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	<title>झील &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/झील/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "झील"</description>
	<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 15:13:49 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[झील सी गहरी इन निगाहों मे...]]></title>
<link>http://meredilne.wordpress.com/?p=5</link>
<pubDate>Fri, 23 May 2008 07:59:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
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<description><![CDATA[झील सी गहरी इन निगाहों मे डूब जाने को ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>झील सी गहरी इन निगाहों मे डूब जाने को जी चाहता है,<br />
न चाहकर भी इन निगाहों से दूर चले जाने को जी चाहता है,<br />
गम तेरे दिल के सारे पी जाने को जी चाहता है,</p>
<p>गुस्से से भरी इन निगाहों को फिर देखने को जी चाहता है,<br />
मुझे तलाशती इन निगाहों को फिर देखने हो जी चाहता है,<br />
न चाहकर भी इन निगाहों से दूर चले जाने को जी चाहता है,</p>
<p>कुछ कहती इन निगाहों से सब कुछ सुन लेने को जी चाहता है,<br />
हाल-ऐ-दिल बयान करती निगाहे देख मर जाने को जी चाहता है,<br />
न चाहकर भी इन निगाहों से दूर चले जाने को जी चाहता है,</p>
<p>दिल को तड़पाती ये निगाहे अब जीने नही देती है,<br />
गम से भरी ये निगाहे अब जीने नही देती है,<br />
मुझे तलाशती ये निगाहे अब जीने नही देती है,<br />
मरना चाहू तो भी ये निगाहे अब मरने नही देती है,</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[खिली-खिली महकी बहारें हैं]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=971</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 02:35:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=971</guid>
<description><![CDATA[खिली-खिली महकी बहारें हैं
झीलों पर बहत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">खिली-खिली महकी बहारें हैं<br />
झीलों पर बहते शिकारें हैं<br />
ठण्डी-ठण्डी सौंधी हवाएँ हैं<br />
गीले पत्तों को खनकाएँ हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">जाने कैसी तलब जागी है<br />
जाने किसका इन्तिज़ार है<br />
बेज़ार-सा यह दिल मेरा<br />
किसके लिए गुलज़ार है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">आज ऐसा क्यों लग रहा है<br />
नये-नये सब नज़ारें हैं<br />
खिली-खिली महकी बहारें हैं<br />
झीलों पर बहते शिकारें हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">शबनमी रातों का यह चाँद<br />
और उजली-उजली चाँदनी<br />
आइनाए-दिल में कौन यार है<br />
इश्क़ जिससे वजहसार है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">बंजर ज़मीने-दिल से आज<br />
उलझे हुए मखमली धारे हैं<br />
खिली-खिली महकी बहारें हैं<br />
झीलों पर बहते शिकारें हैं</span></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति 'नज़र'<br />
लेखन वर्ष: २००४</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बातों ही बातों में कोई बात हो]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=950</link>
<pubDate>Thu, 27 Mar 2008 10:30:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=950</guid>
<description><![CDATA[बातों ही बातों में कोई बात हो
दिल से दि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">बातों ही बातों में कोई बात हो<br />
दिल से दिल की मुलाक़ात हो<br />
नज़रों से नज़रें कहें कुछ<br />
इनायत-ओ-इल्तफ़ात हो</font></p>
<p><font color="#000000">आज की रात जो चाँदनी है<br />
यह तेरे रूप की रोशनी है<br />
संदली यह बदन तेरा<br />
मुक़द्दस-ओ-कायनात हो</font></p>
<p><font color="#000000">हैं झीलें दोनों आँखें तुम्हारी<br />
सादा-सादा हैं प्यारी-प्यारी<br />
हुईं काजल से ख़ुशरंग यूँ<br />
जैसे सूरज ढले तो रात हो</font></p>
