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	<title>वैचारिक &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/वैचारिक/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "वैचारिक"</description>
	<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 13:24:18 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[एक भला काम करें-अपने चिट्ठे पर एक लिंक लगायें]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/12/19/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%ad%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%a0/</link>
<pubDate>Wed, 19 Dec 2007 15:52:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
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<description><![CDATA[
Esha - एक संस्था है जो कि नेत्रहीनों के लि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://aaina2.files.wordpress.com/2007/12/windowslivewriter7980035384d5-12aee2-22.jpg"><img width="240" src="http://aaina2.files.wordpress.com/2007/12/windowslivewriter7980035384d5-12aee2-2-thumb.jpg" height="180" style="border:0;" /></a></p>
<p><font size="3">Esha - एक संस्था है जो कि नेत्रहीनों के लिये काम कर रही है। यह संस्था कई तरीकों से नेत्रहीनों की सहायता कर रही है। यहां विजिटिंग कार्ड्स पर ब्रेल में नाम लिख नेत्रहीनों को आत्मनिर्भर बनाने का काम भी किया जा रहा है। इन्होंने अब अपनी साइट बनायी है <a href="http://www.braillecards.org/"><strong>www.braillecards.org</strong></a> । संस्था के पास अपनी साईट को प्रचारित करने के लिये संसाधन नहीं हैं। आप सभी से अनुरोध है कि इस साईट का लिंक अपने अपने चिट्ठे पर लगायें। हो सके तो इस साईट के बारे में पोस्ट भी लिखें। जरूरत है कि इस तरह की साईट्स के बारे में लोग अधिक से अधिक जानें।</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[नीली रेखाओं और लाल चेहरों वाला शहर]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/10/23/bluelines-and-red-faces/</link>
<pubDate>Tue, 23 Oct 2007 10:10:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
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<description><![CDATA[आप लोग सोचते होंगे कि दिल्ली के लोग कै]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3">आप लोग सोचते होंगे कि दिल्ली के लोग कैसे इतने खौफ में जीते होंगे। एक तरफ लाल चेहरे वाले <a target="_blank" href="http://hindinewspaper.blogspot.com/2007/10/blog-post_6173.html">बंदरों का आतंक </a>और दूसरी तरफ नीली रेखाओं वाली बसों का आंतंक। </font></p>
<p><font size="3">मगर दिल्ली के लोग बहुत ही व्यावाहारिक हैं। हर हालात में अपने को ढाल लेते हैं। सीख जाते हैं। </font></p>
<p><font size="3">दिल्ली के केंद्र में एक हरा भरा क्षेत्र है जिसे रिज एरिया कहा जाता है। यह रिज एरिया दक्षिण में धौला कूंआं से लेकर पश्चिम में नारायणा और केन्द्र में क्नॉट प्लेस के पास तक फैला है। इस रिज एरिया में बंदरों की आबादी बहुत हो गयी है जिससे बंदर आस पास की कालोनियों में घुस जाते हैं।  यह ढीठ  बंदर बेधड़क घरों में धुस जाते हैं और फ्रिज खोल कर उस  में से उठा कर मजे से सामान खाने लगते हैं। दिल्ली के सबसे बड़े अस्पताल एम्स में भी इनका बहुत आतंक है। कोई यदि फल ले कर मरीज को देखने यहां आये तो ये बंदर हाथ में पकड़ा फलों का थैला ही छीन लेते हैं और दूर भाग जाते हैं। जो लोग समझदार हैं वे पहले ही एक फल थैले से निकाल इनकी और उछाल देते हैं। फिर सारे  बंदर उस एक फल के पीछे भागते हैं और आप अपने बाकी फलों के साथ अस्पताल के अंदर खिसक सकते हैं। ऐसे लोगों को यहां प्रैक्टिकल यानि व्यावहारिक कहा जाता है। यह व्यावहारिकता यहां के हवा पानी में है।  बच्चा पैदा होते ही इसे सीख जाता है। </font></p>
<p><font size="3">आपको हैरानी नहीं होगी यदि दूसरी कक्षा का बच्चा घर आ कर मां से बोले "मम्मी मम्मी! क्लास में जो क्यूट सी नयी लड़की आयी है ना निशा, मैंने उससे कहा कि अगर तू मुझे अपने पास की सीट पर बैठने दे तो मैं अपने टिफिन से आधी मैगी खाने के दे सकता हूं और वो मान गयी।" मां  अपने बच्चे की इस व्यवहार कुशलता पर फूल कर कुप्पा हो जायेगी कि देखो मेरा बच्चा कितना प्रैक्टिकल है। बड़ा होकर बहुत सफल होगा।  </font></p>
<p><font size="3">आप यदि छोटे छोटे शहरों से, खाली बोर दोपहरों से, झोला उठा कर यहां चले आये हैं या आने की सोच रहे हैं तो अपना झोला, थैला, बैग आदि अच्छी तरह चैक कर लें कि कहीं उसमें आप अपना कोई सिद्धांत विद्धांत साथ में न ले आयें। ये सिद्धांत यहां कई बार बहुत आढ़े आते हैं। सिद्धांत व्गैरह की बात करने वालों को यहां अव्यवहारिक माना जाता है। </font></p>
<p><font size="3">अब जरा नीली रेखा वाली बसों यानि कि ब्लूलाईन की बात कर ली जाये। सारे मंत्री, मुख्यमंत्री और जनता कोशिश करके हार गये मगर कोइ इनका बाल भी बांका नहीं कर पाया तो इसके पीछे इन बस मालिकों की व्यवहारिकता ही है। आप सोचते होंगे कि यह बस वाले यदि इस तरह से बसे चलाते हैं तो ट्रैफिक वाले तो लगातार ही इनके पीछे पड़े रह्ते होंगे और ट्रैफिक वालों से ये लोग खौफ खाते होंगे। मगर यह बस वाले बहुत ही प्रैक्टिकल हैं। इसी तरह से ट्रैफिक वाले भी बहुत प्रैक्टिकल हैं। हर बस के रूट पर जितनी भी लाल बत्तियां होंगी उन सब पर प्रति माह सौ रुपया। हिसाब लगाइये। दिल्ली में लगभग छः हजार बसें हैं और हजारों लाल बत्तियां। प्रति बस, प्रति लालबत्ती, प्रति माह सौ रुपये के हिसाब से कितने करोड़ हुए।  इतनी टर्नओवर के सामने तो अंबानी का रिलांयस फ्रैश भी शरमा जाये। देश की बढ़ती मुद्रास्फीति में इस मुद्रा विनिमय का कितना योगदान है इसका अंदाजा अपने वित्त मंत्री जी को भी नहीं होगा। ये लोग हर चौराहे पर माह के पहले दस दिन मुस्तैद मिलते हैं उगाही के लिये। छः तारीख से ही जिसके पैसे न आयें उन्हे इशारे करने लगते हैं। दस तारीख तक पैसे न मिलें तो बस जब्त। अब बेचारा जो ड्राइवर नया नया आया होता है वो इन इशारों को समझ नहीं पाता और बस जब्त करवा बैठता है। </font></p>
<p><font size="3">अब अपने नीली पगड़ी वाले मन्नू भाई यहां की राजनीति में 'एक्सिडेंटली' आ गये हैं। लाल बत्ती पर बैठे लोगों के इशारों को समझ नहीं पा रहे। दस तारीख आने को है, लगता है अपनी बस जब्त करवायेंगे।</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[राजनीति के ’पिंजर’ में फंसा लोकतंत्र]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/08/14/pinjar/</link>
<pubDate>Tue, 14 Aug 2007 12:06:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
<guid>http://aaina2.wordpress.com/2007/08/14/pinjar/</guid>
<description><![CDATA[अमृता प्रीतम का उपन्यास ’पिंजर’ मैंन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"><img border="0" align="left" width="193" src="http://farm2.static.flickr.com/1427/1115344598_16e0c1c38b_o.jpg" height="227" /></font><font size="3">अमृता प्रीतम का उपन्यास ’पिंजर’ मैंने  तब  पढ़ा था पहली बार जब में स्कूल में ही था। उसके बाद जाने कितनी ही बार पढ़ लिया। आज जब हम आजादी की सालगिरह मना रहे हैं तो मन कहता है कि इस उपन्यास के बारे में कुछ लिखूं। बंटवारे की पृष्टभूमी पर लिखे गये इस उपन्यास पर फिल्म भी बन चुकी है। आप ने यदि यह उपन्यास नहीं पढ़ा और यदि इन्सानी दुखों से आपके हृदय पर सिलवटें पड़ती हैं तो इस उपन्यास को जरूर पढ़ें। यह उपन्यास आपके अस्तिस्व और आपकी सोच पर एक गहरा असर जरूर छोड़ कर जायेगा। जब मैंने पढ़ा तो कच्ची उम्र थी मेरी। उपन्यास का असर और भी गहरा हुआ।</font></p>
<p align="left"><font size="3">पिंजर कहानी है बंटवारे से पूर्व के हिंन्दुस्तान के पंजाब के एक गांव कि लड़की पूरो के दुखों की। हालांकि उपन्यास पूरी तरह पूरो की कहानी कहता है मगर साथ ही आपको उस समय की राजनैतिक हलचलों के कारण हो रहे घटनाक्रम के प्रभावों से बेचैन कर देता है। पूरे उपन्यास में अमृता जी ने कहीं भी कोई राजनैतिक बयान नहीं दिया, कहीं कोई पात्र कोई राजनैतिक वाक्य नहीं बोलता, मगर जैसे जैसे आप कहानी को पढ़ते जाते हैं, आपके अंदर एक गुस्सा उत्पन्न होता जाता है। आप जैसे जैसे पूरो के दुखों को पढ़ते हैं आप के अंदर वो गुस्सा धधकने लगता है, आप नफरत करने लगते हैं दुनिया भर के उन जिन्नाओं और नैहरूओं से जो अपनी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के कारण जमीनों, देशों, समाजों और लोगों में बंटवारे करवाते हैं।</font></p>
