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	<title>निजी-डायरी &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "निजी-डायरी"</description>
	<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 15:16:45 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[आत्म-सुधार की कसरतें और चिट्ठाकारी ]]></title>
<link>http://srijanshilpi.wordpress.com/2007/08/04/daily_routine/</link>
<pubDate>Sat, 04 Aug 2007 12:37:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
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<description><![CDATA[हमारी सोच-समझ और हमारे कर्म-व्यवहार के]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हमारी सोच-समझ और हमारे कर्म-व्यवहार के बीच कितनी एकरूपता है, इसी से निर्धारित होता है कि हमारा आत्म-विकास किस स्तर तक हो पाया है। ज्ञान को कर्म में परिणत कर पाना अक्सर हमसे मुमकिन नहीं हो पाता। किसी का श्रेष्ठ विद्वान, लेखक या वक्ता होना अलग बात है और उसका श्रेष्ठ इंसान होना बिल्कुल दूसरी बात। हम जैसे साधारण लोग भी कई बार बहुत अच्छी और बड़ी-बड़ी बातें कर लेते हैं, लेकिन जीवन में उन्हीं बातों पर अमल कर पाने में सफल नहीं हो पाते। महान व्यक्तियों और हमारे-जैसे आम मनुष्यों में यही फर्क़ है। एक इंसान के तौर पर महान वही बन पाते हैं जो दूसरों की नज़र में खुद को महान साबित करने की होड़ में नहीं लगे रहते, बल्कि अहर्निश आत्म-सुधार की साधना में रत रहते हैं। क्योंकि, आत्म-सुधार ही संसार की सबसे बड़ी सेवा है। जो खुद अपना भला नहीं कर सकता, वह संसार का कैसे भला करेगा!</p>
<p>खासकर, लेखन और वाचन के पेशों से जुड़े लोगों के साथ तो कथनी-करनी की एकरूपता वाली नैतिकता को निभा पाना सबसे कठिन होता है। जो साहित्यकार अपने साहित्य में महान नज़र आता है, कई बार अपनी निजी जिंदगी में नैतिकता के मानदंडों पर सामान्य व्यक्ति से भी गया-गुजरा साबित होता है। जो पत्रकार अपनी पत्रकारिता में व्यवस्था-विरोधी नज़र आता है, कई बार अपने कॅरियर में प्रगति और जीवन की सुविधाओं के लिए उतना ही चापलूस और समझौतापरस्त भी होता है। कोई प्रवचनकर्ता मंच से जितने सुन्दर और प्रेरक सदुपदेश देता है, अपने व्यक्तिगत जीवन में अक्सर उसके ठीक विपरीत आचरण करता हुआ पाया जाता है। इसी तरह, कई अध्यापक भी अपने छात्रों से जिन नैतिक आदर्शों की बात करते हैं, अपने व्यक्तिगत जीवन में उनके ठीक विपरीत आचरण करते हैं। चिट्ठाकारी करते समय भी हम अक्सर ऐसी बातें कर जाया करते हैं, जिनकी कसौटी पर शायद हम खुद खरे नहीं उतरते। दूसरों की कमियों की आलोचना करना, दूसरों की नैतिकता का रखवाला बनना और दूसरों को उपदेश देना जितना सहज है, उतना ही कठिन है खुद अपने गिरेबान में झाँकना और अपनी कमियों को दूर करने की कोशिश करना। </p>
<p>गांधीजी के जीवन और कार्य-व्यवहार में हम पाते हैं कि अपनी कथनी और करनी में एकरूपता बनाए रखने के मामले में वह बहुत सजग रहते थे। जो भी बात उन्हें अच्छी लगती थी, उस पर तत्क्षण अमल करने की चेष्टा में वह जुट जाया करते थे और अपनी उस चेष्टा में सफल रहने के बाद ही दूसरों से उस पर अमल करने के लिए कहते थे। व्यावहारिक अर्थों में मन, वचन और कर्म की एकरूपता ही सत्य की साधना है। जब हम किसी व्यक्ति के चरित्र की बात करते हैं तो सबसे पहले यही देखते हैं कि उसकी सोच, कथनी और करनी में किस हद तक एकरूपता है। इस तरह की एकरूपता नहीं होने की वजह से ही आम जनता की नज़र में आज के अधिकतर राजनेताओं की कीमत गिर चुकी है।</p>
