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	<title>व्यंग्य-कविता &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/व्यंग्य-कविता/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "व्यंग्य-कविता"</description>
	<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 13:26:42 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[कुछ इधर की, कुछ उधर की-व्यंग्य आलेख]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=540</link>
<pubDate>Mon, 23 Jun 2008 16:25:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=540</guid>
<description><![CDATA[मैं जैसे ही स्कूटर से उतरा तो मेरे मित]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मैं जैसे ही स्कूटर से उतरा तो मेरे मित्र ने मुझे देखते ही कहा-‘पिटवा दी भद्द। टोक दिया न उडन तश्तरी ने कि आजकल तो दनादन कवितायें लिखते जा रहे हो। क्या बचा अब? मना करता हूं कि इतनी सारी कवितायें मत लिखो।’</p>
<p>मैं उसकी बात सुन रहा था। कल मैंने अपने ब्लाग/पत्रिका पर छहः कवितायें प्रकाशित की थीं और मेरे ब्लाग लेखक मित्र समीर लाल ‘उडन तश्तरी’ ने एक जगह सहज भाव से लिख दिया कि ‘आजकल तो दनादन कवितायें लिखी जा रही हैं। मेरा मित्र उसका ही हथियार बना मेरी मजाक बना रहा था। </p>
<p>मैंने भी बनते हुए गंभीरता से कहा-‘हां यार! मेरी एक कविता तैयारी पड़ी थी वह इसलिये ही मैंने पोस्ट नहीं की कि कहीं अपनी छबि खराब न हो जाये। बाकी लोग तो इतना नहीं देखते जितना समीरलाल की दृष्टिपथ में आता है। वैसे तुमने कब देखी उनकी टिप्पणी?’<br />
वह बोला-‘कल रात ही देखी।’वह ऐसे बोल रहा था जैसे कि कोई नया राज बता रहा हो-‘ कल मेरा टीवी खराब हो गया था तो सोचा चलो तुम्हारे ब्लाग ही पढ़ डालें। हमने सारे ब्लाग देख मारे। तुमने कल छहःकवितायें लिख मारीं। यार, हमें तो किसी को यह बताते हुए भी शर्म आये कि हमारा कोई ब्लागर दोस्त छह कवितायें लिख सकता है। ऐसे ब्लागर से दोस्ती रखने पर तो हमारी दूसरी मित्र मंडलियां हमें बिरादरी से बाहर भी निकाल सकती हैं।’<br />
मेरा एक अन्य मित्र हंसते हुंए इस संवाद को सुन रहा था वह बोला-‘‘यार, तुम कवितायें कम लिखा करो। यह हमेशा रोता रहता है कि वह लेख या व्यंग्य नहीं लिखता।’<br />
मैंने अपने पहले मित्र से कहा-‘‘वैसे कल तुम्हारा टीवी खराब था इसलिये तुमने यह सब देखा। अगर टीवी खराब नहीं होता तो तुम क्या करते?’</p>
<p>वह बोला-‘वही देखते। हां, तुम्हारे इतने सारे ब्लाग एक साथ नहीं देखते और यह पता नहीं चलता कि तुमने कितनी कवितायें लिखीं हैं। हम तुम्हारे ब्लाग से यह तो पढ़ ही लेते है कि तुमने कौनसी तारीख को लिखा था। अगर पुरानी तारीख का होता है तो मैं नहीं पढ़ता। तुम यार कोई व्यंग्य, कहानी या चिंतन लिखा करो। यह कवितायें हमेंं पसंद नहीं है।’</p>
<p>मैंने कहा-‘पुरानी तारीखों से तुम्हारा क्या आशय है? अरे भई, मै। लिख रहा हूं डेढ़ बरस से और तुम पढ़ रहे हो तीन महीने से। पहले बहुत सारे व्यंग्य और कहानियां लिखे हुए हैं। तुम उनको पढ़ा करो। वह सम सामयिक तो हैं नहीं कि उनका प्रभाव नहीं पड़ता हो।</p>
<p>वह तुनक कर बोला‘-यार, हम कहीं में जाते हैं तो पुरानी पत्रिका या समाचार पत्र देख कर उसे पढ़ने का मन नहीं करता। अगर मजबूरी में कहीं पढ़ना पड़ता है तो यह बात मन में बराबर बनी रहती है कि हम पुराना पढ़ रहे है। मैं तुम्हारे ब्लाग को भी इसी तरह पढ़ता हूं फिर तुमने अपने ब्लाग पर अपने नाम के साथ पत्रिका शब्द जोड़ रखा हैं। जिस ब्लाग को मैं खोलता हूं उसमें अगर तुम्हारे लिखे पर पुरानी तारीख होती है तो तुम्हारे दूसरे ब्लाग और वहीं अन्य ब्लागर मित्रों के ब्लाग खोलकर पढ़ता हूं। उनके पढ़ने पर भी यही हाल रहता है।’<br />
मैंने हंसकर पूछा-‘तो जो पुराना लिखा है उसका क्या करें? वैसे अंतर्जाल पर नया पुराना क्या होता है यह मेरी समझ से परे है। वहां हमारा हर पाठ स्वतंत्र ढंग से खुलता है। वह तो मेरी वजह से तुम्हें मेरे और मेरे मित्रों के ब्लाग इतनी आराम से मिल  रहे हैं वरना अगर तुम स्वयं प्रयास करते तो तुम्हे सभी ब्लाग के पाठ तुम्हारें सर्च के हिसाब से मिलेंगे। वहां तुम्हारे लिये नये पुराने के नखरे नहीं चल सकते।’</p>
<p>अन्य मित्र ने बहस में हस्तक्षेप करते हुए कहा-‘यार, तुम इसके लिए अपने पुराने लेखों को ही दोबारा प्रकाशित कर दो । कंप्यूटर पर तुम सब करना जानते हो। कापी कर फिर पेस्ट कर दो। इसको क्या पता लगेगा कि पुराना लिखा हुआ है। वहां तो नयी तारीख आ जाती होगी।’</p>
<p>मेरा पहला मित्र बोला‘-हां, यह ठीक है। मुझे क्या पता लगेगा?नये पुराने का टैंशन नहीं होगा तो फिर आराम से पढ़ लूंगा।’</p>
<p>मैंने हंसते हुए कहा-‘क्या खाक ठीक होगा? एक बार समीरलाल ‘उडन तश्तरी’ ने ब्लाग स्पाट के ब्लाग से वर्डप्रेस पर रखी गयी ऐसी ही पोस्ट के बारे में लिखा था कि‘यह पोस्ट पढ़ी हुई लग रही है। अब किसी और ने ऐसा लिख दिया तो तुम्हीं फिर रोते फिरोगे कि ‘मेरे दोस्त की भद्द पिट गयी।’<br />
पहला दोस्त आश्चर्य चकित होकर पूछने लगा-‘यार, तुम्हारे साथ ऐसा भी हो चुका है।’<br />
मैंने कहा-‘मैंने कहा उड़न तश्तरी की टिप्पणियां तो बहुत सहज हैं जबकि अपने ब्लाग/पत्रिकाओं पर मुझे अब कटुतापूर्ण टिप्पणियों का सामना करना पड़ रहा है। मैं ही नहीं स्वयं उड़न तश्तरी को भी ऐसी हालतों से गुजरता पड़ रहा है। वैसे तुम कविताओं का रोना करो बंद और अपना टीवी सुधरवा लो ताकि मैं बेफिक्री से लिख सकूं।<br />
दूसरा दोस्त अब मेरे पक्ष में आ गया और बोला-‘वैसे टीवी देखकर दिमाग से खराब करने की बजाय तो कविता लिखना और पढ़ना ही सही है। वैसे जैसा यह लिखता है तो कवितायें भी दमदार होती होंगी।’<br />
पहला मित्र बोला-‘बहुत दिलचस्प और दमदार! पर यह ऊपर शीर्षक पर ही कविता या शायरी मत लिखा करो। आगे पढ़ने का मन ही नहीं करता।’<br />
आखिर मुझे कहना पड़ा-‘जिनका नहीं पढ़ना हो वह न बाध्य न हों इसलिये लिखता हूं। आखिरी बात यही है कि टीवी देखना मैंने कर दिया है बंद। इसलिये मेरे पास इसके अलावा कोई चारा नहीं है कि कवितायें लिखकर ही मन बहलाऊं। तुम जिन टीवी और अखबार वालों से हमारी तुलना कर रहे हो वह तुम्हारी परवाह भी नहीं करते। सब लोग रोते हैं कि यार कहीं कुछ ढंग का पढ़ने या देखने को नहीं मिलता।’<br />
पहला मित्र बोला-‘हां, यह बात सही है। सच तो यह है कि तुम्हारे ब्लाग पर आने के बाद जब दूसरे ब्लाग और फोरम पर जाता हूं तो मुझे पढ़ना  अच्छा लगता है। बस, हम तुम अच्छा लिखो यही चाहते हैं। जहां तक टीवी देखने का सवाल है अब वाकई बोरियत भरे कार्यक्रम आने लगे हैं। तुम्हारे ब्लाग खुलने का मतलब है कि हमारे पूरे दो घंटे अच्छा पढ़ लेते हैं।‘</p>
<p>मैं चलने को हुआ और उससे कहा-‘एक बात समझ लो। मैं ब्लाग या पत्रिका पर लिख रहा हूं कोई अखबार नहीं निकालता। अखबार तो दो घंटे में पुराने हो जाते हैं, पर अंतर्जाल पर ब्लाग हमेशा बने रहेंगे। वह किसी अल्मारी में बंद नहीं होंगे न कबाड़ में बिकेंगे</p>
<p>मुझे बाद में इस संवाद पर स्वयं हंसी आ रही थी। सबसे बड़ी बात यह है कि ब्लाग लेखक और व्यक्तिगत मित्रों के बीच खड़े एक पुल की तरह मुझे रोमांच अनुभव हो रहा था। मेरे ब्लाग लेखक मित्र हो या निजी मित्र उनकी आलोचनाओं और प्रशंसाओं से सीखता हूं। यही कारण है कि मैं नित नया लिखने के लिये प्रेरित होता हूं। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[निकल पड़ें अनजाने सफर पर-कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=539</link>