<p align="left"><font size="3">दुख की बात यह है की आज भी हमारे राजनेता यही कर रहे हैं। आपने मेरी  कई पोस्टों में यह महसूस किया होगा कि मेरे मन में सभी राजनीतीबाजों के लिये एक नफरत हमेशा से रही है। यह बात सही है कि हमारा लोकतंत्र एक मजबूत लोकतंत्र है मगर हमारे राजनेता अभी भी जाति, धर्म और वर्गों के नाम पर हमें बांट रहे हैं। जातियों और धर्म के नाम पर चुनावों में टिकट दिये जाते हैं और जातियों और धर्मों के नाम पर ही चुनाव जीते जाते हैं। क्या  हमारे बुजुर्गों ने इसी जातियों, धर्मों, वर्गों और भाषाओं में बंटे हुए लोकतंत्र का सपना देखा था?</font><font size="3"> </font><font size="3"> </font></p>
<p align="left"><font size="3">अफसोस तो यह है कि सत्ता के लिये नफरत की यह कहानियां  अभी भी दोहरायी जाती हैं। कभी दिल्ली में  तो कभी गुजरात में ।</font></p>
<p align="left">इसी उपन्यास से एक अंश:</p>
<p align="left">(साफ न पढ़ पा रहे हों तो इमेज पर क्लिक करें)</p>
<p align="left"><font size="3"><a href="http://farm2.static.flickr.com/1343/1115321370_a710506423_o.jpg"><img border="0" width="645" src="http://farm2.static.flickr.com/1343/1115321370_a710506423_o.jpg" height="744" /></a></font></p>
<p align="left">&#160;</p>
<p align="left"><font size="3"><a target="_blank" href="http://farm2.static.flickr.com/1234/1115322058_d28c786d0d_o.jpg"><img border="0" width="684" src="http://farm2.static.flickr.com/1234/1115322058_d28c786d0d_o.jpg" height="1077" /></a></font></p>
<p align="left"><a target="_blank" href="http://farm2.static.flickr.com/1175/1114565617_8e31fda902_o.jpg"><img border="0" width="734" src="http://farm2.static.flickr.com/1175/1114565617_8e31fda902_o.jpg" height="1010" /></a></p>
<p>इसे भी पढ़ें</p>
<p><a rel="bookmark" href="http://aaina2.wordpress.com/2007/04/13/warisshah/"><font size="3" color="#444444">वारिस शाह नूं - अमृता प्रीतम</font></a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मंटो की कहानी - "खोल दो"]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/08/08/khol-do/</link>
<pubDate>Wed, 08 Aug 2007 15:41:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
<guid>http://aaina2.wordpress.com/2007/08/08/khol-do/</guid>
<description><![CDATA[








]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.flickr.com/photos/aaina1/1052045790/" title="Photo Sharing"><img width="587" src="http://farm2.static.flickr.com/1409/1052045790_146f65edbb_o.jpg" alt="kholado" height="796" /></a><br />
<a href="http://www.flickr.com/photos/aaina1/1052045802/" title="Photo Sharing"><img width="600" src="http://farm2.static.flickr.com/1279/1052045802_c174de9175_o.jpg" alt="kholdo1" height="347" /></a><br />
<a href="http://www.flickr.com/photos/aaina1/1052045818/" title="Photo Sharing"><img width="612" src="http://farm2.static.flickr.com/1209/1052045818_d08b406245_o.jpg" alt="kholdo2" height="575" /></a><br />
<a href="http://www.flickr.com/photos/aaina1/1052045844/" title="Photo Sharing"><img width="612" src="http://farm2.static.flickr.com/1254/1052045844_8a55c260b6_o.jpg" alt="kholdo3" height="569" /></a><br />
<a href="http://www.flickr.com/photos/aaina1/1052045850/" title="Photo Sharing"><img width="612" src="http://farm2.static.flickr.com/1387/1052045850_2e1b9658a1_o.jpg" alt="kholdo4" height="423" /></a><br />
<a href="http://www.flickr.com/photos/aaina1/1052872222/" title="Photo Sharing"><img width="600" src="http://farm2.static.flickr.com/1364/1052872222_cfa8a94f3f_o.jpg" alt="khol do5" height="219" /></a></p>
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मंटो की कहानी - टोबा टेक सिंह]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/08/08/manto-toba-tek-singh/</link>
<pubDate>Wed, 08 Aug 2007 13:36:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
<guid>http://aaina2.wordpress.com/2007/08/08/manto-toba-tek-singh/</guid>
<description><![CDATA[बंटवारे के दो तीन साल बाद पाकिस्तान और]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3">बंटवारे के दो तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की हुकूमतों को ख्याल आया कि इखलाकी क़ैदियों की तरह पागलों का तबादला भी होना चाहिए यानी जो मुसल्‌मान पागल, हिंदुस्तान के पागल-ख़ानों में हैं उन्हें पकिस्तान पहुंचा दिया जाए और जो हिंदू और सिख पाकिस्तान के पागल-ख़ानों में हैं उन्हे हिंदुस्तान के हवाले कर दिया जाए।</font><font size="3">मालूम नहीं यह बात माक़ूल थी या ग़ैर-माक़ूल , बहर-हाल दानिश-मन्‌दों के फ़ैस्‌ले के मुताबिक़ इधर उधर ऊंची सतह की कान्फ्रेंसे हुईं , और बाल-आख़िर एक दिन पागलों के तबादले के लिए मुक़र्‌रर हो गया। अच्छी तर्‌ह छान-बीन की गई। वह मुसल्‌मान पागल जिन के लवाहिक़ीन हिंदुस्तान में ही में थे, वहीं रह्‌ने दिए गए थे, जो बाक़ी थे उन को सर्‌हद पर रवाना कर दिया गया।_ यहां पाकिस्‌तान में चूंकि क़रीब क़रीब तमाम हिंदू सिख जा चुके थे, इस लिए किसी को रखने रखाने का सवाल ही न पैदा हुआ। जितने हिंदू सिख पागल थे, सब के सब पुलिस की हिफ़ाज़त में बॉर्डर पर पहुंचा दिए गए।<br />
उधर का मालूम नहीं, लेकिन इधर लाहोर के पागल-ख़ाने में जब उस तबादले की ख़बर पहुंची तो बड़ी दिल्‌चस्‌प चिह-मी-गूइयां होन लगीं। एक मुसल्‌मान पागल जो बारह बरस से हर रोज़ बा-क़ाइदगी के साथ " ज़मीन्‌दार " पढ़्‌ता था उस से जब उस के एक दोस्‌त ने पूछा " मोल्‌बी साब , यह पाकिस्‌तन क्‌या होता है",उस ने बड़े ग़ोर-ओ-फ़िक्‌र के बाद जवाब दिया," हिंदुस्तान में एक ऐसी जगह है जहां उस्तरे बन हैं।"</font><font size="3">यह जवाब सुन कर उस का दोस्त मुत्‌मईन हो गया।</font><font size="3">उसी तरह एक सिख पागल ने एक दूसरे सिख पागल से पूछा "सरदार-जी हमें हिंदुस्तान क्‌यूं भेजा जा रहा है --- हमें तो वहां की बोली नहीं आती?"</font><font size="3">दूसरा मुस्कुराया " मुझे तो हिंदुस्तोड़ो की बोली आती है --- हिंदुस्तानी बड़े शैतानी आकड़ आकड़ फिर्‌ते हैं।"</font><font size="3">एक दिन नहाते नहाते एक मुसल्‌मान पागल ने " पाकिस्तान जिंदाबाद " का नारा इस ज़ोर से बुलंद किया कि फर्श पर फिसल कर गिरा और बेहोश हो गया ।<br />
बाज़ पागल ऐसे भी थे जो पागल नहीं थे। उन में अक्सरियत ऐसे क़ातिलों की थी जिन के रिश्तेदारों ने अफ़्‌सरों को दे दिला कर पागल-ख़ाने भिज्‌वा दिया था कि फांसी के फंदे से बच जाएं। यह कुछ कुछ समझ्‌ते थे कि हिंदुस्तान क्यूं तक़्‌सीम हुआ है और यह पाकिस्तान क्या है? लेकिन सही वाक़िआत से यह भी बे-ख़बर थे। अख़बारों से कुछ पता नहीं चलता था और पहरेदार सिपाही अनपढ़ और जाहिल थे। उन की गुफ़्‌तगू से भी वह कोई नतीजा बरामद नहीं कर सकते थे। उन को सिर्फ़ इतना मालूम था कि एक आद्मी मुहम्मद अली जिन्ना है जिस को काइदे आजम कह्‌ते हैं। उस ने मुसल्‌मानों के लिए एक `इलाहिदा मुल्क बनाया है जिस का नाम पाकिस्‌तान है। यह कहां है , उस का मह्‌ल्‌ल-ए वुक़ू` क्या है। उस के मुताल्लिक़ वह कुछ नहीं जान्‌ते थे। यही वजह है कि पागल-ख़ाने में वह सब पागल जिन का दिमाग़ पूरी तरह माऊफ़ नहीं हुआ था इस मख़्‌मसे में गिरफ़्तार थे कि वह पाकिस्तान में हैं या हिंदुस्तान में? अगर हिंदुस्तान में हैं तो पाकिस्तान कहां है? अगर वह पाकिस्तान में हैं तो यह कैसे हो सकता है कि वह कुछ अरसा पह्‌ले यहीं रह्‌ते हुए भी हिंदुस्तान में थे।<br />
एक पागल तो पाकिस्तान और हिंदुस्तान, और हिंदुस्तान और पाकिस्तान के चक्कर में कुछ ऐसा गिरफ़्तार हुआ कि और ज़ियादा पागल हो गया। झाड़ू देते देते एक दिन दरख़्त पर चढ़ गया और टह्‌नी पर बैठ कर दो घंटे मुसल्सल तक़्‌रीर कर्‌ता रहा जो पाकिस्तान और हिंदुस्तान के नाज़ुक मसले पर थी। सिपाहियों ने उसे नीचे उतरने को कहा तो वह और ऊपर चढ़ गया। डराया धमकाया गया तो उस ने कहा --- " मैं हिंदुस्तान में रह्‌ना चाहता हूं न पाकिस्तान में --- मैं इस दरख़्‌त ही पर रहूंगा।"</font><font size="3">बड़ी मुश्किलों के बाद जब उस का दौरा सर्द पड़ा तो वह नीचे उतरा और अपने हिन्दू सिख दोस्तों से गले मिल मिल कर रोने लगा, इस ख्याल से उस का दिल भर आया था कि वह उसे छोड़ कर हिंदुस्तान चले जाएंगे।</p>
<p>एक एम एस सी पास रेडियो इन्जीनियर में जो मुसल्मान था और दूसरे पागलों से बिल्कुल अलग थलग बाग़ की एक ख़ास रविश पर सारा दिन ख़ामोश टहलता रह्‌ता था यह तबदीली नमूदार हुई कि उस ने तमाम कप्‌ड़े उतार कर दफ़`अदार के हवाले कर दिए और नन्‌ग धड़न्‌ग सारे बाग़ में चलना फिरना शुरू` कर दिया।</p>
<p>चन्‌योट के एक मोटे मुसल्मान पागल ने जो मुस्लिम लीग का सर-गर्म कार्कुन रह चुका था और दिन में पन्द्रह सोलह मर्तबा नहाया करता था यक-लख़्‌त यह आदत तर्क कर दी। उस का नाम मुहम्मद अली था। चुनांचे उस ने एक दिन अपने जंगले में एलान कर दिया कि वह काइदे आजम मुहम्मद अली जिन्ना है। उस की देखा देखी एक सिख पागल मास्टर तारा सिंघ बन गया। क़रीब था कि उस जंगले में ख़ून ख़राबा हो जाए मगर दोनों को ख़तर्‌नाक पागल क़रार दे कर `अलाहिदा `अलाहिदा बंद कर दिया गया।<br />
