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	<title>नीरज-त्रिपाठी &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/नीरज-त्रिपाठी/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "नीरज-त्रिपाठी"</description>
	<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 15:15:01 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[एक और विस्फोट ]]></title>
<link>http://neeraj1.wordpress.com/?p=34</link>
<pubDate>Wed, 14 May 2008 18:30:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>नीरज त्रिपाठी</dc:creator>
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<description><![CDATA[लाल है अब शहर था कल तक गुलाबी
मिट गया सि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>लाल है अब शहर था कल तक गुलाबी<br />
मिट गया सिंदूर हाथ मेंहदी है अभी भी<br />
राख है वो आज मासूमियत उसकी हँसी<br />
सुलगेगी बस अब जिंदगी भर जिंदगी<br />
वो जहाँ जब भी जो चाहेंगे करेंगे<br />
हम नपुंसक थे नपुंसक हैं नपुंसक ही रहेंगे<br />
था लगा मन में वो कुछ सपने संजोने<br />
था क्या पता हैं पापियों के हम खिलौने<br />
बम  फटे   और   साथ में  अरमान  उसके<br />
बहन खोयी भाई खोये खोये हैं बेटे किसी ने<br />
कैसे  मरे  कितने मरे दो चार दिन चर्चा करेंगे<br />
हम  नपुंसक  थे  नपुंसक  हैं  नपुंसक  ही  रहेंगे</p>
<p>शर्ट  के  टुकड़े  मिले  हैं  लाल  गायब<br />
लाश  भी  मिलती  नही  कुछ  को  चहेतों की<br />
सरकार  ने तो कर  दिया  है  काम  अपना<br />
एक  कमेटी   थोड़ा   शोक  थोड़ा   पैसा<br />
ये धमाके कल हुए थे आज भी और कल भी होंगे<br />
हम  नपुंसक  थे  नपुंसक  हैं  नपुंसक  ही  रहेंगे</p>
<p>नीरज त्रिपाठी</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[प्यार व्यार]]></title>
<link>http://neeraj1.wordpress.com/?p=30</link>
<pubDate>Wed, 16 Apr 2008 17:55:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>नीरज त्रिपाठी</dc:creator>
<guid>http://neeraj1.wordpress.com/?p=30</guid>
<description><![CDATA[ 
सोचा जब सब लेते हैं तो हम भी मजा लेंगे
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> </p>
<p>सोचा जब सब लेते हैं तो हम भी मजा लेंगे<br />
भोलू बनकर कब तक जीवन यापन करेंगे</p>
<p>सुनहरा मौसम तिथि एकादशी कार्तिक मास<br />
कर दी शुरू हमने अपने प्यार की तलाश</p>
<p>आंखों में आंखें हाथ हाथों में<br />
कट रहे थे दिन मीठी मीठी बातों में</p>
<p>हम सिनेमा नहीं देखते थे वो बोलीं देखेंगे<br />
हमने सोचा चार दिन की जिंदगी है मजे लेंगे</p>
<p>फिर तो<br />
पिज्जा बर्गर स्लो फ़ूड फास्ट फ़ूड सब कुछ खाया<br />
उधर पिता श्री सोचते लड़के का मनी आर्डर नहीं आया</p>
<p>उसने खायीं कसमें हमने कुछ वादे किए<br />
यहाँ तक कि बच्चों के नाम तक सोच लिए</p>
<p>तभी बच्चों के नाना जी ने तबाही मचा दी<br />
किसी और महापुरुष से तय की अंजली की शादी</p>
<p>मैंने सोचा अंजली रोएगी उसने ठहाका लगाया<br />
बोली अरे वाह इतना अच्छा रिश्ता मेरे लिए आया</p>
<p>बच्चों की माँ तो बच्चों के नाना जी से भी तेज निकली<br />
अच्छा रिश्ता देख आइस क्रीम की तरह पिघली</p>
<p>ये पाँच साल पुरानी बात है<br />
