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	<title>चिंतन &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/चिंतन/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "चिंतन"</description>
	<pubDate>Tue, 13 May 2008 19:04:02 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[नारद और चिट्ठा जगत के मित्रों,जरा ब्लोगवाणी को चेक करें]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=23</link>
<pubDate>Sun, 11 May 2008 17:35:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[आज अनिल रघुराज की एक पोस्ट ^एक हिंदुस्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आज अनिल रघुराज की एक पोस्ट<a href="http://diaryofanindian.blogspot.com/"> ^एक हिंदुस्तानी की डायरी में^ </a> पर मैंने एक कमेंट लगाई। यह कमेंट दूसरे नंबर पर लगायी थी। अभी शाम को मैं जब ब्लागवाणी चेक कर रहा था तो अनिल रधुराज जी की पोस्ट पर चार कमेंट चमक रहे थे। इसमे सबसे ऊपर कोई एक महिला ब्लाग लेखिका का नाम था और सबसे आखिरी एक ब्लाग लेखक का। मैंने पुनः ब्लाग खोलकर देखा तो ब्लाग लेखक ने सातवें और आठवें नंबर पर था। </p>
<p>मैं अपना नाम देखकर यह सोच रहा था कि यह नीचे से ऊपर के क्रम में होंगे पर जब ब्लाग खोलकर देखा तो मुझे हैरानी हुई। आखिर यह क्या माजरा है? एक तरफ कुछ लोग कहते फिर रहे है कि टिप्पणियां करो और दूसरी तरफ ऐसा? अब यह कैसे संभव है। अभी जब यह पोस्ट मैं लिख रहा था तब लाईट चली गयी और लौटकर आया तो देखा कि उड़ल तश्तरी जी की कमेंट वहां दूसरे नंबर पर चमक रही है। क्या एग्रीगेटर को यह अधिकार है कि चाहे जिसकी टिप्पणियां दिखायेगा? नारद और चिट्ठा जगत वाले चेक करें बतायें यार, यह क्या गड़बड़झाला है? मै भ्रम में हूं या ब्लागवाणी वाले खुशफहमी में।<br />
अपनी बात अपने नाम से रखें तो बेहतर है क्योंकि अनामों का साथ मेरे लिये उपयोगी नहीं होगा क्योंकि यह बात निकली है तो दूर तक जायेगी। वैसे मैं किसी प्रकार के विवाद पसंद नहीं करता पर मेहनत कर लिखता हूं और एक मजदूरी की तरह ही हूं। जब कोई किसी की मेहनत पर आक्षेप करता है तब मुझे मजबूर होकर संघर्ष करना पड़ता है अब कोई यह मत कहना कि ज्ञानी होकर ऐसी बात कर रहा है। अब यह बात मत कहना कि दूसरों को प्रोत्साहन की जरूरत है तुम्हें नहीं। याद रखना अपनी मेहनत का मजाक उड़ाने वालों पर मुझे हास्य कविता बरसाने का अभ्यास इसी अंतर्जाल पर हुआ है। कोई तकनीकी गड़बड़ी बताने से पहले यह भी सोच लेना 1983 में कंप्यूटर पर हाथ रखा था। </p>
<p>-------------------------------------------------------------------------<br />
एक हिंदुस्तानी की डायरी में अनिल रघुराज 39 बार पढ़ा गया </p>
<p>--------------------------------------------------------------------------------<br />
टिप्पणियां (कुल: 8)<br />
बोधिसत्व-जय हो भाई..पर यह साहित्यकार कौन है जो नामर्द है......<br />
Udan Tashtari-हमारी आवाज ने जगा ही दिया. बात में तो दम है मगर हम...<br />
आभा-तेरहवी की बात क्यों कर रहे हैं...हमें तो आपकी पोस्...<br />
विजयशंकर चतुर्वेदी-रघुराज भाई, अपन तो सोच रहे थे कि आप गर्मियों की छु... </p>
<p>---------------------------------------------------------------------------<br />
यह मेरा ब्लोग केवल नारद और चिट्ठजगत पर ही है इसलिए इस पर लिख कर तसदीक करना चाहता हूँ । फिर आगे कुछ और भी लिखेंगे।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्रिकेट मैच के लिये एक्शन सीन लिख देना-हास्य व्यंग्य ]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=18</link>
<pubDate>Wed, 30 Apr 2008 17:02:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=18</guid>
<description><![CDATA[ब्लागर अपने कंप्यूटर पर बैठा था कि उसक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ब्लागर अपने कंप्यूटर पर बैठा था कि उसकी पत्नी ने  उसे दूसरे ब्लागर के मिलने की खबर  अंदर आकर सुनायी। उसने कहा-‘बोल दो घर पर नहीं है।’</p>
<p>तब तक दूसरा ब्लागर अंदर आ गया और बोला-‘भाई साहब हमसे क्या नाराजगी है?’</p>
<p>पहले ब्लागर ने कहा-‘‘नाराजगी तुमसे नहीं है। तुम्हारी भाभीजी से है तुम्हें अंदर न बुलाकर हमें यह बताने आयीं हैं कि तुम आ गये हो। वैसे हमारी नजरें बहुत तेज हैं और हमने देख लिया था कि तुम अंदर आये हो।’</p>
<p>वह आकर उसके पास रखी कुर्सी पर बैठ गया और बोला-‘‘भाभीजी, आप मुझे शिकंजी पिलाईये। भाई साहब जरूर शिकंजी पीते हैं-ऐसा मेरा विश्वास है।’</p>
<p>पहले ब्लागर ने कहा-‘पर यह बात हमने अपने किसी ब्लाग पर तो नहीं लिखी।’</p>
<p>दूसरा ब्लागर बोला-‘मैने अंदाजा कर लिया था। शिकंजी पीकर  इंटरनेट पर  ब्लाग पर  अच्छी तरह लिखा जा सकता है।’</p>
<p>भद्र महिला चली गयी तो वह अपने असली रूप में आ गया और बोला-‘पर जरूरी नहीं है कि शिकंजी पीकर हर कोई ब्लाग पर अच्छा लिख सकता हो।’</p>
<p>पहले ब्लागर ने कहा-‘हां इसमें कोई शक नहीं है, अगर वह कुछ लिखता हो तो?’<br />
दूसरे ने ब्लागर ने कहा-‘हम पर फब्तियां कस रहे हो!<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘‘और तुम क्या कर रहे थे?वैसे इधर कैसे भटक गये।’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘‘मैं एक  क्रिकेट प्रतियोगिता करा रहा हूं। जिसमें चार ब्लागर और चार कमेंटरों की टीमें हैं। मै चाहता हूं कि तुम उनके लिये कोई एक्शन सीन लिख दो।’</p>
<p>तब तक गृहिणी शिकंजी के ग्लास बनाकर लायी। उसने जब सुना कि कोई क्रिकेट के एक्शन सीन की बात हो रही है तो वह उत्सुकतावश वहीं एक तरफ बैठ  गयी।<br />
पहला ब्लागर-‘क्रिकेट मैच के लिये एक्शन सीन? और इतने सारे ब्लागर और कमेंटर तुम्हारे पास आये कहां से? क्या कहीं से नीलामी में ले आये क्या?’</p>
<p>दूसरा ब्लागर अब गृहिण की उपस्थिति के आभास होने पर सम्मान के साथ  बोला-‘अरे भाईसाहब, आप भी कैसी बात करते हो। अरे, आजकल वह समय गया। आप देख नहीं रहे कहां का खिलाड़ी कहां खेल रहा है। शहर का वासी हो या न हो तो पर उस शहर की तरफ से खेल तो सकता है। वैसे ही ब्लागर हो या न हो, कमेंटर हो या न हो और उसने कभी इंटरनेट खोला भी न हो पर हमने कह दिया कि ब्लागर तो ब्लागर। हमें अपने काम और कमाई से मतलब है।’<br />
दूसरा ब्लागर उसे हैरानी से देखने लगा। फिर वह बोला-‘‘आप तो कुछ एक्शन सीन लिख दो। आजकल तो क्रिकेट के साथ एक्शन भी जरूरी है। किसी खिलाड़ी को किससे लड़वाना है। लड़ाई के लिये वह कौनसा शब्द बोले यह लिखना है। थप्पड़ या घूसा किस तरह मारे और दूसरे के जोर से लगता दिखे पर लगे नहीं इसलिये मैं ही एक्शन डायरेक्टर तो मैं ही रहूंगा पर यह तो कोई पटकथा लेखक ही तय कर सकता है।  फिर उसके लिये कमेटी होगी तो उसमें बहस के डायलाग लिखवाना है। सजा का क्या हिसाब-किताब हो यह भी लिखना है।  एक-दो खिलाड़ी ऐसे है जिनको एक दो मैच बाद बाहर बैठने के लिये राजी कर लिया है। उसके लिये तमाम तरह का प्रचार कराना है।</p>
<p>गृहिणी ने पूछा-‘पर यह किसलिये?’</p>
<p>वह बोला-‘अपने शहर की इज्जत बढ़ाने के लिये। देखिये हमारे शहर की कोई टीम नहीं बुला रहा। इसलिये मैं अपने शहर में क्रिकेट के खेल के विकास के लिये यह कर रहा हूं। स्थानीय मीडिया मेंे भी इसके लिये संपर्क साध रहा हूं ताकि अधिक से अधिक लोग वहां पहुंचे। और हां, इटरवैल में नाच गाने का भी इंतजाम किया है।’</p>
<p>पहले ब्लागर ने कहा-‘‘मैने आज तक कोई नाटक नहीं लिखा।’<br />
दूसरा ब्लागर बोला-‘इसमे लिखने लायक है क्या? यह तो सब आसानी से हो जायेगा। बस थोड़ा सोचना भर है। मुझे अन्य व्यवस्थायें देखनीं नहंी होतीं तो मैं ही इस पर लिखता।’’</p>
<p>पहले ब्लागर ने कहा-‘‘मेरे बूते का नहीं है। जब झगड़ा कराना है तो उसके लिये कुछ ऐसा वैसा लिखना जरूरी है, और इस मामले में तुम जितने दक्ष हो मैं तो हो ही नहीं सकता।’</p>
<p>गृहिणी ने दूसरे ब्लागर की तरफ देखकर कहा-‘आपने तो सारे सीन पहले ही  सोच लिये है। एकदम जोरदार कहानी लग रही है। बस आपको तो शब्द ही तो भरने हैं। अभी आप यह सीन बताकर जा रहे हैं यह तो उसे भी याद नहीं रख पायेंगे।फिर लिखेंगे कहां से? आप कोशिश करो तो अच्छा लिख लोगे।’<br />
