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	<title>प्रचार &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/प्रचार/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "प्रचार"</description>
	<pubDate>Thu, 16 Oct 2008 07:36:29 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[जिन पर है दौलत मेहरबान-हास्य व्यंग्य कवितायें]]></title>
<link>http://zeedipak.wordpress.com/?p=12</link>
<pubDate>Sun, 12 Oct 2008 12:46:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://zeedipak.wordpress.com/2008/10/12/jin-par-hain-daulat-mehrban-hindi-poem/</guid>
<description><![CDATA[
धन, पद और प्रतिष्ठा की शक्ति
हो जाती है]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><strong><br />
धन, पद और प्रतिष्ठा की शक्ति<br />
हो जाती है जिन पर मेहरबान<br />
क्यों न करे वह उस पर अभिमान<br />
इस जहां में सभी यही चाहते हैं<br />
जिनसे दूर है यह सब<br />
वह रहते हैं परेशान<br />
गर्दन ऊपर उठाएँ देखते हैं<br />
होकर हैरान</p>
<p>उनके लड़के मोटर साइकिलों<br />
और कारों में चलते गरियाते हैं<br />
अभावों से है वास्ता जिनका<br />
वह उन्हें देखकर सहम जाते हैं<br />
अपने वाहन को चलाते है ऐसे<br />
जैसे करते हौं फिल्मी स्टंट<br />
कोई नहीं कर पाता उनको शंट<br />
जो रोकने की कोशिश करे<br />
उस पर टूट पड़ें बनकर हैवान</p>
<p>गरीब अगर अमीर की चौखट पर<br />
जाना बंद कर दे<br />
जाये तो तैयार रहे<br />
झेलने के लिए अपमान<br />
सड़क पर चले तो<br />
किसी से डरे या नहीं<br />
नव-धनाढ्यों की सवारी से<br />
बचकर चले<br />
न हार्न दें<br />
चाहे जहां और जब रूक जाएँ<br />
मन में आये वहीं रूक जाएँ<br />
यही उनकी पहचान</p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
तेज गति से मति होती वैसे ही मन्द<br />
फिर बाप के पैसे, पद और प्रतिष्ठा का<br />
नशा हो जिनको<br />
वह क्यों होंगे किसी नियम के पाबन्द<br />
वह पडा है उनकी तिजोरी में बंद<br />
अपने जीवन की सुरक्षा<br />
अपने ही हाथ में रखो<br />
बाकी करेंगे अपने भगवान<br />
--------------------------</p>
<p>वाह रे बाज़ार तेरा खेल<br />
मैदान में पिटे हीरो को<br />
कागज और फिल्म पर<br />
चमकाकर और सजाकर<br />
जनता के बीच देता है ठेल</p>
<p>क्रिकेट में कोई विश्वकप नही<br />
जीत सके जो तथाकथित महान<br />
ऐसे प्रचार का जाल बिछाते हैं<br />
कि लोग फिर<br />
उनके दीवाने बन जाते हैं<br />
अपने पुराने विज्ञापन इस<br />
तरह सबके बीच लाते हैं कि<br />
लोग हीरो की नाकामी से<br />
हो जाते हैं अनजान<br />
और बिक जाता है बाजार में<br />
उनका रखा और सडा-गडा तेल</p>
<p>न ताज कभी चला न चल सकता है<br />
उस पर हुए करोड़ों के वारे-न्यारे<br />
और वह चला भी ख़ूब<br />
प्रचार ऐसा हुआ कि<br />
पैसेंजर में नही लदा<br />
खुद ही बन गया मेल</p>
<p>कहै दीपक बापू<br />
शिक्षा तो लोगों में बहुत बढ़ी है<br />
पर घट गया है ज्ञान<br />
शब्दों का भण्डार बढ़ गया है<br />
आदमी की अक्ल में<br />
पर अर्थ की कम हो गयी पहचान<br />
बाजार में वह नहीं चलता<br />
चलाता है बाजार उसे<br />
सामान खरीदने नहीं जाता<br />
बल्कि घर लूटकर आता<br />
और कभी सामान तो दूर<br />
हवा में पैसे गँवा आता<br />
विज्ञापन और बाजार का या खेल<br />
जिसने कमाया वही सिकंदर<br />
जिसने गँवाया वह बंदर<br />
इससे कोई मतलब नही कि<br />
कौन है पास कौन है फेल<br />
-------------------</p>
<p>आँखें देखतीं हैं<br />
कान सुनते हैं<br />
और जीभ का काम है बोलना<br />
पर जो पहचान करे<br />
सुनकर जो गुने<br />
और जो श्रीमुख से<br />
शब्द व्यक्त करे<br />
वह कौन है<br />
हाथ करते हैं अपना काम<br />
टांगों का काम है चलना<br />
और कंधे उठाएं बोझ<br />
पर जो पहुँचाता है लक्ष्य तक<br />
जो देता है दान<br />
और जो दर्द को सहलाता है<br />
वह कौन है</p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
कहाँ उसे बाहर ढूंढते हो<br />
क्यों व्यर्थ में त्रस्त होते हो<br />
बैठा तुम्हारे मन में<br />
तुम उससे बात नहीं करते<br />
इसलिये वह मौन है<br />
जब तक तुम हो<br />
तब तक वह भी है<br />
तुम्हारा अस्तित्व है उससे<br />
उसका जीवन है तुमसे<br />
तुम सीमा में बंधे रहते हो<br />
उसकी शक्ति अनंत है<br />
तुम पहचानने की कोशिश करके देखो<br />
वह तुम्हारा अंतर्मन नहीं तो और कौन है<br />
</strong></strong><br />
-----------------</p>
<blockquote><p><strong><a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका</a> पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है। <a href="http://teradipak.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’</a><br />
अन्य ब्लाग<br />
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कवि और संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति: जिसका ज्ञान अल्प हो उसे समझाना कठिन ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=224</link>
<pubDate>Sun, 24 Aug 2008 01:25:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/08/24/few-knowledge_chankya-neeti/</guid>
<description><![CDATA[१.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की भी गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य का  जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य को  शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।</p>
