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	<title>व्यंग्य-चिंतन &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/व्यंग्य-चिंतन/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "व्यंग्य-चिंतन"</description>
	<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 13:26:18 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[मानते नहीं तो फिर पत्थर क्यों उड़ाते-कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=428</link>
<pubDate>Fri, 27 Jun 2008 12:44:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=428</guid>
<description><![CDATA[
कहते हैं पत्थर के बुतों में भगवान नही]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
कहते हैं पत्थर के बुतों में भगवान नहीं मानेंगे<br />
पर भगवान के बुत उड़ाने पहुंच जाते<br />
जवाब नहीं देना इसलिये<br />
तोपों से गोले बरसाते<br />
जब नहीं मानते तो क्यों<br />
पत्थर पर बम बरसा रहे थे<br />
जब खौफ की भाषा बोल रहे थे तब<br />
ऐसे  सवाल भला कहां से आते</p>
<p>जो पत्थर के बुतों मे भगवान देखते<br />
वह भी भला जिंदगी को कहां समझ पाते<br />
कि कई सभी पत्थर ऐसा सम्मान नहीं पाते<br />
दिल में है अगर उसकी तस्वीर<br />
वही पत्थरों में भी नजर आती है<br />
वह श्रद्धा ही है जिसे हम वहां देख पाते<br />
मगर फिर भी पत्थर पूज<br />
कर लेते अपने कर्तव्य की इतिश्री<br />
फिर दया और धर्म से दूर हो जाते</p>
<p>विश्वास और पाखंड की जंग<br />
सदियों से जारी है<br />
कभी दिखती कम<br />
कभी होती भारी है<br />
नहीं जानते लोग धर्म का मर्म<br />
बाहर शोर मचाकर छिपते हैं अपने आप से<br />
अपने खाली दिल दिमाग में<br />
झांकते  ही आती उनको शर्म<br />
जहां  अज्ञान का अंधेरा है<br />
लालच का डेरा है<br />
अपनी नाकामियों से उपजे क्रोध ने<br />
उनको घेरा है<br />
पुरानी किताबों के अर्थ रहित प्रसंग<br />
नये जीवन का बनाते अपने अंग<br />
पत्थर टूटने से श्रद्धा नही टूटती जिनकी<br />
वही सर्वशक्तिमान को समझ पाते<br />
बुतों से खौफ खाने वाले<br />
इंसान भी बहुत हैं<br />
भले ही कहते उसमें नहीं देखते<br />
फिर क्यों तोड़ने जाते<br />
मन में रहता है खौफ या विश्वास<br />
जिन्होंने लगाई ज्ञान सागर में डुबकी<br />
वही भक्ति और सत्संग पाते<br />
तलवारों और तोपों की संगत वाले<br />
अपने हिस्से तो केवल खौफ ही पाते<br />
.................................<br />
यह कविता ब्लाग लेखक श्री अफलातून की कविता के आधार पर लिखी गयी और वहां पोस्ट करने के बाद यहां प्रस्तुत की गयी है।<br />
दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बनते बिगड़ते हैं रंग और इंसान -कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=427</link>
<pubDate>Wed, 25 Jun 2008 14:40:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=427</guid>
<description><![CDATA[पल रंग बदलती दुनियां में
रिश्ते भी बदल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पल रंग बदलती दुनियां में<br />
रिश्ते भी बदलते हैं रंंग<br />
जो सारी उमर साथ चलने का<br />
एलान करते सरेआम<br />
वह कभी नहीं चलते संग<br />
जिनसे फेरा होता है मूंह<br />
वही चल पड़ते है साथ<br />
निभाने लगते हैं बिना वादा किये<br />
चाहे होते है रास्ते तंग<br />
कोई शिकायत नहीं करते<br />
चलते है संग<br />
.....................................</p>
<p>किसी एक रंग पर मत दिल लगाना<br />
हर रंग को अपनी आंखें पर आजमाना<br />
किसी रंग का भरोसा नहीं फीका पड़ जाये<br />
जो फीका लगता संभव है वही जीवन चमकाये<br />
इंसानों के भी रंग होते हैं<br />
कभी उनके मन होतेे उजले तो<br />
कभी काले होते हैं<br />
इज्जत करते हैं जो दिखाने की<br />
करते हैं वही बदनाम<br />
कर जाते हैं अपने पैगाम देकर दिल खुश<br />
जो खुश्क जिंदगी जी रहे होते हैं<br />
बनते बिगड़ते हैं रंग और इंसान<br />
किसी एक पर मत दिल न लगाना<br />
.......................................<br />
दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लाग गिरा सकता है, भाषा की दीवारें-आलेख]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=426</link>
<pubDate>Sun, 22 Jun 2008 07:45:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=426</guid>
<description><![CDATA[अंतर्जाल पर छद्म मित्रों और आलोचकों न]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अंतर्जाल पर छद्म मित्रों और आलोचकों ने मेरी सोच को बहुत संकीर्ण बना दिया है। इसलिये अगर अपने  ब्लाग/पत्रिकाओं पर जो आने वाली टिप्पणियों से अगर कोई विचार मेरे दिमाग में आता है तो सोचता हूं वह अपने किसी ब्लाग/पत्रिका पर लिखूं कि नहीं। फिर सोचता हूं कि अगर मैं दायरों में बंध गया तो लिखना मुश्किल हो जायेगा। इसके अलावा जो मेरे दिमाग में विचार है कल वह सत्य साबित हुआ तो फिर इस बात का कष्ट होगा कि मैंने उसे क्यों नहीं व्यक्त किया?</p>
<p>       बहरहाल वर्डप्रेस के मेरे  ब्लाग/पत्रिकाऐं निरंतर सक्रियता के कारण अंग्रेजी वेबवाईट लेखकों के दृष्टिपथ में बनी रहतीं हैं। इसके अलावा वर्डप्रेस के ब्लाग पर अंग्रेजी में शाब्दिक समानता के कारण अन्य भाषाओं के लेखक भी वहां आते हैं। मेरी कई पोस्टें अंग्रेजी श्रेणीं में घुसीं रहतीं हैं इसलिये अंग्रेजी वेबसाइट और ब्लाग लेखक कभी कभार उस पर अपनी टिप्पणियां लिख जाते हैं। इसमें एक परेशानी आती है। वह यह कि अगर वेबसाईट लेखक ने टिप्पणी रखी है तो ब्लाग उसे स्पैम में डाल देता है-यानि वह केवल ब्लाग लेखक को ही सीधे ब्लाग पर टिप्पणी लिखने देता है। इसका मतलब यह है कि वर्डप्रेस वेबसाइट लेखक को ब्लाग लेखक नहीं मानता। शुरू में मैं अंग्रेजी लेखकों की टिप्पणियों को महत्व नहीं देता था क्योंकि मुझे लगता था कि वह भला क्या पढ़ते होंगे? एक भारत के ही हिंदी और अंग्रेजी भाषा के लेखक ने अपनी टिप्पणी में जब यह बताया अनुवाद टूल से हिंदी को अंग्रेजी में पढ़ा जा सकता है तब मुझे हैरानी हुई और अंग्रेजी लेखकों की टिप्पणियां मैं पढ़ने लगा। इस पर मैंने एक पाठ भी लिखा था। उसके एक महीने के अंदर ही मुझे कृतिदेव का यूनिकोड, देवनागरी लिपि के अरबी लिपि में परिवर्तित करने वाला और फिर हिंदी अंग्रेजी का अनुवाद टूल मिल गया। इनका उपयोग करते हुए मैंने अपने पाठ लिख डाले। </p>
<p>अंग्रेजी हिंदी अनुवाद टूल का उपयोग करते हुए तो मैने दोनों भाषाओं में लिखा और पाठ अपने ब्लाग/पत्रिकाओं पर प्रकाशित किए। अनुवाद टूल में जब हिंदी का पाठ अनुवाद करने पर कुछ शब्द सही नहीं आये तो फिर वैकल्पिक शब्द उपयोग किये और शतप्रतिशत अंग्रजी अनुवाद किया। इसके बावजूद  अनुवाद में क्रियाओं का जब  अनुवाद सही नहीं देखा तो समझ में आया कि इसमें एक-एक पंक्ति को ध्यान से अनुवाद करना होगा।  इसमें बहुत श्रम होता है। अपना पाठ लिखने में इतना समय नहीं लगता जितना उसका सही अनुवाद करने में लगता है। बहरहाल छोटे पाठों का उतना ही अंग्रेजी अनुवाद कर सकता  हूं जितना मुझे समझ में आता है। </p>
<p>मुझे पता नहीं कि इस अंतर्जाल पर एक लेखक के रूप में मुझे कितनी प्रसिद्धि मिली है पर जिस तरह अंग्रेजी लेखक और पाठक  मेरे ब्लाग/पत्रिकाओं को अपनी वेबसाईटों पर खोलकर पढ़ रहे हैं उससे थोड़ी हैरानी है। इनमें से मेरी एक हिंदी में लिखी और प्रकाशित पोस्ट पर एक टिप्पणी में  लिखा गया कि मुझे  अपने लिखे पाठ  अनुवाद टूल में प्रयोग कर सुधारते हुए अपना पाठ लिखना चाहिए। कल ही एक ने लिखा कि मेरे पाठ के कुछ हिस्से सही अनुवाद नहीं हो पा रहे पर आप आप बहुत अच्छा लिखते हैं।<br />
ऐसा लगता है कि अंग्रेजी की कुछ वेबसाईटें हिंदी के ब्लाग को अपने यहां लिंक करने का प्रयास कर रहीं है। संभव है कहीं इस बात के प्रयास हो रहे हैं कि जिन भाषाओं का अंग्रेजी में अधिकतम शुद्ध अनुवाद टूल उपलब्ध है उनको एक जगह लाया जाये। मेरे अधिकतर ब्लाग@पत्रिकाएं दो से तीन बार इसी अनुवाद टूल पर पढ़ी जा रही हैं। उनकी पसंद देखकर लगता है कि वह अध्यात्मिक संदेशों और मेरे चिंतन वाले विषयों वाले पाठों में अधिक रुचि ले रहे हैं। उसके बाद गंभीर कविताऐं उनकी पसंद हैं। हास्य कविताओं में उनकी दिलचस्पी नहीं है।<br />
