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	<title>बिंब-प्रतिबिंब &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/बिंब-प्रतिबिंब/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "बिंब-प्रतिबिंब"</description>
	<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 13:31:22 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[वादे करने और भूलने का सिलसिला ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/15/vade-karne-aur-bhoolne-ka-silsila/</link>
<pubDate>Sat, 15 Dec 2007 17:12:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[पूरे करने होते काम तो
वादे किए ही क्यो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पूरे करने होते काम तो<br />
वादे किए ही क्यों जाते<br />
खाने के लिए कसम होतीं हैं<br />
कोई रिश्ते निभाए नहीं जाते<br />
एक दिन हाथ जोड़कर<br />
मिल जाता है बरसों के लिए सिंहासन<br />
इसलिए वादे कर भी<br />
कभी काम नहीं किए जाते<br />
चार दिन पैदल चलकर<br />
कई बरस हो जाता है महल में बसेरा<br />
फ़िर क्यों दें लोगों के घर का फेरा<br />
जिनसे वादे किए नहीं<br />
उन्हें ही साथ लिया जाता है<br />
जिनसे किए उन्हें भूल जाते<br />
कमाल का है हमारा देश<br />
याददाश्त कमजोर होती है आदमी की<br />
पर यहाँ तो उसे भी नहीं पाते<br />
बरसों के वादे करने और भूलने का<br />
 अंतहीन सिलसिला कहीं थमते नहीं पाते</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मरी  संवेदना का व्यापार जारी है]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/14/mari-sanvedna-ka-vyapar-jari-hai/</link>
<pubDate>Fri, 14 Dec 2007 16:29:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/14/mari-sanvedna-ka-vyapar-jari-hai/</guid>
<description><![CDATA[संवेदना मर गयी है
फिर भी उसका  व्यापार
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>संवेदना मर गयी है<br />
फिर भी उसका  व्यापार<br />
अब भी जारी है<br />
फर्क बस यही आ गया कि<br />
पहले जिन्दों की गरीबी<br />
हटाने की कसम खाकर<br />
होते थे बाजार में सौदे<br />
अब उजाड़कर लोगों के घरोंदे<br />
छोड़ देते मरने के लिए<br />
फिर उनके ग़मों को बेचते हैं<br />
संवेदना से शून्य समाज<br />
बिना आँख खोले<br />
अपने कानों को बंद कर<br />
दिमागी कसरत से बचते लोग<br />
झुंड में  चले जा रहे हैं<br />
अपने को बेचने के लिए<br />
भ्रम यह पाले कि हम<br />
कुछ खरीदने जा रहे हैं<br />
इस तरह जीवंत नहीं<br />
मरी हुई संवेदना का व्यापार जारी है  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इससे तो अकेले में गीत गुनगुनाएं ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/13/isase-akele-men-geet-gungunaaen/</link>
<pubDate>Thu, 13 Dec 2007 15:51:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/13/isase-akele-men-geet-gungunaaen/</guid>
<description><![CDATA[जब पास थे तो ऐसा लगता कि
बस हमेशा के लिए]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जब पास थे तो ऐसा लगता कि<br />
बस हमेशा के लिए साथ  हैं<br />
और कभी अलग नहीं होंगे<br />
जब दूर चले गए तो ऐसा लगता है कि<br />
कोई हवा का झोंका था तो<br />
जो हमारे पास से गुजर गया<br />
हम उसे गलतफहमी में<br />
अपना समझते होंगे</p>
<p>वादों के तूफानों में कई बार<br />
उन्होने हमें उडाया होगा<br />
अपने लिए सामानों का समंदर<br />
हमसे लेकर जुटाया होगा<br />
हम तो समझते थे दिल का रिश्ता<br />
क्या पता था कि वह दिल के नहीं<br />
हमारी चीजों के कद्रदान होंगे<br />
हमें कितने सपने दिखाते थे<br />
ख़्वाबों के अंबार जुटाते थे<br />
क्या पता था वह हमें<br />
फुर्सत का सामान समझते होंगे<br />
--------------------</p>
<p>दिल का दर्द किसे सुनाएँ<br />
कान से सुनते हैं सब<br />
पर दिल के बहरे नजर आयें<br />
जो बोलते हैं जुबान से<br />
पर हमदर्दी के अल्फाज<br />
बोलने की बजाय गूंगे हो जाएं<br />
आंखों से देखते हैं पर<br />
किसी की तकलीफ देखने से<br />
अपने का अंधा  बनायें<br />
इससे अच्छा है अपने दर्द<br />
को अकेले में चिल्ला कर<br />
खुद को ही सुनाएं<br />
 नहीं तो कोई गीत गुनगुनाएं<br />
------------------- </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कल है पुरुष दिवस ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/18/%e0%a4%95%e0%a4%b2-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%b7-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%b8/</link>
<pubDate>Sun, 18 Nov 2007 09:39:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[कल अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाया ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कल अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाया जायेगा। यह अपने आप में अजीब बात लगती है क्योंकि अभी तक तो पुरुष को एक शोषक माना जाता है। अगर हम सभी धर्मों की मान्यताओं को देखें तो सभी सर्वशक्तिमान को पुरुष ही मानते हैं। हालांकि हमारे देश में भगवान के अवतारों और देवताओं के साथ उनकी धर्मपत्नियों की भी मान्यता है पर  उसकी सीमा साकार और सगुण भक्ति तक है जहाँ निर्गुण और निराकार भक्ति की बात आती है तो परब्रह्म की साधना में पुरुषत्व की अनुभूति होती है।  जहाँ तक मान्यताओं का प्रश्न है तो जितने भी मनीषी हुए हैं उन्होने मनुष्य को एक समाज मानते हुए अपने विचार व्यक्त किये हैं हालांकि वह सब पुरुष हैं। जब भी हम अपने आध्यात्म और ग्रंथों से उद्धरण लेते हैं तो उसमें पुरुषो का ही नाम आता है। अगर कुछ लोग कहते हैं कि सारी दुनिया की  सामाजिक मान्यताएं पुरुष की बनाईं हुईं हैं तो गलत नहीं है। </p>
<p>अब जब यह दिवस मनाया जा रहा है तो पुरुषों के लिए वह समय आ गया है जब वह खुलकर अपना दर्द कहे। आखिर पुरुष भी कम पीड़ित नहीं है। उसकी पीडा यही है कि पुराने पुरुषों ने अपनी सता बनाए रखने  के लिए जो मान्यताएं बनाईं वही उसके लिए समस्या बन गयी हैं। जो जाल उसने स्त्री को बन्धन में रखने के लिए बनाए उसमें वह आज का पुरुष ही फंसा है। स्त्री घर की चौखट के बाहर भी उसके नाम के बन्धन में रहे इसके लिए उसने नियम बनाए और उसे निरंतर बनाये रखने के लिए संघर्ष करता रहा, पर घर के अन्दर उसकी सता इतनी नहीं रही जितना समझा जाता है।  अगर वह गृहस्वामी बना तो स्त्री उसकी  गृहस्वामिनी। घर पुरुष के नाम पर चला स्त्री के हाथ और दिमाग के सहारे। वह निर्णायक दिखता है पर उसके निर्णय के पीछे एक स्त्री भी होती है क्या यह सच हम नहीं जानते। पत्नी के बिना या उसकी  असहमति से कोई निर्णय लेने का कितना सोच पाते हैं और लेते हैं तो उस पर कितना  अमल कर  पाते हैं-यह विचारणीय प्रश्न है। घर के सदस्य उसके अधीन माने जाते हैं पर उसके कहने पर कितना चलते हैं बताने की जरूरत नहीं पुर कुछ हो जाये तो कहा जाता है कि उसका अपने परिवार पर नियंत्रण नहीं है। </p>
