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	<title>ज्ञान &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/ज्ञान/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "ज्ञान"</description>
	<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 15:09:49 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[गीत संगीत की महफिल की बजाय महायुद्ध सजाते-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=194</link>
<pubDate>Thu, 03 Jul 2008 14:01:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=194</guid>
<description><![CDATA[गीत और संगीत से
दिल मिल जाते हैं पर
अब त]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i20.tinypic.com/20r4vw6.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' /><strong>गीत और संगीत से<br />
दिल मिल जाते हैं पर<br />
अब तो उसकी परख के लिये<br />
प्रतियोगितायें को अब वह<br />
महायुद्ध कहकर जमकर प्रचार कराते<br />
वाद्ययंत्र हथियारों की तरह सजाये जाते<br />
जिन सुरों से खिलना चाहिये मन<br />
उससे हमले कराये जाते<br />
मद्धिम संगीत और गीत से<br />
तन्मय होने की चाहत है जिनके ख्याल में<br />
उन पर शोर के बादल बरसाये जाते</p>
<p>कहें महाकवि दीपक बापू<br />
‘अब गीत और संगीत<br />
में लयताल कहां ढूंढे<br />
बाजार में तो ताल ठोंककर बजाये जाते<br />
महफिलें तो बस नाम है<br />
श्रोता तो वहां भाड़े के सैनिक की<br />
तरह सजाये जाते<br />
जो हर लय पर तालियों का शोर मचाते<br />
देखने वाले भी कान बंद कर<br />
आंखों से देखने की बजाय<br />
उससे लेते हैं सुनने का काम<br />
गायकों को सैनिक की तरह लड़ते देख<br />
फिल्म का आनंद उठाये जाते<br />
किसे समझायें कि<br />
भक्ति हो या संगीत<br />
एकांत में ही देते हैं आनंद<br />
शोर में तो अपने लिये ही<br />
जुटाते हैं तनाव<br />
जिनसे बचने के लिये संगीत का जन्म हुआ<br />
क्या उठाओगे गीत और संगीत का आंनद<br />
जैसे हम उठाते<br />
लगाकर रेडियो पर विविध भारती पर<br />
अपनी अंतर्जाल की पत्रिका पर लिखते जाते<br />
यारों, संगीत सुनने की शय है देखने की नहीं<br />
गीत वह जिसके शब्द दिल को भाते हैं<br />
सुरों के महायुद्ध में जीत हार होते ही<br />
सब कुछ खत्म हो जाता है<br />
पर तन्हाई में लेते जब आनंद तब<br />
वह दिल में बस जाते<br />
बाजार में दिल के मजे नहीं बिकते<br />
अकेले में ही उसके सुर पैदा किये जाते<br />
.................................</p>
<p>दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दो क्षणिकाएं]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=177</link>
<pubDate>Thu, 12 Jun 2008 14:51:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=177</guid>
<description><![CDATA[आसमान से जो देखा धरती पर
तो इंसान चींट]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आसमान से जो देखा धरती पर<br />
तो इंसान चींटियों की तरह<br />
सड़क पर रेंगता नजर आया<br />
वैसे भी धरती पर  इंसान<br />
कब इंसान की तरह चल पाया<br />
चींटियों की रानी लेती है<br />
अपनी प्रजा से सेवा<br />
पर इंसान  ढूंढता है<br />
अपने आराम से रहने के लिये कोई राजा<br />
जो उसे खिलाये मुफ्त में मेवा<br />
दौड़ सकता है अपनी टांगो के सहारे<br />
पर फिर भी रैंगना उसे पसंद है<br />
करता है पहाड़ जैसी बातें पर<br />
इंसान का चरित्र हमेशा बौना नजर आया<br />
..................................................</p>
<p>शिखर पर पहुंचे हैं वह लोग<br />
जिनके चरित्र बौने हैं<br />
बांस की  टांगों के सहारे<br />
वह दिखते हैं बहुत लंबे<br />
पर जब हट जाती हैं वह<br />
तो लगते वह रोने हैं<br />
बांसों के सहारे हो रहा है शासन<br />
बांस भी रूप बदलता है<br />
कहीं पद तो कहीं बनता है आसन<br />
एक बार लग जाये तो<br />
फिर आदमी सलामत हो जाता<br />
हर कोई उसे सलाम ठोकने द्वार पर आता<br />
मिल जाये एक बांस<br />
तो मिल जाती है प्रसिद्धि की सांस<br />
जिसके हाथ में आया, वह तो हो गया राजा<br />
अपना लिखा हुक्म ही समझ में न आये<br />
पर बांस के जोर पर<br />
उसके पाप तो प्रजा को ढोने हैं</p>
<p>..........................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ॐ शक्ति है]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=819</link>
<pubDate>Thu, 21 Feb 2008 15:34:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=819</guid>
<description><![CDATA[ॐ शक्ति है ॐ ही ईश्वर प्रतीक है
ॐ नश्वर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">ॐ शक्ति है ॐ ही ईश्वर प्रतीक है<br />
ॐ नश्वर है ॐ ही सर्वत्र एक है<br />
ॐ भक्ति है ॐ ही शान्ति मंत्र है<br />
ॐ जगत है ॐ ही जीवन तंत्र है</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ में तुम हो ॐ हर कण तुम में<br />
ॐ मृदा धातु जल वायु गगन में</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ सत्य है ॐ ही चिंतन मनन है<br />
ॐ आत्मा है ॐ ही प्रभु शरण है<br />
ॐ विष्णु है ॐ ही त्रिकाल महादेव है<br />
ॐ दृष्टि है ॐ ही सुर और रव है</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ विद्यमान है प्राण है हर जीव में<br />
ॐ ही सजीव में ॐ ही निर्जीव में</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ संगीत है ॐ ही श्रेष्ठ मित्र है<br />
ॐ असत्य पर विजय का शस्त्र है<br />
ॐ ब्रह्माण्ड है ॐ उत्पत्ति सूत्र है<br />
ॐ मोक्ष है ॐ ही मुक्ति स्रोत है</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ चहुँ ओर ज्ञान का प्रकाश है<br />
ॐ कष्टकाल अंधकार का विनाश है</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:ज्ञान रुपी हाथी की सवारी कीजिए, भौंकने पर ध्यान न  दीजिये]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=124</link>
<pubDate>Fri, 15 Feb 2008 04:29:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=124</guid>
<description><![CDATA[हस्ती चढ़िए ज्ञान की, सहज दुलीचा डार
श्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>हस्ती चढ़िए ज्ञान की, सहज दुलीचा डार<br />
