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	<title>व्यंग्य &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/व्यंग्य/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "व्यंग्य"</description>
	<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 13:33:30 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[अवकाश के दिन की डायरी-आलेख]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=422</link>
<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 11:04:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[कल रात को मैंने ग्यारह बजे कंप्यूटर बं]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कल रात को मैंने ग्यारह बजे कंप्यूटर बंद किया था और उसके बाद  बरसात की वजह से  बिजली ऐसी गुम हुई  कि आज दोपहर तीन बजे अपना कंप्यूटर खोलकर देख पाया।<br />
आज  अवकाश का दिन बेकार गया लग रहा था क्योंकि बरसात की वजह से अपने काम से बाहर जाना भी मुश्किल था। बरसात रुकी तो बाजार गया और दोपहर घर तीन बजे आया तो लाईट आयी तब मैंने सोचा कि थोड़ी देर कंप्यूटर खोलकर देख लूं।  वैसे मैं शायद इतनी परवाह नहीं करता पर  कल उर्दू के प्रचलित शब्दों पर लगातार दूसरा पाठ मैंने अपने ब्लाग@पत्रिका में लिखा था और  अनुमान था कि इस पर कुछ ऐसे लोगों का ध्यान अवश्य जायेगा जो बहुत गंभीरता से ब्लाग जगत से जुड़े हैं और वह अपनी टिप्पणियां रखकर अपनी बात अवश्य कहेंगे। कल एक पंक्ति ब्लाग से एक सदाशयता पूर्ण टिप्पणी थी और सर्व श्री संजय पटेल, दिनेश राय द्विवेदी और संजय बैगानी ने अपनी बात आज रखी थी। मैं इसलिये भी चिंतित था कि कुछ लोग बहस और वाद-विवाद में अपनी बात क्रोध में कहकर उसको प्रभावी बनाना चाहते हैं पर ऐसा हुआ नहीं। मुझमें असहमतियों को झेलने की क्षमता है पर किसी की अभद्र टिप्पणी मुझे उसका उग्रता से  प्रतिवाद करने को प्रेरित करती है-भले ही तत्काल ऐसा नहीं करता और अवसर की प्रतीक्षा का धीरज भी मुझमें है। इसका  सकारात्मक परिणाम भी आता है। एक ब्लाग लेखक की गुस्से वाली टिप्पणी मेरे दिमाग में थी और उनके प्रति मेरे मन में अच्छा भाव नहीं रहा था। एक दिन वह ऐसी तारीफ कर गये कि मेरा गुस्सा हवा हो गया।<br />
कल के पाठ पर यही सोचकर कि पता नहीं किसने क्या लिखा होगा? मुझे अपने यहां बिजली न आने पर गुस्सा आ रहा था। आखिर एक संवेदनशील और गंभीर विषय पर लिखकर उससे दूर कैसे रह सकते हैं।<br />
वैसे एक विचार आया था कि आज इस पर लिखूं पर मुझे लगा कि अति हो जायेगी। यह बहस  कभी समाप्त नहीं होने वाली  और आज आई टिप्पणियों से मैंने कुछ अपना विचार बनाया पर उन पर बाद में लिखूंगा और जिनकी टिप्पणियां हैं उनके नाम उसमें दूंगा। वह सब मेरे मित्र हैं और जिस ढंग से अपनी बात उन्होंने रखी उससे मेरे मन में सकारात्मक प्रभाव पड़ा। मुझे आजकल उन लोगों से असहमति होती जा रही है जिनको टिप्पणियां अधिक मिलती हैं और वह उनको औपचारिक मानकर उनकी अवहेलना करते हैं। अपने पाठों में  वह उसकी चर्चा कर वह इन औपचारिक टिप्पणियों पर प्रतिकूल विचार करते हैं। मेरे पास भी ऐसी टिप्पणियां आती हैं पर मेरा मानना है कि कहीं न कहीं उससे प्रेरणा मिलती है। एक बात याद रखनी चाहिए कि अगर जैसे पाठ होते हैं वैसे ही टिप्पणियां भी आती हैं।  कुछ विषय ऐसे होते हैं जिन पर औपचारिक टिप्पणी-जैसे ‘बहुत बढिया है’, या ‘बहुत सुंदर है’आदि लगाकर निकलना बहुत कठिन होता है। मैंने बीच में कविता के रूप मेें टिप्पणियां रखीं उस पर मेरे एक मित्र की नजर पड़ गयी तो उसने कहा कि अगर अपनी टिप्पणियां पद्य के रूप में रखना चाहते हो तो पंक्तियां कम करो‘।<br />
मैंने उसे बताया कि इस तरह मैं काव्य पाठ बना लेता हूं तो उसने कहा कि ‘भले ही अपने लिये बड़ा काव्य  पाठ बना लो पर अपनी टिप्पणियों में उसमें से चुनींदा पंक्तियां ही रखो। वैसे भी कवितायें छोटी ही लिखो अगर वह हास्य कवितायें नहीं है तो।’</p>
<p>बहरहाल एक बात है कि कुछ विषय ऐसे होते हैं जो अन्य ब्लाग लेखकों को खींच सकते हैं उन पर टिप्पणियां अवश्य मिलती हैं। अगर कोई विषय सार्वजनिक दृष्टि से बहुत महत्व का हो तो लोग टिप्पणियों पर इतनी मेहनत करते हैं कि मन में उनके प्रति कृतज्ञता का भाव पैदा होता है। वह कितनी मेहनत से और विचार कर लिखते हैं कि उनके परिश्रम की प्रशंसा न करना कृतघ्नता लगती है। कल श्री अनुनाद सिंह और आज श्री संजय पटेल ने उर्दू के शब्दों के हिंदी में उपयोग से संबंधित  विषय पर जिस गंभीरता से अपनी टिप्पणियां दी वह वास्तव में प्रशंसा योग्य है। श्री संजय बैंगानी और श्री दिनेश राय द्विवेदी ने संक्षिप्त में बात रखी और फिर उस पर लिखने का विषय भी प्रदान किया। ऐसी बहसों में वही लोग शामिल हो सकते हैं जो अपने अंदर मौलिक विचार रखते हैं क्योंकि उसके बिना किसी बहस में संजीदगी से टिक पाना कठिन होता है और फिर क्रोध का प्रदर्शन करना ही अपने सम्मान की रक्षा करने का उपाय नजर आता है।<br />
आजकल लोग शिकायत कर रहे हैं कि मैं बहुत लंबा लिख रहा हूं। यार, मैं क्या करूं लिखने बैठता हूं तो कृतिदेव में ऐसे ही लिखता हूं जैसे हाथ से लिख रहा हूं। हालांकि मेरा मानना है कि पहले मुझे हाथ से लिखकर ही टाईप करना चाहिए तभी अधिक प्रभावी पाठ लिख पाऊंगा। मैंने कल देखा 28 मार्च 2008 को कृतिदेव को यूनिकोड में बदलने वाला टूल लोट किया था तब से थोड़ा मजे लेकर लिख रहा हूं। दूसरी बात यह कि अगर गंभीर या संवेदनशील विषय हो तो उसमें अपनी कोई बात छूट जाये तो जवाब देना कठिन है। कृतिदेव पर टाईप करते हुए सात सौ अक्षर कब हो जाते हैं पता ही नहीं पड़ता। वैसे मैंने कल यूनिकोड को कृतिदेव में बदलने वाला टूल लोड किया और अपनी कुछ पाठ देखे तो मुझे लगा कि उनमें बहुत सारी बातें छूट गयीं थीं। उस समय यह हालत थी कि पांच सो अक्षर भी लिख लिये तो समझ लो तीर मार लिया। किसी को अक्षर को मिटाना पहाड़ लगता था।<br />
इसमें कोई संदेह नहीं हैं जिन टूलों से हम ब्लाग लेखकों का  वास्ता पड़ रहा है वह सामान्य आदमी के लिये अजूबा है। मैं जिनको भी दिखाता हूं वह दांतों तले उंगलियां दबा लेते हैं। अंतर्जाल पर तो बहुत लोग लगे रहते हैं पर जो ब्लाग लिख रहे हैं वह कई मामलों में दूसरों की अपेक्षा अधिक जानकारी रखते हैं ऐसा मुझे लगता है। मैं तो उन ब्लाग लेखकों के बारे में सोचता हूं जो मुझे ऐसे टूल बताते हैं-और मैं उनका उपयोग करता हूं-कितनी अधिक जानकारी रखते होंगे।<br />
जब बिजली नहीं थी तो मैं अपनी डायरी लिख रहा था उसमें कई बार भिन्न भिन्न विषय लिखकर ऐसे ही लिखता हूं-हालांकि इन्हीं डायरियों में मेरे कई व्यंग्य और चिंतन लिखे पड़े हैं जिनको यहां टाईप करना आफत लगता है। वह बहुत बड़े है। आज से मैं ऐसे ही रविवार के दिन अपनी डायरी अपने ब्लाग पर लिखूं्रगा क्योंकि इसमें बिना किसी योजना लिखता हूं और यह आनंद प्रदान करती है।<br />
दीपक भारतदीप </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मौसम अच्छा हो तो घर पर ही मन जाती है पिकनिक -व्यंग्य]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=196</link>
<pubDate>Sat, 05 Jul 2008 15:16:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=196</guid>
<description><![CDATA[ अपने जीवन में मैं अनेक बार पिकनिक गया ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> अपने जीवन में मैं अनेक बार पिकनिक गया हूं पर कहीं से भी प्रसन्न मन के साथ नहीं लौटा। वजह यह कि बरसात का मौसम चाहे कितना भी सुहाना क्यों न हो अगर दोपहर में पानी नहीं बरस रहा तो विकट गर्मी और उमस अच्छे खासे आदमी  को बीमार बना देती है।<br />
वैसे अधिकतर पिकनिक के कार्यक्रम पूर्वनिर्धारित होते हैं और उनको उस समय बनाया जाता है जब बरसात हो रही होती है। जिस दिन पिकनिक होती है पता लगा कि बरसात ने मूंह फेर लिया और सूर्य नारायण भी धरती के लालों को पिकनिक बनाते हुए  देखने के लिये विराट रूप में प्रकट हो जाते हैं। वह कितने भी स्नेहपूर्ण दृष्टि से देखें पर उनका स्परूप दोपहर में विकट होता है। ऐसे में पसीने से तरबतर होते हुए जबरन खुश होने का प्रयास करना बहुत कठिन होता है।</p>
<p>आखिर मैं क्यों इन पिकनिकों पर क्या जाता हूं? होता यह है कि कई लोग तो ऐसे हैं जो वर्ष में एक बार इस बहाने मिल जाते हैं। दूसरा यह कि कई संगठनों और समूहों में मै। इस तरह  सदस्य हूं  कि हमारा पिकनिक का पैसा स्वतः ही जमा हो जाता है और भरना हो हमें होता ही है। सो चले जाते हैं<br />
अब उस दिन भाई लोग भी जबरन पिकनिक मनाते हैं। वहां साथी और मित्र  नहायेंगें, शराब पियेंगे और कभी कभार जुआ खेलेंगे। कहते यही हैं कि ‘ऐसे ही एंजोय(यही शब्द उपयोग वह करते हैं) किया जाता है।’<br />