<p>वैसे समाज को अलग बांटकर उस पर विचार हमारा आध्यात्म नहीं करता। यह पश्चिमी विचारधारा है पर हम जब उस पर चल ही रहे हैं तो 'पुरुष  दिवस' पर यह तो सोचना ही चाहिए कि  अपना साम्राज्य कायम करने के लिए जो प्रयास विद्वान पुरुषों ने किये उसका परिणाम कोई उसकी नस्ल के लिए भी कोई अच्छा नहीं रहा यह बताने का वक्त आ गया है। माना जाता है कि पुरुष सक्षम है पर कितना?स्त्री से कहा जाता है कि अपने पति  को भगवान  जैसा समझना पर क्या वह उतना सक्षम कभी रहता  है?"</p>
<p>आंकडे बताते हैं कि अधिकतर मामलों में पति पहले इस धरती से विदा होता है और पत्नी बाद में।  वजह कहा जाता है कि उस पर तनाव अधिक रहता है-घर का और बाहर का। क्या यह  स्त्री पर अपना साम्राज्य बनाए रखने से उपजता है? क्या पुरुष अपने घर के तनाव छिपाता नहीं है क्योंकि उससे उसकी समाज में हेठी होती है? क्या पुरुष होने से कई ऐसे तनाव नहीं सामने आते जिनका सामना स्त्री को नहीं करना पड़ता।  हर संघर्ष पर उसका नाम होता है और जीत मिले तू उसकी जय-जय और हार जाये तो उसको ही हाय-हाय झेलने पड़ती है। इन सब पर विचार करने का कल वक्त है। निकला अपने अन्दर फैला तनाव। ऐसा दिन है जब महिलायें भी कोई आपति नहीं करेंगी।  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लोग लेखक और लेखक ब्लोगर ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/16/%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%95-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%95-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Fri, 16 Nov 2007 16:42:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[ब्लोगरों के वर्गीकरण को लेकर अक्सर सव]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ब्लोगरों के वर्गीकरण को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं. इसका वैसे कोई आधिकारिक वर्गीकरण नहीं हुआ है, पर निरंतर चिट्ठों का अध्ययन करते हुए मैं इस निष्कर्ष पर पहुचा हूँ कि इसके  दो वर्गीकरण हैं. -१. ब्लोग लेखक २.लेखक ब्लोग (writer cum blogar)</p>
<p>१.ब्लोग लेखक-इससे आशय यह है कि जिन लोगों ने कंप्यूटर के साथ इंटरनेट कनेक्शन लिया है और कुछ रचना कर्म के साथ संबध बढाने और उसे  निभाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. उन्होने ब्लोग बना लिया है इसलिए लिख रहे हैं और लिखने की विधा में पारंगत भी हो रहे हैं.<br />
२. लेखक (ब्लोग)- यह ऐसे लोग हैं जो कहीं भी लिखने के लिए प्रतिबद्ध हैं. उन्हें अपने लिखने से मतलब है और ऐसे लोग को मित्र मिल जाये तो उनके लिए बोनस की तरह होता है. लिखना उनके लिए नशा है. वह पत्र-पत्रिकाओं में लिखते हैं और ब्लोग इसलिए बनाया है क्योंकि उस पर लिखना है. मैंने ब्लोग इसलिए बनाया क्योंकि मैं लिखना चाहता था, पर इसमें इतने सारे मित्र मिलेंगे यह सोचा नहीं था. मैं अनेक पत्र-पत्रिकाओं में छप चुका हूँ पर इस ब्लोग विधा ने मुझे ब्लोगर बना दिया.  </p>
<p>वैसे दिलचस्प बात यह है कि ब्लोग बनाने वालों ने इन्हें संदेशों के आदान-प्रदान करने के लिए बनाया था, पर जैसा कि हमारे भारत के लोग हैं कि विदेश से अविष्कृत चीज को अपने हिसाब से इस्तेमाल करते हैं. वैसा ही कुछ लेखक  इसे अपने लिखने के लिए इस्तेमाल करते हैं. इसमें कोई शक नहीं है कि इधर कुछ गजब के लोग ब्लोग लिख रहे हैं. वैसे ब्लोग मैं पिछले डेढ़ वर्षों से देख रहा हूँ और मेरा मानना है कि इसमें बहुत अच्छे लेखक  आ गए हैं. मैं जब अभिव्यक्ति पत्रिका पढता था तब यह उस पर लिंकित  नारद चौपाल के   ब्लोग भी देखता था और उस समय मुझे इनकी विषय सामग्री इतनी प्रभावित नहीं करती थी-क्योंकि इसमें साहित्य जैसी विषय वस्तु अधिक नहीं दिखती थी-इसलिए कोई ऐसा विचार नहीं आता था.  वह तो एक दिन एक ऐसे ब्लोग पर नजर पड़ गयी और उसमें एक संवेदनशील विषय पर लिखी पोस्ट ने मुझे प्रभावित किया और तब मुझे लगा कि यह तो अपनी पत्रिका की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है. </p>
<p>इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह एक रोचक विषय है. इसमें कई मित्र मिलना मेरे जैसे लेखक के लिए बोनस है. जो इस पर कमेन्ट देते हैं और या मैं जिन्हें देता हूँ उनके लिए मेरे मन में मैत्री भाव रहता है. इसका मतलब यह नहीं है कि सभी लोग हर पोस्ट कमेन्ट दें  या मैं उन्हें दूं- क्योंकि इन फोरम पर कोई हमेशा बना नही रहता. लिखना एक तरह से आपस में मैत्री भाव बढाने का तरीका है. अधिकतर कमेन्ट विभिन्न फोरमों से आती है क्योंकि ब्लोगर कमेन्ट लगाना जानते हैं. आप ताज्जुब करेंगे कि  मेरे निजी मित्र जो मेरे ब्लोग पढ़ते हैं उन्हें अभी तक यह समझ में नहीं आया कि कमेन्ट कैसे देते हैं? मैं उनको कमेन्ट देने के लिए अधिक प्रेरित भी नहीं करता. मेरी पोस्ट पर कमेन्ट देने वाले अनेक ब्लोगरों को उनको नाम याद हैं. अभी मैंने एक अपने मित्र को गूगल का इंडिक ट्रांसलेट टूल इस्तेमाल करना बताया तो वह हैरान हो गया. अभी इस  विधा के बारे अधिक लोगों को पता नहीं है और जैसे-जैसे इसका प्रचार बढेगा अधिक से अधिक लेखक इसमें आयेंगे. </p>
<p>इन ब्लोग के साथ अभी समस्या यह है कि लंबी चौडी पोस्ट लिखने का समय नहीं आया, पर आगे चलकर यह समय भी आयेगा पर वह तभी संभव हो सकता है कि लेखक को यकीन हो जाये कि उसे पढ़ने वाले बहुत हैं. मुझे ब्लोग बनाये हुए एक वर्ष हो गया पर फोरम पर आये आठ महीने हुए हैं. यह आश्चर्य की बात है कि जिन पोस्टों को फोरम पर दस लोग भी नहीं पड़ते वह महीनों तक अन्य पाठकों  द्वारा पढी जातीं हैं. चाणक्य, कौटिल्य, रहीम और कबीर से संबंधित विषय सामग्री पर निरंतर पाठक आते हैं. लोगों की दिलचस्पी को देखते मुझे इन पर लिखने में मजा आता है क्योंकि इससे मुझे 'स्वाध्याय''का अवसर मिलता है-जो कि किसी लेखक के लिए एक अनिवार्य बौद्धिक व्यायाम है. </p>
<p>लेखक  स्वांत सुखाय भाव के होते हैं पर इसका मतलब यह नहीं होता की उनका समाज से सरोकार नहीं होता. देखा जाये तो असली लेखक वही है जो सामाजिक सरोकारों से संबंधित विषयों पर लिखे. ब्लोग की विधा को ऐसे लोग बहुत लंबे समय तक जिंदा रख सकते हैं, पर अभी यह तय नहीं है इसका आगे क्या स्वरूप होगा-यह आने वाले समय पता लग जायेगा. इतना तय है कि प्रतिदिन तीन सौ से अधिक पाठक मेरे ब्लोग पर आते हैं उससे यह लगता है इसमें लोगों की दिलचस्पी बढ़ रही है.   </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[यारी को  बेगार बना दिया]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/13/%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Tue, 13 Nov 2007 15:40:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[बंद तिजोरियों को सोने और रुपयों की
चमक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बंद तिजोरियों को सोने और रुपयों की<br />
चमक तो मिलती जा रही है<br />
पर धरती की हरियाली<br />
मिटती जा रही है<br />
अंधेरी तिजोरी को चमकाते हुए<br />
इंसान को अंधा बना दिया है<br />
प्यार को व्यापार<br />
और यारी को बेगार बना दिया है<br />
हर रिश्ते की कीमत<br />
पैसे में आंकी जा रही है<br />
अंधे होकर पकडा है पत्थर<br />
उसे हाथी बता रहे हैं<br />
गरीब को बदनसीब और<br />
और छोटे को अजीब बता रहे हैं<br />
दौलत से ऐसी दोस्ती कर ली है की<br />
इस बात की परवाह नहीं कि<br />
इंसान के बीच दुश्मनी बढ़ती जा रही है<br />
--------------------------------</p>