दोनो ने शिकंजी का ग्लास खत्म किया तो वह दोनों ग्लास उठाकर चली गयी । दूसरा ब्लागर बोला-‘‘ठीक है जब क्रिकेट मैच कराना है और उसमें एक्शन के सीन रखने हैं तो यह भी कर लेता हूं। देखो भाभीजी ने हमारा हौंसला बढ़ाया। एक तुम हो जब तब ऐसी वैसी बातें करते हो। भाभीजी बहुत भले ढंग से पेश आतीं हैं और तुम........................छोड़ो अब तुमसे क्या कहूं</p>
<p>पहले ब्लागर ने कहा-‘हां, पर याद रखना मैंने तुम्हारी उस तुम्हारी पहले और आखिरी कमेंट के बारे में उसे कुछ नहीं बताया। क्या इसके लिये मुझे धन्यवाद नहीं दोगे?<br />
दूसरे ने कहा-‘‘अच्छा मैं चल रहा हूं। और हां, इस ब्लागर मीट पर भी कुछ अच्छा लिख देना ताकि मेरी प्रतियोगिता को प्रचार मिले। फिर देखो तुम्हें कैसे फ्लाप से हिट बनाता हूं।’</p>
<p>वह चला गया और गृहिण ने पूछा-‘‘क्या कहा उसने?’</p>
<p>पहले ब्लागर ने कहा-‘तुमने भी तो सुना! यही कहा‘क्रिकेट मैच के लिये एक्शन सीन लिख देना’।’’</p>
<p>फिर वह मन में सोचने लगा-‘मैने इस बार भी नहीं पूछा कि इंटरनेट पर बने ब्लाग पर मैं यह रिपोर्ट हास्य कविता के रूप में लिखूं या नहीं। चलो अगली बार पूछ लूंगा।<br />
नोट-यह काल्पनिक हास्य-व्यंग्य रचना है और इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा। इन पंक्तियों का लेखक किसी ऐसे दूसरे ब्लागर से नही मिला। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्रिकेट मैच में एक्शन का सीन-हास्य कविता]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=20</link>
<pubDate>Wed, 30 Apr 2008 15:31:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=20</guid>
<description><![CDATA[बगल में अखबार दबाकर
घर आया फंदेबाज और ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#ff00ff;">बगल में अखबार दबाकर<br />
घर आया फंदेबाज और बोला<br />
‘दीपक बापु तुमने<br />
पहले अखबारों  और अब ब्लाग पर<br />
क्रिकेट पर ही लिखना शुरू किया<br />
फिर क्यों अब मूंह फेर लिया<br />
देखो क्रिकेट में फिल्म के एक्शन का<br />
मजा भी आ रहा है<br />
पहले पिटा  हीरो<br />
अब पीटकर बाहर जा रहा है<br />
क्यों नहीं तुम भी देखा करते<br />
बैट-बाल के खेल में<br />
मारधाड़ की भी मजा क्यों नहीं लिया करते<br />
ऐसे क्रिकेट से क्यों किनारा किया’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#ff00ff;">सुनकर पहले हैरान हुए फिर बोले<br />
‘‘हम फिल्म के वक्त फिल्म और<br />
क्रिकेट के वक्त क्रिकेट देख करते हैं<br />
यह टू-इन-वन मजा तुम ही लो<br />
हमें तो अब इससे दूर ही समझ लो<br />
हमने पहले भी कहा था<br />
क्रिकेट अब कम खेली जायेगी<br />
पर उससे पहले उसकी पटकथा लिखा जायेगी<br />
फिल्म वालों ने लिया है मोर्चा<br />
क्रिकेट को चमकान का<br />
तो उनकी कला यहां भी नजर आयेगी<br />
आस्ट्रेलिया में किया था जिसने हीरो को रोल<br />
उसे अब विलेन बनाकर पेश किया<br />
उस समय के विलेन को दे रहे थें जो गालियां<br />
अब बजा रहे उनके लिये तालियां<br />
यह हीरो-हीरोइन भला कब  डायरेक्टर के<br />
 हुक्म के बिना एक्शन के कब होते है<br />
जरूर लिखी होगी किसे ने पटकथा<br />
जो झगड़े की फोटो कैमरे से लेने में रोकते हैं<br />
झगड़ा करने वाले खिलाड़ी<br />
बाद में ऐसे होकर मिलते हैं<br />
जैसे कोई बढि़या अभिनय किया<br />
कह तो रहे है सभी<br />
पर किसने देखा यह कि <br />
थप्पड़ मारने वाले ने अपना कितना नुक्सान किया<br />
हमने ने देखा न मैच न झगड़ा<br />
पर एक बात मानते हैं कि<br />
क्रिकेट खेल में एक्शन का सीन लिखकर<br />
पटकथा लिखने वाले ने कमाल किया<br />
............................</span></strong></p>
<p><strong><br />
</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्रिकेट में अब देशप्रेम का सुख नहीं उठाते-हास्य कविता]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=17</link>
<pubDate>Sat, 19 Apr 2008 17:15:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=17</guid>
<description><![CDATA[आया फंदेबाज और बोला
‘क्या दीपक बापू कि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><strong><strong>आया फंदेबाज और बोला<br />
‘क्या दीपक बापू किक्रेट भूल गये देखना<br />
पता नहीं तुम्हें अब यहां<br />
क्रिकेट मैच चल रहे हैं<br />
तुम्हारे नेत्र उनका आनंद उठाने की बजाय<br />
कंप्यूटर में जल रहे हैं<br />
क्यों नहीं कुछ मजा उठाते’</p>
<p>सुन कर पहले उदास हुए<br />
फिर टोपी लहराते हुए कहें दीपक बापू<br />
‘जजबातों में बहकर देख लिया<br />
जिनकी जीत पर हंसे<br />
और हारने पर रोए<br />
उनके खिलवाड़ को सहकर देख लिया<br />
कमबख्तों ने  पहले राष्ट्रप्रेम जगाने के लिये<br />
आजादी के गाने सुनवाये<br />
और हमारे जजबातों से खूब पैसे बनाये<br />
अब क्रिकेट हो गया बाकी सब जगह कंगाल<br />
विदेशी खिलाड़ी हो रहे बेहाल<br />
किसी भी तरह इस देश में ही कमाना है<br />
पर बाहर ही तो रखना अपना खजाना है<br />
इसलिये देश में अंदर ही बंटने के लिये<br />
देश की बजाय टीमों के नाम की भक्ति के लिये<br />
नये-नये मनोरंजक तराने बनवाये<br />
अब तो देशप्रेम उनको सांप की तरह<br />
डसने लगता है<br />
क्योंकि विदेशी नाराज न हो जायें<br />
इससे शरीर उनका कंपता है<br />
हमें तो लगने लगा है कि<br />
इतिहास में ही आडम्बर भरा पड़ा है<br />
गुलामी का दैत्य तो अब भी यहीं खड़ा है<br />
कभी इस देश को एक करने के लिये<br />
सब जगह नारे लगे<br />
अब बांटने के लिये सितारे लगे<br />
पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण में<br />
मनोरंजन के नाम पर बांटा जा रहा है<br />
देशप्रेम से शायद व्यापार नहीं होता<br />
विश्व के सबसे उपभोक्ता यहीं हैं<br />
उनको बांटने से ही कई लोगों का<br />
बेड़ा पार यहीं होता<br />
देशप्रेम हम नहीं छोड़ पाते<br />
उसके नाम के बिना क्रिकेट में सुख नहीं पाते<br />
लोग उसे भुलाने के लिये<br />
बन  रहे हैं बैट बाल के खेल में<br />
पेश कर रहे हैं नृत्य और गाने<br />
उसे देखेंगे शोर के दीवाने<br />
हास्य कविता लिखेंगे हम जैसे सयाने<br />
अब हम क्रिकेट से मनोरंजन नहीं उठाते<br />
..........................................<br />
क्रिकेट में अब देशप्रेम का सुख नहीं उठाते-हास्य कविता</strong></strong></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA["खेळ खेळूया सारे आपण"]]></title>
<link>http://shrikrishnasamant.wordpress.com/?p=300</link>
<pubDate>Tue, 15 Apr 2008 17:00:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>shrikrishnasamant</dc:creator>
<guid>http://shrikrishnasamant.wordpress.com/?p=300</guid>
<description><![CDATA[ 
आज खूप दिवसानी प्रो.देसाई तळ्यावर भे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> </p>
<p>आज खूप दिवसानी प्रो.देसाई तळ्यावर भेटले.बरेच दिवस मी एकटाच तळ्यावर फिरायला जायचो.भाऊसाहेब आपल्या मुलाकडे काही दिवस राहयाला गेले होते ते मला त्यांच्या मुलीकडून कळलं होतं.</p>
<p>मला म्हणाले,<br />
"संध्याकाळची मी तुमची खूप आठवण काढायचो.मुलाच्या घरी सुद्धा फिरायला खूप जागा आहे,पार्क्स आहेत पण असं तळं नाही."<br />
मी म्हणालो,<br />
"भाऊसाहेब,तुमच्या गैरहजेरीत मी काही कविता केल्या आहेत.पुढल्या खेपेला मी तुम्हाला वाचून दाखवीन."<br />
भाऊसाहेब म्हणाले,<br />
"आज मला तुम्हाला माझ्या लहानपणाची एक गमतीदार गोष्ट सांगायची आहे.<br />
ज्याची मी तुम्हाला गोष्ट सांगणार आहे तो गृहस्थ अलिकडेच मला एका दुकानात भेटला होता.प्रथम मी त्याला ओळखलं नाही.सहाजीकच खूप वर्षानी मी त्याला पाहिलं होतं.<br />
कोकणात आम्ही जिथे राहत होतो,त्यापासून दोन तीन वाड्या पुढे हा राहायचा.ह्याच्या लहान पणीच ह्याचे वडील निर्वतले होते आणि ह्याच्या आईच्या डोक्यावर परिणाम झाला होता.त्यामुळे ह्याच्या हंसण्याखेळण्याच्या दिवसात ह्याची खूप हेळसांड झाली होती.मित्र सवंगडी चांगले न मिळाल्याने हा बराचसा उनाड आणि बेजबाबदार झाला होता.<br />
लहान वयात खेळण्या बागडण्याच्या दिवसात,अशा मुलांचा खेळात किवा तसल्या काही activities मधे वेळ गेला तर त्या समाजविघातक संवयी पासून ही मुलं बचावली जातात.</p>
<p>आणि अगदी हेच ह्या मुलाच्या बाबतीत झालं.माझा एक भाऊ मुंबईला श्रीमंत लोकांच्या मुलांच्या शाळेत फिझीकल ट्रेनींगचा शिक्षक होता. त्याला त्या शाळेने इंग्लंडला पाठवून प्ले थेरपीस्टचं पुर्ण ट्रेनींग देवून मग इकडे त्यांच्या मुलांच्या शाळेतल्या खेळाच्या विभागाचा मुख्य केलं होतं.<br />