आज अंजली उस  महापुरुष के दो बच्चों कि माँ है<br />
और हम अब भी ढूंढ रहे हैं<br />
हमारे होने वाले बच्चों की मम्मी कहाँ हैं</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पति या कुत्ता]]></title>
<link>http://neeraj1.wordpress.com/?p=28</link>
<pubDate>Fri, 11 Apr 2008 12:34:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>नीरज त्रिपाठी</dc:creator>
<guid>http://neeraj1.wordpress.com/?p=28</guid>
<description><![CDATA[पति या कुत्ता
नीरज त्रिपाठी

उस दिन शर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#993300;"><strong>पति या कुत्ता</strong></span><br />
नीरज त्रिपाठी
<p>
उस दिन शर्मा जी जब घर लौटे तो उन्होने देखा कि पूरे घर में सजावट थी और बड़ा सा केक भी रखा था, शर्मा जी के कुछ सोचने से पहले ही उनकी पत्नी नीलू जी ने अचानक प्रकट होते हुए कहा ‘...सरप्राइज।’ शर्मा जी ने सोचा कि उन्हें अपना जन्मदिन याद नहीं लेकिन नीलू को याद है। इससे पहले कि उनकी आंखों से निकले आंसू फर्श पर बिछे कालीन को गीला करते नीलू जी बोलीं, ‘पता है आज जोजो का जन्मदिन है,जोजो नीलू जी का लाड़्ला कुत्ता।’</p>
<p>शर्मा जी को तो जैसे किसी ने बीसवीं मन्जिल से धक्का दे दिया हो, क्योंकि उन्हें अब याद आ चुका था कि उनका जन्मदिन पिछले महीने था और वो वैसे ही निकल गया था, जैसे सरकारी दफ्तर में मेज के नीचे से काला धन जिसका किसी को पता नहीं चलता कि कब कहां से आया और कहां गया। शर्मा जी भले ही जोजो के जन्मदिन की तैयारियों से अनभिज्ञ हों उनके क्रेडिट कार्ड ने नीलू जी का भरपूर सहयोग किया।</p>
<p>शर्मा जी अब अपने आंगन में बच्चों की किलकारियां सुनना चाहते थे लेकिन नीलू जी के विचार इस मामले में (और मामलों की तरह) शर्मा जी से अलग थे, वो कहतीं,<br />
‘अगर बच्चों की जिम्मेदारी हम पर आएगी तो हम जोजो का ध्यान अच्छे से नहीं रख<br />
पाएंगे।‘ शर्मा जी भविष्य के बारे में सोचकर सिहर जाते, जब उनके मित्र अपने बच्चों की पापा पापा की आवाज सुनकर हर्षाएंगे और शर्मा जी को जोजो की पीं पीं पीं पीं सुनकर सन्तोष करना पड़ेगा।</p>
<p>शर्मा जी अगर भूल से जोजो को कुत्ता कह देते तो उनकी सजा थी तब तक जोजो से सॉरी बोलते रहना जब तक वो उन्हें माफ करके खुशी से अपनी पूंछ न हिला दे। शर्मा जी पर जोजो ने जो जो  सितम ढाए, शर्मा जी सब सहते गए। नीलू जी जब शर्मा जी से नाराज होतीं तो उन्हें कोसतीं कि मेरे साथ रहते रहते जोजो की पूंछ सीधी हो गयी लेकिन तुम कभी नहीं सुधरोगे।</p>
<p>जब नीलू जी जोजो के साथ चलतीं तो लोग कहते कितना भाग्यशाली कुत्ता है, और जब वो शर्मा जी के साथ चलतीं तो लोग कहते कितना अभागा पति है। कभी कभी तो शर्मा जी का ये हाल देख मोहल्ले वालों की हंसी वैसे ही फूट पड़ती जैसे खुले मेनहोल से बारिश का पानी उफना कर निकलता है।</p>
<p>एक तो मोहल्ले वालों के ताने और दूसरा नीलू जी का उनके प्रति सौतेला व्यवहार, शर्मा जी क्षुब्ध होकर बोल पड़े या तो इस घर में जोजो रहेगा या मैं! नीलू जी बोलीं कि उन्हें सोंचने के लिए थोड़ा समय चाहिए और फिर गहन विचार मन्थन के बाद उन्होंने फैसला कर लिया।</p>
<p>शर्मा जी का पति वाला रिश्ता कुत्ते पर भारी पड़ा और वो भार उठाने में नीलू जी असमर्थ थीं, नीलू जी ने जोजो को अपने पास रखने का फैसला किया।</p>