<pubDate>Fri, 20 Jun 2008 17:40:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=539</guid>
<description><![CDATA[
जब भी हम ढूढ़ते हैं अपने लिए प्यार
पर म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
जब भी हम ढूढ़ते हैं अपने लिए प्यार<br />
पर मिलती है सब जगह से दुत्कार<br />
खुद करो चाहे किसी से भी तुम<br />
मांगो न किसी से इसका उपहार</p>
<p>लोग नहीं निकल पाते अपने दिल से<br />
खरीदा और बिकता पैसे से यहाँ प्यार<br />
भाषा में बहुत होते हैं सुन्दर शब्द<br />
पर बोलने में सब लोग हैं लाचार</p>
<p>अपनों में कितना भी तलाश करने से नहीं मिलता<br />
गैरों में भी नहीं मिल सकता जल्दी प्यार<br />
शब्द में होती ढेर सारी शक्ति<br />
पर पैसे से ही लोग देते-लेते प्यार</p>
<p>बेहतर है निकल पड़े अनजाने सफर पर<br />
शायद कहीं मिल जाये प्यार<br />
अपनों की भीड़ में रहकर ऊबने से अच्छा है<br />
अनजाने लोगों के बीच ढूँढें सच्चा प्यार<br />
--------------------------</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भीड़ से अलग पहचान के लिए अकेले हो जाते- व्यंग्य कविता ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=532</link>
<pubDate>Sun, 01 Jun 2008 16:34:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=532</guid>
<description><![CDATA[
अपनी अलग पहचान के लिये
भीड़ से अलग होन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i23.tinypic.com/2a7shms.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' /><strong><br />
अपनी अलग पहचान के लिये<br />
भीड़ से अलग होना ही पड़ता है<br />
जब चुनते हैं अपनी अलग राह<br />
छोड़नी पड़ती है साथी की चाह<br />
तब हो जाते हैं अकेले<br />
यहां  हर कोई यहां ढूंढ रहा है अपनी पहचान<br />
कोई न एक न बने सरताज<br />
इसलिए हर कोई एक दूसरे से लड़ता है</p>
<p>भीड़ मे बाहर से सभी एक लगते हैं<br />
अंदर से सभी एक दूसरे से जलते हैं<br />
बन जाती है भीड भी कभी भेड़ों का समूह<br />
किसी का इशारा मिलता है कहीं<br />
ताज मिलने का<br />
वहीं पूरा समूह भ्रम में उमड़ता है<br />
जो होता हैं भीड़ से अलग<br />
उससे मूंह फेरते लगते हैं लोग<br />
नाम से अनजान होते दिखते<br />
पर फिर भी उस अकेले के शिखर छू लेने का<br />
खौफ उनके दिमाग में घुमड़ता है<br />
.......................................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[प्यार और नफरत,  दोनों पर यकीन नहीं-हिन्दी शायरी ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=530</link>
<pubDate>Tue, 27 May 2008 16:15:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=530</guid>
<description><![CDATA[आज  एक फोरम पर घूमते घामते अपने मित्र स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i21.tinypic.com/2aahbhz.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' />आज  एक फोरम पर घूमते घामते अपने मित्र <a href="http://udantashtari.blogspot.com/2008/05/blog-post_27.html">समीरलाल ‘उड़न तश्तरी"</a> के ब्लाग पर पहुंच गया। उनका ब्लाग मेरे ब्लाग पर लिंक है पर मैं उनको इन्हीं फोरमों पर पढ़ता हूं। आज कुछ मायूस लगे। हां, कल मैं कुछ ब्लाग देखकर सोच रहा था कि अगर वह उनके दृष्टि में आये तो उनको बहुत कष्ट होगा। यह अच्छा ही हुआ कि मेरे एक पाठ  उनकी दृष्टि पथ में नहीं आया  जो इन्हीं विषयों पर था। कल फोरमों पर उस पर एक व्यूज भी नहीं था। मैने उस शीर्षक लगाते हुए ब्लाग का उल्लेख नहीं किया क्योंकि मैंने देखा है कि आम पाठक ब्लाग शब्द देखकर ही मेरी पोस्ट से मूंह फेर लेते है। वैसे भी ब्लाग लेखकों को उसमें अधिक मजा नहीं आता। समीरलाल को जितना मैं समझ पाया हूं उसके अनुसार ऐसे विवाद उनको तकलीफ देते हैं। मगर इसका कोई उपाय नहीं है। समीरलाल जी मित्र हैं और उनके शब्दों से मेरे पर प्रभाव हो यह संभव नहीं है। ऐसे में मेरा कवि मन कुछ चिंतन करने लगा। जैसा मन में आया अपनी टिप्पणी लिख दी और अपनी पोस्ट बना ली। दुःखी मैं भी होता हूं पर अपने को संभाल भी लेता हूं। मुझे नहीं लगता कि इसके अलावा किसी के पास कोई रास्ता है। पहली  कविता के बाद दूसरी कविता भी इसलिये लिखी ताकि लोग यह न कहें कि ‘अपनी मेहनत बचाता है टिप्पणी को ही पोस्ट बनाता है, दूसरों के दर्द को अपनी दवा बनाता है।’  </p>
<p><strong>जिन रास्तो पर बस्ती है नफरत<br />
वहां से कभी गुजरना नहीं<br />
पर जरूरी हो तो नजरें<br />
फेर कर निकल जाना<br />
कानों से किसी की बात सुनना नहीं<br />
चीखते लोगों के  साथ जंग लड़ने के लिए<br />
मौन से बेहतर हथियार और कोई होता नहीं<br />
फिर भी नजर का खेल है<br />
जहां होती है नफरत की बस्ती<br />
वहां भी  किसी शख्स में होती है शांति की हस्ती<br />
तुम उन्हें ढूंढ सकते हो<br />
अगर तुम्हारे दिल में है प्यार कहीं<br />
नहीं कर सकते अपने अंदर<br />
दर्द को झेलने का जज्बा<br />
तो रास्ता बदल कर चले जाना<br />
पर अगर मन में बैचेनी है तो<br />
तो कोई भी जगह तंग लगेगी<br />
कितनी भी रंगीन हो चादर<br />
नींद नहीं आने पर बेरंग लगेगी<br />
आंखें बंद कर लो<br />
खो जाओ अपनी दुनियां में<br />
बदलती है जो पल-पर अपना रंग<br />
कहीं होते झगड़े, होती शांति कहीं<br />
उस पर मत सोचो कभी<br />
जो तुम्हारे बस में नहीं<br />
...........................<br />
उसने मुझसे पूछा<br />
‘तुमने किसी से प्यार करते हो?'<br />
मैंने कहा-‘नहीं’<br />
उसने पूछा-‘तुम कभी किसी से नफरत करते हो ?’<br />
मैंने कहा-‘नहीं’<br />
उसने मुझे घूर कर देखा<br />
तुम फरिश्ते तो दिखते नहीं<br />
इंसान से तुम्हारा वास्ता कैसे हो सकता है<br />
तुम कहीं शैतान तो नहीं’<br />
मैंने कहा<br />
‘प्यार और नफरत<br />
दोनो में मैंने धोखा खाया है<br />
जिनका प्यार दिया<br />
उनसे पाई नफरत और<br />
जिनको दी नफरत उनसे प्यार पाया<br />
यकीन अब किसी पर इसलिए रहा नहीं<br />
----------------------------</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पसीना ही कविता लिखवाता है]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=520</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 16:51:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=520</guid>
<description><![CDATA[बदलते मौसम के साथ
मन भी यूं बदल जाता है
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बदलते मौसम के साथ<br />
मन भी यूं बदल जाता है<br />
जैसे उसके साथ बंधे हों हाथ<br />
ग्रीष्म के जलती दोपहर में<br />
व्यग्रता इतनी बढ़ जाती है<br />
नरक लगता हो  जीवन<br />
शाम होते बहती ठंडी हवा का<br />
एक झौंका भी शीतल कर देता है<br />
मौसम और मन के पहिये<br />
घूमते देख कौन कह सकता है<br />
हमारा मन भी होता है कभी हमारे साथ<br />
..........................</p>
<p>गर्मी की दोपहर में<br />
साइकिल पर चलते हुए<br />
पसीने में नहाए मैंने उसे देखा है<br />
लिखता है कविता वह हसंते  हुए<br />
कभी  उसे रोते नहीं देखा है<br />
पूछने पर बताता है<br />
उसके दोपहर का पसीना ही<br />
रात में शीतलता देकर उससे कविता लिखवाता है<br />
मैं उसे केवल आईने में ही देख पाता हूं<br />
क्योंकि वह चेहरा<br />
केवल उसी में नजर आता है </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नकली जिंदगी की खातिर-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=517</link>