लाहोर का एक नौजवान हिंदू वकील था जो मुहब्बत में ना-काम हो कर पागल हो गया था। जब उस ने सुना कि अमृतसर हिंदुस्तान में चला गया है तो उसे बहुत दुख हुआ। उसी शह्‌र की एक हिन्दू लड़्‌की से उसे मुहब्बत हो गई थी। गो उस ने उस वकील को ठुकरा दिया था मगर दीवानगी की हालत में भी वह उस को नहीं भूला था। चुनांचे उन तमाम हिन्दू और मुस्लिम लीडरों को गालियां देता था जिन्हों ने मिल मिला कर हिंदुस्तान के दो टुक्‌ड़े कर दिए। --- उस की मह्‌बूबा हिंदुस्तानी बन गई और वह पाकिस्तानी।</p>
<p>जब तबादले की बात शुरू` हुई तो वकील को कई पागलों ने समझाया कि वह दिल बुरा न करे। उस को हिंदुस्तान भेज दिया जाएगा। उस हिंदुस्तान में जहां उस की मह्‌बूबा रह्‌ती है। मगर वह लाहोर छोड़्‌ना नहीं चाह्‌ता था। इस लिए कि उस का ख्याल था कि अमृतसर में उस की प्रेक्टिस नहीं चलेगी।</p>
<p>यूरोपियन वार्ड में दो ऐंग्लो-इन्डियन पागल थे। उन को जब मालूम हुआ कि हिंदुस्तान को आज़ाद कर के अन्ग्रेज़ चले गए हैं तो उन को बहुत सदमा हुआ&#124; वह छुप छुप कर घंटों आपस में इस अहम मसले पर गुफ़्‌तगू करते रह्‌ते कि पागल-ख़ाने में उन की हैसियत किस क़िस्म की होगी। यूरोपियन वार्ड रहेगा या उड़ा दिया जाएगा। ब्रेकफ़ास्ट मिला करेगा या नहीं। क्या उन्हें डबल रोटी के बजाए बलडी इन्डियन चपाटी तो ज़ह्‌र मार नहीं करना पड़ेगी?<br />
एक सिख था जिस को पागल-ख़ाने में दाख़िल हुए पन्द्रह बरस हो चुके थे। हर वक़्त उस की ज़बान से यह `अजीब-ओ-ग़रीब अल्फ़ाज़ सुन्‌ने में आते थे _ " ऊपड़ दी गुड़ गुड़ दी एनक्स दी बे ध्याना दी मुंग दी दाल आफ़ दी लालटेन।" दिन को सोता था न रात को। पहरेदारों का यह कह्‌ना था कि पन्द्रह बरस के तवील अर्‌से में वह एक लह्‌ज़े के लिए भी नहीं सोया। लेटता भी नहीं था। अलबत्ता कभी कभी किसी दीवार के साथ टेक लगा लेता था।</p>
<p>हर वक़्‌त खड़े रह्‌ने से उस के पांव सूज गए थे। पिंडलियां भी फूल गई थीं। मगर इस जिस्मानी तकलीफ़ के बावजूद लेट कर आराम नहीं कर्‌ता था। हिंदुस्तान , पाकिस्तान और पागलों के तबादिले के मुत्तालिक जब कभी पागल-ख़ाने में गुफ़्‌तगू होती थी तो वह ग़ोर से सुन्‌ता था। कोई उस से पूछ्‌ता कि उस का क्या ख़ियाल है तो वह बड़ी सन्जीदगी से जवाब देता" ऊपड़ दी गुड़ गुड़ दी एनकस दी बे ध्याना दी मूंग दी दाल आफ़ दी पाकिस्तान गवर्न्मन्ट।"</p>
<p>लेकिन बाद में " आफ़ दी पाकिस्तान गवर्न्मन्ट" की जगह " आफ़ दी टोबा टेक सिंघ गवर्न्मन्ट" ने ले ली और उस ने दूसरे पागलों से पूछ्‌ना शुरू किया कि टोबा टेक सिंघ कहां है जहां का वह रह्‌ने वाला है। लेकिन किसी को भी मालूम नहीं था कि वह पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में। जो बताने की कोशिश करते थे वह खुद इस उलझावों में गिरिफ़्तार हो जाते थे कि सियालकोट पह्‌ले हिंदुस्तान में होता था पर अब सुना है कि पाकिस्तान में है। क्या पता है कि लाहोर जो अब पाकिस्तान में है कल हिंदुस्तान में चला जाए। या सारा हिंदुस्तान ही पाकिस्तान बन जाए। और यह भी कौन सीने पर हाथ रख कर कह सकता था कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों किसी दिन सिरे से गायब ही हो जाएं।</p>
<p>इस सिख पागल के केस छिदरे हो के बहुत मुख़्तसर रह गए थे&#124; चूंकि बहुत कम नहाता था इस लिए दाढ़ी और सर के बाल आपस में जम गए थे। जिन के बाइस उस की शक्ल बड़ी भयानक हो गई थी। मगर आद्‌मी बे-ज़रर था। पन्द्रह बरसों में उस ने कभी किसी से झगड़ा फ़साद नहीं किया था। पागल-ख़ाने के जो पुराने मुलाज़िम थे वह उस के मुत्तलिक इतना जानते थे कि टोबा टेक सिंह में उस की कई ज़मीनें थीं। अच्छा खाता पीता ज़मीन-दार था कि अचानक दिमाग़ उलट गया। उस के रिश्तेदार लोहे की मोटी मोटी ज़न्जीरों में उसे बांध कर लाए और पागल-ख़ाने में दाख़िल करा गए।</p>
<p>महीने में एक बार मुलाक़ात के लिए यह लोग आते थे और उस की ख़ैर ख़ैरियत दर्याफ़्त कर के चले जाते थे। एक मुद्दत तक यह सिलसिला जारी रहा। पर जब पाकिस्तान , हिंदुस्तान की गड़बड़ शुरू हुई तो उन का आना बन्द हो गया।</p>
<p>उस का नाम बिशन सिंघ था मगर सब उसे टोबा टेक सिंघ कह्‌ते थे। उस को इतना मालूम नहीं था कि दिन कौन सा है , महीना कौन सा है , या कितने साल बीत चुके हैं। लेकिन हर महीने जब उस के अज़ीज़-ओ-अक़ारिब उस से मिलने के लिए आते थे तो उसे अपने आप पता चल जाता था। चुनांचे वह दफादार से कह्‌ता कि उस की मुलाक़ात आ रही है। उस दिन वह अच्छी तरह नहाता , बदन पर ख़ूब साबुन घिसता और सर में तेल लगा कर कंघा करता , अपने कपड़े जो वह कभी इसतेमाल नहीं करता था निकलवा के पहनता और यूं सज बन कर मिलने वालों के पास जाता। वह उस से कुछ पूछ्ते तो वह ख़ामोश रह्‌ता या कभी कभार " ऊपड़ दी गुड़ गुड़ दी एनकस दी बे ध्याना दी मूंग दी दाल आफ़ दी लाल्टेन " कह देता।<br />
उस की एक लड़्‌की थी जो हर महीने एक उंगली बढ़ती बढ़ती पन्द्रह बरसों में जवान हो गई थी। बिशन सिंघ उस को पहचानता ही नहीं था। वह बच्ची थी जब भी अपने बाप को देख कर रोती थी , जवान हुई तब भी उस की आंखों से आंसू बह्‌ते थे।</p>
<p>पाकिस्तान और हिंदुस्तान का क़िस्सा शुरू` हुआ तो उस ने दूसरे पागलों से पूछ्‌ना शुरू` किया कि टोबा टेक सिंघ कहां है? जब इत्‌मीनान-बख़्‌श जवाब न मिला तो उस की कुरेद दिन-बदिन बढ़्‌ती गई। अब मुलाक़ात भी नहीं आती थी। पह्‌ले तो उसे अपने आप पता चल जाता था कि मिलने वाले आ रहे हैं , पर अब जैसे उस के दिल की आवाज़ भी बन्द हो गई थी जो उसे उन की आमद की ख़बर दे दिया करती थी।</p>
<p>उस की बड़ी ख़्वाहिश थी कि वह लोग आएं जो उस से हम-दर्दी का इज़हार करते थे और उस के लिए फल , मिठाइयां और कपड़े लाते थे। वह अगर उन से पूछ्‌ता कि टोबह टेक सिंघ कहां है तो वह यक़ीनन उसे बता देते कि पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में। क्योंकि उस का ख्याल था कि वह टोबा टेक सिंघ ही से आते हैं जहां उस की ज़मीनें हैं।<br />
पागल-ख़ाने में एक पागल ऐसा भी था जो खुद को ख़ुदा कह्‌ता था। उस से जब एक रोज़ बिशन सिंघ ने पूछा कि टोबा टेक सिंघ पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में , तो उस ने हस्‌ब-ए `आदत क़ह्‌क़हा लगाया और कहा "वह पाकिस्तान में है न हिंदुस्तान में, इस लिए कि हम ने अभी तक हुक्म नहीं दिया। "</p>
<p>बिशन सिंघ ने इस ख़ुदा से कई मरतबा बड़ी मिन्नत समाजत से कहा कि वह हुक्‌म दे दे ताकि झंझट ख़त्म हो मगर वह बहुत मसरूफ़ था इसलिए कि उसे और बे-शुमार हुक्म देने थे। एक दिन तन्ग आ कर वह उस पर बरस पड़ा "ऊपड़ दी गुड़ गुड़ दी एनक्स दी बे ध्याना दी मुंग दी दाल आफ़ वाहे गूरू जी दा ख़ालसा ऐंड वाहे गूरू जी की फ़तह --- जो बोले सो निहाल , सत सरी अकाल।"</p>
<p>उस का शायद यह मतलब था कि तुम मुसल्मानों के ख़ुदा हो --- सिखों के ख़ुदा होते तो ज़रूर मेरी सुनते ।</p>
<p>तबादले से कुछ दिन पहले टोबा टेक सिंघ का एक मुसल्मान जो उस का दोस्त था मुलाक़ात के लिए आया। पह्‌ले वह कभी नहीं आया था। जब बिशन सिंघ ने उसे देखा तो एक तरफ़ हट गया और वापस जाने लगा। मगर सिपाहियों ने उसे रोका " यह तुम से मिलने आया है --- तुम्हारा दोस्त फ़ज़ल दीन है। "</p>
<p>बिशन सिंघ ने फ़ज़ल दीन को एक नज़र देखा और कुछ बड़बड़ाने लगा। फ़ज़ल दीन ने आगे बढ़ कर उस के कन्धे पर हाथ रखा"मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि तुम से मिलूं लेकिन फ़ुरसत ही न मिली, तुम्हारे सब आदमी ख़ैरियत से हिंदुस्तान चले गए थे, मुझ से जितनी मदद हो सकी , मैं ने की, तुम्‌हारी बेटी रूप कौर . . . . "</p>
<p>वह कुछ कह्‌ते कह्‌ते रुक गया। बिशन सिंघ कुछ याद करने लगा " बेटी रूप कौर " _</p>
<p>फ़ज़ल दीन ने रुक रुक कर कहा " हां . . . . वह . . . . वह भी ठीक ठाक है --- उन के साथ ही चली गई थी। "<br />
बिशन सिंघ ख़ामोश रहा। फ़ज़ल दीन ने कह्‌ना शुरू` किया_ " उंहों ने मुझ से कहा था कि तुम्हारी ख़ैर ख़ैरियत पूछ्ता रहूं --- अब मैं ने सुना है कि तुम हिंदुस्तान जा रहे हो --- भाई बल्बेसर सिंघ और भाई वधावा सिंघ से मेरा सलाम कह्‌ना --- और बहन अमरित कौर से भी . . . . भाई बल्बेसर से कह्‌ना, फ़ज़ल दीन राज़ी खुशी है --- वह भूरी भैंसें जो वह छोड़ गए थे, उन में से एक ने कट्‌टा दिया है --- दूस्‌री के कट्‌टी हुई थी पर वह छह दिन की हो के मर गई . . . . और . . . . मेरी लाइक़ जो ख़िद्‌मत हो , कहना , मैं हर वक़्त तैयार हूं . . . . और यह तुम्‌हारे लिए थोड़े से मरूंडे लाया हूं। "</p>
<p>बिशन सिंघ ने मरूंडों की पोटली ले कर पास खड़े सिपाही के हवाले कर दी और फ़ज़ल दीन से पूछा "टोबा टेक सिंघ कहां है ?"</p>
<p>फ़ज़ल दीन ने क़द्रे हैरत से कहा " कहां है? --- वहीं है जहां था "</p>
<p>बिशन सिंघ ने फिर पूछा " पाकिस्तान में या हिंदुस्तान में ? "</p>
<p>" हिंदुस्तान में --- नहीं नहीं पाकिस्तान में " फ़ज़ल दीन बोखला सा गया।</p>