निष्कर्ष यह है कि अब हिंदी में लिखना केवल हिंदी पढ़ने वालों के लिए नहीं रह गया है। अनुवाद टूल ने अंग्रेजी  भाषी लोग भी हिंदी में लिखे पाठों को पढ़ रहे हैं। इससे वह अन्य भाषी भी पढ़ सकते हैं जिन्हें अंग्रेजी आती है, पर अन्य भाषी अपने यहां लिंक नहीं कर सकते क्योंकि </p>
<p>1.जिन भाषाओं का अनुवाद टूल उपलब्ध है उनमें  अधिकतर का अंग्रेजी में अधिक प्रतिशत सही  अनुवाद हो रहा है पर उन अंग्रेजी का उन भाषाओं में अनुवाद निराशाजनक है। अगर कोई चीनी हिंदी के ब्लाग को अंग्रेजी में पढ़ सकता है पर चूंकि  अंग्रेजी का चीनी में सही अनुवाद उपलब्ध नहीं है इसलिये यह संभव नहीं है कि हिंदी का पाठ पहले अंग्रेजी और फिर चीनी में पढ़ा जाये।<br />
2.इन टूलों का अभी व्यापक प्रचार नहीं हुआ है और अभी तक जो लोग अंतर्जाल पर पढ़लिख  रहे हैं उनके विचार अभी सीमित दायरे में हैं और  उनके दृष्टिकोण में व्यापक बदलाव अभी आना शेष है।</p>
<p>जिस तरह अंतर्जाल में नित नये टूल आ रहे हैं इसलिये संभव है कोई ऐसा टूल आ जाये तो अन्य भाषाओं में हिंदी पाठों को पढ़ना संभव बना दे। अपने जिन पाठों को मैं इन टूलों के द्वारा  पढ़ता देख रहा हूं उनसे मुझे लगता है कि भारतीय विषयों में अन्य विदेशी लोगों की व्यापक रुचि है और मानवीय स्वभाव, चरित्र और विचार जो सभी जगह एक समान है उस पर लिखा पाठ  पढ़ने का वह लोग प्रयास कर रहे हैं। </p>
<p>मैंने शुरू में अधिक ब्लाग इसलिये बनाये थे क्योंकि मुझे कुछ आता जाता नहीं था। बाद में प्रयोग की दृष्टि से बनाये। ब्लाग स्पाट के ब्लाग का कोई अपना डेशबोर्ड नहीं है जबकि वर्डप्रेस का डेशबोर्ड न केवल दूसरों के ब्लाग पढ़ने के लिये हमारे पास लाता है बल्कि हमारे भी दूसरों के सामने ले जाता है। संभवतः इसलिये वहां के ब्लाग हमेशा आवागमन में रहते हैं और अन्य भाषियों और देशों के ब्लाग लेखकों से संपर्क बना रहता है। उनके ढेर सारी टिप्पणियां आती है। यह देखकर लगता है कि भाषा की दीवारें अब अधिक समय नहीं रहेंगी और हम लिख हिंदी में रहे हैं पर ब्लाग किसी भाषा विशेष का नहीं रहने वाला। यही कारण है कि अपनी बौद्धिक चतुराई से अल्पज्ञान अर्जित कर वाद चलाने और नारे लगाने वाले लोगों को यह ब्लाग जगत एक शत्रू की तरह दिखाई दे रहा है-क्योंकि उनके वाद पर वाह वाह और नारों पर हाहाकार मचाने वाले लोगों का झुंड ऐसे व्यापक संपर्कों के कारण सत्य से अवगत होता जायेगा और वह उनसे दूर होकर अकेले कर देगा। इससे उनकी दुकानें बंद हो जायेंगी। ऐसा केवल हिंदी में नहीं सभी भाषाओं में कथित विद्वानों के साथ होने वाला है। बहरहाल मैं एक जिज्ञासु व्यक्ति हूं इस उथल पुथल को इतनी निकट से देख रहा हूं। अगर में हिंदी भाषा में अंतर्जाल पर नहीं लिखता तो शायद उसकी ऐसी अनुभूतियां नहीं कर पाता। मैं इसी से संतुष्ट हूं कि नित नये लोगों से संपर्क और मित्रता बन जाती है। सबसे अच्छा यह कि यहां जाति, भाषा, धर्म, और अन्य भ्रामक आधारों पर स्थापित समूहों  से अलग होकर लिखा जा रहा है। कुछ समय बाद जक राष्ट्रीय आधारों से बाहर निकलकर भी लिखा जायेगा तब विश्व का स्वरूप भी दिलचस्प होगा। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रेल की बोगी में ज्ञान की किताबें बेच सकते हैं, ज्ञान नहीं-आलेख]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=425</link>
<pubDate>Wed, 18 Jun 2008 15:14:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=425</guid>
<description><![CDATA[
वृंदावन की यात्रा कर हम दोनों पति-पत्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
वृंदावन की यात्रा कर हम दोनों पति-पत्नी दोनों ही खुश होते हैं। इस बार जब हम दोनों वहां पहुंचे तो बरसात हो रही थी और ठहरने के स्थान पर सामान रखकर हम सबसे अंग्रेजों के मंदिर में गये क्योंकि वह अधिक पास था। हमारे साथ के परिचित सज्जन तो नहीं चले पर उनकी दस वर्षीय बेटी हमारे साथ वहां चली। </p>
<p>वृंदावन में अनेक मंदिर हैं पर बांके बिहारी और अंग्रेजों (इस्कान) का मंदिर बहुत अधिक प्रसिद्ध हैं और हम दोनों भी वहां रहते हुए प्रतिदिन जाते हैं।  अंग्रेजों के मंदिर में आरती के समय नाचते हुए लोगों का दृश्य भी अच्छा लगता है। हालांकि बरसों से जा रहे हैं पर अब वहां मैटल डिक्टेटर और अन्य कड़ी सुरक्षा सहित अन्य परिवर्तन देखकर हमें आश्चर्य होता है। वहां तमाम लोग आते हैं और ऐसा लगता है कि कुछ पिकनिक मनाने के लिए भी आते हैं तो कुछ केवल देखने भर के लिये चले आते हैं। कुछ लोग भक्ति भाव से आते हैं। अगर सीधे कहें तो वहां चारों तरह के भक्त आते हैं-आर्ती, अर्थाथी, जिज्ञासु और ज्ञानी।  मैं तो वहां कर ध्यान लगाता हूं और मेरी पत्नी भीड़ में बैठकर तालियां बजाते हुए भजन गाती है।</p>
<p>बरसात बंद होने पर जो उमस का गुब्बार फूटा तो उसमें हम पसीना-पसीना हो गये थे। ग्यारस और अवकाश का दिन होने के कारण वहां भीड़ अधिक थी और मुझे ध्यान के लिये किसी अच्छी जगह की तलाश थी। मेरी पत्नी ने दीवार से रखे कूलर की तरफ इशारा किया  और मैं वहां ध्यान लगाने बैठ गया और वह आगे बैठकर ताली बजाते हुए नाम जपने लगी। कुछ देर बाद हम बांके बिहारी के मंदिर जाने के लिये तैयार होकर बाहर निकलने लगे। वहां लगी दुकान पर किताबों का  मैं निरीक्षण करने लगा। मेरी पत्नी किताबों में रुचि नहीं लेती वह फिर माला या कोई गले में डालने के लिये प्रतीकों के हार खरीदने के इरादे से खड़ी हो गयी।  </p>
<p>मैं किताब की दुकान पर पहुंचा तो वहां धवल वस्त्र पहने एक  सेल्समेन ने<br />
मेरी तरफ चार पांच छोटी किताबों एक साथ आगे बढ़ाते हुए कहा-‘यह लीजिये सौ रुपये की हैं। दान समझकर लीजिये इससे आपको ज्ञान भी मिलेगा।’</p>
<p>मैंने उससे पूछा-‘क्या कबीर की रचनाओं का कोई अंग्रेजी संग्रह है?’</p>
<p>उसने तुरंत कहा-‘यहां तो केवल हमारी किताबें ही मिलती हैं।’ </p>
<p>मैं वहां से चल पड़ा तो पत्नी ने कहा-‘जब आपको मालुम है तो फिर इन किताबोंे की दुकान पर जाते क्यों हैं?’<br />
मैंने कहा-‘इस उम्मीद में शायद कोई किताब मिल जाये।’<br />
वहां से बाहर निकलते हुए कम से कम तीन स्थानों पर ऐसी किताबें खरीदने के लिए हमारे समक्ष रखी गयी। अचानक मेरी पत्नी को याद आया कि कभी मैंने उससे इस्कान की श्रीगीता खरीदने की बात कही थी और उसने पूछा-‘आप खरीदते क्यों नहीं।’<br />
मैंने उससे कहा-‘यह आज से पांच वर्ष पूर्व की बात है। तब तो मैंने अनेक संतों की व्याख्या वाली श्रीगीता खरीद ली थी, पर मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा था कि गोरखपुर प्रेस की वही गीता पढ़ना जिसमें केवल संस्कृत श्लोक का अनुवाद हो। किसी द्वारा की गयी व्याख्या या महात्म्य वाली मत पढ़ना क्योंकि उससे भ्रमित हो जाओगे।’ वह तो मेरे पास थी।’<br />
पत्नी ने पूछा-‘ पर उसने ऐसा क्यों कहा था?’<br />
मैंने कहा-‘उसने मेरा लिखा पढ़ा था और वह जानता था कि मैं स्वयं भी अपना सृजन कर सकता हूं। वह मुझे और मेरे लेखन का प्रशंसक था और नहीं चाहता था कि मैं किसी दूसरे की सोच पर चलूं। वह मुझसे आज भी मौलिक सोच और सृजन की आशा करता हैं।’<br />
पत्नी ने पूछा-‘वैसे इस तरह किताबों को इस तरह बेचना ठीक लगता है। अरे, जिसे खरीदना है वह खरीद लेगा।’<br />
मैंने कहा-‘हां, मुझे भी लगता है कि किताबें तो बेची जा सकती हैं पर ज्ञान नहीं बेचा जा सकता है।’</p>
<p>रास्ते में एक जगह किताबों की दुकान पड़ी। वहां एक जगह हमारे साथ चल रही लड़की उसी दुकान के पास पानी पताशा खाने की जिद करने लगी तो मेरी पत्नी भी वहां रुक गयी। मैं पानी पताशा नहीं खाता इसलिये मेरी पत्नी ने उस किताब की दुकान की तरफ	 इशारा करते हुए बोली-‘आपको कोई किताब खरीदनी हो तो यहां देख लीजिये। आपकी  पसंद की किताबें तो ऐसी ही दुकानों पर मिल पातीं हैं।’<br />
मैं वहां जाकर किताबें देखने लगा। एक किताब ली। वहां से हम बांके बिहारी मंदिर में चले गये।</p>