<pubDate>Mon, 28 Apr 2008 16:18:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=517</guid>
<description><![CDATA[फिल्मों में ही होता है चक दे इंडिया
सच ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">फिल्मों में ही होता है चक दे इंडिया<br />
सच में तो सब जगह है<br />
एक ही नारा गूंजता है भग दे इंडिया<br />
फिल्म में हाकी की काल्पनिका कहानी ने<br />
देश में खूब नाम कमाया<br />
ओलम्पिक से हाकी टीम का<br />
‘नो एंट्री’ संदेश आया<br />
कहें दीपक बापू<br />
‘फिल्मों में नकली हीरो और<br />
नकली कहानी पर फिदा होकर लोग<br />
उसी राह पर चल रहे हैं<br />
ख्वाबों ही देख रहे हैं तरक्की की सपना<br />
पर सबका कर्म और भाग्य होता अपना<br />
आखें से देखते नजर आते हैं<br />
पर देख कहां पाते हैं<br />
कानों से सुनते तो दिखते<br />
पर कितना सुन पाते हैं<br />
अपनी अक्ल रख दी है<br />
नकली ख्वाबों की अलमारी में बंद<br />
गुलामों की तरह दूसरे के<br />
इशारे पर चले जाते हैं<br />
पर्दे पर देखते जो जिंदगी<br />
उसे ही सच करने के कोशिश में<br />
बुझा देते हैं अपनी जिंदगी का दिया<br />
............................</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;"><br />
</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कमरे के अंदर-बाहर की राजनीति होती हैं अलग-अलग-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=513</link>
<pubDate>Wed, 16 Apr 2008 16:06:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=513</guid>
<description><![CDATA[सभाकक्ष से बाहर निकलते ही
फंदेबाज जोर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">सभाकक्ष से बाहर निकलते ही<br />
फंदेबाज जोर से चिल्लाया<br />
‘‘दीपक बापू, तुम्हें तो<br />
मैं बहुत भला आदमी समझा था<br />
पर तुम तो निकले एकदम चालू<br />
अपने मजदूरों के वेतन और बोनस<br />
बढ़ाने के लिये प्रबंधकों का पास तुम्हें लाया<br />
मै उनका अध्यक्ष हूं और तुम मित्र<br />
ढंग से हमारी बात कहोगे<br />
यही सोच तुम्हें बुलाया<br />
पर तुमने कंपनी से अपने ठेके के रेट बढ़ाये<br />
मेरे लिये भी कुछ लाभ जुटाये<br />
पर जिन मजदूरों की बात करने गये थे<br />
उस पर तो हम बोल ही न पाये<br />
बताओं अब क्या मूंह लेकर<br />
साथियों के पास जाऊं<br />
यह तुमने केसा हमको फंसाया ’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">गला खंखार कर मुस्कराते हुए बोले<br />
‘‘चलो चलते हैं पहले वहां होटल में<br />
जहां खाने की पर्ची  तुम्हारे प्रबंधन ने दी है<br />
फिर समझाते हैं तुम्हें माजरा<br />
राजनीति करने चले हो या<br />
खरीदने ज्वार बाजरा<br />
हम न तीन में  न तेरह में<br />
न अटे में न फटे में<br />
हम तो तुम्हारे वफादार हैं<br />
मजदूरों के हिमायती है हम भी<br />
पर राजनीति तो तुम्हारी चमकानी है<br />
कमरे के अंदर<br />
बाहर होती है राजनीति अलग-अलग<br />
एक समझना बात बचकानी है<br />
हमार ठेके के रेट तो वैसे ही बढ़ते<br />
पर तुम कभी राजनीति की सीढ़ी नहीं चढ़ते<br />
अरे, जाकर मजदूरों को<br />
आश्वासन मिलने की बात बता देना<br />
वहां कर रहे थे हम दोनों हुजूर-हुजूर प्रबंधन की<br />
पर मजदूरों में हाय-हाय करा देना<br />
कुछ तालियां हमारे नाम की बजवा देना<br />
अपने दो-चार चमचों को भी<br />
प्रमोशन दिलवा देना<br />
पर असली हक की लड़ाई कभी न लड़ना<br />
तुम्हारे बूते का नहीं है यह सब<br />
निकल गया हाथ से मामला तो<br />
फिर मुश्किल होगा पकड़ना<br />
वाद और नारों पर चलना सालों साल<br />
भरना अपने घर में माल<br />
हमारी तरह गहरा चिंतन न करना<br />
हम तो हैं सब जगह फ्लाप<br />
और अब तो हिट की फिक्र छोड़ दी है<br />
पर राजनीति में तुम्हें हिट होने के लिये<br />
ऐसा ही मायाजाल है रचना<br />
कमरे के बाहर हाय-हाय<br />
अंदर उनको हुजूर-हुजूर करना<br />
अब सब जगह ऐसा ही वक्त आया<br />
कोई तुम्हें कुछ नहीं कहेगा<br />
पूरा जमाना इसी रास्त चलता आया<br />
...............................................</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">सूचना-यह काल्पनिक हास्य व्यंग्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई मेल नहीं है अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शब्द ही हमारे मित्र और गुरु-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=506</link>
<pubDate>Fri, 21 Mar 2008 19:19:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=506</guid>
<description><![CDATA[कलम और दवात लेकर
जब निकले थे घर से तो
नह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>कलम और दवात लेकर<br />
जब निकले थे घर से तो<br />
नहीं जानते थे सम्मान क्या होता है<br />
लिखने बैठे बचपन  से<br />
अपने गुजारे लम्हों की कहानी<br />
अपने जजबात बयान किये अपनी जुबानी<br />
भूल गए रोना क्या होता है<br />
देखा है बस एक ही सच<br />
काटता  है वही आदमी जो उसने बोया होता है </p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
मांगें तो सम्मान भी मिल जाता<br />
पर इसके लिए कोई काबिल भी  तो नजर आता<br />
जो बेचते हैं सम्मान<br />
उनको लिखना नहीं आता<br />
जो पाते हैं चंद शब्द लिखकर<br />
उनका लिखा भी हमारे समझ में नहीं आता<br />
ऐसा लगता है कि<br />
पहले सम्मान की सोचते हैं<br />
बाद में लिखा होता है<br />
हम तो अपने  लिखे को कभी<br />
सम्मान के योग्य नहीं पाते<br />
तो सम्मान कहाँ से जुटाते<br />
फिर मिलता तो जाकर लेना पड़ता<br />
होता समय नष्ट<br />
फिर हम दूसरों का लिखा  कहाँ पढ़ पाते<br />
और बिना पढे भला क्या लिख पाते<br />
जो पढ़ते बिलकुल  नहीं लिखते हैं जरूर<br />
उनमें आ जाता है गुरुर<br />
दूसरों के लिखे से ही लिखते हैं<br />
इसलिए अपने को सर्वश्रेष्ठ<br />
कहलवाने में हम वैसे भी शर्माते<br />
अपनी कमअक्ली का पता था<br />
इसलिए लिखना किया शुरू<br />
 शब्द ही हैं हमारे मित्र और गुरु<br />
लिखने का मतलब उनसे मिलन भर होता है<br />
--------------------------------------------</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल से सम्मान करे वही है सच्चा  वीर-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=474</link>
<pubDate>Sat, 08 Mar 2008 14:18:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=474</guid>
<description><![CDATA[फटे हुए कपडे पहने
चक्षुओं से अश्रु प्र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>फटे हुए कपडे पहने<br />
चक्षुओं से अश्रु प्रवाहित करता हुआ<br />
फंदेबाज आ पहुंचा और  बोला<br />
''दीपक बापू आज हमारी बात मान लो<br />
हम पत्नी पीडितों का दर्द भी जान लो<br />
लिखो  महिला दिवस पर हास्य कविता<br />
करो हमारे दर्द का हरण<br />
नहीं तो हम मर  जायेंगे''</p>
<p>घर के बाहर पहुंचे थे उसी समय<br />
धूप में सायकल चलाकर<br />
पोंछ रहे थे पसीना बीडी जलाकर <br />
और धुआं छोड़ते  हुए बोले दीपक बापू<br />
''अभी तो घर में घुसे और तुम आ गए<br />
कहते हो हास्य कविता लिखो<br />
भूल गए कितने उस पर व्यंग्यबाण चला गए<br />
फिर भी बताओ माजरा क्या है<br />
लिखने की सोचेंगे अगर समझ जायेंगे''</p>
<p>बोला फंदेबाज<br />
''दीपक बापू<br />
आज है महिला दिवस<br />
हमने रास्ते  में दी अपनी<br />