<p>बिशन सिंघ बड़्‌बड़ाता हुआ चला गया _ " ऊपड़ दी गुड़ गुड़ दी एनक्‌स दी बे ध्‌याना दी मुंग दी दाल आफ़ दी आफ़ दी पाकिस्तान ऐंड हिंदुस्तान आफ़ दी दूर फिटे मुंह ! "<br />
तबादले के तैयारियां मुकम्मल हो चुकी थीं। इधर से उधर और उधर से इधर आने वाले पागलों की फ़हरिस्तें पहुंच गई थीं और तबादले का दिन भी मुक़र्रर हो चुका था।<br />
।</p>
<p>सख़्त सर्दियां थीं जब लाहोर के पागल-ख़ाने से हिन्‌दू सिख पागलों से भरी हुई लारियां पुलिस के मुहाफ़िज़ दस्ते के साथ रवाना हुई मुत्तलिक अफ़सर भी हमराह थे। वाघा के बार्डर पर तरफ़ैन के सुपरिंटेडेंट एक दूसरे से मिले और इब्तिदाई कारवाई ख़त्म होने के बाद तबादला शुरू` हो गया जो रात भर जारी रहा।</p>
<p>पागलों को लारियों से निकालना और दूसरे अफ़सरों के हवाले करना बड़ा कठिन काम था। बाज़ तो बाहर निकलते ही नहीं थे। जो निकलने पर रज़ा-मन्द होते थे, उन को संभालना मुश्‌किल हो जाता था, क्योंकि इधर उधर भाग उठते थे , जो नन्गे थे उन को कप्‌ड़े पनाए जाते तो वह फाड़ कर अपने तन से जुदा कर देते। कोई गालियां बक रहा है, कोई गा रहा है, _ आपस में लड़ झगड़ रहे हैं, _ रो रहे हैं , बिलख रहे हैं, कान पड़ी आवाज़ सुनाई नहीं देती थी, पागल औरतों का शोर-ओ-ग़ौग़ा अलग था और सर्दी इतनी कड़ाके की थी कि दांत से दांत बज रहे थे ।<br />
पागलों की अकसरियत इस तबादले के हक़ में नहीं थी। इसलिए कि उन की समझ में नहीं आता था कि उंहें अपनी जगह से उखाड़ कर कहां फेंका जा रहा है। वह चन्द जो कुछ सोच समझ सकते थे " पाकिस्तान जिंदाबाद" और " पाकिस्तान मुर्दाबाद" के नारे लगा रहे थे। दो तीन मर्तबा फ़साद होते होते बचा , क्योंकि बाज़ मुसल्मानों ओर सिखों को यह नारे सुन कर तेश आ गया था।</p>
<p>बिशन सिंघ की बारी आई और वाघा के उस पार मुत्तलिक अफ़सर उस का नाम रिजिस्टर में दरज करने लगा तो उस ने पूछा " टोबा टेक सिंघ कहां है? --- पाकिस्तान में या हिंदुस्तान में ? "</p>
<p>मुत्तलिक अफ़सर हंसा " पाकिस्तान में "</p>
<p>यह सुन कर बिशन सिंघ उछल कर एक तरफ़ हटा और दौड़ कर अपने बाक़ी मांदह साथियों के पास पहुंच गया। पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ़ ले जाने लगे , मगर उस ने चलने से इन्कार कर दिया "टोबा टेक सिंघ यहां है --- " और ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगा _ " ऊपड़ दी गुड़ गुड़ दी एनक्स दी बे ध्याना दी मुंग दी दाल आफ़ टोबा टेक सिंघ ऐंड पाकिस्तान "<br />
उसे बहुत समझाया गया कि देखो अब टोबा टेक सिंघ हिंदुस्तान में चला गया है,अगर नहीं गया तो उसे फ़ौरन वहां भेज दिया जाएगा। मगर वह न माना। जब उस को ज़बर्दस्ती दूसरी तरफ़ ले जाने की कोशिश की गई तो वह दर्मियान में एक जगह इस अन्दाज़ में अपनि सूजी हुई टांगों पर खड़ा हो गया जैसे अब उसे कोई ताक़त वहां से नहीं हिला सकेगी।</p>
<p>आदमी चूंकि बे-ज़रर था इस लिए उस से मज़ीद ज़बर्दस्ती न की गई , उस को वहीं खड़ा रह्‌ने दिया गया और तबादले का बाक़ी काम होता रहा।</p>
<p>सूरज निकलने से पहले साकत-ओ-सामत बिशन सिंघ के हल्क़ से एक फ़लक-शिगाफ़ चीख़ निकली। इधर उधर से कई अफ़सर दौड़े आए और देखा कि वह आद्‌मी जो पन्द्रह बरस तक दिन रात अप्‌नी टांगों पर खड़ा रहा , औंधे मुंह लेटा है। उधर ख़ारदार तारों के पीछे हिंदुस्तान था, इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान! दर्मियान में ज़मीन के उस टुकड़े पर जिस का कोइ नाम नहीं था। टोबह टेक सिंघ पड़ा था।</p>
<p>इसे भी पढ़ें<br />
<a rel="bookmark" target="_blank" href="http://aaina2.wordpress.com/2007/08/08/khol-do/"><font size="3" color="#444444">मंटो की कहानी - “खोल दो”</font></a></p>
<p></font></p>
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</item>
<item>
<title><![CDATA[वित्तमंत्री जी डाक टिकट के पैसे तो दे दो इन्हें]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/07/18/income-tax/</link>
<pubDate>Wed, 18 Jul 2007 14:25:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
<guid>http://aaina2.wordpress.com/2007/07/18/income-tax/</guid>
<description><![CDATA[
आज जीतू भाई से दिल्ली में मिलने से पहल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.chitthajagat.in/?claim=em2l3b53kpip" title="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी"></a><br />
<font size="3">आज <a href="http://hindibloggersmeet.blogspot.com/2007/07/blog-post_18.html">जीतू भाई से दिल्ली में मिलने</a> से पहले मैं  अपना आयकर रिटर्न जमा करवाने ITO गया। कई सालों से देख रहा हूं कि दिल्ली के ITO ऑफिस में कैसा बुरा हाल है। ऑफिस के गलियारों और कमरों में पर्याप्त रोशनी नहीं है। कूलर दसियों साल पुराने हैं। जो रिटर्न हर साल हम बड़े चाव से बनाते हैं और बड़े शान से जमा करवाते हैं वह सब रिटर्न वहां यूंही खुले में जमीन पर पड़ीं दिखीं। मैने जब कर्मचारी से अपने 2004- 05 तथा 2005-06 के रिफंड के बारे में जानना चाहा तो उन्हों ने कहा की जुलाई के बाद ही आकर पता करें। मेरे यह पूछने पर कि क्या आप डाक से भिजवा देंगे कर्मचारी ने कहा कि आप खुद ही आकर पता कर लीजियेगा क्योंकि हमें तो डाक टिकट भी नहीं मिलते अपने पास से टिकट लगा कर भेजने पड़ते हैं।</font></p>
<p><font size="3">अब पता नहीं कि कर्मचारी सच कह रहा था या बहाने से बुला कर कुछ अपनी जेब गर्म करवाना चाहता था।</font></p>
<p align="left"><font size="3">आज सुबह ही अखबार में पढ़ा था कि सरकार के पास <a href="http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/2211378.cms">5000 करोड़ रुपये का बकाया रिफंड</a> पड़ा है। मंत्री जी इस पैसे के एक दिन के ब्याज के बराबर भी अगर आप आयकर विभाग के कार्यालयों के ऊपर खर्च करदें तो कैसा रहे? न सिर्फ यहां आधारभूत सुविधाओं की आवश्यकता है इसके साथ साथ सारे कार्यालय को कंप्यूटरीकृत कर करदाताओं के लिये उनके रिटर्न तथा रिफंड के बारे में ऑनलाइन जानकारी भी दिया जाना आवश्यक है। सरकार ने कर तथा रिटर्न जमा करवाने की तो समय सीमा निर्धारित की हुई है मगर रिफंड भिजवाने की कोइ समय सीमा तय नहीं की है।</font></p>
<hr />
<p><b>Technorati Tags:</b> <a href="http://technorati.com/tags/Income" rel="tag">Income</a>, <a href="http://technorati.com/tags/Tax" rel="tag">Tax</a>, <a href="http://technorati.com/tags/आयकर" rel="tag">आयकर</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्या कोइ हमें  हिंदी चिट्ठों का देसीपंडित देगा ?]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/07/13/desipundit/</link>
<pubDate>Fri, 13 Jul 2007 13:19:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
<guid>http://aaina2.wordpress.com/2007/07/13/desipundit/</guid>
<description><![CDATA[मेरे दोस्त राजेश रोशन ने लिखा कि कैसे ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3">मेरे दोस्त <a href="http://merasapna.wordpress.com/" target="_blank">राजेश रोशन</a> ने लिखा कि कैसे उनकी एक पोस्ट पर <a href="http://merasapna.wordpress.com/2007/07/13/shakira-keyword-and-hits/">एक ही दिन में 221 हिट्स</a> मिले। ऐसा ही एक बार मेरे एक पोस्ट पर हुआ जब मैंने <a href="http://aaina2.wordpress.com/2007/03/20/250/" target="_blank">गुरू</a> <a href="http://aaina2.wordpress.com/2007/03/20/251/">फिल्म</a> के <a href="http://aaina2.wordpress.com/2007/03/20/252/">अनदेखे</a> <a href="http://aaina2.wordpress.com/2007/03/20/253/">सीन</a> पोस्ट किये और उनका लिंक किसी ने ऑर्कुट पर किसी की स्क्रैपबुक पर लगा दिया।</font></p>
<p><font size="3">यह बात पहले भी कई वरिष्ठ चिट्ठाकार लिख चुके हैं कि एग्रीगेटर केवल वह नोटिसबोर्ड होता है जो कि आपकी पोस्ट की सूचना लोगों तक दे देता है। वास्तव में केवल पहले और दूसरे दिन ही लोग एग्रीगेटर से उस पोस्ट तक आते हैं उसके बाद सर्च करने वाले ही आपके चिट्ठे की विभिन्न पोस्टों तक आते हैं और हमारी पोस्ट की आयू तो अनंत वर्षों की है। <img src="http://farm2.static.flickr.com/1185/798407569_9fcb5ee40f.jpg" alt="आईना पर सर्च से आने वाले" align="middle" border="0" height="417" width="500" /></font></p>
<p><font size="3">यहां मैं अपनी एक पोस्ट <a href="http://aaina2.wordpress.com/2006/06/13/hindinewspaper/" rel="bookmark" title="Permanent Link to "><font color="#444444" size="3">दिस इज़ हिंडी न्यूजपेपर फ़्रॉम डेल्ही</font></a> का उदाहरण देता हूं जिसे मैंने जून 2006 में पोस्ट किया था। आप देख सकते हैं कि पिछले तेरह महीने में इस पोस्ट पर तेरह सौ से ज्यादा हिट्स मिले हैं।  </font><font size="3"> </font><br />
<img src="http://farm2.static.flickr.com/1348/798312089_049e7c3fb7.jpg" alt="मेरी एक पोस्ट के  आंकड़े" border="0" height="193" width="500" /><br />