<p>आत्म-सुधार की चेष्टा का दूसरा कदम है अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित करना। गांधीजी की दिनचर्या इस मायने में मुझे काफी आकर्षित करती रही है। इतनी व्यवस्थित दिनचर्या विरले किसी इन्सान की होती है। हर काम समय पर करना, जीवन के हर पल का भरपूर सदुपयोग करना, हर क्षण के महत्व को समझते हुए उसे पूरी तरह से जीना। उनकी दिनचर्या कुछ ऐसी प्रतीत होती है मानो वह समय की सतत बहती धारा में अतीत और भविष्य के किनारों से टकराए बगैर वर्तमान की मँझधार में सीधे बहे जा रहे हों। कहते हैं कि सुबह की सैर पर निकलने का उनका वक्त इतना निश्चित था कि उनको देखकर घड़ी मिलाई जा सकती थी। टॉलस्टॉय की प्रेरक कहानी "<a target="_blank" href="http://www.online-literature.com/tolstoy/2736">तीन प्रश्न</a>" के संदेश को उन्होंने अपने जीवन में पूरी तरह से चरितार्थ कर लिया था। हर किसी से वह ऐसे मिलते थे मानो उनसे बात करने वाला व्यक्ति दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हो। उनसे मिलने वाले हर व्यक्ति को यह महसूस होता था कि उस मुलाकात में उसने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण क्षणों को जी लिया है। हर काम को वह ऐसे करते थे मानो वह जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण काम हो। चाहे अपनी बकरी के लिए घास जुटाने का काम हो या आजादी के आंदोलन के संबंध में गंभीर विचार-विमर्श करना हो या ब्रिटिश वायसराय से मुलाकात के लिए जाना हो या किसी कुष्ठ रोगी की सेवा करनी हो, हर काम को वह उतना ही महत्वपूर्ण मानते थे। सच्चे मायने में गांधीजी ही कह सकते थे-- मेरा जीवन ही मेरा संदेश है।</p>
<p>मेरे गुरुदेव की दिनचर्या भी कुछ ऐसी ही थी। हर सुबह एक नया जन्म और हर रात एक नई मौत। वह हमें सिखाते थे, जब सबेरे जगो तो पिछले दिन की कोई चिंता, कोई ग़म, कोई मलाल तुम पर हावी न हो। जब रात को सोने जाओ तो अगले दिन के लिए कोई परवाह, कोई परेशानी अपने दिमाग में समेट कर मत रखो। हर दिन को ऐसे गुजारो जैसे कि वही तुम्हारे जीवन का आखिरी दिन हो। एक-एक पल को जीओ और उसका पूरा-पूरा उपयोग करो। उन्होंने अपना पूरा जीवन पूर्वनियोजित ढंग से गुजारा। यहां तक कि अपनी मौत का मुहूर्त भी वर्षों पूर्व उन्होंने खुद ही मुकर्रर कर लिया था।</p>
<p>हालांकि महान लोगों में कई ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने इस तरह की मशीनी दिनचर्या को अपनाने के बजाय समय के दबाव से मुक्त रहकर जीना पसंद किया। ऐसे व्यक्ति जीवन में सहजता, स्वच्छंदता और नैसर्गिकता को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। । वे अपनी मर्जी के मालिक होते हैं और मूड के हिसाब से काम करते हैं। वे समय की धारा के साथ सहज भाव से बहते हैं, उसकी तरंगों के साथ डूबते-उतराते हैं, अपनी तरफ से कोई चेष्टा नहीं करते।</p>