एक पढी-लिखी  पडोसन को उसकी बधाई<br />
बीबी तो कम पढी लिखी है<br />
क्या जानती है इस बारे में<br />
इसलिए हमने इस बारे में<br />
कोई बात नहीं बताई<br />
पडोसन ने जाकर  बता दिया घर पर<br />
सास भी थी वहीं<br />
हुआ घमासान<br />
हमारी हो गयी  पिटाई<br />
आज है तुम्हारी हास्य कविता का सहारा<br />
तुम लिखो तभी हम घर जायेंगे<br />
नहीं तो कही भाग जायेंगे''</p>
<p>पहले ही थे पसीना और निकलने लगा<br />
अपनी धोती कसते  और टोपी संभालते<br />
और हँसते हुए बोले-<br />
''तुम भी हो नालायक<br />
भला क्या जरूरत थी जो दी बधाई<br />
शैतान भी दस घर छोड़  देता है<br />
मूर्ख ही है वह जो  पड़ोस में पंगा लेता है   <br />
वैसे तुम्हारी पत्नी कम पढी-लिखी है<br />
पर समझदार है<br />
मेरी तरफ से उनको देना बधाई<br />
हम उनको मानते हैं<br />
तुम्हारी  नालायकी को भी हम जानते हैं<br />
इसलिए पुरुष दिवस की बात तुमको नहीं बताई <br />
तुम्हें पडी  मार भी असरदार है<br />
 जिन हास्य कविताओं पर हँसते थे<br />
उसी की शरण में आये हो<br />
मगर गलत समय पर आये हो<br />
हम हास्य कविता नहीं लिख पायेंगे<br />
समझदार महिलाओं पर हम क्या लिख पायेंगे</p>
<p>सुना है कहीं<br />
पत्नी पीड़ित अपना दर्द सुनाने के लिए<br />
महिलाओं को बाँट रहे हैं फूल<br />
हम नहीं बरसा सकते शब्द रूपी शूल<br />
वैसे भी क्या गम जमाने में<br />
जो बैठे बिठाए मुसीबत बुलाएं<br />
महिला दिवस पर कविता आजमाने में<br />
हमारे घर पर ऐसे लफड़े नहीं होते<br />
कि  तुम्हारी तरह रोते<br />
इधर-उधर मुहँ से कहने की बजाय<br />
लिखकर ही कविता में सजाते हैं बधाई<br />
यही है हमारी कमाई<br />
अब तुम निकल लो यहाँ से <br />
घर पर सुन लिया कि  तुम<br />
हास्य कविता लिखवाने आये हो<br />
तुम्हारे साथ हम भी फंस जायेंगे <br />
 यहाँ से भी कट जायेगा तुम्हारा  पता<br />
फिर हम तुम्हें चाय भी नहीं पिला पायेंगे<br />
वैसे ही है महिलाओं के अधिकार का प्रश्न गंभीर<br />
महिलाओं का स्वभाव होता है कोमल और  धीर<br />
कह गए हैं बडे-बडे विद्वान<br />
महिला का  दिल से सम्मान करे<br />
वही  है सच्चा  वीर<br />
जो अब तक संसार  नहीं समझ पाया  <br />
तुम और हम क्या समझ पायेंगे<br />
हम इस पर हास्य  कविता नहीं लिख पायेंगे<br />
------------------------------------------<br />
 <strong>नोट-यह हास्य कविता एक काल्पनिक रचना है और इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है. </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपना नाम भी होगा-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/02/29/apnaa-naab-bhee-hoga-hasya-kavita/</link>
<pubDate>Thu, 28 Feb 2008 15:27:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/02/29/apnaa-naab-bhee-hoga-hasya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[अंतर्जाल पर लिखने वाले एक
कविनुमा ब्ल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अंतर्जाल पर लिखने वाले एक<br />
कविनुमा ब्लोगर को भी<br />
आयोजकों ने कविसम्मेलन में बुलाया<br />
जब वह भी पहुंचा मंच पर तो<br />
कवियों को बहुत गुस्सा आया<br />
एक बोला<br />
''इसे उतारों यहाँ से<br />
यह यहाँ क्यों आया<br />
यह जमीनी कवियों का सम्मेलन में<br />
अंतर्जाल पर लिखने वाला क्यों बुलाया''</p>
<p>आयोजक ने कहा<br />
''अब साहित्य अंतर्जाल पर छा जायेगा<br />
आप लोगों की रचनाएं यही वहाँ पहुंचा पाएगा<br />
एक-दो कविता  सुना लेने दो<br />
कौन लोग याद रखेंगे<br />
अखबारों में कल कवियों के रूप में<br />
आप के ही नाम छपेंगे<br />
बाद में यह हमारे कार्यक्रम की<br />
खबर अपने ब्लोग पर लिखेगा<br />
इसका नाम तो है छद्म और वह भी<br />
ऐसी जगह पर जहाँ कोई नहीं पढेगा<br />
इसके लेख में हमारा नाम ही दिखेगा<br />
इसलिए इसे बुलवाया''</p>
<p>सुनकर ब्लोगर को गुस्सा आया<br />
और चिल्लाकर बोला-<br />
''इतना सस्ता समझ लिया है<br />
एक कविता सुनाने के लिए यह सब<br />
कैसे  कर जाऊंगा<br />
अरे, मैं तो लिखता हूँ वहाँ रोज नया<br />
यह एक कविता लिखते हैं<br />
उसे कई-कई बार अनेक जगह पर<br />
सुनाते दिखते हैं<br />
जब अंतर्जाल पर साहित्य छा जायेगा<br />
तब मेरा नाम भी आएगा<br />
नहीं छपेगी किताब मेरी तो क्या<br />
मेरा लिखा आसमान में तो लहरायेगा<br />
वैसे भी मैं  यहाँ सुनाने नहीं सुनने आया<br />
पर लगता है की अभी इनको कोई इल्म नही है<br />
अंतर्जाल ने अपनी रचनाएं  छपने के लिए<br />
दूसरों के आगे झुकने से बचाया<br />
 दूसरी जगह जाकर भीड़ में<br />
जाकर शब्दों का मेले लगाने से हटाया<br />
कभी-कभी होते हैं साहित्य और कवि  सम्मेलन<br />
नारद, ब्लोगवाणी, चिट्ठाजगत और हिन्दी ब्लोग्स ने<br />
हमें रोज साहित्यकारों से मिलने का मौका दिलाया<br />
अब मैं जाता हूँ क्योंकि उससे कीमती वक्त<br />
निकालकर  यहाँ किसी तरह आया.''    </p>
<p>नोट-यह हास्य कविता काल्पनिक है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है और अगर किसी से मेल खा जाये तो उसके लिए वही जिम्मेदार होगा.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भजन करते-करते भक्त हो जायेंगे-हास्य क्षणिकाएँ ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=464</link>
<pubDate>Sun, 03 Feb 2008 11:46:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=464</guid>
<description><![CDATA[निजी अस्पतालों के बाहर लिखा रहता है
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>निजी अस्पतालों के बाहर लिखा रहता है<br />
'गरीबों का इलाज मुफ्त किया जाता है'<br />
शायद इसलिए उनके पेट की किडनी<br />
कभी खराब न हो इसलिए ही<br />
कुछ डाक्टरों द्वारा  उसे निकालकर<br />
अमीर की देह में फिक्स्ड डिपोजिट<br />
मुफ्त में किया जाता है<br />
---------------------------------------</p>
<p>एक गरीब मरीज ने मरने से<br />
पहले ही कह दिया कि<br />
'उसके सभी अंग जो दान किये जा सकते हैं<br />
गरीब जरूरतमंदों मरीजों को लगा दिए जाएं'<br />
उसकी बात सुनकर<br />
कई अमीर उसके पास पहुंचे<br />
साथ में गरीबी का भी ले आये प्रमाणपत्र<br />
तब भी कई गरीब सोचते रहे<br />
''हम ऐसा प्रमाणपत्र कहाँ से लायें<br />
उसके लिए भी तो पैसे चाहिए<br />
हम अपना दावा कैसे जताएं'<br />
----------------------------------------------</p>
<p>अगर इसी तरह गरीबों के<br />
मानव अंग बेचकर<br />
कुछ लोग अमीर होते जायेंगे<br />
'हमें सर्वशक्तिमान ने  इतने कीमती अंग दिए<br />
जिनके  लिए अमीर तरस रहे हैं'<br />
यह सोच गरीब<br />
अमीरों के अस्पताल जाने से कतरायेंगे<br />
सभी बिना पैसे बिना इलाज के<br />
तड़पना पसंद करेगे या<br />
भजन करते-करते भक्त हो जायेंगे.<br />
-----------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हमारे ब्लोग की रेटिंग पांच से पौने पांच कर देना-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/01/20/hamaare-blog-kee-reting-paanch-se-paune-paanch-kar-dena/</link>
<pubDate>Sun, 20 Jan 2008 07:58:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/01/20/hamaare-blog-kee-reting-paanch-se-paune-paanch-kar-dena/</guid>
<description><![CDATA[आ गया सुबह एक फंदेबाज और बोला
&#8221;दीपक ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आ गया सुबह एक फंदेबाज और बोला<br />
''दीपक बापू मजा नहीं आ रहा<br />