<p>२.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है । इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। बाल्यकाल, युवावस्था और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही उन्हें अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है।<br />
३.जिस प्रकार सोने की चार विधियों-घिसना, काटना, तपाना तथा पीटने-से जांच की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की श्रेष्ठता की जांच भी चार विधियों-त्यागवृति, शील, गुण तथा सतकर्मो -से की जाती है।</p>
<p>४.अज्ञानी व्यक्ति को कोई भी बात समझायी जा सकती है क्योंक उस किसी बात का ज्ञान तो है नहीं। अत: उसे जो कुछ समझाया जाएगा वह समझ सकता है, ज्ञानी को तो कोई बात बिल्कुल सही तौर पर समझायी जा सकते है। परन्तु अल्पज्ञानी को कोई भी बात नही समझायी क्योंकि अल्पज्ञान के रुप में अधकचरे ज्ञान का समावेश होता है जो किसी भी बात को उसके मस्तिष्क तक पहुंचने ही नहीं देता। </p>
<p>*लेखक का मत है कि अल्पज्ञानी को अपने ज्ञान का अहंकार हो जाता है इसलिये वह कुछ सीखना ही नहीं चाहता, वह केवल अपने प्रदर्शन में ही लगा रहता है।</p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.worpdress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका’</a> पर प्रकाशित है। इस ब्लाग से संबद्ध अन्य यह ब्लाग भी संबद्ध हैं<br />
<a href="http://deepkraj.blogspot.com">1.शब्दलेख सारथी</a><br />
<a href="http://terahdeep.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blgospot.com">3.दीपक भारतदीप की चिंतन पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पहले बनाओ पंगेबाज फिर बताओ चंगेबाज-हास्य व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=469</link>
<pubDate>Tue, 19 Aug 2008 15:16:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2008/08/19/pangebaj-aur-fandebaj/</guid>
<description><![CDATA[घर से निकले ही थे पैदल
देखा फंदेबाज को ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>घर से निकले ही थे पैदल<br />
देखा फंदेबाज को भागते हुए आते<br />
इससे पहले कुछ कह पाते<br />
वह हांफते हुए गिर पड़ा आगे<br />
और बोला<br />
’‘दीपक बापू  अभी मुझे बचा लो<br />
चाहे फिर भले ही अपनी हास्य कविता सुनाकर<br />
हलाल कर मुझे पचा लो<br />
रास्ते में उस पंगेबाज को जैसे ही मैंने<br />
कहा बापू से मिलने जा रहा हूं<br />
पत्थर लेकर मारने के लिये मेरे पीछे पड़ा है<br />
सिर फोड़ने के लिये अड़ा है<br />
कह रहा है ‘टीवी पर तमाम समाचार आ रहे है<br />
बापू के नाम से बुरे विचार मन में छा रहे हैं<br />
तू उनका नाम हमारे सामने लेता है<br />
उनको तू इतना सम्मान देता है<br />
अभी तेरा काम तमाम करता हूं<br />
वीरों में अपना नाम करता हूं’<br />
देखो वह आ रहा है<br />
अच्छा होगा आप मुझे बचाते’’</p>
<p>पंगेबाज भी सीना तानकर खड़ा हो गया<br />
हांफते हांफते  बोला फंदेबाज<br />
‘अच्छा होता आप इसे भी<br />
अपनी हास्य कविता सुनाते’</p>
<p>कविता का नाम सुनकर भागा पंगेबाज<br />
उसके पीछे दौडने को हुए<br />
फंदेबाज  का हाथ छोड़ने को हुए<br />
पर अपनी धोती का एक हिस्सा<br />
उसके हाथ में पाया<br />
उनकी टोपी पा रही थी<br />
अपने ही पांव की छाया<br />
अपनी धोती को बांधते<br />
टोपी सिर पर रखते बोले महाकवि दीपक बापू<br />
‘कम्बख्त जब भी हमारे पास आना<br />
कोई संकट साथ लाना<br />
क्या जरूरत बताने थी  उसे बताने की कि<br />
हम हास्य कविता रचाते<br />
कविता सुनने से अच्छे खासे तीसमारखां<br />
अपने आपको बचाते<br />
हम उसे पकड़कर अपनी कविता सुनाते<br />
तुम अपने मोबाइल से कुछ दृश्य फिल्माते<br />
वह नहीं भागता तो हम मीडिया में छा जाते<br />
कैसे बचाया एक फंदेबाज को पंगेबाज से<br />
इसका  प्रसारण और प्रकाशन सब जगह करवाते<br />
आजकल सभी जगह हिट हो रहे पंगे<br />
रो रहे है फ्लाप काम करके  भले चंगे<br />
ऐसे ही दृश्य बनते हैं खबर<br />
खींचो चाहे  दृश्य और शब्द<br />
जैसे कोई हो रबड़<br />
पहले बनाते हैं ऐसी योजना जिससे<br />
मशहूर हो जायें पंगे<br />
फिर जिनको  पहले बताओ  बुरा<br />
बाद में बताओ उनको चंगे<br />
पहले बनाओ पंगेबाज फिर बताओ चंगेबाज<br />
कितना अच्छा होता हम सीधे प्रसारण करते हुए<br />
अपनी हास्य कविता से पंगेबाज को भगाते<br />
हो सकता है उससे हम भी नायक बन जाते<br />
हमारे ब्लाग पर भी छपती वह कविता<br />
शायद इसी बहाने हिट हो जाते<br />
इतने पाठ लिखकर भी कभी हिट नहीं पाते<br />
पंगेबाज कुछ देर खड़ा रहा जाता तो<br />
शायद हम भी कुछ हास्य कविता पका लेते<br />
अपने पाठको का पढ़ाकर सकपका  देते<br />
पर तुमने सब मामला ठंडा कर दिया<br />
अब हम तो चले घर वापस<br />
इस गम में<br />
कोई छोटी मोटी शायरी लिख कर काम  चलाते<br />
...............................................................</strong><br />
<strong>यह हास्य कविता काल्पनिक है तथा किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसक लिये जिम्मेदार होगा<br />
दीपक भारतदीप</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह मूल पाठ इस ब्लाग <a href="http://rajlekh.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिका’</a> पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सभी का व्यापार शोर के सहारे चल रहा है-आलेख]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=462</link>
<pubDate>Mon, 11 Aug 2008 14:48:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2008/08/11/article-in-hindi/</guid>
