा नहीं की अब आग बुझ चुकी है<br />
वो तो आज भी सुलगती है किसी कोने में</p>
<p>हाथ से खोजते थे उसमे जाने क्या खोया हुआ<br />
और ये हाथ अक्सर तब जल जाता था</p>
<p>बुझाने को फूंकते थे जब भी हम उसको<br />
चेहरा एक बार फिर से झुलस जाता था</p>
<p>अब बस यही आदत बदल डाली है तबसे<br />
जाते ही नहीं अब कभी उस कोने में</p>
<p>पर सुबह अपनी आँखे नम मिलने पे समझ आता है<br />
आज क्या ख्वाब देखा है हमने सोने में ??</p>
<p>............................... Shubhashish</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मानते नहीं तो फिर पत्थर क्यों उड़ाते-कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=428</link>
<pubDate>Fri, 27 Jun 2008 12:44:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=428</guid>
<description><![CDATA[
कहते हैं पत्थर के बुतों में भगवान नही]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
कहते हैं पत्थर के बुतों में भगवान नहीं मानेंगे<br />
पर भगवान के बुत उड़ाने पहुंच जाते<br />
जवाब नहीं देना इसलिये<br />
तोपों से गोले बरसाते<br />
जब नहीं मानते तो क्यों<br />
पत्थर पर बम बरसा रहे थे<br />
जब खौफ की भाषा बोल रहे थे तब<br />
ऐसे  सवाल भला कहां से आते</p>
<p>जो पत्थर के बुतों मे भगवान देखते<br />
वह भी भला जिंदगी को कहां समझ पाते<br />
कि कई सभी पत्थर ऐसा सम्मान नहीं पाते<br />
दिल में है अगर उसकी तस्वीर<br />
वही पत्थरों में भी नजर आती है<br />
वह श्रद्धा ही है जिसे हम वहां देख पाते<br />
मगर फिर भी पत्थर पूज<br />
कर लेते अपने कर्तव्य की इतिश्री<br />
फिर दया और धर्म से दूर हो जाते</p>
<p>विश्वास और पाखंड की जंग<br />
सदियों से जारी है<br />
कभी दिखती कम<br />
कभी होती भारी है<br />
नहीं जानते लोग धर्म का मर्म<br />
बाहर शोर मचाकर छिपते हैं अपने आप से<br />
अपने खाली दिल दिमाग में<br />
झांकते  ही आती उनको शर्म<br />
जहां  अज्ञान का अंधेरा है<br />
लालच का डेरा है<br />
अपनी नाकामियों से उपजे क्रोध ने<br />
उनको घेरा है<br />
पुरानी किताबों के अर्थ रहित प्रसंग<br />
नये जीवन का बनाते अपने अंग<br />
पत्थर टूटने से श्रद्धा नही टूटती जिनकी<br />
वही सर्वशक्तिमान को समझ पाते<br />
बुतों से खौफ खाने वाले<br />
इंसान भी बहुत हैं<br />
भले ही कहते उसमें नहीं देखते<br />
फिर क्यों तोड़ने जाते<br />
मन में रहता है खौफ या विश्वास<br />
जिन्होंने लगाई ज्ञान सागर में डुबकी<br />
वही भक्ति और सत्संग पाते<br />
तलवारों और तोपों की संगत वाले<br />
अपने हिस्से तो केवल खौफ ही पाते<br />
.................................<br />
यह कविता ब्लाग लेखक श्री अफलातून की कविता के आधार पर लिखी गयी और वहां पोस्ट करने के बाद यहां प्रस्तुत की गयी है।<br />
दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बरसात की पहली फुहार-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=183</link>
<pubDate>Mon, 23 Jun 2008 14:48:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=183</guid>
<description><![CDATA[वर्षा ऋतु का की पहली फुहार
प्रेमी को म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>वर्षा ऋतु का की पहली फुहार<br />
प्रेमी को मिली मोबाइल पर प्रेमिका की पुकार<br />
‘चले आओ,<br />
घर पर अकेली हूं<br />
चंद लम्हे सुनाओ अपनी बात<br />
आज से शुरू हो गयी बरसात<br />
मन में जल रही है तन्हाई की ज्वाला<br />
आओ  अपने मन भावन शब्दों से<br />
इस मौसम में बैठकर करें कुछ अच्छी बात<br />
अगर वक्त निकल गया तो<br />
तुम्हें दिल से निकालते हुए दूंगी दुत्कार’</p>
<p>प्रेमी पहुंचा मोटर सायकिल पर<br />
दनादनाता हुआ उसके घर के बाहर<br />
चंद लोग खड़े थे वहां<br />
बरसात से बचने के लिये<br />
प्रेमिका के घर की छत का छाता बनाकर<br />
जिसमें था उसका चाचा भी था शामिल<br />
जिसने भतीजे को रुकते देखकर कहा<br />
‘तुम हो लायक भतीजे जो<br />
चाचा को देखकर रुक गये<br />
लेकर चलना मुझे अपने साथ<br />
जब थम जाये बरसात<br />
आजकल इस कलियुग में ऐसे भतीजे<br />
कहां मिलते हैं<br />
मुझे आ रहा है तुम पर दुलार’</p>
<p>प्रेमी का दिल बैठ गया<br />
अब नहीं हो सकता था प्यार<br />
जिसने उकसाया था वही बाधक बनी<br />
पहली बरसात की फुहार<br />
उधर से मोबाइल पर आई प्रेमिका की फिर पुकार<br />
प्रेमी बोला<br />
‘भले ही मौसम सुहाना हो गया<br />
पर इस तरह मिलने का फैशन भी पुराना हो गया है<br />
करेंगे अब नया सिलसिला शुरू<br />
तुम होटल में पहुंच जाओ यार<br />
इस समय तो तुम तो घर में हो<br />
मैं नीचे  छत को ही छाता बनाकर<br />
अपने चाचा के साथ खड़ा हूं<br />
बीच धारा में अड़ा हूूं<br />
जब होगी बरसात मुझे भी जाना होगा<br />
फिर लौटकर आना होगा<br />
करना होगा तुम्हें  इंतजार’</p>
<p>प्रेमिका इशारे में समझ गयी और बोली<br />
‘जब तक चाचा को छोड़कर आओगे<br />
मुझे अपने से दूर पाओगे<br />
कहीं मेरे परिवार वाले भी इसी तरह फंसे है<br />
करती हूं मैं अपने वेटिंग में पड़े<br />
नंबर एक  को पुकार<br />
तुम मत करना अब मेरे को दुलार’</p>
<p>थोड़ी देर में देखा प्रेमी ने<br />