<p><font color="#000000">बख़्त है सबा तुमको छुए<br />
तेरी ज़ुल्फ़ से खेले, मचले<br />
ख़ुशबाश में है गुंचाए-दिल<br />
तुम जन्नत-ओ-हयात हो</font></p>
<p><font color="#000000">गुलाबी पैमाने छलकते हैं<br />
लबों पर अंगारे सुलगते हैं<br />
पतंगा करे तेरी लब-बोसी<br />
गर इख़लास-ओ-सबात हो</font></p>
<p><font color="#000000">क़ुर्बां तेरे शोख़ी-ओ-नाज़ पे<br />
मुआ जाऊँ तेरे एतराज़ पे<br />
फ़साने में जाँ भर दी तुमने<br />
यह कि अब इख़्तिलात हो</font></p>
<p>इल्तफ़ात= favour, friendship; मुक़द्दस= clean, pious; बख़्त= lucky; गुंचाए-दिल= bud of heart; लब-बोसी= kiss on lips; इख़लास= love, worship; सबात= constancy, endurance; मुआ= sacrifice; इख़्तिलात= love</p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मेरी आँखों पर जो था]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=915</link>
<pubDate>Fri, 14 Mar 2008 11:29:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=915</guid>
<description><![CDATA[मेरी आँखों पर जो था तेरी ख़ुशबू का आँच]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">मेरी आँखों पर जो था तेरी ख़ुशबू का आँचल था<br />
वह तेरी लटों का लहराना चाँद पे उड़ता बादल था<br />
मुहब्बत के ज़हरीले तीर जो तुमने चलाये<br />
तिश्ना लबों पर प्यास का क़तरा कितना बेकल था</font></p>
<p><font color="#000000">वह गीले गुलाबी लब तेरे कितने नशीले थे<br />
तेरी नख़्वत से हाए! हुए कितने रोबीले थे<br />
देखा तो देखता ही रह गया तेरे यह आशिक़<br />
तेरा चेहरा झील में खिलता हुआ ताज़ा कँवल था</font></p>
<p><font color="#000000">मेरी आँखों पर जो था तेरी ख़ुशबू का आँचल था<br />
वह तेरी लटों का लहराना चाँद पे उड़ता बादल था</font></p>
<p><font color="#000000">जब भी निकलती हो सामने से मुस्कुराके निकलती हो<br />
क्यों न हो दर्द मीठा-मीठा बर्क़ गिराती चलती हो<br />
तुमको कोई और चाहता है मेरी चाहत हुई बेअसर<br />
मेरे दर्दो-दिल का हर टुकड़ा एक नयी ग़ज़ल था</font></p>
<p><font color="#000000">मेरी आँखों पर जो था तेरी ख़ुशबू का आँचल था<br />
वह तेरी लटों का लहराना चाँद पे उड़ता बादल था</font></p>
<p>तिश्ना= प्यासा, नख़्वत= नखरा, नाराज़गी, बर्क़= बिजली</p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘वफ़ा’<br />
लेखन वर्ष: २००२</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जिसकी यादों में गुज़ारता हूँ सुबह-शाम]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=750</link>
<pubDate>Tue, 12 Feb 2008 09:50:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=750</guid>
<description><![CDATA[जिसकी यादों में गुज़ारता हूँ मैं सुबह-श]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">जिसकी यादों में गुज़ारता हूँ मैं सुबह-शाम<br />
मंज़िल वह मेरी वह मेरा आख़िरी मुक़ाम</font></p>
<p><font color="#000000">वह रंगीन शाम थी शाम वह गुमनाम थी<br />
नज़रों में नज़ारों में वह वफ़ा बेनाम थी<br />
हूर थी वह किसी चिराग़ का नूर थी<br />
किसी किनारे से जैसे कोई कश्ती दूर थी<br />
देखा जब हमने नज़रें थम ही गयीं<br />
हमें जैसे मंज़िलों की राहें मिल ही गयीं</font></p>
<p><font color="#000000">जिसकी यादों में गुज़ारता हूँ मैं सुबह-शाम<br />
मंज़िल वह मेरी वह मेरा आख़िरी मुक़ाम</font></p>
<p><font color="#000000">महफ़िल हसीन थी या ख़ूबसूरत समा था<br />
उस पल के लिए जाने दिल मैं कहाँ था<br />
आँखों की गहरी झील जिसकी नहीं तफ़सील<br />
तोड़ दी पतंग किसी ने जब हमने दी ढील<br />
उसका चेहरा जैसे शाम की गहराई में सवेरा<br />
वह सवेरा जिसने किया मेरे दिल में बसेरा</font></p>
<p><font color="#000000">जिसकी यादों में गुज़ारता हूँ मैं सुबह-शाम<br />
मंज़िल वह मेरी वह मेरा आख़िरी मुक़ाम</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>

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