तो असाच एकदा कोकणात काही दिवसासाठी घरी आला होता.त्याचं ह्या मुलावर लक्ष गेलं.माझ्याकडे त्याने त्या मुलाबद्दल चौकशी केली.</p>
<p>ते ऐकून मला म्हणाला,<br />
"हा मुलगा जात्याच असा उनाड दिसत नाही.त्याच्यावर काही मानसिक आगाध झाले असावेत.दिसायला हा जरी आडदांड,रागीट आणि हट्टी दिसला तरी हे वय त्याचं हंसण्या खेळण्याचं आहे.त्याच्या ह्या असल्या संवयी त्याच्या आईच्या आजाराने आणि आईला सोडून म्हाताऱ्या आजीकडे पोरका म्हणून राहिल्याने त्याच्या ह्या संवयीत नकळत भर पडली आहे. माझ्या ह्या मुक्कामात मी त्याला सुधारण्याचा प्रयत्न करतो."</p>
<p>भाऊसाहेब पुढे म्हणाले,<br />
"रोज हा माझा भाऊ त्याच्या घरी जायचा.त्यानेच मला सांगतलं,"<br />
"ह्या मुलाला प्रथम मी प्ले थेरपीच्या नियमानुसार काही मर्यादा मला त्याला घालाव्या लागल्या.प्रथम त्याला मी म्हणालो, कुठल्या गोष्टींची जरूरी असते आणि कुठल्यांची नसते हे समजावून घे.मी चित्रकलेसाठी नाही,मला चित्रकला येत नाही. खेळणी तोडण्यासाठी नसतात. पुस्तकं खिडकीच्या बाहेर फेकून देण्यासाठी नसतात.माझ्या प्रत्येक सुचना त्याने आदरपुर्वक मानल्या पण एकदा म्हणाला,</p>
<p>"खिडकीतून फेकून देण्यासाठी काय असतं?"<br />
मी त्याच्या बरोबर कागदाचे छोटे,छोटे तुकडे करून एक एक खिडकीच्या बाहेर टाकून देत<br />
म्हणालो आपण दोघानी मिळून हे ठरवलंय तसं करतोय.</p>
<p>हे त्याल सांगून काय मिळालं याचा मी विचार करीत होतो.तो पर्यंत तो एका अडगळीच्या जागी जावून लपला.मी त्याला बाहेर यायला सांगितलं.</p>
<p>त्यावेळी तो मला ओरडून म्हणाला<br />
"मी शोधून काढण्यासाठी नाही."<br />
कोणत्या गोष्टीच्या काय मर्यादा असतात हे त्याला कमीत कमी कळलं,हे पाहून मला बरं वाटलं.<br />
दोन दिवसानंतर हळू हळू तो माझं ऐकून लक्षात घेत होता हे माझ्या लक्षात आलं.त्याला माझा आधार वाटत होता आणि म्हणून तो माझ्याशी काहीतरी संबध जुळवायला पहात होता. त्यानंतर आणखी काही दिवसानी असल्या त्याच्या माझ्या लहान लहान खेळामुळे तो स्वतःहून निर्णय घेवून स्वतःला आणि दुसऱ्याला आदर देवून वागायला लागला.मी त्याची किती कदर करतो आणि तो जे काय म्हणतो ते पण कसं समजावून घेतो हे शिकायला लागला.<br />
द्दयायला आणि घ्यायला तो शिकला आणि स्वतःवर प्रेम करू लागला.त्याला समजलं की दुस्रऱ्यानी त्याच्यावर प्रेम करायच्या लायकीचा तो आहे आणि हे ज्ञान मनात ठेवून स्वतःत बदल करू शकला,वाढू लागला आणि नवीन प्रकारचं वागणं शिकू लागला."</p>
<p>नंतर माझा भाऊ मला पुढे म्हणाल्याचं आठवतं,<br />
"मला त्या शाळेने ह्या शिक्षणासाठी परदेशी पाठवलं,त्यातून मी एक गोष्ट चागली शिकलो की ही लहान मूलं खेळणी वापरून आणि खेळ खेळत असताना त्याचा उपयोग एकमेकाशी दुवा वाढवण्यासाठी नकळत ही कला वापरत असतात.हे पण मला ठावूक झालं की काही तरी जादू होत असावी की ही मूलं आपलं अंतरमन वापरून काही तरी नजरेत येईल असं खेळ खेळताना दाखवतात.<br />
तसं पाहिलं तर खेळ हा एक चालू पास टाईम आहे.खेळता खेळता पोक्तपणा येतो आणि शिकायला मिळतं,खेळत असताना स्वतः हजर असल्याने आपल्या अस्थित्वाची जाणीव होते.<br />
त्या मुलाला काय किंवा आपल्या सर्वांना काय हा एक चान्स आहे की मनाच्या आतून काय हवंय आणि माणुसकीला धरून आपण ते किती आनंदाने घेतो."<br />
हे सर्व सांगून प्रो.देसाई जरा स्तब्ध झाले.<br />
आणि मला पुढे म्हणाले,<br />
"हा अलिकडेच दुकानात भेटलेला गृहस्थ हा तोच मुलगा होता हे आठवून मी क्षणभर अचंबीत झालो.माझ्या भावाची त्यावेळेला त्याला झालेली मदत,त्याच्या आयुष्यात एक परिवर्तन होण्यात झालं.तो लहानपणापासून त्याच्या आईला समजावून घेवू लागला.तिचा काहीच दोष नाही हे त्याला त्यानंतर लक्षात आलं असावं.एकदा माझा भाऊ मला भेटला होता,ह्याचा विषय आमच्या दोघांच्या बोलण्यात आला होता.मोठ्या विश्वासाने भाऊ सांगत होता की ती केस यशस्वी होणार याची त्याला खात्री होती."</p>
<p>मी भाऊसाहेबाना उठता उठता म्हणालो,<br />
"तुम्ही जर मला ही गोष्ट सांगितली नसती तर  खेळणी आणि खेळ हे मी सर्वसाधारण पास टाईमच समजलो असतो.त्याचं मला महत्व कळलं.भाऊसाहेब मला एक गाणं आठवतं,</p>
<p>"जगताचे हे सुरेख अंगण<br />
खेळ खेळूया सारे आपण<br />
मुलां संगती छान<br />
खेळूया मुलां संगती छान<br />
याला जीवन ऐसे नांव<br />
दोन घडीचा डाव<br />
याला जीवन ऐसे नांव"</p>
<p>श्रीकृष्ण सामंत (स्यान होझे कॅलिफोरनीया)<br />
<a href="mailto:shrikrishnas@gmail.com">shrikrishnas@gmail.com</a><br />
  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[प्रो.देसायांच्या नातवाचं तत्वज्ञान]]></title>
<link>http://shrikrishnasamant.wordpress.com/?p=298</link>
<pubDate>Sun, 13 Apr 2008 00:58:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>shrikrishnasamant</dc:creator>
<guid>http://shrikrishnasamant.wordpress.com/?p=298</guid>
<description><![CDATA[&#8220;पण अलिकडे मला वाटू लागलं की देवाची ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>"पण अलिकडे मला वाटू लागलं की देवाची जरूरी आहे.मी मानतो की सायन्समुळे विश्वकर्त्याची जरूरी भासत नाही पण हे एक त्याचे रूप असावं."</p>
<p>आज जरा गम्मतच झाली.आज प्रो.देसाई आपल्या नातवाबरोबर तळ्यावर फिरायला आले होते.रोजच्या ठिकाणी मी भाऊसाहेबांची वाट पहात बसलो होतो.<br />
गम्मत झाली हे म्हणण्याचे कारण, आजोबा आणि नातू तावातावाने बोलत येत होते.दोघांचा कोणत्या विषयावर वाद चालला होता,ह्याचं मला जरा कुतुहल होतं.ते जवळ आल्यावर  त्या दोघानां उद्देशून मी म्हणालो,<br />
"भाऊसाहेब,तुमचा नातू आपल्या दोघांनाही वादात हरवणार ह्याची मला खात्री आहे.अहो,पुढची पिढी नक्कीच जास्त इंटिलीजंट असते असं मी कुठेतरी वाचलंय.हा तर आपला नातू म्हणजे तो आणखी एक पिढी पुढे गेलेला,मग काय विचारता."<br />
हे ऐकून प्रोफेसर मला म्हणाले,<br />
"अहो,तो वाद घालत नाही काय,तो त्याचं तत्वज्ञान सांगतोय आणि तेही देवाच्या अस्थित्वा बाबत."<br />
मी म्हणालो,<br />
"भाऊसाहेब,तुमचा नातू आहे.तेव्हां तो लेक्चर देत असेल तर तसं करणं त्याचा हक्कच आहे"<br />
माझा सपोर्ट बघून भाऊसाहेबांचा नातू मिष्किल हंसू लागला.<br />
मी त्याला म्हणालो,<br />
"ऐकूया तर खरं तुझं चिंतन"<br />
हे ऐकून खूषीत येवून तो बोलू लागला,<br />
"मला वाटतं ईश्वराला भविष्य माहित नसावं,कसं ते सांगतो.मी ह्या निर्णयाला यायला मला खूप लांबचा आणि कठिण प्रवास करावा लागला.आणि तो सुद्धा जी श्रद्धा मी वाढत असताना माझ्या मनाशी जोपासून ठेवली होती ती ठेवून.अगदी लहानपणी मला खूप लोक सांगायचे की ’देवाला सर्व माहित असतं’ बराच काळ मी माझा हा विश्वास ह्या समजुतीवर जखडून ठेवला होता.पण शेवटी मी माझ्या स्वतःच्याच विश्वासाला घेवून एक मोठी झेप घेण्याचा प्रयत्न केला.मी असा विचार केला की ईश्वराला रुढीमुळे असलेल्या विश्वासापेक्षा एखाद्दयाचा प्रामाणिकपणा जास्त आवडत असावा.माझं चैतन्य जिथे मला नेईल तिथे मी जायचं ठरवलं.</p>
<p>मला वाटतं जगाचं भवितव्य धर्माच्या पुस्तकात लिहील्याप्रमाणे नसून निसर्गाच्या नियमानुसार असणार. बऱ्याच लोकाना वाटतं,की सूर्योदय,सूर्यास्थ,जीवन,मरण,भूकंप आणि पूर वगैरे हे दैविक असतात.<br />
पण मी शास्त्रज्ञ काय म्हणतात त्याच्यावर विश्वास ठेवतो.या पृथ्वीवरचे होणारे बदल,हवामान वगैरे गोष्टी ह्या निसर्गाच्या ठरलेल्या नियमानुसार होत असतात.हे माहित झाल्यामुळे मला वाईट गोष्टी देव कसा करू देतो असल्या म्हणण्यावर काहीच त्रास होत नाही.त्यामुळे क्रिकेट मॅच जिंकायला देवाची मदत हवी असते हे मुळीच पटत नाही.खरं म्हणजे कोण जिंकणार हे कुणालाच अगोदर माहित नसतं देवाला सुद्धा.<br />
मी सायन्स आणि इंजिनीयरींग शिकायला लागल्या पासून मला खूप लोकांना भेटल्यावर कळलं की देवावर कुणीच विश्वास ठेवू मागत नाहीत.ते म्हणतात जर का सायन्स सर्व काही समजावून सांगू शकतं इलेक्ट्रॉन्स पासून गॅल्याक्सीस पर्यंत,तर मग देवाची कुणाला जरूरी आहे.</p>