श्वान रूप संसार है, भूंकन दे झकमार</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं की ज्ञान रूपी हाथी पर सहज भाव से दुलीचा डालकर उस पर सवारी कीजिए और संसार के दुष्ट पुरुषों को कुत्ते की तरह भोंकने दीजिये, उनकी पवाह मत करिये. </p>
<p><strong>कहते को कहि जान दे, गुरु की सीख तू लेय<br />
साकट जन और स्वान को, फेरि जवाब न देय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दुनिया के लोग आलोचना और निंदा करते हैं और उनकी परवाह नहीं करना चाहिऐ. अपने गुरु की शिक्षा लेकर उस पर चलना चाहिऐ और कुछ दुष्ट लोग अगर निंदा करते हैं तो उनके भोंकने पर जवाब नहीं देना चाहिऐ. </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:सज्जन सौ बार रूठे तो भी मनाएं ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=119</link>
<pubDate>Fri, 08 Feb 2008 04:14:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=119</guid>
<description><![CDATA[जैसी जाकी बुद्धि है, तैसे कहैं बनाय
ता]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जैसी जाकी बुद्धि है, तैसे कहैं बनाय<br />
ताकौं बुरो न मानी, लें कहाँ सो जाय </p>
<p>कविवर रहीम  जी कहते हैं कि जिस मनुष्य की जैसी बुद्धि है वह उसके अनुरूप ही तो काम करता है। उस मनुष्य का बुरा मत मानिए क्योंकि वह और बुद्धि कहाँ लेने जायेगा। </p>
<p>टूटे सुजन मनाइये, जौ टूटे सौ बार<br />
रहिमन फिरि फिरि पोहिए, टूटे मुक्ताहार<br />
कविवर रहीम कहते हैं कि जिस प्रकार सच्चे मोतियों का हार टूट जाने पर बार-बार पिरोया जाता है, उसी प्रकार यदि सज्जन सौ बार भी नाराज हो जाएं तो भी उन्हें सौ बार ही मना लेना चाहिऐ क्योंकि वह मोतियों की तरह मूल्यवान होते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[महिला जाग्रति के लिए-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=116</link>
<pubDate>Sun, 03 Feb 2008 10:35:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=116</guid>
<description><![CDATA[प्रदूषण पर आयोजित कार्यक्रम में वह  वि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>प्रदूषण पर आयोजित कार्यक्रम में वह  विद्वान<br />
बोल रहे थे<br />
''घर से कितना भी सजकर<br />
सड़क पर खुले में जाएं<br />
तो गाड़ियों के धुएं में<br />
सबके चेहरे काले हो जाएं<br />
अगर जाएं बंद गाडी में<br />
करें अपना सफर पूरा तो<br />
लोगों को अपनी सुन्दरता पर<br />
ध्यान कैसे दिलाएं<br />
दुनिया में फैले प्रदूषण से<br />
महिलाओं को खास परेशानी है<br />
हम चाहते हैं कि इस समस्या को सब<br />
मिलकर सुलझाएं''</p>
<p>कार्यक्रम की समाप्ति पर<br />
वह आयोजकों से बोले<br />
देखो मैं  महिलाओं की समस्याओं को ही<br />
उठाता  हूँ और अब मेरा नाम<br />
महिला जागृति के लिए<br />
जहाँ भी पुरस्कार मिलता हो<br />
वहाँ जरूर भिजवाएं'<br />
--------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[प्रभावपूर्ण दस्तक देते हैं सागरचंद नाहर-समीक्षा ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=110</link>
<pubDate>Tue, 29 Jan 2008 14:39:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=110</guid>
<description><![CDATA[अंतर्जाल  पर बहुत लोग लिख रहे हैं और हर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अंतर्जाल  पर बहुत लोग लिख रहे हैं और हर किसी को ब्लोग  के बारे इस्तेमाल की पूरी जानकारी हो यह कोई जरूरी  नहीं है और जिनको पूरी  हो गयी है तो लिख कर  व्यक्त नहीं करते. हालत यह है जिन ब्लॉगस्पोट और वर्डप्रेस  ब्लोगों का  पूरा इस्तेमाल भी कुछ  लोग-जिनमें मैं स्वयं भी शामिल-नहीं कर पा रहे हैं. ऐसे में एक शख्सियत हैं सागर चंद नाहर जो निर्बाध गति से अपना ज्ञान  दूसरे लोगों को अपने ब्लॉग दस्तक पर बाँट रहे  हैं. जब मैं अपने को अंतर्जाल  पर लिखते देखता हूं तो यह कभी नहीं भूलता कि किस तरह कमेंट देकर उन्होने मुझे प्रेरित किया, तब मैं सादा हिन्दी फ़ॉन्ट में लिख रहा था और मेरा लिखा कोई पढ़ नहीं पा रहा था. उस समय  वह मेरे ब्लॉग पर आए और अपना संदेश छोड़  गये.   उसके बाद मैं महीने भर तक अकेले ही अपने ब्लोग यूनीकोड में लिखकर  विचरता रहा  था तो फिर आए और संदेश छोडा  कि  नारद पर आओ. हमें तो केवल लिखने का नशा है पर उनको इसके साथ दूसरों को भी प्रेरित करने का भाव हो नाहर जी में है वह बहुत कम  लोगोंमें दिखता  है. </p>
<p>जो भी नया ब्लॉग नारद पर आया उसे सबसे पहले कमेन्ट  देकर आगे  बढ़ने के  लिए प्रेरित करने का  काम उन्होने किया है. मैं हमेशा  उसे ही अच्छा ब्लोग  लेखक मानता हूँ जो प्रभावपूर्ण लिखने के साथ दूसरों को भी प्रेरित करता है और मेरे हिसाब से इस समय नाहर  जी के अलावा मैं यह गुण अन्य  किसी में नहीं देखता .  </p>
<p>आईए उनके लिखे पर चर्चा करें. तमाम  तरह के तकनीकी ज्ञान  को लेकर तमाम ब्लॉगर दावे करते रहे  हैं पर अपने ब्लोग पर ही मौजूद सुविधाओं का इस्तेमाल किस तरह किया जाये यह जानकारी मुझे केवल सागरचंद नाहर के ब्लोग से ही मिलती है.देखा जाए तो हमारे ब्लॉग पर जो सुविधाएँ उपलब्ध हैं उनके लिए बाहर से किसी सॉफ्टवेअर की मुझे कभी ज़रूरत नहीं लगती.  इन्हीं ब्लोग का  अधिक  से अधिक उपयोग कैसे किया जाए यह सीखना भर है-हमें यह जानकारी अक्सर दस्तक पर मिल जाती  है . अभी सागर चंद नाहर जी ने अपने ब्लॉग पर ही मौजूद सुविधा  ब्लोगरोल के व्यापक इस्तेमाल के बारे में लिखा था. इसका इस्तेमाल तो मैं बहुत समय से कर रहा हूँ पर कई लोगों को  शायद  इससे पता लगा होगा. आपने पिछले  दिनों यह सुना होगा की ''अपने चिट्ठे  पसंद कर लो और पढ़ो".  जिन ब्लॉगरों ने सागरचंद नाहर का  वह लेख पढ़ा होगा वह हंसते होंगे. हमारे ब्लॉग पर ही यह सुविधा है कि  आपको जो ब्लॉग पसंद है उस अपने ब्लॉग पर ही लिंक दे और स्वयं पढ़ें  और अपने पाठकों को भी पढ़वाएं.  चाहे कितने भी चिट्ठे  अपने ब्लॉग पर लिंक कर सकते हैं. इसके लिए किसी का  मोहताज होने की ज़रूरत नहीं है.  </p>