<p>अगली सुबह हम वापस रवाना होने के लिये रेल्वे स्टेशन पर पहुंचे। वहां से हम एक ट्रेन में बैठे तो वहां इस्कान का ही एक गेहुंआ वस्त्र पहने व्यक्ति अपने हाथ में अपने संस्थान द्वारा प्रकाशित श्रीगीता और श्रीमद्भागवत सभी यात्रियों को दिखाकर उनको खरीदने के लिए प्रेरित करता हुआ हमारे पास आया। मेरे इंकार करने पर वह चला गया। मेरी पत्नी ने फिर हैरान होकर पूछा-‘यह क्या तरीका है?’<br />
मैंने कहा-‘लगता है कि प्राईवेट कंपनियों की तरह इन पर भी टारगेट का बोझ है। शायद इन लोगों का अपने टारगेट पूरा करने पर ही आश्रमों मे बने रहने की छूट दी जाती होगी।</p>
<p>मुझे याद आ जब मैं छोटा था तब अपने माता पिता के साथ अंग्रेजों कें मंदिर में गया था उसके बाद उसमें बहुत विकास हुआ है। एक समय मैं सोचता था कि  जो अंग्रेज भगवान श्रीकृष्ण के भक्त हैं वह शायद श्रीगीता को समझ पायें क्योंकि भारत में तो ऐसे लोग कम ही दिखते हैं। यहां तो ज्ञान का व्यापार होता। लगता है कि जाने अनजाने इस्कान के लोग भारतीय साधु संतों से अपने आपको बड़ा भक्त साबित करने के लिये ऐसा प्रयास कर रहे हैं जिनका कोई तार्किक आधार नहीं है। जहां तक किताबों का प्रश्न है जो जिज्ञासु और ज्ञानी भक्त हैं वह तो स्वयं ही खरीद लेते हैं पर अर्थाथी या आर्ती हैं उनकी इन किताबों में कोई दिलचस्पी नहीं होती। इस  रेल्वे की बोगियों में इस तरह पवित्र ग्रंथों का ज्ञान बेचने वाले भक्त किस श्रेणी के हैं यह मेरे समझ से परे है? वैसे रेल की बोगी में ज्ञान और भक्ति की किताबें बेच सकते हैं पर ज्ञान और भक्ति भाव किसी में स्थापित करना मुश्किल है।  </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मैत्री संदेशों  से बचने की कोशिश-व्यंग्य]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=424</link>
<pubDate>Fri, 13 Jun 2008 15:55:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=424</guid>
<description><![CDATA[एक महिला ब्लाग लेखिका ने किसी वेबसाइट ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>एक महिला ब्लाग लेखिका ने किसी वेबसाइट पर अपना प्रोफाइल लिखते हुए क्लिक किया होगा। बस उसके संपर्क में आने वाले हर ब्लाग लेखक के पास मित्रता का संदेश पहुंच गया। मेरे पास भी पहुंचा और मैने भी बिना विचार किये सामान्य ढंग सेे भरकर लौटा दिया। तब अंतर्जाल का मुझे अनुभव नहीं था इसलिये  मैं सोच रहा था कि इस तरह से अलग से संपर्क सूत्र स्थापित रखने की हम ब्लाग लेखकों को भला क्या आवश्यकता है। एक दूसरे को पढ़कर और टिप्पणियां लिखकर यही काम तो कर रहे हैं। फिर अगर किसी से बात करनी हो तो आपस में कभी न कभी संवाद होता ही है और ईमेल पते तो गूगल पर बने ही रहते हैं। चाहे जब चैट कर लो। फिर चैट में भी क्या खाक बात करें? ऐसा कौनसा दिन है जो आपस में किसी की शक्ल न देखते हों। सबके तो ब्लाग पर फोटो टंगे है।<br />
संदेश लौटाने के बाद  अपने काम में लग गया। थोड़ी देर बात ही उस महिला ब्लाग लेखिका ने सूचित किया किया यह केवल उत्सुकतावश उस वेबसाइठ पर जिज्ञासा से कार्य करने के कारण गलती से आ गया। मुझे इस बात पर यकीन हो गया क्योंकि मुझे लगा कि यह गलती हुई होगी। कई बार मै भी कई वेब साईटों पर पहुंच जाता था और अपना खाता खोल लेता तो उनके संदेश अभी तक मेरे ईमेल पर आते हैं और उनको रोकने का मेरे पास कोई उपाय नहीं है। अगर हो तो मुंझे पता नहीं। याहू के एक ईमेल पर थोक भाव में कविताऐं आतीं हैं और उनको हटाते हुए परेशान हो जाता हूं।  यही परेशानी मुझे जीमेल भी आती है। </p>
<p>ब्लाग लिखते हुए मुझे एक माह भी नहीं हुआ तक  एक मित्र ब्लाग  का मित्रता करने का संदेश आया था। पता नहीं उसे जानबुझकर भेजा था उसने भी गलती की थी। पर मैंने उस समय भी उसका फार्म भर दिया। पता लगा कि उसका संदेश कई लोगों के पास गया। उस समय मैं कुछ नहीं समझा। धीरे-धीरे आभास होने लगा कि यह तो उन लोगों के लिए है जिनके पास ब्लाग लिखने के लिए न समय है न इच्छा न योग्यता-आखिर लिखना हर किसी के लिए संंभव नहीं है। ओरकुट की आवश्यकता किसी ब्लाग लेखक को दूसरे ब्लाग लेखक से संपर्क रखने के लिये हो सकती है यह मैं नहीं सोचता। </p>
<p>बहरहाल ऐसे अनेक संदेश आते हैं और मैं उन्हें मिटा देता हूं। मुश्किल तब आती है जब किसी ऐसे नाम से होते हैं जो हिंदी ब्लाग जगत की महिला लेखिकाओं से मिलते हैं। मैं हमेशा संशकित रहता हूं कि आखिर यह कोई और नाम है या वास्तव में कोई महिला ब्लाग लेखिका का है। मैं अब इन पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं देता। अगर मैं दूं तो पता लगे कि किसी महिला ब्लाग लेखिका ने गलती से भर दिया है। यह हो तो ठीक है क्योंकि आपस में ऊंच नीच बात होने पर सब एक दूसरे को संभाल सकते हैं पर अगर किसी अन्य महिला का है और कहीं मुझे चलाने के लिये किया गया है तो फिर सतर्कता की आवश्यकता अनुभव करता हूं। एक दिलचस्प बात यह है कि यह संदेश  मेरे उन्हीं ईमेल पर आते हैं जिनसे संबंधित ब्लाग अधिक ट्रैफिक में रहते  हैं। कम वाले पर कोई नहीं आता। ऐसे संदेशों के साथ ऐसी वेबसाईटों से जुड़े रहते है जो एकदम नयी होती है। ऐसे में इसकी संभावना लगती है भी है कि किसी महिला ब्लाग लेखिका ने गलती से किया हो या उनके नाम भी इतने आम है कि कोई भी वेबसाइट अपने प्रचार के लिये  उसका उपयोग कर सकती है।<br />
हालांकि कुछ ऐसे भी मैत्री संदेश होते हैं जो किसी ब्लाग लेखक या लेखिका के नाम से नहीं मिलते पर उनमें जाओं तो............आकर्षक फोटो होते है। मैं इन संदेशों पर स्वीकृति देने से इसलिये भी बचता हूं कि एक बार यह सिलसिला शुरू होता है तो फिर थमता नहीं हैं। बहरहाल ऐसे संदेश मिटाते हुए परेशान बहुत हो जाता हूं हालांकि इनमें कुछ के लिये स्वयं की जिज्ञासा को भी जिम्मदार मानता हूं। किसी भी वेबसाइट पर अपना प्रोफाइल लिखने से कतराता हूं कि कहीं यह अन्य ब्लाग लेखिकाओं के पास मैत्री संदेश लेकर  पहुंच गया तो क्या सोचेंंगी कि अब यह बेवकूफी भरे व्यंग्य तो लिखता था ऐसी भी बेवकूफियों पर उतर आया है। कहीं चला गया तो फिर अपना वक्त खराब करता फिरूं सफाई देने के लिये। इससे अच्छा है तो ऐसे मैत्री संदेशों की अनदेखी की जाये। </p>
<p> </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वह औरत-कविता ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=423</link>
<pubDate>Thu, 12 Jun 2008 16:16:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=423</guid>
<description><![CDATA[दिन भर ईंट, पत्थर और
सीमेंट का मसाला-तस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>दिन भर ईंट, पत्थर और<br />
सीमेंट का मसाला-तस्सल सिर<br />
पर रखकर ढोती वह औरत<br />
रात्रि में प्लास्टिक की छत से ढंकी<br />
झौंपडी के बाहर आंगन में<br />
बबूल की लकड़ी से<br />
अग्नि जलाकर<br />
उस पर रोटी सेंकती वह औरत</p>
<p>सुबह चाय बनाते हुए<br />
अपने बच्चे को<br />
गोद में बैठाकर<br />
उसे बडे स्नेह से<br />
मुस्कान बिखेरती<br />
और दूध पिलाती वह औरत</p>
<p>अपने अनवरत संघर्ष से<br />
इस सृष्टी में जीवन को ही<br />
सहजता से जीवनदान देती<br />
चेहरे पर शिकन तक नहीं आने देती<br />
अपनी शक्ति और सामर्थ्य का<br />
प्रतीक है वह औरत<br />
कोई उसके दर्द को नहीं सहलाता<br />
उसकी तस्वीरें बाजार में बिकतीं हैं मंहगे भाव में<br />
सोच भी नहीं सकती वह औरत<br />
उसके दर्द का बयान करती हुई लिखी गयी कहानियां<br />
बनी कई फिल्में<br />
पाए उन्होने इनाम<br />
न ही बदली उसकी दिनचर्या न काम<br />
रोटी बनाना सुबह और शाम<br />
दिन में मजदूरी और फिर खाने के बाद थोडा आराम<br />
उसमें भी अपने ही जैसी औरतों को<br />
अपना दर्द सुनाकर खुश होने की कोशिश करती  वह औरत </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कई लोग बेमन से साथ हो जाते हैं-कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=418</link>
<pubDate>Mon, 09 Jun 2008 16:20:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=418</guid>
<description><![CDATA[
मन भी एक कागज की तरह है
कई नाम लिख जाते ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
मन भी एक कागज की तरह है<br />
कई नाम लिख जाते हैं<br />
धुंधलाने लगते हैं जब उसके रंग<br />
नये खाली पन्ने लिखने के लिए<br />
चले आते हैं<br />
ख्यालों का कारवां जैसे-जैसे बढता जाता है<br />