वेटिंग में नंबर वन पर खड़ा उसका विरोधी<br />
कंफर्म होने की खुशी में कार पर आया<br />
और सीना तानकर दरवाजे से प्रवेश पाया<br />
उदास प्रेमी ने चाचा को देखकर कहा<br />
‘आप भी कहां आकर खड़े हुए<br />
नहीं ले सकते थे भीगने का मजा<br />
इस छत के नीचे खड़े होने पर<br />
ऐसा लग रहा है जैसे पा रहे हों सजा<br />
झेलना चाहिए थी आपको<br />
बरसात की पहली फुहार’</p>
<p>चाचा ने कहा<br />
‘ठीक है दोनों ही चलते हैं<br />
मोटर सायकिल पर जल्दी पहुंच जायेंगे<br />
कुछ भीगने का मजा भी उठायेंगे<br />
आखिर है बरसात की पहली फुहार’</p>
<p>प्रेमी भतीजे ने मोटर साइकिल<br />
चालू करते हुए आसमान में देखा<br />
और कहा-<br />
‘ऊपर वाले बरसात बनानी तो<br />
मकानों की छत बड़ी नहीं बनाना था<br />
जो बनती हैं किसी का   छाता<br />
तो किसी की छाती पर आग बरसाती हैं<br />
चाहे होती हो बरसात की पहली  फुहार<br />
............................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इश्क भी क्या चीज़ है]]></title>
<link>http://apurn.wordpress.com/?p=188</link>
<pubDate>Wed, 11 Jun 2008 11:29:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>Shubhashish Pandey</dc:creator>
<guid>http://apurn.wordpress.com/?p=188</guid>
<description><![CDATA[&#8220;अरे इतनी सी बात पे परेशान होने की क्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>"अरे इतनी सी बात पे परेशान होने की क्या जरुरत ये लो तुम मेरी फाइल दिखा देना,हाँ मेरी राइटिंग थोडी गन्दी है" अनुराग ने मुस्कुराते हुए सुबह से परेशान भावना की ओर अपनी फाइल बढ़ा दी, भावना को समझ नहीं आ रहा था की वो क्या करे&#124; "अरे ! नहीं अनुराग तुमने साल भर मेंहनत कर के ये फाइल बनायीं है और अगर आज मेरी लापरवाही की वजह से तुम्हारे लिए कोई परेशानी होगी तो शायद मुझे अच्छा नहीं लगेगा&#124; अगर मैंने ध्यान रखा होता तो वो फाइल गुम ना हुई होती " अरे! come-on भावना बच्चो जैसी बात मत करो आज तुम्हे जरुरत है इसलिए दे रहा हूँ ऐसे भी मेरा टर्न कल है तब तक मैं बना लूँगा फाइल" शायद इस अपनेपन को भावना नकार नहीं सकती थी ऊपर से जरुरत ने उसे और मजबूर कर दिया &#124; "अरे चलो कैंटीन में कुछ खाते हैं यार मुझे बहुत भूख लग रही है" अनुराग के इस बात से सब सहमत हो गए उनके पूरे छ: लोगो का ग्रुप कैंटीन की कोने वाली टेबल पर बैठ के आर्डर का इंतजार करने लगा&#124;   </p>
<p>भावना आज खामोश थी उसके सर का बोझ तो हट गया था पर दिल बहुत भारी था&#124; लोग अपनी बातो में मस्त थे पर वो लगातार अनुराग को देखे जा रही थी &#124; जुबान से खामोश मगर अन्दर जाने कितना तूफान &#124; आखिरकार आँखों ने अनुराग के सामने सवाल उढ़ेल ही दिए "क्यों तुम मुझे एहसान से लादे जा रहे हो पहले के एहसान क्या कम हैं मुझ पर जो आज एक और दे दिया &#124; क्यों नहीं कभी कुछ मांग लेते मुझसे, क्यों नहीं मेरे दिल को ये एहसास होने देते की मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकती, इतना प्यार करते हो पर कभी अपनी आँखों से भी नहीं ज़ाहीर होने देते &#124; हाँ, मैं कुछ नहीं दे सकती तुम्हे पर मैं ये एक बार तुम्हारे सामने स्वीकार करना चाहती हूँ &#124; तुम्हारे एहसानो का बोझ बहुत भारी है &#124; इसे लेके अब और नहीं चला जाता मुझ से "  </p>
<p>भावना के दिमाग की इन सारी बातों को जैसे अनुराग ने साफ सुन लिया हो &#124; बहुत ही सहज भाव से उसने भावना की आँखों में देख एक हल्की सी मुस्कराहट से ही जवाब दे दिया "हाँ मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ पर क्या प्यार बस पाने का ही नाम है अगर हाँ तो तुमसे बहुत ज्यादा मैंने पाया है तुम्हारे लिए कुछ भी कर पाने का सुकून मुझे जाने कितने दिनों तक खुश रखता है &#124; तुमसे मांग मैं प्यार को छोटा नहीं कर सकता मैं तुम्हे, तुम्हारी मजबूरिया सब कुछ समझता हूँ &#124; मुझे जो चाहिए वो मुझे तुम अनजाने में ही दे देती हो&#124; तुम्हारी ख़ुशी से ज्यादा मुझे क्या चाहिए होगा &#124; तुम्हारी ख़ुशी शायद तुम्हे भी उतना खुश न करती हो जितना मुझे कर देती है &#124; और इस वक़्त भी मैं तुम्हे हँसता हुआ देखना चाहता हूँ &#124; सच में बस एक बार मुस्कुरा दो ना मेरे लिए, लो मांग भी लिया अब न कहना की कुछ माँगा नहीं "&#124; बात आँखों में हुई थीं पर भावना की आँखों में आंसू और होठो पे मुस्कान थी </p>
<p>........... ये इश्क भी क्या चीज़ है &#124;</p>
<p><em>यूँ तो इश्क हो जाता है बस चन्द कदम साथ चलकर के<br />
पर ये मोम नहीं जो खत्म हो जाये बस थोडी देर जल कर के<br />
लकडी जल कर कुछ देर में ही कोयला हो जाया करती है<br />
पर कोयले से हीरा बनता है सैकडो साल घुटन सह कर के<br />
........................... Shubhashish</em></p>
<p>नोट : - हीरा कोयले का ही अपरूप होता है, जब कोयला कई सौ सालों तक ज़मीन में दबा रहता है तो उसकी आण्विक संरचना परिवर्तित हो जाती है और धीरे-धीरे वो कोयले से हीरा बन जाता है &#124;</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[उसे ही प्यार करते हैं जो करीब होता है-कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=420</link>
<pubDate>Tue, 10 Jun 2008 16:33:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=420</guid>