<p>अभी कुछ  दिनों पहले ही उन्होने वर्डप्रेस  के widgest के इस्तेमाल  की जानकारी दी. इसके अलावा वर्ड प्रेस में अपनी पोस्ट पर ही post slug   में भी अपना शीर्षक डालने की जानकारी दी और वह मेरे काम आई. आज अब मेरे वर्डप्रेस   के ब्लॉग को देखेंगे तो उनके वर्तमान स्वरूप का  श्रेय सागरचंद नाहर को ही देता हूँ. इसके अलावा अपनी पोस्ट पर शब्दों का  चयन कर उनको विशिष्ट रूप से कैसे दिखाएँ यह भी उन्होने बताया. इतना ही नहीं वह ब्लॉगस्पोट के ब्लॉग के बारे में भी लिखते हैं. मैं मानता हूँ कि  अगर आप ब्लॉग को निरंतर लिख रहे हैं और उसमें सुधार करना चाहते हैं तो सागर चंद नहर की दस्तक पर ध्यान देते र्हें, ऐसी जानकारी देने वाला और कोई मुझे तो नहीं दिखा.  </p>
<p>वह बहुत सरल स्वभाव के हैं. यह मैं जानता हूँ क्योंकि पिछले  वर्ष की कुछ  ऐसी पोस्टें जो ब्लॉग जगत में अभद्र व्यवहार पर प्रतिवाद प्रकट   करतीं थी  उस पर वह कमेंट देते थे और कहते थे आप ऐसा लिखते रहें. कुछ  लोगों ने उनकी सादगी को कमज़ोरी समझकर ऐसा कोई व्यवहार उसने किया होगा जो अशोभनीय होगा या वह ऐसे माहौल से दुख होकर  कहते होंगे -ऐसा मुझे लगता है. शांति से अपनी बात लिखकर दूसरों की प्रेरणा  बनने वाले सागरचंद  नाहर पर बहुत दिनों से लिखने का  मन था. हिन्दी साहित्या में वही साहित्यकार पूर्ण माना जाता है जो समीक्षा  लिख सकता है. मैने इससे  पहले सत्येन्द्र श्रीवास्तव (भूख), परमजीत बाली (दिशाएं) और ममता श्री वास्तव (ममता टीवी) पर समीक्षाएं लिखीं थी. उसके बाद एक समीक्षा लिख रहा था तो वह पूरी होने से पहले ही इंडिक  टूल पर पता नहीं कहाँ हाथ पड़ा और वह उड़ गया. यह पोस्ट भी मैं लिख चुका था एक माह पहले पर लाईट चली गयी तो इसे सेव कर रख लिया. आज जब वर्डप्रेस  पर गया तो अचानक यह याद आई और मुझे अपने आप पर खुद आश्चर्य  हुआ कि  मैने इसे इतने दिन तक क्यों अपने पास रख छोडा . सागर चंद नाहर के बारे में बस इतना ही और कहना चाहूँगा कि  वह ऐसा न समझें की उनका लिखा कोई महत्व नहीं रखता.यह समीक्षा लिखने का  मतलब भी यही है की सब  लोग समझें  कि  अन्य पाठक  उनको पढ़ते हैं और उसका प्रभाव होता है.<br />
हाँ मैं एक आग्रह उनसे करूंगा कि अगर वह एक ऐसी पोस्ट रखें जिसमें ब्लोग बनाने की पूरी विधि हो. वह यह मानकर लिखें कि ब्लोगर अनाडी हैं क्योंकि हमारा लिखा अन्य आम पाठक भी पढ़ते हैं जो हमें बता नहीं पाते और इस विधा की जानकारी उनको तभी हो सकती है जब कोई  ब्लोगर उस पर लिखे. अगर मैं  उनके बारे में कम या गलत लिख गया हूँ तो उनसे और उनके प्रशंसकों से और अधिक लिख गया हूँ तो उनके आलोचकों से क्षमा प्रार्थी हूँ. उनके उज्जवल भविष्य की कामना के साथ यह समीक्षात्मक आलेख उनको ही समर्पित.</p>
<p>इनके ब्लोग का पता है<br />
http://nahar.wordpress.com<br />
------------------------------------- ----------------------------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:माया के स्वरूप को भी कोई नहीं जानता ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2008/01/23/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Wed, 23 Jan 2008 04:04:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2008/01/23/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0/</guid>
<description><![CDATA[माया मया सब कहैं, माया लखै न कोय
जो मन म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>माया मया सब कहैं, माया लखै न कोय<br />
जो मन में ना उतरे, माया कहिए सोय </strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि माया-माया कहकर उसके पीछे तो सब पड़े हैं पर उसका सही स्वरूप कोई नहीं जानता. सभी एक दूसरे को सन्देश देते हैं कि माया के चक्कर में मत पडो पर पर सभी उसके इर्द-गिर्द जिन्दगी भर घूमते हैं. </p>
<p>भावार्थ-आपने देखा होगा कि सब लोग एक दूसरे को तमाम तरह के उपदेश देते हैं कि पैसे से सब कुछ नहीं होता है और धर्म-कर्म भी करना चाहिए और दिखाने के लिए भक्ति भी करते हैं पर उनके मन से माया का मोह नहीं निकलता और भगवान् का नाम लेते हैं पर उनको मन में स्थान नहीं दे पाते.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ रहीम के दोहे:अभिवादन करने वाले सभी मित्र नहीं हो जाते ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/29/abhivadan-karne-vale-sabhi-mitra-naheen-hote/</link>
<pubDate>Sat, 29 Dec 2007 04:24:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/29/abhivadan-karne-vale-sabhi-mitra-naheen-hote/</guid>
<description><![CDATA[सब को सब कोऊ करै, कै सलाम कै राम
हित रही]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सब को सब कोऊ करै, कै सलाम कै राम<br />
हित रहीम तब जानिए, जब कछु अटकै काम</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं की सब एक दुसरे को सलाम और राम-राम कहकर अभिवादन तो सभी करते हैं पर मित्र तो उसे ही मानिए जो समय पर काम पर आये.</p>
<p><strong>संपादकीय अभिमत-</strong>इसमें रहीम जी ने कितना बड़ा गूढ़ रहस्य प्रकट किया है.  दिन में कई लोगों से हमारा सलाम और राम-राम कहकर अभिवादन होता है और समझते हैं की वह हमारे अपने हो गए. कई लोग इसे भे होते हैं जिनसे हमारा प्रतिदिन अभिवादन का आदान-प्रदान और अन्य वार्तालाप होता है पर वह सब मित्र नहीं हो जाते जबक हम मन ही मन उन्हें अपना समझने लगते हैं. जब काम अटकता है तो हम उनसे उम्मीद करते हैं जब वह इनकार कर देते हैं तब कहीं जाकर हमारा भ्रम टूटता है. </p>
<p>स्कूल. ऑफिस और दुकानों पर हमारे साथ ऐसे अनेक जुड़ते हैं जो केवल वहाँ काम करने की वजह से होते हैं पर उन्हें मित्र नहीं माना जा सकता. हाँ, वहाँ मित्र बनते हैं पर वही लोग जो दु:ख और सुख में हमारे यहाँ शरीक होते हैं. </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:मन शुद्ध हो तो प्रतिमा में भी भगवान् ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/16/chankya-nitiman-shuddh-ho-to-pratima-men-bhee-bhagvaan/</link>
<pubDate>Sun, 16 Dec 2007 08:10:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/16/chankya-nitiman-shuddh-ho-to-pratima-men-bhee-bhagvaan/</guid>