मन भी उसके साथ हो जाता है<br />
जिंदगी की राह में<br />
दूर तक साथ चलता है<br />
वही हमसफर हो जाता है<br />
मिलकर बिछड़ने वालों  के चेहरे भी<br />
मन की आंखों  से  धीरे-धीरे<br />
धुंधलाने नजर आने लग  जाते हैं</p>
<p>जिंदगी छोटी है पर<br />
आदमी के कदम भी कहां बड़े हैं<br />
रास्ते में भी कई इंसानी बुत खड़े हैं<br />
लगते हैं  सभी अपने जैसे<br />
पर नीयत का भरोसा करें कैसे<br />
जैसे हमारा ख्याल बदलता है<br />
दूसरों के मन भी बदल जाते हैं</p>
<p>सपने में मचलता हो<br />
या जागते हुए बहलता हो<br />
अपने मन का क्या भरोसा<br />
उस  पर काबू रखना होता है  कठिन<br />
फिर दूसरों के मन साफ होने की<br />
उम्मीद क्यों करते है<br />
यह मन ही है जिससे लोग<br />
अपनों से भी दूर हो जाते हैं<br />
जिंदगी के सफर में साथ चलने वाले<br />
कई लोग बेमन से साथ हो जाते हैं<br />
------------------------------<br />
दीपक भारतदीप<br />
 </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हमने क्या बुरा किया-कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=417</link>
<pubDate>Sun, 08 Jun 2008 15:36:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=417</guid>
<description><![CDATA[जिनको अपना समझकर सच कहा
वह बेगाना समझन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जिनको अपना समझकर सच कहा<br />
वह बेगाना समझने लगे<br />
जब तक उनकी लापरवाह अदाओं पर<br />
खामोश रहे<br />
उनको हम अच्छे लगे<br />
जो एक बार किया इशारा<br />
उनको संभल जाने का<br />
तब से मूंह फेरकर वह जाने लगे<br />
अजनबियों जैसे हो गये अब<br />
गैरों की तरह मिलने लगे<br />
सोचते हैं हमने सच कहकर क्या गलत किया<br />
गलत राह पर चलने के खतरे<br />
होते है बहुत<br />
अगर हमने उनको आगाह किया तो<br />
क्या बुरा किया<br />
वह चले जा रहे हैं फिर भी<br />
बस अब  हम से संभलकर चलने लगे<br />
..............................<br />
दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पर्यावरण पर क्या लिखता-व्यंग्य]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=415</link>
<pubDate>Fri, 06 Jun 2008 16:17:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=415</guid>
<description><![CDATA[
कल पर्यावरण दिवस था। शायद ही कोई ऐसा व]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i24.tinypic.com/2jfy3hs.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' /><br />
कल पर्यावरण दिवस था। शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति मिला हो जिसे पर्यावरण बचाने की चिंता हो। इसका कारण भी है। मैंने कहीं पढ़ा था कि जितना पानी भारत में लोगों का उपलब्ध उतना दुनियां में किसी अन्य देश को नहीं है। कहना चाहिए कि भारत के लोगों पर भगवान की कृपा है और इसलिये ही यहां भगवान के भक्त अधिक दिखते हैं भले ही दिखावे के हो।<br />
यहां प्रकृति के विशेष कृपा रही है और लोगों का लगता है कि यह सब तो मुफ्त का माल है इसकी क्या सोचना। अस्थमा और दिल के मरीज भी इसे वैसे ही समझते हैं जैसे स्वस्थ आदमी। </p>
<p>बड़े-बड़े भक्त हैं भगवान के। पत्थरों को पूजते हैं। पेड़ कट रहे हैं। हमे प्राणवायु प्रदान करने वाले पेड़ हमारे सामने ही ध्वस्त हो जाते हैं।  अखबार,टीवी और अन्य सभाओं में वक्ता भाषण करते हैं। मगर पेड़ कटने का सिलसिल थम नहीं रहा। लगाने की बात करते हैं। एक पेड़ को लगाना आसान नहीं है। पहले पौधा लगाओ और फिर उसकी रक्षा करो। घर के अंदर तो कोई लगाना नहीं चाहता और घर के बाहर अगर सरकारी संस्था लगा जाये तो उसकी देखभाल करने तक कोई तैयार नहीं। अनेक संस्थाओं ने भूखंड बेचे और सभी के मकानों में पेड़ पौधे लगाने के लिऐ नक्शें मेें जगह छोड़ी  पर लोगों ने वहां पत्थर बिछा दिये। कई लोगों ने उस जगह पूजाघर बना दिये। ताकि लोग आयें और देखे कि हम कितने भक्त है और स्वर्ग में टिकट सुरक्षित हो गया है। उससे भी मन नहीं भरा बाहर पेड़ पौधे लगाने की सरकारी  जगह पर भी पत्थर बिछा दिये कि वहां कीचड़ न हो। कहीं दुकान बनवा लिये।  कौन हैं सब लोग? जो लोग पर्यावरण बचाने के लिये इतने सारे प्रपंच कर रहे हैं उनके व्यक्तिगत जीवन का अवलोकन किया जाये तो सब  पता लग जायेगा। मगर नहीं साहब यहां भी बंदिश है। सार्वजनिक जीवन में जो लोग हैं उनके निजी जीवन पर टिप्पणियां करना ठीक नहीं है। अब यह सार्वजनिक जीवन और निजी जीवन का अंतर हमारी समझ से बाहर हैं।<br />
पत्थर से कभी प्राणवायु प्रवाहित नहीं होती। वह जल का प्रवाह अवरुद्ध करने की ताकत रखता है पर उसके निर्माण की क्षमता उसमें नहीं है। उसी पत्थर को पूरी दुनियां में पूजा जाता है। अरे, आप देख सकते हैं सभी लोगोंं ने अपने इष्ट के नाम पर पत्थरों के घर बनवा रखे हैं और वहीं के चक्कर लगाते रहते हैं। जिन पेड़ों से उनको प्राणवायु मिलती है और जल का संरक्षण होता है वह उनके लिए कोई मतलब नहीं रखता। विदेशों का तो ठीक है पर इस देश में क्या है? पेड़ों को देवता स्वरूप माना जाता है इस देश में ऐसे पेड़ों को प्रतिदिन जल देने की भी परंपरा रही है पर यहां पत्थरों की पूजा करने का भी विधान किया गया। पता नहीं कैसे? भारतीय अध्यात्म में तो निरंकार की उपासना करने का विचार ही देखने को मिलता है। कई जगह पेड़ों के आसपास इष्ट देवों के घर  बनाकर वहां पत्थर रख दिये गये। धीरे-धीरे पेड़ गायब होता गया और लोगों की श्रद्धा पत्थर के घरों को बढ़ा करती गयी।</p>
<p>कहते हैं जो चीज आसानी से मिलती है उसकी कद्र इंसान नहीं करता? मगर अनेक ज्ञानी और ध्यानियों को मानने वाले इस देश में अज्ञानी कहीं अधिक हैं नहीं तो उनको समझ में आ जाता कि पेड़ पौद्यों की बहुलता और जल की प्रचुरता हम सृष्टि की देन है इसलिये सहज सुलभ है वरना लोग तरस रहे हैं इन सबके लिए। हर कोई अपने इष्ट का बखान करता है पर जो पेड़ इस दैहिक जीवन का संचालन करते हैं उसकी बजाय लोग मरने के बाद के स्वर्ग के जीवन के लिए संघर्ष करते नजर आते हैं।  जहां से पैट्रोल आता है वहां पानी नहीं मिलता। वहां लोग ऐसी जलवायु को तरसते हैं। जिन पश्चिमी देशों में कारों का अविष्कार किया गया वही आज सायकिल को स्वास्थ्य के लिये उपयुक्त बताते हैं। ऐसी और कूलरों के वश में होते जा रहे लोगों का इस पर्यावरण प्रदूषण का पता नहीं चलता। आजकल अस्पताल फाइव स्टार होटलों जैसे हो गये हैं उनको अगर अपनी बीमारी के इलाज के लिये वहां जाने पर घर जैसी सुविधायें मिल जातीं हैं।  मगर गरीब जिसके लिये स्वास्थ्य ही अब एक पूंजी की तरह है उसको भी कहां फिक्र है? किसे ने पेड़ काटने के लिये बुलाया है तो उसे अपनी रोटी की खातिर यह भी करना पड़ता है। </p>
<p>पर्यावरण के दुश्मन कहीं हमसे अधिक दूर नहीं है और न अधिक शक्तिशाली है पर अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से गुलामी की मानसिकता से लबालब इस देश में केवल बातें ही होती हैं। पेड़ इसलिये काट दो कि सर्दी में धूप नहीं आती या फिर घर में शादी है शमियाना लगवाना है। किसी भी जंगल में शेर कितने हैं पता ही नहीं चलता। आंकड़े आते हैं पर कोई उनको यकीन नहीं करता। आखिर वहां शिकारी भी विचरते हैं। शेरों के खालों के कितने तस्कर पकड़े गये सभी जानते हैं।  आदमी के मन में ही पर्यावरण का दुश्मन। शेर हो या हरिण उसका शिकार करना ऐसे लोगों के लिए शगल हो गया है जो उसकी खाल से पैसा कमाते हैं या अपनी प्रेमिका को प्रभावित करने के लिए अपना कौशल दिखाते हैं। एक नहीं पांच-पांच खालें बरामद होने के समाचार आते हैं पर जो नहीं आते उनकी गणना किसने की है। </p>
<p>लोग पेड़ पौधों के लिए चिंतित नहीं है जितना पेट्रोल के पैसे बढ़ने से दिखते हैं। वह पैट्रोल जो गाड़ी में डलने से पहले और बाद दोनों स्थितियों में चिंता का विषय है।ऐसे में पर्यावरण पर मैं क्या लिखता? </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लाग लेखक (http://) का मतलब एक सामान्य उपभोक्ता-आलेख  ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=413</link>
<pubDate>Tue, 03 Jun 2008 12:57:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=413</guid>