<p>यहाँ बोलने के लिए सब हैं आतुर<br />
अपने बारे में सच सुनने से भयातुर<br />
चारों और बोले जा रहे शब्द<br />
बस बोलने के लिए<br />
सुनता कोई नजर नहीं आता<br />
अपनी भक्ति के गीत हर कोई गाता<br />
जिन्दगी जीने का तरीका कोई नहीं जानता<br />
सिखाता दूसरे को गुर<br />
सूरज उगने के बाद उठते<br />
और बोलना शुरू करें ऐसे जैसे दादुर (मेंढक)<br />
सुबह से शाम तक लोग ढूढ़ते श्रोता<br />
सच सुनने से रहते भयातुर</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शब्द का भी होता है नकाब ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/12/%e0%a4%b6%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%ac/</link>
<pubDate>Mon, 12 Nov 2007 15:15:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[अपने चरित्र पर लगे काले दागों से
जो लो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अपने चरित्र पर लगे काले दागों से<br />
जो लोग घबडाते हैं<br />
वही अपना सच छुपाने के लिए<br />
शब्दों का नकाब लगाते हैं<br />
यूं तो शब्द सौन्दर्य की रचना<br />
उनके लिए खेल होता है<br />
पर उनके अर्थों में ढूंढो तो<br />
खोखले भाव सहजता से<br />
सामने आते हैं<br />
शब्दों के नकाब में उनके सच को<br />
पकड़ने के लिए दिल की नहीं<br />
होती है दिमाग की जरूरत<br />
क्योंकि उनके शब्द भावना से नहीं<br />
निज स्वार्थ के लिए रचे जाते हैं<br />
------------------------<br />
किसी के ख्यालों में खो जाना<br />
किसी के वादों में बहकना<br />
किसी के इरादों के साथ बह जाना<br />
क्या कहलाता है प्यार<br />
जिसमें कुछ पल का भटकने की<br />
सजा भी मिल सकती है<br />
जिन्दगी में हर कदम पर बारंबार<br />
कोई एक पहचान खोये<br />
दूसरा उस पर थोपे अपना नाम<br />
बराबरी की शर्त पूरी<br />
नहीं करता ऐसा प्यार<br />
एक खेलता है<br />
दूसरा देखता है<br />
वासना में लिपटा बदन मचले<br />
कहलाता नहीं प्यार<br />
दिल में भोगने की चाहत पूरी करना<br />
जिस्म में जलती आग बुझाना तो<br />
सभी चाहते हैं<br />
पर त्याग और यकीन पर खरे उतरें<br />
कुछ पाने की चाह न हो<br />
तभी कहलाता है प्यार<br />
----------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इस ब्लोग की पाठक संख्या १० हजार हुई ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/10/%e0%a4%87%e0%a4%b8-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a0%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%96%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a5%a7%e0%a5%a6/</link>
<pubDate>Sat, 10 Nov 2007 10:41:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[दीपकबापू कहिन के बाद मेरा यह दूसरा ब्ल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>दीपकबापू कहिन के बाद मेरा यह दूसरा ब्लोग है जिसने पाठक/व्युज की संख्या दस हजार पर कर ली. अंतर्जाल पर जब मैंने  लिखना शुरू किया था तब मुझे इतना समर्थन मिलने की आशा नहीं थी  पर यह हिन्दी प्रेमी ब्लोग लेखकों और पाठकों ने जो सहयोग दिया उसके लिए मैं उनका आभारी हूँ. </p>
<p>जहाँ दीपक बापू कहिन को आरंभ करते समय ब्लोग के बारे में कुछ नहीं जानता  वहीं इसको इस आशा से शुरू किया कि इस पर  मैं केवल व्यंग्य रचनाओं को प्रस्तुत करूंगा. हालांकि बाद में हर विधा के लिए इसका प्रयोग किया. इस ब्लोग को मैंने इसलिए बनाया कि मुझे दीपक बापू कहिन के बाद इस पर रचनाएं पोस्ट करनी थी. उस समय न यह पता था कि आगे मुझे कुछ फोरम पर जाना है और न यह पता था कि और लोग मेरे ब्लोग को अपने यहाँ दिखाएँगे. बीच में मैंने  ब्लागस्पाट के ब्लोग नारद पर पंजीकृत कराने किए लिए वर्ड प्रेस के इस ब्लोग को हटा लिया था पर इसे कुछ प्रशंसक अलग ही थे, जो इसे अपने यहाँ लिंक किये रहे. मजे की बात  यह रही कि ब्लोग्वानी, चिट्ठाजगत और हिन्दी ब्लोग काम मेरे कराये बिना ही इसका पंजीकरण हो गया था और यह बात मुझे बाद में पता चली. </p>
<p>          इस ब्लोग पर श्री  शास्त्री जे.सी.फिलिप की सबसे अधिक कृपा दृष्टि रही है और साथ ही   परमजीत बाली, ममता श्रीवास्तव, रविन्द्र प्रभात, उन्मुक्त जी, रवि रतलामी जी   तथा संजय बेंगानी के साथ-साथ अन्य अनेक ब्लोग लेखकों और पाठकों का इस पर सहयोग और समर्थन मिला.  मैं इसकी सूचना आत्मप्रवंचना के लिए नहीं दे रहा बल्कि सभी को यह बताने के लिए दे रहा हूँ कि ब्लोग लेखन इस देश में आन्दोलन बनेगा. इस समय देश के बुद्धिजीवी वर्ग में हताशा का माहौल है. अभी तक वह विभिन्न विचारधाराओं में नहाकर मन को शांत कर लेते थे. अब छद्म विचार पर्वतों से  कृत्रिम सिद्धांतों की वैतरिणी में बहती इन  विचारधाराओं कि असलियत खुल गयी है और अब सब प्रकार के बुद्धिजीवी  हताश हैं. उन्हें लगता था कि उनको  विचारधारा पर चलने के लिए प्रेरित करने वाले लोग जब अपना काम निकाल लेते हैं उन फिर उन्हें पूछते नहीं है. इतना ही नहीं उनका काम उस विचारधारा के विपरीत होता है जिसको वह अपनी पूजा मानते हैं. </p>
<p>                        अपनी बात कहने और लिखने के लिए ब्लोग एक सबसे अच्छा जरिया है और आगे वही बुद्धिजीवी होने का गौरव पाएंगे जिनके पास अपना एक ब्लोग होगा. इसमें समय लगा सकता था क्योंकि लोग अभी इस बारे में अधिक नहीं जानते और जब जानेंगे तो फिर इस पर लिखे बिना उनका मन नहीं भरेगा. मेरी इच्छा है कि लोग अधिक से अधिक इस विधा से जुड़ें. मैं पुन: आभारी हूँ उन लोगों का जिन्होंने इस ब्लोग को अपना सतत समर्थन  दिया.  </p>
<p><strong>दीपक बापू कहिन की पाठक संख्या दस हजार तक पहुचने पर लिखे गए लेख की  पुन: प्रस्तुति </strong></p>
<p>आज दीपकबापू कहिन ने १० हजार पाठकों का आंकडा पार कर लिया है. मेरे द्वारा बनाया जब यह ब्लोग बनाया गया था तब मुझे यह मालुम भी नहीं था की मैं बना क्या रहा हूँ?कमेन्ट क्या होती हैं. इसका पता इतना लंबा है तो केवल इसीलिए के जब उसे लिख रहा तो इस  बात का ज्ञान भी नहीं था कि इसे हमेशा  लिखना होगा. इसे कोई अन्य कैसे पढेगा इसका ज्ञान भी नहीं था. यू.टी.ऍफ़-८ ई फाइल में देव-१० फॉण्ट में लिखता था. हिन्दी श्रेणी भी नही रखा पाया था इसलिए डैशबोर्ड पर भी नहीं दिखता था. </p>
<p>                                 उस समय हमारे मित्र उन्मुक्त जी ने इसे देखा और बताया कि वह इसे पढ़ नहीं पा रहे थे. मुझे हंसी आयी. सोचा कोई होगा जो मुझे परेशान कर रहा है याह खुद कुछ जानता नहीं है और मुझे सीखा रहा है.  उसी समय ब्लागस्पाट का एक ब्लोग भी बनाया था जिसे आज दीपक भारतदीप का चिंतन नाम से जाना जाता है. उसमें इस तरह अपनी घुसपैठ कर ली थी कि वह तो सादा हिन्दी फॉण्ट में भी काम करने लगा था. </p>
<p>        उन्मुक्त जी ने दोनों की कापी  मेरे पास भेज दी तो मैं दंग रह गया. उनकी दशा  देखकर मुझे हैरानी हो रही थी. शहर के अन्य कंप्यूटरों पर देखा तो मुझे सही दिखाए दे रहे थे. ब्लोग बनने से जितना खुश था उतना ही अब परेशान हो रहा था. इसी परेशानी में गूगल का हिन्दी फॉण्ट मेरे हाथ आया. कैसे? यह मुझे याद नहीं. उसीसे लिखना शुरू किया और लिखता चला गया. हर नये  प्रयोग के लिए नया ब्लोग खोलता था. एक नहीं आठ ब्लोग खोल लिए. इसी बीच नारद पर पंजीकरण का प्रयास किया, पर पंजीकरण करना आये तब तो हो. मेरे प्रयासों के उनको गुस्सा आया और बिन करने की धमकी दे डाली. आज जब काम करता हूँ और जो ब्लोग लिखने कि पूरी प्रकिया है उसे देखकर तो उनका गुस्सा सही लगता है. इसके बाद  मैं चुप हो गया और लिखने लगा. तब एक दिन सर्व श्री सागर चंद नाहर, उन्मुक्त जी   संजय  बैगानी और  पंकज  बैगानी जी की  कमेन्ट आयी कि आप तो बहुत लिख चुके हैं पर नारद पर आपका ब्लोग नहीं दिख रहा है आप पंजीकृत कराईये.  </p>