<description><![CDATA[उज्जैन के ब्लाग लेखक श्री सुरेश चिपलू]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>उज्जैन के ब्लाग लेखक <a href="http://sureshchiplunkar.blogspot.com">श्री सुरेश चिपलूनकर</a> हिंदी के न केवल सक्रिय ब्लाग लेखक हैं बल्कि दूसरों को भी सक्रिय रखने का अवसर अपने हाथ से नहीं जाने देते। वह अक्सर ईमेल पर तमाम तरह की  छबियां भेजते रहते हैं-जिनमें करीब करीब सभी दिलचस्प होती है। उनकी इन्हीं प्रेषणों पर मैं पहले अपने दो  पाठ लिख चुका हूं। तीन दिन  पहले उन्होने कुछ फोटो भेजे थे जिनमें एक टीवी चैनल की खबर थी जिसमें यू.एफ.ओ. द्वारा गायें उठा कर ले जाने की जानकारी थी।<br />
उन चित्रों पर अंकित था<br />
‘क्या गायों को बचाने आयेंगे गौरक्षक’<br />
‘अभी तक एक भी गाय का सुराग नहीं‘, आदि आदि।<br />
पहली बार जब मैंने सरसरी तौर से पढ़ा तो मुझे समझ में नहीं आया कि चिपलूनकर जी गुस्से में  अपनी टिप्पणियां फोटो के नीचे रख रहे हैं या कटाक्ष के रूप में। उनकी एक लाईन ने जरूर इशारा किया कि वह शायद कोई एनिमेशन फिल्म रही होगी जिसके बारे में वह टीवी चैनल दावा कर रहा था कि उसके पास गायों को एलियन द्वारा उठाये जाने का यह समाचार उसके  पास ही है। मेरे विचार से कोई सनसनी फैलाने वाली एनिमेशन फिल्म रही होगी।<br />
अब तो वह समय आ गया है जब  किसी  एनिमेशन फिल्म, सामाजिक धारावाहिक और जादूगरों के कर्तव्यों को सभी समाचार चैनल सनसनीखेज बनाकर प्रसारित कर रहे हैं संभवतः उपरोक्त खबर भी इसी तरह की दी होगी। मैं उनके फोटो यहां इसलिये नहीं दे रहा क्योंकि उससे उसका व्यर्थ ही  प्रचार होगा क्योंकि यहां मुख्य विषय तो टीवी चैनलों द्वारा काल्पनिक कथाओं पर आधारित एनिमेशन, फिल्म, धारावाहिक तथा अन्य मनोरंजन के अंशों का अपने कार्यक्रम को सनसनीखेज बनाने के औचित्य का प्रश्न है।<br />
कल एक चैनल लिख रहा था‘मां ने बहु बेटे की सुपारी दी‘ थोड़े देर में देखिये। पता लगा कि वह किसी सामाजिक धारावाहिक का विज्ञापन कर रहा था।<br />
आज भी ऐसा ही देखा<br />
‘क्या आपके घर में रखा है कोई बक्सा,जिसकी चाबी खो गयी है तो उस लड़की को उसके पास नहीं आने दें। अगर वह उस पर चढ़ गयी तो पांच सैकंड  में यह हो जायेगा। देखिए थोड़ी देर में।’<br />
उस दौरान वहां विस्फोट भी होते दिखाई दिया।<br />
उसे देख और  सुनकर सनसनी का बोध होने के कारण  हर आदमी उसे देखने के लिये उत्सुक होता है। मैंने भी कुछ देर देखा और बाद में तो उसने अनेक जादू के करतब दिखाना शुरू किये।<br />
यह समाचार चैनलों की हालत हो गयी है कि वह अब समाचारों से कम अपने मनोरंजन की वजह से चल रहे हैं। वैसे तो यह व्यवसाय है और किसी को उन पर क्या टिप्पणियां करना है यह तो करने वाले ही जाने। हां, मेरा नजरिया थोड़ा अलग है।<br />
कमाने को तो सभी कमाते हैं पर पश्चिम के लोगों का अपने जीवन में जो व्यवसायिक रवैया है वह वाकई अनुकरणीय हैं वहां बी.बी.सी और सी.एन.एन. की जो आकर्षक छबि है वह उनके व्यवसायिक रवैये के कारण हैं। आज भी बी.बी.सी का रेडियो भारत में लोकप्रिय है। खबर सुनने वाले आज भी उसे पसंद करते हैं। प्रबंधन के मामले में भारतीय कुशल नहीं हैं अपने कमाने में चाहें कितने भी सिद्ध हस्त हो जायें। आखिर क्या फर्क है एक व्यवसायिक और अव्यवसायिक व्यक्ति  में। जो लोग अपने रोजगार के साथ व्यवसायिक रवैये जुड़े होते हैं वह उसमें नये प्रयोग करते हुए नये अविष्कार भी करते हैं और किसी की नकल तो वह करते ही नहीं हैं। जबकि अव्यवसायिक रवैये वाले कोई प्रयोग नहीं करते ओर जहां से जैसा दांव मिला काम चलाते हैं। वह अपने व्यवसाय से नहीं बल्कि अपनी आय से प्रतिबद्ध होते हैं। अवसर पड़े तो अपना व्यवसाय भी बदल लेते हैंं। भारत में  ढेर सारे आई. टी. विशेषज्ञ, इंजीनियर,डाक्टर और अन्य विषयों के विशारद हैं पर प्रबंध कौशल में दक्षता के अभाव में ही भारत की प्रतिभा कौशल की कदर नहीं हो पायी। अर्थशास्त्र में भारत की समस्याओं में प्रबंध कौशल का अभाव भी माना जाता है। यह केवल  सरकारी क्षेत्र में ही नहीं बल्कि निजी क्षेत्र में भी है और जो लोग निजीकरण की वकालत कर रहे हैं उन्हें यह समझना चाहिए कि वहां भी सेठ लोग और उनके कारिंदे परंपरागत ढंग से सोचने के आदी हैंं। वह अपनी कमाई में तो दिलचस्पी लेते हैं पर बेहतर सेवाऐं देना और ग्राहकों से सच्चाई बरतने जैसी बातों पर कभी सोचना भी नहीं चाहते। वह कमाई करना चाहते हैं व्यवसाय नहीं। वह अपना पेट पालने के लिये (पता नहीं वह कितना बड़ा है जो कभी भरता ही नहीं) काम करते हैं उसमें नये प्रयोग करना उनके लिये अपना समय बरबाद करना है।<br />
टीवी चैनलों और अन्य प्रचार माध्यमों को यहां कमाई इसलिये हो रही है क्योंंकि यहां आबादी अधिक है पर पश्चिम के देशों की निजी संस्थायें तो अपने यहां कम आबादी होते हुए भी भारतीय संस्थाओं से अधिक कमातीं हैं। वैसे आबादी अधिक होते हुए भी निजी क्षेत्र ने केवल अपने पांव उतने ही फैलाये जितने से उनका काम चलता रहे।  भारत के लोगों की उपभोग रुचियों में बदलाव का श्रेय तो पश्चिमी देशों को ही जाता है। आजकल टेलीफोन कंपनियां, फिल्में,दवाई कारखाने,समाचार पत्र तथा अन्य बृहद उद्योग आबादी अधिक होने के कारण अधिक ग्राहक और सस्ते श्रम के कारण ही कमा रहे हैं।  उनकी आय का आधार व्यवसायिक कौशल कम शोषण अधिक है। यही कारण है कि भारतीय पत्रकार,अर्थशास्त्री,और व्यवसायी यहां कितना भी ढिंढोरा पीट लें विश्व स्तर पर कोई उनका सम्मान नहीं करता। चाहे वह प्रवासी हो या अप्रवासी यही आकर सम्मान पाते हैंं। इनमें से कुछ लोग तो पुरस्कार आदि का स्वयं इंतजाम कर अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाते हैं। आस्कर अवार्ड में भारतीय फिल्म शामिल होने का शोर कितना मचता है पर वहां से पिटकर लौटने पर फिर चर्चा बंद हो जाती है। कुल मिलाकर यहां शोर के सहारे ही सभी के व्यापार चल रहे हैं। </p>
