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	<title>बंजर &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/बंजर/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "बंजर"</description>
	<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 13:28:58 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[खिली-खिली महकी बहारें हैं]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=971</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 02:35:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
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<description><![CDATA[खिली-खिली महकी बहारें हैं
झीलों पर बहत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">खिली-खिली महकी बहारें हैं<br />
झीलों पर बहते शिकारें हैं<br />
ठण्डी-ठण्डी सौंधी हवाएँ हैं<br />
गीले पत्तों को खनकाएँ हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">जाने कैसी तलब जागी है<br />
जाने किसका इन्तिज़ार है<br />
बेज़ार-सा यह दिल मेरा<br />
किसके लिए गुलज़ार है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">आज ऐसा क्यों लग रहा है<br />
नये-नये सब नज़ारें हैं<br />
खिली-खिली महकी बहारें हैं<br />
झीलों पर बहते शिकारें हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">शबनमी रातों का यह चाँद<br />
और उजली-उजली चाँदनी<br />
आइनाए-दिल में कौन यार है<br />
इश्क़ जिससे वजहसार है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">बंजर ज़मीने-दिल से आज<br />
उलझे हुए मखमली धारे हैं<br />
खिली-खिली महकी बहारें हैं<br />
झीलों पर बहते शिकारें हैं</span></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति 'नज़र'<br />
लेखन वर्ष: २००४</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नग़मे खिलने लगे हैं]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=916</link>
<pubDate>Fri, 14 Mar 2008 14:32:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=916</guid>
<description><![CDATA[नग़मे खिलने लगे हैं नज़्म महकने लगी है
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">नग़मे खिलने लगे हैं नज़्म महकने लगी है<br />
तेरे एहसास पे धड़कन ग़ज़ल कहने लगी है<br />
साँवली आँखों में सपनों की ख़ुशबू घुलने लगी है<br />
मुसलसल ख़ाबों की भीड़ पलकों में लगने लगी है</font></p>
<p><font color="#000000">बंजर सूखे मैदान सारे सब्ज़ होने लग गये<br />
फूल अरमानों के मेरे मन में खिलने लग गये<br />
सौंधे आसमाँ पर सतरंगी धनुष खिल गया है<br />
पर्वतों पे घटा झुकने लगी है बरसने लगी है</font></p>
<p><font color="#000000">नग़मे खिलने लगे हैं नज़्म महकने लगी है<br />
तेरे एहसास पे धड़कन ग़ज़ल कहने लगी है</font></p>
<p><font color="#000000">दुआओं की सदा मेरी फ़ुग़ाँ असर कर जायेगी<br />
रहमत ख़ुदा की होगी मेरी ज़ीस्त घर आयेगी<br />
बहारो-फ़िज़ा का रंग हर-सू बदलने लगा है<br />
तेरे तस्व्वुर की मद्धम धूप खिलने लगी है</font></p>
<p><font color="#000000">साँवली आँखों में सपनों की ख़ुशबू घुलने लगी है<br />
मुसलसल ख़ाबों की भीड़ पलकों में लगने लगी है</font></p>
<p>मुसलसल= लगातार, ज़ीस्त= जीवन, हर-सू= चारों तरफ़</p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००२</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[टूटे हुए चाँद को]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=827</link>
<pubDate>Mon, 25 Feb 2008 16:26:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=827</guid>
<description><![CDATA[टूटे हुए चाँद को सादे काग़ज़ में लपेटा ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">टूटे हुए चाँद को सादे काग़ज़ में लपेटा मैंने<br />
भीगे हुए सूरज को हथेलियों में समेटा मैंने<br />
तारे बसरने लगे और आसमाँ ख़ाली हो गया<br />
उसने एक आइने की तरह मुझे तोड़ दिया है<br />
...तोड़ दिया है</font></p>
<p><font color="#000000">जला दिये दिल के जज़्बात उसने<br />
बढ़ा दिये मेरे मुश्किलात उसने<br />
जीना मेरा जीना बहुत मुश्किल है<br />
यह ज़हर पीना बहुत मुश्किल है</font></p>
<p><font color="#000000">बहार में भी शाख़ों पर ख़िज़ाँ थी<br />
सूखी-सूखी बंजर हर फ़िज़ा थी<br />
फ़िज़ाएँ रंग बदलने लगी हैं<br />
हवाओं के साथ चलने लगी हैं मगर<br />
उसने निगाहों में खिलना छोड़ दिया है<br />
...छोड़ दिया है</font></p>
<p><font color="#000000">फ़िज़ाएँ मौसम के साथ खिलती हैं<br />
और मौसम बदलते रहते हैं<br />
मौसम बदला है तो फ़िज़ा भी बदलेगी<br />
बदले हुए मौसम ने हज़ार रास्तों को<br />
मेरी तरफ़ मोड़ दिया है, मोड़ दिया है<br />
...मोड़ दिया है</font></p>
<p><font color="#000000">शब्दों की स्याही में रिश्ते हैं<br />
फूलों के अर्क़ में रिश्ते हैं<br />
हर शब्द हर फूल में मिलते हैं<br />
हर जिस्म की शाखों पर खिलते हैं<br />
मिलते हैं बिछुड़ते हैं,<br />
बिछुड़ते हैं मिलते हैं<br />
समंदर की लहर जैसे चलते रहते हैं<br />
खिलते हैं महकते हैं<br />
बनते हैं बुझते हैं<br />
यह धूप-छाँव के जैसे रंग बदलते हैं</font></p>
<p><font color="#000000">उसने एक रिश्ता तोड़ा है इक जोड़ दिया है<br />
जोड़कर उसने रिश्ते को फिर तोड़ दिया है<br />
...तोड़ दिया है</font></p>
<p><font color="#000000">जला दिये दिल के जज़्बात उसने<br />
बढ़ा दिये मेरे मुश्किलात उसने<br />