<description><![CDATA[हिंदी ब्लाग जगत का व्यवसायिक रूप करीब-]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i21.tinypic.com/14oac0.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' />हिंदी ब्लाग जगत का व्यवसायिक रूप करीब-करीब मैंने समझ लिया है और अब मुझे किसी तरह का कोई भ्रम नहीं है। एक बात बिल्कुल स्पष्ट है कि केवल लिखने के दम पर यहां कमाना अभी तक तो अंसभव है। निरंतर लिखते हुए मैंने यह अनुभव किया कि उससे मुझे कोई आर्थिक या सामाजिक लाभ होने वाला नहीं है। हिंदी के सभी ब्लाग एक जगह दिखाये जाने वाले एग्रीगेटरों पर अक्सर मैं देखता हूं तो पता हूं कि मुझे वहां लोकप्रियता पाने का विचार तो छोड़ ही देना चाहिए क्योंकि कई ऐसी स्थितियां हैं जो कभी मेरे अनुकूल नहीं होंगी। उसके लिए जिस प्रकार के रणनीतिक कौशल की आवश्यकता है वह मुझमें नहीं है। </p>
<p>कई बार ऐसे विज्ञापन मेरे सामने आते हैं जिसमें ऐसा संदेश होता है कि जैसे वह आपको फ्री वेबसाइट बनाने का आमंत्रण दे रहे हों पर जैसे ही उसमें घुसते हैं पता चलता है कि यह सब एक छलावा है। फ्री ब्लाग बनाओ उस पर लिखते जाओ। गूगल का विज्ञापन उस पर लगाओ और इस आशा में लिखते जाओ कि शायद कुछ मिल जायेगा तो वह एक स्वप्न है। अभी तक वही कमा रहे हैं जिन्होंने डोमेन खरीदा है यानि वेब साइट बनाई है।</p>
<p>मेरा एक मित्र है जिसकी बिल्कुल भी अंतर्जाल में रुचि नहीं है। उसका बेटा साफ्टवेयर का कुछ काम जानता है। अभी तक बेरोजगार है। मैने अपने मित्र को अपने ब्लाग के बारे में बताया था तो उसने मुझसे पूछा था कि‘ क्या मुझे उससे आय हो रही है।‘ मेरे इंकार करने पर उसने बताया कि उसका बेटा किसी व्यक्ति के साथ वेबसाइट बना रहा है और उससे उनको आय होने की संभावना है। उससे मिली जानकारी के आधार पर पता चला कि उसका लड़का तो फिर अलग हट गया और उस वेबसाइट पर कुल पंद्रह हजार बनाने का खर्चा आया। मेरे मित्र ने ही बताया कि उनको आय के रूप में एक चेक मिल चुका है।  आज मैंने उस वेबसाइट का निरीक्षण किया। मैंने अपने मित्र से कहा था कि वह उस वेबसाइट बनाने वाले को मेरे ब्लाग का पता पूछकर उससे राय मांगे। मेरे मित्र ने कुछ और समझा और आकर मुझे बताया कि तुम्हारे  ब्लाग की सामग्री उसके  काम की नहीं है। </p>
<p>मैंने आज उस वेबसाइट को देखा। विशुद्ध रूप से साफ्टवेयर के व्यवसाय से जुड़ी उस वेबसाइट का निर्माण मेरे ब्लाग बनाने के बहुत  बाद हुआ और उसे चेक भी मिल गया। उसके विज्ञापन देखे तो मुझे लगा कि इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होना चाहिए। अंतर्जाल पर आय  के जरिये बने यह अच्छी बात है। मैंने हमेशा ही कहा है कि जिनके लिए यह व्यवसास बन सकता है वह अपने परिश्रम में कोई कमी नहीं रखें। जैसे जैसे मैंने गौर किया तो पाया कि  उस बेवसाइट पर हिंदी में भी मनोरंजन और साहित्य जैसा कुछ दिखाने का प्रयास हो रहा है। पर उसका जो मुख्य पृष्ठ है उसमें अंग्रेजी में ही साफ्टवेयर के बारे में लिखा हुआ है। उसके वेबसाइट के मालिक ने मेरी विषय सामग्री के बारे में कहा कि वह उसके काम की नहीं है पर उसने यह भी बताया था कि केवल एक-दो कविता या  आलेख उसने देखा था। मेरे मित्र का कहना था कि उसने यह भी कहा कि जब तक वह डोमेन नहीं लेंगे उनकी आय की संभावन नगण्य ही है। </p>
<p>वह मेरा मित्र अंतरंग है और जब भी मिलता है ब्लाग के बारे में चर्चा करते हुए कहता है कि-‘कुछ पैसा खर्च करो तो तुम्हें भी आय हो जायेगी। इस तरह केवल लिखने से काम नहीं चलेगा।‘</p>
<p>मैं उसकी बात सुनकर हंसता हूं। मुझे ताज्जुब होता है कि अंतर्जाल के बारे में कोई जानकारी न होने के बावजूद वह यह बात बड़े आत्मविश्वास से अपनी बात  कहता है। उसको यह ज्ञान मेरे और अपने बेटे द्वारा बतायी गयी बातों पर ही आधारित है।  बहुत दिन तक उसकी बातों का विश्लेषण करता रहा। अब मेरे सामने वैसे ही निष्कर्ष आ रहे हैं जैसा वह कहता आया है। </p>
<p>अनेक अंतर्जाल लेखक समय समय पर अपने  विचार प्रकट करते रहे हैं यह अलग बात है कि कुछ अपनी व्यवसायिक मजबूरियों के कारण लिखते नहीं है और लिखते हैं तो संभवतः छदम नामों से। वजह यह है कि कोई भी संतुष्ट नहीं है। एक ब्लाग लेखक ने इस पर जमकर लिख था और उसे मैंने अपने दिमाग में पूरी तरह स्थापित कर लिया। उसने तो  यह भी लिख दिया कि डोमेन बेचने वालों ने बहुत आशा से अपना काम प्रारंभ किया परंतु उन्हें बहुत निराशा हाथ लगी। उसने डोमेन बेचने वाली कंपनियों के बाकायदा नाम देते हुए उनके गुणों के साथ दोषों का भी वर्णन किया। केवल ब्लाग लिखने से कमाई नहीं होगी ऐसा उसने नहीं लिखा पर उससे मुझे यह बात भी लगी।<br />
अनेक ब्लाग लेखक अप्रत्यक्ष रूप से कई ऐसी बातें कह जाते हैं कि उसके प्रभाव क्या होंगे इसकी कल्पना तक नहीं कर सकते। डोमेन बेचने वाली कंपनियों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने का साहस उस ब्लागर ने वर्डप्रेस के ब्लाग पर ही किया-मैंने इस बात पर गौर किया। वर्डप्रेस के ब्लाग पर लिखना मतलब फ्री में लिखना है पर उसने लिखा। </p>
<p>अब कई ब्लाग धीरे-धीरे वेबसाइट के रूप में परिवर्तित होते जा रहे हैं। इनमें से कुछ को मैंने लिंक भी किया है। इसके बावजूद मुझे ऐसा लग रहा है कि वेबसाइट धारक और ब्लाग धारक अपने आप में एक विभाजन है-यह विभाजन भी मैंने नहीं बल्कि एक ब्लाग लेखक ने ही किया है जो अब स्वयं वेबसाइट चला रहा है। हां, यह अंतर अब लिखने और पढ़ने पर भी दिखने लगा है। मैं अर्थशास्त्र का विद्यार्थी और परिवार की व्यापारिक पृष्ठभूमि के कारण कई ऐसी चालाकियों को आसानी से देख लेता हूं जो कोई अन्य नहीं देख लेता। किसी ने ब्लाग को वेबसाइट बनाया इस पर  भी कोई आपत्ति नहीं है और जिसने बनवाई उसमें भी मैं दोष नहीं देखता। जब शुरूआती दौर में मैं ब्लाग लेखकों को अपना उत्साह बढ़ाते हुए देखता था तो सोचता  कि क्या यह सभी केवल शौकिया ही ऐसा कर रहे हैं या उनका कोई व्यवसायिक उद्देश्य है। अंतर्जाल पर हिंदी लिखने का अभियान कई लोगों ने चला कर रखा है पर धीरे-धीरे सबकी असलियत सामने आती जा रही है। मुझे अपना ब्लाग वेबसाइट में बदलना आता ही नहीं इसलिये यह संभव नहीं है। दूसरा यह कि जिन ब्लाग लेखकों ने बनाकर आय अर्जित की है उनकी आय का सही अनुमान लगाते हुए यह भी लगता है कि अभी इतनी आय उनको नहीं होती जितनी कि घर के लिए आवश्यक है। एक बात तय रही कि हिंदी को अंतर्जाल पर लिखने के अभियान में सभी लोग शौकिया नहीं है उनमें कुछ लोगों  उदद्ेश्य यह भी है कि किसी तरह डोमेन बिकवाये जायें। हो सकता है कि यह सच किसी को कड़वा लगे पर मुझे वह यहां दिखाई देते हैं। मजे की बात यह है कि वेबसाईट धारक लोगों ने ही ऐसी बातें लिखी हैं जिससे मैं यह सब विचार बनाता गया हूं। </p>
<p>यहां यह भी स्पष्ट कर दूं कि मैं कई बातें यहां नहीं लिख रहा क्योंकि सभी लोगों के प्रति मेरे मन में मैत्री भाव है। मैं यह भी बता सकता हूं कि किस तरह उन वेबसाईट धारकों को इतने पाठक मिल जाते हैं जिनसे उनके विज्ञापन खाते दूसरों के बनिस्बत अधिक चलायमान होते हैं-शायद वह स्वयं भी नहीं समझते होंगे। कुछ अंतर्जाल लेखकों की गतिविधियों से ही मुझे यह आभास हो जाता है कि वह किस तरह लाभ उठा रहे हैं। एक ब्लाग लेखक ने दूसरे का संदर्भ देते हुए लिखा कि ‘मैं 1000 ऐसे पाठक लेकर क्या करूंगा जो मुझे एक पैसा भी नही दिलवा सकते। मैं तो ऐसे 10 पाठक ही चाहूंगा जो मुझे कुछ दिलवा सकें।’ अब इसमें मुझे दिमाग चलाने की अधिक आवश्यकता नहीं पड़ी।’ </p>
<p>यहां दो तरह के लोग लाभ उठाने वाले लगते हैं। एक तो जो डोमेन बिकवाना चाहते हैं दूसरा वह लोग हैं जो यहां थोड़ा बहुत लिखकर बाहर अपनी छवि बनाना चाहते हैं। ऐसे लोग लिखने वालों को प्रेरित करते हुए दिखने का काम भी करते हैं।  कई तरह के कार्यक्रमों का आयोजन भी कर यह दिखाते हैं कि वह अंतर्जाल पर हिंदी लिखवाने के लिए कितना काम कर रहे है। पहले तो मैं समझा कि एक दो लोग हैं पर अब लगने लगा है कि एक समूह है जो इस तरह के काम में लगा है।<br />