<description><![CDATA[यूं तो दिल सभी की देह में होता है
पर खुश]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>यूं तो दिल सभी की देह में होता है<br />
पर खुशनसीब होते हैं वह  जिनको<br />
जिंदगी में प्यार नसीब होता है</p>
<p>देखकर पर्दे पर चलचित्र  का प्यार<br />
नाचते गाते नायक-नायिका<br />
अपनी जिंदगी में वैसा ही सच देखनें के लिए<br />
कई  लोग तरस जाते है<br />
पर जमीन पर न कोई नायक होता न नायिका<br />
यहां बगीचों में जाकर घूमते हुए में भी<br />
पहरेदारों के डंडे  बरस जाते है<br />
हीरो बूढ़ा भी हो तो<br />
तो कमसिन मिल जाती है प्यार करने के लिए<br />
पर सच  में कोई कोई आंख उठाकर भी देख ले<br />
भला ऐसा भी कहां गरीब होता है</p>
<p>प्यार भरे गाने सुनते हुए बीत गये बरसों<br />
दिल की दिल में रह गयी<br />
इंतजार तो इंतजार ही रहा<br />
शायद कोई सच में नहीं प्यार करे<br />
तो दिल्लगी ही कर ले<br />
आज, कल या परसों<br />
परदे के चलचित्र से परे रहकर<br />
जब देखते हैं अपनी जिंदगी तो<br />
उसे ही प्यार करते हैं<br />
जो शरीर के करीब होता है<br />
फिर भी गीतों में झूम लेते हैं<br />
यही ख्याल करते हुए<br />
गीत-संगीत पर झूम सकते हैं<br />
यह भी किसी किसी का नसीब होता है</p>
<p>...................................</p>
<p>दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कभी उजड़ता तो कभी महकता है चमन-कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=392</link>
<pubDate>Tue, 10 Jun 2008 14:41:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=392</guid>
<description><![CDATA[जिनको देखने के लिय मचलता है मन
अगर वह प]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जिनको देखने के लिय मचलता है मन<br />
अगर वह पास आते हैं तो<br />
हो जाता है अमन<br />
बातें होतीं हैं प्यारी<br />
कभी होती है तकरार भी भारी<br />
पर प्रेम के पथ पर<br />
चलने वाले कभी रुकते नहीं<br />
लगता है जहां खड़े हैं<br />
कदम उनके बरसों तक थमें रहेंगे यहीं<br />
पर मिलना और बिछुड़ना तो<br />
इस दुनियां की रीति है<br />
चले जाते हैं वह जब आंखों से दूर<br />
अंधियारी हो जाती है यह दुनियां<br />
वीरान हो जाता हे चमन </p>
<p>फिर चलता है यादों का<br />
कभी खत्म ना होने वाला  दौर<br />
कहीं  चैन नहीं आता न मिलता  कोई ठौर<br />
कभी हंसते हुए बात करने की याद आती<br />
जो हुई थी तकरार वह भी मन भाती<br />
बिछ+ड़ गये अब क्या<br />
फिर कभी आयेंगे<br />
जीवन को महकायेंगे<br />
जिंदगी की तरह धरती के भी कायदे हैं<br />
कभी उजड़ता तो  कभी महकता है चमन<br />
.......................................</p>
<p>दीपक भारतदीप</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[उसे भी समाज कहते हैं-कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=175</link>
<pubDate>Tue, 10 Jun 2008 14:17:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=175</guid>
<description><![CDATA[आदमी से ही डरा आदमी
अपने लिये एक झुंड ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आदमी से ही डरा आदमी<br />
अपने लिये एक झुंड बना लेता है<br />
जिसे समाज कहते हैं<br />
अकेले होने की सोच से घबड़ाया आदमी<br />
उस झुंड के कायदे कानून<br />
अक्ल के दरवाजे बंद कर<br />
मानता इस उम्मीद में<br />
कभी संकट में उसके काम आयेगा<br />
पर संकट में जो हंसता है आदमी पर<br />
उसे भी समाज कहते हैं<br />
.................................................. </p>
<p>समाज के शिखर पर बैठे लोग<br />
हांकते हैं ऐसे आदमी को<br />
जैसे भेड़-बकरी हों<br />
जो न बोले<br />
न कहे<br />
न देखे<br />
उनके काले कारनामें दिन के उजाले में भी<br />
अपने डंडे के जोर पर चलता उनका फरमान<br />
टूट जाये चाहे किसी का भी अरमान<br />
उन पर कोई नहीं उठाता उंगली<br />
फिर भी समाज की गलियों में<br />
गोल-गोल घूमता है<br />
चाहे वह कितनी भी संकरी हों<br />
...............................</p>
<p>दीपक भारतदीप </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कई लोग बेमन से साथ हो जाते हैं-कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=418</link>
<pubDate>Mon, 09 Jun 2008 16:20:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=418</guid>
<description><![CDATA[
मन भी एक कागज की तरह है
कई नाम लिख जाते ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
मन भी एक कागज की तरह है<br />
कई नाम लिख जाते हैं<br />
धुंधलाने लगते हैं जब उसके रंग<br />
नये खाली पन्ने लिखने के लिए<br />
चले आते हैं<br />
ख्यालों का कारवां जैसे-जैसे बढता जाता है<br />
मन भी उसके साथ हो जाता है<br />
जिंदगी की राह में<br />
दूर तक साथ चलता है<br />
वही हमसफर हो जाता है<br />
मिलकर बिछड़ने वालों  के चेहरे भी<br />
मन की आंखों  से  धीरे-धीरे<br />
धुंधलाने नजर आने लग  जाते हैं</p>
<p>जिंदगी छोटी है पर<br />
आदमी के कदम भी कहां बड़े हैं<br />
रास्ते में भी कई इंसानी बुत खड़े हैं<br />
लगते हैं  सभी अपने जैसे<br />
पर नीयत का भरोसा करें कैसे<br />