<p>मैं इस बहस में नहीं पड़ना चाहता कि दोनों में से किस तरह की दिनचर्या अधिक उपयुक्त है। दोनों ही रास्तों पर चलकर लोगों ने जीवन को सफल और सार्थक बनाया है। दोनों ही तरह की जीवन शैली वाले लोग महानता के शिखर तक पहुंचे हैं। एक ही समय के दो महान लोगों की दिनचर्या और जीवन शैली में भी हम यह बुनियादी अंतर देख सकते हैं। जैसे कि महात्मा गांधी और रवीन्द्रनाथ ठाकुर, चाणक्य और दाण्डयायन, श्रीराम शर्मा आचार्य और ओशो ..... ।</p>
<p>दिक्कत तब होती है जब हमारी दिनचर्या में जाने-अनजाने इन दोनों ही तरह की जीवन शैली एक साथ शामिल हो जाती है। ऐसा खासकर तब होता है जब हमारी बंधी-बंधाई दिनचर्या में कोई नया शगल शामिल हो जाता है और वह जीवन शैली में एक किस्म का व्यतिक्रम ला देता है। मेरी दिनचर्या में भी इसी कारण ऐसे व्यतिक्रम समय-समय पर आते रहे हैं। हालांकि, मैं <a target="_blank" href="http://srijanshilpi.wordpress.com/2006/02/25/samay_yoga">समय योग</a> का साधक बनने के लिए प्रयासरत रहा हूं, लेकिन जब भी मेरे ऊपर कोई नया शगल सवार होता है, दिनचर्या कुछ गड़बड़ा जाती है। जैसे कि, जब से चिट्ठाकारी का शगल हुआ, तब से मेरी दिनचर्या में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव आ गया। चिट्ठों को पढ़ने में अब काफी समय निकल जाता है। पहले यह समय लाइब्रेरी में गुजरता था, पत्र-पत्रिकाएँ और किताबों को पढ़ने में। सुबह-शाम ध्यान और व्यायाम में गुजरने वाले समय में भी चिट्ठाकारी ने सेंध मार ली। इससे मेरी सेहत पर भी काफी असर पड़ा। पहले लगभग हर सप्ताह अख़बारों में मेरे लेख छप जाते थे, लेकिन चिट्ठाकारी में सक्रिय होने के बाद से यह सिलसिला भी थम-सा गया।</p>
<p>हालांकि मैं चिट्ठाकारी में बहुत अधिक सक्रिय कभी नहीं रहा। पहले भी हर सप्ताह एक पोस्ट की औसत से ही लिखता था। लेकिन दूसरे चिट्ठाकारों की पोस्ट को पढ़ने, उन पर टिप्पणियाँ करने और चिट्ठा जगत की हलचलों पर नज़र रखने में काफी समय लग जाया करता था। लेकिन जब मुझे महसूस हुआ कि इस शगल ने मेरी दिनचर्या को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करना शुरू कर दिया है, तो मैं सावधान हो गया। हालांकि चिट्ठाकारी ने मेरे ऑफिसियल कामकाज को कभी प्रभावित नहीं किया, लेकिन नए-नए शुरू हुए वैवाहिक जीवन के कुछ हसीन लम्हों की चोरी इसने अवश्य की, जो बाद में कभी लौटकर नहीं आ सकेंगे। इसलिए, कुछ अरसे से मैंने चिट्ठाकारी से एक दूरी-सी बनाकर दिनचर्या को फिर से पटरी पर लाने की कवायद शुरू कर दी। कुछ चिट्ठाकार साथियों ने अपने मेल और कमेंट्स में मेरे इस 'हायबरनेशन' की चर्चा भी की।</p>
<p>अपने कई चिट्ठाकार साथियों को जब मैं उम्दा स्तर की चिट्ठाकारी में निरंतर सक्रिय देखता हूं तो जिज्ञासा होती है कि वे अपनी दिनचर्या में चिट्ठाकारी के शगल को किस तरह से एडजस्ट करते हैं। खासकर, रवि रतलामी जी, अनूप शुक्ला जी, सुनील दीपक जी, देबू दा, जीतू भाई, शास्त्री जी, ज्ञानदत्त जी, आलोक पुराणिक जी, अनामदास जी, प्रमोद सिंह जी, अभय तिवारी जी, अविनाश जी, मसिजीवी जी, श्रीश जी आदि जैसे चिट्ठाकार साथियों से मैं जानना और सीखना चाहता हूं कि वे अपनी दिनचर्या की तमाम महत्वपूर्ण व्यस्तताओं के साथ चिट्ठाकारी के शगल को कैसे इतनी शिद्दत के साथ पूरा कर पाते हैं!</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[सृजन शिल्पी का स्थायी जालस्थल]]></title>
<link>http://srijanshilpi.wordpress.com/2006/08/29/permanent_blog/</link>