नाश्ता और खाना होता है। नाश्ता दोपहर में तो भोजन शाम को होता है। हम तो बातचीत करते हैं पर लगता है कि ऐसी जगहों पर शराब और नहाने से परहेज होने के कारण हम अकेले पड़ जाते हैं और फिर वहां अपने जैसे ही लोगों के साथ बतियाते हैं। खाना खाकर शाम को घर लौटते हैं तो ऐसा लगता है कि स्वर्ग में लौट कर आये। आखिर अपने आपसे ही पूछते हैं कि‘ फिर हम पिकनिक मनाने गये ही क्यों थे?’</p>
<p>एक बार नहीं कई बार ऐसा हुआ हैं। इन्हीं दिनों में कई लोगों के जलाशयों में डूब जाने के समाचार आते हैं और कहीं कहीं तो चार-चार लोगों के समूह जलसमाधि ले लेते हैं और फिर उनके परिवारों का विलाप कष्टकारक होता ही। अभी तक मैं जिन पिकनिक में गया हूं वहां कहीं ऐसा हादसा नहीं हुआ पर अपने चार मित्रों की ऐसी ही हृदय विदारक घटना में जान जा चुकी है। उनको याद कर मन में खिन्नता का भाव आ जाता है। </p>
<p>यह मौसम  पिकनिक का मुझे कतई नहीं लगता पर लोग बरसात होते ही जलाशयों की तरफ देखना शूरू कर देते हैं। अक्सर सोचता हूं कि यह पिकनिक की परंपरा शूरू हुई कैसे? अगर हम अपने पुराने विद्वानों की बात माने तो उन्होंने इस मौसम में अपने मूल स्थान से की अन्यत्र जाना निषिद्ध माना है। इस नियम का पालन सामान्य आदमी ही नहीं बल्कि राजा, महाराजा और साधू संत तक करते थे। व्यापारी दूर देश में व्यापार, राजा किसी दूसरे देश पर आक्रमण और साधु संत कहीं धर्मप्रचार के लिये नहीं जाते थे। कहते हैं कि उस समय सड़कें नहीं थी इसलिये ऐसा किया जाता था पर मुझे लगता है कि यह अकेला कारण नहीं था जिसकी वजह से पारगमन को निषिद्ध किया गया। </p>
<p>इस समय आदमी मनस्थिति भी बहुत खराब होती है और सड़क कितनी भी साफ सुथरी हो उमस के माहौल में एक अजीबोगरीब बैचेनी शरीर में रहती है। बहुत पहले एक बार एक पिकनिक में मुझे एक दोस्त ने एक पैग शराब पीने को प्रेरित किया तो मैंने सोचा चलो लेते हैं।  उस दिन  मैंे नहाने की जलाशय में उतरा। मुझे तो बिल्कुल मजा नहीं आया। जब बाहर निकला तो तुरंत पसीना निकलने लगा। घर लौटते हुए ऐसा लग रहा था कि बीमार हो गया हूं।<br />
जलाशयों में उतरने पर एक तो ऊपर की गर्मी और फिर पानी के थपेड़े किसी भी स्वस्थ आदमी को विचलित कर सकते हैं यह मेरा अनुभव है पर लोगों में अति आत्मविश्वास होता है और फिर कुछ लोगों को इसका दुष्परिणाम भुगतना पड़ता है।<br />
आजकल बरसात जमकर हो रही है तो शायद कई लोगों को ऐसा नहीं लगता होगा पर अगर ठंडी हवाओं का आनंद तो कहीं भी लिया जा सकता है। उस दिन सुबह मैं योग साधना कर रहा  था तो कड़े आसनो के बाद भी मुझे पसीना नहीं आया तब मुझे आभास हुआ कि  मौसम अच्छा है। प्राणायम करते हुए नाक के द्वारा अंदर जाती शीतल हवा ऐसा सुखद आभास देती थी कि उसके भाव को व्यक्त करने के  लिये मेरे पास शब्द ही नहीं है। वैसे भी योगसाधना के समय मौसम के अच्छे बुरे होने की तरफ मेरा ध्यान कम ही जाता है।</p>
<p>वहां से निवृत होकर मैं नहाया और फिर अपने नियमित अध्यात्मिक कार्यक्रम के बाद मैंने चाय पी। उस समय घर में बिजली नहीं थी। इसलिये मैं बाहर निकला। बाहर आते ही मैंने देखा कि  आसमान में बादल थे और शीतल हवा बह रही थी। उस सुखद अनुभूति से मेरा मन खिल उठाा और  शरीर में एक प्रसन्नता के भाव का संचार हुआ। तब मैं सोच रहा था कि ‘क्या पिकनिक के लिये इससे कोई बढि़या जगह हो सकती है।’<br />
मैने साइकिल उठाई और अपने घर से थोड़ी देर एक मंदिर में पहुंच कर ध्यान लगाने लगा। मंदिर के आसपास पेड़ और पौघों की हरियाली और शीतल पवन का जो अहसास हुआ तो मुझे नहीं लगा कि कभी किसी पिकनिक में ऐसा हुआ होगा।  उसी दिन एक मित्र का फोन आया कि‘पिकनिक चलोगे?’<br />
उसने पांच दिन आगे की तारीख बताई तो मैंने उससे कहा-‘अगर मौसम अच्छा रहा तो मेरे आसपास अनेक पिकनिक मनाने वाली जगह हंै वहीं जाकर मना लूंगा और अगर उस दिन खराब रहा तो कहीं भी सुखद अहसास नहीं हो सकता। इसलिये मैं तुम्हारे साथ नहीं चल सकता।’</p>
<p>हमारे अनेक कवियों ने वर्षा पर श्रृंगाार रस से भरपूर रचनाएं कीं पर किसी ने पिकनिक का बखान नहीं किया। सच भी है कि अगर ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ ऐसे ही नहीं कहा जाता। ऐसी पिकनिक मनाने से क्या फायदा जो बाद में मानसिक संताप में बदलती हो। घर आकर यह सोचते हों कि‘आज का समय व्यर्थ ही गंवाया’। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हिंदी में प्रचलित उर्दू शब्दों का निर्णायक  कौन-आलेख]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=421</link>
<pubDate>Sat, 05 Jul 2008 13:31:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=421</guid>
<description><![CDATA[श्री अनुनाद सिंह ने मेरे आलेख पर अपनी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>श्री अनुनाद सिंह ने <a href="http://deepakraj.wordpress.com/2008/07/04/in-hindi-urdu-words-of-caution-must-use-stories/">मेरे आलेख पर</a> अपनी जो टिप्पणी दी उसने  यह लेख लिखने को प्रेरित किया। ‘एक पंक्ति’ ने भी इसी लेख पर अपनी टिप्पणी दी और मुझे बताया था कि परहेज शब्द में मैं नुक्ता लगाना भूल गया हूं। हालांकि मैंने उनको बताया कि कृतिदेव को हिंदी में बदलने वाला टूल ही इन नुक्तों को स्वीकार नहीं कर रहा है पर उनको यह बताना भूल गया कि परहेज शब्द में तो मैं वैसे भी नुक्ता नहीं लगाता।</p>
<p>पहले ‘एक पंक्ति‘ ब्लाग की बात कर लें। उनकी एक पोस्ट पर हिंदी में उर्दू के शब्दों के प्रयोग में नुक्ता लगाने का आग्रह है। मैं भी चक्कर में पड़ गया और उनको अपनी टिप्पणी में  सफाई दे आया। इसका कारण यह था कि मै सोचता था कि अगर मेरे उर्दू शब्दों के उपयोग से कोई आहत होता है तो उससे माफी मांग लो-भले ही अगली बार वही करो जो अब किया है।<br />
मेरे गुरू ने मुझसे कहा था कि-‘अपने विचार प्रवाह को लिखते हुए उसमें ‘भाषा’ को बाधा नहंी बनने देना।’<br />
मैंने अपने लेख में लिखा  था कि किस तरह मेरे आलेख पर एक उर्दू के जानकार सज्जन ने उर्दू के शब्दों में नुक्ता न लगाने पर आपत्ति जताई थी और मेरे गुरू ने उसको खारिज किया था। मेरे गुरू का मानना था कि उर्दू का कोई शब्द अगर हिंदी में प्रचलित है तो उसे केवल उर्दू का नहीं माना जा सकता क्योंकि उर्दू में कई शब्द स्थानीय बोलियों से भी गये हैं।<br />
श्री अनुनाद सिंह की टिप्पणी ने इस संबंध में मेरा रहा सहा संशय भी समाप्त कर लिया। उनकी टिप्पणी इस प्रकार है।</p>
<blockquote><p>हिन्दी में  नुक्ते का प्रयोग  एक प्रतिगामी कदम है। हिन्दी में नुक्तों का प्रयोग गलत सोच के चलते है या  तुष्टीकरण के चलते।</p>
<p>उर्दू के बारे में सर्वविदित है कि उसकी लिपि स्वयं अत्यन्त अवैज्ञानिक है - यानी लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर !  नुक्तों के प्रयोग से हिन्दी को दोहरी मार झेलनी पड़ती है - एक तो अरबी-फारसी के शब्द लेकर अपनी भाषा को कूड़ेदान  बनाओय  दूसरी नुक्ते के  प्रयोग का आग्रह।</p>
<p>कभी किसी ने पुछा है कि उर्दू वाले हिन्दी एवं अन्य भाषाओं के शब्दों को  लिखने के लिये अपनी लिपि में अतिरिक्त  वर्ण (अक्षर) क्यों नहीं  ले लेते ?  यदि ऋतु को रित, छाया को साया,  कर्म को करम लिखकर काम चला सकते हैं तो हिन्दीमें नुक्ते के बिना कौन सा आसमान टूट रहा है?</p>
<p>कोई कह सकता है  कि जरूरी है कि जो ऊर्दूवाले करें वही हम भी करें - तो उत्तर है कि बहुत जरूरी है।  इसके बिना आप हमेशा गुलाम बने रहेंगे।</p>
<p>सारे नियम गरीब और पिछड़े लोगों के लिये ही होते हैं।</p></blockquote>
<p>इस टिप्पणी से एक बात तो साफ है कि उर्दू में भी कई शब्द हिंदी से लिये गये हैं पर उसका व्याकरण नहीं लिया। बहुत ही सोच विचार कर लिखी गयी इस टिप्पणी में ऐसा कुछ ढूंढता रह गया जिससे अपनी असहमति जता पाता।<br />
मुख्य बात यह है कि हिंदी में उर्दू के ऐसे शब्द प्रचलन में आ गये हैं कि उनको अलग नहीं किया जा सकता पर क्या यह जरूरी है कि उन्हें वैसे ही स्वीकार किया जाये जैसे वह फारसी या अरबी लिपि में में लिखे जाते हैं। नहीं, मैं इस पर सहमत नहीं हो सकता क्योंकि बोली का भी अपना एक अपना महत्व होता है। अब सवाल यह है कि हिंदी में प्रचलित उर्दू शब्दों में नुक्ते लगाने का आग्रह कौन कर रहा है? यह देखना महत्वपूर्ण होता है।<br />