जीना मेरा जीना बहुत मुश्किल है<br />
यह ज़हर पीना बहुत मुश्किल है</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९ अप्रैल २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[न रखो वह तस्वीरें हरी जिनसे दिल दुखता हो]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/12/28/%e0%a4%a8-%e0%a4%b0%e0%a4%96%e0%a5%8b-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%a4%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%b8/</link>
<pubDate>Fri, 28 Dec 2007 09:16:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
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<description><![CDATA[न रखो वह तस्वीरें हरी जिनसे दिल दुखता ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">न रखो वह तस्वीरें हरी जिनसे दिल दुखता हो<br />
कर दो वह ज़मीनें बंजर जिनमें घाव उगता हो</font></p>
<p><font color="#000000">क्यों सीने में साँस लेवे दर्द किसी बेदर्द का<br />
मिटा दो वह शोलए-दाग़ भी जिससे दिल जलता हो</font></p>
<p><font color="#000000">लुत्फ़ लो उस बात में जिसमें न हो माज़ी की सदा<br />
नोंच दो वह हर ख़ार जो उम्मीदों पर चुभता हो</font></p>
<p><font color="#000000">रोशनी चाहिए हर क़दम पे हमें भी तुम्हें भी<br />
जलाओ वह दिए किसलिए जिनसे धुँआ उठता हो</font></p>
<p><font color="#000000">आँच बटोरो ग़म पी जाओ ज़ीस्त को जीना सीखो 'वफ़ा'<br />
क्यों जोड़ो उस ख़ाब के टुकड़े जो ख़ुद को छलता हो</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘वफ़ा’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रोज़े-शामे-दीवाली कोई नूरे-चराग़ नहीं]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/12/20/%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a5%9b%e0%a5%87-%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%88-%e0%a4%a8%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Thu, 20 Dec 2007 23:24:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
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<description><![CDATA[रोज़े - शामे - दीवाली   कोई   नूरे - चराग़  न]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">रोज़े - शामे - दीवाली   कोई   नूरे - चराग़  नहीं<br />
चौखट   सूनी   दिल   वीराँ   तन्हा - तन्हा  रहता है</font></p>
<p><font color="#000000">पलकों पर शबनम के क़तरे फीका-फीका चाँद<br />
और गली में सब सूखा-सूखा बंजर-सा रहता है</font></p>
<p><font color="#000000">न   फूल   नकहता   है   न   कोपल   कोई खुलती है<br />
गुलाबी बेलों पर सब बेरंग ख़ुश्क - सा रहता है</font></p>
<p><font color="#000000">काली रातों-सी तेरी लटें वो जिनमें जी उलझा था<br />
उनका तो अब आँखों पर कुछ साया-सा रहता है</font></p>
<p><font color="#000000">मज़ा कहाँ अब आतिश में कहाँ पटाखों में वो धूम<br />
मेरे कानों में सन्नाटा-सा कुछ चीखता रहता है</font></p>
<p><font color="#000000">मंदिर में जब हाथ जोड़कर मेरा सिर झुकता है<br />
मेरा   यह   मन  बस   तुमको   ही   माँगता   रहता   है</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ज़िन्दगी के हर्फ़ बदल गये हैं]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/08/27/%e0%a5%9b%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%97%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a5%9e-%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b2-%e0%a4%97%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%88/</link>
<pubDate>Mon, 27 Aug 2007 18:32:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
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<description><![CDATA[आइने रातभर रोते रहे
तस्वीरें रातभर जा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">आइने रातभर रोते रहे<br />
तस्वीरें रातभर जागती रहीं<br />
लम्हे उम्रभर सिसकते रहे<br />
ख़ामोशियाँ उम्रभर ख़ाक फाँकती रहीं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">यादें धूप में सूख रही हैं<br />
बातें सब मुरझा गयी हैं<br />
आँखों में दरार पड़ रही है<br />
सपने बंजर हो गये हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">आँसू बर्फ़ बन गये हैं<br />
ख़ाहिशें तिनके चुन रही हैं<br />
आरज़ू के पाँव थक चुके हैं<br />
ख़्याल ज़मीन में दफ़्न हो गये हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">साँसें सीने में भीग गयी हैं<br />
उदास सावन टपक रहा है<br />
जंगल तन्हाई में सुलगता है<br />
फूल पलकें झुकाये हुए हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">ख़ुशबू बे-सदा गल रही है<br />
पलाश के फूल हँस रहे हैं<br />
जड़ें मिट्टी सोख रही हैं<br />
पत्ते सूखी बेलों ने डस लिये हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">उजाले पत्थरों में जज़्ब हो गये हैं<br />
चाँद धुँध हो रहा है<br />
रात रेत हो गयी है<br />
सितारे रेत के दरया में बह रहे हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">दर्द तेज़ाब हो गया है<br />
और खु़शी मग़रूर रहती है<br />
मैं शब्द उगलता रहता हूँ<br />
ज़िन्दगी के हर्फ़ बदल गये हैं</span></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’</p>
]]></content:encoded>
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