<pubDate>Tue, 29 Aug 2006 03:46:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
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<description><![CDATA[मित्रो, इस पत्रकार-लेखक ने जब तीन वर्ष ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मित्रो, इस पत्रकार-लेखक ने जब तीन वर्ष पहले अपनी ऑनलाइन सृजनशीलता के लिए <a href="http://srijanshilpi.com"><strong>सृजन शिल्पी</strong> </a>नाम को अपनाया तभी यह डोमेन रजिस्टर करा लिया गया था। लेकिन जैसे बालक धीरे-धीरे कदमों का संतुलन बनाते हुए चलना सीखता है, मैंने भी धीरे-धीरे ही ऑनलाइन जगत में कदम बढ़ाए। <em><a href="http://in.geocities.com/srijanshilpi/welcome.html" target="_blank">जियोसिटीज</a></em> पर अपना पहला जाल पृष्ठ अंग्रेजी में बनाया, फिर <em><a href="http://blog.360.yahoo.com/blog-nWphv6Uiaa9VGLatHUE6z0MaTnQ-;_ylt=AiVYUFQXffl2n_OpS0HQv8NMAeJ3?cq=1" target="_blank">याहू</a></em> पर भी बनाकर देखा, लेकिन <strong>सर्वज्ञ</strong> पर ब्लॉगिंग के बारे में पढ़कर <em><a href="http://srijanshilpi.blogspot.com" target="_blank">ब्लॉगस्पॉट</a></em> पर चिट्ठा बनाने की प्रेरणा मिली। यहीं से सही अर्थों में नियमित चिट्ठाकारी की लत लगी। लेकिन जैसा कि आप जानते हैं, ब्लॉगस्पॉट पर कुछ समय के लिए सरकारी पाबंदी लगने के बाद मजबूरन यहाँ <em>वर्डप्रेस</em> पर आना पड़ा। यहाँ भी कुछ दिक्कतें महसूस हो रही थीं तो हमने <a href="http://www.jitu.info/merapanna/?p=584" target="_blank">नारद जी की सहायता से</a> चिट्ठे को अपने रजिस्टर्ड डोमेन के सर्वर पर स्थानांतरित कर लिया। अब से सृजन शिल्पी के विचारों को आप स्थायी रूप से <a href="http://srijanshilpi.com" title="सृजन शिल्पी">मेरे स्थायी वेब पते पर </a>पढ़ सकेंगे। हालाँकि पिछले चिट्ठे भी जरूरत पड़ने पर विकल्प के रूप में काम आने के लिए अस्तित्व में बने रहेंगे।</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[हिंदी चिट्ठाकारिता के नए दौर का आग़ाज़]]></title>
<link>http://srijanshilpi.wordpress.com/2006/08/06/hindi_bloggers_meet/</link>
<pubDate>Sun, 06 Aug 2006 18:28:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
<guid>http://srijanshilpi.wordpress.com/2006/08/06/hindi_bloggers_meet/</guid>
<description><![CDATA[इंतजार के पल
आज का दिन यूँ तो मित्रता द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b><span>इंतजार के पल</span></b></p>
<p><span></span><span>आज का दिन यूँ तो मित्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है और दुनिया में पहली बार अमेरिका द्वारा हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराए जाने की लोमहर्षक घटना के लिए याद किया जाता है, लेकिन मेरे जैसे चिट्ठाकार के लिए तो आज का दिन हिन्दी चिट्ठाकारिता के स्वर्णिम भविष्य के सूत्रपात का दिवस बनकर आया। जब सुबह काफी देर से आँख खुली, उस समय दस बजकर पचास मिनट हो रहे थे। घड़ी ने मुझे ख़बरदार किया कि ऐसा न हो कि तुम सम्मेलन में सबसे आख़िर में पहुँचो और तुम्हारे पहुँचने तक सारी चर्चा संपन्न हो जाए। लिहाज़ा चालीस मिनट के भीतर जल्दबाजी में तैयार हुए और साढ़े ग्यारह बजे निकल पड़े कनॉट प्लेस। बारह बजकर