<p>पण अलिकडे मला वाटू लागलं की देवाची जरूरी आहे.मी मानतो की सायन्समुळे विश्वकर्त्याची जरूरी भासत नाही पण हे एक त्याचे रूप असावं.पदार्थविज्ञानाचे गणीताचे नियम जरी अगदी नेमके आणि व्यक्तिसादृश्य नसतात,तरी जगात आणखी अनेक अशा गोष्टी आहेत जसे की आपल्या सारखे प्राणीमात्र आहेत त्यांना वगळून चालणार नाही.आणि त्याचं कारण त्यांच्या अस्थित्वाला  काहीनाकाही उद्देश आणि अर्थ असतो.चंद्र तारे आणि गुरुत्वाकर्षणाशी त्याचा काडीचाही संबंध नाही.<br />
विज्ञानाला आवाजाच्या लहरी आणि संगीत यातला फरक कळत नाही.प्रेम आणि दुःख हयातलाही फरक कळत नाही.<br />
विज्ञानाला माझ्या शरिराबद्दल सांगता येईल पण माझ्या आत्म्याचं काही सांगता येत नाही हाच खरा फरक आहे.<br />
मला वाटतं माझा आत्मा मला चैतन्य देवून दुखापतीचं दुखणं कमी कसं करावं ही क्षमता देतो.कुणाला स्पर्श करून त्याच्या बद्दल प्रेमाची भावना जागृत करतो.प्रयत्न करूनही कधी यश मिळतं कधी अपयश. एखाद्दया चांगल्या दिवशी सर्व दिवस आनंदात जातो.<br />
मात्र हे पाहून देव आनंदाने आश्चर्य चकित होतो,असं मला वाटतं"<br />
हे त्याचं सर्व चिंतन ऐकून मी त्याला म्हणालो,<br />
"म्हणजे ह्याचा अर्थ प्रत्येकाने बॅलन्स ठेवून राहिलं पाहिजे.कुठचीही टोकाची भुमिका घेवून चालणार नाही.असंच तुला म्हणायचं आहे नां?"<br />
"काका,तुम्ही अगदी माझ्या मनातलं बोललात"असं म्हणत आम्ही सर्व घरी जायला उठलो.</p>
<p>श्रीकृष्ण सामंत (स्यान होझे कॅलिफोरनीया)<br />
<a href="mailto:sharikrishnas@gmail.com">sharikrishnas@gmail.com</a> </p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सैनिक हो! तुमच्या साठी....]]></title>
<link>http://shrikrishnasamant.wordpress.com/?p=296</link>
<pubDate>Thu, 10 Apr 2008 17:41:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>shrikrishnasamant</dc:creator>
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<description><![CDATA[अलिकडेच माझ्या एका मित्राचा मुलगा त्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अलिकडेच माझ्या एका मित्राचा मुलगा त्याच्या वडिलांबरोबर माझ्या घरी आला होता.माझा मित्र डॉक्टर आहे आणि हा मुलगा सायकॉलॉजीस्ट आहे.<br />
गप्पा मारता मारता मुलगा म्हाणाला,<br />
"आलेल्या संकटाला तोंड देवून पुनरप्रस्थापीत होण्याची निसर्गाने मनुष्याला दिलीली शक्ति"<br />
ह्या विषयावर आपण थोडी चर्चा करूंया.<br />
मला ह्या विषयावर अगदीच तुटपुंजं ज्ञान असल्याने मी ऐकून घेण्याचीच जास्त भुमीका घेतली.<br />
सुनील देवधर,हा माझा मित्र कारगीलच्या युद्धात जखमी जवानाना ट्रिटमेंट देवून त्यांना बरं करण्याच्या सेवेत होता.<br />
मुलगा म्हणाला,<br />
काका,मला लोकांच ऐकून घेण्यासाठी पैसे मिळतात.मी अमेरिकेत आल्यावर युद्धावरून परत आलेल्या सैनिकांच्या सुख दुःखाच्या परिस्थितीतून त्यांचा संभाळ करण्य़ाच्या आणि त्यांच्या सोयी पाहून त्यांना आयुष्यात स्थैर्य आणण्यासाठी योजना पाहाण्याच्या संस्थेमधे कामाला लागलो होतो.ते व्हेटरनस हॉस्पिटल होतं.<br />
ह्या सैनिकांकडून मला, मनुष्याला असंभवनीय परिस्थितीला तोंड देण्याच्या प्रयत्नाना सामोरं जाताना कसल्या कसल्या प्रसंगातून जावं लागतं,त्याचा त्यांनी पाहिलेला आखोंदेखा हाल त्यांच्याकडून ऐकायला मिळाला.<br />
प्रत्यक्ष एकेकाने अतिगंभिर परिस्थितीत समोरासमोर हातापायी करून त्यातून सही सलामत सुटल्याबद्दलच्या त्यांच्या गोष्टी ऐकून घेण्याची पाळी माझ्या वर आली होती.<br />
वैद्दयकीय विभागातल्या आणि तोफगोळ्या विभागातल्या सैनिकाना आलेल्या अनुभवातून समजलेल्या गोष्टी ऐकून, तसंच इथे आल्यावर जगू न शकलेल्या सैनिकाना त्यांच्याच आईवडलाना आपल्या मुलांच्या शेवटच्या क्रियेला प्रत्यक्ष हजर रहाण्याचे आलेले प्रसंग पाहून, आणि हे सर्व आश्चर्य वाटण्या इतके अनुभव पाहून, मनुष्याची आलेल्या प्रसंगाला तोंड देण्याची शक्ति आणि क्षमता किती टोकापर्यंत जावू शकते ह्याचा विचार मनात आल्यावर ह्या सर्वांचं खरंच कौतुक करावं असं वाटतं.</p>
<p>हे सैनिक, जखमी भावनेत असूनही, स्वतःला सावरून परत मानसिक धक्का घेवून कल्पने पलिकडचे प्रसंग सांभाळून पुढे मार्ग काटत जायचा त्यांचा निर्धार पाहून सतत एक प्रकारची स्फुर्ती माझ्या अंगात यायची.<br />
इराकच्या लढाईतून परत आलेले सैनिक त्यांच्यावर होणाऱ्या असंभवनीय आय-ई-डीचे हल्ले,अदृश्यपणे होणारे बंदुकीच्या गोळ्यांचे वर्षाव कसे होत, याचं वर्णन करून सांगतात.<br />
घरी परत आल्यावर त्यांना रस्त्यावर साधी गाडी चालवणं पण अशक्य होतं.जुन्या मित्रां बरोबर एका खोलीत राहायला जमत नाही.एक तर सैनिक सांगत होता की मानसिक सुन्नता आणि रागाची खून्नस, ह्यांच्या कचाट्यात अडकून घेतल्या सारखं त्याला सतत वाटतं.</p>
<p>असल्या भयंकर आघातातून बाहेर पडून हया बऱ्याचश्या इराकहून परत आलेल्या सैनिकांची पुनरप्रस्थापीत होण्याची इर्षा आणि ज्याचा अंदाज ही नाही अशा मार्गाने जावून आपल्या आयुष्याला काही अर्थ यावा असं करण्याची त्यांची धडपड पाहून त्यांचं आश्चर्य न वाटल्यास नवल म्हटलं पाहिजे.<br />
उदाहरणार्थ,एक सैनिक होता त्याचा ह्या आजारावर जालीम इलाज म्हणजे आपल्या आजीच्या लहानश्या हॉटेलच्या धंद्दयामधे तिला मदत करण्याची त्याची इच्छा. ह्या मदतीच्या कारणाने त्याला आपल्या आजीशी भावनात्मक संबंध ठेवून सकाळी उठून तिला मदत करण्याचं एक सुंदर कारण मिळत होतं.<br />
हे कदाचीत साधसुधं कारण वाटत असेल पण प्रत्यक्षात लांबवत जाणारी ही ट्रिटमेंट तशी कठीणही असते आणि प्रत्येक इलाजाचा शेवट गोड होईल असं नाही.<br />
काही काही दिवशी मी ज्यावेळी घरी जातो,त्यावेळेला माझं डोकं खूप दुखत असतं.कधी मी मनातून दुःखी होवून, माझ्यावरच मी रागवून अपसेट व्हायचो.ह्या दिवशी माझं मलाच संभाळावं लागायचं. आणि पुढचा मार्ग चालू ठेवावा लागायचा. ज्या लोकांबरोबर मी त्यांना बरं करण्यासाठी आयुष्य घालवतो तेच लोक मला मी स्वतःला कसं संभाळून घ्यायचं तेच शिकवीत होते.त्या लोकांच्या निरनीराळ्या प्रकारच्या व्याधीवर असलेली यादी माझ्या डोक्यांत ठेवून ही यादी माझी मार्गदर्शिका म्हणून वापरून पुनरप्रस्थापनेसाठी मनुष्य काही गोष्टी कसा आत्मसात करू शकतो ह्याची आठवण म्हणून मनात ठेवतो.</p>
<p>परंतु हे लोक माझ्या ह्या विचाराचं किती कौतुक करीत असतील देवजाणे.पण मी त्यांच्याशी संबंध ठेवून माझ्या भविष्यातल्या अडचणीना तोंड द्दयायला शक्ति मिळवण्याचा प्रयत्न करतो.<br />
अशी ही आशा,  मला एक चांगली देणगी म्हणून मिळाली आहे असं समजून मी अगदी अदबीने इच्छा करतो की ती आशा मी माझ्या जवळ दुसरी कोणतीही व्यक्ति बसेल तिच्या बरोबर वाटून घेण्याचा प्रयत्न करीन."</p>
<p>माझ्या ह्या मित्राच्या सायकॉलॉजीस्ट मुलाचे विचार ऐकून माझ्या मनात आलं की कारगिल वरून असेच किती तरी सैनिक अशा तर्हेच्या व्याधी घेवून आले असतील परंतु असले सायकॉलॉजीस्ट आणि असले डॉक्टर त्यांना उपाय करायला मिळाले असतील का?<br />
आपल्याकडे सुद्धा अशा तर्हेच्या संस्था असतील का की जिथे ह्या सैनिकांची इतक्या निगेने काळजी घेतली जाते.</p>
<p>श्रीकृष्ण सामंत (स्यान होझे कॅलिफोरनीया)<br />
<a href="mailto:shrikrishnas@gmail.com">shrikrishnas@gmail.com</a><br />
 <br />
 <br />
 </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[प्रो.देसायांना वाटतं........]]></title>
<link>http://shrikrishnasamant.wordpress.com/?p=275</link>
<pubDate>Thu, 13 Mar 2008 16:35:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>shrikrishnasamant</dc:creator>
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<description><![CDATA[आज मी प्रो.देसायांच्या घरी गेलो होतो.ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आज मी प्रो.देसायांच्या घरी गेलो होतो.बरेच दिवस तळ्यावर त्यांची भेट झाली नाही तेव्हां म्हटलं बरं तर आहे ना त्याना!.<br />
भाऊसाहेब वाचत बसले होते.मला पाहून त्याना बरं वाटलं असावं.<br />
मी म्हणालो,<br />
"भाऊसाहेब काय वाचता?विशेष काही तरी विषय असणार."<br />
भाऊसाहेब म्हणाले,<br />
"खूप दिवस टी.व्ही वर ग्रीनहाऊस इफेक्ट, एनव्हायरनमेंट, ग्लोबलवारमींग असे मोठे मोठे शब्द कानावर येतात.म्ह्टलं काय आहे प्रकरण म्हणून जरा  इंटरनेटवर गेलो आणि ह्या विषयावर काही पुस्तकं चाळली.त्यातून रेकमेंड केलेलं हे पुस्तक लायब्ररीतून आणून वाचत होतो.काय म्हणता बसा चहा घ्या."<br />
मी म्हणालो,<br />
"भाऊसाहेब मी जरा घाईत आहे.तुमची फक्त खबर घ्यायला आलो होतो.तुम्ही हे सगळं वाचून झाल्यावर मला तुमची बॉटम लाईन सांगा.उद्दया आपण तळ्यावर भेटू तेव्हा"<br />