<p>शर्मा जी आजकल एक किराए के मकान में रहते हैं।</p>
<p>नीरज त्रिपाठी</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[महाराष्ट्र में नवनिर्माण]]></title>
<link>http://neeraj1.wordpress.com/2008/03/31/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a3/</link>
<pubDate>Mon, 31 Mar 2008 14:55:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>नीरज त्रिपाठी</dc:creator>
<guid>http://neeraj1.wordpress.com/2008/03/31/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a3/</guid>
<description><![CDATA[बस एक ध्येय बस एक लक्ष्य वो जहर उगलते ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बस एक ध्येय बस एक लक्ष्य वो जहर उगलते जाते हैं<br />
भावुक भोली जनता का ख़ुद को शुभचिंतक बतलाते हैं<br />
सत्ता लोलुप घडियालों का कोई ईमान नही होता<br />
नकारात्मक भावों का जग में सम्मान नहीं होता<br />
निर्दोषों की लाशों पर चढ़ नवनिर्माण नहीं होता</p>
<p>बन रहे शेर सब आज भेडिये खूनी दांत छिपाते हैं<br />
पूज्य शिवाजी को वो अपना आदर्श बताते हैं<br />
क्या इन ओछी घटनाओं से उन वीरों का अपमान नहीं होता<br />
नकारात्मक भावों का जग में सम्मान नहीं होता<br />
निर्दोषों की लाशों पर चढ़ नवनिर्माण नहीं होता</p>
<p>उजले कपडों की चमचम से वो मन का मैल छिपाते हैं<br />
सुलझे मुद्दों में आग लगा वो जनता को भड़काते हैं<br />
कपट द्वेष से कोई  यशस्वी आयुष्मान नहीं होता<br />
नकारात्मक भावों का जग में सम्मान नहीं होता<br />
निर्दोषों की लाशों पर चढ़ नवनिर्माण नहीं होता</p>
<p>फसल प्यार की काट वहाँ नफरत के बीज उगाते हैं<br />
हिंसक घटनाओं को बेशर्मी से जायज ठहराते हैं<br />
मार पीट हिंसा से कभी कहीं कोई उत्थान नहीं होता<br />
नकारात्मक भावों का जग में सम्मान नहीं होता<br />
निर्दोषों की लाशों पर चढ़ नवनिर्माण नहीं होता</p>
<p>नीरज त्रिपाठी</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नोट - नीरज त्रिपाठी]]></title>
<link>http://neeraj1.wordpress.com/?p=23</link>
<pubDate>Fri, 28 Mar 2008 23:48:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>नीरज त्रिपाठी</dc:creator>
<guid>http://neeraj1.wordpress.com/?p=23</guid>
<description><![CDATA[नोट
कुछ नोट
जिन्हें देख रिक्शे वाले,खो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b><font color="#0000ff">नोट</font></b></p>
<p>कुछ नोट<br />
जिन्हें देख रिक्शे वाले,खोमचे वाले<br />
कहते हैं<br />
बहुत बड़ा नोट है बाबू टूटे दो</p>
<p>वही नोट<br />
शराब के ठेके पर, उस विदेशी शोरूम में<br />
लगते हैं<br />
बहुत छोटे..........</p>
<p>नीरज त्रिपाठी</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मैं और तुम]]></title>
<link>http://neeraj1.wordpress.com/2008/03/23/%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%ae/</link>
<pubDate>Sun, 23 Mar 2008 12:36:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>नीरज त्रिपाठी</dc:creator>
<guid>http://neeraj1.wordpress.com/2008/03/23/%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%ae/</guid>
<description><![CDATA[उस दिन
मेरे घर से निकलते ही बंटू छींका