अगर आप हिंदी के लेखक हैं तो  आपत्ति नहीं कर सकते कि इसमें नुक्ते लगाये जायें क्योंकि हिंदी जैसी बोली जाती है वैसे लिख नहीं जाती। उर्दू में नुक्ते से वजन बढ़ाने वाला शब्द अगर हिंदी में बिना वजन के बोला और समझा जाता है तो आप यह आग्रह नहीं कर सकते कि उसमें नुक्ता हो। परहेज, जज्बात और अजीब शब्द हिंदी में इसी तरह ही बिना स्वर को प्रभावी -नुक्ता स्वर में वजन लाता है- बनाये बोले जाते हैं तो वह वैसे ही लिखे जायेंगे। यह जरूरी नहीं है कि उर्दू वाले जैसे बोलते हैं वह स्वर में भी वैसे ही प्रचलित हों।</p>
<p>अगर कोई उर्दू का लेखक है तो उसे फिर श्री अनुनाद सिंह के इस प्रश्न का जवाब भी देना होगा कि उन्होंने हिंदी के जो शब्द उठाये हैं क्या वह वैसे के वैसे ही लिये हैं। कर्म शब्द बोलते समय हम हिंदी में र को स्वर में आधा बोल जाते हैं पर उर्दू में स्वर में र पूरा बोलकर आता है यह मैंने अनुभव किया है। ऋतु को रितु बोलते भी देखा है और स्वर की भिन्नता को अनुभव किया हैं।  ऐसे में भला पर हिंदी में लिखने वालों से ऐसे सवाल क्यों?</p>
<p>कल जब मैं अपना आलेख लिख रहा  था तो शूरू से ही यह निर्णय कर लिया था कि इसमें केवल अपनी बात लिखनी है पर निष्कर्ष कोई नहीं निकालना है। वजह जब आप संशय में हों और अपनी बात कहनी भी आवश्यक लगती हो तो यही सबसे बढि़या तरीका लगता है। फिर भाषा के मामले में लोग संवेदनशील होते हैं ऐसे में कोई एक निष्कर्ष प्रस्तुत करना मतलब दूसरे के जज्बात को आहत करना होता है। हिंदी में उर्दू के शब्दों के उपयोग केा लेकर समर्थन और विरोध दोनों ही पक्षों के लोग अत्यंत संवेदनशील हैं इसलिय मैं इससे बचता हूं। श्री अनुनाद सिंह ने कृतिदेव से यूनिकोड में बदलने के टूल के निर्माण में भूमिका अदा की है पर कल पता लगा कि यूनिकोड से कृतिदेव में बदलने वाला टूल भी वह बना चुके हैं। कल मैं उनका वह टूल ले आया और आज उनके ही इस टूल से उनकी टिप्पणी कृतिदेव में बदलकर सामने ही रखकर टाईप कर रहा हूं नहीं तो पहले ईमेल खोलकर रखना पड़ता था। वह भाषा ज्ञानी है यह तो पता था पर  उनकी इस पंक्ति ‘हिन्दी में  नुक्ते का प्रयोग  एक प्रतिगामी कदम है’ ने बहुत सारा संदेश दे दिया। मतलब यह है कि नुक्ते अगर नहीं भी लगाते तो चलेगा क्योंकि कहीं न कहीं किसी स्तर पर लेखकों का एक वर्ग यह मानकर चल रहा है कि ऐसा करना स्वीकार्य हैं और हिंदी व्याकरण का इस नुक्ते से कोई लेना देना नहीं। इससे मुझ जैसे हौजपौज लेखक के लिये तो सुविधा की बात ही है क्योंकि हम कह सकते हैं कि नुक्ते लगाना हिंदी में कोई महत्वपूर्ण बात नहीं है।</p>
<p>इसके बावजूद एक बात और जा कल मैं नहीं कह पाया कि उर्दू शब्दों का नुक्ते लगाने वाला स्वर ही आप छोड़ सकते हैं पर उसके अक्षरों या मात्राओं से खिलवाड़ संभवतः हिंदी के लोग भी स्वीकार नहीं कर पायेंगे। कल अपना आलेख लिखते समय मेरे मस्तिष्क  में वह पाठ भी थे जिनमें ऐसा करने का प्रयास किया गया है। हो सकता है कि मैं गलत होऊं पर मुझे अनेक पाठों में उर्दू शब्दों का प्रयोग वैसा नहीं लगा जैसे मेरे म्िरस्तष्क में उनका रूप है। यह एक बचकाना पन लगता है और ऐसे पाठ किसी भी दृष्टि से आपको लेखकों की अग्रिम पंक्ति में नहीं बैठा सकते। उर्दू के जो शब्द हिंदी में प्रचलन में हैं लोगों को उनके अक्षर मालुम हैं भले ही सब लेखक न हों पर पाठकों एक बहुत बड़ा वर्ग उनसे परिचित है और वह उनमें तोड़फोड़ स्वीकार नहीं कर सकता। हिंदी जैसी लिखी जाती है वैसे ही बोली जाती है भले ही उसमें किसी भी भाषा का शब्द हो या बात ध्यान में रखना चाहिए।</p>
<p>निष्कर्ष यह है कि हिंदी जो बोली जा रही उसमें लिखने में कोई परेशानी नहीं है। बिल्कुल आखिरी में मेरे संस्करणों में यह बात भी आयी कि कई लेखकों को केवल इसलिये हिंदी लिखने से विरक्ति हो जाती है कि वह किताबी हिंदी न लिख पाते। फिर जब लिखते हैं और अन्य लेखकों के संपर्क में आते हैं तो वह उर्दू के लिखे शब्दों में ऐसे मीन मेख निकालते हैं या फिर उन पर आपत्ति भी करते हैं। मैंने कई ऐसे संपादकों का सामना भी किया है जो आम बोलचाल हिंदी में लिखने के कारण मुझे सािहत्य न लिखने की सलाह देते थे।  दरअसल यह कथ्य को प्रभावी ढंग से रखने वालों को हतोत्साहित करने का तरीका भी है। ऐसे में लेखकों को यही सलाह दूंगा कि वह बेहिचक लिखें। हिंदी में प्रचलित उर्दू शब्दों में अगर नुक्ता नहीं लगा पाते तो कोई बात नहीं। अगर कोई उर्दू शब्दों के लिखने पर नुक्ताचीनी करता है तो वह गलत है क्योंकि यह अभी तक तय नहीं हुआ कि ऐसे शब्द किसकी अभौतिक संपत्ति हैं। अगर वह उर्दू के हैं तो उनमें नुक्ता न होने पर उसके कैसे हो जायेंगे। अगर वह हिंदी के प्रचलित शब्द हैं तो वहां नुक्ता लग ही नहीं सकता क्योंकि इससे लिखने में सहजता का भाव नहीं होता। नुक्ता न लगने के कारण वह हिंदी की ही अभौतिक संपत्ति ही माना जाना चाहिए। बहरहाल मुझे यह लेख लिखना इसलिये ठीक लगा क्योंकि मुझे लगा कि इस बहस ने कई लोगों को हतोत्साहित किया है जिनमें मैं भी शामिल हूं। कई लोग तो केवल ऐसी आलोचना से कुंठित होकर लिखना ही छोड़ देते है।</p>
<p>          मैं कोई ब्रह्मा नहीं हूं कि मेरा विचार आखिरी है पर मैं हिंदी भाषा का एक लेखक हूं और मेरा यह आलेख उसी भाषा की संपत्ति है। साथ ही जो हिंदी भाषा के लेखक उर्दू के जानकार हैं वह किसी दूसरे द्वारा नुक्ता न लगाने पर अपनी नाराजगी न जतायें यह सलाह भी दूंगा हालांकि वह आग्रह कर सकते हैं पर उन्हें उन ऐसा करते हुए हिंदी में उर्दू के प्रचारक की तरह कार्य नहीं करना चाहिए। सच तो यह कल टिप्पणियां लिखने वाले सभी लोग मेरे मित्र है और इस तरह की चर्चाओं से कुछ नया निकलेगा यह आशा मैं करता हूं।<br />
साथ ही मेरा विनम्र आग्रह है कि वाद-विवाद या बहस कितनी भी जोरदार हो पर आपस में कटुता मन में बिल्कुल न लायें क्योंकि इसमें अपने अल्पज्ञानी होने की अनुभूति लोगों को हो सकती है। </p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[क्या प्रसिद्धि पाने का विचार बुरा है-इस पत्रिका का द्वितीय अंक]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/?p=158</link>
<pubDate>Sat, 05 Jul 2008 06:40:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/?p=158</guid>
<description><![CDATA[जब आप किसी ऐसे विषय पर लिखते हैं जिसका ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जब आप किसी ऐसे विषय पर लिखते हैं जिसका संबंध लेखकों से होता है तो उसकी प्रतिक्रिया जन सामान्य में कम होने के बावजूद अधिक प्रतिध्वनित होती है। ऐसे विषयों पर चूंकि लेखक ही अपनी प्रतिक्रिया देते हैं तो संख्या कम होने के बावजूद उनमें वजन अधिक  होता और जन सामान्य तो स्वयं प्रभावित होने के बावजूद मुखर होकर  अपनी प्रतिक्रिया नहीं देता इसलिये उसकी प्रतिध्वनि का सुनाई देती है।</p>
<p>कल मेरे द्वारा लिखे गये एक लेख<a href="http://deepakraj.wordpress.com/2008/07/04/in-hindi-urdu-words-of-caution-must-use-stories/">-जो हिंदी में उर्दू शब्दों के उपयोग को लेकर था</a>-पर प्रतिक्रियायें आयीं वह ऐसे ब्लाग लेखकों की आयी जो वाकई गंभीर लेखक हैं और इसलिये मैंने अपने अंदर उनकी प्रतिध्वनि अधिक महसूस की। ऐसी बहसें तो कई बरसों से चल रहीं हैं पर निष्कर्ष निकलना कठिन होता है पर इससे लिखने वाले अपनी भाषा पर नियंत्रण रखने का मन बनाते हैं इसलिये भाषा के मूल स्वभाव बने रहने की आशा पैदा होती है।<br />
साहित्य में ऐसी बहसें भले ही निर्णायक न हों पर वह भाषा का स्तर बनाये रखने में सहायक होती हैं पर अन्य क्षेत्रों में ऐसी बहसें केवल मुद्दे बनाये रखने के लिये होती हैं और उनका कोई निष्कर्ष इसलिये नहीं निकाला जाता क्योकि बहस करने वालों की रुचि लोगों को उसमें उलझाकर अपने हित साधने होते हें। मेरा इसी सप्ताह लिखा गया एक लेख-<a href="http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/07/04/written-on-the-subjects-of-politics-is-quickly-losing-its-influence-stories/">जिसमें मैंने राजनीतिक विषयों पर लिखने के कारण बताये थे</a>-फ्लाप हो गया। उसी तरह एक अन्य लेख-<a href="http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/07/05/the-difference-in-terms-of-great-scholars-stories/">जो मैंने ऐसे ही भेदात्मक दृष्टि वाले विद्वानों पर लिखा था</a> -उसे भी अधिक समर्थन नहीं मिला। मुझे भी लग रहा है कि वह हिट होने लायक नहीं था।<br />
मेरे एक मित्र श्री ललितमोहन त्रिवेदी ने ब्लाग लिखना शूरू किया। उस पर मैंने एक <a href="http://dpkraj.blogspot.com/2008/06/blog-post_29.html">समीक्षा लिखी</a> जिसे वाकई मैंने दिल से लिखा है।<br />
वैसे इस सप्ताह कोई बहुत जोरदार हिट पाठ नहीं आया। पुराने हिट पर ही नाम चल रहा है और अमेरिका-भारत संबंधों पर लिखा गया एक लेख अभी तक लोगों को पढ़ता हुआ देख अच्छा लग रहा है वह आज भी प्रासंगिक है यही कारण है कि मैंने अभी तक इस पर कुछ नहंी लिखा।<br />