<font size="3"> यदि आपकी पोस्ट में कुछ ऐसा लिखा है जो केवल आज ही नहीं आने वाले समय तक प्रासांगिक है तो पाठक आपके चिट्ठे पर आते रहेंगे। अब जब चिट्ठाकारों की संख्या जल्द ही हजार (अभी तक ७६१) को छूने वाली है और प्रतिदिन दो सौ से अधिक लेख पोस्ट होंगे तो एग्रीगेटर की भूमिका और भी नग्णय हो जायेगी। आज जब हम इस बात पर खुश हो रहे हैं कि हमारी पोस्ट बटन दबाते ही एग्रीगेटर पर आ जायेगी तब इस बात को भूल रहे हैं कि जल्द ही इतने चिट्ठे हो जायेंगे कि हमारी पोस्ट एक घंटा भी एग्रीगेटर के पहले पेज पर नहीं रहेगी।  दिन भर एग्रिगेटरों की बहती गटरगंगाओं में कोइ अच्छी पोस्ट कब आयी और कब चली गयी पता भी नहीं चलेगा। आज हमें शायद नये एग्रीगेटरों की उतनी जरूरत नहीं है जितनी कि एक मैच्योर तरीके से की गयी चिट्ठाचर्चा की जरूरत है जिसमें दिन की केवल अच्छी पोस्टों का ही जिक्र हो।   क्या कोइ हमें हमारा हिंदी चिट्ठों का अपना <a href="http://www.desipundit.com/">देसीपंडित</a> देगा?</font></p>
<p><font size="3"> </font><font size="3"><a href="http://www.desipundit.com/2006/10/11/windoz-ke-loche/" target="_blank"></a><a href="http://www.desipundit.com/2006/10/11/windoz-ke-loche/"><img src="http://farm2.static.flickr.com/1056/798312133_e1d1aeb237.jpg" alt="देसी पंडित पर मेरी एक पोस्ट" align="middle" border="0" height="189" width="500" /></a></font></p>
<hr />
<p><b>Technorati Tags:</b> <a href="http://technorati.com/tags/Blog" rel="tag">Blog</a>, <a href="http://technorati.com/tags/Blogs" rel="tag">Blogs</a>, <a href="http://technorati.com/tags/Hindi" rel="tag">Hindi</a>, <a href="http://technorati.com/tags/Desipundit" rel="tag">Desipundit</a>, <a href="http://technorati.com/tags/हिंदी" rel="tag">हिंदी</a>, <a href="http://technorati.com/tags/चिट्ठे" rel="tag">चिट्ठे</a>, <a href="http://technorati.com/tags/चिट्ठा" rel="tag">चिट्ठा</a>, <a href="http://technorati.com/tags/देसीपंडित" rel="tag">देसीपंडित</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[उनकी आत्महत्या और हमारी आत्मा की हत्या]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/05/30/atma-ki-hatya/</link>
<pubDate>Wed, 30 May 2007 13:28:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
<guid>http://aaina2.wordpress.com/2007/05/30/atma-ki-hatya/</guid>
<description><![CDATA[
परसों जब अपने नये चिट्ठे मजेदार समाचा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"><br />
परसों जब अपने नये चिट्ठे <a href="http://hindinewspaper.blogspot.com/">मजेदार समाचार</a> के लिये कुछ मजेदार समाचार खोज रहा था तो एक समाचार पर नजर पड़ी जिसमें <a href="http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/2079737.cms">जापान के एक मंत्री ने</a> एक घोटाले में नाम आ जाने के कारण शर्म के मारे आत्महत्या कर ली। मुझे पढ़ कर बहुत विस्मय हुआ। जापान इतना प्रगति कर चुका मगर आध्यात्म में हमारे जितनी तरक्की कोई नहीं कर पाया। हमारे यहां मंत्री लोग मंत्री बनने से पहले ही अपनी आत्मा की ही ह्त्या कर लेते हैं। न होगी आत्मा और न होगी आत्मा की आवाज। हमारे यहां तो मंत्री, सांसद या विधायक बनने की पहली शर्त ही यही है कि आपकी आत्मा मर चुकी हो। रही घोटालों की बात तो हमारे यहां तो किसी के पार्षद बनते ही घोटालों में नाम आ जाता है। इसके बाद विधायक, सांसद या मंत्री बनने तक तो बाकायदा कई कई मुकदमे शुरू हो जाते हैं। कई दफा मुकदमे आपराधिक और हत्या तक के भी हो सकते हैं। पिछली बार तो एक केंद्रिय मंत्री को हत्या के जुर्म में उम्र कैद की सजा मिलने पर आनन फानन में इस्तीफा करवाया गया। कई बार तो उम्मीदवार जेल से ही चुनाव लड़ते हैं। आजकल तो जिस किसी पर ज्यादा से ज्यादा घोटालों के आरोप हों वह सांसद या विधायक बनने का सबसे ज्यादा प्रबल उम्मीदवार होता है। </font><font size="3">मंत्री होने का मतलब ही यही है कि वे अक्सर अदालत आते जाते रहें। इससे उन्हें प्रचार मिलता है और अगले चुनावों में भी विजयी होने के चांस बढ़ते हैं। हमारे न्यूज चैनल वाले भी ऐसे ही मंत्रियों के पीछे पीछे कैमरा ले कर चलते हैं।</font></p>
<p><font size="3">कभी आप किसी भी कार्य दिवस में सुबह ग्यारह बजे के आसपास जब अदालतें खुलती हैं उस समय कोइ न्यूज चैनल लगा कर देखिये। किसी न किसी नेता (या अभिनेता) की तारीख लगी होगी अदालत में। पहले तो संवाददाता मंत्री जी के आने से पहले सीधे प्रसारण में मुकदमे की जानकारी देगा। फिर कारों के काफिले के साथ मंत्री जी आयेंगे। मंत्री जी एफटीवी की मॉडल की तरह कैट वॉक करते अदालत के दरवाजे से पहले उस तरफ जायेंगे जहां टीवी के कैमरे खड़े होंगे। पहले मंत्री जी कैमरों की तरफ हाथ हिला कर मुस्कुरायेंगे। फिर दो अंगुलियां फैला कर 'वी' का चिन्ह बनायेंगे। फिर अपनी चिरप्रतीक्षित बाईट देंगे। मंत्री जी अपनी पहली लाइन में अपने विरोधियों पर निशाना साधेंगे कि यह सब हमारे विरोधियों की चाल है। अब यहां यह स्पष्ट करदें कि यह विरोधी, विरोधी दल वाले भी हो सकते हैं या फिर उनके अपने दल में भी हो सकते हैं जो कि उन्हें मंत्री बनाये जाने का सिर्फ इस लिये विरोध कर रहे होते हैं कि वो हटें तो हम बनें। दूसरी लाइन में मंत्री जी अपने समुदाय या जाति की दुहाई देंगे कि हमारे समुदाय को आगे बढ़ने से रोकने के लिये यह सब किया जा रहा है। अब यहां यह ध्यान देने लायक बात है कि मंत्री जी इसी जाति या समुदाय का नाम लेकर चुनाव जीते थे और इसी जाति के कोटे से मंत्री भी बने थे। तीसरी लाइन में मंत्री जी बतायेंगे कि उनके खिलाफ कोई आरोप सिद्ध नहीं होगा क्योंकि उन्होंने कोइ सबूत छोड़ा ही नहीं। हम इस मुकदमे से बेदाग होकर निकलेंगे। इसके बाद सर्फ एक्सेल का विज्ञापन "दाग अच्छे हैं ना!"</font><font size="3"> </font></p>
<p><font size="3">कभी कभी तो मैं सोचता हूं कि हमारे नेता यदि घोटाले न करें या हमारे अभिनेता कहीं से लाकर हथियार न छुपायें तो हमारे न्यूज चैनल वाले सारा दिन अपने चैनल पर क्या दिखायेंगे? अब मीका सिंह और रिचर्ड गेयर रोज रोज तो लड़कियां चूमते नजर नहीं ना आयेंगे।</font></p>
<p><font size="3">अभिनेता जब अदालत में आता है तो सीन जरा अलग सा होता है। वो अपनी जींस में और लाल नीली शर्ट में ऊपर के दो बटन खोले चुपचाप आंखे झुकाये कैमरे के सामने से अदालत की और चला जायेगा। माथे पर सुबह मंदिर से लगवाया लंबा चंदन का टीका होगा। यहां बाईट उनके फैन देते हैं "सो क्यूट, कितने हैंडसम लग रहे थे ना?" उसके बाद रीड एंड टेलर का विज्ञापन "लम्हों को लिबास दे।"</font><font size="3"> </font></p>
<p><font size="3">एक अभिनेता पर पंद्र्ह साल मुकदमा चल जाये, उसका फिल्म निर्माता इस बीच लगातार पांच छः फिल्में बना कर अरबपती बन जाये। टुन्ना भाई लगे रहो, टुन्ना भाई अमेरिका में, टुन्ना भाई चांद पर।</font></p>
<p><font size="3">हां तो बात मंत्री की आत्महत्या और आत्मा की हत्या की हो रही थी। हमारे यहां मंत्री द्वारा आत्महत्या का कोइ इतिहास नहीं है। हां उन्हे चुनने वाली जनता अकसर आत्महत्या करती पाई जाती है। किसी भी दिन का अखबार उठा कर देख लीजिये। देश के कई हिस्से मिल जायेंगे जहां आये दिन किसान आत्महत्यायें कर रहे हैं। खुद से न मरें तो पुलिस की गोलियां किस लिये हैं, कभी सिंगूर में किसानों की जमीन के नाम पर तो कभी बूंदी, दौसा में आरक्षण के नाम पर।<br />
हां हमारे यहां यदि कोई बिना किसी घोटाले के पांच साल तक मंत्री बना रह जाये तो शर्म के मारे आत्महत्या जरूर कर ले।</font></p>
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सावधान! आपकी निजी सूचनायें कोई बेच तो नहीं रहा!]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/05/05/private-information/</link>
<pubDate>Sat, 05 May 2007 07:41:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
<guid>http://aaina2.wordpress.com/2007/05/05/private-information/</guid>
<description><![CDATA[  कल पार्किंग में गाड़ी खड़ी करके ऑफिस क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>  <font size="3">कल पार्किंग में गाड़ी खड़ी करके ऑफिस की ओर जाने लगा तो एक युवक टकरा गया। "माफ करें सर! आपसे दो मिनट बात कर सकता हूं?" मैंने हामी भरी तो उसने बताया "सर मैं एमबीए कर रहा हूं और अपने एक प्रोजेक्ट जो कि लोगों के निवेश की आदतों पर है के लिये सर्वे कर रहा हूं। क्या आप मुझे कुछ जानकारी देना चाहेंगे।" "अवश्य, मगर अपना नाम, पता और फोन नम्बर नहीं बताऊंगा।" मैंने कहा। "सर यह सब तो बहुत जरूरी है, इसके बिना काम नहीं चलेगा।" मैं चलने को हुआ तो युवक दयनीय सा हो कर बोला "सर प्लीज़ बता दीजीये ना?" इस बार मैं कुछ झुंझला कर जोर से बोला "भई सर्वे कर रहे हो तो नाम और संपर्क की क्या जरूरत है?" इस बार युवक खुल कर बोल पड़ा " दरअसल मैं एक कम्पनी  के लिये डाटा एकत्र कर रहा हूं और जितना डाटा शाम तक इकट्ठा होगा मुझे उसी हिसाब से पैसे मिलेंगे।"</font></p>