असं म्हणून मी काढता पाय घेतला.<br />
दुसऱ्या दिवशी आम्ही तळ्यावर भेटल्यावर प्रो.देसायानी स्वतःहूनच विषय काढला.<br />
मला म्हणाले,<br />
" सर्व प्राणीमात्रानवर आपणां माणसाचा आदर असला पाहिजे.मला वाटतं, माणासावर, ह्या पृथ्वीबद्दल आणि पृथ्वीवरच्या जीवनाबद्दल एक नकळत जबाबदारी आली आहे.<br />
खरं सांगू तुम्हाला हे पुस्तक वाचल्यावर मला माझं लहानपण आठवलं.जमीन खणतां खणतां मला लहान जीवजंतू खालून येताना पाहून काय हा चमत्कार आहे असं वाटायचं.प्रत्येक जीव, सरपटणारा,वळवळणारा पाहून मला खूप अचंबा वाटायचा. अगणीत तास मी आमच्या पोरसात,काय काय चमत्कार ह्या जमीनीत असावा,याचा शोध करीत बसायचो.<br />
काही लोकाना कदाचित माझं हे चमत्कारीक वागणं पाहून तिटकारा येत असावा. हे प्राणी गिळगीळीत कीडे वाटत असतील.पण मला तर हे सगळे प्राणी, ह्या विश्वात निरनिराळ्या आकाराचे आणि प्रकाराचे दिसतात. आणि हे गिळगीळीत किडे जणू लहानात लहान राहून ह्या सर्व लहान मोठ्या प्राण्यांचे प्रतीनिधीत्व करतात असं वाटायचं. जीवन चक्राशी हे अगदी निगडीत वाटायचं.  सर्व ऋतूमधे मला आवडणारा वसंत ऋतू."<br />
मी म्हणालो,<br />
"भाऊसाहेब,तुमच्या लहानपणाच्या आवडीच्या विषयाचीच आता उदोउदो होत आहे असं मला वाटतं जे तुम्ही अलिकडे वरचेवर सगळीकडॆ ऐकतां आहां."<br />
प्रो.देसाई मला म्हणाले,<br />
"अगदी बरोबर बोलला. वसंत ऋतूच्या अगदी सुरवातीला झाडावरच्या घरट्यांमधून बाहेर पडणारं ते पक्षांच पिल्लू आणि गडद निळ्या अंड्याचं ते घरट्यातून खाली पडणारं कवच, मी कितींदा पाहिलंय. निसर्गाच्या निर्मीतीचक्राची त्याच वेळेला मला जाणीव व्हायची.हा निसर्गाचा निर्मीतीचा दुवा पाहून मी ह्या गोष्टीबद्दल खूपच भारावून  गेलो होतो आणि अजून पर्यंत ती जाणीव माझ्या मनात  आहे. त्यामुळे ह्या वयात पण  ग्रीनहाऊस ईफेक्ट, एनव्हायरनमेंट,ग्लोबल वारमींग हे शब्द कानावर पडल्याने माझ्या मनातले ते लहानपणातले खोल भारावून गेलेले विचार मला हे पुस्तक वाचायाला जणू आव्हान देत आहेत असं वाटलं."<br />
"पण भाऊसाहेब,हे आतांच जगात एव्हडं अवडंबर कसलं चाललं आहे?" असं मी त्याना विचारल्यावर<br />
ते म्हणाले,<br />
"तुम्ही फारच चांगला प्रश्न विचारलात. अहो,ह्या जीवनचक्राचा आदर करण्याचा लाभ घ्यायला सर्वच मनुष्यप्राणी तयार असलेला दिसत नाही.उलटपक्षी हा  निसर्ग आणि हे विश्व सर्वांचं आहे ही भावना न बाळगता, निसर्गातल्या सोयी ह्या आपल्यापुरत्या गरजा समजून काही लोक त्याचा दुरूपयोग करीत आहेत.ह्या यंत्रयुगातल्या क्रांतीने जीवन यांत्रींक करून तो एक कारखाना केला आहे.आणि मनुष्याला आवश्यक असलेली मुबलक नैसर्गीक भिन्नभिन्नता पद्धतशीरपणे वाटेला लावली आहे.<br />
एकमेकावर अवलंबून असणाऱ्या जीवंत प्राण्यांच्या आवश्यक्यतेची, स्वतःहून केलेली हानी एव्हड्या टोकाला पोहोचवली गेली आहे,की कुठचाच पृथ्वीचा भाग रक्षीत राहिलेला नाही.वातावरणात एव्हडी विषारी टॉक्झीन्स भरमसाट प्रकाराने आपल्या यंत्रसामुग्री बनविण्याच्या हव्यासाने फेकली गेली आहेत की त्याची आता परिसीमा गाठली गेली आहे.त्यामुळे वातावरण धोकादायक शीगेला पोहचलं आहे.<br />
त्यामुळे हा वातावरणातला बदल सर्व तऱ्हेच्या जीवनाचं मुलभूत चक्रच बदलून टाकण्याचा इशारा देत आहे,ताकीद देत आहे.आणि त्यामुळे नवीन नैसर्गीक उत्पतीला वेळच मिळेनासा झाला आहे.<br />
मी म्हणालो,<br />
" भाऊसाहेब हे जे तुम्ही मला सांगता, ह्याचे प्राणीमात्रावर नक्कीच दुष्परीणाम झाले असणार हे उघडंच आहे."<br />
कपाळावर आठ्या आणत भाऊसाहेब म्हणाले,<br />
"काय सांगू तुम्हाला,कॅन्सर झालेला, एखाद्दया डॉक्टरचाच जवळचा नातेवाईक, स्वतः आपल्या रोगाबद्दल  अज्ञानात आहे आणि त्या डॉक्टरला मात्र त्याच्या रोगाची जाणीव असल्यानें त्या रोग्याचं कसं होईल याचा प्रश्न पडला आहे तसं ह्या विषयातल्या जाणकाराना पृथ्वीबद्दल वाटत आहे.तुम्हाला मी एकामागून एक विटंबना सांगतो.<br />
धृवावरील सर्व पोलर अस्वलांचं राहण्याचं बर्फ वितळत आहे.<br />
समुद्रातील कासवांच्या अंड्यांच्या उत्पतीवर गंडांतर आलं आहे.<br />
मोठ्या देवमास्यांच्या ठरावीक खाण्यावर संकट आलं आहे. समुद्रातल्या वनस्पतीचा मुळ रंग धुवून गेला आहे.<br />
ही थोडी फार उदाहरणं मी तुम्हाला सांगितली.<br />
त्याशिवाय वातावरणातल्या होणाऱ्या बदलाने मानवाच्या संस्कृतीवर आणि त्याच्या रहाणीमानावर दुष्परीणाम होत आहेत,इतके की तो आता जणू वातावरणाचा निर्वासीत झाला आहे.<br />
ह्या सर्व संकटावर मात करण्यासाठी फारच कमी प्रयत्न केले जात आहेत इतके की आणखी कांही थोड्याच अवधीत पृथ्वीचं वातावरण संपुर्ण कायमचं बद्लून जाणार आहे.<br />
मला काळजी वाटते की,सर्व प्राणी मग ते आमच्या पोरसात असो की जगात आणि कुठे असो मानवाच्या हव्यासामुळे बळी जावूं नयेत."<br />
हे सर्व ऐकून मी प्रोफेसरना म्हणालो,<br />
"भाऊसाहेब,तुमची मात्र कमाल आहे.एखाद्दया विषयाच्या तुम्ही मागे लागला की पुरंपुर तो विषय तुम्ही पिंजून काढता. आणि इतराना कौशल्याने समजावून सांगता.रुईया कॉलेजचे प्रोफेसर उगीचच झाला नव्हता."<br />
भाऊसाहेबांच्या मिष्कील हंसण्यात माझ्या म्हणण्याला दुजोरा मिळाल्याचे पाहून मला बरं वाटलं<br />
 <br />
       श्रीकृष्ण सामंत(स्यान होझे कॅलिफोरनीया)<br />
         <a href="mailto:shrikrishnas@gmail.com">shrikrishnas@gmail.com</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बहरला पारिजात दारी फुलें का पडती शेजारी?]]></title>
<link>http://shrikrishnasamant.wordpress.com/?p=260</link>
<pubDate>Mon, 03 Mar 2008 02:37:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>shrikrishnasamant</dc:creator>
<guid>http://shrikrishnasamant.wordpress.com/?p=260</guid>
<description><![CDATA[अमिताभ बच्चनाक मालवणीतून फुक्कटचो सल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अमिताभ बच्चनाक मालवणीतून फुक्कटचो सल्लो.<br />
बाबारे,<br />
कुणी तरी म्हटला हा,<br />
"सूर्याकडून एक शिकूक होयां संध्याकाळ झाली रे झाली, की आपण अस्थाक गेलेला बरां."</p>
<p>तुझ्यापेक्षा मी मोठो आसंय (फक्त वय्यान रे!),माकां वाटतां मी तुका चार उपदेशाच्यो गोष्टी सांगितलंय तर तां गैर होवूंचा नाय.नायतरी माझ्यासारख्या मालवणी माणसाक विचारल्याशिवाय कोणाक उपदेश करण्याची उपजतच खाजच असतां म्हणा.</p>
<p>माणूस निष्कारण उपदेश करूंक लागलो की समजुक होया हेका म्हातारपण इला.म्हातारपण इल्याचे आणखीन काय काय खुणो आसत म्हणा. पु.ल.नी म्हणजे आमच्या पु.ल.देशपांड्यानी रे, नाय काय सांगितला,सकाळी उठल्यावर गुढगे दुखणत नाय असां झाला की समजुचा आपण खंवाचलो( म्हणजे मेलो रे!) तशीच आणखी एक खूण कोणी तरी सांगितली आसा.<br />
जर कोण तुमच्याकडून उपदेश घेवचो बंद झालो की समजुचा म्हातारपण इला.आणि जर कां कोणी म्हणालो हो उपदेश अमक्या अमक्याकडून मिळालो असतो! की समजुचां तो म्हातारो आतां हयात नाय.<br />
तू माझो शेजारी.जुहु चौपाटीवर सकाळीच फिरांक जाताना तुझ्या बंगल्यावरून जावचा लागा.तुका बागेत काम करताना हज्जारवेळां बघीतलंय.झाले आतां तेका खूप दिवस म्हणा.आता तूं माका ओळखूचस नाय.</p>
<p>बाबारे,(अशी सुरवात केल्यावर समजुक होयां,काय तरी उपदेश ऐकूचो लागतलो.)<br />
"आयुष्य कमी किंवा जास्त ह्या काय नशिबावर अवलंबून नसता, आपल्या लाईफ स्टाईलवर असतां अशी माझी धारणा आसा.</p>
<p>तू हल्ली ज्यावेळी ६३ वर्षाचो होतस त्यावेळी तुका कसलो तरी आजार इलो होतो.६३ वयावर ३६ वर्षाचो असल्यासारख्या करून कामा करीत रव्हल्यास कसा चलताला बाबा?समजा, एखादी बाई ४१ वर्षाची आसा तिनां १४ वर्षाची स्वतःक समजून जर का बॉलीवूड डान्स केलो तर तेचे काय परिणाम होतले?.(तू बॉलिवूडचो राजो, तेव्हां तुका तां समजूक कठीण नाय म्हणा) असो प्रश्न मी माझ्या एका डॉक्टर मित्राक विचारलंय.तो काय म्हणालो माहित आसां?<br />
तो हंसत हंसत म्हणालो,<br />
 "जास्त काही होणार नाही फक्त गुढगे,युट्रस,किंवा आंतडे डीसलोकेट होईल.ताबडतोब त्याचे परिणाम दिसतीलही,न दिसल्यास कांही काळजी नाही उतार वयावर ते सर्व निमुटपणे दिसायला लागतील एव्हडंच."<br />
४२ वर्षावर तुका नाय काय, जीवघेणो अपघात झालेलो,तेचे परिणाम आता तुका भोवतत.२४ वर्षाच्या तरुण मुलासारखो तूं फायटींग करूचो शॉट करताना, पुनीत नावाच्या नटान तुका शुटींगमधे बुक्को मारण्याचो सीन केलो आणि तू तो टाळण्यासाठी उडी मारलंस आणि मग  टेबलाचो कोपरो तुझ्या पोटांत गेलो आणि तुझां आंतडा आतुन दुखावला वगैरे वगैरे.आठवतां मां, तुका? त्यावेळां त्यामानान, तूं तरुण होतंस लवकर बरो झालंस आणि कामांक पण लागलंस.</p>