पाँच मिनट पर बरिस्ता पहुँचे तो कहीं कोई परिचित चेहरा नजर नहीं आया वहाँ। तो कोने की एक मेज पर इत्मीनान से जाकर बैठ लिए। सुबह में अख़बार नहीं पढ़ पाया था, इसलिए बैठकर हिन्दुस्तान टाइम्स के मुखपृष्ठ और संपादकीय पृष्ठ पढ़ डाले। इस बीच अमित जी, शशि जी, नीरज जी और जगदीश जी को भी फोन करके जानना चाहा कि उनको पहुँचने में कितनी देर लगने वाली है। नीरज जी का फोन वायस मेल बॉक्स में जा रहा था, इससे समझ में आ गया कि वह इस क़दर व्यस्त हैं कि बात भी नहीं कर सकते। अमित फोन नहीं उठा रहे थे, इससे मैंने अनुमान लगाया कि वह अभी बाइक चला रहे होंगे। शशि जी ने बताया कि पंद्रह-बीस मिनट में पहुँच रहे हैं और जगदीश जी ने बताया कि आधे घंटे लगेंगे। मैंने समय का सदुपयोग करते हुए आज के सम्मेलन के विचार-बिन्दुओं को नोटपैड पर सूत्रबद्ध करके रख लिया ताकि विचार-विमर्श के दौरान चर्चा मुद्दे से अधिक भटककर दूर नहीं जा पाए।</span></p>
<p><b><span>सम्मेलन की वैचारिक पृष्ठभूमि</span></b></p>
<p><span></span><span>आज का यह सम्मेलन मुम्बई के चर्चित हिन्दी चिट्ठाकार <b>शशि जी</b> की पहल पर आयोजित हो रहा था। वह दिल्ली में तीन दिनों के लिए आए हुए थे और उन्होंने दिल्ली के चिट्ठाकारों के साथ मिलन की इच्छा जताई थी। हालाँकि दिल्ली में हमलोग एक माह पहले ही, 4 जुलाई को एक सम्मेलन कर चुके थे और उसके बाद 8 जुलाई को भी जयपुर में हुए सम्मेलन में कई चिट्ठाकार आपस में मिल चुके थे और खूब सारी मौज-मस्ती करके आ चुके थे। इसलिए हमने इस सम्मेलन को मनोरंजन और आपसी परिचय से आगे बढ़कर, अब कुछ ठोस मुद्दों पर केन्द्रित करने की रूपरेखा बनाई। दरअसल हममें से कई चिट्ठाकारों के मन में हिन्दी चिट्टाकारिता के भावी स्वरूप के संबंध में लंबे अरसे से मंथन चल रहा था और हमलोग आपसी ऑनलाइन एवं टेलीफोन वार्ता में इसके विभिन्न पहलुओं पर चर्चा कर रहे थे। इस क्रम में देबू दा, शशि जी, जीतू जी, अनुनाद जी, नीरज जी और पंकज जी के साथ मेरी कई बार वार्ता हुई थी। पिछले दिल्ली सम्मेलन में भी नीरज जी और जगदीश जी के साथ अलग से मेरी इस विषय पर कुछ आरंभिक बातें हुई थीं। जीतू जी ने मेरे आग्रह पर <a target="_blank" href="http://www.jitu.info/merapanna/?p=564">अपने चिट्ठे पर अपने विचारों को बिंदुवार ढंग से रख दिया</a> था ताकि इस विषय पर अन्य लोग भी अपने विचार व्यक्त करने के लिए प्रेरित हो सकें। उसके बाद मैंने भी अपने चिट्ठे पर हिन्दी चिट्टाकारिता के नवीन आयामों पर एक विहंगम दृष्टि डालने का प्रयास किया। देबू दा से भी मैंने इस विषय पर अपने विचार व्यक्त करने को कहा तो उन्होंने बताया कि इस मुद्दे पर शशि जी से उनकी पहले से चर्चा होती रही है और वह प्रस्तावित सम्मेलन में उनके विचारों का भी प्रतिनिधित्व करेंगे। कल 5 अगस्त को <a target="_blank" href="http://hindini.com/fursatiya/?p=167">रवि रतलामी जी के जन्म-दिन पर अनूप भाई द्वारा लिए गए साक्षात्कार</a> में भी यह मुद्दा छाया रहा था। </span><span><b><span> </span></b></span></p>
<p><span><b><span>सम्मेलन के प्रतिभागी</span></b></span></p>