<p><font size="3">मैं तो यह देख सुन कर हैरान रह गया। एक भोला सा युवक जो अपने एक निजी प्रोजेक्ट के लिये सहायता मांग रहा था असल में मुझ से मेरी सारी निजी जानकारी जैसे कि मैं कहां कहां और कितना कितना निवेश करता हूं, शेयर बाजार, म्यूचल फंड, बैंक डिपॉज़िट ले लेता और फिर मेरे नाम, पते और मोबाईल नम्बर के साथ बाजार में वह या उसकी कम्पनी जिसके लिये वह काम करता है, इस जानाकारी को बेच देते। मुझे आइडिया तो था कि लोग इस तरह से भी डाटा एकत्र करते हैं मगर मेरे साथ यह पहली बार हुआ था।</font><font size="3"> </font><font size="3">इस प्रकार की सूचनायें तथा डाटा टेली मार्कटिंग के काम की रीढ़ है। आप लाख कोशिश कर लें मगर ये लोग इन सूचनाओं का जुगाड़ कर ही लेते हैं। अगली बार जब आपके पास किसी टेली मर्केटिंग वाले या वाली का फोन आये तो हैरान न हों अगर आपके बारे में उनके पास आपकी कई गोपनीय जानकारियां पहले से हो मौजूद हों। इस तरह की जानकारियों और सूचनाओं का बहुत बड़ा बाजार है जहां आपके बारे में जानकारियां मंहगे में बिकती हैं।</font></p>
<p><font size="3">इस तरह की जानाकारियां कई बार बैंको में काम करने वाले जुटा कर इन लोगों को खाते नम्बर और बैंक बैंलेस की सूचना के साथ बेच देते हैं। सिर्फ दो रुपये प्रति जानकारी के रेट से।</font></p>
<p><font size="3">कई बार जब हम ऑफिस में बैठे होते हैं तो लोग कई बहानों से हमारा विज़िटिंग कार्ड मांग कर ले जाते हैं। याद कीजिये पिछली बार कोई आया हो यह कहने कि हम लोग का प्रिंटिंग प्रैस है, यदि आपको कोई प्रिंटिंग का काम हो तो हमें दीजिये या हम लोग कम्प्यूटर रिपेयर करते हैं यदि आपको कोई काम हो तो हमें दीजिये। ये लोग जाते जाते आपका विज़िटिंग कार्ड ले जाते हैं। एक रुपये में छपा आपका विज़िटिंग कार्ड चार रुपये तक में बिक जाता है। आप के नाम के साथ साथ, आपकी कम्पनी का नाम, आप किस पद पर कार्यरत हैं, आपके फोन नम्बर सब सूचनायें बिकाऊ हैं।</font><font size="3"> </font><font size="3">जिस तरह के बाजार में हम पहुंच रहे हैं वहा अपने बारे में जानाकारियों को किस तरह से छिपा कर रखा जाये इस बारे में अभी सतर्कता या जागरुकता हम लोगों मे बिल्कुल नहीं आयी है।</font></p>
<p><font size="3">हमारे बैंक इन विषयों पर कितने जागरूक हैं इसका एक उदाहरण आपको देता हूं।</font></p>
<p><font size="3">एक बार मैं एक निजी बैंक के काऊंटर पर खड़ा था। साथ साथ बने चार काऊंटरों पर लगभग पचास लोग बेहद करीब करीब खड़े थे। काऊंटर पर बैठी महिला बहुत जोर जोर से बोल रहीं थी। पता नहीं उनकी आवाज ही तेज थी या शीशे के आर पार ग्राहकों से बात करने के कारण उनकी यह आदत बन गयी थी। मेरे आगे एक सज्जन पुरूष खड़े थे। अचानक से वो महिला बैंक कर्मचारी जोर से उन सज्जन से बोलीं "अरे! आपने साढ़े पांच लाख रुपये यूं ही सेविंग एकाऊंट में क्यों रखे हुए हैं।" सज्जन बहुत ही भद्र थे। कुछ बोल न पाये। मगर आप ही बताइये इस तरह की बात इस प्रकार से इतने लोगों के बीच एक बैंक कर्मचारी द्वारा बोलना क्या ठीक है? हमारे यहां न तो बैंकिंग तथा निवेश की सेवायें देने वाले इतने प्रोफेशनल होते हैं कि ग्राहक की निजता का आदर कर सकें और न ही ग्राहक इतने जागरूक हैं जो इस सब का विरोध कर सकें।</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मत रोको हवाओं को]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/03/07/blog-4/</link>
<pubDate>Wed, 07 Mar 2007 02:05:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
<guid>http://aaina2.wordpress.com/2007/03/07/blog-4/</guid>
<description><![CDATA[मार्च का महीना हमारे लिये बहुत ही व्यस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size>मार्च का महीना हमारे लिये बहुत ही व्यस्ततम महीना होता है।<br />
मैंने फैसला किया था कि मार्च में कोई पोस्ट नहीं लिखूंगा, मगर आज लिखनी पड़ रही है। व्यस्तता के कारण ही कल केवल एक जरूरी मेल देखने के लिये सुबह कम्प्यूटर चलाया था और बंद करने लगा तो नारद के फीड पर संजय भाई  की पोस्ट के शीर्षक पर नजर गयी। मुझे लगा कि इसका तीव्र विरोध होना चहिये तो जल्दी में एक लाईन की पोस्ट करके चला गया। यकीन मानिये मेरा उद्देश्य कोई सनसनी फैलाना या ड्रामा खड़ा करना नहीं था। थोड़े में तीव्र विरोध जताने  का मुझे यही तरीका सूझा।</p>
<p>उस दिन उस महिला को देखता था टीवी पर जब वह रो  रो कर निवेदन कर रही थी कि इस फिल्म को अपने राज्य में प्रदर्शित हो जाने दीजिये, शायद मेरा बच्चा मुझे मिल जाये।<br />
मुझे लगा कि एक मां की तस्सली के लिये ही सही, यह फिल्म देश के हर हिस्से में दिखायी जानी चाहिये मगर मैं  अपने आप को इस विषय पर बेबस महसूस कर रहा था।<br />
कल सुबह मुझे वही बेबस मां और अपनी बेबसी याद हो आई। मगर मुझे लगा कि नारद के मुद्दे पर मैं इतना बेबस नहीं हूं, यहां शायद मेरी बात भी सुनी जा सकेगी, तो जोरदार तरीके से अपनी बात रखनी चाही। </p>
<p>मेरी यह पोस्ट पाबंदी के विचार के खिलाफ थी। निजी तौर पर संजय भाई के खिलाफ नहीं।</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मेरी पाँच बातें : तर्जुमा आईने का ठीक नहीं]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/02/25/aaina/</link>
<pubDate>Sun, 25 Feb 2007 17:51:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
<guid>http://aaina2.wordpress.com/2007/02/25/aaina/</guid>
<description><![CDATA[
 रचना जी ने जब पांच सवाल पूछे तो मैंने ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"><br />
 रचना जी ने जब <a href="http://rachanabajaj.wordpress.com/2007/02/16/meree-paancha-baate/#comments">पांच सवाल पूछे तो मैंने चुटकी ली</a> थी कि "आपको मौका मिला था तो कुछ निजी पोल पट्टी खुलवाते इन सब की। आपने तो बड़े औपचारिक से प्रश्न पूछे।" इस पर समीर भाई ने लिखा कि "जितने लोग सोच रहे हैं कि हमें सस्ते में छोड़ दिया गया है, उनके नाम नोट हो गये हैं. अब कम से कम वो तो सस्ते में नहीं ही छूटेंगे, यह तय रहा."<br />
मुझे  आशंका थी कि जल्द ही <a href="http://udantashtari.blogspot.com/">समीर भाई</a> निशाना साधेंगे मगर जब तक समीर भाई रचना जी के सवालों का जवाब देते और हमें फंसाते, जीतू भाई ने हम पर <a href="http://www.jitu.info/merapanna/?p=672">सवालों के तीर दाग दिये</a>। वो सवाल जो जब दूसरों से पूछे जा रहे थे तो बहुत आसान लग रहे थे, जब हम से पूछे गये तो कुछ कुछ मुशकिल लगने लगे। फिर भी कोशिश करते हैं कि जवाब सच्चाई और इमानदारी से दिये जायें। </p>
<p>(जब यह लिख रहा था तो <a href="http://epandit.blogspot.com/2007/02/game-of-tagging-and-15-questions.html">श्रीश ने भी मुझे टैग किया</a> है। मगर जो कुछ भी लिखा है उसमें उनके सवालों के जवाब भी मिल जाते हैं इसीलिये अलग से नहीं लिख रहा। मैं जिनको टैग करना चाहता था वे पहले से ही टैग हो चुके हैं तो मैं अपने पांच नाम भी नहीं दे रहा।)</p>
<p><b>क्या चिट्ठाकारी ने आपके जीवन/व्यक्तित्व को प्रभावित किया है? </b></p>
<p>बहुत ही अनोखी दुनिया है हिंदी चिट्ठाकारिता की। दुनिया के अलग अलग कोने पर बैठे लोग एक दूसरे से इतना प्यार और सहयोग रखे हैं&#124; बिना किसी स्वार्थ के. बिना किसी लालसा के संबध बन रहे हैं&#124; एक दूसरे का विरोध करते हैं, सहमत होते हैं, फिर विरोध करते रहने के लिये सहमत हो जाते हैं&#124; एक दिन जिस पर गुस्सा दिखाते हैं, दूसरे दिन उसी के ब्लाग पर जाकर प्यार भरी टिप्पणी कर आते हैं :) ऐसी दुनिया में आप प्रभावित हुए बिना कैसे रह सकते हैं? फिर यहां आकर न सिर्फ अपने विचारों को प्रस्तुत करने का मंच मिला, दूसरों को पढ़ पढ़ कर अपने ज्ञान और सोच का दायरा भी बढ़ा। कई चीजों पर मेरी सोच बदली। कई बार तो पूरे 180 डिग्री। शुरू में जीतू भाई आपके चिट्ठे पर जब <a href="http://www.jitu.info/merapanna/?page_id=319">आपके बारे में</a> पढ़ रहा था तो आपकी एक बात ने बहुत प्रभावित किया, वो थी कि <b>"जिन्दगी हर रोज कुछ ना कुछ नया सिखाती है, बहुत कुछ सीखा…….नही सीख पाया तो बस किसी से नफरत करना।"</b>  अनूप जी द्वारा प्रस्तुत अखिलेश जी का लेख "<a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=211">मनुष्य खत्म हो रहे हैं, वस्तुयें खिली हुई हैं</a>" ने मेरी सोच को जैसे झकझोड़ दिया। इस लेख से संवेदनाओं के नये मायने सीखे। इस लेख ने मेरा ध्यान दूसरे भारत की तरफ खींचा जिस दूसरे भारत के बारे में <a href="http://srijanshilpi.com/">सृजनशिल्पी जी</a> मुझे लिखने को बार बार कहते रहते थे, उस तरफ ध्यान गया तो  जाना कि सच्चाई वह नहीं जो दिल्ली से दिखती है। इसके बाद मेरे लेखन का झुकाव भी इस <a href="http://aaina2.wordpress.com/2007/01/10/india/">दूसरे भारत</a> की तरफ हुआ।<br />