<p>खूप कचोऱ्यो खाल्लंस म्हणून तुझ्या पोटांत दुखतां म्हणून हल्लीच्या आजारात डॉक्टरास सांगून तू बघलंय,पण माझ्या मनात पाल चुकचुकली.तुझो तो जुनो आजार आतां तुका ह्या वयात त्रास देवूक लागलो असतोलो असां माझ्या मनात इला.आणि तांच तुकां डॉक्टरान सांगलां नाय रे?<br />
"देवा असां नको होवू देत रे" असां आम्ही मनात म्हटलां विचार पायजेतर कुंदाक माझ्या बायलेक रे!<br />
अरे राजा,तुका लिलावतीत नेल्यावर तां इतक्या अपसेट झालां कि रात्री तेच्या स्वपनात तुझी जया आयली आणि म्हणता कशी,</p>
<p>"त्या आजारात आणि ह्या आजारात मी ह्याला बरं वाटावं म्हणून ह्याच्यासाठी किती व्रते केली, ह्याच्यावर ओवाळून दानधर्म केले, सिद्धीविनायक मंदिरात जावून किती एकादक्षीणा केल्या.मी त्याला सांगत असते "अरे,प्रकृती सांभाळून काम कर,पण माझा त्याला राग येतो"</p>
<p>मी जां काय ऐकला तां आता तुका सांगतंय.<br />
तू म्हणे शंभर कोटी रुपये खंय तरी गुंतवलंस आणि एक कंपनी काढलंस,आणि हातोहात तुका लोकांनी फसवलां म्हणून मी ऐकलां. आपल्यासारख्याच सगळां जग आसां, असा समजून तू तेंच्यावर विश्वास ठेवून वागलंस,लोकांचो पैसो तो, मग तेंचो पैसो फेडूक नको काय? ते फेडून टाकण्यासाठी तू झटून मेहनत घेतलंस.<br />
जया सांगी होती,</p>
<p>"फिजा,दिदार आणि कल हो न हो मधे माका ह्या वयात काम करुक लागला.फिजात तर माका बुरखो घालून काम करुक लागला."</p>
<p>बाबारे, सगळां देणां तू फेडलंस,त्यानंतर पैशाची तुझ्याकडे रीघ लागली.तू पब्लीक फीगर ना, मग तुका लोकांचा ऐकूक लागतलाच. पण लोक म्हणतत म्हणून भुरावून जावू नको बाबा.<br />
"अमिताभजी तुम ऍक्टींग करो हम तुम्हारे सांथ है " असा लोक तुका सांगतत असा मी ऐकलां.पण तू तेंच्या नादाक लागू नको. काळजी घे तुझ्या प्रकृतीची.<br />
बाबारे, म्हटहा ना "जग हे दिल्या घेतल्याचे,नाही कोण कुणाचे" तां काय खोटां नाय.शेवटी नुकसान कोणाचा तुझाच मां?अभिषेकचा आता लगीन झाला.नक्षत्रासारखी तुका सुन मिळाली. तू आजोबा पण होशीत.तुका काय कमी आसा रे?पैसो म्हटलो तर दाबून पैसो तुझ्याकडे आसा.आणि ह्या वयात पैशाची कितीशी गरज आसा.मनः शांती मिळाली म्हणजे झाला. तुका नाय असा वाटणां?<br />
हे सगळे लोक तुझ्या मागे लागतत आणि तुका काय काय आयडीया देतत.पण तुझ्या आंगातले गुण ह्या लोकानी घेवूक नको काय?<br />
आतां ह्याच बघ,माका आपलां दिसला तां सांगतय.तू हल्लीच्या आजारात लिलावती हॉस्प्रिट्लात होतंस.किती लोक घोळको करून तुझ्यासाठी बाहेर उभे असत.एकदाचो तू बरो झालंस. त्यावेळी हॉस्पिटलाच्या बाहेर किती तुफान गर्दी होती.तू दिशसीस म्हणून ताटकळंत उभे होते येव्हडे लोक.<br />
तुझी जया तुझ्या नविन "जलसा" बंगल्यांत वाट बघत होती.लोकानी तू तिकडे जाशीस म्हणून तुझ्या दर्शनासाठी तिकडे धांव घेतली.काही लोकानी तु सिद्धीविनायक मंदिरात पहिल्यानदां जाशीस म्हणून तिकडे धांव घेतली.तू शिरडीक जाझीस म्हणून तिकडे धांव घेतली. पण तू काय केलंस,तू सरळ तुझ्या "प्रतिक्षा" बंगल्याकडे गेलंस. कारण तुका तुझ्या आवशीची आठवण आयली.ती तुझी वाट बघत असतली तू मातृभक्त किती आसस ह्या, ह्यां लोकांक काय माहीत रे?पण आचरणात कोण आणताहा या दिवसात? त्या बंगल्याकडे तुझ्या रखवालदारा शिवाय कोण चिटपांखरू पण नव्हता.बरो झालंस म्हणून सुरवातीक आवशीच्या पायावर डोक्या ठेवूक गेलस मां?पायावर डोक्या ठेवून नंतर तिना तुका जवळ घेतलां.त्या तुझ्या माऊलीक तुझ्या स्पर्शान निराळाच वाटलां.तुझ्या डोळ्यातली आंसवा तिना तिच्या कृश हातानी फुसत, तिना तुका आणखी जवळ घेतलां आणि तुझ्या कानात पुट्पुटून ती म्हणाली, "देवा माझा उरलेलां आयुष्य हेकांच दी" तां ऐकून तू किती सद्नदीत झालंस,आठवतां ना तुका?</p>
<p>एका खयंच्या तरी सिनेमात तू त्या शशी कपुराक विचारतंस ना?<br />
 "काय आसां तुझ्याकडे?<br />
 माझ्याकडे आसां तसो, बंगलो,गाडी,नोकर चाकर आसत?"<br />
 त्यावर तो तुका सांगता मां,<br />
"माझी आओस आसा माझ्याकडे."<br />
आणि तां ऐकून तू कसो त्या सिनमधे गप्प बसतंस.पण खरां सागू  तुझ्या खऱ्या आयुष्यात तुका त्या प्रश्नाचां उत्तर असा देवूक होयां,<br />
 "बंगलो,गाडी,नोकर चाकर माझ्याकडे आसंतंच शिवाय माझी आओस  पण माझ्याक्डे आसां."<br />
असां म्हणून किती धन्य वाटत असताला तुका?.<br />
आता तुझी आवस गेली,आमकां पण खूप वायट वाटलां.</p>
<p>एखादो माका म्हणतलो, तुका काय करूंचा आसा.तो आपलां काय तां बघून घ्येत.पण खरां सांगू तुका मालवणी आम्ही असेच आसो.जरा फटकळ दिसलो ना तरी रसाळ फणसा सारखे.बाहेरून कांटेरी पण आतून रसाळ गऱ्या सारखे.तेव्हा तू काय मनांक लावून घेवू नकोस.<br />
माझा मात्र काम सांगूचा.आणि तुझा ऐकूचा.</p>
<p>हेंचो अर्थ तू काहीच काम करु नकोस असा नाय.अरे,तुझ्यो काही तरी आयुष्यातल्यो आठवणी लिही,तुझा आत्मचरित्र लिही,उगवत्या कलाकारासाठी काही शिकण्यासारख्या लिही,आईवडीलांक तू किती आदर ठेवून वागतंस, त्याचे काही इतरांवर चांगले संस्कार होतीत असां काही तरी लिही, तुझ्या वडिलांसारख्यो काही कविता कर .तुका जरी अलोट पैसो तुझ्या मेहनतीन मिळालो तरी तो लोकांकडूनच मिळालो मां? त्यातलो थोडो पैसो तरी लोकांक ह्या ना त्या निमीत्तान परत केलंस तर गोरगरीब तुका नक्कीच मानतलो,आशिर्वाद देतलो,असा तुका नाय का वाटणां? थोडीशी गांधीगीरीपण करूची लागता.<br />
तू तसा करुचंस नाय म्हणा, कारण पैसो कोणाक नको झालोसा?. पण एक  सांगतंय राजकारणांत मात्र अजिबात पडूं नको बाबा! मोठ्यां मोठ्याक पश्चाताप झालेलो मी बघितलंय.तुकापण पुर्वीचो अनुभव आसां म्हणा.राजीव गांधीच्या वेळी रे!<br />
ह्या वयांत "हेल्थ इज वेल्थ " असा काय म्हणतत नां तांच खरा.तू काय इतको म्हातारो झालंस नाय रे.पण बघ ज्या वयावर जां शोभतां तां करुक होयां नाय काय?ह्या वयावर आता लहान मुलांसारख्यो उडक्यो मारलंस तर तुका तां शोभताला काय? माकां सांग.<br />
हल्लीच तुझ्या घरावर कोणी म्हणे बाटल्यो फेकल्यो,दगड मारले म्हणून ऐकलां,माकां काय राजकारण समजणां नाय बघ.</p>
<p>जां समजणां नाय मां तेच्यावर विचारला नाय तरी सांगुचा असा आमका मालवणी लोकांक मुळचीच संवय आसा.आता एखादो मालवणी ह्या वाचून माझ्यावर चिडतोलो नक्की,पण मी तेची पर्वा करणंय नाय.खरां सांगूक हरकत कसली रे?</p>
<p>राजकारण बरां नांय.मोठ्या मोठ्यानी हात टेकलेत बघ.होताचा नाय आणि नायचा होता करूंक येवंक होयां.गेंड्याचा कातडां आंगावर होया.ह्या बोटावरची थुकी त्या  बोटावर करूक येवूक होयी.तां तुकां माकां जमुचा नाय.आपलो पिंड तसलो नाय.आणि बघ प्रत्येक काडीक दोन टोकां असतत.ह्या तुका सागूंक नको.तसाच प्रत्येक वादाक दोन बाजू असतत.दुसऱ्याचां म्हणणां पण बरोबर असू शकतां.<br />
तुका माहीत आसां मा, मराठी लोकांक नाटकां खूप आवडतत,आणि त्यातल्यात्यात आमका मालवण्यांक तर खूपच आवडतत,मालवणीत धयकालो तर नाटकाचो उस्फुर्त प्रकार आसा. थोडा रामायण महाभारत माहित असलां म्हणजे झालां.मग अर्जुन रामायणात की राम महाभारतात होतो ही खरी माहिती असण्याची इतकी जरुरी नाय.फक्त नाटकाच्या मंचावर डायलॉग म्हटले म्हणजे झालां.तुका माहीत आसां त्यामुळे विनोद सुद्धा उत्पन्न होता तो.मछ्चींद्र कांबळी तुका म्हायत असतोलच.आता तो गेलो म्हणां नायतर तेना तुझ्या ह्या बाटल्या प्रकरणावर एक मालवणीत नाटक लिवला असतां<br />
 " बहरला पारीजात दारी,फुले कां पडती शेजारी?"<br />
 रुक्मिणी,भामिनोचो वाद तुका म्हायत आसां मां?श्रीकृष्णाक किती त्याच्या बाईलानी डोक्याक काणेर केलो तो?</p>
<p>आता जाता जाता एक शेवटचा सांगतय.आयुष्य एकदांच मिळतां ह्या काय तुकां सांगुक नको.तुझे जे जवळचे आसत ना त्यांच्या बरोबर जास्त वेळ घालंव.आणि तुका जोपर्यंत लोकां हवो हवोसो म्हणतत नां, तो पर्यंत तेंच्यातून आंग काढून घेतलेलां बरां असा माका वाटतां. आमच्या सुनील गावस्करान कसा केला.वेळीच बाजूक झालो. क्रिकेट मधून रे!.आमचो सुनील म्हणण्याचा कारण तो आमच्या वेंगुर्ल्याचो.उभ्यादाड्यांचो रे!<br />
दुसरा म्हणजे अट्ट्ल बिहारीचा बघ.नावासारखे बाजपायजी आपल्या पणाशी अट्ट्ल आसत.आता परत पंतप्रधान होवूक मागणत नाय. अशी किती दाखले देवू मी तुका?<br />
कुणी तरी म्हटलां बघ." सूर्यनारायणा कडून एक शिकूक होयां,संध्याकाळ झाली रे झाली, की  आपण अस्थाक गेलेला बंरा"<br />