आपकी हास्य कवितायेँ<br />
तीन चार दिन  से रस नहीं दे रही हैं<br />
क्या आपने शराब फिर शुरू कर दी है<br />
या किसी ने आपका सम्मान बढाया''</p>
<p>धोती बांधते टोपी पहनते<br />
और गुस्से में बोले दीपक बापू<br />
''यार, क्या समझ रखा है<br />
यहाँ ब्लोगर हैं कितने जो<br />
रोज सम्मान बाँटेंगे<br />
और रेटिंग में अपने  नंबर  घटेंगे<br />
तुम ही कोई ब्लोग शुरू कर दो<br />
और हमारी रेटिंग पांच से<br />
पौने पांच कर तो कुछ मजा आये<br />
एकाध और भी हमारा दोस्त ब्लोगर दिखाना<br />
ताकि हमें गुस्सा आये<br />
अपनी मजाक पर हमें गुस्सा नहीं आता<br />
दूसरे का हमसे सहा नहीं जाता<br />
पर अधिक रेटिंग मत गिराना<br />
क्योंकि आगे भी बहुत मौके और हैं<br />
इसलिए धीरे-धीरे ही गिराना<br />
आज तो संडे है जा रहे<br />
दूसरे ब्लोगर के घर<br />
वही से कुछ सामग्री ले आयेंगे<br />
वही एक चारा है जिसे<br />
अब हास्य में सजाएंगे<br />
हमें तो आगे बढ़ना है तसल्ली से<br />
 पर हाँ रेटिंग घटाने के सिलसिले में<br />
अधिक तेजी न दिखाना<br />
इस प्रसंग को आगे भी है बढाना<br />
बढ़ी मुश्किल से हाथ आया<br />
-----------------------------</p>
<p><strong>नोट-यह एक काल्पनिक हास्य कविता है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई लेना देना नहीं है और अगर किसी की कारिस्तानी से में मेल खा जाये तो इसके लिए वही जिम्मेदार होगा.</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जब ऐसे भी फिक्स होने लगे ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/01/19/jab-aise-bhee-fisk-hone-lage/</link>
<pubDate>Fri, 18 Jan 2008 14:06:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/01/19/jab-aise-bhee-fisk-hone-lage/</guid>
<description><![CDATA[हीरो ने चांटा मारा एक  लड़के को
बडे जोर स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हीरो ने चांटा मारा एक  लड़के को<br />
बडे जोर से थप्पड़  तो<br />
वह भी हीरो हो गया<br />
जिस पर नहीं पहुँचती किसी की नजर<br />
बन गया सबकी खबर<br />
सबके सामने सहमता<br />
 अकेले में हंसता<br />
''अब तो में भी हीरो गया '</p>
<p> आगे हो सकता है<br />
 हर फिल्मी हीरो के घर<br />
थप्पड़ खाने वालों की<br />
लाइन लगने लगे<br />
हर कोई थप्पड़ की मांग करने लगे<br />
नहीं है बाजार का भरोसा<br />
कभी खिलाडियों में गाली-गलौच तो<br />
कभी नस्लभेद का मामला उठा<br />
फिर सब अपने आप जीरो हो गया<br />
मीडिया अपने प्रचार के लिए<br />
कौनसे तरीके से नये-नये हीरो गढ़ने लगे<br />
कोई बड़ी बात नहीं अब थप्पड़ भी<br />
ऐसे फिक्स होने लगे<br />
जो खाकर एक हीरो हो गया<br />
---------------------------------<br />
नोट-यह एक काल्पनिक हास्य व्यंग्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से लेना-देना नहीं है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चजई-शाम तक इनाम दिला देगा यह कार्टून-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/01/18/sham-tak-inam-dila-dega-kartoon/</link>
<pubDate>Thu, 17 Jan 2008 15:41:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/01/18/sham-tak-inam-dila-dega-kartoon/</guid>
<description><![CDATA[सुबह-सुबह आया एक  कार्टूनिस्ट
और बोला
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सुबह-सुबह आया एक  कार्टूनिस्ट<br />
और बोला<br />
''दीपक बापू क्या लिखोगे तुम<br />
कोई हास्य कविता<br />
देखो बनाया है तुम पर कार्टून<br />
भूल जाओगे अपनी धुन<br />
खुश हो कर देखा  तो<br />
कुछ समझ में नहीं आया<br />
लिया अपना सिर धुन </p>
<p>हंसकर बोले दीपक बापू<br />
''सुबह-सुबह  हम इन पचडों में नहीं पड़ते<br />
ध्यान और भक्ति में ही बसते<br />
पर इन रंगे हुए कागजों में<br />
हम अपने आप को नहीं दिखते<br />
हम तो हिन्दी के लेखक<br />
अंग्रेजी  के शब्द हमारे पल्ले  नहीं पड़ते<br />
शाम को आना<br />
हम से हास्य कविता सुन जाना<br />
भूल जाओगे अपना कार्टून''</p>
<p>वह हंसा और बोला<br />
''तुम तो जाओ अपने रास्ते<br />
मैं तो आया था अपने वास्ते<br />
तुम्हें समझ में नहीं आयेगा<br />
गणों के तंत्र में सब जगह चल रहा है<br />
पुरस्कार और सम्मान का माहौल<br />
तुम क्या जानो सृजन-वृजन<br />
हिन्दी तो सबके समझ में आती है<br />
इसलिए नहीं होता  सम्मान<br />
पर अंगेजी समझ से परे होती है<br />
नासमझ न दिखे इस भय से<br />
हर कोई देता सम्मान<br />
जा रहा हूँ एक जगह<br />
जहाँ खुली है इनाम की दूकान<br />
कई जगह एप्रोच है<br />
पता नहीं शाम तक कितने इनाम दिला देगा<br />
तुम्हारी  समझ में न आने वाला यह कार्टून''<br />
---------------------------------------<br />
<strong>नोट-यह हास्य-व्यंग्य कविता काल्पनिक है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई लेना-देना नहीं है अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही उसके लिए जिम्मेदार होगा. </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपने चिराग खुद ही जलायें ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/12/27/apne-chirag-khud-hee-jalaayen/</link>
<pubDate>Thu, 27 Dec 2007 05:27:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/12/27/apne-chirag-khud-hee-jalaayen/</guid>
<description><![CDATA[सुबह की शायरी 
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;
अप]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सुबह की शायरी </strong><br />
-----------------------<br />
अपना दर्द लोगों को<br />
जाकर सुनाएं<br />
और हंसी का पात्र बन जाएं<br />
इससे बेहतर<br />
सुबह खामोश रहकर खुद ही सहलाएं<br />
अपने हमदर्द खुद ही बन जाएं<br />
अँधेरे भटकते लोग<br />
भला किसको रोशनी दिखाएँगे<br />
इससे अच्छा हम अपने लिए<br />
चिराग खुद ही जलाएं<br />
-------------------------<br />
कल दीपक भारतदीप का चिंतन पर प्रकाशित लेख यहाँ पुन प्रकाशित<br />
------------------------------------------------<br />
<strong>पोस्ट फटीचर लगे पर शीर्षक आकर्षक लगाएं </strong><br />
-------------------------------------------------------<br />
किसी भी रचना की मुख्य पहचान उसका शीर्षक होता है। अगर कभी कोई शीर्षक आकर्षक होता है तो लोग उसे बडे चाव से पढ़ते हैं और कही वह प्रभावपूर्ण नहीं है तो लोग उसे नजरंदाज कर जाते हैं। हालांकि इसमें पढ़ने वाले का दोष नहीं होता क्योंकि हो सकता है उसे वह विषय ही पसंद न हो दूसरा विषय पसंद हो पर शीर्षक से उस पर प्रभाव न डाला हो. वैसे भी हम जब अखबार या पत्रिका देखते हैं तो शीर्षक से ही तय करते हैं कि उसे पढ़ें या नहीं। </p>
<p>मैने एक ब्लोग पर एक नाराजगी भरी पोस्ट देखी थी जिसमें चार ब्लोगरों के नाम शीर्षक में लिखकर नीचे इस बात पर नाराजगी व्यक्त की गयी थी कि लोग शीर्षक देखकर कोई पोस्ट पढ़ते हैं। इसलिए प्रसिद्ध ब्लोगरों के नाम दिये गये हैं ताकि ब्लोगर लोग अपनी गलती महसूस करें। जैसा की अनुमान था और कई ब्लोगरों ने उसे खोला और वहां कुछ न देखकर अपना बहुत गुस्सा कमेंट के रूप में दिखाया। उत्सुक्तवश मैने भी वह पोस्ट खोली और उससे उपजी निराशा को पी गया। इस तरह पाठकों की परीक्षा लेना मुझे भी बहुत खला क्योंकि उस ब्लोगर ने यह नहीं सोचा ही ब्लोग पर कोई ऐसा पाठक भी हो सकता है और जो ब्लोगर नहीं है और उसे कुछ समझ नहीं आयेगा। जो ब्लोगर मशहूर हैं उसे केवल ब्लोग लिखने वाले ही जानते हैं न कि आम पाठक।</p>