<p>               मैं उस समय सब करने को तैयार था सिवाय नारद पर पंजीकरण कराने के. क्योंकि अब कोई गलती वहाँ से मेरे को बिन करा सकती थी.  मैं सिर पकड़ कर बैठ गया कि अब इस नारद से कैसे सुलझें. बहरहाल उसे दिन भाग्य था और पंजीकरण कैसे हो गया यह अब मुझे भी याद नहीं है. उसके बाद  मेरा ब्लोग मैदान में आ गया. धीरे-धीर  समझ में आने लगा कि वह सब लोग मेरे को अपने साथ जोड़ने के लिए इतनी मेहनत कर रहे थे. उन्मुक्त जी के प्रयास तो बहुत प्रशंसनीय हैं. मैं इन सब लोगों का आभारी हूँ. </p>
<p>                     अंतर्जाल लिख्नते समय मेरे पास कोई योजना नहीं थी. मेरे एक लेखक मित्र ने मुझे अभिव्यक्ति  (अंतर्जाल की पत्रिका)  का पता दिया था. वहाँ मुझे नारद दिखता था पर मैं उसे नहीं देखता था और  जब देखा तो भी मुझे उसमें रूचि नही जागी-इसका कारण यह भी था कि उसमें मुझे उस समय साहित्य जैसे विषय पर कुछ  लिखा गया नहीं लगा. एक बार मेरी नजर ब्लागस्पाट पर एक हिन्दी ब्लोग पर पढ़ गई. मैंने उसे पढा  तो आश्चर्य हुआ. उस  विषय में मेरी दिलचस्पी बहुत थी और उस लेखक ने जो लिखा उससे मैं बहुत  प्रभावित हुआ. उसने मुझे भी उसी तरह लिखने की प्रेरणा दी. अभिव्यक्ति को तो मैं अपनी रचनाएं भेज रहा था पर उस ब्लोग को मैं आज तक नहीं भूल पाया. उसकी विषय सामग्री मेरे दिमाग में आज तक है. मुझे उस लेखक का नाम याद नहीं है. मुझे उस समय अनुभव नहीं था उसके नीचे कमेंट देखता तो शायद कुछ याद रहता-उस समय  कमेंट लगाने की बात तो मैं सोच भी नहीं सकता.  हाँ, ऐसा लगता है कि उस ब्लोग  अपनी इन चारों  फोरम पर होना चाहिए. फुरसत में मैं इन फोरम पर उसका ब्लोग तलाशता हूँ. उसके बारे में कोई संकेत इसलिए नहीं दे सकता क्योंकि वह उस समय एक विवादास्पद  विषय पर लिखा गया था पर उसकी स्पष्टवादिता ने मेरे मन को खुश कर दिया था. तब मुझे लगा कि इस  ब्लोग विधा को मैं अपने सृजन को लोगों तक पहुचा  सकता हूँ. उस ब्लोग लेखक ने जो व्यंग्य लिखा था वह कोई समाचार पत्र या पत्रिका शायद ही छापने का साहस कर सके और मुझे लगा कि यह विधा आगे आम आदमी को आपनी बात कहने के लिए बहुत योगदान  देने वाली है. मैं उस अज्ञात ब्लोग लेखक को कभी नहीं भूल सकता. </p>
<p>                             श्रीश शर्मा -(ईसवामी) का नाम यहाँ लेना जरूरी है इसलिए  लिख रहा हूँ. वह मेरे मित्र हैं और उनकी कोई सलाह मेरे काम नहीं आती या मैं उनके अनुसार चल नहीं पाता  यह अलग बात है पर उस अज्ञात ब्लोग लेखक के बाद उनका नंबर भी याद रखने लायक है. जब मैंने अभिव्यक्ति पर नारद खोला तो उनका ब्लोग देखा(यह भी हो सकता है कोई उनका लेख हो) जिसमें उनका कंप्यूटर पर काम करते हुए फोटो था. मैं उस फोटो को देखने से  पहले ब्लोग  लिखने का फैसला कर चुका था और वहाँ  इसलिए गया था कि आगे कैसे बढूँ. उनका लिखा मेरे समझ में नहीं आया पर तय कर चुका था कि इस राह पर चलना ही है और मैं यह नहीं जानता था कि उनसे मेरी मित्रता होने वाली  है-उन्होने अभी मुझे गूगल ट्रांसलेटर टूल का पता  भेजा और मैं कह सकता हूँ कि उनकी यह पहली सलाह है जो काम आ रही है इससे पहले उनका बताया काम तो नहीं आता पर इस इस रास्ते पर अनुभव बढ़ता जाता था.एक बात जो मुझे प्रभावित करती थी कि उन्होने कोई बात पूछने पर उसका उत्तर अवश्य सहज भाव से  देते थे ,   मैंने बाद में श्री देवाशीष और श्री रविन्द्र श्रीवास्तव  के लेख भी पढे और आगे बढ़ने का विचार दृढ़ होता गया. आज मैं जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो हँसता हूँ. शायद यह सब हँसेंगे कि यह क्या लिख रहा है पर मैं बता दूं कि उनका काम अभी ख़त्म नहीं हुआ है मुझ  जैसे अभी कई होंगे जिनकी उन्हें मदद करनी होगी. इन सबका धन्यवाद ज्ञापित करते हुए आशा करूंगा कि यह लोग अपना सहयोग जारी रखेंगे.<br />
                                आखिर में समीर लाल जी का धन्यवाद ज्ञापित करूंगा कि उन्होने मेरा होंसला बढाने में कोई कसर नहीं छोडी. चिट्ठा चर्चा में उन्होने दीपक बापू कहिन के लिए लिखा था कि यह ब्लोग नया अलख जगायेगा. उनको यह बताने के लिए ही मैं लिख रहा हूँ  १० हजार पाठकों का आंकडा पर कर चुके इस ब्लोग की एक दिन में पाठक संख्या का सर्वोत्तम आंकडा १९१ है जो पिछले सप्ताह ही बना था. उसके बाद  हैं १७७, १६६, १५२, और १४८ है. कल इसकी संख्या ९७ थी.</p>
<p>                                 यह केवल जानकारी भर है और मैं अपने मित्रो और पाठकों को इस बात के लिए प्रशंसा करता हूँ कि उनकी जो पढ़ने में रुचियाँ हैं उनसे अंतर्जाल पर अच्छा लिखने  वालों की संख्या बढेगी. लोग अच्छा पढ़ना चाहते हैं अगर लिखा जाये तो. मैं आगे भी लिखता रहूंग इस विश्वास के साथ कि आप भी मेरे को प्रेरित करते रहेंगे. मैं चारों फोरम-नारद, ब्लोग्वानी, चिट्ठाजगत और हिन्दी ब्लोग- के  कर्णधारों का आभारी हूँ जो अपना सहयोग दे रहे हैं.  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बस यही संदेश इस पावन पर्व पर सुनाते ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/09/%e0%a4%ac%e0%a4%b8-%e0%a4%af%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%87%e0%a4%b8-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5-%e0%a4%aa/</link>
<pubDate>Fri, 09 Nov 2007 15:54:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[नीचे से ऊपर जाते हुए पटाखे
धमाके से का]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>नीचे से ऊपर जाते हुए पटाखे<br />
धमाके से कानों  को कंपाते<br />
साथ में नीचे आते प्रदूषण लाते<br />
नीचे चलती गाडियाँ<br />
तेज लाईट से आंखों को अंधा करती<br />
और हार्न से निकला भयानक शोर<br />
रास्ते के दोनों और बिखरी रौशनी<br />
में भी उसके जलते   अँधेरे का अहसास कराते<br />
खुशी में चिराग जलाने के तो<br />
खूब  सुने हैं अफसाने<br />
अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारता हो<br />
एकजुट होकर समाज<br />
नही मिलतीं ऐसी  दास्ताने<br />
अंधी दौड़ में शामिल हैं सब लोग<br />
जिनमें अक्ल है ताकत नहीं है<br />
जिनके पास ताकत है तो<br />
नीयत में है अपने लाभ पाने का स्वार्थ<br />
इसलिए चेतना का अलख नहीं जगाते </p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
किस-किसको रोईये<br />
आराम बड़ी चीज है<br />
मुहँ ढककर सोईये<br />
यह नीति अच्छी होती<br />
अगर आवाजों से नींद नहीं टूटी होती<br />
चैन होता हमें भी अगर<br />
मिठाई के नाम पर विष को<br />
परोसते नहीं देख पाते<br />
करते समाज सेवा का व्यापार तो<br />
हम ही चेतना का अलख जगाते<br />
बना लेते कोई बड़ा आश्रम<br />
इन आवाजों से दूर रह पाते<br />
चूंकि दर्द है कई लोग का<br />
उनका हमदर्द बन जाते<br />
यह त्यौहार खाने-पीने के ही लिए  नहीं<br />