<blockquote><p><strong>यह मूल पाठ इस ब्लाग <a href="http://rajlekh.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिका’</a> पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का शब्दज्ञान-पत्रिका</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:अपनी पीडा दूसरों को सुनाकर उपहास का पात्र नहीं बने]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=156</link>
<pubDate>Thu, 03 Jul 2008 01:22:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/07/03/rahims-couplets-their-stories-to-the-pain-of-others-does-not-become-a-laughing-stock/</guid>
<description><![CDATA[रहिमन निज मन की बिधा, मन ही राखो गोय
सुन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन निज मन की बिधा, मन ही राखो गोय<br />
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बांटि न लैहैं कोय </strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते है अपने मन के दुःख दर्द किसी से मत करो। लोग उसे सुनकर उपहास करेंगे। कोई भी उसे बांटने वाला नहीं मिलेगा। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>जीवन में दुख दर्द तो सभी को होता है पर जो उसे दूसरों को सुनाकर उसे हल्का करने का प्रयास करते हैं उन्हें समाज में उपहास का पात्र बनना पड़ता है। अब तो वैसे भी लोगों की पीड़ाएं इतनी हो गयीं हैं कि कोई किसी की पीड़ा क्या सुनेगा? सब अपनी कह रहे हैं पर कोई किसी की सुनता नहीं है। अमीर हो या गरीब सब अपने तनाव से जूझ रहे हैं। ऐसे में बस सबके पास हंसने का बस एक ही रास्ता है वह यह कि दूसरा अपनी पीड़ा कहे तो दिल को संतोष हो कि कोई अन्य व्यक्ति भी दुखी है। उसकी पीड़ा का मजाक उड़ाओ ‘‘देख हम भी झेल रहे हैं पर भला किसी से कह रहे हैं‘।</p>
<p>कई चालाक लोग अपने दुख को कहते नहीं है पर अपनी पीड़ा को हल्का करने के लिये दूसरों की पीड़ा को सबके सामने सुनाकर उसे निशाना बनाते हैं। ऐसे लोगों को अपनी थोड़ी पीड़ा बताना भी मूर्खता है। वह सार्वजनिक रूप से उसकी चर्चा कर उपहास बनाते है। ऐसे में अपना दर्द कम होने की बजाय बढ़ और जाता है। अपने दुःख दर्द जब हमें खुद ही झेलने हैं तब दूसरों को वह बताकर क्या मिलने वाला है? जब हमारे दर्द को कोई इलाज करने वाला नहीं है उसकी दवा हमें ढूंढनी है तो फिर क्योंकर उसे सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाएं। उसका हल हो न हो पर लोग पूछते फिरेंगे-‘‘क्या हुआ उसका?’’</p>
<p>हम अपनी उस पीड़ा को भूल गये हों पर लोग उसे याद कर बढ़ा देते हैं। ऐसे में कुछ अन्य विषय पर सोच रहे हों तो उससे ध्यान हटकर अपनी उसी समस्या की तरफ चला जाता है। बेहतर है अपने दर्द अपने मन में रखें।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी: किसी खेत में प्रेम की फसल नहीं होती]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=147</link>
<pubDate>Sun, 22 Jun 2008 02:49:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/06/22/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%96%e0%a5%87%e0%a4%a4-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82/</guid>
<description><![CDATA[
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट विकाय
र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट विकाय<br />
राजा परजा जो रुचे, शीश देय ले जाय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि  न किसी बाजार में यह मिलता है। जिसे प्रेम पाना है उसे अपने अंदर त्याग की भावना रखनी चाहिए और इसमें प्राणोत्सर्ग करने को भी तैयार रहना चाहिए।</p>
<p><strong>यह तो घर है प्रेम का, ऊंचा अधिक इकंत<br />
शीश काटि पग तर धरै, तब पैठ कोई संत</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम का घर तो ऊंचे स्थान और एकांत में स्थित होता है जब कोई इसमें त्याग की भावना रखता है तभी वहां तक कोई पहुंच सकता है। ऐसा तो कोई संत ही हो सकता है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>लोग कहते हैं कि ‘अमुक से प्रेम करते हैं’ या ‘अमुक हमसे प्रेम करता है’। यह वास्तव में बहुत बड़ा भ्रम हैं। सच देखा जाये तो अपने जिनके साथ हमारे स्वार्थों के संबंध हैं उनसे हमारा प्रेम तो केवल दिखावा है। प्रेम न तो किसी को दिखाने की चीज है न बताने की। वह तो एकांत में अनुभव करने वाली चीज है। ध्यान लगाकर उस परमपिता परमात्मा का स्मरण करें तब इस बात का आभास होगा कि वास्तव में उसने प्रेम के वशीभूत होकर ही यह हमें मानव जीवन दिया है। उसका हमारे प्रति निष्काम प्रेमभाव है जो हमारे जीवन का रास्ता सहज बनाये देता है। जब हम इसी निष्काम भाव से उसका स्मरण करेंगे तब पता लगेगा कि वास्तव में प्रेम क्या है? जो लोग एक दूसरे के प्रति प्रेमभाव का दिखावा करते हैं व न केवल स्वयं भ्रमित होते है बल्कि दूसरे को भी भ्रमित करते हैं। अतःऐसे लोगों की बातों में नहीं आना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनु स्मृतिःपर्वों पर मंदिरों में अवश्य जाना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=126</link>
<pubDate>Fri, 18 Apr 2008 05:04:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/04/18/%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a5%81-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%83%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a6/</guid>