<p>जो लोग इस तरह की शिकायतें करते हैं वह मानव मन की कमजोरियों को नहीं जानते जबकि उसके गुण और दुर्गुण दोनों का शिकार खुद भी रहते हैं। ब्लोग, पत्रिका, या समाचार पत्र जहां भी कोई आदमी पढता है शीर्षक देखकर ही पढता है। एक अच्छे लेखक को यह पता होता है इसलिए अपने शीर्षकों में जो आकर्षण का भाव भरते हैं वही हिट हो पाते हैं। शीर्षक देखकर ही लोग समझ पाते हैं। अपने संक्षिप्त पत्रकारिता अनुभव से मैंने यही सखा है कि शीर्षक किसी भी गद्य या पद्य की वास्तविक पहचान होता है, उस काम को छोडे बरसों होने के बावजूद मेरा उस समय का अभ्यास अब ब्लोग पर काम आता है। इसलिए शीर्षक देखकर आदमी पढ़ते हैं तो उसमें उनका दोष मुझे नहीं दिखाई देता-क्योंकि यह मानवीय स्वभाव है, अगर पाठक नहीं पढ़ रहे हैं तो इसका मतलब दोष तो मैं लेखक का ही मानता हूं। वैसे भी शीर्षक तो पोस्ट की पहचान है और उसे यह पता लगता है की उसका विषय क्या है? और हो सकता है की वह विषय किसी को पसंद आता हो किसी को नहीं.</p>
<p>हालांकि मैं कई बार ऐसी रचनाएँ- जो की कवितायेँ होतीं है- अनाकर्षक शीर्षक से डाल जाता हूं जिनके बारे में मेरा विचार यह होता है कि इसे आकर्षक शीर्षक डालकर अधिक लोगों को पढ़ने के लिए प्रेरित करना ठीक नहीं होगा, यह अलग बात है कि मुझे जो नियमित रूप से पढ़ते हैं वह मुझे जानने लगे हैं और वह मेरी कोई पोस्ट नहीं छोड़ते। एक मित्र ने लिखा भी था कि आप कभी-कभी ऐसा हल्का शीर्षक क्यों लगाते हैं कि अधिक लोग न पढ़ें।</p>
<p>मैं बहुत लिखता हूं इसलिए कुछ हल्की रचनाएँ भी निकल जाती हैं-ऐसा मुझे लगता है और नहीं चाह्ता कि पाठकों से अन्याय करूं पर जो कम लिखते हैं उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं रखना चाहिये कि पोस्ट कैसी है और उन्हें फड़कते शीर्षक ही लगाने का प्रयास करना चाहिऐ ताकि लोग उसे अधिक से अधिक पढ़ें, इसमें कोई बुराई नहीं है पर कुछ न कुछ पढ़ने योग्य होना चाहिये न कि केवल परीक्षा लेना चाहिये।</p>
<p>अभी दो भारत में ही रहने वाले ब्लोगरों से शीर्षक में ही पूछा गया था कि क्या अफगानिस्तान में रहते हैं। उस ब्लोगर ने लिखा था कि लोगों का ध्यान आकर्षित हो इसलिए ऐसा लिखा है ताकि दूसरे ब्लोगर भी अपनी गलती सुधार लें। मैं उस ब्लोगर की तारीफ करूंगा कि उसने सही शीर्षक लगाया था ताकि उसे अधिक ब्लोगर पढ़ें। उसकी पूरी जानकारी काम की थी। उसके बाद मैने अपने एक ब्लोग को देखा तो वह भी अफगानिस्तान में बसा दिख रहा था और उसे सही किया। पोस्ट छोटी थी पर काम की थी-और जैसा कि मैं हमेशा कह्ता हूं कि अच्छी या बुरी रचना का निर्णय पाठक पर ही छोड़ देना चाहिये। इसलिए अपनी पोस्ट भले ही फटीचर लगे पर शीर्षक तो फड़कता लगाना चाहिये पर पाठकों की परीक्षा लेने का प्रयास नहीं करना चाहिये। एक बार अगर किसी के मन में यह बात आ गयी कि उसे मूर्ख बनाया गया है तो वह फिर आपकी पोस्ट की तरफ देखेगा भी नहीं। शीर्षक लगाते हुए बहुत गंभीर रहना चाहिए क्योंकि वह हमारे मन के पहचान सबके सामने ले जाता है.</p>
<p><!-- Start of StatCounter Code --></p>
<p>var sc_project=3285361;<br />
var sc_invisible=0;<br />
var sc_partition=21;<br />
var sc_security="5a165309"; </p>
<div class="statcounter"><a class="statcounter" href="http://www.statcounter.com/"><img class="statcounter" src="http://c22.statcounter.com/3285361/0/5a165309/0/" alt="web site analytic" /></a></div>
<p><!-- End of StatCounter Code --><br /><a href="http://my.statcounter.com/project/standard/stats.php?project_id=3285361&#38;guest=1">View My Stats</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जिन पर होता कोहिनूर चैन से होते दूर ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/12/26/jin-par-hotaa-kohinoor/</link>
<pubDate>Tue, 25 Dec 2007 17:08:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/12/26/jin-par-hotaa-kohinoor/</guid>
<description><![CDATA[
जिन्होंने जंग जीती है
कभी उनकों हमेशा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>
जिन्होंने जंग जीती है<br />
कभी उनकों हमेशा  सिंहासन<br />
नसीब नहीं होते<br />
अगर मिल जाये तो बैठना होता कठिन<br />
चारों तरफ फैला है नाम<br />
कदम-कदम पर उनका चलता<br />
दिखता है हुक्म<br />
पर यह एक भ्रम होता है<br />
चैन और सब्र से होता दूर<br />
मन का गरीब होता है<br />
तारीख है गवाह इस बात की<br />
खतरे में वही जीते हैं<br />
जिनपर कोहिनूर होता<br />
-----------------------------<br />
कभी चले थे हम साथ-साथ<br />
थामें रहते थे एक-दूसरे का हाथ<br />
एक दूसरे के दिल थे इतने पास<br />
कभी अलग होंगे<br />
यह हमने सोचा ही नहीं था</p>
<p>वक्त गुजरते-गुजरते दूर होते गए<br />
हम पाले रहे याद उनकी<br />
उनके बिना लम्हें खालीपन के साथ<br />
यूं ही गुजरते रहे<br />
कभी दिल भी इतनी दूर होंगे<br />
यह हमने सोचा ही नहीं था</p>
<p>उनकी याद में हमें दिल में<br />
चिराग उम्मीद के जगाये रखे<br />
जब भी उनकी याद आयी<br />
अधरों पर मुस्कान उभर आयी<br />
हम अपने अंधेरों में भी<br />
उनसे रौशनी उधर मांगें<br />
यह हमने सोचा ही नहीं था</p>
<p>जो एक बार उनके<br />
घर के बाहर रोशनी देखी<br />
उस दिन कदम खिंच गए<br />
वहीं अपनी खुशी में<br />
वह हमें भूल जायेंगे<br />
यह हमने कभी सोचा ही नहीं था<br />
हमें देखकर भी उनके चेहरे पर<br />
मुस्कान नहीं आयी<br />
आखें थी उनकी पथराई<br />
हम खडे थे स्तब्ध<br />
उनके मेहमानों की फेहस्त में<br />
हमारा नाम नहीं था<br />
----------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वोटर कभी नहीं हारता ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/12/25/votar-kabhee-naheen-haarta/</link>
<pubDate>Mon, 24 Dec 2007 17:14:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/12/25/votar-kabhee-naheen-haarta/</guid>
<description><![CDATA[खत्म हो गया चुनाव
पता लग गया कहाँ था
लो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>खत्म हो गया चुनाव<br />
पता लग गया कहाँ था<br />
लोगों का झुकाव<br />
पर बेगाने शादी में इतने दीवाने है<br />
किस-किस को समझायेंगे </p>
<p>जो जीत गए वह जश्न मनाते<br />
जो हारे वह भी मन मारकर घर चले जाते<br />
चुनाव की वैतरिणी से परे<br />
जो किनारे एक तरफ  बैठे रहते<br />
वह अपने मनोमुताबिक परिणाम<br />
 नहीं होना भला कब  सहते<br />
उन्हें तो दिन में भी तारे नजर आयेंगे </p>
<p>जिन्होंने उठाया है किताबों का बोझ सिर पर<br />
चाहते हैं लोग भी उनको ढोयें<br />
हम उन्हें सांत्वना दे  पहले वह रोएँ<br />
चाहते हैं वोटर जहाँ हम कहें डाले  वोट<br />
जहाँ कहैं  करें वहाँ चोट<br />
तो उसके कद्रदान हो जायेंगे<br />
वरना उसे ही पराजित घोषित कर जायेंगे </p>
<p>लोकतंत्र के इस यज्ञ में<br />
आहूति देते हुए<br />
वोटर अब बुद्धू से बुद्धिमान हो गया है<br />
वाद और नारे से समाज नहीं चलते<br />
उसको ज्ञात हो गया है<br />
किताबी कीडों की रची माया में<br />
अब वह नहीं फंसता<br />
लोग बरसों तक रचते हैं अपना जाल<br />
वह एक मिनट में ही बच निकलता<br />
उसे मालुम है कहने वाले कुछ भी कह जायेंगे </p>
<p>जीता है वह खुशी में झूम रहा है<br />