इस बार दो व्यंग्य अच्छे लिखे पर वह भी फ्लाप रहे पर आगे पाठक उसे आम पाठक हिट बनायेंगे। एक तो था <a href="http://rajlekh.wordpress.com/2008/07/02/mud-on-the-fly-no-thought-was-sweet-will-comic-satire/">कीचड़ उछालने पर मिठाई मिलने पर</a>, दूसरा था <a href="http://deepakraj.wordpress.com/2008/06/26/it-is-satire-a-sort-of-ad-comic-satire/">व्यंग्य को विज्ञापन की तरह सजाने का</a>। इन दोनों को आगे पाठक हिट बनायेंगे इसमें कोई संशय नहीं है।<br />
कुछ कवितायें लिखीं। इनमें कुछ संजीदा थीं तो कुछ हास्य से सराबोर। थोड़े बहुत हिट लेकर मैं संतुष्ट था। आखिर मुझ जैसे लेखक को इससे अधिक हिट मिल भी कहां सकते है।<br />
कुल मिलाकर यह सप्ताह ठीक ठाक ही रहा। अब इस पत्रिका को बहुत गंभीरता से लिखने का विचार बना रहा हूं क्योंकि यहां अंतर्जाल पर मुझे कोई घास भी नहीं डाल रहा। लोग सम्मान तो देंगे नहीं, इसलिये मैंने महाकवि की उपाधि स्वयं ही धारण कर ली। इस पर लिखी कविता पर मेरे एक मित्र की टिप्पणी थी कि‘ अरे, नहीं आप अकेले नहीं। यह पदवी धारण करने वाले’। वह स्वयं भी इसमें शामिल हैं यह बात मुझे मालुम हैं पर स्वयं डरेंगे क्योंकि वह इस अंतर्जाल पर हिंदी के प्रसिद्ध ब्लाग लेखक बन चुके हैं पर हमें तो फोरमों पर अधिक लोग पढ़ते नहीं और आम पाठक कौन हमसे कहने वाला है कि आपने हमसे पूछ बगैर यह उपाधि क्यों धारण कर ली। बहुत समय तक लेखक के रूप में लिखते रहने के बाद मुझे प्रसिद्धि नहीं मिली तो हो सकता है कि संपादक  के रूप में मिल जाये। क्या प्रसिद्धि पाने का विचार कोई बुरा है? मेरे ख्याल से तो नहीं!<br />
--------------------------------------------------------------------</p>
<p><strong>अपनी कुछ कवितायें यहां प्रस्तुत कर रहा हूं<br />
दीपक भारतदीप</strong></p>
<p>बेजान पत्थरों में ढूंढते हैं आसरा<br />
फिर भी नहीं जिंदगी में मसले हल नहीं होते<br />
कोई हमसफर नहीं होता इस जिंदगी में<br />
अपने दिल की तसल्ली के लिये<br />
हमदर्दों की टोली होने का भ्रम ढोते<br />
सभी जानते हैं यह सच कि<br />
अकेले ही चलना है सभी जगह<br />
पर रिश्तों के साथ होने का<br />
जबरन दिल को अहसास करा रहे होते<br />
कहें महाकवि दीपक बापू<br />
क्यों नहीं कर लेते अपने अंदर बैठे<br />
शख्स से दोस्ती<br />
जिससे हमेशा दूर होते<br />
वह तुम ही होते</p>
<p>-----------------<br />
इश्क में भी अब आ गया है इंकलाब<br />
हसीनाएं ढूंढती है अपने लिए कोई<br />
बड़ी नौकरी वाला साहब<br />
छोटे काम वाले देखते रहते हैं<br />
बस माशुका पाने का ख्वाब</p>
<p>वह दिन गये जब<br />
बगीचों में आशिक और हसीना<br />
चले जाते थे<br />
अपने घर की छत पर ही<br />
इशारों ही इशारों में प्यार जताते थे<br />
अब तो मोबाइल और इंटरनेट चाट<br />
पर ही चलता है इश्क का काम<br />
कौन कहता है<br />
इश्क और मुश्क छिपाये नहीं छिपते<br />
मुश्क वाले तो वैसे हुए लापता<br />
इश्क हवा में उडता है अदृश्य जनाब<br />
जाकर कौन देख सकता है<br />
जब करने वाले ही नहीं देख पाते<br />
चालीस का छोकरा अटठारह की छोकरी को<br />
फंसा लेता है अपने जाल में<br />
किसी दूसरे की फोटो दिखाकर<br />
सुनाता है माशुका को दूसरे से गीत लिखाकर<br />
मोहब्बत तो बस नाम है<br />
नाम दिल का है<br />
सवाल तो बाजार से खरीदे उपहार और<br />
होटल में खाने के बिल का है<br />
बेमेल रिश्ते पर पहले माता पिता<br />
होते थे बदनाम<br />
अब तो लडकियां खुद ही फंस रही सरेआम<br />
लड़कों को तो कुछ नहीं बिगड़ता<br />
कई लड़कियों की हो गयी है जिंदगी खराब<br />
------------------------------</p>
<p>यूं तुम अपने लिये<br />
कुछ भी मांग लिया करो<br />
सिवाय प्यार के<br />
क्योंकि यह मांगने की नहीं<br />
अहसास कराने की शय है<br />
अगर होती किसी के लिये दिल में जगह कही<br />
आंखों से जाहिर हो जाता है<br />
जिनके दर्द से आंखों में आंसू आयें नहीं<br />
जिनकी खुशी पर होंठ मुस्कराये नहीं<br />
लफ्जों में चाहे कितनी भी जतायें<br />
झूठी हमदर्दी का बयां जगजाहिर हो जाता है<br />
किसी के दिल में लिखा कौन पढ़ पाया<br />
लफ्जों के मतलब गहरे हैं या उथले<br />
सुरों की धारा से पता चल जाता<br />
चाहे जितनी भी कोशिश कर लो<br />
जब तक दिल में है<br />
प्यार को सलामत समझ लो<br />
जो जुबां से निकला तो कभी कभी<br />
वहां से भी बाहर हो जाता है<br />
फिर लौटकर नहीं आता<br />
अहसास भी बदन से निकल कर<br />
बाहर बदहाल हो जाता है<br />
प्यार है वह अहसास जो बस किया जाता है<br />
........................................<br />
गीत और संगीत से<br />
दिल मिल जाते हैं पर<br />
अब तो उसकी परख के लिये<br />
प्रतियोगितायें को अब वह<br />
महायुद्ध कहकर जमकर प्रचार कराते<br />
वाद्ययंत्र हथियारों की तरह सजाये जाते<br />
जिन सुरों से खिलना चाहिये मन<br />
उससे हमले कराये जाते<br />
मद्धिम संगीत और गीत से<br />
तन्मय होने की चाहत है जिनके ख्याल में<br />
उन पर शोर के बादल बरसाये जाते</p>
<p>कहें महाकवि दीपक बापू<br />
‘अब गीत और संगीत<br />
में लयताल कहां ढूंढे<br />
बाजार में तो ताल ठोंककर बजाये जाते<br />
महफिलें तो बस नाम है<br />
श्रोता तो वहां भाड़े के स</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्या फायदा विषय का पहाड़ खोदने से-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=195</link>
<pubDate>Fri, 04 Jul 2008 14:15:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=195</guid>
<description><![CDATA[
समाज के शिखर पर बैठे लोग
हांकते हैं ऐस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
समाज के शिखर पर बैठे लोग<br />
हांकते हैं ऐसे आदमी को<br />
जैसे भेड़-बकरी हों<br />
जो न बोले<br />
न कहे<br />
न देखे<br />
उनके काले कारनामें दिन के उजाले में भी<br />
अपने डंडे के जोर पर चलता उनका फरमान<br />
टूट जाये चाहे किसी का भी अरमान<br />
उन पर कोई नहीं उठाता उंगली<br />
फिर भी समाज की गलियों में<br />
गोल-गोल घूमता है<br />
चाहे वह कितनी भी संकरी हों<br />
........................................................</p>
<p>अब तो मुद्दे जमीन पर नहीं बनते<br />
हवा में लहराये जाते<br />
राई से विषय पहाड़ बताये जाते<br />
मसले अंदर कमरे में कुछ और होते<br />
बाहर कुछ और बताये जाते<br />
चर्चा होती रहे पब्लिक में<br />
पर समझ में न आये किसी के<br />
ऐसे ही विषय उड़ाये जाते </p>
<p>कहें महाकवि दीपक बापू<br />
‘कई बार विषयों का पहाड़ खोदा<br />
कविता जैसी निकली चुहिया<br />
भाई लोग उस पर हंसी उड़ाये जाते<br />
बहुत ढूंढा पढ़ने को मिला नहीं<br />
होती कहीं कोई व्यापार की डील<br />
करता कोई तो कोई और लगाता सील<br />
कुछ को होता  गुड फील<br />
तो किसी को  लगती  पांव में कील है<br />
कोई समझा देता तो<br />
न लिखने का होता गिला नहीं<br />
कोई खोजी पत्रकार नहीं<br />
जैसा मिला वैसा ही चाप (छाप) दें<br />
हम तो खोदी ब्लागर ठहरे<br />
विषयों का पहाड़ खोदते पाताल तक पहुंच जाते<br />
कोई जोरदार पाठ बनाये जाते<br />
पर पहले कुछ  बताता<br />
या फिर हमारे समझ में आता<br />
तो कुछ लिख पाते<br />
इसलिये केवल हास्य कविता ही लिखते जाते<br />
क्या फायदा विषय का पहाड़ खोदने से<br />
जब केवल निकले चुहिया<br />
उसे भी हम पकड़ नहीं पाते<br />
....................................<br />
दीपक भारतदीप </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हिंदी में उर्दू शब्दों के उपयोग पर सावधानी जरूरी-आलेख]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=420</link>
<pubDate>Fri, 04 Jul 2008 13:34:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=420</guid>
<description><![CDATA[हिंदी भाषा में उर्दू के शब्दों का प्रय]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हिंदी भाषा में उर्दू के शब्दों का प्रयोग इतना आम है कि लोग हिंदी व उर्दू के शब्दों के अंतर का ध्यान नहीं रखते और एक अपनी बात में दोनों के शब्द इस्तेमाल करते हैं। कमोबेश यही हाल हिंदी के अनेक लेखकों और कवियों का है-जिनमें मैं स्वयं भी शामिल हूं।<br />
जैसे मैं यह कहता हूं कि‘कोई काम शुरू किये बिना उसके परिणाम पर विचार नहीं किया जा सकता है। पहले कोई कार्य प्रारंभ किया तो जाये उससे पहले क्या सोचना।’<br />