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>उस दिन<br />
मेरे घर से निकलते ही बंटू छींका<br />
थोड़ा आगे गया तो बिल्ली ने रास्ता काटा</p>
<p>मैं ये सब मानता न था सो चलता रहा<br />
उसी दिन मेरी तुमसे पहली मुलाक़ात हुई</p>
<p>अब मैं  कट्टर अंध विश्वासी हूँ</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हमारे पतलू भाई]]></title>
<link>http://neeraj1.wordpress.com/?p=20</link>
<pubDate>Mon, 10 Mar 2008 18:40:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>नीरज त्रिपाठी</dc:creator>
<guid>http://neeraj1.wordpress.com/?p=20</guid>
<description><![CDATA[हमारे पतलू भाई
नीरज त्रिपाठी
पतलू भाई ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#0000ff">हमारे पतलू भाई<br />
नीरज त्रिपाठी</font></p>
<p>पतलू भाई जिन्हें कुछ लोग किताबी कीड़ा कहते तो कुछ किताबें चाटने वाला दीमक। पतलू भाई थे मस्त मौला जो इन सब बातों को सुनकर वैसे ही अनसुना कर दिया करते जैसे संगीत के जानकार आजकल के फ़िल्मी गानों को। पढ़ाई और तैयारी तक तो सब ठीक रहता लेकिन परिणाम का तो जैसे छत्तीस का आँकड़ा था हमारे पतलू भाई से, कभी उनके पक्ष में आता ही नहीं था और पतलू भाई चाहें जो कर लें, जब भी परिणाम आता, तो पतलू भाई का डब्बा गोल हो जाया करता था। पतलू भाई का परिणाम एक बार फिर आया और अनुक्रमांक अख़बार में छपते-छपते रह गया जबकि इस बार तो अनुक्रमांक एक सम संख्या थी और लोकसभा मार्ग पर बैठे ज्योतिषाचार्य के तोते ने जो चिठ्ठी निकाली थी उस हिसाब से तो पतलू भाई को उत्तीर्ण हो जाना चाहिए था। इस बार तो पतलू भाई ने इतनी मेहनत की थी कि चप्पल घिस गई थी, पतलून फट गई थी।</p>
<p>अब होनी को कौन टाल सकता है, ये पाँचवी बार लगातार अनुत्तीर्ण होने वाली दुर्घटना घट ही गई। बारहवीं कक्षा की पढ़ाई कठिन है ये तो पतलू भाई ने सुना था लेकिन बारहवीं और दसवीं की पढ़ाई में इतना अंतर है इसका एहसास उन्हें आज हुआ। दसवीं में पतलू भाई ने तीसरे प्रयास में ही विजय पताका फहरा दी थी। पतलू भाई पढ़-लिखकर डाक्टर बनना चाहते थे लेकिन इस बारहवीं में अनुत्तीर्ण होने वाली घटना ने उनके डाक्टर बनने के सपने का पोस्टमार्टम कर डाला। पतलू भाई ने सुन रखा था कि असफलता निराशा का सूत्र कभी नहीं अपितु वह तो एक नई प्रेरणा है, तो इस पाँचवीं लगातार असफलता से प्रेरणा लेकर पतलू भाई ने सोचा कि बहुत हो गई पढ़ाई अब कुछ और ही किया जाए। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि अपना जीवन लेने के लिए नहीं, देने के लिए है, तो पतलू भाई भी कुछ ऐसा करना चाहते थे जिससे उन्हें संतुष्टि मिल सके और समाज को कुछ दे पाने की चाहत तो मन में हिलोरें ले ही रही थी।</p>
<p>मनन, चिंतन और गहन विचारमंथन के बाद पतलू भाई ने आख़िर सोच ही लिया की करना क्या है और बस लग गए तन-मन-धन से अपने नए कार्य में। स्वयं को समाज को समर्पित करने की ठान ली थी उन्होंने। बहुत कम समय में ही पतलू भाई महज़ पतलू भाई नहीं रहे बल्कि एक शख्स़ियत बन गए। अब पतलू भाई स्वयं तो डाक्टर नहीं बन पाए लेकिन न जाने कितने ही लोग उनकी शरण में आकर डाक्टर बन गए और अभी पतलू भाई की तुलना पारस पत्थर से की जाने लगी थी, पारस पत्थर चीज़ों को सोना बनाता था और पतलू भाई लोगों को डाक्टर। तो समाज की बीमारियाँ तो उन्होंने इतने डाक्टर बनाकर लगभग दूर कर दीं साथ ही कुछ इंजीनियर भी दे डाले।<br />