अभी हाल ही में लिंक बदलते बदलते रवि रतलामी जी के एक <a href="http://hindini.com/ravi/?p=15">पुराने लेख</a> पर पहुंच गया। इस लेख ने भी मुझे बहुत प्रभावित किया और वहां एक भावुक सी टिप्पणी भी छोड़ कर आया जिसका <a href="http://raviratlami.blogspot.com/2007/02/demon-numbers-to-tag.html">जिक्र रवि जी ने भी किया</a>। यूं तो यहां आकर इतनी ज्यादा उद्विग्नताएं और संवेदनायें मिली फिर भी पहले की अपेक्षा अब ज्यादा अच्छी नींद आती है :)<br />
एक बात बताना चाहूंगा कि कभी कभी चिट्ठे में इतना तल्लीन हो जाता हूं कि कई जरूरी काम भी छूट जाते हैं ।</p>
<p><b>आपने कितने लोगों को चिट्ठाकारी के लिए प्रेरित किया है। </b></p>
<p>याहू ने जब ३६० ब्लाग शुरू किया तो कुछ एक दो प्रविष्टियां वहां मैंने भी कीं (बहुत कुछ बचकानी सी, ब्लाग के बारे में जानता नहीं था कुछ)। एक जगह जब मैंने रोमन में गालिब का एक शेर लिखा तो <a href="http://360.yahoo.com/profile-83pkQKYidbUVHwdTsKb2SyK7">शेषनाथ जी</a> की टिप्पणी मिली जिसमें अक्षरग्राम, नारद के साथ अनुनाद जी कें हिंदी लिंकों वाली पोस्ट के लिंक थे। बस, कड़ी से कड़ी मिलती गई। मैं भी वही तरीका अपनाता हूं। बहुत से भारतीय जो अंग्रेजी में लिखते हैं, उनके ब्लाग पर टिप्पणी छोड़ आता हूं, इससे हमें नये पाठक मिलते हैं, कई प्रेरित हो कर हिंदी लिखना भी शुरू कर देते हैं। संख्या नहीं बता पाऊंगा।</p>
<p><b>आपके मनपसन्द चिट्ठाकार कौन है और क्यों?</b></p>
<p>यूं तो पूरी सूची लगा रखी है साईडबार में। सब पसंद हैं। फिर भी अनूपजी, जीतू भाई, रवि जी, रमन जी, दीपक जी, समीर जी, नीरज भाई ऐसे नाम हैं जिनके पोस्ट नारद पर देख कर फट चटका लगता है। अब कुछ कवितायें भी पढ़ने लगा हूं। </p>
<p><b>आपको चिट्ठाकारी शुरु करते समय कैसा प्रोत्साहन और सहयोग मिला था? </b></p>
<p>बहुत डरते डरते चिट्ठा शुरू किया था कि पता नहीं लोग कैसा रिएक्ट करेंगे। थोड़ी आशंका तो अब भी रहती है मगर अब लगता है कि सब अपने ही हैं, कोई कुछ कह भी देगा तो झेल लेंगे। उस वक्त डर लगता था। जब मैंने चिट्ठाकार समूह में अपने चिट्ठे को शुरु करने की सूचना भेजी तो आपका जवाब आया कि आपने नारद में इसे शामिल कर दिया है, आपने सभी सद्स्यों को भी कहा कि जाकर टिप्पणी करें और उत्साह बढ़ाएं। मैं गद गद। होंसला बढ़ता गया। जब भी तकनीकि समस्या आई, आपने सहयोग किया। टिप्पाणियां अभी भी प्रोत्साहित करती हैं। खासकर जब पुराने और बड़े चिट्ठाकार टिप्पणी करते हैं तो रोमांचित हो जाता हूं। कुछ टिप्पणियां मैं कभी नहीं भूलता, जैसे की:</p>
<p>देवाशीष जी की टिप्पणी <a href="http://aaina2.wordpress.com/2006/11/05/mush/">मूषकर जी का ईंटरव्यू</a> पर:</p>
<blockquote><p><i>Its very finely written, writer is worth appreciating, simplicity of language is the most admirable followed by splendid use of “LAKSHANA” that characterized “GAGAR MEIN SAGAR” . Keep interviewing.</i></p></blockquote>
<p>अनूप जी <a href="http://aaina2.wordpress.com/2006/09/07/telagi/">दिल में वंदेमातरम दिमाग में तेलगी</a> पर</p>
<blockquote><p><i>बढ़िया! दिन पर दिन आप ऐसा लिखते जा रहे हैं कि क्या कहें याद रहता है कि टिप्पणी करनी बाकी है! बधाई!</i></p></blockquote>
<p>समीर <a href="http://aaina2.wordpress.com/2006/08/31/lagerahomunnabhai/">भाई लगे रहो मुन्ना भाई</a> पर</p>
<blockquote><p><i>क्या गजब लिखे हो, भाई. मजा आ गया. बहुत खुब. कहां थे अब तक…?</i></p></blockquote>
<p>आपकी टिप्पणी <a href="http://aaina2.wordpress.com/2007/02/14/gita/">चिट्ठाकार गीता</a> पर</p>
<blockquote><p><i>जगदीश भाई,<br />
आपकी प्रविष्टि इस साल के इन्डीब्लॉगीज के लिए सबसे मुफ़ीद प्रविष्टि थी। आप इस वर्ष की नायाब खोज हो। आपकी मुन्नाभाई सीरीज को पढने के लिए मै अकेला ही नही, सैकड़ो अन्य लोग भी इन्तज़ार करते है।<br />
आप अच्छा लिखते हो, लगातार लिखते रहो। भविष्य को आपसे बहुत उम्मीदें है।</i></p></blockquote>
<p><b>आप किन विषयों पर लिखना पसन्द/झिझकते है? </b></p>
<p>आपको सच बताऊं, जो कुछ भी मैं आईना पर लिखता हूं वह सब मैं लिखना नहीं चाहता। मगर क्या करूं, जो लिखना चाहता हूं वह लिख ही नहीं पाता। बचपन से माता पिता से पाकिस्तान से उजड़ कर आने के किस्से सुने। अभी भी हर तरफ वही भीड़ तंत्र दिखता है। हमने इतिहास से कुछ नहीं सीखा। फिर दिल्ली में चौरासी के दंगे देखे। मौत के डर से फटी आंखें देखीं। कैसे सात दिनों में एक शहर का भुगोल और चरित्र बदल जाता है। हर धर्म  सद्भावना सीखाता है और हर झगड़ा धर्म के नाम पर ही होता है। कल उस महिला को बिलखते देखा समाचारों में, जिसके पांच बच्चे मर गये समझौता एक्सप्रैस में?  चाहता हूं कि सब को बताऊं कि इन राजनीतिबाजों के शिकंजे में न आयें। ये सब धर्म के नाम पर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। मगर कह नहीं पाता। और भी बहुत से दर्द हैं दिल में। लिखना कुछ चाहता हूं, लिख कुछ और देता हूं।</p>
<p>मेरी बेटी जब दो ढाई साल की थी तो चोट लगने से उसके पैर की हड्डी टूट गई। लंबे समय का प्लास्टर लग गया। जो बच्चा एक पल चैन से न बैठता, हिल डुल भी न पाये। ऊपर से दर्द और प्लास्टर की असुविधा।  बच्ची परेशान हो जाती तो गोद में उठा बाहर ले जाता और दिखता, वो देखो फूल, वो देखो चिड़िया। रात होती तो वो देखो चंदा मामा। वो देखो तारे। यही खेल खेलता। बच्ची ठीक हो गयी। खेल भी भूल गयी। मैं नहीं भूला। अभी भी वही खेल जारी है। अब खुद से खेलता हूं। दर्द की बात कर नहीं पाता तो ऊट पटांग लिख देता हूं। वो देखो आईना, वो देखो मुन्नाभाई, वो देखो सरकिट.......। </p>
<p><b>मेरी पसंद</p>
<p>जिंदगी क्या है जानने के लिये<br />
जिंदा रहना बहुत जरूरी है<br />
आज तक कोई भी रहा तो नहीं</p>
<p>सारी वादी उदास बैठी है<br />
मौसमे गुल ने खुदकशी कर ली<br />
किसने बारूद बोया बागों में </p>
<p>आओ हम सब पहन लें आईने<br />
सारे देखेंगे अपना ही चेहरा<br />
सबको सारे हसीं लगेंगे यहां</p>
<p>है नहीं जो  दिखाई देता है<br />
आईने पर छपा हुआ चेहरा<br />
तर्जुमा आईने का ठीक नहीं</p>
<p>हम को गालिब ने ये दुआ दी थी<br />
तुम सलामत रहो हजार बरस<br />
ये बरस तो फकत दिनों में गया</p>
<p>लब तेरे मीर ने भी देखे हैं<br />
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है<br />
बात सुनते तो गालिब हो जाते</p>
<p>ऐसे बिखरे हैं रात दिन जैसे<br />
मोतियों वाला हार टूट गया<br />
तुमने मुझको पिरो के रखा था।</p>
<p>-गुलजार</b></font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मुन्नाभाई अमेरिका में]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/02/11/munnabhaai/</link>
<pubDate>Sun, 11 Feb 2007 18:13:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
<guid>http://aaina2.wordpress.com/2007/02/11/munnabhaai/</guid>
<description><![CDATA[
(नीरज भाई तथा अनूप भाई की फरमाईश पर एक ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"><br />
(<a href="http://neerajdiwan.wordpress.com/">नीरज भाई</a> तथा <a href="http://www.hindini.com/fursatiya/">अनूप भाई</a> की फरमाईश पर एक बार फिर पेश है मुन्ना सरकिट संवाद। जैसा कि आप सब को मालूम होगा कि मुन्नाभाई सिरीज की तीसरी फिल्म 'मुन्नाभाई अमेरिका में' बनने वाली है। आजकल इसकी स्क्रिप्ट पर काम चल रहा है। हमने अपने सूत्रों से इस स्क्रिप्ट की एक ओरिजनल कापी का जुगाड़ कर लिया है- पेश है आपके लिये इसी का एक हिस्सा)</p>
<p>"याहू ! चाहे कोई मुझे जंगली कहे.........!"</p>
<p>"अरे मुन्नाभाई, बड़े खुश लग रहे हॊ, क्या बात है?"</p>
<p>"अरे सरकिट कुछ मत पूछ आज अपुन भोत खुश है"</p>
<p>"क्या बात है भाई? इस बार <a href="http://www.indibloggies.org/">इंडीब्लागीस</a> में तुम्हारा चिट्ठा आ रहा है क्या?"</p>
<p>"अरे उसका तो अभी चुनाव भी शुरु नईं हुआ, अपुन तो खुश हैं कि <a href="http://aaina2.wordpress.com/2007/02/07/yahoo/">याहू ने हिंदी का पोर्टल शुरू कर दिया।</a>"</p>
<p>"पर भाई, अपन सुना कि कोई <a href="http://dhurvirodhi.wordpress.com/">धुरविरोधी साहब</a> बोला कि हिंदी को याहू की क्या जरूरत? वो बोला कि "हिन्दी की वेबसाइटें कम नहीं हैं" और बोला कि "याहू में कौन से फुंदने टंके हैं"</p>
<p>"अरे सरकिट, याहू के पास इंडिया मेंइच ढाई करोड़ खाते हैं, याहू और गुगल जैसी कम्पनियां अगर इतना बड़ा प्लेटफारम हिंदी चिट्ठाकारों को परदान करतीं है तो अपुन लोगों को निरमल आनंद तो होंयेंगाइ ना।  अपन तो खुश हैं कि अब हिंदी जानने वाले और लोग भी हमारे साथ जुड़ेंगे और इंटेरनेट पर हिंदी लिखने और पढ़ने वाले राकेट की माफिक बढ़ेंगे।"</p>
<p>"पर भाई तुम इतना खुश कयेकु हो रिया है।"</p>
<p>"अरे सरकिट तरकश और इंडीब्लागीस की तरह क्या पता याहू भी अच्छे चिट्ठाकार की प्रतियोगिता रख दे और इनाम में हमें अमेरीका की सैर करवा दे । अपुन उदर जाके मिस्टर खुश को गांधीगिरी सिखायेंगा।"</p>