<description><![CDATA[1.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की भी गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य का  जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य को  शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।<br />
<strong>संपादकीय अभिमत-</strong>विश्व में अनेक प्रकार के ग्रंथ हैं और सबको पढ़ना और उनका ज्ञान धारण करना संभव नहीं है इसलिए सार अपनी दिमाग में रखना चाहिए. अनेक पुस्तकों में कहानियां और उदाहरण दिए जाते हैं पर उनके सन्देश का सार बहुत संक्षिप्त होता है और उसे ही ध्यान में रखान चाहिऐ </p>
<p>2.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है ।<br />
 3. सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है।<br />
<strong><strong>संपादकीय अभिमत-</strong></strong>यह सच है की प्रतिमा में भगवान् का अस्तित्व नही दिखता पर इस उसमें उसके होने की अनुभूति हमारे मन होती है. आदमी का मन ही उसका मूल है इसलिए उसे मनुष्य कहा जाता है. जब किसी प्रतिमा  के सामने बहुत श्रद्धा से प्रणाम करते हैं तो कुछ देर इस दुनिया से विरक्त हो जाते हैं और हमारा ध्यान थोडी  देर के लिए पवित्र भाव को प्राप्त होता है. यह बहुत महत्वपूर्ण होता है. हाँ, इसके लिए हमें मन में शुद्ध भावना को स्थापित करना पडेगा तभी हम प्रसन्नता प्राप्त कर सकते हैं.  </p>
<p>4.इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। बाल्यकाल, युवावस्था और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही उन्हें अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।<br />
5.जिस प्रकार सोने की चार विधियों-घिसना, काटना, तपाना तथा पीटने-से जांच की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की श्रेष्ठता की जांच भी चार विधियों-त्यागवृति, शील, गुण तथा सतकर्मो -से की जाती है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:बुद्धिमान अपने  आहार की चिंता नहीं करते ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/15/chanky-neetibudhimaan-apne-ahar-ke-chinta-nahin-karte/</link>
<pubDate>Sat, 15 Dec 2007 05:17:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/15/chanky-neetibudhimaan-apne-ahar-ke-chinta-nahin-karte/</guid>
<description><![CDATA[१.बुद्धिमान पुरुष को आहार जुटाने के चि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.बुद्धिमान पुरुष को आहार जुटाने के चिंता नहीं करना चाहिए, उसे तो केवल  अपने धर्म और अनुष्ठान में लगना चाहिए क्योंकि उसका आहार तो उसके मनुष्य जन्म लेते ही उत्पन्न हो जाता है.</p>
<p>अभिप्राय-इसका अभिप्राय यह है कि परमपिता परमात्मा ने जिसे जन्म दिया है उसके लिए आहार का इंतजाम तो उसके भाग्य में लिख दिया है, कहा भी जाता है कि दाने-दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम. आदमी में यह अहंकार रहता है कि में खुद अर्जित कर रहा हूँ जबकि वह  तो उसके भाग्य में लिखा है.</p>
<p> लोगों से जब कहा जाता है कि 'भाई,. धर्म कर्म और भगवान् की भक्ति कर लो.' तो वह कहते हैं कि समय ही कहाँ मिल पाता. परिवार के लिए रोटी कमाने से फुरसत ही कहाँ  है?</p>
<p>ऐसा कहकर अपने को धोखा देते हैं. यहाँ कोई किसी को नहीं पाल सकता. सब अपने लिए नियत भाग्य का खा रहे  हैं. आपने देखा होगा कि कोइ व्यक्ति जब मार जाता है तो उसके पीछे कोई  और मरने नहीं जाता कि अब तो अमुक मर  गया है और अब में कहाँ से रोटी खाऊंगा. अब जिंदा लोग यह खुशफहमी पालें के में किसी को भोजन  और वस्त्र और अन्य  वस्तुएं उपलब्ध करा रहा हूँ तो उसे भ्रमित नहीं तो क्या कहा जायेगा. यह भ्रम नहीं तो और क्या है कि लोग  अपना पूरा जीवन अपने जिस  परिवार को अर्पित करते हुए  धर्म-कर्म और अनुष्टान से दूर रहकर गुजार देते हैं और वह उनके बाद भी यथावत चलता है.   </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[डर की कोख में ही क्रूरता का शैतान जन्म लेता है ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/14/dar-ki-kokh-men-hi-shaitan-jam-leta-hai/</link>
<pubDate>Fri, 14 Dec 2007 15:01:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/14/dar-ki-kokh-men-hi-shaitan-jam-leta-hai/</guid>
<description><![CDATA[कभी बनते थे हथियारों के खिलौने
अब हथिय]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कभी बनते थे हथियारों के खिलौने<br />
अब हथियार ही खिलौने बनने लगे हैं<br />
अपनी देह को बचाने के लिए<br />
लोग रखने लगे हैं हथियार<br />
इस इलेक्ट्रोनिक युग में<br />
कौन रिवाल्वर को खरीद कर<br />
बच्चों को देता है<br />
अपने लिए ही हथियार को खिलौना समझ लेता है<br />
क्या गलती उस बच्चे की जो<br />
हथियार को खिलौना समझ लेता है</p>
<p>किस-किस से शिकायत करें<br />
सबने अपनी जिन्दगी को ही खेल<br />
समझ लिया है<br />
क्या सिखाएंगे वह अपने बच्चों को<br />
जिन्होंने खुद कुछ नहीं सीखा<br />
क्या जियेगा वह जिन्दगी जो<br />
पत्थर की दीवारों के पीछे<br />
हथियार रखकर<br />
भय को अपना मित्र बनाकर<br />
अपनी सुरक्षा का किला समझ लेता है </p>
<p>हथियार रखने से लोग<br />
बहादुर नहीं हो जाते<br />
जो बहादुर होते वह होते दयालू<br />
इसलिए   किसी सी नहीं डरते<br />
जिनके मन में खौफ है<br />
वही क्रूर हो जाते<br />
ओ हथियारों पर भरोसा रखने वालों<br />
तुम खुद भी डरपोक हो और<br />
अपने बच्चों को भी वही विरासत सौंप रहे  हो<br />
समझ लो इस बात को कि<br />
डर की कोख में ही ईर्ष्या और क्रूरता का<br />
शैतान जन्म लेता है  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:सच्चा मित्र दही की तरह निभाता है ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/14/rahim-ke-dohesachcha-mitra-dahi-ke-tarah-nibhata-hai/</link>
<pubDate>Fri, 14 Dec 2007 03:54:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/14/rahim-ke-dohesachcha-mitra-dahi-ke-tarah-nibhata-hai/</guid>
<description><![CDATA[मथत मथत माखन रही, दही मही बिलगाव
रहिमन ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><strong>मथत मथत माखन रही, दही मही बिलगाव<br />