<description><![CDATA[दैवतान्यभिगच्छेत्तु धार्मिकांश्च द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">दैवतान्यभिगच्छेत्तु धार्मिकांश्च द्विजोत्तमान्<br />
ईश्वरं चैव रक्षार्थ गुरूदेव च पर्वसु</span></strong></p>
<p><span style="color:#003300;">अपनी रक्षा तथा कल्याण के लिये अमावस्या तथा पूर्णिमा जैसे पर्वों पर देवताओं, धार्मिक पुरुषों तथा श्रेष्ठ अध्यात्मिक विद्वानों तथा भगवान के घर अवश्य जाना चाहिए। </span></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">मैत्रं प्रसाधनं स्नानं दन्तधावनञ्जनम्<br />
पूर्वान्ह एवं कुर्वीत देवतानां च पूजनम्</span></strong></p>
<p><span style="color:#003300;">दिन के प्रथम पहर में ही अपने मल-मूत्र का त्याग, दंत मंजन, स्नान, आंखें में अंजन लगाना तथा पूजन आदि कर्म करने चाहिए।</span></p>
<p><span style="color:#003300;"><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>हमारे यहां अनेक पर्व मनाये जाते हैं जिनका मुख्य उद्देश्य लोगों को आपस में मेलमिलाप करना होता है। जबकि लोग इसको केवल अपने उल्लास मनाने का समय मानते हैं। यह क्षणिक उल्लास केवल पकवान खाने या फटाखे जलाने से प्राप्त नहीं होता न ही अपने कथित गुरूओं के आश्रम पर पिकनिक मनाने ने प्राप्त होता है। जब ऐसा कोई पर्व का दिन हो तो उस दिन सच्चे संतों की संगत करना चाहिए। यह जरूरी नहीं है कि साधु संत कोई गेहुंए रंग के वस्त्र धारण किये हो। हमारी मित्र मंडली या आसपास ऐसे भक्त होते हैं जो वास्तव में गृहस्थ का जीवन व्यतीत करते हैं ऐसे लोगों के पास जाना चाहिए। इसके अलावा मंदिर आदि भी जाना चाहिए। यह सच है कि वहां पत्थर या लकड़ी  की मूर्ति होती है और परमात्मा का निवास तो हमारे मन में है पर चक्षुओं वह इंद्रिय है जिससे हम उसका स्वरूप ग्रहण कर ध्यान लगाते हैं। दरअसल मूर्ति पर जब हमारा ध्यान जाता है तो वह दुनियांवी विचारों से प्रथक होकर नवीनता का भाव ग्रहण करता है। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">कुछ लोग कहते हैं कि मूर्तियों की पूजा से क्या होता है हम तो मन में ही ध्यान कर लेते हैं। यह एक छलावा है। हमारा मन तो आंख से देखी, कान से सुनी, कान से सूंधी और हाथ से स्पर्श की गयी वस्तुओं में ही भटकता है। ऐसे मे अगर हमने अपने चक्षुओं से परमात्मा का स्वरूप ग्रहण किया तो मन में पवित्रता का भाव आता है। हमारे अध्यात्म मनीषियों को आज भी कोई चुनौती नहीं देता और अगर उन्होंने मूर्तिपूजा को बनाया है तो इसलिये कि उन्होंने मनुष्य मन की प्रभुता और उसकी कमजोरियों को समझा है। कुछ लोग मूर्तिपूजकों में तमाम दोष देखते हैं-अमुक आदमी तो ढोंगी है बस मूर्तियां पूजता है और मूर्ति में क्या रखा है-आदि बातें कहते हैं। ऐसे लोग अपने अंदर दोष देखें तो हजार दोष उनमें दिखाई देंगे। आकर्षक होटल देखकर उसमें खाना खाने जायेंगे। पार्कों में जाकर हवा खाते हुए महत्वहीन बातें करेंगे। कहीं अपने  लोगों के तो कहीं आकर्षक पत्थर और लोहे की  इमारतों के फोटो खीचेंगे और सबको दिखाएंगे। उनमें उनको सार्थकता दिखाई देती है पर मूर्तिपूजा में हजारों दोष दिखाई देते हैं। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">देश में कई लोग मंदिरों में जाते हैं। कहते हैं अभ्यास करने से मूर्ख भी विद्वान हो जाता है उसी तरह जो निरंतर मंदिर जाते हैं उनके मन में शांति और भक्ति का भाव तो आ ही जाता है। जो लोग मंदिर नहीं जाते े वह इस बात को नहीं समझ सकते। हां यह मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि मूर्ति का स्वरूप अपने ध्यान में रखकर अंततः निराकार की तरफ जाना चाहिए न कि वहीं अपना  ध्यान टिकाए रखना चाहिए। वह भक्ति का चरम तो है ही अनेक प्रकार का ज्ञान स्वतः हमारे मस्तिष्क में आने लगता है।<br />
</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वही कहलाता है असली सम्मान-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=115</link>
<pubDate>Fri, 21 Mar 2008 17:38:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/03/21/vahe-kahlata-hai-asli-samman-haasy-kavita/</guid>
<description><![CDATA[अपने सीने में दर्द छिपाये हर समय
इधर-उ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>अपने सीने में दर्द छिपाये हर समय<br />
इधर-उधर ढूँढता है खुशी हमेशा इंसान<br />
कही जश्न के लिए पीता है  शराब<br />
ताकत के लिए खाता  कबाब<br />
ढेर सारे पैसे से बनता नवाब<br />
पर अकेले में होता है<br />
अपने कर्मों  से ही होता  परेशान  </p>
<p>इन्तजार करता है त्योहारों का<br />
कुछ मिलने के व्यवहारों का<br />
जिंदा रहने के लिए ढूँढता है सम्मान<br />
मुर्दा दिलों में कहलाता है महान<br />
सिद्धि के लिए करता है यत्न<br />
प्रसिद्धि के मनाता है जश्न<br />
अपने से  भागता रहता है इंसान </p>
<p>सीख लो हर पल जीना<br />
सत्कर्मों को नशे की तरह पीना<br />
कुछ मिलने से मजा अधिक देर नहीं आता<br />
देने से किसी को नाम आगे जाता<br />
गले में हार पड़ने से<br />
पीठ पर चाल डालने से<br />
मिलता है थोडी देर का सम्मान<br />
अपने बोलों में भर दो रस<br />
अपने जिए पलों का बांटो ज्ञान<br />
रचनाओं में भाव भरो शब्दों को कस<br />
पाने वाले हाथों को कौन पूजता है<br />
देने वाला ही खुशी भी लूटता है<br />
जीते जी और सामने तो सब पूजते हैं<br />
मरने या पीठ पीछे हो<br />
वही कहलाता है असली सम्मान<br />