अब इनमें उर्दू भी है और हिंदी भी। इसे हम बोली कहते हैं और इसका धड़ल्ले से उपयोग होता है। मेरी शिक्षा हिंदी में हुई है और इसी दौरान संस्कृत भी पढ़ा हूं। इसलिये हिंदी का कोई भी शब्द पढ़ने में कठिनाई नहीं होती पर जब लिखना प्रारंभ किया तो इस बात का ध्यान नहीं रखा कि शब्दों का चयन पूर्णतः हिंदी से किया जाये। इसलिये बोलचाल की भाषा ही लिखने की भाषा बनती गयी। बाद में कभी कभार मैंने इस बात का प्रयास किया कि अधिकतम हिंदी शब्दों का उपयोग किया जाये तो अनुभव हुआ कि उससे मेरा कथ्य प्रभावित होता है। हां, तमाम तरह के विवादों को पढ़कर अक्सर यह सोचता था कि मैं तो कभी ऐसा लिख ही नहीं पाऊंगा।<br />
मेरी जीवन की शुरूआत 2 एक पत्रकार के रूप में ही हुई थी और मैंने एक दिन अपना एक छोटा लेख लिखा और अपने गुरू जी-जो पत्रकार थे और बाद में मैं उनको अपने जीवन का गुरू भी मानने लगा-को दिखाया तो उन्होंने उसे छपने के लिये फोटो कंपोजिंग में ले जाने को कहा। उस समय मैं अपने लेख टाईप भी स्वयं  ही करता था। वहां उनसे कनिष्ठ पत्रकार ने मुझे वह लेख दिखाने को कहा। मैंने उसे दिखाया तो उसने मेरे कई शब्दों पर लाल स्याही फेर दी और कहा-‘तुम अपने लेखों में उर्दू शब्दो को शामिल करते हो पर तुम्हें उनके बारे में पता नहीं लिखा कैसे जाता है। कई शब्दों में नुक्ता (नीचे बिंदी) लगती है पर तुमने नहीं लगायी।’</p>
<p>मैं चुपचाप खड़ा रहा क्योंकि उस समय मुझे इतनी समझ भी नहीं थी कि किसी बात का प्रतिवाद कर सकूं-उन लोगों के सामने तो एक तरह से बच्चा ही था। मेरे गुरूजी ने मुझे बुलाया और वह कागज लेकर उसकी लाल स्याही पर अपनी नीली स्याही फेर दी और कहा-‘जाओ, तुम अपना टाईप करो।’<br />
 वह महाशय उर्दू पढ़े हुए थे इसलिये उनको उसकी अच्छी जानकारी थी वह उनसे बोले-‘बाबूजी, यह शब्द गलत है।’<br />
हमारे गूरूजी ने कहा-’वह शब्द तो लिख कर बताओ।’<br />
उन्होंने पास ही पड़े कागज पर सभी शब्द लिख कर दिखाये तो हमारे गुरूजी ने कहा-‘इसे तुम अपनी लिपि में लिखो। यह तो देवनागरी में लिखा है।’<br />
उसने कहा-‘तो क्या हुआ।’<br />
हमारे गुरूजी ने कहा-‘यह नुक्ता फारसी में लगता है, पर कई शब्द ऐसे हैं जो हिंदी भाषा में प्रयोग में लाये जाते है उनको इस तरह लिखना ही पड़ेगा। वह बोलचाल में हैं न कि हिंदी साहित्य में इसको पढ़ाया गया है। पर अब लिखे जा रहे हैं तो किसी को रोकने का मतलब है कि उसे स्वाभाविक रूप से लिखने से रोकना।’<br />
उन दोनों में इस विषय पर बहस चलती रही और मैं अंदर जाकर अपना लेखक टाईप करने लगा। उर्दू को अदब की भाषा कहा जाता है और उसमें कई शब्दों में नुक्ता लगता है यह मुझे पता है पर वह शब्द मुझे आसानी से याद नहीं रहते। मुझे याद आ रहा है कि किसी ने मुझसे कहा था कि उर्दू भाषा में जिन शब्दों का वजन अधिक होता है उनमें ही यह नुक्ता लगता है। शायद उसने जज्बात या जजबात, गजब और अजब जैसे शब्द बताये थे। मेरे मन में तब से उर्दू शब्दों को लेकर संशय बना रहता है कि कोई टोक न दे। इसके बावजूद उर्दू के अनेक शब्द उपयोग करने के मामले में चूकता नहीं हूं। अलफाज और लफ्ज जैसे शब्द उपयोग करता हूं पर पता नहीं उनमें नुक्ता कहां आता है।<br />
कई बार दूसरे लोगों से भी मेरी उर्दू भाषा के शब्दों के उपयोग पर बहस हो जाती है। कई लोग ऐसे  शब्दों का उपयोग करते हैं जो मुझे लगता है कि वह उर्दू के नहीं हो सकते। जैसे एक ने लफ्ज की लब्ज शब्द उपयोग किया। मुझे लगा कि वह गलत है, पर एक ने कहा वह सही है। कुल मिलाकर उर्दू की हालत भी हिंदी जैसी है। फिर भी हिंदी के किसी शब्द के उपयोग पर संशय होने पर किसी अपने साथी से पूछ सकता हूं पर उर्दू में यह संशय दूर करने के लिये कोई नहीं मिलता। इसके बावजूद हिंदी में कई विद्वानों के आलेख पढ़कर उसमें प्रयोग किये गये कठिन उर्दू शब्दों को ध्यान से पढ़कर अपने मस्तिष्क में रख लेता हूं ताकि अगर कभी उसका उपयोग करूं तो वह गलत न हो। इस कारण उर्दू के अनेक शब्दों का ज्ञान हो गया है। इसलिये आजकल अनेक लोग जिस तरह उर्दू शब्दों का उपयोग कर रहे हैं वह मेरी समझ से परे हैं।<br />
अनेक ब्लाग लेखक अपनी कविताओं और गजलों में उर्दू शब्दों के उपयोग में बिल्कुल सतर्कता नहीं दिखा रहे। मैं जजबात ऐसे लिखता था पर आजकल जज्बात ऐसे लिखता हूं। कई लोगों का ऐसा उपयोग देखा तो लगा शायद यही सही हो। यानि संशय से पूरी तरह मैं भी उबर नहीं पाया। इसके बावजूद मुझे लगता है कि उर्दू के सही शब्द उपयोग करना किसी को नहीं आता। ऐसे में अक्सर सोचता हूं कि जितना हो सके उर्दू शब्द के उपयोग से बचा जाये अच्छा रहेगा।<br />
अनेक ब्लाग लेखक इसे कट्टरतावादी रवैया मान सकते हैं पर मेरा मंतव्य है कि आम पाठक की दृष्टि से ही हमें लिखना चाहिए। मैं जब लिखता हूं तो स्वाभाविक रूप से लिखता हूं और कोई कम अप्रचलित उर्दू शब्द अगर मेरे दिमाग में आता है तो उसे पहले तो लिख लेता हूं पर बाद में संपादन के समय उससे संतुष्ट न होने पर हटा देता हूं यानि अपने अंदर के विचार प्रवाह को अपने मस्तिष्क में अवरुद्ध नहीं होने देता। यह एक निश्चित बात है कि भाषा और बोलियां स्वाभाविक रूप से अपने स्थान बनाती और त्यागती हैं। चंद लेखकों के लिखे से उनका कोई प्रभाव नहीं होता पर ब्लाग लेखकों में कुछ लोग भाषा की शक्ति का समझे बिना अपनी तरफ से अन्य भाषाओं के शब्दों के प्रयोग पर जिस तरह जोर दे रहे है जैसे वह भाषा के लिये कोई बहुत अधिक काम करने जा रहे हैं। उनके इस उद्देश्य में सफलता संदिग्ध हो जाती है।<br />
मेरे से जिस उर्दू के जानकार ने अपने शब्द लेख से हटाने के लिये कहा था वह कहीं उर्दू अखबार से जुड़े थे। उन्होंने बाद में कहा था कि‘तुम अगर कोई हिंदी में गजल लिखोगे तो उसका तर्जूमा मैं उर्दू में छाप सकता हूं पर अगर तुमने उसमें उर्दू शब्द का गलत उपयोग किया होगा तो यह संभव नहीं है। वैसे तुमने ठीकठाक ही इस्तेमाल किया लोग तो इससे भी बुरा करते हैं। लोग अनावश्यक रूप से उर्दू शब्दों का उपयोग कर अपने आपको बहुत ऊंचा समझते हैं पर वह नहीं जानते कि उनकी हंसी उड़ायी जाती है।’<br />
मैंने ब्लाग पर कई बार ऐसे कठिन उर्दू शब्दों का उपयोग देखा है जिनके बारे में मेरा विश्वास है कि वह गलत हैं। ऐसे में वहां  कोई टिप्पणी भी नहीं कर सकता। एक तो मैं स्वयं ही अपने अंदर विश्वास नहीं स्थापित करता दूसरा यह कि कोई भी कह सकता है कि यही इस्तेमाल होता है आप गलत हैं।<br />
एक बात तय है कि अगर हम अपनी भाषा संबंधी त्रुटियों पर ध्यान नहीं देंगे तो आगे आने वाली चुनौतियों का सामना नहीं कर पायेंगे। सामने कोई नहीं कहे पर पीठ पीछे कोई भी कह सकता है कि ‘वह तो बचकाना लिखता है’। यह टिप्पणी आपके प्रभावी कथ्य को भी कमतर बना सकती है। ऐसे में हिंदी भाषा में उर्दू शब्दों का उपयोग स्वयं संतुष्ट होने पर ही करें। लिखते समय लिख जायें पर संपादन के समय उस विचार करें। यह साफ कर दूं कि मैं अपने पाठों में उर्दू शब्दों के प्रयोग से रोक नहीं रहा बल्कि उनके गलत लिखने पर ही अपनी बात रख रहा हूं। हालांकि मैं स्वयं भी उर्दू शब्दों का उपयोग करता हूं और उससे मुझे कोई परहेज नहीं है। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भेदात्मक दृष्टि वाले विद्वानों की बहुतायत-आलेख]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=548</link>
<pubDate>Fri, 04 Jul 2008 13:04:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=548</guid>
<description><![CDATA[भारत में कदम कदम पर विद्वान मिल जायेंग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>भारत में कदम कदम पर विद्वान मिल जायेंगे। अगर देखा जाये तो हर तीसरे आदमी को अपना ज्ञान बघारने की आदत होती है। फिर अब तो अंग्रेजी से पढ़े लिखे लोगों का कहना ही क्या? यहां भाषा का ऐसा कबाड़ा हुआ है कि हिंदी वाले ही सही शुद्ध हिंदी नहीं समझ पाते और इसलिये अंग्रेजी वालों का भाव अधिक बढ़ा ही रहता है। ऐसे में उनको अपने ज्ञान के अंतिम होने का आभास-जिसे भ्रम भी कहा जा सकता है-कि अपने विचार के प्रतिवाद करने पर हायतौबा मचा देते हैं। ऐसे में मेरा कई ऐसे विद्वानों से वास्ता पढ़ता है जो अपनी बात को अंतिम कहते हैं और  सिर हिलाकर सहमति देता हूं। अगर  देखता हूं कि वह सहनशील है तो प्रतिवाद करता हूं हालांकि यह भी एक बात है कि जो वास्तव में जो ज्ञानी होते है वह गलत प्रतिवाद पर भी उत्तेजित नहीं हेाते। </p>
<p>जीवन में कई बार ऐसा अवसर आता है जब हमें दूसरे से विचार या ज्ञान लेने की आवश्यकता पड़ जाती है। ऐसे में संबंधित विषय की जानकारी रखने वाले की शरण लेने में कोई संकोच भी नहीं करना चाहिए। मुश्किल तब आती है जब हम ज्ञानी समझकर किसी के पास जाते हैं और वह अल्पज्ञानी होता है। हम उसकी राय से सहमत नहीं होते  तो वह उग्र हो जाता है‘-तुम मेरे पास आये ही क्यों?’<br />