<p>"पर भाई, यह धुरविरोधी क्या नाम हुआ? कुछ भी अच्छा होता है ना भाई, कुछ लोग विरोध करने आ जाते हैं।"</p>
<p>"सुन सरकिट, अपुन के यहां लोकतंतर है और विरोध लोकतंतर का भोत जरूरी हिस्सा है, बिना विरोध के सत्ता निरंकुश हो जाती है।"</p>
<p>"क्या बोला भाई? मिस्टर सत्ताम और मिस्टर खुश में क्या हो जाती है?"</p>
<p>"अरे सरकिट तुम आज सुबह सुबह ही पी लिये हो क्या? अपुन कह रहा है कि सत्ता निरंकुश हो जाती है और तुम सुन रहा है कि मिस्टर सत्ताम और मिस्टर खुश में कुछ हो जाती है।"</p>
<p>"भाई तुम भी तो संसकरित में बात कर रेला है, अपुन तो एक ही सत्ता मालूम है जो ताश का पत्ता होता है - पंजा, छक्का, सत्ता, ये तुम कौन सी सत्ता की बात कर रेला है?</p>
<p>"अरे सरकिट तुम अनजानें में ही बहुत बड़ी बात बोल दिया। आजकल अपुन के यहां यहिच हो रिया है, जो सत्ता दूसरों की मेहरबानी से मिलती है ना  भाई, वो पंजा छक्का सत्ता बन केईच रह जाती है।"</p>
<p>"पर भाई, तुम अपुन को समझाओ कि सत्ता क्या होती है?</p>
<p>"अरे सरकिट, सत्ता का मतलब होता है ताकत, ताकत चाहे आदमी में हो, सरकार में हो या किसी कंपनी में, यदि विरोध न हो तो निरंकुश हो जाती है। "</p>
<p>"भाई फिर यह ताकत मिस्टर खुश, मेरा मतलब है निरंकुश कैसे हो जाती है?"</p>
<p>"जब भी विरोध की ताकत कमजोर हो जाती है, सत्ता निरंकुश हो जाती है जैसे घोड़ा बेलगाम हो जाता है तो किसी भी पार्क या गुलिस्तान को उजाड़ सकता है।"</p>
<p>"क्या बोला भाई इराक और अफ्गानिस्तान को उजाड़ सकता है?"</p>
<p>"इसी लिये तो बापू बोला कि ताकत वाले का विरोध होना चाहिये और जो सबसे कमजोर हो हमें उसके साथ खड़े होना चाहिये, हमेशाईच ! बस इतनी सी बात जाके मिस्टर खुश को समझानी है।"</font></p>
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हिंदी को बचाता याहू या हिंदी बचाती याहू को]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/02/07/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%ac%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a5%82-%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82/</link>
<pubDate>Wed, 07 Feb 2007 17:28:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
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<description><![CDATA[
जिस दिन से हिंदी याहू शुरू हुआ, मेरा हो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='http://aaina2.wordpress.com/files/2007/02/yahoohindi.JPG' alt='yahoohindi.JPG' /></p>
<p><font size="3">जिस दिन से <a href="http://in.hindi.yahoo.com/index.htm">हिंदी याहू</a> शुरू हुआ, मेरा होमपेज बन गया। शुरू से ही साईट पर हिंदी में पढ़ने  को इतना कुछ है कि आप पढ़ते पढ़्ते थक जायें साईट के पन्ने खत्म नहीं होते। हर्ष की बात यह है कि यहां केवल हिंदी के समाचार ही नहीं हैं, खाना खजाना, सेहत, मनोरंजन तथा हिंदी साहित्य का अलग विभाग सृजन संसार भी है। मुख्य रूप से मैं सृजन संसार के बारे में आप सब को बताना चाहता हूं। मगर इससे पहले यह और बता दूं कि जैसा कि जीतू भाई ने भी बताया याहू के नये <a href="http://in.ourcity.yahoo.com/delhi/hindi#nogo">याहू आवर सिटी के पेज</a> पर  हिंदी चिट्ठों की फीड भी दी जा रही है। </p>
<p>याहू हिंदी पर समाचारों के बारे में मैं यही बताना चाहुंगा कि लगता है कि हिंदी में समाचार लगभग उसी गति से आ रहे हैं जिस गति से  इंगलिश समाचार। कल जब <a href="http://in.hindi.yahoo.com/News/International/0702/07/1070207001_1.htm">इस्लामाबाद हवाईअड्डे पर आत्मघाती हमला</a> हुआ तो जब तक यह समाचार एन डी टी वी पर ब्रेक होता उससे पहले ही इस समाचार को मैं याहू हिंदी पर पढ़ चुका था।</p>
<p>जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि याहू हिंदी का जो हिस्सा मुझे सबसे ज्यादा भा रहा है वो है हिंदी साहित्य पर आधारित <a href="http://in.hindi.yahoo.com/Literature/">सृजन संसार</a>। यहां आपको अच्छा और स्तरीय साहित्य मिलेगा जिसमें हैं कहानियां, खासकर लघु कथाएं, कवितायें, पूस्तक समीक्षा तथा अत्मकथात्मक अपना लेखन। मगर कई जगहों पर लेखकों का नाम न देख कर आश्चर्य होता है। </p>
<p><a href="http://in.hindi.yahoo.com/Literature/Autobiographies/">अपना लेखन</a> में मुझे मेरी मनपसंद लेखिका अमृता प्रीतम की आत्मकथा <a href="http://in.hindi.yahoo.com/Literature/Autobiographies/0610/18/1061018071_1.htm">रसीदी टिकट का एक हिस्सा</a> मिल गया, इसका एक अंश आपके लिये यहां प्रस्तुत है:</p>
<p><strong><em>घर में पिताजी के सिवाय कोई नहीं था- वे भी लेखक जो सारी रात जागते थे, लिखते थे और सारे दिन सोते थे। माँ जीवित होतीं तो शायद सोलहवाँ साल और तरह से आता- परिचितों की तरह, सहेलियों की तरह। पर माँ की गैर हाजिरी के कारण जिंदगी में से बहुत कुछ गैर हाजिरी हो गया था। आसपास के अच्छे-बुरे प्रभावों से बचाने के लिए पिता को इसमें ही सुरक्षा समझ में आई थी कि मेरा कोई परिचित न हो, न स्कूल की कोई लड़की, न पड़ोस का कोई लड़का।</p>
<p>सोलहवाँ बरस भी इसी गिनती में शामिल था और मेरा ख्याल है, इसीलिए वह सीधी तरह का घर का दरवाजा खटखटाकर नहीं आया था, चोरों की तरह आया था।</strong></em></p>
<p>आगे देखिये</p>
<p><strong><em>कहते हैं ऋषियों की समाधि भंग करने के लिए जो अप्सराएँ आती थीं, उनमें राजा इंद्र की साजिश होती थी। मेरा सोलहवाँ साल भी अवश्य ही ईश्वर की साजिश रहा होगा, क्योंकि इसने मेरे बचपन की समाधि तोड़ दी थी। मैं कविताएँ लिखने लगी थी और हर कविता मुझे वर्जित इच्छा की तरह लगती थी। किसी ऋषि की समाधि टूट जाए तो भटकने का शाप उसके पीछे पड़ जाता है- 'सोचों' का शाप मेरे पीछे पड़ गया...</strong></em></p>
<p> इसी प्रकार मिला गुलजार साहब की पुस्तक रावीपार से उनका <a href="http://in.hindi.yahoo.com/Literature/Autobiographies/0610/18/1061018073_1.htm">आत्मकथात्मक अंश</a> जहां गुलजार साहब अपने लेखन के बारे में बता रहे हैं। आप भी देखिये:</p>
<p><strong><em>कभी नज्म कहके खून थूक लिया और कभी अफसाना लिखकर जख्म पर पट्टी बाँध ली। मगर एक बात है, नज्म हो या अफसाना, उनसे इलाज नहीं होता। वह आह भी है, चीख भी, दुहाई भी। मगर इंसानी दर्दों का इलाज नहीं है। वह सिर्फ इन्सानी दर्दों को ममिया के रख देते हैं, ताकि आने वाली सदियों के लिए सनद रहे।</strong></em></p>
<p>इसके अलावा कई कवितायें भी हैं। यूं तो कविताओं में अपना हाथ कुछ तंग ही है मगर पढ़ कर समझने की कोशिश जरूर करता हूं। एक कविता मिली <em><strong><a href="http://in.hindi.yahoo.com/Literature/Poems/0612/15/1061215023_1.htm">बिटिया मुर्मू के लिए कविता</a></strong></em> लेखक का नाम नहीं है पर कविता अच्छी लगी:</p>
<p><img src='http://aaina2.wordpress.com/files/2007/02/img1061215023_1_1.jpg' alt='img1061215023_1_1.jpg' /></p>
<p><a href="http://in.hindi.yahoo.com/Literature/Poems/0612/15/1061215023_1.htm">बिटिया मुर्मू के लिए कविता</a></strong></em></p>
<p><strong><em>उठो कि अपने अँधेरे के खिलाफ उठो<br />
उठो अपने पीछे चल रही साजिश के खिलाफ</p>
<p>उठो कि तुम जहाँ हो वहाँ से उठो<br />
जैसे तूफान से बवंडर उठता है<br />
उठती है जैसी राख में दबी चिंगारी<br />
देखो! अपनी बस्ती के सीमान्त पर<br />
जहाँ धराशायी हो रहे हैं पेड़<br />
कुल्हाड़ियों के सामने असहाय<br />
रोज नंगी होती बस्तियाँ<br />
एक रोज माँगेगी तुमसे तुम्हारी खामोशी का जवाब</p>
<p>सोचो-<br />
तुम्हारे पसीने से पुष्ट हुए दाने एक दिन लौटते हैं<br />
तुम्हारा मुँह चिढ़ाते तुम्हारी ही बस्ती की दुकानों पर<br />
कैसा लगता है तुम्हें<br />
जब तुम्हारी ही चीजें तुम्हारी पहुँच से दूर होती दिखती हैं....</strong></em></p>
<p>इबे डॉट कॉम, टाईम्सजॉब डॉट कॉम, ईंडियाप्रॉपर्टीस डॉट कॉम तथा अन्य कई साईटों एवम उत्पादों के विज्ञापनों के बीच याहू की साईट पर इस तरह का हिंदी साहित्य देख एक आनंद मिश्रित आश्चर्य होता है। </p>
<p>राजेश जोशी जी की एक कविता <a href="http://in.hindi.yahoo.com/Literature/Poems/0611/17/1061117047_1.htm">बचाना</a> भी  है यहां:</p>
<p><strong><em><a href="http://in.hindi.yahoo.com/Literature/Poems/0611/17/1061117047_1.htm">बचाना</a></p>
<p>एक औरत हथेलियों की ओट में<br />
दिए की काँपती लौ को बुझाने से बचा रही है</p>
<p>एक बहुत बूढ़ी औरत कमजोर आवाज में गुनगुनाते हुए<br />
अपनी छोटी बहू को अपनी माँ से सुना गीत<br />
सुना रही है</p>
<p>एक बच्चा पानी में गिरे पड़े चींटे को<br />
एक हरी पत्ती पर उठाने की कोशिश कर रहा है<br />
एक आदमी एलबम में अपने परिजनों के फोटो लगाते हुए<br />
अपने बेटे को उसके दादा दादी और नाना नानी के<br />
किस्से सुना रहा है।</strong></em></p>
<p>अब इसका निश्चय तो आप ही कीजिये कि यहां याहू बचा रहा है हिंदी को या हिंदी बचा रही है याहू 