-----------------------------------------</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति-जरूरत हो तो दिखावा भी करें ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=101</link>
<pubDate>Sat, 08 Mar 2008 04:41:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/03/08/chanakya-nitijaruri-ho-to-dikhavaa-bhi-karen/</guid>
<description><![CDATA[
सर्प के मुख में विष न हो तो भी वह अपना फ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<li>
<blockquote><p><strong><code>सर्प के मुख में विष न हो तो भी वह अपना फन फैला देता है, जिससे अन्य जीव डरकर पीछे हट जाते हैं। अगर वह  ऐसा न करे तो कोई भी उसे मार डालेगा। इसलिए अपने आप को शक्तिशाली  प्रदर्शित  करना भी जरूरी है।</code></strong></p></blockquote>
<p><strong>आज के संदर्भों में व्याख्या-</strong>चाणक्य के इस कथन का आशय यह है की हमें सांसरिक जीवन में कई बार दिखावे की आवश्यकता होती है क्योंकि यहाँ लोगों में देवत्व और राक्षसत्व दोनों का ही भाव  होता है। हमारे साथ अच्छे और बुरे लोगों का संपर्क होता है पर किसके दिल में क्या है यह पता नहीं लगता। ऐसे में थोडी चतुराई जरूरी है। हमें अपनी कमजोरी किसी को नहीं बताना चाहिए और और अनावश्यक रूप से अधिक विनम्रता का भाव दिखाने से लोग कमजोर समझने लगते हैं। कभी किसी से वाद-विवाद हो तो अपने क्रोध और विवेक शक्ति का पूरा उपयोग करना चाहिए और ऐसा प्रदर्शित करना चाहिए कि हम शक्तिशाली हैं। </p>
<p>धन दौलत तो किस्मत का खेल है पर अगर जरूरी न हो तो अपनी आर्थिक तंगी का जिक्र  सबके सामने नहीं करना चाहिऐ। कई बार तो ऐसे दिखाना चाहिए कि  हमारे पास भी पर्याप्त मात्रा में  धन है। समाज में धनवान का सम्मान होता है पर गरीब को समाज कुछ देता भी नहीं है। अगर पर्याप्त मात्रा में धन नहीं है तो परिवार और उसका मुखिया ही उसका सामना करता है। अगर अनावश्यक रूप से दूसरों के सामने अपनी दरिद्रता का प्रदर्शन करेंगे तो अपना और अपने परिवार का सम्मान समाज में काम होगा। इसका अर्थ यह भी कदापि नहीं है कि इस दिखावे के  लिए हम अनाप-शनाप खर्च करें। अगर कोई दिखावे की वस्तु हम नहीं खरीद सकते तो हमें उसके प्रति लोगों के सामने नापसंदगी का भाव दिखाना चाहिऐ- भले ही यह उसी  तरह हो जैसे लोमडी अंगूर न मिलने पर कहती हैं कि खट्टे हैं। ऐसे दिखावे करना जरूरी हैं पर इसमें अनावश्यक प्रदर्शन से बचना चाहिए। </li>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर नीति:विद्या सज्जन पुरुष की शक्ति होती है ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2008/02/15/vidur-neetividhyaa-sajjan-purush-kee-shakti-hotee-hai/</link>
<pubDate>Fri, 15 Feb 2008 04:13:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/02/15/vidur-neetividhyaa-sajjan-purush-kee-shakti-hotee-hai/</guid>
<description><![CDATA[१. विद्या का मद, धन का मद और तीसरा ऊंची क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१. विद्या का मद, धन का मद और तीसरा ऊंची कुल का मद है. यह घमंडी पुरुषों के लिए मद हैं परन्तु सज्जन पुरुषों के लिए दम के साधन हैं.<br />
२.मनस्वी पुरुषों को सहारा देने वाले संत है, संतों के भी सहारे संत ही हैं. दुष्टों को सहारा देने वाले संत हैं, पर दुष्ट लोग संतों को सहारा नहीं देते.<br />
३.अच्छे वस्त्र वाला सभा को जीतता है, जिसके पास गाय है वह मीठे स्वाद की आकांक्षा को जीत लेता है, सवारी से चलने वाला मार्ग को जीत लेता है और शीलवान पुरुष सब पर विजय पा लेता है.<br />
४.पुरुष शील में ही प्रधान है जिसका वही नष्ट हो जाता है, इस संसार में उसका जीवन, धन और बंधुओं से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता. </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पापा ब्लोगर नंबर वन के लिए वोट  मांग रहे -हास्य कविता]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2008/01/24/papa-nanbar-van-ke-liye-vot-maang-rhe/</link>
<pubDate>Thu, 24 Jan 2008 15:11:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/01/24/papa-nanbar-van-ke-liye-vot-maang-rhe/</guid>
<description><![CDATA[स्कूल से छुट्टी मिलते ही बालक पहुंचा
इ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>स्कूल से छुट्टी मिलते ही बालक पहुंचा<br />
इंडिया आईडियल के शहर के कार्यक्रम  में<br />
कंधे पर लटकाए बस्ता<br />
आयोजकों ने पूछा<br />
''अकेले आये हो<br />
चले जाओ  यहाँ से<br />
माँ-बाप को साथ नहीं लाये </p>
<p>बालक बोला<br />
''क्या करता<br />
पापा तो ब्लोगर नंबर वन के लिए<br />
कंप्यूटर चलाते हुए इंटरनेट पर<br />
वोट मांगने वाली पोस्ट चाप (छाप) रहे<br />
अगले साल मम्मी को भी टॉप पर<br />
 लाने के लिए ब्लोग बनवा रहे<br />
दोनों ही यूनिवर्सिटी के टोपर हैं<br />
इसलिए दोनों होड़ लगा रहे<br />
आप मुझे क्यों यहाँ से भगा रहे<br />
वोट मांगना आज पापा से ही सीख आया<br />
आप क्यों घबडा रहे<br />
मुझे पापा ने नंबर वन के लिए सारे दाव सिखाये<br />
----------------------------------------<br />
<strong><br />
नोट-यह एक काल्पनिक हास्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई लेना-देना नहीं है, अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो उसकी ही जिम्मेदारी है. </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:शांत व्यक्ति को दुर्बल न समझें ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2008/01/23/chankya-neetishant-vyakti-ko-durbal-na-samjhen/</link>