जैसे हमारा ख्याल बदलता है<br />
दूसरों के मन भी बदल जाते हैं</p>
<p>सपने में मचलता हो<br />
या जागते हुए बहलता हो<br />
अपने मन का क्या भरोसा<br />
उस  पर काबू रखना होता है  कठिन<br />
फिर दूसरों के मन साफ होने की<br />
उम्मीद क्यों करते है<br />
यह मन ही है जिससे लोग<br />
अपनों से भी दूर हो जाते हैं<br />
जिंदगी के सफर में साथ चलने वाले<br />
कई लोग बेमन से साथ हो जाते हैं<br />
------------------------------<br />
दीपक भारतदीप<br />
 </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हमने क्या बुरा किया-कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=417</link>
<pubDate>Sun, 08 Jun 2008 15:36:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=417</guid>
<description><![CDATA[जिनको अपना समझकर सच कहा
वह बेगाना समझन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जिनको अपना समझकर सच कहा<br />
वह बेगाना समझने लगे<br />
जब तक उनकी लापरवाह अदाओं पर<br />
खामोश रहे<br />
उनको हम अच्छे लगे<br />
जो एक बार किया इशारा<br />
उनको संभल जाने का<br />
तब से मूंह फेरकर वह जाने लगे<br />
अजनबियों जैसे हो गये अब<br />
गैरों की तरह मिलने लगे<br />
सोचते हैं हमने सच कहकर क्या गलत किया<br />
गलत राह पर चलने के खतरे<br />
होते है बहुत<br />
अगर हमने उनको आगाह किया तो<br />
क्या बुरा किया<br />
वह चले जा रहे हैं फिर भी<br />
बस अब  हम से संभलकर चलने लगे<br />
..............................<br />
दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रात भर]]></title>
<link>http://apurn.wordpress.com/?p=187</link>
<pubDate>Fri, 06 Jun 2008 08:21:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>Shubhashish Pandey</dc:creator>
<guid>http://apurn.wordpress.com/?p=187</guid>
<description><![CDATA[दर्द सीने में सिसकता रहा है रात भर,
याद]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>दर्द सीने में सिसकता रहा है रात भर,<br />
यादों का सिलसिला चलता रहा है रात भर,<br />
एक बार फिर से माफ़ कर दूं उसकी बेवफाई को,<br />
यही इल्तजा दिल मुझसे करता रहा है रात भर &#124;<br />
................................ Shubhashish</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भ्रम का सिंहासन-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=171</link>
<pubDate>Mon, 02 Jun 2008 17:02:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=171</guid>
<description><![CDATA[एक सपना लेकर
सभी लोग आते हैं सामने
दूर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक सपना लेकर<br />
सभी लोग आते हैं सामने<br />
दूर कहीं दिखाते हैं सोने-चांदी से बना सिंहासन</p>
<p>कहते हैं<br />
‘तुम उस पर बैठ सकते हो<br />
और कर सकते हो दुनियां पर शासन</p>
<p>उठाकर देखता हूं दृष्टि<br />
दिखती है सुनसार सारी सृष्टि<br />
न कहीं सिंहासन दिखता है<br />
न शासन होने के आसार<br />
कहने वाले का कहना ही है व्यापार<br />
वह दिखाते हैं एक सपना<br />
‘तुम हमारी बात मान लो<br />
हमार उद्देश्य पूरा करने का ठान लो<br />
देखो वह जगह जहां हम तुम्हें बिठायेंगे<br />
वह बना है सोने चांदी का सिंहासन’</p>
<p>उनको देता हूं अपने पसीने का दान<br />
उनके दिखाये भ्रमों का नहीं<br />
रहने देता अपने मन में निशान<br />
मतलब निकल जाने के बाद<br />
वह मुझसे नजरें फेरें<br />
मैं पहले ही पीठ दिखा देता हूं<br />
मुझे पता है<br />
अब नहीं दिखाई देगा भ्रम का सिंहासन<br />
जिस पर बैठा हूं वही रहेगा मेरा आसन</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[निशानी]]></title>
<link>http://apurn.wordpress.com/?p=182</link>
<pubDate>Mon, 02 Jun 2008 09:06:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>Shubhashish Pandey</dc:creator>
<guid>http://apurn.wordpress.com/?p=182</guid>
<description><![CDATA[समझ नहीं आता की क्या कर डालूँ मैं
तुम्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>समझ नहीं आता की क्या कर डालूँ मैं<br />
तुम्हें बदलने की कोशिश करूं या खुद को बदल डालूँ मैं</p>
<p>अब और यही दर्द नहीं सहा जाता मुझसे<br />
दम तोड़ने दूं या खुद को संभालूँ मैं </p>
<p>जाने कब से बरसने को तरसते हैं बादल<br />
रोकूँ उन्हें या अपना दामन भीगा डालूँ मैं</p>
<p>जीने नहीं देती, पर तेरी यही एक निशानी बाकी है<br />
इस दर्द को सीने से क्या सोच के निकालूँ मैं<br />
................................. Shubhashish(2007)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इंसान भी अब पालतू होते हैं-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=412</link>
<pubDate>Sun, 01 Jun 2008 17:53:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=412</guid>
<description><![CDATA[कई चेहरे रोज दिखते हैं
पर फिर भी अनजान]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कई चेहरे रोज दिखते हैं<br />
पर फिर भी अनजाने रह जाते हैं<br />
मिलते हैं रोज कई लोग यहां<br />
पर सभी अपनी महफिलों में आने के<br />