होय नायतर, आपलां नांव रात्रीच्या भानगडीत नको बाबा!.<br />
माझ्या अक्कलेप्रमाणे मी तुका सल्लो दिलंय.आता निर्णय का घेवचो तां तू बघ.<br />
    श्रीकृष्ण सामंत (स्यान होझे कॅलिफोरनीया)<br />
        <a href="mailto:shrikrishnas@gmail.com">shrikrishnas@gmail.com</a><br />
 </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[खोट्या सुखाचा आणि आशेचा मोह.]]></title>
<link>http://shrikrishnasamant.wordpress.com/?p=254</link>
<pubDate>Sat, 23 Feb 2008 03:19:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>shrikrishnasamant</dc:creator>
<guid>http://shrikrishnasamant.wordpress.com/?p=254</guid>
<description><![CDATA[प्रो.देसाई म्हणतात,
 
&#8220;जीवनात सतत अडच]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>प्रो.देसाई म्हणतात,<br />
 <br />
"जीवनात सतत अडचणी येतच असतात,म्हणून जे काही नशिबात आहे ते होणार असं समजून जर त्या अडचणींचा  स्विकार केला,आणि स्वतःच्या जबाबदाऱ्या झिडकारल्या तर जीवनात काहीच मिळवलं जाणार नाही. माणसाने स्वतःला बळी झालो असं समजू नये.<br />
उलट माणसाने आपली स्थिती जास्तीत जास्त स्विकारणीय आणि योग्य करण्याचा प्रयत्नात असलं पाहिजे.<br />
माणसाच्या मनात श्रद्धा का असावी? ह्या  प्रश्नाला उत्तर देता येत नाही,आणि त्याचं निवारण ही करता येत नाही.श्रद्धा कुणावरही लादता येत नाही, श्रद्धा करणाऱ्याचा श्रद्धेवर विश्वास असला पाहिजे."<br />
हे सर्व ऐकून मी म्हटलं,<br />
"भाऊसाहेब,आज तुमचा विचार तरी काय आहे. आज कुठच्या विषयावर मला लेक्चर देणार आहात?"<br />
यावर मला म्हणाले,<br />
"आज मी तुम्हाला खोट्या सुखाचा मोह आणि खोट्या आशेचा स्विकार करीत राहणं ह्यावर थोडं काही सांगणार आहे."<br />
आणि मग पुढे म्हणाले,<br />
" जबाबदाऱ्या आणि श्रद्धा याची सांगड घालून तृप्त झाल्यावर, मिळणारं समाधान कसं आनंदायी नसतं हे पटवून देण्याचा प्रयत्न करणार आहे.<br />
खरं म्हणजे मानवतेला आपला स्वभावगुणधर्म बदलता आलेला नाही.’प्रत्येक गोष्ट घडायला कारण लागतं’ असं म्हणण्या पेक्षा,’ प्रत्येक कारणामुळे गोष्ट घडते’ असं म्हटलं तर मला जास्त मान्य होईल.पण हे काही खरं नाही."<br />
"हे खरं नाही तर, खरं काय आहे भाऊसाहेब?"<br />
असा मी त्याना प्रश्न केला.<br />
त्यावर ते म्हणाले,<br />
" हे बघा, हे म्हणणं केवळ देवाला वस्तुस्थिति मानून किंवा आपल्या शक्ति बाहेर किंवा आपल्या समजुतीच्या पलिकडलं, किंवा आपण राहतो त्या समाजाच्या समजूतीच्या पलिकडलं असं समजून हे सर्व म्हटलं जातं.आणि ह्या समजुतीमुळे आपण आपल्या जबाबदारीतून आपल्याला  मुक्त करायला जातो.<br />
जे आहे ते तसंच असणार,त्यामुळे माझा, ह्या मधला असलेला भाग, किंवा माझ्या हातून जे झालं ते अगोदरच ठरलेलं असल्याने मी त्यासाठी जबाबदार होत नाही,असं ’म्हणणं’ म्हणजे त्याचा अर्थ असा की जीवनात ज्या काही उलथापालथी होतात,किवा ज्या अडचणी येतात त्या नैसर्गिक असो अथवा माणसामुळे असो,आपल्या श्रद्धेच्या आधाराने त्याच्यावर मात करून सूख मिळवता आलं पाहिजे. असं म्हणण्या सारखं आहे"<br />
मी विचारलं,<br />
"मग भाऊसाहेब तुमचं काय म्हणणं आहे ते तर मला कळू द्दया."<br />
भाऊसाहेब म्हणाले,<br />
"माझं म्हणणं असं आहे,की माणूस आपली करणी आणि भरणी ह्या दोनही गोष्टी ईश्वराच्या अंगावर टाकतो.आपल्या जीवनात होणाऱ्या उलथापालथी किंवा येणाऱ्या अडचणींच्या समोर जातो सामोरे जात नाही.<br />
खरं म्हणजे, ह्या दुखण्याला आपणच कारणीभूत असतो.<br />
आणि होतं ते बऱ्यासाठी होतं अशी समजूत करून सुखी होण्याचा प्रयत्न करतो.हे दुखणं मलाच कां? ते कधी बंद होणार?मी ते दूर कसं करूं? असे प्रश्न विचारून त्याचं उत्तर मिळवण्याचा प्रयत्न करतो.मग म्हणतो, ते टाळण्यासारखं नाही. आणि ते टाळायला आपल्या हातात काही नाही."<br />
मी म्हणालो,<br />
"भाऊसाहेब,असा विचार करण्यात काय चुकलं?"<br />
त्यावर जरा श्वास घेत घेत भाऊसाहेब म्हणाले,<br />
"सत्य परिस्थिती न्याहळल्यास,दिसून येईल की, वाईट होत असलं तरीसुद्धा सर्व काही आलबेल आहे अशी समजूत करून घेण्याचा हा एक अट्टाहास आहे.<br />
असल्या समजुतीतून मोकळीक करून घेणं, म्हणजेच खरी परिस्थिती स्विकारणं.<br />
आणि म्हणून मी म्हणतो,प्रत्येकाने आपली जबाबदारी ओळखून त्याप्रमाणे वागून मगच आनंदात राहण्याचा प्रयत्न केला पाहिजे.जे काय घडत असेल त्याला आपणच जबाबदार असल्याचे समजून राहिल्यास आपोआपच मनाला सुख मिळणार."<br />
मी म्हणालो,<br />
’भाऊसाहेब,असा विचार करून कितीसे लोक जीवन जगत असतात?"<br />
निरोप घेता घेता भाऊसाहेब मला म्हणाले,<br />
"तुम्ही चांगला प्रश्न विचारलात.त्याला माझं एकच उत्तर आहे.जोपर्यंत आपलं काम आपल्याला समाधान देतं,आणि जोपर्यंत आपण आपल्या कामाशी एकरूप असतो,तोपर्यंत आपल्याला सुख मिळत राहतं."</p>
<p>       श्रीकृष्ण सामंत (स्यान होझे कॅलिफोरनीया)<br />
         <a href="mailto:shrikrishnas@gmail.com">shrikrishnas@gmail.com</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ॐ शक्ति है]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=819</link>
<pubDate>Thu, 21 Feb 2008 15:34:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=819</guid>
<description><![CDATA[ॐ शक्ति है ॐ ही ईश्वर प्रतीक है
ॐ नश्वर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">ॐ शक्ति है ॐ ही ईश्वर प्रतीक है<br />
ॐ नश्वर है ॐ ही सर्वत्र एक है<br />
ॐ भक्ति है ॐ ही शान्ति मंत्र है<br />
ॐ जगत है ॐ ही जीवन तंत्र है</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ में तुम हो ॐ हर कण तुम में<br />
ॐ मृदा धातु जल वायु गगन में</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ सत्य है ॐ ही चिंतन मनन है<br />
ॐ आत्मा है ॐ ही प्रभु शरण है<br />
ॐ विष्णु है ॐ ही त्रिकाल महादेव है<br />
ॐ दृष्टि है ॐ ही सुर और रव है</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ विद्यमान है प्राण है हर जीव में<br />
ॐ ही सजीव में ॐ ही निर्जीव में</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ संगीत है ॐ ही श्रेष्ठ मित्र है<br />
ॐ असत्य पर विजय का शस्त्र है<br />
ॐ ब्रह्माण्ड है ॐ उत्पत्ति सूत्र है<br />
ॐ मोक्ष है ॐ ही मुक्ति स्रोत है</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ चहुँ ओर ज्ञान का प्रकाश है<br />
ॐ कष्टकाल अंधकार का विनाश है</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपना अहंकार दिखाते-कविता साहित्य ]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=15</link>
<pubDate>Tue, 12 Feb 2008 14:55:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=15</guid>
<description><![CDATA[मेरा लिखा शब्द तेरे लिखे शब्द से भारी
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मेरा लिखा शब्द तेरे लिखे शब्द से भारी<br />
मैंने जो पढा  व्याकरण<br />
तेरी भाषा भी उसमें सिमट जायेगी सारी<br />
मेरी भाषा का तू भी हो जा आज्ञाकारी<br />
ऐसी सोचे वाले   कहते हैं कि<br />
'जैसा हम कहते हैं वैसा तू  लिख<br />
जैसा चाहें वैसा तू  दिख' </p>
<p>अपने  अहंकार की देखी<br />
कई बार  नाकामी<br />
दो हजार सात तक झेली गुलामी<br />
अभी तक छूटी  नहीं वह  बदनामी<br />
फिर भी  अपना नाम करने  की खातिर<br />
 चाहे जब अकड़ दिखाते<br />
अपने इलाके के  शेर कहलाने वाले<br />
हरिणों की तरह चहकते लोगों पर<br />
अपने  अस्तित्व का रुतवा जताते<br />
पड़ जाये तगड़ा विदेशी शिकारी तो<br />
उसके  आगे नतमस्तक हो जाते<br />
हाथ उठाकर मांगते उसकी मेहरबानी<br />
और अपने असहाय आदमी पर गुर्राते<br />
'जैसा हम कहते हैं वैसा तू  लिख<br />
जैसा चाहें वैसा तू  दिख' </p>
<p>अपनी संस्कृति, भाषा, और विचारधारा<br />
के करते ढेर सारे दावे<br />
कई वाद रचते<br />
उनकी तरफ से कई नारे लगते<br />
इससे आगे उनकी समझ नहीं जाती<br />
कुछ आगे पूछों तो<br />
इतिहास की किताबों में लिखे<br />
खंडहर जैसे शब्द उठाकर दिखाते<br />
'हम ऐसे थे' और वैसे थे"<br />
अब का हाल पूछो तो लड़ जाते<br />
बस एक ही बात दोहराते<br />
'जैसा हम कहते हैं वैसा तू  लिख<br />
जैसा चाहें वैसा तू  दिख' </p>
<p>भाषा, संस्कृति और विचारधारा का<br />
स्वरूप  कभी स्पष्ट नहीं किया<br />