<pubDate>Wed, 23 Jan 2008 03:47:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/01/23/chankya-neetishant-vyakti-ko-durbal-na-samjhen/</guid>
<description><![CDATA[
१.युवावस्था में काम-क्रोध हावी होते ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>
१.युवावस्था में काम-क्रोध हावी होते हैं, इसी कारण व्यक्ति की विवेक शक्ति निष्क्रिय हो जाती है। काम वासना से व्यक्ति को कुछ नहीं सूझता। काम-क्रोध व्यक्ति को अँधा कर देता है।</p>
<p>२.वैद के ज्ञान की गहराई को न समझकर उनकी निंदा करने वाले उनमें वर्णित सच्चाई और महानता को कम नहीं कर सकते। शास्त्र निहित आचार व्यवहार को व्यर्थ बताने वाले अल्पज्ञ लोग शास्त्रों के उपयोगिता को नष्ट नहीं कर सकते। </p>
<p>३.शांत, सज्जन व्यक्ति को दुर्बल कहने वाले दुर्जनों का प्रयास भी निरर्थक हो जाता है। किसी की निंदा कराने वाले का अपना ही नाश होता है। </p>
<p>४.कामवासना से रहित व्यक्ति रोग रहित नहीं रह सकता है, कामंधता भी अपने आप में एक रोग है। </p>
<p>५.अधिक मोह भी मनुष्य को कमजोर बना देता है। ममता अच्छा गुण है पर मोह बुरा है। बुद्धि पूर्वक प्रेम करना अच्छा है, मोह तो अज्ञानता के कारण होता है। क्रोध की आग में क्रोधी व्यक्ति ही भस्म होता है। </p>
<p>६.आत्मज्ञान से बढ़कर इस संसार में कोई दूसरा सुख नहीं। सत्य के ज्ञान से मनुष्य अज्ञानता द्वारा पैदा हुए कष्ट से बच सकता है।<br />
७.यदि गंदे स्थान पर सोना पडा है उसे उठाने में गुरेज नहीं करना नहीं चाहिए, क्योंकि वह कीमती हैं। यदि विद्या निम्न कोटि के व्यक्ति से भी सीखना पडे तो संकोच नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह उपयोगी होती है। यदि विष से अमृत मिलता है जरूर प्राप्त करना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चजई-चिट्ठा जगत ने दी इस ब्लोग को स्थाई सुरक्षा-हास्य आलेख ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2008/01/22/is-blog-ka-sthai-surksha/</link>
<pubDate>Tue, 22 Jan 2008 16:36:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/01/22/is-blog-ka-sthai-surksha/</guid>
<description><![CDATA[ चलो अपना यह ब्लोग http://rajdpk.wordpress.com अब फिर सं]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> चलो अपना यह ब्लोग http://rajdpk.wordpress.com अब फिर संकट में अब नहीं आयेगा. आज  चिट्ठा जगत वालों ने हमें एक ईमेल भेजा कि  अपने-अपने चिट्ठे छांट लो और उन्हें पढो. हमें बड़ी तसल्ली हुई, अब ख़तरा टल  गया. यह काम अपने सलाहकारों से मिलकर पहले ही कर लेना चाहिए था. हमारा ब्लोग गलती से उनके पास चला गया. वैसे चिट्ठाजगत वाले भी हमारा ब्लोग नहीं पढ़ते होंगे. नहीं तो अपने सलाहकारों से कुछ अधिक रेटिंग जरूर दिला देते. उन्होने अपने इस बदलाव में  दो लोगों के नाम लिए हैं उनमें से एक को मैं  जानता हूँ उनमें एक नारद के कर्णधार हैं  और मैंने उनके हाल ही में एक आलेख पढा था उसमें उन्होने कुछ ऐसी टिप्पणियाँ की थी जो...................अब चिट्ठाजगत वाले ही बता सकते हैं. किसके कहने पर किया है भईया  यह परिवर्तन  ज़रा चेक कर लेना क्योंकि हम नारद के इन कर्णधार को बहुत मानते हैं. अगर उन्होने सलाह दी है तो अच्छी बात है. हम इस हिन्दी ब्लोग में उन्हें सबसे अधिक तकनीकी जानकारी रखने वाले मानते हैं. </p>
<p>यह नारद के कर्णधार भले और सहृदय है. अगर उन्होने सलाह दी है तो ठीक ही दी होगी. सोचा होगा कि यह दीपक भारतदीप १२ ब्लोग बनाए बैठा है और गलती से इसके ब्लोग कहीं भी चले जाते हैं, और पिटकर लौट आते हैं और फिर यह शोर मचाता है और हास्य कविताओं की बौछार करता है जिससे कुछ  ब्लोगरों को एलर्जी है. जहाँ तक मेरी जानकारी है उनके आलेख में मुझे कोई ऐसी बात नहीं लगी थी कि वह इस तरह की दीवार उठाने की बात कर रहे हों वह तो लिख रहे थे कि  अपनी मनपसंद ब्लोगरों को भी ऐसे ही पढा जा सकता है. इस बदलाव के उन्होने कोई वकालत नहीं की थी, हो सकता है कि हमें ''तकनीकी ज्ञान' कुछ कम है और   हमारे समझ में नहीं आया हो. </p>
<p>वैसे चिट्ठाजगत वाले अपनी मर्जी के मालिक हैं. पर  हम उनको याद दिला दें कि  हम उन अपने सहृदय मित्र के ब्लोग पर कमेन्ट भी लगा कर आये थे कि ''तकनीकी ज्ञान होने से सींग नहीं लग जाते और वह भी प्रमाणित होना बाकी है'. मुझे नहीं लगता कि यह उनकी सलाह के अनुसार है. तुम्हारे कोई और सलाहकार हों तो  वह आप जानो. यह आपका परिवर्तन उन्हीं के काम का  हो सकता है. कम से कम एक बात है कि वह हमारे ब्लोग पर दृष्टिपात नहीं करेंगे और हम भी मनचाहे लिख सकेंगे. सम्मान-फम्मान गया तेल लेने.वैसे भी जो चिट्ठे  जो ब्लोग मेरे  प्रिय मित्रों के हैं उनको लिंक करने की सुविधा सभी वेब साईटों ने यह जानते हुए कि यह भारत का सबसे तेज होने के साथ तकनीकी और व्यवसायिक  दृष्टि से संपन्न ब्लोगर हैं मुझे ब्लोगों पर उपलब्ध करा  दी थी और मैं इनका इस्तेमाल अपने और अपने पाठकों के लिए कर ही रहा हूँ मेरे सामान्य मित्र भी इन ब्लोगरों को पढ़ते हैं और उनको सराहते हैं, आपकी यह सुविधा उन ब्लोगरों के लिए ठीक है जिनको वेब साईटों ने यह सुविधा अपने ब्लोग पर नहीं दी है.इसलिए हमें सभी फोरम पर जाते रहते हैं. अलबता चिट्ठजगत पर आकर कुछ असुविधा होती है पर क्या कर सकते हैं?  हमें तो यहाँ कोई किसी ब्लोग पर कूडा नहीं लगता. हम तो सबको पढेंगे और अपने लिए लिखने के लिए सामग्री तलाशेंगे.<br />