ऐसे में मेरे जैसे आम लेखक की कोई अधिक भूमिका होती भी नहीं। मन में कभी आता है कि यार थोड़ी आय हो जाती तो और मजे का लिख लेते।  तकनीकी कौशल और प्रबंधक की प्रवृत्ति के अभाव ने कहीं भी नहीं पनपने दिया शायद यहां अवसर मिल जाये। धीरे-धीरे इस आशा को ही  छोड़ ही दिया। लाभ उठाने वाले लोगों के लिए मैं कोई प्रिय व्यक्ति नहीं हो सकता। फिर भी जो ब्लाग लेखक कमाना चाहते हैं उनके लिए यह आवश्यक है कि इन दोनों प्रकार के लोगों से संपर्क बढ़ायें। जिनको स्वांत सुखाय लिखना है वही केवल ब्लाग पर डटे रहें क्योंकि हिंदी के पाठक जैसे जैसे बढ़ने लगेंगे तब उनकी चर्चा होगी और हो सकता है तब वह लाभ ले सकें। बाकी यहां तो जब शीर्षस्थ ब्लाग लेखकों की कोई सूची किसी ब्लाग, समाचार पत्र, या टीवी चैनल पर आती है वह तो रणनीति में दक्ष ब्लाग लेखकों की आती है। केवल लिखने में ही नहीं बल्कि फोरमों पर पढ़ने में  भी रणनीति अपनायी जा रही है। आप ब्लागवाणी पर हिट देखकर अंदाजा लगा सकते हैं।<br />
फिर भी मैं मानकर चलता हूं कि कुछ तो मेरे मित्र हैं जो मुझे चाहते होंगे। आखिर मैं तो किसी से कोई आशा नहीं करता। मैं पहले भी कह चुका हूं कि मैंने अभी तक केवल एक ब्लाग लेखक के साथ प्रत्यक्ष मुलाकात की है-वह हैं श्री सुरेश चिपलूनकर।  उनके व्यक्तित्व और कृतित्व देखकर कह सकता हूं कि वह भी मेरी तरह ही हैं। कुछ लोगों का मेरे प्रति स्नेह भाव है वह मुझे द्रवित कर देता है।  ऐसे लोगोंे की संख्या यहां अधिक है  पर वह शांति से अपना लिखते हैं पर कई ऐसे लोग जो चमक रहे हैं वह अपने लिखे से कम अपनी चालाकियों से अधिक प्रभाव बनाये हुए हैं। ऐसे में आम ब्लाग लेखकों को अपने समूह बनाते हुए आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि तकनीकी रूप से ब्लाग और वेबसाइट में कोई फर्क नहीं है सिवाय इसके कि उस पर पैसा खर्च कर<br />
जल्दी पैसा कमाने की आशा कर सकते हैं।  सच मैं नहीं जानता पर वेबसाइट बनाकर भी केवल लिखकर यह संभव नहीं हैं-जिन लोगों ने पैसा कमाया है उसकी वजह उनका पुराना होना तो है ही साथ ही ब्लाग लिखने के लिए दूसरों को प्रेरित करते हुए उनको पाठक भी अधिक मिल जाते हैं-कैसे? इस पर फिर कभी।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इंसान भी अब पालतू होते हैं-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=412</link>
<pubDate>Sun, 01 Jun 2008 17:53:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=412</guid>
<description><![CDATA[कई चेहरे रोज दिखते हैं
पर फिर भी अनजान]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कई चेहरे रोज दिखते हैं<br />
पर फिर भी अनजाने रह जाते हैं<br />
मिलते हैं रोज कई लोग यहां<br />
पर सभी अपनी महफिलों में आने के<br />
दावतनामे नहीं भिजवाते हैं</p>
<p>आते हैं कई खत हमारे दरवाजे पर<br />
लिखने वाले सभी अपने नहीं हो जाते हैं<br />
सस्ती है दोस्ती<br />
एक जाम पर दोस्त बदल जाते हैं<br />
बेदर्द जमाने में लोग<br />
क्या समझेंगे दिल के इशारे<br />
उनके दिल में तो चमकते पत्थरों के<br />
घर बस जाते हैं</p>
<p>सहारे की उम्मीद किससे करें<br />
मददगार कीमत बताए जाते हैं<br />
जिनकी आंखों पर  है दौलत का पर्दा<br />
वह किसी के बहते पसीने को<br />
भला क्या देख पायेंगे<br />
जिनके कान सुनते है शोर<br />
भला किसी बेसहारे की<br />
सिसकती आवाज कहां सुन पायेंगे<br />
जुबान जिनकी गिरवी है अपने आका के पास<br />
भला सच क्या कह पायेंगे<br />
आपने हाथों रखी है अपनी कलम गुलाम<br />
मालिक के इशारे के बिना<br />
किसका नाम लिख पायेंगे<br />
इंसान  भी  अब पालतू होते हैं<br />
जो अपना  सम्मान बेच आते हैं<br />
हर जगह अपने आका के नाम<br />
लिखते और गाते नजर आते हैं</p>
<p>....................................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हिंदी ब्लागःलेखकों को नाम व नामा मिले बगैर अंतर्जाल पर पाठक जुटाना मुश्किल]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=410</link>
<pubDate>Sun, 25 May 2008 09:41:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=410</guid>
<description><![CDATA[अंतर्जाल पर लिखते हुए आप कोई बात दावे ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i23.tinypic.com/fld9ts.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' />अंतर्जाल पर लिखते हुए आप कोई बात दावे से नहीं कह सकते क्योंकि एक तो इसका क्षेत्र बृहद है और इसमें तकनीकी इतनी सूक्ष्म है कि उसमें पारंगत होना सभी के लिये संभव नहीं है। ब्लाग लिखने का विचार मुझे एक अखबार में इस पर प्रकाशित एक लेख से आया था। मुझे तकनीकी रूप से इसकी जानकारी संभवतः छ माह बाद हो पायी। लिखते हुए करीब डेढ़ वर्ष से ऊपर हो गया  है और कई बातें मुझे सोचने पर बाध्य कर देतीं हैं। मेरी इस पर शुरूआत मेरे एक मित्र द्वारा एक अंतर्जाल पत्रिका का पता ढूंढ कर उस पर अपनी किताब भिजवाने के लिए व्यवस्था करने के अनुरोध से हुआ। था। मेरी उस मित्र से मुलाकात हुई मैंने उससे पूछा-‘आपको उस पत्रिका का पता किसने दिया था?’</p>
<p>उसने बताया कि वह अब इसे भूल चुका है। वह कंप्यूटर और इंटरनेट के बारे मेंे कुछ नहीं जानता। इसका आशय यह है कि बाहर कुछ लोग हैं जो पहले से ही अंतर्जाल पर हिंदी को बढ़ावा देने के लिये काम कर रहे हैं। यह लोग अंतर्जाल पत्रिकाओं और ब्लाग पर सक्रिय हैं। अपने कार्य को करते हुए वह यह आभास देते हैं कि यह उनका काम केवल शौक की वजह से है और इनको इसमें कोई अन्य लाभ नहीं है। अपने व्यवसायिक रहस्य उजागर न करना उनकी बाध्यता है पर मैं कोई व्यवसायिक ब्लाग लेखक नहीं हूं। मुझे उनसे कोई लाभ भी नहीं है कि मैं उनके इस व्यवसाय पर पर दृष्टिपात नहीं करूं। मैं उन पर प्रहार भी नहीं करना चाहता क्योंकि दूसरे की रोजीरोटी पर प्रहार करने वाला पापी होता है। यहां केवल मैं अपनी लेखकीय प्रतिबद्धता के तहत यह जानना चाहता हूं कि आखिर माजरा क्या है? </p>
<p>मेरा अनुमान है कि अंतर्जाल पर हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में लोगों को लिखने के लिए प्रेरित करने वाली कुछ प्रायोजित संस्थाऐं और लोगों के समूह है और  जिन्हें लिखने से आर्थिक लाभ नहीं हैं उनके मित्र बनकर उन्हें प्रेरित करना शायद उनका उद्देश्य है और जिनको वह कुछ भुगतान कर रहे हैं उनको यह उत्तरदायित्व दिया गया है कि वह इन लेखकों के बीच में कुछ पाठ लिखकर और मुफ्त मे लिखने वाले ब्लाग लेखकों के पाठ पर  टिप्पणी आदि देखकर प्रेरित करते रहें। छद्म और बेनाम लोगों की सक्रियता देखकर यह संशय किसी के मन में भी उठ  सकता है। इतना ही नहीं कहीं कुछ ब्लाग लेखकों के सम्मेलन और शिविर लगाकर उनकी चर्चा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित  कर आम नागरिकों में इस ब्लाग का प्रचार कर यह लोग अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे है। कुछ संस्थाओं के पदाधिकारी समाचार पत्रों में अपने बयान देकर यह प्रकट कर रहे हैं कि हिंदी ब्लाग जगत को वह बहुत निकट से देख रहे हैं। मेरे विचार  से यह सब हो रहा है पर इसमें आपत्ति योग्य कुछ नहीं है। </p>
<p>आज एक अंग्रेजी अखबार में मैंने एक ऐसी ही संस्था और उसके पदाधिकारी की बात पढ़ी। उनका यह संदेश था कि ब्लाग लेखकों को आम दर्शक या पाठक के लिए लिखना चाहिए जैसे संपादकीय वगैरह। इस बारे में मैं एक दो ब्लाग में पढ़ चुका हूं। यह बात शुरू भी मैंने ही अपने ब्लाग पर शुरू की और आम पाठक को प्रभावित करने के लिए जितना मै कर सकता हूं कर रहा हूं। इसका आशय यह है कि हिंदी को अंतर्जाल पर स्थापित करने वालों ने इसी लाइन पर आगे बढ़ने का निर्णय किया है। मगर यह आलेख मैं  उन लोगों की प्रशंसा में नहीं लिख रहा। बल्कि उनके प्रयासों में जो कमी है उसको सबके सामने रख रहा हूं। पहले इन संस्थाओं के स्वरूप का आधार समझें। वह कौन हो सकतीं हैं? वह दावा करतीं हैं कि उनका इससे कोई आर्थिक लाभ नहीं है। उनकी सक्रियता देखकर लगता है कि-<br />