रहिमन सोई मीत हैं, भीर परे ठहराय</strong></strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि जब दही को लगातार माथा जाता है तो उसमें से मक्खन अलग हो जाता है और दही मट्ठे में विलीन होकर मक्खन को अपने ऊपर आश्रय देती है, इसी प्रकार सच्चा मित्र वही होता है जो विपत्ति आने पर भी साथ नहीं छोड़ता। </p>
<p>भावार्थ-सच्चा  दोस्त वक्त पर  ही परखा जाता है जिस प्रकार  दही मट्ठे में परिवर्तित  होकर मक्खन को अपने ऊपर आश्रय देती है वैसे ही सच्चा मित्र विपति में अपने मित्र को बचाने के लिए अपना अस्तित्व समाप्त कर देता है।</p>
<p><strong><strong>मनिसिज माली के उपज, कहि रहीम नहिं जाय<br />
फल श्यामा के उर लगे, फूल श्याम उर आय</strong></strong> </p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि कामदेव रुपी माली  की पैदावार का शब्दों में बखान नहीं किया जा सकता। राधा के हृदय पर जो फल लगे हुए हैं उसके फूल श्याम के हृदय पर ही उगे हैं। </p>
<p><strong><strong>रहिमन गली है सांकरी, दूजो न ठहराहिं<br />
आपु अहैं तो हरि नहीं, हरि आपुन नाहि</strong></strong></p>
<p>संत शिरोमणि रहीम कहते हैं की प्रेम की गली बहुत पतली होती है उसमें दूसरा व्यक्ति नहीं ठहर सकता, यदि मन में अहंकार है तो भगवान का निवास  नहीं होगा और यदि  दृदय में ईश्वर का वास है तो अहंकार का अस्तित्व नहीं होगा। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:मन में पाप हो तो तीर्थ से भी शुद्धि नहीं ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/13/chankya-neetiman-men-pap-ho-to-teerth-se-bhee-shuddhi-naheen/</link>
<pubDate>Thu, 13 Dec 2007 03:14:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/13/chankya-neetiman-men-pap-ho-to-teerth-se-bhee-shuddhi-naheen/</guid>
<description><![CDATA[१.आंखों से देखभाल का पैर रखें, पानी कपड]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.आंखों से देखभाल का पैर रखें, पानी कपडे से छान कर पीयें. शास्त्रानुसार वाक्य बोलें, मन में सोच कर कार्य करें.<br />
२.दान, शक्ति, मीठा बोलना, धीरता और सम्यक ज्ञान यह चार प्रकार के गुण जन्म जात होते हैं, यह अभ्यास से नहीं आते.<br />
३.जिसकी मन में पाप हैं, वह सौ बार तीर्थ स्नान करने के बाद भी पवित्र नहीं हो सकता, जिस प्रकार मदिरा का पात्र जलाने पर भी शुद्ध नहीं होता.<br />
४.जो वर्ष भर मौन रहकर भोजन करता है, वह हजार कोटी वर्ष तक स्वर्ग लोक में पूजित होता है.<br />
५.पीछे-पीछे बुराई कर काम बिगाड़ने वाले और सामने मधुर बोलने वाले मित्र को अवश्य छोड़ देना चाहिए.<br />
६.कुमित्र पर कदापि विश्वास न करें क्योंकि वह आपकी कभी भी आपकी पोल खोल सकता है.<br />
७.अपने शास्त्रों के किसी एक श्लोक अथवा उस में से भी आधे का प्रतिदिन करना चाहिए. इससे अपने मन और विचार की शुद्ध होती है.</p>
<p><strong>नोट-थक रहे ब्लोगर योग साधना शुरू करें-यह लेखा यहाँ अवश्य पढें</strong></p>
<p>http//dpkraj.blogspot.com</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:संतान को शिक्षा न देने वाले माता-पिता शत्रु के समान ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/12/%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%8d/</link>
<pubDate>Wed, 12 Dec 2007 03:52:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१.इस संसार में कुछ प्राणियों के किसी व]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.इस संसार में कुछ प्राणियों के किसी विशेष अंग में विष होता है-जैसे सर्प के  दांतों  में मक्खी के मस्तिष्क में और बिच्छू की पुँछ में-पर इन सबसे अलग दुर्जन और कपटी मनुष्य के  हर अंग में विष होता है. उसके मन में विद्वेष,वाणी में कटुता और कर्म में नीचता का व्यवहार  जहर बुझे तीर की तरह दूसरे को त्रास देते हैं.</p>
<p>२.जो माता-पिता अपने पुत्र को शिक्षित नहीं करते वह उसके शत्रु के समान हैं.<br />
संपादकीय अभिव्यक्ति-चाणक्य के काल में पूरा समाज  स्त्री को घरेलू शिक्षा तक ही सीमित था पर आज के आधुनिक समाज में यह कथन पुत्री की शिक्षा पर भी लागू होता है. </p>
<p>३.हर मनुष्य को सभी विधाओं में निपुण होना चाहिऐ. बडे लोगों से विनम्रता, विद्वानों से श्रेष्ठ और मधुर ढंग से वार्तालाप का तरीक सीखना चाहिए.  जुआरियों से झूठ बोलना और  कुशल स्त्रियों से चालाकी का गुण सीखना चाहिए.<br />
४.मनुष्य  को ऐसे कर्म करना जिससे उसकी कीर्ति सब और फैले. विद्या, दान, तपस्या, सत्य भाषण और धनोपार्जन के उचित तरीकों से कीर्ति दसों दिशाओं में फैलती है.</p>
<p>५.अपना जीवन शांतिपूर्वक बिताने के लिए हर मनुष्य को धर्म-कर्म का अनुष्ठान करते रहना चाहिऐ. वह घर मुर्दाघर के समान हैं जहाँ धर्म-कर्म या यज्ञ-हवन नहीं होता. जहाँ वेद शास्त्रों का उच्चारण नहीं होता, विद्वानों का सम्मान नहीं होता और यज्ञ-हवन से देवताओं का पूजन नहीं होता ऐसे घर, घर न रहकर शमशान के समान होता है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:जिस देश में मूर्खों का सम्मान नहीं होता वहाँ समृद्धि आती है ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/11/chanakya-nitijahan-moorkhon-ka-samman-naheen-hota/</link>
<pubDate>Tue, 11 Dec 2007 04:03:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/11/chanakya-nitijahan-moorkhon-ka-samman-naheen-hota/</guid>
<description><![CDATA[१.जिस देश में मूर्खों का सम्मान नहीं ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.जिस देश में मूर्खों का सम्मान नहीं होता, अन्न संचित रहता है तथा पति-पत्नी में झगडा नहीं होता वहाँ लक्ष्मी बिना बुलाए निवास करती है.<br />
अभिप्राय-इस कथन का आशय यह है की यदि किसी देश में सुख और समृद्धि आयेगी तो गुणवानों  के समान  से आयेगी.इसके अलावा जहाँ खाद्यान के भण्डार एवं परिवारों में शांति होती है वही खुशहाली होती है.      </p>
<p> 2.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वाचों द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।<br />
३.समय  के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं। मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बुद्धि  भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।<br />