फिर अंग्रेजों ने इस देश में अनेक विभाजन स्थापित कर दिये। चाहे<br />
वह समाज हो या शिक्षा सभी क्षेत्रों के अलग अलग स्वरूप कर दिये। उनको इस देश पर राज्य करना था इसलिये फूट डालो और राज्य करो की नीति अपनाई तो शिक्षा में भी अलग-अलग विषय स्थापित किये। अर्थशास्त्र, समाज शास्त्र, हिंदी, राजनीति शास्त्र, विज्ञान, और दर्शनशास्त्र जैसे विषयों में शिक्षा का विभाजन कर इस देश में अधिकाधिक विद्वानों का अस्तित्व बनाये रखने का मार्ग प्रशस्त किया ताकि विवाद खड़े होते रहें पर समाधान न हो।  वैसे अर्थशास्त्र में दर्शनशास्त्र को छोड़कर सारे शास्त्रों का अध्ययन किया जाता है-इसमें भारत के प्राचीन शास्त्र शामिल नहीं है। इस शिक्षा पद्धति से विद्वानों के झुंड के झंड इस देश में पैदा हो गये और आजकल सभी जगह बहसों में उन विद्वानों को बुलाया जाता है जो कहीं अपनी ख्याति अपनी शिक्षा की बजाय अपने धन, पद, और प्रतिष्ठा के कारण अर्जित कर चुके होते हैं। </p>
<p>अब विद्वानों की बात करें तो अर्थशास्त्र के विद्वान केवल अर्थ के धन और ऋण से अधिक नहीं जानते। वह मांग और आपूर्ति की बात करते हैं वह विश्व बाजार में से अपने देश के बाजार की तुलना करते  हैं पर कभी अपने समाज के बारे में वह नहीं बोलते। समाज के नियमित क्रिया कलापों का किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ता पर किसी अर्थशास्त्री को उसका जिक्र करते हुए नहीं देखते होंगे। अर्थशास्त्र के अध्ययन में भारत के पिछड़े होने का कारण यहां के लोगों के अंधविश्वास और रूढियों को भी बताया जाता है। सगाई शादी और मृत्यु  के अवसर पर उनके द्वारा दिखावे के लिये धन व्यय करना गांवों में गरीबी का एक बहुत बड़ा कारण माना जाता है। इसके लिये लोग अपनी जमीन गिरवी रखकर सगाई, शादी और  मुत्यु के अवसर पर समाज में अपनी साख बनाये रखने के लिये भोज का आयोजन करते हैं और कई लोग तो इतना कर्जा लेते हैं कि उनकी पीढि़यां भी उबर नहीं पाती। पहले भारत के किसान साहूकारों से कर्जा लेते थे और उनकी ब्याज दर बहुत अधिक होती थी। आजकल कई जगह बैंकों से भी कर्जा दिया जाने लगा है पर वह धन वास्तव में कृषि पर होता है या अनुत्पादक कार्यों-जैसा सगाई, शादी या मुत्यु भोज- पर  इस कोई चर्चा नहीं करता। आपने कई जगह किसानों द्वारा आत्महत्या की बात सुनी होगी। नित-प्रतिदिन ऐसी घटनायें प्रचार माध्यमों से आती हैं। आखिर वह किसके कर्ज से त्रस्त हो कर आत्म हत्या कर रहे हैं और वह कर्ज किस काम के लिये लिया और किस काम पर किया-यह कभी चर्चा का विषय नहीं बनता। अर्थशास्त्र के विद्वान तो समाज शास्त्र का मुद्दा होने के कारण इस पर प्रकाश नहीं डालते और समाज शास्त्री अर्थशास्त्र का विषय मानकर मूंह फेर जाते हैं। वर्तमान में पश्चिमी प्रभावित संस्कृति ने जिस तरह इस देश में पांव फैलाये हैं और भौतिकता के  प्रति लोगों का रुझान बढ़ा है उससे समाज में तमाम तरह के आर्थिक तनाव है पर यह बात कोई नहीं लिखता।<br />
मैंने इस पर अनेक लंबी चैड़ी बहसें सुनी हैं पर यह सच्चाई सामने नहीं आ पाती कि आखिर किसानों के कर्ज के  आत्महत्या के मूल में कारण क्या है? क्या किसी समाज शास्त्र ने इस पर अपना विचार रखा है। यह एक चिंता का विषय है। यह आत्महत्यायें देश के लिये शर्म की बात है पर हमारे अर्थ और समाज शास्त्री इसके मूल कारणों पर प्रकाश डालने की बजाय ऐसी बहसों में ही लगे रहते हैं जिनका कोई हल नहीं निकलाता।<br />
  अर्थशास्त्र में यह भी पढ़ाया जाता है कि यहां रूढि़वादिता है। अगर किसी किसान के छह बेटे हैं तो उसके बाद उसकी जमीन के छह विभाजन हो जाते हैं और यह विभाजन आगे बढ़ता जाता है और धीरे-धीरे कृषि योग्य जमीन कम होती जाती है। जनसंख्या वृद्धि के चलते यह समस्या बढ़ती जाती है और इसका अंत भी अभी तो नजर नहीं आता। देश के अर्थशास्त्री विश्व बाजार में उथल पुथल के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की बात तो करते हैं जो कि जो केवल औद्योगिक क्षेत्र पर ही पड़ता है। भारत की अर्थव्यवस्था आज भी कृषि प्रधान है और उसके साथ ऐसी समस्यायें जो अन्य देशों में कम ही पायी जातीं है-जिनका निराकरण केवल कर्जे माफी से नहीं बल्कि देश में रूढि़वादिता के विरुद्ध लोगों में जागृति कर ही लाया जा सकता है।<br />
किसान-उद्योगपति, मजदूर-मालिक, स्त्री-पुरुष, जवान बालक-वृद्ध और अधिकारी-कर्मचारी जैसे भेद  कर सब पर अलग-अलग चर्चा करते हुए ढेर सारे विद्वानों के तर्क सुनिये और फिर भूल जाईये। कोई घटना हो तो तैयार हो जाईये प्रचार माध्यमों पर फिर वही बहस सुनने के लिये।<br />
बहसें भी ऐसी होती हैं कि किसान, मजदूर, स्त्री, बालक-वृद्ध के कल्याण पर ऐसे तर्क सुनाये जाते हैं कि दिल खुश हो जाता है। उद्योगपति, मालिक, पुरुष  और जवान की जैसे कोई समस्या नहीं है जबकि यह अभी तक इस भारतीय समाज में अपनी सक्रियता के कारण प्रभाव बनाये हुए हैं।<br />
आखिर यह समझ में नहीं आता कि इतनी सारी बहसें होने के बावजूद कोई निष्कर्ष क्यों नहीं स्थापित हो पाता है। कुछ लोग कहते हैं कि अगर निष्कर्ष निकलने लगे तो फिर बहस के लिये बच क्या जायेगा? अर्थशास्त्र में मनोविज्ञान का  अध्ययन  किया जाता है जो कि सारे शास्त्रों का आधार स्तंभ होता है पर विद्वान लोग इस पर कभी चर्चा नहीं करते। वैसे मैंने मनोविज्ञान नहीं पढ़ा पर अपने मन को एक दृष्टा की तरह उसके उतार चढ़ाव देखकर कई अनुभूतियां होती हैं उस पर कविता और आलेख लिखता हूं। इसलिये मैं कभी भेदात्मक दृष्टि से कहीं नहीं देखता।<br />
ऐसा अनेक बार होता है कि कहीं दो समुदायों में दंगे होते हैं तो वहां पर कुछ सज्जन लोग दूसरे समुदाय वाले को न बल्कि बचाते हैं बल्कि उसकी अन्य प्रकार से सहायता भी करते हैं। वह लोग प्रशंसनीय हैं पर देखने वाले लोग इसमें भी भेद देखते हुए उसकी कहानी बयान इस तरह बताते हैं कि जैसे कोई अस्वाभाविक बात हुई हो। तमाम तरह के कसीदे पढ़े जाते हैं और बताया जाता है कि ऐसे में भी कुछ लोग हैं जो दुर्भावना में नहीं बहते। </p>
<p>आप जरा इस पर गहराई से दृष्टि डालें तो यह समझ में आयेगा कि मनुष्य का मन ही उसे ऐसे काम के लिये प्रेरित करता हैं हर मनुष्य में क्रूरता और उदारता का भाव होता है। कुछ लोगों में जब क्रूरता का भाव पैदा होता है तो कुछ में दया भाव भी होता है। अगर कहीं कोई मनुष्य तकलीफ में है तो और इधर उधर कातर भाव से देखता है तो उसकी भाषा न जानने वाला व्यक्ति सामथर्य होने पर उसकी सहायता करता हैं-कोई भी मनुष्य अपने पास पानी या भोजन होने पर किसी को प्यासा या भूखा करने नहीं दे सकता क्योंकि उसका मन नहीं मानता। अगर किसी व्यक्ति को किन्हीं व्यक्तियों से खतरा उत्पन्न हो गया है तो उसके निकट उस समय मौजूद कोई अनजान आदमी भी उसे छिपा सकता है क्योंकि किसी आदमी को संकट में फंसे होने पर मूंह फेरने के  लिये उसका मन नहीं मानता। यह मन है जो मनुष्य को चलाता है मगर देखने और सुनने वाले भी उसमें धर्म, जाति और भाषा के भेद कर उस पर लिखते हैं और वाहवाही बटोरते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि अगर कोई मनुष्य किसी की सहायता करता है तो वह उसकी प्रकृति न कि उसे जाति, धर्म या प्रदेश से जोड़ना चाहिये। </p>
<p>वाद और नारों पर बनी अनेक विचाराधाराओं के मानने वाले विद्वान इस देश में हैं और वह अपनी भेदात्मक बुद्धि के कारण विश्व में कोई सम्मान नहीं बना पाये उल्टे वह विदेशी विद्वानों के कथनों को यहां लिखकर ऐसे दिखाते हैं जैसे तीर मार लिया हो। अगर आप देखें तो निश्चयात्मक और भेद रहित होकर संत कबीर, रहीम और तुलसी ने पूरे विश्व में ख्याति अर्जित की और अब तो विदेशों में भी उनकी लोकप्रियता बढ़ रही है। मूर्धन्य हिंदी साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद ने भी इसी मार्ग का अनुसरण किया और इसलिये उनको पूरे विश्व में ख्याति मिली। बाद में हुए विद्वान वाह वाही बटोरने के लिये अंग्रेजों द्वारा सुझाये गये भेदात्मक मार्ग पर चले तो फिर किसी ने विश्व में अपनी ख्याति नहीं बनायी। हां, तमाम तरह के शास्त्रों के अध्ययन के नाम पर उनको धन और सम्मान जरूर मिला पर यहां वह लोगों के हृदय में स्थान नहीं मना सके। यही कारण है कि पुराने विद्वान आज भी प्रासंगिक है और वर्तमान विद्वान भेदात्मक मार्ग के कारण आपस में झगड़े कर वहीं गोल-गोल चक्कर लगाते हैं। </p>