1.कोई संस्था, व्यापारिक प्रतिष्ठान या कोई कंपनी उनको प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से फीस, पारिश्रमिक या कमीशन दे रही है। एक इंटरनेट उपभोक्ता के रूप में मैं प्रतिमाह साढ़े छह सौ रुपये का भुगतान कर रहा हूं और अगर कुछ लोगों की बातों पर यकीन किया जाये तो इस देश में छह से सात सौ करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता है-इनसे कितना पैसा लिया जाता होगा यह आंकड़ों में मेरे पास उपलब्ध नहीं है पर जितना है उससे वह कंपनियां कुछ ऐसी संस्थाअें पर खर्च कर सकतीं हैं जो हिंदी और भारतीय भाषाओं में ब्लग लिखने के लिये प्रेरणा देने का काम करती हैं। इन्हीं में हिंदी पाठक ढूंंढे जा रहे हैं ताकि यह व्यवसाय बना रहे। संभव है कि गूगल जैसी संस्था भी इसके लिये भुगतान करती हो।<br />
2.कुछ लोग जिन्होंने वेबसाइट बनायीं हों और वह इसके लिए बाजार ढूंढते हुए इस काम में जुटे हों ताकि और अधिक ब्लाग बनाकर वेबसाइट के स्पेस देकर उनसे पैसा कमाया जा सके।<br />
3.इसके अलावा कोई विज्ञापन एजेंसी भी हो सकती है इसके लिए भुगतान करती हो।<br />
4. कुछ ऐसी अंतर्जाल की पत्रिकाओं के संपादकों और ब्लाग लेखकों को भी इसके लिये भुगतान किया जाता होगा।<br />
मैं किसी व्यक्ति द्वारा धन कमाये जाने का विरोधी नहीं हू पर इतना कहना चाहता हूं कि वह अपने दायित्वों का निर्वहन-भले ही वह निष्काम भाव से भी करते हों- नहीं कर रहे हैं। मेरे इस आलेख को पढ़कर कई ब्लाग लेखक और पाठक हैरान होंगे पर यह सच है कि जितने प्रयोग मेरे साथ हो रहे हैं उतने मैं भी करता हूं जो कभी कभी मूर्खतापूर्ण लगने वाली पोस्टों में दिखाई देता है। मैंने क्या देखा है।<br />
1. मेरे वर्डपेस के ब्लाग पर स्पैम में अनेक कमेंट आये और उससे लगता है िक कोई मीडिया जैसे शब्द धारण करने वाली वेबसाईटें  वहां अपने कमेंट डाल जातीं हैं और उनसे मेेरे व्यूज भी बनते हैं। कभी कभी तो संदेह होता है कि कोई अज्ञात शक्ति है जो मुझे सतत लिखने को प्रेरित कर रही है।<br />
2.ब्लाग स्पाट से पता नहीं कहां से इतने सारे व्यूज आ जाते हैं जिनके आने का मार्ग ही पता नहीं चलता। यह व्यूज हिंदी के ब्लाग दिखाने वाले फोरमों से कई गुना अधिक होते है।<br />
3.मैंने कई ऐसे लोगों को ईमेल किये जो ब्लाग लेखक नहीं हैं पर उनका कभी उत्तर नहीं आया। मैं उनको हिंदी में लिखने के लिए टूल भेजता हूं। कुछ लोगों से थोड़े दिन संपर्क रहा। उन्होंने ब्लाग भी बनाये फिर पता नहीं कहां गायब हो गये। वह छद्म नाम के लोग थे? कई बार ब्लाग के बारे में लिखे गये विषयों पर उन लोगों ने महत्वपूर्ण जानकारियां दीं जैसे बहुत अनुभवी हों। फिर गायब हो गये। मैं उनसे हार्दिक प्रेम करता हूं। आखिर कोई न कोई मुझे प्रेरित करने के लिए लगा ही रहता है। वह मनुष्य हैं चाहे जो भी नाम हों पर उनसे मुझे कोई शिकायत नहीं है। मुझे प्यार देने वाले लोगों के शब्द इस तरह होते हैं जैसे एक या दो लोग हैं जो नाम बदल बदलकर प्रकट होते है।<br />
मुझे सिर्फ एक बार अखरी। यह संस्थाएं या लोग मीडिया से जुडे+ हैं पर एक भी स्थान पर मेरा नाम नहीं दिया। अभी तक यह पुराने ब्लाग लेखक वह भी जो बड़े शहरों में रहते हैं उनका नाम दिया। वह प्रेस कांफ्रेंस करते हैं और अपने नाम देते हैं पर क्या कभी इस हिंदी ब्लाग जगत में वास्तविक नाम से सक्रिय छोटे शहरों के ब्लाग लेखकों को प्रसिद्ध करने में कोई योगदान दिया। अगर वह ऐसा करते तो हो सकता है कि हमें पाठक अधिक मिल जाते और उनका काम शायद और आसान हो जाता। यहां टिप्पणियां लिखकर ही अपना दायित्व समाप्त मान लिया और हमें छोड़ दिया अकेले पाठक जुटाने के लिए। 2000 हजार से अधिक पोस्ट लिखकर भी मैंने क्या पाया है? यह मेरे नहीं उनके सोचने का विषय है।</p>
<p>मुझे वह लोग लिखते हैं कि तुम्हारे लेख का उपयोग करना चाहते हैं और जब सम्मति देता हूं तो लिखते हैं कि छः माह बाद करेंगे-ऐसा लगता है कि मुझे अपने बड़े ब्लाग लेखक होने का भ्रम हो जाये जो आज तक नहीं हुआ। मुझे पता नहीं अदृश्य प्रायोजक कौन है पर यह सच है कि हिंदी ब्लाग जगत पर लिखवाने का उत्तरदायित्व लेने वालों ने सही नीति नहीं अपनाई। कभी कभी तो मन करता है कि मैंने दूसरों के उद्देश्यों की पूर्ति की पर मेरी सफलता मुझसे दूर है। न नाम मिला न नामा इसलिये अपने सारे ब्लाग ही नष्ट कर डालूं पर फिर सोचता हूं देखें आगे-आगे होता है क्या? वैसे गुस्सा आने पर यह मैं कर सकता हूं। एक दिन मैंने अपनी सारी प्रकाशित रचनाएं फाड़ दी थीं।<br />
अंतर्जाल पर हिंदी लिखने का काम मंथर गति से चल रहा है और उसके लिये वही लोग जिम्मेदार हैं जिन्होंने पैसा लेकर या अपनी इच्छा से यह काम अपने हाथ में लिया। इसका कारण वही है कि हिंदी के लेखक को सम्मान और धन से वंचित कर अपने लिऐ रोटी जुगाड़ करने की जो प्रवृत्ति पुराने प्रकाशकों में थी अब वही अंतर्जाल पर हो रहा है। यह मेरी शिकायत नहीं बल्कि उनके कामों का प्रतिवेदन है जिससे पता लगता है कि वह अपने काम में नाकाम रहे। </p>
<p>उनको छः करोड़ उपभोक्ता दिख रहे हैं और उनमें ही यह चार पांच सौ ब्लाग लेखक भी। इनमें उन्होंने 10 से पंद्रह लोगों को अपना साथी बना रखा है और सोचते हैं कि बाकी तो उपभोक्ता हैं जैसे अन्य छः करोड हैं। फिल्मी अभिनेताओं और कुछ माडलनुमा कवि-शायरों से भी ब्लाग बनवा लिया और लगे है उसका प्रचार करने। यह नहीं कि जमीन से उठे ब्लाग लेखकों को प्रचार दें जो  वाकई लिखकर मेहनत कर रहे हैं। अंतर्जाल पर निकलने वाली पत्रिकाओं के सपंादकों और ब्लाग लेखकों के जो सम्मान के समाचार आते हैं और तब यह समझते मुझे देर नहीं लगती कि कोई समूह है जो इस तरह की  गतिविधियों में लगे हैं।  समूह के एक व्यक्ति की नाराजी से पूरे समूह के नाराज होने का प्रमाण मेरे पास है पर उसका कोई फायदा नहीं क्योंकि वह तो किसी से जुड़े हैं और उनकी नहीं बजायेंगे तो तो क्या मुझे समर्थन देंगे।<br />
मैं अपनी बात तो कहता ही रहता हूं पर आज यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि सामान्य ब्लाग लेखकों को उनके लिखने के आधार पर अगर सम्मान और धन नहीं मिलेगा तो यह अभियान कभी सफल नहीं होगा। बड़े नामों के सहारे यह हिंदी ब्लाग जगत आगे नहीं बढ़ सकेगा। छहः करोड़ इंटरनेट उपभोक्ताओं में सभी नहीं लिखेंगे बल्कि पढ़ना चाहेंगे और यह छह सौ ब्लाग लेखक अगर उनसे अलग कर देखें जायें तो इनमें ही इतना सामथर््य है कि वह पाठकों को जुटा लेेंगे। समस्या यह है कि उनको नाम और नामा (अगर दिया जा सकता है तो) देना नहीं चाहते। मैं देख रहा हूं कि किस तरह के लोग नाम जुटा रहे हैं। यह लेख भी अब मुझे थका रहा है और शायद अब मैं इतनी अधिक पोस्ट नहीं लिखूं जितनी लिखता हूं। मेरे यह सच छिपा नहीं है कि लोग स्वयं आर्थिक लाभ ले रहे हैं। होटलों और रेस्टराओं में कौन आखिर पैसे खर्च कर रहा है? इतने बड़े-बड़े सम्मेलन हो रहे हैं और अंतर्जाल की पत्रिकाओं के संपादक और ब्लाग लेखक वहां पहूंचकर सम्मानित हो रहे है क्या उसमें पैसे खर्च नहीं होते? यह सब हो इसमें कोई आपत्ति नहीं है पर छोटे शहर के मध्यम वर्ग के ब्लाग लेखकों को प्रोत्साहित किये बिना अंतर्जाल पर पाठक जुटाने लायक लिखना संभव नहीं है। ब्लाग लेखकों का उपभोक्ता मानकर चलना एक मूर्खतापूर्ण विचार है।  </p>
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<title><![CDATA[मन के रोग का इलाज तो मन ही में है-आलेख]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=409</link>
<pubDate>Sun, 18 May 2008 07:22:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
आयु में वह मुझसे चार वर्ष बड़ा है पर फि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><strong><br />
आयु में वह मुझसे चार वर्ष बड़ा है पर फिर भी उसकी मेरे से मित्रता बरसों पुरानी है। वह आर्केस्टा चलाता है। मैं  कई बार विद्यालयों, महाविद्यालयों और सार्वजनिक स्थानों पर उसका कार्यक्रम सुन चुका हूं। उसने कभी मुझे स्वयं इस तरह के कार्यक्रमों में आमंत्रण नहीं दिया क्योंकि उसकी और मेरी मित्रता ऐसी भी नहीं रही। वह जब कहीं मिलता है तो उससे बड़ी आत्मीयता से बातचीत हेाती हैं। इस तरह  मेरे चार मित्र हैं जो रास्ते पर मिलते हैं और आत्मीय रूप से बातचीत कर अलग हो जाते हैं। यह आर्केस्ट्रा चलाने वाला मेरा मित्र कैसे बना यह तो मै भी नहीं जानता। हां, इतना याद है कि कुछ वर्ष पहले मैं अपनी एक रचना देने अखबार में गया तो वह वहीं काम से खड़ा था तब उसकी और मेरी बातचीत शुरू हुई। बाद में तो वह उस अखबार के दफ्तर में भी आता रहा जहां मैं काम करता था। </p>