<p><span></span><span></span><span>शशि जी ने इस सम्मेलन में अपने साथ दो अन्य हिन्दी चिट्ठाकारों के शामिल होने की सूचना दी थी, जिनमें से एक तो हैं सरोज सिंह, जिन्हें हम सभी <a target="_blank" href="http://www.delhiblog.blogspot.com"><b>दिल्ली ब्लॉग</b> </a>की लेखिका </span><span><font face="Times New Roman">‘</font></span><span>सुर</span><span><font face="Times New Roman">’ </font></span><span>के रूप में जानते हैं और दूसरे हैं प्रिय रंजन झा, जिन्होंने <b><a target="_blank" href="http://www.biharibabukahin.blogspot.com">बिहारी बाबू कहिन</a></b> नाम से दो महीने पहले ही एक रोचक चिट्ठा शुरू किया है। ये दोनों पत्रकार हैं और एक ही मीडिया संस्थान में कार्यरत हैं। अमित ने सूचित किया था कि उन्होंने दिल्ली के अंग्रेजी चिट्ठाकारों को भी इस सम्मेलन में आमंत्रित किया है। अमित के आमंत्रण पर आज अंग्रेजी में चतुष्पदियों के माध्यम से <a target="_blank" href="http://ardh-satya.blogspot.com">अर्ध सत्य</a> का बयान करने वाले माया भूषण जी आए थे, जिनके चेहरे से तो नहीं परंतु नाम और काम से मैं पहले से ही परिचित था। वह भी संभवत: बारह बजे ही बरिस्ता पहुँच चुके थे और मेरी तरह बाकी लोगों का इंतजार कर रहे थे, लेकिन आपसी परिचय नहीं होने के कारण हमलोग एक-दूसरे की मौजूदगी से बेख़बर थे। वह स्टिंग ऑपरेशनों पर आधारित अपनी सनसनीखेज पत्रकारिता के कारण हाल ही में काफी चर्चित हुए हैं। आधे घंटे के इंतजार के बाद एक-एक करके साथी लोग आने शुरू हो गए। पहले अमित आए, फिर शशि और उनके साथ सरोज और प्रिय रंजन, अंत में जगदीश भाई। नीरज भाई कार्य की व्यस्तता की वजह से नहीं आ सके। जीतू जी ने कुवैत से अपने एसएमएस संदेश के जरिए उपस्थिति जताई। मुझे शामिल करके कुल मिलाकर सात चिट्ठाकार आज के सम्मेलन में प्रत्यक्ष रूप से शरीक हुए। सम्मेलन में खींचे गए फोटो पर दृष्टिपात करने के लिए <a target="_blank" href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta">अमित के चिट्ठे पर मौजूद फोटो संग्रह</a> में जा सकते हैं, जहाँ आज की तारीख वाले चार फोटो दिख जाएँगे। जगदीश भाई ने भी इस सम्मेलन के संबंध में कुछ रोचक बातें अपने <a target="_blank" href="http://aaina2.wordpress.com/2006/08/06/mahanagarblogmilan">आइने</a> में दर्शायी हैं।  </span><span></span><span><font face="Times New Roman"> </font></span></p>
<p class="MsoNormal"><span><strong>हुआ आग़ाज़ एक नए दौर का  </strong></span></p>
<p class="MsoNormal"><span>सम्मेलन में जिन विचार बिन्दुओं पर विस्तार से चर्चा हुई और जिस भावी परियोजना की रूपरेखा बनी, उसके संबंध में <a target="_blank" href="http://www.shashisingh.co.in/mumbaiblogs">शशि जी</a> व्यवस्थित ढंग से एक प्रविष्टि अलग से लिख रहे हैं। हमलोगों ने हिन्दी चिट्ठाकारिता के भविष्य के कुछ सुनहरे सपने देखे हैं और हमलोग मिल-जुलकर उन सपनों को अवश्य साकार करेंगे। इतना समझ लीजिए कि आज के सम्मेलन में हिन्दी चिट्ठाकारिता के नए दौर का आग़ाज़ हो चुका है। मेरी अगली कुछ प्रविष्टियाँ इसी विषय पर केन्द्रित रहेंगी, जिनमें धीरे-धीरे खुलासे किए जाएँगे। </span></p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[मेरा जन्म दिन और मूल नक्षत्र]]></title>
<link>http://srijanshilpi.wordpress.com/2006/06/16/%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b2-%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%a4%e0%a5/</link>