जो हारे वह भी खामोश है<br />
पर अपने बुद्धि के खेल में ही<br />
रचने-बसने वाले बुद्धिजीवी<br />
उस वोटर को ही  हारा बता रहे हैं<br />
जिसने बडे-बडे खिलाड़ी निपटाए हैं<br />
धन्य है इस देश का वोटर<br />
जो खामोशी से अपना काम कर जाता है<br />
किसी को देता है जीत की खुशी<br />
किसी को हार का गम<br />
किसी को बेबात भी झटका दे जाता है<br />
वह कभी नहीं हारता<br />
कोई कितना भी कहे<br />
सभी उसी वोटर की महिमा गायेंगे<br />
किसी का  मूहं  बंद नही किया जाता<br />
कहने वाले तो कुछ भी कह जायेंगे<br />
----------------------------------------   </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अँधेरे का व्यापार ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/12/24/amdhere-ka-vyapar/</link>
<pubDate>Sun, 23 Dec 2007 16:55:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/12/24/amdhere-ka-vyapar/</guid>
<description><![CDATA[वादों के बादल बरसने का
मौसम जब आता है
य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>वादों के बादल बरसने का<br />
मौसम जब आता है<br />
यादों पर ग्रहण लग जाता है<br />
जजबातों के सौदागर तय करते हैं कि<br />
कौनसा सा वादा बरसाया जाये<br />
किस याद को लोगों के दिमाग<br />
से  भुलाया जाये<br />
तमाम के लगाते नारे रचकर<br />
हवाई किला   किया जाता है खडा<br />
जो  कभी खुद नहीं चलते<br />
उसके  दरवाजे कितने भी आकर्षक<br />
रास्ता एक कदम बाद दीवार से टकरा जाता है<br />
लुभावने वाद और वादों के झुंड अपनी जुबान पर लिए<br />
अभिनय करते हुए जजबातों के<br />
व्यापारी चलते हैं साथ लेकर चलते हैं बुझे दिए<br />
अँधेरे का डर दिखाकर<br />
अपना  करते हैं व्यापार<br />
कहते हैं कि दूध का जला<br />
छांछ भी फूंक कर पी जाता है<br />
पर यहाँ तो आदमी कई बार<br />
जलने के बाद भी आदमी<br />
फिर पीने के लिए  जीभ जलाने आ जाता है</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बडे ब्लोगर अब साहित्यकारों पर बरस रहे हैं]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/12/19/bade-blogar-baras-rhe-hain/</link>
<pubDate>Tue, 18 Dec 2007 16:17:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/12/19/bade-blogar-baras-rhe-hain/</guid>
<description><![CDATA[ऐसा क्या हुआ है यारों
ब्लोगर अब  साहित]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ऐसा क्या हुआ है यारों<br />
ब्लोगर अब  साहित्यकारों पर बरस रहे हैं<br />
जो रूठ्ता है अपनी बिरादरी से<br />
ब्लोगरों की लिस्ट में नाम न  देखकर<br />
क्रुद्ध होकर बरसता है कवियों पर<br />
वह तो वैसे ही ब्लोगरों की<br />
नजरें इनायत हों<br />
इसके लिए तरस रहे हैं<br />
कोई ललकार रहा है<br />
कि साहित्यकार कभी<br />
ब्लोगरों से आगे नहीं निकल सकते तो<br />
कोई इनाम के लिए ललचाता बता रहा है<br />
यार, साहित्यकार तो खामोश हैं<br />
बडे  ब्लोगर उन पर गरज रहे है </p>
<p>कहै दीपक बापू<br />
हम भी ब्लोग लिखते हैं<br />
पर भला कभी तुमसे<br />
सम्मान की याचना करते दिखते हैं<br />
फिर भी गलतफहमी में मत रहना<br />
जब हो जायेगा हद से अधिक सहना<br />
सीधे पर पैनी होगी कवियों की भाषा<br />
हास्य के लिए शब्दों और भाषा  को<br />
कचड़ा कर   रचना नहीं लिखेंगे<br />
हमारे सीधे तीर भी तीखे दिखेंगे<br />
अपनी रचना साहित्यिक भाषा में ही लिखेंगे<br />
चाहे कितनी भी हो निराशा<br />
ब्लोग पर तुम लिखते रहो<br />
अखबारों की कतरनों में दिखते रहो<br />
इनाम भी चाहे जितने बटोरो<br />
पर अब आ रहे हैं कवि<br />
फीकी पड़ जायेगी तुम्हारी छबि<br />
बदल रहा हैं अंतर्जाल<br />
कुएँ के मेंढक की तरह मत  रहो<br />
कुछ जोरदार लिखो<br />
कई नये साहित्यकार ब्लोग पर<br />
बडे बनने वाले हैं<br />
हम चेता रहे हैं<br />
कोई अरज नहीं कर रहे हैं </p>
<p>नोट-यह एक काल्पनिक हास्य रचना है और किसी व्यक्ति या घटना से कोई लेना-देना नहीं है और किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही उसके लिए जिम्मेदार होगा </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सच का रास्ता ही दिल तक जाता  है ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/12/15/sach-ka-rasta-hee-dil-tak-jata-hai/</link>
<pubDate>Sat, 15 Dec 2007 11:30:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/12/15/sach-ka-rasta-hee-dil-tak-jata-hai/</guid>
<description><![CDATA[वक्त ने देखा है सबको
उसे चलते भले देखत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="center"><strong>वक्त ने देखा है सबको<br />
उसे चलते भले देखता न हो कोई<br />
बडे-बडे शिलालेखों पर नाम<br />
खुदवाकर कई राजाओं ने<br />
अमर होने की कोशिश की<br />
उनके हटते ही उनका नाम लेवा भी रहा कोई<br />
 <br />
कई अमीरों ने बनवाये<br />
अपने नाम से महल<br />
वक्त की  मार से खँडहर में बदल  गए<br />
अब देखता भी नहीं कोई<br />
आँखों से बसे<br />
कानों से सुने<br />
हाथों से स्पर्श  किये गए<br />
जिंदा और मुर्दा बुत<br />
भुला दिए गए<br />
बसे दिल में लोगों के<br />
चलते हैं आज भी<br />
वक्त उनको नहीं मिटा पाता<br />
दौलत से न खरीदा जा सकता<br />
शोहरत से पसीजा नहीं करता<br />
शरीर को छू लेने से भी<br />
दिल किसी का अपना नहीं हुआ करता<br />
वह सच ही है जो<br />
दिल में बसा करता है<br />
दिमाग में कई ख्याल आते हैं<br />
दिल में तो बसता  है एक कोई</strong></p>
<p align="center"><strong>दौलत और शौहरत के<br />
ढेर पर बैठकर वक्त को जीत का<br />
दावा  करने वालों<br />
तलवार के जोर पर<br />
लोगों को डराने वालों<br />
अपनी सूरत पर इतराने वालों<br />
वक्त सबको मिटा देता है<br />
पर दिलों में बसे हुए नाम और तस्वीरों<br />
पर उसका रंग नहीं चढ़ता कोई<br />
सच ही वह रास्ता है<br />
जिस पर दिल के दरवाजे तक<br />
पहुंचता है कोई  </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शायद कभी छपे अच्छी खबर]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/10/30/%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%9b%e0%a4%aa%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%9a%e0%a5%8d%e0%a4%9b%e0%a5%80-%e0%a4%96%e0%a4%ac%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Mon, 29 Oct 2007 15:49:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/10/30/%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%9b%e0%a4%aa%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%9a%e0%a5%8d%e0%a4%9b%e0%a5%80-%e0%a4%96%e0%a4%ac%e0%a4%b0/</guid>
<description><![CDATA[हर  सुबह अपने घर के
दरवाजे पर रखा  उठाता]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हर  सुबह अपने घर के<br />
दरवाजे पर रखा  उठाता हूँ<br />
अखबार ताजा समझकर<br />
पर पढने पर लगती है<br />
बासी हर खबर</p>
<p>अखबार के हर पृष्ठ  पर<br />
नजरें दौडाता हूँ उसके चारों और<br />
रंग-बिरंगे और छोटे और बडे<br />
अक्षरों को निहारता हूँ<br />
इस यकीन के साथ कि<br />
शायद कुछ नया पढने को मिल जाये<br />
ऐसा कुछ हो<br />
जो मन पर छा जाये<br />
पर आता नहीं कुछ नया नजर</p>
<p>ह्त्या, डकैती, और लूट की खबरें<br />
काले मोटे अक्षरों में सुर्ख़ियों में<br />
छपी होती हैं<br />
पात्र और नाम बदले रहते हैं<br />