किसी ने जो कुछ  सुनाया<br />
अपने रास्ते का नाम वही रख दिया<br />
सदियों से चलता सिलसिला<br />
जब थमने लगता है<br />
वह उठा लेते हैं पत्थर की शिला<br />
'जैसा हम कहते हैं वैसा तू  लिख-कविता साहित्य<br />
जैसा चाहें वैसा तू  दिख'<br />
---------------------------------- </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[प्रो.देसायांचा उद्वेग......]]></title>
<link>http://shrikrishnasamant.wordpress.com/?p=248</link>
<pubDate>Tue, 12 Feb 2008 04:50:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>shrikrishnasamant</dc:creator>
<guid>http://shrikrishnasamant.wordpress.com/?p=248</guid>
<description><![CDATA[प्रो.देसायांचा उद्वेग&#8230;&#8230;
 काल प्रो.]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>प्रो.देसायांचा उद्वेग......</p>
<p> काल प्रो.देसाई मला तळ्यावर भेटले.मला म्हणाले<br />
"काय हा अत्याचार चालला आहे या जगात?आपण आपल्याला माणसं समजतो पण माणूसकी म्हणून काय राहिलीच नाही."<br />
मी म्हणालो<br />
"भाऊसाहेब आज कसल्या विषयावर मला लेक्चर द्दयायचं<br />
ठरवलंय? कळलं मला, पेपरातल्या बातम्या वाचून तुमचं मन उद्विग्न झालेलं दिसतंय."<br />
मला म्हणाले<br />
" मला काय वाटतं ते मी तुम्हाला सांगतो.तुम्हाला माझा विचार कसा वाटतो ते सांगा"<br />
मी मनात म्हटलं भाऊसाहेब आपल्या मुळ पदावर गेलेले दिसतात.प्रोफेसर नां!.<br />
ते पुढे म्हणाले<br />
" ज्यावेळी आपण जनावराना पाळीव करायला लागलो, त्याला आता दहा हजारच्या वरती वर्ष झाली असतील. त्यावेळ पासून आपण ईतर जगातले प्राणी  आणि आपण माणूस ह्यात एक प्रकारचा वेगळेपणा दाखवायला सुरवात केली."<br />
मी म्हणालो<br />
"भाऊसाहेब तुम्ही आज मला बहुतेक प्राण्यावर लेक्चर देणार दिसतं."<br />
जरा विचारात पडले आणि मग म्हणाले<br />
" प्राण्यांकडून आपण माणसानी काय शिकलं पाहिजे ते मी तुम्हाला सांगण्याचा प्रयत्न करतोय.<br />
माणसाने ह्या सर्व प्राण्यावर आपली सुप्रीमसी लादण्याचा प्रयत्न करीत, तो प्रयत्न अजून पर्यंत टिकून ठेवला आहे.<br />
ह्या जनावरांवर आपण माणसाने त्यांच्या अंगात असलेल्या गुणांचा दुर्लक्ष केलाच आणि त्याउप्पर त्यांच्यावर अत्याचार पण करीत आहोत.आणि ते सुद्धा हजारो वर्षे असं करीत आहो.आणि एखाद्दया माणसाचा अपमान करताना त्याला आपण "तू जनावर आहेस " अशी संबोधना करतो."<br />
आंवढा गिळून पुढे म्हणाले<br />
" जनावरांचे विजेते आणि ईतिहासाचे लेखक आपण, जनावराना ’ कृर,दुष्ट आणि अत्याचारी’ संभोधतो.आणि स्वतःला ’कनवाळू,बुद्धिवान आणि सुसंकृत’ समजतो.<br />
जनावरं जर बोलू लागली तर निराळीच गोष्ट ऐकायला मिळेल.माणासाने जर स्वतःला तोलून पाहिलं,आपण किती वर पर्यंत चढू शकतो,किती जोरात पळू शकतो, किती बारीक ऐकू शकतो,तर नक्कीच लक्षात येईल की आपण ह्या सर्व बाबतीत खूपच अपुरे पडतो."<br />
आणखी मनोरंजक माहिती देत प्रोफेसर पुढे म्हणाले<br />
"  एखाद्दया जनावरांकडॆ तुम्ही बारकाईने बघीतलंत तर तुम्हाला कळेल,तुम्ही त्याच्या तोंडातला घांस काढून घ्यायला गेलात तरच ते तुमच्या अंगावर येईल,तुम्हाला चावायचा प्रयत्न करील.तुम्ही त्याच्या वाटेला गेला नाहीत तर तुमच्या भानगडीत पण पडणार नाही. ते अन्नाचा सांठा करून ठेवणार नाही.आपले पोट भरल्यावर कुणी का उरलेले अन्न खाईना त्याची कदर ते करणार नाही.एकदा पोटभरल्यावर तृप्त होवून निघून जाईल.<br />
हे सर्व गुण जनावराला निसर्गानेच दिले आहेत ना?<br />
मग माणसाने आपल्या वागणुकीकडे जरा डोकावून पाहिल्यास,कदाचित माणसालाच कुणी तरी जनावर म्हणण्याच्या लायकीचा माणूस नाही काय?"<br />
प्रोफेसर बोलण्यात एव्ह्डे दंग झाले होते की क्लासात मी एकटाच आहे हे ते विसरून गेले असावेत.जरा फारमातच आले होते.<br />
जरा खाकरून म्हणाले<br />
"ह्या जनावरांची एखाद्दयाने जवळून पारख केली तर ज्यांच्या वर आपण अन्याय आणि अत्याचार केले त्यांची सभ्यता आणि उमदेपणा पाहून प्रभावीत होताना,गायीचा सौम्यपणा,कुत्र्याचा सामावून घेण्याचा गुण,बकरीचा साधेपणा, कुक्कुटाचा संभाळ करण्याचा गुण,गाढवाची सहनशिलता,शांतीने एकत्र राहण्याचा मेंढ्यांचा गुण, सश्याचा मैत्री ठेवण्याचा गुण,कुटुंबवत्सल बगळे, मांजराचासेल्फ कॉनफीडन्स,टर्कीचा जागृत रहाण्याचा गुण,तल्लखबुद्धि,स्नेह,आणि प्राणामिकपणा कुत्र्याचा आणि डुक्कराचा गुण पाहून छोटीशी लाज ठेवून राहिल्यास भला माणूस म्हणून घ्यायला काय अडचण आहे?"</p>
<p>एव्हडं बोलून झाल्यावर प्रोफेसर खूपच भावनावश झालेले पाहून<br />
मी म्हणालो<br />
"भाऊसाहेब,तुम्ही खूपच मनाला लावून घेता,अहो हे असंच चालायचंच.शंभर टक्के समाजात नऊव्वद टक्के असलेच लोक असले तरी दहा टक्के तुम्हाला हवे तसे नक्कीच असणार नाही तर हा जगन्नाथाचा रथ चालला नसता."<br />
माझा विचार प्रोफेसराना पटलेला भासला</p>
<p>       श्रीकृष्ण सामंत (स्यान होझे कॅलिफोरनीया)<br />
           <a href="mailto:shrikrishnas@gmail.com">shrikrishnas@gmail.com</a><br />
 <br />
 <br />
 <br />
 </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पैसा लेकर दिल बहलाने के लिए-hindi poem]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/2008/02/10/paisa-lekar-dil-bahalaane-ke-lie-hindi-kavita/</link>
<pubDate>Sun, 10 Feb 2008 11:54:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/2008/02/10/paisa-lekar-dil-bahalaane-ke-lie-hindi-kavita/</guid>
<description><![CDATA[मनोरंजन के लिए किसी
दृश्य, वस्तु या आद]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मनोरंजन के लिए किसी<br />
दृश्य, वस्तु या आदमी की  चाहत<br />
इन्सान को मजबूर करती है<br />
इधर-उधर जाने के लिए<br />
बाजार में कई बुत खडे  है<br />
पैसा लेकर दिल  बहलाने के लिए</p>
<p>भटकते मन को चैन और खुशी<br />
चंद सिक्के दिला देते हैं<br />
जब ऊब जाये हंसने से<br />
मनोरंजन के लिए दहला भी  देते हैं<br />
बिकता है मनोरंजन भी<br />
पैसा लेकर दिल बहलाने के लिए </p>
<p>पर कोई ऐसी चीज नहीं मिलती जो<br />
हर पल मन बहला सके<br />
रोज पनपते दर्द को सहला सके<br />
हालत यह होती की<br />
जितने  दर्द हल्का कर पाते<br />
वह नये दर्द में जुड़कर चले आते<br />
फिर चले जाते उन ठिकानों पर<br />
जहाँ सजे हैं बाजार<br />
पैसा लेकर दिल बहलाने के लिए</p>
<p>क्यों नहीं तलाशते<br />
अपने मन में ही मनोरंजन<br />
क्यों जाते उन लोगों  के पास<br />
जो बेचते नकली दवा दिल की<br />
फिक्र उनको आदमी की नहीं<br />
होती केवल अपने बिल की<br />
कभी गानों की सजाते झूठी महफ़िल<br />
कभी डर की रचना से बहलाते दिल<br />
पूरी जिन्दगी गुजारते  हैं<br />
पैसा लेकर दिल बहलाने के लिए<br />
---------------------------------------  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[तुम दृष्टा बन जाओ-कविता साहित्य ]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=14</link>
<pubDate>Thu, 07 Feb 2008 15:09:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=14</guid>
<description><![CDATA[भीड़ में अपनों की तलाश
अपनों में आत्मी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>भीड़ में अपनों की तलाश<br />
अपनों में आत्मीय की तलाश<br />
कभी भी नहीं होती पूरी<br />
दिल होता निराश<br />
बाजार में खरीदने-बेचने निकले<br />
क्यों करें सम्मान की आस<br />
बिचोलियों से ही चलता बाजार<br />
क्या अच्छा क्या बुरा<br />
चीजों के होते अपने दाम<br />
बेचो या खरीदों<br />
धंधे हैं जिनके उनके लिए<br />
सौदेबाजी के  अलावा और क्या होता उनका  काम<br />
हाट में क्यों करें सम्मान  की तलाश </p>
<p>बिकता है सब यहाँ<br />
गद्य-पद्य और गीत-संगीत<br />
पल भर के लिए मिलते मीत<br />
पैसे से चाहे जिसका दिल लो जीत<br />
जानने की कोशिश मत करो<br />
असली है कि नकली प्रीत<br />
जांचने कि कोशिश करेगी चिंता पैदा<br />
बढता हुआ  तनाव कर देगा<br />
सुंदर देह  का विनाश</p>
<p>फ़िर भी रास्ते हैं<br />
बचने के लिए<br />
इसे जीवन पथ पर<br />
सहजता से चलने के लिए<br />
कहीं चीजों की तरह सजने से<br />
अच्छा होगा दृष्टा बन जाओ<br />
सौदे में खरीदो खुशी मन की<br />
उसके सृष्टा ख़ुद बन जाओ<br />
आते-जाते देखो<br />
लोगों की खुशिया औ