4.जो बात बीत गयी उसका सोच नहीं करना चाहिए। समझदार लोग भविष्य की भी चिंता नहीं करते और केवल वर्तमान पर ही विचार करते हैं।हृदय में प्रीति रखने वाले लोगों को ही दुःख झेलने पड़ते हैं। प्रीति सुख का कारण है तो भय का भी। अतएव प्रीति में चालाकी रखने वाले लोग ही सुखी होते है.<br />
५. व्यक्ति आने वाले संकट का सामना करने के लिए पहले से ही तैयारी कर रहे होते हैं वह उसके आने पर तत्काल उसका उपाय खोज लेते हैं। जो यह सोचता है कि भाग्य में लिखा है वही होगा वह जल्द खत्म हो जाता है। मन को विषय में लगाना बंधन है और विषयों से मन को हटाना मुक्ति है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पहले अपनी नीयत बताओ ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/10/pahle-apni-neeyat-bataao/</link>
<pubDate>Mon, 10 Dec 2007 14:17:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/10/pahle-apni-neeyat-bataao/</guid>
<description><![CDATA[कहते हैं रामजी के होने के
भौतिक सबूत ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कहते हैं रामजी के होने के<br />
भौतिक सबूत हमारे सामने लाओ<br />
नहीं ला सकते तो उन्हें भूल जाओ<br />
राम जी की माया अपरम्पार<br />
जिस पर माया का भूत चढा दें<br />
अपना नाम भी भुलवा दें<br />
सोने के सिंहासन पर बैठते ही<br />
भगवान् की तरह पूजने की चाह<br />
उन्हें अंधा बना देती  है<br />
रामजी का नाम रहते यह संभव नहीं<br />
अमीर तो क्या गरीब के मन भी<br />
उनका नाम बसता है कहीं न कहीं<br />
दिलों के नाम मिटाने के लिए<br />
वह कहते है<br />
उनके होने का सबूत लाओ </p>
<p>राम के नाम का उनको कितना खौफ है<br />
गरीबी, शोषण और बीमारी के दवा के लिए<br />
लोगों को इधर उधर भटकाते हैं<br />
राम की प्रस्तर की प्रतिमा को<br />
पूजने से मना  करने वाले ही<br />
मुर्दों के नाम पर पत्थर लगाकर<br />
उस पर माला चढाते हैं<br />
कहीं अपना काम न बने तो<br />
पत्थर लगवाने के लिए<br />
जिंदा इंसान  को ही मुर्दा बनाते हैं<br />
राम का नाम फिर भी लेते हैं<br />
यह कहने के लिए उसे भूल जाओ </p>
<p>रामभक्त भी सबूत जुटा लेंगे<br />
अपने भक्तों के लिए रामजी  भी<br />
अपनी कृपा उन पर लुटा देंगे<br />
पर सवाल करने वाले भी<br />
इसके पीछे जो उनके  दिल की नीयत  है<br />
क्या वह अपनी हथेली पर रखकर  दिखा देंगे<br />
कर सकते हैं तभी कहें कि<br />
'राम जी के होने के सबूत लाओ'<br />
-----------------------------------  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति: इस कड़वे संसार  में दो मीठे फल भी लगते हैं ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/09/chankya-nitiis-kadev-sansar-men/</link>
<pubDate>Sun, 09 Dec 2007 09:12:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/09/chankya-nitiis-kadev-sansar-men/</guid>
<description><![CDATA[१.इस संसार की तुलना एक कड़वे वृक्ष से क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.इस संसार की तुलना एक कड़वे वृक्ष से की जाती है जिस पर पर अमृत के समान दो फल भी लगेते हैं-मधुर वचन और सद्पुरुषों की संगति. ये दोनों अत्यंत गुणकारी होते हैं. इन्हें खाकर आदमी अपने जीवन को सुखद बना सकता है. अत हर मनुष्य को मधुर वचन और सत्संग का फल ग्रहण करना चाहिए </p>
<p>2.जिसके कार्य में स्थिरता नहीं है, वह समाज में सुख नहीं पाता न ही उसे  जंगल में सुख मिलता है. समाज के बीच वह परेशान रहता है और किसी का साथ पाने के लिए तरस जाता है.<br />
3.गंदे पड़ोस में रहना, नीच कुल की सेवा, खराब भोजन करना, और  मूर्ख पुत्र बिना आग के ही जला देते हैं.<br />
4.कांसे का बर्तन राख से, तांबे का बर्तन इमले से,स्त्री रजस्वला कृत्य से और नदी  पानी की तेज धारा से पवित्र होती है.<br />
5.मनुष्य में अंधापन कई प्रकार का होता है. एक तो जन्म के अंधे होते हैं और आंखों से बिलकुल नहीं देख पाते और कुछ आँख के रहते हुए भी हो जाते हैं जिनकी अक्ल को कुछ सूझता नहीं है.<br />
6.काम वासना के अंधे के कुछ नहीं सूझता और मदौन्मत  को भी कुछ नहीं सूझता. लोभी भी अपने दोष के कारण वस्तु में दोष नहीं देख पाता. कामांध  और मदांध इसी श्रेणी में आते हैं.<br />
7.कुछ लोगों की प्रवृतियों को ध्यान में रखते हुए उनको वश में किया जा सकता है, और उनको वश में किया जा सकता है, लोभी को धन से, अहंकारी को हाथ जोड़कर, मूर्ख को मनमानी करने देने से और सत्य बोलकर विद्वान को खुश किया जा सकता है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ चाणक्य नीति:धर्म का नियम ही शाश्वत ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/08/chankya-neetidharam-kaa-niyam-hee-shashvat/</link>
<pubDate>Sat, 08 Dec 2007 04:02:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/08/chankya-neetidharam-kaa-niyam-hee-shashvat/</guid>
<description><![CDATA[१.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की भी गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य का  जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य को  शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।</p>
<p>२.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है । इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। बाल्यकाल, युवावस्था और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही उन्हें अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है।<br />
३.जिस प्रकार सोने की चार विधियों-घिसना, काटना, तपाना तथा पीटने-से जांच की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की श्रेष्ठता की जांच भी चार विधियों-त्यागवृति, शील, गुण तथा सतकर्मो -से की जाती है।</p>
<p>४.अज्ञानी व्यक्ति को कोई भी बात समझायी जा सकती है क्योंकि  उसे  किसी बात का ज्ञान तो है नहीं। अत: उसे जो कुछ समझाया जाएगा वह समझ सकता है, ज्ञानी को तो कोई बात बिल्कुल सही तौर पर समझायी जा सकते है। परन्तु अल्पज्ञानी को कोई भी बात नही समझायी क्योंकि अल्पज्ञान के रुप में अधकचरे ज्ञान का समावेश होता है जो किसी भी बात को उसके मस्तिष्क तक पहुंचने ही नहीं देता। </p>