ऐसा लगता है मैंने पढी है<br />
पहले भी कहीं यह खबर</p>
<p>बडे नाम वालों के बडे बयान<br />
कुछ छोटे नाम वालों को<br />
बडे बनाते बयान<br />
समाज सेवा और जन कल्याण के<br />
दावों की लंबी-चौड़ी सूची<br />
सोचता हूँ कि कितनी मनगढ़त<br />
और कितनी सत्य के निकट होगी खबर</p>
<p>मन को ललचाते, बहलाते और फुसलाते<br />
विज्ञापनों का झुंड<br />
सामने आ ही जाता है<br />
चाहे बचाओ जितनी नज़र<br />
विज्ञापन में वर्णित वस्तुओं के<br />
बेचने के लिए<br />
समर्थन देती छपती है एक खबर</p>
<p>सोचता हूँ कि अखबार न पढूं<br />
पर बरसों पुरानी आदतें<br />
ऐसे ही नहीं जातीं<br />
भले ही मजा नहीं आता<br />
फिर भी दौडा ही लेता हूँ<br />
सरसरी नज़र<br />
शायद कभी छपे अच्छी खबर</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आराम से उपजती पीडा ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/10/27/%e0%a4%86%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%89%e0%a4%aa%e0%a4%9c%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Fri, 26 Oct 2007 16:48:21 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/10/27/%e0%a4%86%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%89%e0%a4%aa%e0%a4%9c%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%be/</guid>
<description><![CDATA[वाशिंगटन स्थित वर्ल्ड वॉच इंस्टीट्यू]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>वाशिंगटन स्थित वर्ल्ड वॉच इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के मध्यम वर्ग में सुस्त और आश्रित जीवनशैली को अपनाने से लोगों में वह बीमारियाँ पैदा हो रहीं हैं जो पहले कभी पश्चिम यूरोप वासियों को ही हुआ करती थी. ऐसा नहीं है कि इस रिपोर्ट से पहले कभी कोई चर्चा इस विषय पर नहीं हुई पर लगता है हमारे देश से ज्यादा विदेश के लोग हमारी चिंता कर रहे हैं कि हम उन संकटों में न  फंसे जिससे निजात पाने के लिए वह जूझ रहे हैं. </p>
<p>               वैसे इस रिपोर्ट पर जब उन्होने काम शुरू किया होगा और जब उसके निष्कर्ष प्रस्तुत किये होंगे तब से लेकर तो पता नहीं कितना पानी गंगा में बह गया होगा. इसलिए वह वर्तमान में ही 'हो रहीं हैं' शब्द लिखा गया है. हमारा देश तो बहुत पहले ही बहुत सी ऐसी बीमारियों की चपेट में आ गया है जिनकी चर्चा ही बहुत बाद में होगी. सबसे अधिक तो लोगों में मानसिक तनाव व्याप्त है-और समाज में जो वैचारिक धरातल पर खोखलापन आया है उसका आंकलन करने वाला कौन है? मनुष्य की पहचान है उसका मन और अगर वही अस्वस्थ है तो वह कैसे स्वस्थ हो सकता है. पहले तो बस संकट बडों तक ही सीमित था और बच्चों के लिए  कहते थे कि ' अभी तो बच्चे हैं खेलने दो  यही तो  इनके  दिन हैं'-पर अब  फास्ट फ़ूड के उपयोग से उन्हें जो बीमारियाँ होतीं है वह उनका बचपन छीनकर उन्हें बुढापा प्रदान कर देती हैं. हम भारतीय वैसे तो  मर्यादा और अनुशासन की बात तो बहुत करते हैं पर जीवनशैली में उससे परहेज करते हैं. </p>
<p>                    टीवी,मोबाइल.कंप्यूटर,फ्रिज और पेट्रोल चालित वाहन उपयोग के लिए साधन मात्र है न कि साध्य! हमें मिल गया है तो ऐसा लगता है कि  वही सब कुछ है. मनोरंजन की जरूरत है तो टीवी देखें न कि इसलिए देखें कि घर में पडा  है तो देखें. मोबाइल है सूचना के आदान प्रदान के लिए न कि उससे  चिपक कर लोगों को बताने के लिए कि हमारे पास है-उस पर बात तो कर रहे हैं  पर वह कितनी सार्थक है इस पर भी विचार तो करना चाहिए. कंप्यूटर रचनात्मक काम करने वालों के लिए एक बहुत अच्छा साधन है पर जो लोग इंटरनेट पर काम करते देखता हूँ तो हंसी आती है. एक साइबर कैफे में जाकर मैंने देखा वहाँ स्कूल की ड्रेस पहने छात्र बैठे थे और  उनकी खुली हुईं  साइटें देखीं तो हैरान हो गया-वह किसी भी दृष्टि से उनके शैक्षणिक विषय से संबंधित नहीं थीं और अगर उन्हें मनोरंजक भी कहा जाये तो हास्यास्पद ही होगा क्योंकि उससे भी कुछ शिक्षा  मिलती है  और मुझे नहीं लग  रहा था कि वह दोनों में से कोई काम कर रहे थे सिवाय अपना कीमती समय खराब करने के. पेट्रोल चालित वाहन कहीं पहुंचने का साधन है और उसका उपयोग क्या वाकई उसके लिए हो रहा है. कहीं जाना है इसलिए गाडी का उपयोग होना चाहिए न कि इसलिए कि वाहन है तो कहीं जाना है. </p>
<p>                       वैसे तो इस देश में गरीबी बहुत है और सबकी  आरामदायक जीवन शैली है यह कहना गलत है पर मध्यम वर्ग समाज की एक बहुत बडी शक्ति होता   है और उसे वह व्याधियां घेर रही हैं जिससे उसकी स्वयं की तकलीफें बढाएगी और उसका तो वैसे भी आर्थिक आधार हवा में होता है जब तक शरीर स्वस्थ है तब तक खूब कमा लो और जो वह डावांडोल हुआ कि गरीबी के वर्ग में शामिल होते देर  नहीं लगेगी. लोग चल-फिर रहे हैं और लगता नहीं है कि उनको कोई बीमारी है पर वह केवल इसलिए कि उनके पास वाहन हैं और थोडा पैदल चलने के लिए कहा जाये तो उनके  हाथ-पाँव फूल जाते हैं-सबसे अधिक तो जो मानसिक तनाव है उसका तो कोई पैमाना नहीं है. मैंने एक रिपोर्ट पढी थी कि लोगों की बहुत बड़ी ऐसी संख्या है जो मनोरोगी  हैं और यह उनको खुद नहीं मालुम. मनोरोगी का अर्थ एकदम पागल होना नहीं होता यह समझ लेना चाहिए. अकारण चिंता, उठते-बैठते घबराहट और नींद न आना,अकेले में घबडाना तथा फालतू बडबडाना और अधिक बोलना भी इसके लक्षण है.</p>
<p>              शरीर का सीधा नियम है जितना चलाओगे चलेगा और जितना आराम करोगे उतना ही कमजोर होगा. आहार-विहार , विचार, निद्रा और काम करने के तय नियमों का पालन करते हुए अनुशासित जीवन शैली ही ऐसी  बीमारियों का सामना करने की शक्ति दे सकते हैं और दवाईयों से कितना आराम मिलता है यह सब जानते हैं.    </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सच को बैसाखियों की जरूरत नहीं-हास्य कविता  ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/10/20/%e0%a4%b8%e0%a4%9a-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%ac%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%96%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%a8/</link>
<pubDate>Fri, 19 Oct 2007 13:55:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/10/20/%e0%a4%b8%e0%a4%9a-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%ac%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%96%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%a8/</guid>
<description><![CDATA[पत्थरों पर लिखी इबारत भी
इतिहास का सच ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पत्थरों पर लिखी इबारत भी<br />
इतिहास का सच बयान नहीं करती<br />
जिसे लिखना आता है<br />
वह कुछ भी लिख सकता है<br />
लिखने पर चलती है उसीकी मर्जी<br />
पुराने समय से चलती कथाओं को भी<br />
इतिहास मानना होगा गलती<br />
क्या हम नहीं देखते<br />
अपने सामने ही कैसे रचे जाते हैं स्वांग<br />
कितने झूठ गढ़कर एक सच बनाया जाता है<br />
ईमान की लाशों पर बेईमानी को<br />
शिखर पर पहुंचाया जाता है<br />
झूठ का दरिया बहता था पहले भी<br />
और अब भी<br />
सच तब भी किनारे खडा रहता था<br />
और अब भी मुस्कराता है<br />
झूठ तब भी इतिहास के रूप में<br />
रचा गया हो सकता है<br />
जैसे अब रचा जाता है<br />
और सच को तो कभी<br />
बैसाखियों की जरूरत नहीं हुआ करती<br />
--------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