चिंतन और मनन के लिए भी आते<br />
कुछ सोचो कहाँ जा रहे हो<br />
अपने हाथ से अपने  लिए विष जुटा रहे हो<br />
बस यही सन्देश इस पावन पर्व पर सुनाते<br />
-------------------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:यज्ञ हवन से मन में शांति आती है ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/08/%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e-%e0%a4%b9%e0%a4%b5%e0%a4%a8-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%a8/</link>
<pubDate>Thu, 08 Nov 2007 04:29:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१.इस संसार में कुछ प्राणियों के किसी व]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>१.इस संसार में कुछ प्राणियों के किसी विशेष अंग में विष होता है-जैसे सर्प के  दांतों  में मक्खी के मस्तिष्क में और बिच्छू की पुँछ में-पर इन सबसे अलग दुर्जन और कपटी मनुष्य के  हर अंग में विष होता है. उसके मन में विद्वेष,वाणी में कटुता और कर्म में नीचता का व्यवहार  जहर बुझे तीर की तरह दूसरे को त्रास देते हैं.</p>
<p>२.औषधि, धर्म,धन, धान्य, और गुरु के  मार्गदर्शन वाक्य-इन पांच वस्तुओं का संग्रह अवश्य करें. जो  व्यक्ति इनका संचय नहीं करता वह अपने जीवन की सार्थक नहीं बना सकता. लेकिन इन पांच वस्तुओं का उपयोग भी बहुत सोच समझ कर करना चाहिऐ वरना हानि भी हो सकती है.</p>
<p>३.हर मनुष्य को सभी विधाओं में निपुण होना चाहिऐ. बडे लोगों से विनम्रता, विद्वानों से श्रेष्ठ और मधुर ढंग से वार्तालाप का तरीक सीखना चाहिए.  जुआरियों से झूठ बोलना और  कुशल स्त्रियों से चालाकी का गुण सीखना चाहिए.<br />
४.मनुष्य  को ऐसे कर्म करना जिससे उसकी कीर्ति सब और फैले. विद्या, दान, तपस्या, सत्य भाषण और धनोपार्जन के उचित तरीकों से कीर्ति दसों दिशाओं में फैलती है.</p>
<p>५.अपना जीवन शांतिपूर्वक बिताने के लिए हर मनुष्य को धर्म-कर्म का अनुष्ठान करते रहना चाहिऐ. वह घर मुर्दाघर के समान हैं जहाँ धर्म-कर्म या यज्ञ-हवन नहीं होता. जहाँ वेद शास्त्रों का उच्चारण नहीं होता, विद्वानों का सम्मान नहीं होता और यज्ञ-हवन से देवताओं का पूजन नहीं होता ऐसे घर, घर न रहकर शमशान के समान होता है.  </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जमीन और आसमान]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/06/%e0%a4%9c%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%86%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8/</link>
<pubDate>Tue, 06 Nov 2007 16:56:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[छोटे आदमी को कुचल कर
यूं ही सब बडे होते ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>छोटे आदमी को कुचल कर<br />
यूं ही सब बडे होते जायेंगे<br />
गरीब को लूटकर<br />
यूं ही अमीर होते जायेंगे<br />
जमीन को खोदकर<br />
आसमान में उड़ते जायेंगे<br />
तो कब तक खुद भी जिंदा रह पायेंगे<br />
क्या यह कभी तुमने सोचा है</p>
<p>छोटा काम करते आती है शर्म<br />
बड़ा करना चाहते हैं कर्म<br />
कितना भी उड़ लें<br />
जमीन पर रखने ही हैं कदम<br />
आकाश में नजर लगाए बैठें हैं<br />
नहीं जानते धरती का मर्म<br />
खूबसूरत और ऊंची अट्टालिकाओं में<br />
रहने वालो<br />
बंद गाड़ियों में घूमने वालों<br />
यह जमीन तुम्हारी दासी नहीं है<br />
जो सबको रौंदकर चलना चाहते हो<br />
क्या यह कभी तुमने सोचा है</p>
<p>जिंदा रहने और चलने का हक़<br />
यहाँ सभी प्राणियों को है<br />
तुम जमीन पर आकाश की तरह<br />
उड़ने की कोशिश मत करो<br />
गरीब और छोटे पर<br />
कटु शब्दों की वर्षा मत करो<br />
तुम्हारे बडे होने का भ्रम<br />
उनके ही क्रूर यथार्थ की बुनियाद पर टिका है<br />
मेहनतकश को देवता ही समझो<br />
जो सींचते हैं अपने पसीने से<br />
तुम्हारी अमीरी रुपी हरियाली<br />
वह अपराध नहीं कर तुम्हारे<br />
जीवन में शांति का स्वर्ग बसाते हैं<br />
अपने दर्द को दवा समझकर पी जाते हैं<br />
क्या कभी तुमने यह सोचा है<br />
---------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:ज्ञानी कोरी मान्यताओं में नहीं फंसते ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/05/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Mon, 05 Nov 2007 04:50:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
चाल बकुल की चलत हैं, बहुरि कहावैं हंस
त]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
चाल बकुल की चलत हैं, बहुरि कहावैं हंस<br />
ते मुक्ता कैसे चुंगे, पडे काल के फंस</strong></p>
<p> संत शिरोमणि कबीरदास जीं कहते हैं कि जो लोग चाल तो बगुले की चलते हैं और अपने आपको हंस कहलाते हैं, भला ज्ञान के मोती कैसे चुन सकते हैं? वह तो काल के फंदे में ही फंसे रह जायेंगे। जो छल-कपट में लगे रहते हैं और जिनका खान-पान और रहन-सहन सात्विक नहीं है वह भला साधू रूपी हंस कैसे हो सकते हैं।</p>
<p><strong>जो हंसा मोती चुगेँ , कंकर क्यों पतिताय<br />
कंकर माथा ना नवै, मोटी मिले तो खाय </strong></p>
<p>जो ज्ञानी और विवेकवान-हंस रूपी-लोग संसार की आसक्ति को त्यागकर आत्मज्ञान रूपी मोती को चुगता है, तो वह सांसरिक विषय और कामनाओं के कंकर पत्थर पर क्यों यकीन करेगा? अर्थात वह मिथ्या वाद-विवादों एवं कल्पित मान्यताओं के चक्कर में नहीं पडेगा। वह कंकर रूपी अज्ञानता के आगे कदापि अपना माथा नहीं झुकायेगा, केवल यथार्थ ज्ञान को ही ग्रहण करेगा।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[झूठ को सच जैसा सजाता है विज्ञापन ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/04/%e0%a4%9d%e0%a5%82%e0%a4%a0-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%b8%e0%a4%9a-%e0%a4%9c%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9c/</link>
<pubDate>Sun, 04 Nov 2007 17:41:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/04/%e0%a4%9d%e0%a5%82%e0%a4%a0-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%b8%e0%a4%9a-%e0%a4%9c%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9c/</guid>
<description><![CDATA[गुलाब का फूल कभी नहीं करता
अपनी  सुगंध ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>गुलाब का फूल कभी नहीं करता<br />
अपनी  सुगंध का  विज्ञापन<br />
उसकी सुगंध से महकता है<br />
अपने आप ही घर का आंगन<br />
कमल का फूल कभी अपने गुणों का<br />
बखान नहीं करता<br />
आदमी की आँखों को<br />
वैसे ही लगता है मनभावन<br />
जिनमें भाव की गहराई  नहीं<br />
ऐसी तुकबंदी को कितना भी सुनाओ<br />
नहीं पहुंच पाती कानों से आगे<br />
दिल को छू लें ऐसे शब्दों से सजे<br />
गीत जब भी कानों में गूंजें<br />
अच्छे लगे<br />
बसंत हो या सावन<br />
शायद इसलिए अब जज्बात<br />
कहीं अँधेरे में खोये लगते हैं<br />
जो सच में खूबसूरत है चेहरे<br />
कहीं सोये लगते हैं<br />
लोग ज्ञान और श्रद्धा में<br />
रमने की बजाय<br />
आत्मविज्ञापन में भटकते हैं<br />
सच कितना भी खूबसूरत हो<br />
लोगों के सामने नहीं आता<br />
झूठ को ही सजा लेता है<br />