दावतनामे नहीं भिजवाते हैं</p>
<p>आते हैं कई खत हमारे दरवाजे पर<br />
लिखने वाले सभी अपने नहीं हो जाते हैं<br />
सस्ती है दोस्ती<br />
एक जाम पर दोस्त बदल जाते हैं<br />
बेदर्द जमाने में लोग<br />
क्या समझेंगे दिल के इशारे<br />
उनके दिल में तो चमकते पत्थरों के<br />
घर बस जाते हैं</p>
<p>सहारे की उम्मीद किससे करें<br />
मददगार कीमत बताए जाते हैं<br />
जिनकी आंखों पर  है दौलत का पर्दा<br />
वह किसी के बहते पसीने को<br />
भला क्या देख पायेंगे<br />
जिनके कान सुनते है शोर<br />
भला किसी बेसहारे की<br />
सिसकती आवाज कहां सुन पायेंगे<br />
जुबान जिनकी गिरवी है अपने आका के पास<br />
भला सच क्या कह पायेंगे<br />
आपने हाथों रखी है अपनी कलम गुलाम<br />
मालिक के इशारे के बिना<br />
किसका नाम लिख पायेंगे<br />
इंसान  भी  अब पालतू होते हैं<br />
जो अपना  सम्मान बेच आते हैं<br />
हर जगह अपने आका के नाम<br />
लिखते और गाते नजर आते हैं</p>
<p>....................................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अहिंसा का व्रत पालन करने का यही तरीका समझ में आया-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=384</link>
<pubDate>Sun, 01 Jun 2008 12:48:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=384</guid>
<description><![CDATA[किसी ने उनसे पूछा उनसे
‘आप अब अपने कंध]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>किसी ने उनसे पूछा उनसे<br />
‘आप अब अपने कंधे पर<br />
बंदूक लेकर नहीं निकलते<br />
साथ रख लिया सुरक्षा कर्मी<br />
वही रहता उसे थामे<br />
इसका मतलब हमारे समझ में नहीं आया’</p>
<p>जवाब दिया उन्होंने<br />
‘अब आम लोगों को भी है रिझाना<br />
इसलिये हमने अहिंसा का व्रत लिया है<br />
इसलिये बदूक थमा दी है<br />
अपने सुरक्षाकर्मी को<br />
हम खून  खराबा नहीं कर सकते<br />
पर अपना धंधा भी नही ठप कर सकते<br />
हम करते हैं  इशारा<br />
यह साधता है निशाना<br />
आदमी तो आजकल<br />
डर जाता है बंदूक देखकर<br />
कभी कभी ऐसी नौबत आती है<br />
जब गोली पड़ती है चलाना<br />
अपने व्रत का पालन करने का<br />
यही तरीका हमारे समझ में आया’<br />
.............................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सभी की सोच मतलब के घर में बंद है-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=169</link>
<pubDate>Sat, 31 May 2008 12:46:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=169</guid>
<description><![CDATA[
कोई लिखकर कहे या
अपनी जुबां से बोले
को]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i21.tinypic.com/1zybtc3.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' /><strong><br />
कोई लिखकर कहे या<br />
अपनी जुबां से बोले<br />
कोई ऐसे शब्द कान में अमृत घोले<br />
मन में छा जाये प्रसन्नता की सरिता<br />
इसी चाहत में उम्र गुजार दी </p>
<p>पर प्यासे रहे हमेशा<br />
कोई नहीं बोल पाया<br />
नहीं लिख पाया कुछ मीठे शब्द<br />
हमने बोले कुछ प्यार के<br />
तो लिखे  भी बहुत<br />
पर जमाना ही है लाचार और बेबस<br />
जूझता है अपने दर्द और गमों से<br />
कोई नहीं समझता<br />
प्यार के शब्दों की असलियत<br />
सभी ढूंढते हैं खुशी उधार की<br />
.............................<br />
मैं कहां तलाश करूं प्यार से<br />
सराबोर शब्दों की<br />
सभी दरवाजे बंद हैं</p>
<p>अपने दिल के दर्द से टूटे लोग<br />
ढूंढ रहे हैं खुशियां<br />
रौशनी के पीछे अंधेरे में<br />
अपने शब्दों से जला सकें<br />
किसी के दिल में उम्मीद का चिराग<br />
कोई ख्याल में भी नहीं लाता<br />
सभी की सोच<br />
अपने मतलब के घर में बंद है<br />
.............................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एहसास नहीं रह जाता]]></title>
<link>http://apurn.wordpress.com/?p=180</link>
<pubDate>Sat, 31 May 2008 09:09:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>Shubhashish Pandey</dc:creator>
<guid>http://apurn.wordpress.com/?p=180</guid>
<description><![CDATA[जीने के लिये इस दुनिया में कुछ खास नही ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जीने के लिये इस दुनिया में कुछ खास नही रह जाता है<br />
सब कुछ होता है फिर भी कुछ पास नही रह जाता है<br />
खुद अपने मे घुट कर जब अरमान युं ही मर जाये तो<br />
इक हद के आगे दर्द का भी एहसास नहीं रह जाता है<br />
................................................... Shubhashish(2007)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपने आपसे दूर हो जाता आदमी-हिन्दी शायरी ]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=25</link>
<pubDate>Sat, 31 May 2008 07:37:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=25</guid>
<description><![CDATA[जीवन के उतार चढाव के साथ
चलता हुआ आदमी
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जीवन के उतार चढाव के साथ<br />
चलता हुआ आदमी<br />
कभी बेबस तो कभी दबंग हो जाता<br />
सब कुछ जानने का भ्रम<br />
उसमें जब जा जाता तब<br />