<p>एक हिंदी फिल्म का गाना है। शायद पड़ौसन का! इक चतुर नार, बड़ी होशियार....................उस गाने को वह जिस तरह मंत्रमुग्ध ढंग से गाता है वह मन को छू लेता है। वह जब भी कहीं जाता है लोग इस गाने की फरमाइश अवश्य करते है।</p>
<p>उस दिन रास्ते चलते हुए उससे मुलाकात हुई। मुझसे कहने लगा-‘यार आजकल तो ऐसा लगता है कि अधिकतर लोगों को साइकिटिस (मनोचिकित्सक)की आवश्यकता हैं। आजकल लोग क्या बात करते हैं समझ में नहीं आता।’<br />
मनोचिकित्सक शब्द से मैं सतर्क हो गया। मैने उससे पूछा-‘क्या हुंआ।’<br />
वह बताने लगा कि-‘ ‘‘मैं अभी एक आदमी के घर उसके लड़के की शिकायत लेकर गया था। वह मेरे भाई से बेकार में लड़ता रहता है तो वह कहने लगा कि बचपन में उसके लड़के को सिर पर चोट लगी थी तो उसके दिमाग में खराबी पैदा हो गयी थी। अब बताओं भला ऐसा कहीं होता है। अच्छी तरह खाता पीता है, बात करता है। भला ऐसा कहीं ऐसा होता है’’?’<br />
मैंने कहा-‘‘पर उसने जब स्वयं कहा है तो होगा? वह अपने लड़के की इस कमजोरी को स्वयं ही मान रहा है क्या यही कम है।’<br />
उसने कहा-‘‘हां यह बात तो सही है। उस आदमी ने बरसों से स्कूटर तक नहीं चलाया। शायद यही वजह रही होगी, पर मैं उसे अकेले की बात नहीं कर रहा। ऐसा लगता है कि मांबाइल, कंप्यूटर और तथा अन्य आधुनिक साधनों के उपयोग से अधिकतर  लोग कही मानसिक रोगों का शिकार तो नहीं हो रहे।’</p>
<p>मैंने हंसते हुए कहा-‘आप तो जानते हो कि किसी अन्य व्यक्ति को मनोरोगी बताकर मैं अपने को मनोरोगी घोषित नहीं करना चाहतां।’<br />
वह जोर से हंसा-‘अच्छा! याद आया! वही जो तुमने मानसिक चिकित्सालय के बोर्ड पर लिखी बातों का जिक्र किया था। हां, मैं भी सोचता हूं कि इस तरह दूसरों को मनोरोगी मानना छोड़ दूं।’</p>
<p>मेरा एक अन्य लेखक मित्र है और वह एक दिन मनोचिकित्सालय गया था। वहां उसने एक बोर्ड पढा, जिस पर दस प्रश्न लिखे थे। साथ ही यहा भी लिखा था कि अगर इन प्रश्नों का उत्तर ‘हां’ है तो आपको मानसिक चिकित्सा की आवश्यकता है। मुझे वह सभी प्रश्न याद नहीं है पर जितने याद हैं उतने लिख देता हूं। उस लेखक मित्र की बेटी ने उसे ब्लाग तो बना दिया है पर उसने  अभी उस पर मेरे कहने के बावजूद लिखना शुरू नहीं किया। जब वह लिखेगा तो उससे कहूंगा कि वह दस के दस प्रश्न वैसे ही लिख दे। उनमें से जो प्रश्न मुझे याद हैं वह नीचे लिख देता हूं। </p>
<p>1.क्या आपको लगता है कि आप सबसे अच्छा व्यवहार करते हैं पर बाकी सबका व्यवहार खराब है।<br />
2.क्या आपको लगता है कि आप हमेशा सही सोचते हैं बाकी लोग गलत सोचते है।<br />
3.क्या आपको लगता है कि आप दूसरों की सफलता देखकर खुश होते हैं और बाकी लोग आपकी सफलता या उपलब्धि से जलते है।<br />
4. आप दूसरों का भला करते हैं पर सभी लोग आपका बुरा करने पर आमादा होते है।<br />
5. क्या आपको लगता है कि आपकी नीयत अच्छी है  अन्य सभी लोगों की  खराब है।<br />
6.आप सबसे अच्छा काम करते हैं पर उसकी कोई सराहना नहीं करता जबकि दूसरों के खराब काम को भी आप सराहते है।</p>
<p>मैने जब अपने मित्र की बात सुनी तबसे अपने आपको यह यकीन दिलाने का प्रयास करता हूं कि मैं मनोरोगी नहीं हूं। कई बार जब तनाव के पल आते है तब मैं सोचता हूं कि कहीं मैं मनोरोगी तो नहीं हूं तक यह प्रश्न अपने मन में दोहरात हूं साथ ही यह उत्तर भी कि नहीं। ताकि मुझे यह न लगे कि मै मनोरोग का शिकार हो रहा हूं।<br />
अगर मैं कहीं ने लौटता हूं और मुझसे कोई पूछता है कि‘आपके साथ वहां कैसा व्यवहार हुआ?’<br />
बुरा भी हुआ हो तो मैं कहता हूं कि‘अच्छा हुआ’<br />
कोई पूछे-‘अमुक व्यक्ति कैसा है?’<br />
मैं कहता हूं-‘ठीक है?’<br />
अंतर्जाल पर कोई बात लिखते हुए  कई बार यह स्पष्ट लिख देता हूं कि मैं कोई सिद्ध या ज्ञानी नहीं हूं जो मेरे विचार में परिवर्तन की संभावना न हो। इसके साथ ही यह भी बता देता हूं कि अपने लिखे का अच्छे या बुरे न होने का भार मै अपने मस्तिष्क पर नहीं डालता।<br />
दूसरो का लिखा अगर समझ में न आये या अच्छा न लगे तब भी वहां नहीं लिखता कि यह ठीक नहीं है। सोचता हूं कि मुझे मुझे ठीक नहीं लगा तो क्या दूसरों को अच्छा लग सकता है। अगर किसी जगह प्रतिवाद स्वरूप टिप्पणी लिखनी तो जरूर लिखता हूं कि भई,  आपके विचार पर मेरा यह विचार है  परं और उससे पहले भी सोच लेता हूं कि वह बात इन प्रश्नों के दायरे ने बाहर है कि नहीं। प्रशंसा करना मनोरोग के दायरे में नहीं आता है पर आलोचना कहीं मनोरोग के प्रश्नों के दायरे में तो नहीं यह अवश्य देख लेता हूं।’</p>
<p>वैसे दूसरे क्या सोचते हैं यह अलग बात है। हां, अपने अंदर जरूर आजकल देखना चाहिए कि कहीं हम मनोरोग का शिकार तो नहीं हो रहे। हम जिस तरह विद्युतीय प्रवाह से चुंबकीय प्रभाव उत्पन्न करने वाली वस्तुओं का उपयोग कर रहे हैं उसको देखकर मुझे लगता है कि हमारे अंदर मनोरोगों का होना कोई बड़ी बात नहीं है। मैं डरा नहीं रहा हूं। हो सकता है कि शुरू में आप डर जायें पर एक बात याद रखें कि मनोरोगों की दवा भी मन में ही है और जब आप जान जायेंगे कि आप में उसका कोई अंश है तो बिना बताये अपना इलाज भी शुरू कर देंगे। जैसे मैंने अपने मित्र की बात सुनकर तय किया कि अब अपने मुख से अपनी प्रशंसा नहीं करूंगा और कोई करे तो उस  पर नाचूंगा नहीं।  किसी को अपने से कमतर नहीं बताऊंगा । अपनी वस्तु या पाठ को दूसरे के पाठ से श्रेष्ठ बताने का प्रयास से स्वयं परे रहूंगा। मन का इलाज मन से करने का प्रयास किया है अब सफल हुआ कि नहीं यह मुझे भी पता नहीं। </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गिरने से पहले वह डालियां सीना तानकर खड़ी थीं]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=408</link>
<pubDate>Thu, 15 May 2008 17:58:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[ हम किसी बड़ी इमारत में ऐसी जगह बैठे है]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> हम किसी बड़ी इमारत में ऐसी जगह बैठे हैं जहां दिन में भी बिजली जलाना पड़ती है। इस कारण चारों तरफ रोशनी बिखरी रहती है। खिड़किया खुली हैं और उन पर रंग बिरंगे पर्दे लहलहा रहे हैं। बाहर तेज गर्मी है और लोग अंदर ऐसी और कूलर में आनंद के साथ बैठकर  एक दूसरे से बात कर रहे हैं। अचानक आंधी आती है। बहुत जोर की आंधी हमला करती हुई प्रतीत होती है तो सारा दृश्य बदल जाता है। बिजली चली आती है और खिड़कियां से  पल्ले आपस में इतने भयानक रूप से लड़ते हैं जैसे भूतों की कोई फिल्म देख रहे है। खिड़किया बंद कर धूल को अंदर रोकने का प्रयास भी भयानक होता है। अचानक कांच टूटकर आदमी के शरीर पर आ गिरने का खतरा दिखाई देता है। बाहर भी अंधेरा अंदर भी अंधेरा। जो मन अभी दूसरों के साथ बैठकर अंदर बाहर प्रकाश की अनुभूति कर रहा था वह भी अंधेरे में बैठा दिखाई देता है। हंसी ठिठोली के साथ बात करते हुए लोग भयभीत हो जाते हैं।  अगर कोई घर से बाहर है तो वह मोबाइल से फोन कर अपने परिवार वालों को सूचित करता है कि ‘मै इधर ठीक हूं तुम घर का ख्याल रखना’। बाहर वायु देवता के प्रकोप से उपजी आंधी चल रही है और मन में चिंताओं की चिता जल रही है। </p>
<p>सच मौसम की तरह जीवन है या यूं कहें कि जीवन की तरह मौसम है। कब मौसम बदले और कब जीवन का रूप कौन जानता है।</p>
<p>मैं रास्ते में स्कूटर पर हूं। आंधी से उड़ती धूल मुझ पर आक्रमण कर मेरी आंखों में प्रवेश कर चुकी है। वह धूल जो कई बार मेरे पांव तले रौंदी गयी है वह हवा के सहारे उड़कर मेरा मार्ग अवरुद्ध करती दृष्टिगोचर हो रही है वह शक्ति का प्रदर्शन कर बता रही है कि प्रतिदिन रौंदे जाने का आशय यह कतई नहीं है कि उसकी कोई शक्ति नहीं है।  मैं रुकने के लिये इधर उधर देखता हूं। कुछ पेड़ खड़े दिखाई देते हैं। इनके नीचे कई बार वर्षा होने पर मैंने आश्रय लिया है। यह मेरे प्रतिदिन का मार्ग है पर आज अजनबी हो गया लगता है। मैं इन पेड़ों के नीचे आश्रय लेने की सोच भी नहीं सकता। अचानक वर्षा भी शूरू हो जाती है। मैं स्कूटर लेकर आगे बढ़ता जा रहा हूं। मुझे अपने अंदर ही लड़खड़ाहट का अनुभव होता है। आखिर एक बंद दुकान के नीचे रुकने का निर्णय करता हूं। वहां एक अन्य पथिक भी शायद आश्रय लेकर खड़ा है। मैं स्क