<pubDate>Fri, 16 Jun 2006 10:16:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
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<description><![CDATA[आज, 16 जून को मेरा जन्म दिन है। यही मेरी व]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p class="MsoNormal">आज, 16 जून को मेरा जन्म दिन है। यही मेरी वास्तविक जन्म तिथि है, हालाँकि आधिकारिक प्रयोजनों के लिए मेरी जन्म तिथि 3 जनवरी है। जे.एन.यू. में अपने अध्ययन काल में और उसके कुछ वर्षों बाद तक मैं 3 जनवरी को ही अपना जन्म दिन मनाया करता था जिसमें मेरे बहुत से घनिष्ठ मित्र शामिल होते थे। मेरी मित्र-मंडली में दिल्ली के विभिन्न न्यूज चैनलों एवं समाचार पत्रों में कार्यरत युवा पत्रकार और दिल्ली के विभिन्न शिक्षण संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे युवा लेक्चरर तथा भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में कार्यरत युवा अधिकारी शामिल हैं। इनमें से कई साथी 3 जनवरी को मेरे जन्म दिन पर अपने पेशे की तमाम व्यस्तताओं के बावजूद पार्टी में शामिल होने का समय निकाल लेते थे। लेकिन अब 3 जनवरी को घर पर जन्म-दिन की पार्टी रखने का वह सिलसिला भंग हो गया है।</p>
<p class="MsoNormal">मुझे अपनी वास्तविक जन्म-तिथि पहले ज्ञात नहीं थी। हाई स्कूल के सर्टिफ़िकेट में उल्लिखित जन्म-तिथि को ही मैं अपना जन्म-दिन मनाकर खुश हो लिया करता था। लेकिन दो वर्ष पहले जब विवाह के लिए पारिवारिक दबाव और रिश्तों के प्रस्तावों को टालना मेरे लिए मुश्किल हो गया तो मैंने अपनी जन्म-कुंडली बनाने की सोची। लेकिन प्रामाणिक जन्म-कुंडली के लिए जन्म की तारीख और समय का ज्ञान होना बहुत जरूरी है। मेरा जन्म बिहार के मधेपुरा जिले के साहूगढ़ गाँव स्थित मेरे ननिहाल में हुआ था। (शायद यह जन्म-स्थल के संस्कारों का ही प्रभाव है कि मैं आरक्षण का इतना प्रबल समर्थक बन गया! मंडल आयोग के अध्यक्ष बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल मेरे जन्म-स्थल के ही रहने वाले थे। इतना ही नहीं, आरक्षण और सामाजिक न्याय की राजनीति के दो बड़े पुरोधा शरद यादव और लालू यादव की कर्मभूमि भी मधेपुरा ही है।) जब मैंने जन्म से संबंधित विवरणों के बारे में अपने माँ-पिताजी से पूछा तो वे भी सटीक रूप से इसे याद नहीं कर पाए। पिताजी ने शायद इसे कहीं डायरी में लिख कर रखा था, लेकिन खोजने पर 1973 की वह डायरी नहीं मिल पाई। शायद वह मेरे गाँव में प्राय: हर वर्ष आने वाली बाढ़ की भेंट चढ़ गई होगी। इसलिए मेरे लिए अपना जन्म-दिन एक पहेली बन गया था, जिसे मैंने बहुत खोजबीन और ज्योतिषीय गणनाओं के बाद अब सुलझा लिया है। इसके लिए मुझे कुछ नामचीन ज्योतिषियों की भी मदद लेनी पड़ी।</p>
<p class="MsoNormal">16 जून की तारीख मूल नक्षत्र में पड़ती है, जिसमें जन्म लेने वाले लोग जन्म से दुर्भाग्यशाली लेकिन कर्म से दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने वाले माने जाते हैं। तुलसीदास का उदाहरण विश्वविख्यात है। ऐसी मान्यता है कि <a href="http://www.myastrohelpline.com/nakshtra-report.html">मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाले अधिकांश जातक</a> अपने परिवार के लिए शोक का कारण बनते हैं। मूल