अपने आपसे दूर हो जाता आदमी</p>
<p>दुख पहाड़ लगते<br />
सुख लगता सिंहासन<br />
खुली आँखों से देखता जीवन<br />
मन की उथल-पुथल के साथ<br />
उठता-बैठता<br />
पर जीवन का सच समझ नहीं पाता<br />
जब अपने से हटा लेता अपनी नजर तब<br />
अपने आप से दूर हो जाता आदमी</p>
<p>मेलों में तलाशता अमन<br />
सर्वशक्तिमान के द्वार पर<br />
ढूँढता दिल के लिए अमन<br />
दौलत के ढेर पर<br />
सवारी करता शौहरत के शेर पर<br />
अपने इर्द-गिर्द ढूँढता वफादार<br />
अपने विश्वास का महल खडा करता<br />
उन लोगों के सहारे<br />
जिनका कोई नहीं होता आधार तब<br />
अपने आपसे दूर हो जाता आदमी</p>
<p>जमीन से ऊपर अपने को देखता<br />
अपनी असलियत से मुहँ फेरता<br />
लाचार के लिए जिसके मन में दर्द नहीं<br />
किसी को धोखा देने में कोई हर्ज नहीं<br />
अपने काम के लिए किसी भी<br />
राह पर चलने को तैयार होता है तब<br />
अपने आपसे दूर हो जाता आदमी</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[खुदा भी पिघलता है]]></title>
<link>http://apurn.wordpress.com/?p=179</link>
<pubDate>Thu, 29 May 2008 09:34:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>Shubhashish Pandey</dc:creator>
<guid>http://apurn.wordpress.com/?p=179</guid>
<description><![CDATA[जब गम तेरा देख के दिल मुझसे नही सम्भलत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जब गम तेरा देख के दिल मुझसे नही सम्भलता है<br />
तो तेरी खुशियों की खातिर ये यूं ही दिन रात जलता है<br />
ऐसे तो सुनता ही नही खुदा दुआ हमारी अक्सर<br />
पर शायद कभी-कभी हमारे आँसुवों से वो भी पिघलता है<br />
.......................................... Shubhashish(2007)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जैसी  अभिव्यक्ति वैसी ही अनुभूति-हिन्दी शायरी ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=168</link>
<pubDate>Tue, 27 May 2008 17:05:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=168</guid>
<description><![CDATA[राह पर चलते हुए जो
मैंने देखी जोर से चि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>राह पर चलते हुए जो<br />
मैंने देखी जोर से चिल्लाते लोगों की भीड़<br />
 वहां एक खड़े एक आदमी से पूछा<br />
‘यहां क्या हो रहा है’<br />
उसने कहा-‘झगड़ा हो रहा है’</p>
<p>मैं कुछ दूर चला तो जोर जोर से<br />
लोगों को स्तुतिगान गाते सुना<br />
मैंने एक आदमी से पूछा<br />
‘यह इतना शोर क्यों हो रहा है’<br />
उसने गुस्से से कहा<br />
‘</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ चरित्रहीन - The call girl]]></title>
<link>http://apurn.wordpress.com/?p=171</link>
<pubDate>Mon, 26 May 2008 06:43:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>Shubhashish Pandey</dc:creator>
<guid>http://apurn.wordpress.com/?p=171</guid>
<description><![CDATA[
यौवन के मद में अनियंत्रित, सागर में खो ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://apurn.files.wordpress.com/2008/05/ladyback.jpg"><img class="size-full wp-image-172 alignright" style="float:right;" src="http://apurn.wordpress.com/files/2008/05/ladyback.jpg" alt="" width="158" height="272" /></a></p>
<p>यौवन के मद में अनियंत्रित, सागर में खो जाने को<br />
आज चला था पैसो से मैं यौवन का सुख पाने को</p>
<p>दिल की धड़कन भी थिरक रही थी यौवन के मोहक बाजे पे<br />
अरमानों के साथ मैं पंहुचा उस तड़ीता के दरवाजे पे</p>
<p>अंदर पंहुचा तो मानो हया ने भी मुँह फेर लिया<br />
चारो तरफ से मुझको यूँ रुपसियों ने था घेर लिया</p>
<p>हर कोई अपने यौवन के श्रृंगार से सुसज्जित था<br />
पर अब जाने क्यों मेरा मॅन थोडा सा लज्जित था</p>
<p>आहत होता था हृदय बहुत उन संबोधन के तीरों से<br />
पर अभी भी मॅन था बंधा हुआ संवेगों की जंजीरों से</p>
<p>तभी एक रूपसी पर अटकी मेरी दृष्टि थी<br />
लगता था मानो स्वयं वही सुन्दरता की सृष्टि थी</p>
<p>व्यग्र हुआ मॅन साथ में उसके स्वयं चरम सुख पाने को<br />
उस कनकलता को लिए चला अपनी कामाग्नि बुझाने को</p>
<p>जून के उष्ण महीने में बसंती सी हो गयी थी रुत<br />
कुछ ऐसे अपने तन को उसने मेरे समुख किया प्रस्तुत</p>
<p>खुला निमंत्रण था सपनो को आलिंगन में भरने का<br />
पर नहीं समझ पा रहा था कारण अपने अंतस के डरने का</p>
<p>अंतस को अनदेखा कर के प्रथम स्पर्श किया तन को<br />
उस मद से ज्यादा मद-मादित अब तक कुछ नहीं लगा मॅन को</p>
<p>खुद अंग ही इतने सुंदर थे लज्जा आ जाये गहनों को<br />
पर सहसा सहम गया देख उस मृग-नयनी के नयनो को</p>
<p style="text-align:left;">आँखों में कोई चमक नहीं चेहरे पे कोई भाव नहीं<br />
सपने कोई छीन गया जैसे जीने कोई चाह नहीं</p>
<p style="text-align:left;">प्रश्नों की श्रृंखल कड़ियों ने सारा मद तोड़ दिया पल में<br />
व्याकुल था अंतस जानने को क्या है इसके हृदयातल में</p>
<p style="text-align:left;">उसे देख अवस्था में ऐसी जब रहा नहीं गया मुझसे<br />
जो उबल रहा था अंतस में वो सब कुछ बोल दिया उससे</p>
<p style="text-align:left;">आँखे सूना चेहरा सूना क्यों सूना तेरा जीवन है<br />