जब से हमारे एक  व्यंग्यकार ब्लोगर  मित्र ने हमें भारत का सबसे तेज ब्लोगर की उपाधि और अधिक पढ़ने लगे हैं ताकि वह और अच्छा लिखें और वह इस पदवी को वापस न ले सके. चाणक्य महाराज भी कह गए हैं कि कूड़े में भी  अगर सोना मिल जाये तो उठा लेना चाहिए. हमारा दुर्भाग्य यही रहा है कि हमें सोना भी वहीं मिलता है विषय के रूप में. आप यह ताज्जुब करेंगे हमें ढेर सारा व्यंग्य का विषय (जो हमारे लिए सोना है) वहीं से मिल रहा है जहाँ से  हमारा मजाक उडाया गया   था. </p>
<p>हमारी और चिट्ठाजगत की बात बननी नहीं है. अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार साहित्य की कहानी, व्यंग्य और कविता  की श्रेणी बननी नहीं है और अंग्रेजी पैटर्न पर ही इस फोरम को चलना है तो फिर हमें क्या? बस एक काम कर देना कि अपने सलाहकारों को मेरे ब्लोग की सूची  जरूर देना  कि उनसे दूर रहें. उनके लेखन और तकनीकी दोनों प्रकार के ज्ञान पर मुझे संशय है. मेरे ब्लोगों का बोझ आपका फोरम तो उठा सकता है पर उसके  सलाहकार नहीं उठा सकते. हालांकि इसे संचालक भले हैं पर उनको आगे बढ़ना है तो अन्य लोगों की सलाह भी लेना चाहिए. इनके यह परिवर्तन   सामान्य और नये और ब्लोग लेखकों के लिए किसी काम के नहीं हैं और अपने  निजी स्वार्थी  तत्व अब अपने लिए इसका इस्तेमाल कर कुछ और करना चाहते हैं? आप जानना चाहेंगे कि मैंने यह आलेख क्यों लिखा? एक लेखक के रूप में यह बताने के लिए कि इस ब्लोग जगत में में रेटिंग मांगने नहीं पाठक ढूँढने आया हूँ और हर बात पर मेरी दृष्टि रहती है और अपने अपमान को भूला नहीं हूँ औसत से नीचे के ब्लोगर मेरे ब्लोग का मूल्यांकन करने बैठे और उसका प्रचार करें यह कैसे सहन कर सकता था. फिर भी चिट्ठजगत वालों को मेरी शुभकामनाएं. अब मेरे ब्लोग इधर-उधर नहीं जा पायेंगे.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इस ब्लोग के बारे में भ्रामक प्रचार  से सावधान रहें ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2008/01/20/is-blog-ke-bare-men-bhramak-prachaar-se-savdhan-rhen/</link>
<pubDate>Sun, 20 Jan 2008 15:05:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/01/20/is-blog-ke-bare-men-bhramak-prachaar-se-savdhan-rhen/</guid>
<description><![CDATA[इस ब्लोगhttp://rajdpk.wordpress.com के समस्त पाठकों को ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इस ब्लोगhttp://rajdpk.wordpress.com के समस्त पाठकों को सूचित किया जाता है की कतिपय लोग किन्हीं लोगों  तथाकथित रूप से सम्मान देने के नाम पर इसकी रेटिंग १० अंक में से पांच प्रदर्शित कर रहे है। इस सबंध में समस्त पाठकों को सूचित किया जाता  है कि इस ब्लोग के संबंध में किसी भी अन्य व्यक्ति या संस्था के समक्ष यह ब्लोग  इसके लेखक एवं संपादक द्वारा नहीं प्रस्तुत किया गया। इस ब्लोग के लेखक संपादक के ११ अन्य ब्लोग भी हैं जिन पर इससे अधिक लिखा गया है। कुछ मित्रों ने मुझे इस संबंध में अपनी निराशाजनक भावनाओं से अवगत कराया उन्हें सूचित किया जाता है कि वह किसी भ्रामक प्रचार से बचें। लेखक संपादक का उद्देश्य बिना किसी प्रयोजन के लिखने के अलावा और कुछ नहीं है, और कतिपय लोग या संस्थाएं  यह कर रहे हैं तो उनके अपने  निहित स्वार्थ हैं और उनसे हमारा कोई लेना-देना  नहीं है। समय  आने पर उनके बारे में भी विचार  व्यक्त  किये    जायेंगे।</p>
<p> अन्य सभी सहृदय ब्लोग लेखकों से निवेदन है कि विजेताओं को बधाई देते समय इस ब्लोग का उल्लेख न करें क्योंकि इसमें ऐसी धार्मिक सामग्री भी है जो पठनीय है और उनका मूल्यांकन असंभव है और कुछ लोगों को इससे मानसिक संताप भी हो सकता है। साथ ही निवेदन है कि किसी भी विजेता या निर्णायक के बारे में इस ब्लोग को लेकर कोई प्रतिकूल टिप्पणी भी न करें क्योंकि लेखक एवं संपादक का मानना है कि ऐसा  विवाद मन को कलुषित करता है जो हमारे लिखने-पढ़ने के उद्देश्य के विपरीत है। यह सूचना अपने सहृदय साथी ब्लोगर और पाठको की चिंता को देखते हुए जारी की गयी है. अगर कोई सहृदय ब्लोग इस बारे में त्रुटी से छापता है तो उस पर आप को प्रतिकूल टिपण्णी न करें. उन्हें बडे विनम्रता के साथ लेखक व संपादक द्वारा सूचित किया जायेगा.<br />
मेरे अन्य ब्लोग<br />
http://dpkraj.blogspot.com<br />
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दीपक भारतदीप </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -विद्यालय ने बोर्ड बदला ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/26/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%af-%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a1-%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Wed, 26 Sep 2007 16:23:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[विद्यालय के प्रबंधन ने
छात्रो की भर्त]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>विद्यालय के प्रबंधन ने<br />
छात्रो की भर्ती बढाने के लिए<br />
अपने प्रचार के पर्चों में<br />
शिक्षा के अलावा अन्य गतिविधियों में<br />
संगीत, गायन, नृत्य और अभिनय में<br />
इस तरह प्रशिक्षण देने का<br />
दावा किया गया  कि<br />
बच्चा इंडियन आइडियल प्रतियोगिता में<br />
नंबर वन पर आ जाये<br />
ट्वंटी ओवर में विश्व कप मे देश जीता<br />
मिटा कर लिखा गया अन्य गतिविधियों में<br />
यहाँ ट्वंटी ओवर क्रिकेट सिखाने की<br />
विशेष सुविधा उपलब्ध है<br />
जिसमे सिक्स लगाने का<br />
जमकर अभ्यास कराया जाता है<br />
जिससे खिलाड़ी सिक्स सिक्सर<br />
लगाने वाला बन जाये<br />
---------------------</p>
]]></content:encoded>
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