<p>*संकलनकर्ता  का मत है कि अल्पज्ञानी को अपने ज्ञान का अहंकार हो जाता है इसलिये वह कुछ सीखना ही नहीं चाहता, वह केवल अपने प्रदर्शन में ही लगा रहता है।<br />
<strong>नोट-रहीम, चाणक्य, कबीर और कौटिल्य की त्वरित पोस्टें नारद और ब्लोगवाणी पर अभी उपलब्ध हैं, अत: वहाँ देखने का प्रयास करें. </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विकास यानि वाहनों की चौडाई बढना सड़क की कम होना ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/06/vikas-yani-vahanon-kee-chaudaaee-bahdnaa-aur-sadkon-kee-kam-honaa/</link>
<pubDate>Thu, 06 Dec 2007 14:27:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/06/vikas-yani-vahanon-kee-chaudaaee-bahdnaa-aur-sadkon-kee-kam-honaa/</guid>
<description><![CDATA[बहुत समय से देश के विकास होने के   प्रचा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत समय से देश के विकास होने के   प्रचार का मैं टीवी चैनलों और अख़बारों में सुनता आ रहा हूँ. तमाम तरह के आंकडे भी दिए जाते हैं पर जब मैं रास्तों से उन रास्तों से गुजरता हूँ-जहाँ चलते हुए वर्षों हो गयी है-तो उनकी हालत देखकर यह ख्याल आता है कि आखिर वह विकास हुआ कहाँ है. अगर इसे विकास कहते हैं तो वह इंसान के लिए बहुत तकलीफ देह होने वाला है.</p>
<p>पेट्रोल, धुएं और रेत से पटे पड़े रास्ते राहगीरों की साँसों में जो विष घोल रहे हैं उससे  अनेक बार तो सांस बंद करना पड़ती हैं कि यह थोडा आगे चलकर यह विष भरा धुआं और गंध कम हो तो फिर लें. टेलीफोन, जल और सीवर की लाईने डालने और उनको सुधारने के लिए खुदाई हो जाती है पर सड़क को पहले वाली  शक्ल-जो पहले भी कम बुरी नहीं थी-फिर वैसी नहीं हो पाती. अपने  टीवी चैनल और अखबार चीन के विकास की खबरें दिखाते हुए चमचमाती सड़कें और ऊंची-ऊंची गगनचुंबी इमारतें दिखा कर यह बताते हैं कि हम उससे बहुत पीछे हैं-पर यह मानते हैं  कि अपने देश में विकास हो रहा है पर धीमी गति से. मैं जब वास्तविक धरातल पह देखता हूँ तो पानी और पैसे के लिए देश का बहुत बड़ा वर्ग अब भी जूझ रहा है. कमबख्त विकास कहीं तो नजर आये. </p>
<p>आज एक अखबार में पढ़ रहा था कि भारत में पुरुषों से मोबाइल अधिक महिलाओं के पास बहुत हैं. मोबाइल से औरतें  अधिक लाभप्रद स्थिति में दिखतीं  हैं क्योंकि अब किसी से बात करना है तो उसके घर जाने की जरूरत ही नहीं है मोबाइल पर ही बात कर ली, पर पुरुषों की समस्या यह है कि उनको अपने कार्यस्थल तक घर से सड़क मार्ग से ही जाना  है और उनके लिए यह रास्ते कोई सरल नहीं रहे. साथ में मोबाइल लेकर उनके लिए चलना वैसे भी ठीक नहीं है. रास्ते में  मोबाइल की घंटी मस्तिष्क में कितनी बाधा पहुचाती है यह मैं जानता हूँ. उस दिन बीच सड़क पर स्कूटर पर घंटी बजी और मेरे  इर्द-गिर्द वाहनों की गति बहुत तेज थी कि एक तरफ रूकने के लिए मुझे समय लग गया. जब एक तरफ रुका तो जेब से मोबाइल निकाला तो देखा कि 'विज्ञापन' था. उस समय झल्लाहट हुई पर मैं क्या कर सकता था? फिर मैंने स्कूटर भी सड़क से ढलान से उतरकर  ऐसी जगह रोका था  जहाँ सड़क पर लाने के लिए शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन करना पडा. </p>
<p>आपने देखा होगा कि जो आंकडे विकास के रूप में दिए जाते हैं उनमें देशों में मोबाइल, कंप्यूटर और टीवी के उपभोक्ता की संख्या  शामिल रहती है. अब विकास का अर्थ प्रति व्यक्ति की आय-व्यय की जगह  धन की बर्बादी से है. यह नहीं देखते कि उनका उपयोग क्या है? मैं तो आज तक समझ नहीं पाया कि लोग मोबाइल पर इतनी लंबी बात करते क्या हैं. फालतू, एकदम फालतू? फिर तमाम ऍफ़ एम् रेडियो, और टीवी पर ऐसे सवाल करते है ( उस पर एस.एम्.एस करने के लिए कहा जाता है) जो एक दम साधारण होते हैं. लोग जानते हैं कि यह सब उनका धन खींचने के लिए किया जा रहा है पर अपने को रोक नहीं पाते क्योंकि उन्हें क्षेत्र, धर्म, और भाषा के नाम पर बौद्धिक रूप से गुलाम बना दिया  गया है कि वह उससे मुक्त नहीं हो पाता. </p>
<p>अगर मुझसे पूछें तो विकास का मतलब है कि वाहनों की चौडाई बढना और सड़क की कम होना. जब भी कहीं जाम में फंसता हूँ तो मुझे नहीं लगता कि वह लोगों और उनके वाहनों की संख्या की वजह से है. दो सौ मीटर के दायरे में सौ लोग और पच्चीस वाहन भी नहीं होंगे पर जाम फिर भी लग जाता है. वहाँ कारें, ट्रेक्टर और मोटर साइकलों पर एक-एक व्यक्ति सवार हैं पर सड़क तंग है तो रास्ता जाम हो जाता है. सड़कें भी जो पहले चौड़ी थी वहाँ इस  तरह निर्माण  किये गए हैं कि पता नहीं कि कब यह हो गए. जहाँ पहले पेड़ थे वहाँ गुमटियाँ, ठेले और कहीं पक्के निर्माण हो गए हैं और सड़क छोटी हो गयी और वाहन जहाँ साइकिल और स्कूटर थे वहाँ आजकल कारों का झुंड हो गया है. यह विकास और उत्थान  है तो फिर विनाश और पतन   किसे कहते हैं यह मेरे लिए  अभी भी एक पहेली है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:जहाँ धनी, ज्ञानी और निपुण राजा न हो वह स्थान  छोड़ दें]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/06/chankya-nitijahah-gyani-aur-dhani-n-ho-vah-jagah-chhod-den/</link>
<pubDate>Thu, 06 Dec 2007 04:04:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[1.किसी भी व्यक्ति का जहाँ सम्मान न हो उस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.किसी भी व्यक्ति का जहाँ सम्मान न हो उसे त्याग देना चाहिए. क्योंकि बिना सम्मान के मनुष्य जीवन जीने का कोई अर्थ नहीं है.<br />
2.किसी भी व्यक्ति को वह स्थान भी त्याग देना चाहिए जहाँ आजीविका न हो क्योंकि आजीविका रहित मनुष्य समाज में किसी सम्मान के योग्य नहीं रह जाता. </p>
<p>3.इसी प्रकार  वह देश और क्षेत्र भी त्याज्य है जहाः अपने मित्र व संबंधी न रहते हों क्योंकि इनके अभाव में व्यक्ति कभी भी असहाय हो सकता है.<br />
4.वेद के ज्ञान की गहराई न समझकर वैद की निंदा करने वाले वेद  की महानता  कम नहीं कर सकते.शास्त्र निहित आचार-व्यवहार को व्यर्थ बताने वाले अल्प ज्ञानी उसकी विषय सामग्री की उपयोगिता को नष्ट नहीं कर सकते</p>