इच्छाओं के संसार में क्यों अब लगता नहीं तेरा मॅन है</p>
<p style="text-align:left;">सिर्फ तन का मूल्य दिया हूँ मैं, मॅन पर मेरा अधिकार नहीं<br />
पर इतना तो बता ऐ कनकलता क्या तुझको मैं स्वीकार्य नहीं</p>
<p style="text-align:left;">हे कामप्रिया!,हे मृगनयनी! ऐसी क्या विवशता है तुझको<br />
जो मॅन से मेरे साथ नहीं फिर तन क्यों सौप दिया मुझको</p>
<p style="text-align:left;">शांत भाव से बोली वो यहाँ मॅन को कौन समझता है<br />
एक लड़की के लिए गरीबी ही उसकी सबसे बड़ी विवशता है</p>
<p style="text-align:left;">इतना कह के फिर शांत हो गयी कुछ समझ नहीं आया मुझको<br />
प्रश्नों की श्रृंखल कड़ियों से फिर मैंने झक-झोर दिया उसको</p>
<p style="text-align:left;">लड़ना ही जीवन है चाहे मुश्किल कितनी भी ज्यादा हो<br />
फिर नारी हो के क्यों तोड़ दिया तुमने अपनी मर्यादा को</p>
<p style="text-align:left;">कमी नहीं दुनिया में काम की पैसे इज्जत से कमाने को<br />
फिर क्यों बेच दिया खुद को बस अपनी क्षुधा मिटाने को ?</p>
<p style="text-align:left;">तड़प उठी वो मेरे ऐसे प्रश्नों के आघातों से<br />
मुझसे बोली क्या समझाना चाहते हो इन बातों से</p>
<p style="text-align:left;">शौक नहीं था वेश्या बन बाज़ारों में बिक जाने का<br />
अपने ही हाथों से खुद अपना आस्तित्व मिटाने का</p>
<p style="text-align:left;">पर आँखों के सारे सपने एक रोज बह गए पानी में<br />
जब माँ-बाप,घर-आँगन सब खो गए सुनामी में</p>
<p style="text-align:left;">फिर एक ही रात में बदल गयी मेरी दुनिया की तस्वीर यहाँ<br />
कठपुतली बना के बहुत नचाई मुझको मेरी तक़दीर यहाँ</p>
<p style="text-align:left;">दिन अच्छे हो जाते हैं राते भी अच्छी लगती हैं<br />
भरे पेट को सिद्धांत की हर बातें अच्छी लगती हैं</p>
<p style="text-align:left;">पर मई-जून की गर्मी से जब देह झुलसने लगती है<br />
रोटी के टुकड़े खोज रही आँखे कुछ थकने लगती हैं</p>
<p style="text-align:left;">भूख की आग में तड़प-तड़प मुश्किल से दिन कट पाते हैं<br />
अपनी बेबसी में घुट-घुट कर सपनों को जलाती रातें है</p>
<p style="text-align:left;">जब नीली छत के सिवा सर पर कोई और छत नहीं होती है<br />
कपडो के छेदों से झाँक रही मजबूरी खुद पे रोती है</p>
<p style="text-align:left;">गिद्धदृष्टि से देहांश देखता जब कोई चीर-सुराखों से<br />
तब मॅन छलनी हो जाता है तीर विष बुझे लाखों से</p>
<p style="text-align:left;">जब इन हालातों से लड़ लड़ कर जवानी थकने लगती है<br />
तब मर्यादा और सम्मान की ये बातें बेमानी लगने लगतीं है</p>
<p style="text-align:left;">लोगो ने जाने कितनी बार मन को निर्वस्त्र कर डाला था<br />
पर फिर भी किसी तरह मैंने अपना तन संभाला था</p>
<p style="text-align:left;">पर एक दिन कुचल गयी कली कुछ मदमाते क़दमों से<br />
कुछ और नहीं अब बाकी था इन किस्मत के पन्नों में</p>
<p style="text-align:left;">खुद को ख़त्म कर लेने का निश्चय कर लिया मेरे मॅन ने<br />
पर लाख चाहने पर भी दिल का साथ नहीं दिया हिम्मत ने</p>
<p style="text-align:left;">पर जीने का मतलब मेरे लिए हर मोड़ पर एक समझौता था<br />
फिर इस जगह से ज्यादा गया गुजरा मेरे लिए क्या हो सकता था</p>
<p style="text-align:left;">इतना गिर गयी हूँ मैं कैसे ये सवाल हमेशा डसता था<br />
लेकिन मेरे पास भी इसके सिवा अब और कहाँ कोई रस्ता था</p>
<p style="text-align:left;">उस वक़्त बहुत मैं रोई थी हद से ज्यादा चिल्लाई थी<br />
दूसरों के हाथ आस्तित्वहीन हा जब खुद को मैं पाई थी</p>
<p style="text-align:left;">पर रो-रो के सारे आंसू एक रोज़ बहा डाला मैंने<br />
हर अरमान का गला घोंट कफ़न ओढा डाला मैंने</p>
<p style="text-align:left;">पर अब पेट भर जाने पर भी जब नीद नहीं आती रातों को<br />
नहीं सँभाल पता है ये दिल तब इन बिखरे जज्बातों को</p>
<p style="text-align:left;">क्यों नहीं सजा सकती हूँ मैं दुल्हन बन किसी आँगन को<br />
क्यों प्रेयसी बनने का अधिकार नहीं मिला मुझ अभागन को</p>
<p style="text-align:left;">काश कि मैं भी किसी को प्राणों से प्यारा कह पाती<br />
काश कि मैं भी किसी के हृदयातल में रह पाती</p>
<p style="text-align:left;">काश कि मेरे आँचल में भी एक अंश मेरा अपना होता<br />
ममता से पागल हो जाती एक बार जो मुझको माँ कहता</p>
<p style="text-align:left;">इतना कहते कहते ही उसकी आँखे भर आई थी<br />
मैं भी था खामोश वहाँ बस एक उदासी छाई थी</p>
<p style="text-align:left;">फिर मुझमे हिम्मत ही नहीं थी उससे कुछ कह पाने को<br />
धीमे क़दमों से लौट गया वापस गंतव्य पे जाने को</p>
<p style="text-align:left;">सोचता रहा ये रास्ते भर होके मानववृत्ति के अधीन<br />
वो चरित्रहीन थी या फिर दुनिया ही है चरित्रहीन</p>
<p style="text-align:left;">........................................  Shubhashish(2006)</p>
<p>In printable format<br />
<a href="http://apurn.files.wordpress.com/2008/05/chtf1_0.jpg"><img class="alignleft size-thumbnail wp-image-173" src="http://apurn.wordpress.com/files/2008/05/chtf1_0.jpg?w=74" alt="" width="74" height="96" /></a> <br />