एकदम सच जैसा विज्ञापन</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[यह पब्लिक है, सब जानती है ]]></title>
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<pubDate>Fri, 02 Nov 2007 15:13:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[हीरो को जन्म दिन हो तो
सारे चैनल भौंपू ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हीरो को जन्म दिन हो तो<br />
सारे चैनल भौंपू हो जाते<br />
बस उसकी आरती सुनाये जाते<br />
चालीस पार हो चुके हों<br />
और बिकती हो खबर बाजार में<br />
तो उसे जवान बताते<br />
और चालीस पार आम आदमी को<br />
स्वस्थ रहने के लिए<br />
गोलियों के ब्रांड<br />
बाल काले रखने के लिए<br />
अनेक तेलों के नाम सुझाते </p>
<p>कहैं दीपक बापू  कब तक<br />
जनता  को चलाओगे<br />
अधेडावस्था के लोगों को कब तक<br />
नवयोवनाओं की आँखों में बसाओगे<br />
दावा करते हो देश में जागरूकता लाने का<br />
फैलाते हो भ्रम<br />
सच बोलने में आती है शर्म<br />
खुलने लगे हैं कर्म<br />
यह जनता सब जानती है<br />
तुम्हारे सच के पीछे झूठ को जानती है<br />
इसलिए तुम नाम बदलते हो<br />
चेहरे वही पुराने सामने लाते<br />
खबर के नाम पर गाने परोसते<br />
जज्बात के नाम पर हीरो के अलावा<br />
और लोग तुम्हें नहीं सुहाते<br />
पर याद रखना यह पब्लिक है<br />
लोग तुमसे नहीं चलते<br />
वही तुम्हें चलाते<br />
-----------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:निर्धन के लिए सभाएँ विष समान ]]></title>
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<pubDate>Fri, 02 Nov 2007 04:10:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१.प्रत्येक व्यक्ति की दृष्टि अलग-अलग ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.प्रत्येक व्यक्ति की दृष्टि अलग-अलग होती है, एक ही  शरीर जी तीन ढंग से देखते हैं. योगी इसे नश्वर रूप में, भोगी इसे काम वासना के रूप  में और सुनार मोम के घडे के रूप  रूप में देखता है.</p>
<p>२.दुष्ट और काँटों को दबाने के दो ही उपाय है. पहला उपाय है जूता और दूसरा उपेक्षा अर्थात बगल से बिना देखे निकला जाये.</p>
<p>३.अच्छी और बुरी वस्तु दोनों की अति बुरी होती है. अच्छी बाते और गुण भी कभी विपत्ति का कारण बन जाते हैं.  रजा बलि को अत्यादिक दानशीलता के कारण बन्धन में बंधना पडा और अत्यधिक अंहकार के कारण रावण का वध हुआ.</p>
<p>४.निर्धन व्यक्ति के लिए किसी प्रकार की सभाएं विष समान होती हैं. गोष्ठियों में तो  धनवान व्यक्ति ही जा सकते हैं. यदि भूल से कोई निर्धन व्यक्ति ऐसे सभा स्थलों में चला भी जाये तो उसकी  मूर्खता होगी क्योंकि वहाँ उसे अपमानित होकर ही निकलना पड़ता है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल के सोच जैसी होगी दुनिया ]]></title>
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<pubDate>Thu, 01 Nov 2007 17:14:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[मन का खोखलापन
तन को रुग्ण कर देता हैं
व]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मन का खोखलापन<br />
तन को रुग्ण कर देता हैं<br />
विचारों की कलुषिता से<br />
अपना दिल ही बैचेन कर देता है<br />
हम अपने ही दायरों में कैद हो जाते हैं </p>
<p>जैसा ख़्याल दिल में होगा<br />
वैसा ही दृश्य हमारे सामने<br />
हर हाल में प्रकट होगा<br />
ख्वाब देखना ठीक है<br />
पर अगर पूरे न हौं तो<br />
देखने वाले तकलीफ उठाएँ जाते हैं</p>
<p>जैसी सोच होती है<br />
वैसी ही दुनिया सामने नजर आती है<br />
कुछ अच्छा और बुरा नहीं<br />
नजरिया जैसा होता है<br />
वैसे ही अहसास हो जाते हैं</p>
<p>इसलिये जैसी दुनिया<br />
देखना चाहते हो<br />
वैसी ही सोच के साथ चलो<br />
ख़्वाबों और ख्यालों में<br />
कुछ खूबसूरत नजरिये<br />
जोड़ते हुए उनके साथ ढलो<br />
जिन्दगी का सफर तो सभी काटते हैं<br />
कुछ रोते कराहते गुजारते हैं<br />
जो हँसते, गुनगुनाते और अपनी<br />
हकीकतों से करते हैं दोस्ती<br />
वही सुख के पल जीं पाते हैं</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपनी पहचान ढूंढता आदमी ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/01/%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%a2%e0%a5%82%e0%a4%82%e0%a4%a2%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%ae%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Thu, 01 Nov 2007 16:29:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[अलग खडा नहीं रह सकता
इसलिये भीड़ में श]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अलग खडा नहीं रह सकता<br />
इसलिये भीड़ में शामिल<br />
हो जाता है आदमी<br />
फिर वहीं तलाशता है<br />
अपनी पहचान आदमी<br />
भीड़ में सवाल-दर सवाल<br />
सोचता मन में<br />
भीड़ में शामिल पर अलग सोचता आदमी</p>
<p>भीड़ में शामिल लोगों में<br />
अपने धर्म के रंग<br />
अपनी जाति का संग<br />
अपनी भाषा का अंग<br />
देखना चाहता आदमी<br />
अपनी टोपी जैसी सब पहने<br />
और उसके देवता को सब माने<br />
उसके सच को ही सर्वश्रेष्ठ जाने<br />
अपनी शर्तें भीड़ पर थोपता आदमी<br />
भीड़ में किसी की पहचान नहीं होती<br />
यह जानकर उसे कोसता आदमी</p>
<p>अपने अन्दर होते विचारों में छेद<br />
भीड़ में देखता सबके भेद<br />
अपनी सोच पर कभी नहीं होता खेद<br />
सबको अलग बताकर एकता की कोशिश<br />
दूसरे की नस्ल पर उंगुली उठाकर<br />
अपने को श्रेष्ठ साबित कराने का इरादा<br />
असफल होने पर सबको समान<br />
बताने का दावा<br />
आदमी देता है भीड़ को धोखा<br />
पर भीड़ का कोई रंग नहीं होता<br />
कोई देवता उसकी पहचान नहीं बनता<br />
कोई उसकी भाषा नहीं होती<br />
कहा-सुना सब बेकार<br />
तब हताश हो जाता है आदमी<br />
भीड़ में शामिल होना चाहता है<br />
अपनी शर्तें भूलना नहीं चाहता आदमी<br />
अपने अंतर्द्वंदों से मुक्त नहीं हो पाता आदमी<br />
---------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल का क्या हिसाब रखते ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/30/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%ac-%e0%a4%b0%e0%a4%96%e0%a4%a4%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Tue, 30 Oct 2007 14:24:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[जिस राह से गुजरे हम
वहीं हमसफ़र मिलते ग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जिस राह से गुजरे हम<br />
वहीं हमसफ़र मिलते गये<br />
वह अपनी मंजिल पर आकर रुके<br />
हम अपनी राह पर चलते गये<br />
किसी से बिछडे तो किसी से मिले<br />
अपना  कारवां लिए बढते रहे<br />
जो बिछडे क्या उनका पता रखते<br />
क्या भला अपनी उनको खबर करते<br />
जो साथ होते<br />
उनसे ही निभाने से फुर्सत कहाँ होती<br />
अपनी राह पर हम चलते रहे<br />
कहीं रास्ते में नहीं होंगे हमारे पैर के निशान<br />
कहीं नहीं होगी हमारे नाम की इबारत<br />
हमारे आगे जाते ही सब मिटते गये<br />
हो सकता है कि किसी के दिल में<br />
हमारे लिए जगह हो<br />
क्योंकि दिल  पर नहीं होता बस किसी का<br />
अगर बसे तो बस ही गये<br />
करते हों शायद वह लोग<br />