सिसरो ने कहा था जीवन में बुद्धि का नहीं लक्ष्मी का साम्राज्य है, यह बात पतलू भाई को हर्षित कर देती थी। पतलू भाई थे लक्ष्मी जी के अनन्य भक्त और ये बात जगजाहिर थी तो लोग पतलू भाई को लक्ष्मी जी के दर्शन कराते और पतलू भाई आगामी प्रतियोगी परीक्षाओं के पर्चे के। पतलू भाई किसी भी पर्चे को बहुत ही सहजता से परीक्षा से पहले ही अपने शुभचिंतकों को और उन लोगों को जो उन्हें लक्ष्मी जी के दर्शन करा सकते थे, उपलब्ध करा दिया करते थे। पतलू भाई के पर्चे जाने कहाँ से चुपके से आते और कुछ चुनिंदा लोगों को लाभान्वित कर वैसे ही निकल जाया करते थे जैसे सरकारी राशन की दुकान से चीनी। आम लोगों को न चीनी का पता चलता न पर्चे का। एक बार मेरी मुलाक़ात ऐसे ही पतलू भाई से हो गई थी, चल पड़ी बात, मैंने पूछा- पतलू भाई आप कौन-सी परीक्षाओं के पर्चे निकलवाते हैं। पतलू भाई ने कुटिल मुस्कान चेहरे पर धारण कर गौरवान्वित होते हुए कहा- मेरे पास आइए, लक्ष्मी के दर्शन कराइए, परीक्षा का नाम बताइए, पर्चा ले जाइए।</p>
<p>पतलू भाई की यह बात सुनकर मेरी आँखें वैसे ही खुली रह गईं जैसे न्यायालय में चल रहे केस की फ़ाइल जो एक बार खुलती है तो बंद होने का नाम ही नहीं लेती। पतलू भाई का समाज सेवा का काम अच्छे से चल रहा था लेकिन इधर मौसम में परिवर्तन हुआ और उधर पतलू भाई के निवास स्थान में, अभी पतलू भाई से जेल में मिला जा सकता था, न जाने कैसे पतलू भाई की ये समाज सेवा वाली बात पुलिस को पता चल गई थी। पतलू भाई कहते हैं कि वो उन छात्रों की मदद कर रहे थे जिनके सपने वैसे शायद कभी पूरे न हो पाते। तो इस प्रकार से वो उन छात्रों की मदद कर रहे थे जिनको पाठय पुस्तक की प्रत्येक पंक्ति लोरियाँ सुनाती थीं और फिर जो तेज़ दिमाग़ वाले हैं वो तो कभी भी कहीं भी सफलता का गीत गा सकते हैं। किसी ने सच ही कहा है कि एक साथ विवेक और लक्ष्मी का वरदान विरलों को ही मिलता है। वर्तमान समय में जिसके पास विवेक है उसके सफल होने की संभावना है और जिसके पास लक्ष्मी है उसकी सफलता निश्चित है। पतलू भाई सादा जीवन उच्च विचार में विश्वास करते थे और अपना काम करते-करते पाँच दस लाख जो भी बन जाया करते उसी में रुखा-सूखा खाकर वो अपना गुज़ारा कर लिया करते थे।</p>
<p>पतलू भाई को जेल में आए हुए दस महीने बीत चुके थे और वो जेल की सुविधाओं का भरपूर आनंद उठा रहे थे। इधर स्थानीय अख़बारों में एक ख़बर मोटे-मोटे अक्षरों में छपी थी, एक बार फिर मेडिकल परीक्षा का पर्चा आउट।</p>
<p>पतलू भाई जेल में बैठ कर गर्व का अनुभव कर रहे थे और ये सोंचकर उनकी आँखें नम हो गई थीं कि कोई है जो उनके अधूरे सपने को पूरा कर रहा है। मैं और मेरे जैसे कुछ लोग जो एक पतलू भाई के गिरफ़्तार होने से खुश थे वो अनेक पतलू भाइयों को उदित होते देख सोंच रहे थे कि शायद सच में ये युग पतलू भाई और उनके समर्थकों का है और इसमें तंग जेब वाले पढ़ने-लिखने वाले बच्चों को सफल होने का कोई अधिकार नहीं है। मुंशी जी ने गोदान में बिल्कुल सही लिखा था, हमें संसार में रहना है तो धन की उपासना करनी पड़ेगी, इसी से लोक परलोक में कल्याण होगा। पतलू भाई का अगला लक्ष्य नेता बनकर समाज की सेवा करना है।</p>
]]></content:encoded>
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