<blockquote><p>5.जिस स्थान पर धनी-व्यापारी, ज्ञानीजन, शासन  व्यवस्था में निपुण राजा, सिंचाई अथवा जल आपूर्ति की व्यवस्था न  हो उस स्थान का भी त्याग कर देना चाहिऐ. क्योंकि धनि से श्री वृद्धि ज्ञानी से विवेक , निपुण राजा से मनुष्य की सुरक्षा और जल से जीवन के रक्षा होती है.</p></blockquote>
<p>6.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की भी गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य का  जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य को  शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[चाणक्य नीति:जहाँ यज्ञ-हवन न हो वह घर मुर्दाघर समान ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/05/chaanky-neetijahaan-yagya-havan-n-ho-vah-ghar-murdaaghar-samaam/</link>
<pubDate>Wed, 05 Dec 2007 03:53:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१.इस संसार में कुछ प्राणियों के किसी व]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.इस संसार में कुछ प्राणियों के किसी विशेष अंग में विष होता है-जैसे सर्प के  दांतों  में मक्खी के मस्तिष्क में और बिच्छू की पुँछ में-पर इन सबसे अलग दुर्जन और कपटी मनुष्य के  हर अंग में विष होता है. उसके मन में विद्वेष,वाणी में कटुता और कर्म में नीचता का व्यवहार  जहर बुझे तीर की तरह दूसरे को त्रास देते हैं.</p>
<p>२.किसी भी व्यक्ति को वह स्थान भी त्याग देना चाहिए जहाँ आजीविका न हो क्योंकि आजीविका रहित मनुष्य समाज में किसी सम्मान के योग्य नहीं रह जाता. </p>
<p>३.हर मनुष्य को सभी विधाओं में निपुण होना चाहिऐ. बडे लोगों से विनम्रता, विद्वानों से श्रेष्ठ और मधुर ढंग से वार्तालाप का तरीक सीखना चाहिए.  जुआरियों से झूठ बोलना और  कुशल स्त्रियों से चालाकी का गुण सीखना चाहिए.<br />
४.मनुष्य  को ऐसे कर्म करना जिससे उसकी कीर्ति सब और फैले. विद्या, दान, तपस्या, सत्य भाषण और धनोपार्जन के उचित तरीकों से कीर्ति दसों दिशाओं में फैलती है.</p>
<p>५.अपना जीवन शांतिपूर्वक बिताने के लिए हर मनुष्य को धर्म-कर्म का अनुष्ठान करते रहना चाहिऐ. वह घर मुर्दाघर के समान हैं जहाँ धर्म-कर्म या यज्ञ-हवन नहीं होता. जहाँ वेद शास्त्रों का उच्चारण नहीं होता, विद्वानों का सम्मान नहीं होता और यज्ञ-हवन से देवताओं का पूजन नहीं होता ऐसे घर, घर न रहकर शमशान के समान होता है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[चीखकर करना पङता है इजहार ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/02/cheekhkar-karnaa-padta-hai-ijhar/</link>
<pubDate>Sun, 02 Dec 2007 11:04:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[चारों और मचती चीख पुकार
कोई खुशी में च]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>चारों और मचती चीख पुकार<br />
कोई खुशी में चिल्ला रहा है<br />
कोई तकलीफ में कर रहा है चीत्कार<br />
सुखों की खोज में बढ़ता आदमी<br />
दुख जुटा रहा है<br />
अपना चैन गँवा रहा है<br />
दिल का दर्द इतना बढ जाता है<br />
चिल्ला कर ही हो पाता है इजहार<br />
कानों से किसी का दर्द<br />
सुनने की आदत भी कहाँ रही<br />
किसी को सुनाना  है तो<br />
इतनी शक्ति लगानी जरूरी हैं<br />
की कान के के खुलें द्वार<br />
इसलिए ही मची है<br />
चारों और मची है  चीख पुकार  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:जादू-टोना व्यर्थ है ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/02/sant-kabir-vanijadu-tona-vyarth-hai/</link>
<pubDate>Sun, 02 Dec 2007 04:48:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[जो कोय निन्दै साधू को, संकट आवै सोय
नरक ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जो कोय निन्दै साधू को, संकट आवै सोय<br />
नरक जाय जन्मै मरै, मुक्ति कबहु नहिं होय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो भी साधू और संतजनों की निंदा करता है, उसके अनुसार अवश्य ही संकट आता है। वह निम्न कोटि का व्यक्ति नरक-योनि के अनेक दु:खों को भोगता हुआ जन्मता और मरता रहता है। उसके मुक्ति कभी भी नहीं हो सकती और वह हमेशा आवागमन के चक्कर में फंसा रहेगा।</p>
<p><strong><strong>बोलै बोल विचारि के, बैठे ठौर संभारि<br />
कहैं कबीर ता दास को, कबहु न आवै हारि</strong></strong><br />
इसका आशय यह है कि जो आदमी वाणी के महत्त्व को जानता है,, समय देखकर उसके अनुसार सोच और विचार कर बोलता है और अपने लिए उचित स्थान देखकर बैठता है वह कभी भी कहीं भी पराजित नहीं हो सकता।</p>
<p><strong><strong>जंत्र मन्त्र सब झूठ है, मति भरमो जग कोय<br />
सार शब्द जाने बिना, कागा हंस न होय </strong></strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जीं का यह आशय है कि यन्त्र-मन्त्र एवं टोना-टोटका आदि सब मिथ्या हैं। इनके भ्रम में मत कभी  मत आओ। परम सत्य के ठोस शब्द-ज्ञान के बिना, कौवा कभी भी हंस नहीं हो सकता अर्थात दुर्गुनी-अज्ञानी लोग कभी  सदगुनी और ज्ञानवान नही हो सकते </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सच किसे समझाएं]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/01/sach-kise-samjhaaen/</link>
<pubDate>Sat, 01 Dec 2007 13:02:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/01/sach-kise-samjhaaen/</guid>
<description><![CDATA[सदियों से चले आ रही
लोगों के समूहों की ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सदियों से चले आ रही<br />
लोगों के समूहों की परिभाषाएँ<br />
बाहर से मजबूत किले की तरह लगते<br />
अन्दर रिवाजों में एक दूसरे को ठगते<br />
बाहर से आदर्श  लगते<br />
पर एक शब्द से हिलते नजर आएं<br />
वक्त देखें तो पहचान छिपाएं<br />
फायदा देखें सीना तानकर सामने आयें<br />
सभ्य  समाज हो रहा है दिशाहीन<br />
अक्षरज्ञान जितना बढ़ता जा रहा है<br />
अक्षरों से बने  शब्दार्थ पर  हो रही है जंग<br />
लोगों के दिमाग हो रहे हैं तंग<br />
अभिव्यक्ति का मतलब चिल्लाना हो गया है<br />
ऐसे में सच किसे समझाएं<br />
------------------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
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