जिन्हें हम खुद भूल गए<br />
दिलों को पढ़ना कहाँ संभव<br />
किसके दिन में कैसे बसे<br />
किसकी आंखों के सामने से गुजरे<br />
और उसके दिल में बसे<br />
और कहाँ बाहर से ही निकल गए<br />
--------------------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल हुआ इधर से उधर ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/10/28/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2-%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%86-%e0%a4%87%e0%a4%a7%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%89%e0%a4%a7%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Sun, 28 Oct 2007 09:03:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[अंतरजाल पर एक दूसरे के ब्लोग पर
कमेन्ट]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अंतरजाल पर एक दूसरे के ब्लोग पर<br />
कमेन्ट लिखते-लिखते<br />
दोनों के दिल मिल गए  अपने आप<br />
दोनों युवा थे और कविता लिखने  के शौकीन भी<br />
होना था मिलन कभी न कभी<br />
प्रेमी ब्लोगर एक असली नाम से तो<br />
चार छद्म नाम से कमेन्ट लगाता<br />
और प्रेमिका के ब्लोग को हिट कराता<br />
अपना लिखना भूल गया<br />
उसके ब्लोग पर कमेन्ट लगाता<br />
और खुश होता अपने ही आप </p>
<p>एक दिन प्रेमिका ने भेजा सन्देश<br />
' कुछ और रचनाएं भी लिखा करो<br />
वरना ब्लोग जगत में बदनाम हो जाओगे<br />
'केवल कमेन्ट दागने वाला ब्लोगर'कहलाओगे<br />
इससे होगा मुझे भारी संताप </p>
<p>प्रेमिका का आग्रह शिरोधार्य कर<br />
वह लिखने में जुट गया<br />
हो गया मशहूर सब जगह<br />
कमेन्ट लिखने का व्यवहार उसका छूट गया<br />
एक प्रतिद्वंदी ब्लोगर को आया ताव<br />
उसके हिट होने और अपने फ्लॉप होने का<br />
उसके दिल में था घाव<br />
बदला लेने को था बेताब<br />
उसने उसकी प्रेमिका के ब्लोग पर<br />
लगाना शुरू किया कमेन्ट<br />
एक अपने और आठ छद्म नाम से<br />
उसके ब्लोग को हिट कराता<br />
अपनी बेतुकी कवितायेँ करने लगा<br />
उसको हर बार भेंट<br />
प्रेमिका का दिल भी गया पलट<br />
दूसरे में गया दिल गया भटक<br />
पहले ब्लोगर को कमेन्ट देने का<br />
उसका सिलसिला बंद हुआ अपने आप </p>
<p>उधर पहले ब्लोगर ने उसको जब अपने<br />
ब्लोग पर बहुत दिन तक नही देखा<br />
तब उसके ब्लोग का दरवाजा खटखटाया<br />
दूसरे ब्लोगर के कमेन्ट को देखकर<br />
उसे सब समझ में आया<br />
मन में हुआ भारी संताप<br />
उसने भेजा प्रेमिका को सन्देश<br />
'यह क्या कर रही हो<br />
मुझे लिखने में उलझाकर<br />
तुम कमेन्ट में उलझ रही हो<br />
सच्चे और झूठे प्रेम को तुम<br />
अंतर नही समाज रही<br />
धोखा खाओगी अपने आप'</p>
<p>प्रेमिका ने भेजा सन्देश<br />
'तुम्हारी रचना से तो उसकी कमेन्ट अच्छी<br />
तुम्हारी रचना दर्द  बाँटती हैं<br />
उसकी कवितायेँ दुख के बादल छांटती हैं<br />
अब तो मेरा उस पर ही दिल आ गया<br />
तुम अपना दिल कहीं और लगाना<br />
मत देना अपने को विरह का संताप<br />
सब ठीक हो जायेगा अपने आप </p>
<p><strong>नोट- यह एक काल्पनिक हास्य व्यंग्य रचना है इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है. </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आस्तिक-नास्तिक विवाद पर बेकार की बहस]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/28/%e0%a4%86%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%ac/</link>
<pubDate>Sun, 28 Oct 2007 08:51:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[माया की कृपा जिन पर होती है उन्हें भगव]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>माया की कृपा जिन पर होती है उन्हें भगवान् का वरदहस्त मान लिया जाता है. जितनी  भगवान् की महिमा अनंत है उतनी  ही माया की गाथा अनंत है. इस विश्व में कई ऐसे लोग  हैं जो पद, प्रतिष्ठा और पैसे की उपलब्धियों के शिखर पर हैं पर भगवान को नहीं मानते हैं न पूजते हैं. उन लोगों को पूजना भी नहीं चाहिए और उनके नास्तिक विचार पर किसी को आपत्ति भी नहीं करना चाहिए. आखिर हर आदमी भगवान् की पूजा क्यों करता है? माया की कृपा हो इसलिए ही न! कहीं नमन कर तो कहीं ऊपर हाथ उठाकर आखिर आदमी और क्या चाहता है! इस दुनिया में दैहिक  और भौतिक सुख ही न! </p>
<p>     अब किसी के ऊपर माया मेहरबान हो तो लोग यहीं कहते हैं की भगवान् के मेहरबानी है. पर अगर कोई  अपनी उपलब्धियों को अपनी मानता है तो उसे आखिर लोग क्यों जबरदस्ती कहलाना चाहते हैं कि भगवान की कृपा है.मेरे विचार से  भक्ति के नितांत एक  निजी मामला है. अपने देश में तो और भी अधिक मामला पेचीदा है. एक ही परिवार के पांच सदस्य अलग-अलग भगवानों की पूजा करते हैं और उनके आध्यात्म गुरु भी अलग होते हैं और बडे आराम से एक छत के नीचे रहते हैं. कभी एक दूसरे से नहीं कहते कि 'तुम हमारे  भगवान् को पूजो या हमारे गुरु को मानो'. सब जानते हैं कि यह निरंकार की उपासना का मार्ग हैं. जब लोग अपने घरों में ऐसे मामलों  पर बहस नहीं करते तो बाहर विवाद खडा क्यों करना चाहते हैं. </p>
<p>             इतिहास गवाह है की पूरे विश्व में आस्तिक और नास्तिक विचारधारा के लोग एक दूसरे की गर्दन तक उड़ा चुके हैं. ऐसी घटनाएं भारत में तो कम बाहर और भी ज्यादा हो चुकी हैं. पर यह उस समय की बात है जब मनोरंजन और आवागमन  के साधन काम थे और लोग अपने सीमित दायरों में ही रहते और सोचते थे. उस समय भगवान् को मानने की चर्चा इसलिए अधिक थी क्योंकि काम कम था और समय अधिक.  अब समय बदल गया है और ऐसे में आदमी जिन्दगी की धमा-चौकडी में इस कदर  फंसा है की उसे यह पूछना अन्याय लगता है कि बता भगवान् है कि नहीं. घर और रोजगार के स्थानों के बीच की दूरी तय करते हुए आदमी का आधा दिन गुजर जाता है. रिश्तेदारी पहले की तरह अब घर के पिछवाडे में नहीं होती. कहीं से सन्देश आ जाये तो वहाँ पहुँचने के साधन की चिंता अलग से कंरनी पड़ती है. इस समय रेल मिलेगी कि बस. समय पर पहुँचेगे कि नहीं. तमाम  तरह के घरेलू और सामाजिक  तनाव अब ऐसे हैं कि भगवान् के अस्तित्व पर बहस करने का किसी को समय ही नही है. </p>
<p>जिसके मन में हैं वह समय निकाल कर मंदिर चला जाता है और जिसके पास नहीं है घर के अन्दर भी कर लेता है. कोई नहीं भी कर पाता इसका मतलब यह कतई  नहीं है  वह  भगवान् को नहीं मानता-और जो मानता है वह कहने के लिए मानता है औरहृदय में धारण करता है कि नहीं यह पता नहीं लग पाता.  ऐसे में जो नहीं मानता तो उससे भी इस बात के लिए बाध्य करना ठीक नहीं है बता-कैसे कहता है कि भगवान् नहीं है". </p>
<p>                अब तो आधुनिक योग में हमारे पास तमाम  तरह की वैज्ञानिक जानकारी है और इस धरती के लोग अन्तरिक्ष में विचरण कर रहे हैं तब आस्तिक और नास्तिक पर  बहस बेकार लगती है  जो कर रहे हैं उनका एकमात्र उद्देश्य लोगों का ध्यान अपनी और आकर्षित करना है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इस ब्लोग की पाठक संख्या दस हजार के पार ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/10/28/%e0%a4%87%e0%a4%b8-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a0%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%96%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b8/</link>