नक्षत्र के चार भागों में से पहले तीन भाग अशुभ माने जाते हैं। इस नक्षत्र के पहले भाग में जन्म लेने वाला जातक पिता के शोक अथवा मृत्यु का कारण बनता है, दूसरे भाग में जन्म लेने वाला जातक अपनी माता के शोक अथवा मृत्यु का कारण बनता है, जबकि तीसरे भाग में जन्म लेने वाला जातक पारिवारिक संपत्ति की गंभीर हानि का कारक होता है। मेरी नानी का देहांत मेरी छठी का संस्कार समाप्त होने के तुरंत बाद अचानक हो गया था। इसके आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि मेरा जन्म संभवत: मूल नक्षत्र के दूसरे भाग में हुआ होगा। मूल नक्षत्र के जातक को विरासत में कोई पैतृक संपत्ति प्राप्त नहीं होती। <a href="http://vedic.indastro.com/learn-astrology/nakshatra-moola.php">मूल नक्षत्र के जातकों की अन्य विशेषताओं के बारे में पढ़ने</a> के बाद अपने जन्म-दिन के बारे में मेरी यह धारणा पुष्ट होती गई।</p>
<p class="MsoNormal"><a href="http://www.findyourfate.com/indianastro/Moola.html">मूल नक्षत्र के जातक</a> एक साथ कई क्षेत्रों में दिलचस्पी रखते हैं और उनमें विशेषज्ञता भी हासिल करते हैं और इसीलिए वे अपने कैरियर का क्षेत्र भी बारंबार बदलते रहते हैं। मेरे साथ तो यह प्रत्यक्ष ही हुआ है। पहले अध्यात्म, उसके बाद पत्रकारिता, फिर कार्यपालिका, उसके बाद विधायिका और अब न्यायपालिका के क्षेत्र में मेरी सक्रियता शायद मूल नक्षत्र में जन्म लेने के प्रभावस्वरूप ही बार-बार बदलती रही है। पिछले चार वर्ष में अपना कार्यस्थल मैं चार बार बदल चुका हूँ। बारंबार कार्यक्षेत्र बदलने के अपने नुकसान हैं जो मैं झेल रहा हूँ। मूल नक्षत्र के जातकों की एक बहुत बड़ी खामी यह है कि वे जिन बातों का उपदेश दूसरों को बहुत बेहतर ढंग से दे सकते हैं उनका पालन स्वयं अपने जीवन में कर पाना उनके लिए दुष्कर होता है। इसीलिए उन्हें सलाहकार की भूमिका के लिए अत्यंत उपयुक्त माना गया है। वैसे मूल नक्षत्र के अधिकतर जातक वक्ता, लेखक, दार्शनिक, आध्यात्मिक गुरु, वकील, राजनीतिज्ञ और डॉक्टर के रूप में अधिक सफल रहते हैं। जब मैं आत्मान्वेषण करता हूँ तो मुझे अपने अंदर इन सभी विशेषज्ञताओं के बीजांकुर मिलते हैं।</p>
<p class="MsoNormal">मैं सोचता हूँ कि ब्लॉग के माध्यम से मुझे अपने भीतर के उन बीजांकुरों को पल्लवित करने का मौका मिलेगा और शायद इसी तरह से मैं अपने जन्मजात दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिवर्तित कर पाऊँगा। <a href="http://www.blogger.com/profile/7639306">मानसी</a> जी ज्योतिष शास्त्र की विशेषज्ञ हैं, शायद वह कुछ बेहतर प्रकाश डाल सकें। बहरहाल आप मुझे आज जन्म-दिन की बधाई दे सकते हैं, जिसकी शुरुआत इंडिया टी.वी. के पत्रकार और हिन्दी ब्लॉग जगत के सक्रिय साथी <a href="http://www.blogger.com/profile/7768422">नीरज दीवान</a> ने आज पहली बार अकस्मात सुबह-सुबह फोन पर बधाई देकर कर दी है। शायद यह टेलीपैथी का ही कमाल होगा, जिसके चमत्कारों में मेरा गहरा विश्वास है। उन्हें तो पहले से पता भी नहीं था मेरे जन्म दिन का। लेकिन जब मैं आज सुबह-सुबह यह पोस्ट लिख रहा था तो अनायास ही उनका फोन आ गया और उन्होंने बताया कि अभी-अभी जगा हूँ और आपकी याद आने लगी तो मैंने फोन कर दिया।</p>
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