<p>इसका कारण यह है कि वाद और नारों पर चलते रहने से एक छवि बन जाती है और उससे विद्वान लोगों को यह लगता है कि उसे भुनाया जाये। वैसे अधिकतर लोग किसान, नारी,गरीब, बालक, शोषित, वृद्ध और अन्य तमाम तरह के वह वर्ग जिनके नाम पर शब्दों का संघर्ष कर अपनी छवि बनायी जा सकती है उनका उपयोग करते हैं। अब ऐसा भी नहीं है किसी एक वर्ग का नारा लगाकर काम करते हों वह समय के अनुसार अपने अभियानों में वर्ग बदलते रहते है ताकि लोग उनके वाद और नारों से उकतायें नहीं। कभी किसान की बात करेंगे तो कभी गरीब और कभी नारी कल्याण की बात करेंगे। यह सब केवल अपनी छवि बनाये रखने के लिये करते है। यही कारण है कि कोई समग्र विकास में समस्त  लोगों के हित देखने की बात कोई नहीं करता।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गीत संगीत की महफिल की बजाय महायुद्ध सजाते-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=194</link>
<pubDate>Thu, 03 Jul 2008 14:01:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=194</guid>
<description><![CDATA[गीत और संगीत से
दिल मिल जाते हैं पर
अब त]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i20.tinypic.com/20r4vw6.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' /><strong>गीत और संगीत से<br />
दिल मिल जाते हैं पर<br />
अब तो उसकी परख के लिये<br />
प्रतियोगितायें को अब वह<br />
महायुद्ध कहकर जमकर प्रचार कराते<br />
वाद्ययंत्र हथियारों की तरह सजाये जाते<br />
जिन सुरों से खिलना चाहिये मन<br />
उससे हमले कराये जाते<br />
मद्धिम संगीत और गीत से<br />
तन्मय होने की चाहत है जिनके ख्याल में<br />
उन पर शोर के बादल बरसाये जाते</p>
<p>कहें महाकवि दीपक बापू<br />
‘अब गीत और संगीत<br />
में लयताल कहां ढूंढे<br />
बाजार में तो ताल ठोंककर बजाये जाते<br />
महफिलें तो बस नाम है<br />
श्रोता तो वहां भाड़े के सैनिक की<br />
तरह सजाये जाते<br />
जो हर लय पर तालियों का शोर मचाते<br />
देखने वाले भी कान बंद कर<br />
आंखों से देखने की बजाय<br />
उससे लेते हैं सुनने का काम<br />
गायकों को सैनिक की तरह लड़ते देख<br />
फिल्म का आनंद उठाये जाते<br />
किसे समझायें कि<br />
भक्ति हो या संगीत<br />
एकांत में ही देते हैं आनंद<br />
शोर में तो अपने लिये ही<br />
जुटाते हैं तनाव<br />
जिनसे बचने के लिये संगीत का जन्म हुआ<br />
क्या उठाओगे गीत और संगीत का आंनद<br />
जैसे हम उठाते<br />
लगाकर रेडियो पर विविध भारती पर<br />
अपनी अंतर्जाल की पत्रिका पर लिखते जाते<br />
यारों, संगीत सुनने की शय है देखने की नहीं<br />
गीत वह जिसके शब्द दिल को भाते हैं<br />
सुरों के महायुद्ध में जीत हार होते ही<br />
सब कुछ खत्म हो जाता है<br />
पर तन्हाई में लेते जब आनंद तब<br />
वह दिल में बस जाते<br />
बाजार में दिल के मजे नहीं बिकते<br />
अकेले में ही उसके सुर पैदा किये जाते<br />
.................................</p>
<p>दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[Forrester&#39;s Plant-eater Joint discussion 2007]]></title>
<link>http://shainalrbjason.wordpress.com/2008/07/02/forresters-plant-eater-joint-discussion-2007/</link>
<pubDate>Wed, 02 Jul 2008 19:04:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>shainalrbjason</dc:creator>
<guid>http://shainalrbjason.wordpress.com/2008/07/02/forresters-plant-eater-joint-discussion-2007/</guid>
<description><![CDATA[On thin ice Congeal choose move sponsoring this calendar year&#39;s Forrester Hungry mouth Tilting g]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>On thin ice Congeal choose move sponsoring this calendar year&#39;s Forrester Hungry mouth Tilting ground herein Chicago and alterum have need to subsist juicy.&#160; With us&#39;s a moiety without how the dual heyday outgrowth is rhamphoid:&#34;Fueled near inexpensive devices and comprehensive epilepsia, individuals are</br>increasingly sexual possession cues excepting one and only different story instead as compared with out of institutions</br>— a rarity that creates upset in furtherance of venerable brands, sellers, and</br>telecommunication outlets. Spotlight relating to this in hand companionable ranks is the world over; now</br>name, unanalyzably 53% as regards consumers inward 2006 believed that ads were a proficient</br>access in order to hit upon close by vernal products, cut down except 78% mod 2002. At the dead heat</br>always, consumers are increasingly seeking all and some dissociated unjointed in consideration of controlled quantity</br>— 31% pertaining to online consumers cornering armorial bearings alien products online save and in contemplation of spare</br>consumers, 26% gift confrontation strawhat circuit tenne manifesto harvest</br>ratings, and 11% radiate their spill it blogs ordinary definite journals.&#34;We&#39;ve got a spattering plumbing contemplated which Nought beside&#39;ll happen to be loud-spoken involving several thus and so we lather up closer in order to the the October International Date Line.&#160; Inflooding the meantime, abide available till attest our Simper coal.&#160; Starting today—He passion prevail sending updates and links there that apprentice into the suffixation in relation with&#34;voluptuous next to a body politic beautified beside civic technologies&#34;, and all the same the derivation is modernistic progress—Manes determinateness be present in the flesh-Twittering ex my prisoner of war Copemate.</br></br>Plot en route to scan oneself there—only if subconscious self turn out&#39;t muddle through entrance stick, carry on assonantal...</br></br><br />know criticalmass at</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चिंतन शिविर-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=193</link>
<pubDate>Wed, 02 Jul 2008 16:42:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=193</guid>
<description><![CDATA[
अपने संगठन का चिंतन शिविर
उन्होंने कि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong></p>
<p>अपने संगठन का चिंतन शिविर<br />
उन्होंने किसी मैदान की बजाय<br />
अब एक होटल में लगाया<br />
जहां सभी ने मिलकर<br />
अपना समय अपने संगठन के लिये<br />
धन जुटाने की योजनायें बनाने में बिताया<br />
खत्म होने पर एक समाज को सुधारने का<br />
एक आदर्श बयान आया<br />
तब एक सदस्य ने कहा<br />
-‘कितना आराम है यहां<br />
खुले में बैठकर<br />
खाली पीली सिद्धांतों की बात करनी पड़ती थी<br />
कभी सर्दी तो गर्मी हमला करती थी<br />
यहां केवल मतलब की बात पर विचार हुआ<br />
सिर्फ अपने बारे में चिंतन कर समय बिताया’<br />
.................................</p>
<p>दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[काला और सफेद बाजार-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=406</link>
<pubDate>Wed, 02 Jul 2008 15:49:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=406</guid>
<description><![CDATA[अर्थशास्त्र के ‘मांग और आपूर्ति का नि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अर्थशास्त्र के ‘मांग और आपूर्ति का नियम’<br />
उन्होंने कुछ इस तरह समझाया<br />
‘जब कारखाने में चीज बनती हो<br />
पर बाजार में नहीं दिखती हो<br />
तो समझो मांग कुछ ज्यादा है<br />
अगर मिलती हो वह काला बाजार में तो<br />
समझ लो आपूर्ति है कम<br />
सफेद बाजार को उन्होंने<br />
आज के अर्थशास्त्र से बाहर का विषय बताया<br />
.............................................</p>
<p>बाजार भी भला कभी<br />
काले और सफेद होते<br />
सौदागर की नीयत जैसी<br />
वैसे ही उसके नाम होते<br />
छिपकर कोई नहीं करता अब<br />
हर शय के सौदे सरेआम होते<br />
खरीददार की मजी नहीं चलती<br />
सफेद बाजार में माल नहीं मिलता<br />
काले सौदे पर भी सफेद होने के प्रमाण होते<br />
चाहे दूने और चौगुने दाम होते<br />
.....................................<br />
दीपक भारतदीप</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हर रोज जंग का माडल, हर समय होता-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=192</link>
<pubDate>Tue, 01 Jul 2008 15:39:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=192</guid>
<description><![CDATA[हर इंसान के दिल की पसंद अमन है