<pubDate>Sun, 28 Oct 2007 08:02:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[आज दीपकबापू कहिन ने १० हजार पाठकों का ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आज दीपकबापू कहिन ने १० हजार पाठकों का आंकडा पार कर लिया है. मेरे द्वारा बनाया जब यह ब्लोग बनाया गया था तब मुझे यह मालुम भी नहीं था की मैं बना क्या रहा हूँ?कमेन्ट क्या होती हैं. इसका पता इतना लंबा है तो केवल इसीलिए के जब उसे लिख रहा तो इस  बात का ज्ञान भी नहीं था कि इसे हमेशा  लिखना होगा. इसे कोई अन्य कैसे पढेगा इसका ज्ञान भी नहीं था. यू.टी.ऍफ़-८ ई फाइल में देव-१० फॉण्ट में लिखता था. हिन्दी श्रेणी भी नही रखा पाया था इसलिए डैशबोर्ड पर भी नहीं दिखता था. </p>
<p>                                 उस समय हमारे मित्र उन्मुक्त जी ने इसे देखा और बताया कि वह इसे पढ़ नहीं पा रहे थे. मुझे हंसी आयी. सोचा कोई होगा जो मुझे परेशान कर रहा है याह खुद कुछ जानता नहीं है और मुझे सीखा रहा है.  उसी समय ब्लागस्पाट का एक ब्लोग भी बनाया था जिसे आज दीपक भारतदीप का चिंतन नाम से जाना जाता है. उसमें इस तरह अपनी घुसपैठ कर ली थी कि वह तो सादा हिन्दी फॉण्ट में भी काम करने लगा था. </p>
<p>        उन्मुक्त जी ने दोनों की कापी  मेरे पास भेज दी तो मैं दंग रह गया. उनकी दशा  देखकर मुझे हैरानी हो रही थी. शहर के अन्य कंप्यूटरों पर देखा तो मुझे सही दिखाए दे रहे थे. ब्लोग बनने से जितना खुश था उतना ही अब परेशान हो रहा था. इसी परेशानी में गूगल का हिन्दी फॉण्ट मेरे हाथ आया. कैसे? यह मुझे याद नहीं. उसीसे लिखना शुरू किया और लिखता चला गया. हर नये  प्रयोग के लिए नया ब्लोग खोलता था. एक नहीं आठ ब्लोग खोल लिए. इसी बीच नारद पर पंजीकरण का प्रयास किया, पर पंजीकरण करना आये तब तो हो. मेरे प्रयासों के उनको गुस्सा आया और बिन करने की धमकी दे डाली. आज जब काम करता हूँ और जो ब्लोग लिखने कि पूरी प्रकिया है उसे देखकर तो उनका गुस्सा सही लगता है. इसके बाद  मैं चुप हो गया और लिखने लगा. तब एक दिन सर्व श्री सागर चंद नाहर, उन्मुक्त जी   संजय  बैगानी और  पंकज  बैगानी जी की  कमेन्ट आयी कि आप तो बहुत लिख चुके हैं पर नारद पर आपका ब्लोग नहीं दिख रहा है आप पंजीकृत कराईये.  </p>
<p>               मैं उस समय सब करने को तैयार था सिवाय नारद पर पंजीकरण कराने के. क्योंकि अब कोई गलती वहाँ से मेरे को बिन करा सकती थी.  मैं सिर पकड़ कर बैठ गया कि अब इस नारद से कैसे सुलझें. बहरहाल उसे दिन भाग्य था और पंजीकरण कैसे हो गया यह अब मुझे भी याद नहीं है. उसके बाद  मेरा ब्लोग मैदान में आ गया. धीरे-धीर  समझ में आने लगा कि वह सब लोग मेरे को अपने साथ जोड़ने के लिए इतनी मेहनत कर रहे थे. उन्मुक्त जी के प्रयास तो बहुत प्रशंसनीय हैं. मैं इन सब लोगों का आभारी हूँ. </p>
<p>                     अंतर्जाल लिख्नते समय मेरे पास कोई योजना नहीं थी. मेरे एक लेखक मित्र ने मुझे अभिव्यक्ति  (अंतर्जाल की पत्रिका)  का पता दिया था. वहाँ मुझे नारद दिखता था पर मैं उसे नहीं देखता था और  जब देखा तो भी मुझे उसमें रूचि नही जागी-इसका कारण यह भी था कि उसमें मुझे उस समय साहित्य जैसे विषय पर कुछ  लिखा गया नहीं लगा. एक बार मेरी नजर ब्लागस्पाट पर एक हिन्दी ब्लोग पर पढ़ गई. मैंने उसे पढा  तो आश्चर्य हुआ. उस  विषय में मेरी दिलचस्पी बहुत थी और उस लेखक ने जो लिखा उससे मैं बहुत  प्रभावित हुआ. उसने मुझे भी उसी तरह लिखने की प्रेरणा दी. अभिव्यक्ति को तो मैं अपनी रचनाएं भेज रहा था पर उस ब्लोग को मैं आज तक नहीं भूल पाया. उसकी विषय सामग्री मेरे दिमाग में आज तक है. मुझे उस लेखक का नाम याद नहीं है. मुझे उस समय अनुभव नहीं था उसके नीचे कमेंट देखता तो शायद कुछ याद रहता-उस समय  कमेंट लगाने की बात तो मैं सोच भी नहीं सकता.  हाँ, ऐसा लगता है कि उस ब्लोग  अपनी इन चारों  फोरम पर होना चाहिए. फुरसत में मैं इन फोरम पर उसका ब्लोग तलाशता हूँ. उसके बारे में कोई संकेत इसलिए नहीं दे सकता क्योंकि वह उस समय एक विवादास्पद  विषय पर लिखा गया था पर उसकी स्पष्टवादिता ने मेरे मन को खुश कर दिया था. तब मुझे लगा कि इस  ब्लोग विधा को मैं अपने सृजन को लोगों तक पहुचा  सकता हूँ. उस ब्लोग लेखक ने जो व्यंग्य लिखा था वह कोई समाचार पत्र या पत्रिका शायद ही छापने का साहस कर सके और मुझे लगा कि यह विधा आगे आम आदमी को आपनी बात कहने के लिए बहुत योगदान  देने वाली है. मैं उस अज्ञात ब्लोग लेखक को कभी नहीं भूल सकता. </p>
<p>                             श्रीश शर्मा -(ईसवामी) का नाम यहाँ लेना जरूरी है इसलिए  लिख रहा हूँ. वह मेरे मित्र हैं और उनकी कोई सलाह मेरे काम नहीं आती या मैं उनके अनुसार चल नहीं पाता  यह अलग बात है पर उस अज्ञात ब्लोग लेखक के बाद उनका नंबर भी याद रखने लायक है. जब मैंने अभिव्यक्ति पर नारद खोला तो उनका ब्लोग देखा(यह भी हो सकता है कोई उनका लेख हो) जिसमें उनका कंप्यूटर पर काम करते हुए फोटो था. मैं उस फोटो को देखने से  पहले ब्लोग  लिखने का फैसला कर चुका था और वहाँ  इसलिए गया था कि आगे कैसे बढूँ. उनका लिखा मेरे समझ में नहीं आया पर तय कर चुका था कि इस राह पर चलना ही है और मैं यह नहीं जानता था कि उनसे मेरी मित्रता होने वाली  है-उन्होने अभी मुझे गूगल ट्रांसलेटर टूल का पता  भेजा और मैं कह सकता हूँ कि उनकी यह पहली सलाह है जो काम आ रही है इससे पहले उनका बताया काम तो नहीं आता पर इस इस रास्ते पर अनुभव बढ़ता जाता था.एक बात जो मुझे प्रभावित करती थी कि उन्होने कोई बात पूछने पर उसका उत्तर अवश्य सहज भाव से  देते थे ,   मैंने बाद में श्री देवाशीष और श्री रविन्द्र श्रीवास्तव  के लेख भी पढे और आगे बढ़ने का विचार दृढ़ होता गया. आज मैं जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो हँसता हूँ. शायद यह सब हँसेंगे कि यह क्या लिख रहा है पर मैं बता दूं कि उनका काम अभी ख़त्म नहीं हुआ है मुझ  जैसे अभी कई होंगे जिनकी उन्हें मदद करनी होगी. इन सबका धन्यवाद ज्ञापित करते हुए आशा करूंगा कि यह लोग अपना सहयोग जारी रखेंगे.<br />
                                आखिर में समीर लाल जी का धन्यवाद ज्ञापित करूंगा कि उन्होने मेरा होंसला बढाने में कोई कसर नहीं छोडी. चिट्ठा चर्चा में उन्होने दीपक बापू कहिन के लिए लिखा था कि यह ब्लोग नया अलख जगायेगा. उनको यह बताने के लिए ही मैं लिख रहा हूँ  १० हजार पाठकों का आंकडा पर कर चुके इस ब्लोग की एक दिन में पाठक संख्या का सर्वोत्तम आंकडा १९१ है जो पिछले सप्ताह ही बना था. उसके बाद  हैं १७७, १६६, १५२, और १४८ है. कल इसकी संख्या ९७ थी.</p>
<p>                                 यह केवल जानकारी भर है और मैं अपने मित्रो और पाठकों को इस बात के लिए प्रशंसा करता हूँ कि उनकी जो पढ़ने में रुचियाँ हैं उनसे अंतर्जाल पर अच्छा लिखने  वालों की संख्या बढेगी. लोग अच्छा पढ़ना चाहते हैं अगर लिखा जाये तो. मैं आगे भी लिखता रहूंग इस विश्वास के साथ कि आप भी मेरे को प्रेरित करते रहेंगे. मैं चारों फोरम-नारद, ब्लोग्वानी, चिट्ठाजगत और हिन्दी ब्लोग- के  कर्णधारों का आभारी हूँ जो अपना सहयोग दे रहे हैं.  </p>
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