<a href="http://apurn.files.wordpress.com/2008/05/cht2f_0.jpg"><img class="alignleft size-thumbnail wp-image-174" src="http://apurn.wordpress.com/files/2008/05/cht2f_0.jpg?w=74" alt="" width="74" height="96" /></a><br />
<a href="http://apurn.files.wordpress.com/2008/05/chtf3.jpg"><img class="alignleft size-thumbnail wp-image-175" src="http://apurn.wordpress.com/files/2008/05/chtf3.jpg?w=74" alt="" width="74" height="96" /></a><br />
<a href="http://apurn.files.wordpress.com/2008/05/chtf4.jpg"><img class="alignleft size-thumbnail wp-image-176" src="http://apurn.wordpress.com/files/2008/05/chtf4.jpg?w=74" alt="" width="74" height="95" /></a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मौसम पर  कविता नहीं लिखेंगे-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=165</link>
<pubDate>Sat, 24 May 2008 11:55:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=165</guid>
<description><![CDATA[आया फंदेबाज और बोला
‘दीपक बापू, गर्मी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i20.tinypic.com/160oms5.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' /><strong>आया फंदेबाज और बोला<br />
‘दीपक बापू, गर्मी में हो रही बरसात<br />
जहां रुलाता पसीना, वहां करती बहार अपनी  बात<br />
लिखो कोई जोरदार कविता<br />
बहने लगे श्रृंगार रस की सरिता<br />
शायद तुम्हारे नाम से फ्लाप का लेबल हट जाये<br />
हिट होकर तुम्हारा नाम आकाश पर चमक जाये<br />
कोई कुछ भी कहे तुम करो<br />
अपनी पत्रिका पर मौसम पर कविता की बरसात’</p>
<p>जाने को तैयार खड़े थे<br />
बांध रहे थे धोती<br />
सिर पर रख रहे टोपी<br />
सुनकर पहले देखा फंदेबाज को घूरकर<br />
फिर कहैं दीपक बापू<br />
‘दो दिन पहले  गर्मी पर<br />
लिखने को कह रहे थे हास्य कविता<br />
अब प्रवाहित करवाना चाहते हो<br />
श्रृंगार रस की सरिता<br />
बहुत लिख चुके तुम्हारे विषयों पर<br />
नहीं बनी हमारी पत्रिका के  हिट होने की बात<br />
मौसम का कोई भरोसा नहीं<br />
सर्दी के मौसम में सुबह लिख रहे थे<br />
कंपाकंपाते हुए उस पर गर्म कविता<br />
दोपहर तक  निकलने लगा गर्मी में पसीना<br />
गर्मी में लिखने बैठते हैं शाम को<br />
रात तक पानी बरसता है बनकर नगीना<br />
हवा बंद पर लिखने बैठते हैं तो<br />
आंधी चली आती है<br />
मौसम का कोई भरोसा नहीं<br />
यह अंतर्जाल है मेरे मित्र<br />
सारी दुनियां में एक जैसा मौसम नहीं रहता<br />
कहीं कोई बहार में नहाता<br />
तो कोई धूप में गर्मी में सहता<br />
अब पहले जैसा माहौल नहीं है<br />
जो लिखेंगे यहीं पढ़ा जायेगा<br />
अब तो लिखो अपने शहर में<br />
वह विदेश में भी दिखने में आयेगा<br />
इसलिये समझ में नहीं आती<br />
मौसम पर लिखकर  हिट होने की बात<br />
यहां  हमेशा ही होने लगी है<br />
बेमौसम गर्मी, सर्दी, और बरसात<br />
हमें नहीं जमी तुम्हारी मौसम पर<br />
हास्य कविता लिखने की बात<br />
..................................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कोशिश न करना कीमत लगाने की]]></title>
<link>http://apurn.wordpress.com/?p=170</link>
<pubDate>Thu, 22 May 2008 08:29:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>Shubhashish Pandey</dc:creator>
<guid>http://apurn.wordpress.com/?p=170</guid>
<description><![CDATA[धोखे से लूट ले जा सकते हो तुम भी,
पर कोश]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>धोखे से लूट ले जा सकते हो तुम भी,<br />
पर कोशिश न करना कीमत लगाने की,<br />
जिसके बदले में बिक जाये इमान मेरा,<br />
औकात इतनी नहीं अभी इस ज़माने की<br />
............................. Shubhashish</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल बहलाने के लिए देख लो सुंदर तस्वीरें कहीं-कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=163</link>
<pubDate>Wed, 21 May 2008 17:11:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=163</guid>
<description><![CDATA[हंसते चेहरे देखकर हंसता हूं
दिल बहलान]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i20.tinypic.com/1h5pp2.jpg[/IMG]' alt='' class='alignright' />हंसते चेहरे देखकर हंसता हूं<br />
दिल बहलाने के लिये दूसरों की<br />
हंसी भी सहारा बन जाती है<br />
किसी के दर्द पर हंसने वाले बहुत हैं<br />
दूसरों को हंसा दें ऐसी सूरतें<br />
कभी कभी नजर आती हैं<br />
नहीं मिलता तो देख लेता हूं<br />
हंसते हुए लोगों तस्वीरें<br />
दर्द से परे जो ले जातीं हैं<br />
......................................................</p>
<p>आंखों से देखने का उम्र से<br />
कभी कोई वास्ता नहीं<br />
अगर बहलता हो मन तस्वीरों से<br />
तो कोई हर्ज नहीं<br />
अपनी उम्र देखकर शर्माने से<br />
भला समय कट पाता है<br />
राह चलते किसी का सौंदर्य देखने पर<br />
अगर घबड़ाते हो तो<br />
देख लो सुंदर तस्वीरें कहीं<br />
.........................................</p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