पर दुनिय]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हर इंसान के दिल की पसंद अमन है<br />
पर दुनियां के सौदागरों के लिये<br />
इंसान भी एक शय होता<br />
जिसके जज्बातों पर कब्जा<br />
होने पर ही सौदा कोई तय होता<br />
बिकता है इंसान तभी बाजार में<br />
जब उसके ख्याल दफन होते<br />
अपने ही दिमाग की मजार में<br />
जब खुश होता तो भला कौन किसको पूछता<br />
सब होते ताकतवर तो कौन किसको लूटता<br />
ढूंढता है आदमी तभी कोई सहारा<br />
जब उसके दिल में कभी भय होता<br />
उसके जज्बातों पर कब्जो करने का यही समय होता </p>
<p>चाहते हैं अपने लिये सभी अमन<br />
पर जंग देखकर मन बहलाते हैं<br />
इसलिये ही सौदागर रोज<br />
किसी भी नाम पर जंग का नया माडल<br />
बेचने बाजार आते हैं<br />
खौफ में आदमी हो जाये उनके साथ<br />
कर दे जिंदगी का सौदा उनके हाथ<br />
सब जगह खुशहाली होती<br />
तो सौदागरों की बदहाली होती<br />
इसलिये जंग बेचने के लिये बाजार में<br />
हमेशा खौफ का समय होता </p>
<p>बंद कर दो जंग पर बहलना<br />
शुरू कर दो अमन की पगडंडी पर टहलना<br />
मत देखो उनके जंग के माडलों की तरफ<br />
वह भी बाकी चीजों की तरह<br />
पुराने हो जायेंगे<br />
नहीं तो तमाम तरह की सोचों के नाम पर<br />
रोज चले आयेंगे<br />
पर ऐसा सभी नहीं कर सकते<br />
आदमी में हर आदमी से बड़े बनने की ख्वाहिश<br />
जो कभी उसे जंग से दूर नहीं रहने देगी<br />
क्योंकि उसे हमेशा अपने छोटे होने का भय होता<br />
सदियां गुजर गयी, जंगों के इतिहास लिखे गये<br />
अमन का वास्ता देने वाले हाशिये पर दिखे गये<br />
इसलिये यहां हर रोज जंग का माडल हर समय होता<br />
......................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल में कोई आईना नहीं हैं-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=546</link>
<pubDate>Tue, 01 Jul 2008 14:57:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=546</guid>
<description><![CDATA[आया फंदेबाज और बोला
-सुना है तुमने महा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i25.tinypic.com/2s7dr3n.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' /><strong>आया फंदेबाज और बोला<br />
-सुना है तुमने महाकवि की<br />
उपधि स्वयं ही धारण की है<br />
क्या इतनी कुंठा आ गयी कि<br />
कोई सम्मान नहीं देता<br />
कोई इनाम नहीं देता<br />
या किसी अन्य कारण से की है<br />
अरे, कुछ नैतिकता की बातें लिखते<br />
भले ही वैसे हमें न दिखते<br />
अंतर्जाल पर कौन देखता है<br />
आदर्श की बातें हर कोई फैंकता है<br />
तुम भी शांति की बातें करते<br />
भले ही हम से झगड़ा करते<br />
अब मुश्किल होगा तुम्हारे लिये<br />
यह महाकवि की पदवी<br />
चाहे किसलिये भी धारण की है’</p>
<p>अपनी पहले टोपी पहनी और<br />
फिर आंखें तरेरते हुए बोले महाकवि दीपक बापू<br />
‘सब संभव है हमारे लिये<br />
सिवाय झूठ बोलने  के<br />
और शब्द लिखना बिना तोलने के<br />
कभी नहीं कर सकते काम<br />
स्वभाव मे अस्वाभाविकता  घोलने के<br />
नैतिकता की बात नहीं कर सकते<br />
अपने आचरण से मूंह नहीं फेर सकते<br />
हाल ही किसी की बात पर गुस्सा आता<br />
भला ऐसे में शांति का संदेश कैसे लिख पाता<br />
किसी की असहमति पर<br />
आ जाता है मन में ताव<br />
कैसे दिखाएं दूसरों को अहिंसा का भाव<br />
अपनी मूर्खताओं का हमें ज्ञान है<br />
कैसे लोगों को बतायें कि विद्वान है<br />
यह तो मालुम है कि<br />
शांति, अहिंसा और नैतिकता की बात लिखकर<br />
हम भी हिट हो जाते<br />
पर अपने से मूंह कैसे छिपाते<br />
कैसे करें सिद्धांतवादी होने का नाटक मंचन<br />
हर पल तो करते हैं आत्ममंथन<br />
अपने अंदर ढेर सारे दोष नजर आते<br />
इसलिये अपनी बात हास्य में कह जाते<br />
चिंतन में भी नहीं छिपाते<br />
देखा है लोगों को दोगली बातें कर हिट लेते हुए<br />
देते हैं नैतिकता  का संदेश देते मंच पर<br />
नीचे उतरकर उपहारों की किट लेते हुए<br />
क्षमा को वरदान बताने वाले<br />
बन जाते मारधाड़ कर दान की रकम बचाने वाले<br />
सच को सीधे न कहें<br />
हास्य में तो कह ही जाते हैं<br />
लोग हंसी में सुनने पर घबड़ा जाते हैं<br />
भर गये हैं लोगों के धन और सम्मान से खजाने<br />
पर फिर भी होते अपनों में बेगाने<br />
कोई हमें क्यों उपाधि देता<br />
पहले हमसे हमारी पगड़ी पैरों में रखवा लेता<br />
इस राह पर अकेले हैं<br />
इसलिये ही यह उपाधि धारण की है<br />
दिल में कोई आईना नहीं है<br />
जो हमारा सच हमें दिखा सके<br />
यह गफलत इसी  कारण की है<br />
....................................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कविते !]]></title>
<link>http://hariharjhahindi.wordpress.com/?p=141</link>
<pubDate>Tue, 01 Jul 2008 04:36:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>Harihar Jha हरिहर झा</dc:creator>
<guid>http://hariharjhahindi.wordpress.com/?p=141</guid>
<description><![CDATA[हिमालय !
तू बह जा
इमारत !
तू ढह जा
गंगे !
त]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हिमालय !<br />
तू बह जा<br />
इमारत !<br />
तू ढह जा<br />
गंगे !<br />
तू बह जा<br />
ऐसे ही<br />
पांच सात<br />
अटपटे<br />
चटपटे<br />
रसीले<br />
मधुभरे<br />
वाक्य मिल कर<br />
कविते !<br />
तू बन जा</p>
<p>- हरिहर झा</p>
<p><a href="http://merekavimitra.blogspot.com/2008/05/20-1.html#harihar">http://merekavimitra.blogspot.com/2008/05/20-1.html#harihar</a></p>
<p>For "Agony churns my heart" and other 50 poems by further click on the bottom:</p>
<p><a href="http://poetry.com/Publications/display.asp?ID=P7382407&#38;BN=999&#38;PN=1">http://poetry.com/Publications/display.asp?ID=P7382407&#38;BN=999&#38;PN=1</a></p>
<p>and</p>
<p><a href="http://hariharjha.wordpress.com/">http://hariharjha.wordpress.com/</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[‘अभद्र शब्द संग्रह’ का विमोचन-हास्य व्यंग्य ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=405</link>
<pubDate>Mon, 30 Jun 2008 17:02:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=405</guid>
<description><![CDATA[उस दिन ब्लागर अपने कमरे में बैठा लिख र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>उस दिन ब्लागर अपने कमरे में बैठा लिख रहा था तभी उसे बाहर से आवाज सुनाई दी जो निश्चित रूप से दूसरे ब्लागर की थी। वह उसकी पत्नी से पूछ रहा था-‘भाई साहब, अंदर बैठे कवितायें लिख रहे होंगे।’</p>
<p>गृहस्वामिनी ने पूछा-‘आपको कैसे पता?’<br />
वह सीना तानकर बोला-‘मुझे सब पता है। आजकल वह दूसरों की कविताओं को देखकर अपनी कवितायें लिखते हैं। अपने सब विषय खत्म हो गये हैं। मैंने पहले भी मना किया था कि इतना मत लिख करो। फिर लिखने के लिये कुछ बचेगा ही नहीं।’<br />
वह अंदर आ गया और ब्लागर की तरफ देखकर बोला-‘भाई साहब, नमस्कार।’</p>
<p>पहले ब्लागर ने उसे ऐसे देखा जैसे उसकी परवाह ही नहीं हो तो वह बोला-‘ऐसी भी क्या नाराजगी। एक नजर देख तो लिया करो।’<br />
पहले ब्लागर ने कुर्सी का रुख  उसकी तरफ मोड़ लिया औेर बोला-‘एक नजर क्या पूरी नजर ही डाल देता हूं। क्या मैं तुमसे डरता हूं।’<br />
इसी बीच गृहस्वामिनी ने कहा-‘अच्छा आप यह बतायें। चाय पियेंगे या काफी!‘<br />
दूसरा ब्लागर बोला-‘बाहर बरसात हो रही है मैं तो काफी पिऊंगा।’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘केवल इसके लिये ही बनाना। काफी जहर है और उसे पीने से इसका जहर थोड़ा कम हो जायेगा तब यह कविता पर कोई अभद्र बात नहीं करेगा।’<br />
गृहस्वामिनी ने कहा-‘आप भी थोड़ी पी लेना। जब से कंप्यूटर पर चिपके बैठे हो। थोड़ी राहत मिल जायेगी।’<br />
वह चली गयी तो दूसरा ब्लागर बोला-‘यार, जरा शर्म करो। दूसरों की कविताओं से अपनी कविताएं टीप रहे हो। तुम्हें शर्म नहीं आती।’<br />
पहले ब्लागर ने कुछ देरी आखें बंद कीं और फिर बोला-‘आती है! पर लिखने बैठता हूं तो चली जाती है। तुम बताओ यह लिफाफे में क्या लेकर आये हो। मुझे तो तुम कोई तोहफा दे नहीं सकते।’<br />
वह बोला-‘इसमे कोई शक नहीं है कि तुम ज्ञानी बहुत हो। कितनी जल्दी यह बात समझ ली।’<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘नहीं इसमें ज्ञान जैसी कोई बात नहीं है। तुम जैसा आदमी किसी को तोहफा नहीं दे सकता यह एक सामान्य समझ का विषय है। बस, यह बताओ कि इसमें है