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	<title>कला &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/कला/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "कला"</description>
	<pubDate>Tue, 13 May 2008 19:08:02 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[अंधेरे मे तीर चलाना ही उनका काम है-चार क्षणिकाएं]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=406</link>
<pubDate>Tue, 13 May 2008 17:30:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=406</guid>
<description><![CDATA[हादसों की खबर से अब
शहर सिहरता नहीं
अप]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h3>हादसों की खबर से अब<br />
शहर सिहरता नहीं<br />
अपने दर्द इतने भर लिये इंसानं ने<br />
कि किसी अन्य की लाश  से हमदर्दी<br />
जताने के लिये निकलता नहीं<br />
कुछ लोग गिरा देते हैं लाशें<br />
शायद कोई उनको देखकर चैंक जाये<br />
जानते नहीं कि<br />
कोई दूसरे को देखेगा तो तब<br />
अब अपने से आगे देखने की<br />
रौशनी और चाहत होगी<br />
किसी की आंखों  में<br />
अपने सामने कत्ल होते देखकर भी<br />
आदमी अब सिहरता  नहीं<br />
.............................</h3>
<h3>शांति की बात सियारों से नहीं होती<br />
पीठ पीछे वार करने वालों से<br />
कभी वफादारी की उम्मीद नहीं होती<br />
जो यकीन करते हैं उन पर<br />
मुसीबत में किसी की भी<br />
उनसे हमदर्दी नहीं होती<br />
.....................</h3>
<h3>जख्म बांटना ही उनका काम है<br />
इसलिये ही तो उनका नाम है<br />
खंजर लेकर घूमने वालों से दोस्ती की<br />
ख्वाहिश करते हैं कायर<br />
क्योंकि घुटने टेकना ही रोज उनका काम है<br />
.............................<br />
आग लगाना उनका काम है<br />
मिलते उनको दाम है<br />
कौन देता है कीमत<br />
कौन खरीदता है लाशें<br />
रौशनी जितनी तेज है इस शहर में<br />
अंधेरे का राज है उतना ही गहरा<br />
सच तो सब जानते हैं<br />
पर अंधेरे मे तीर चलाना ही उनका काम है<br />
...............................</h3>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[स्टार्ट अप को समोसा मान लेते हैं-व्यंग्य चिंतन]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=155</link>
<pubDate>Tue, 13 May 2008 15:10:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=155</guid>
<description><![CDATA[ 
गूगल के अंग्रेजी हिंदी टूल आने का भार]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> </p>
<p>गूगल के अंग्रेजी हिंदी टूल आने का भारत के अनेक क्षेत्रों के प्रतीक्षा थी। भारत मेें भी हिंदी ब्लाग जगत पर इसकी चर्चा कुछ समय से हो रही  थी।मेरे एक ब्लाग पर एक  अंग्रेजी ब्लाग लेखक ने अपनी टिप्पणी में लिखा था कि एसा टूल आ रहा है इससे भाषा की दीवार समाप्त हो जायेगी।  अब इस टूल के प्रयोग ने कई लोगों को निराश कर दिया है। हिंदी में अंतर्जाल पर लिखने वाले हिंदी ब्लाग ही नहीं वरन् अनेक वह पाठक भी निराश हुए हैं जिनको अंग्रेजी भाषा का ज्ञान नहीं है पर उसके विषयों को पढ़ने का बहुत आकर्षण है। उन्हें लगता है कि अंग्रेजी में शायद हिंदी से बेहतर लिखा जाता है। इससे पहले भी अनेक लोग इंटरनेट पर अंग्रेजी वेब साईटों के सामने आंखें लगाकर  अपने को विश्वास दिलाते हैं कि वह उसे पढ़ रहे हैं और फिर अपने मित्रों को बताते हैं। जब उन्होंने अनुवाद टूल  के बारे में सुना तो चेहरे खिल उठे होंगे पर अब तमाम स्त्रोतों से पता चलता है कि वह निराश है।</p>
<p>हिंदी ब्लाग जगत के नियमित सदस्य होने के कारण मेरे पास इस टूल का बहुत शीघ्र पहुंचना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी और मैंने भी इसके हाथ लगते ही उसके आजमाने का प्रयास किया। मैंने इस टूल को खोला और अग्रेजी के एक ब्लाग की विषय सामग्री की प्रतिलिपि उठाकर अपने ब्लाग पर चिपका दी। फिर परिवर्तित बटन दबाया। कुछ ही सेकण्ड में ही हिंदी में पूरी विषय सामग्री कुछ अस्वीकृत शब्दों साथ  मेरे सामने थी। उसे मैं पढ़ सक पर समझ नहीं सकता था। इसलिये सामने ही अंग्रेजी की सामग्री को पढ़ता और फिर हिंदी को देखता। इस काम में मेहनत कुछ अधिक है पर अंग्रेजी को पूरी तरह नहीं पढ़ने आने की  यह सजा कोई बुरी भी नहीं लगी। मैं अंग्रेजी का पढ़ा समझ पा रहा था इसी से मैं संतुष्ट था। अंग्रेजी व्याकरण की अच्छी जानकारी है इसलिये मुझे पढ़ने और समझने में आ रहा था। हां, शतप्रतिशत नहीं कह सकता पर यह तो अंग्रेजी वाले भी नहीं कह सकते। अंग्रेजी क्या किसी भी भाषा में पढ़ने वाला व्यक्ति यह दावा नहीं कर सकता।</p>
<p>वह ब्लाग शायद किसी ब्रिटेन या अमेरिकी ब्लाग लेखक का होगा। वह कहीं इजरायल अपने व्यवसायिक कार्य से गया था और स्टार्ट अप(start up) खाने की बात लिख रहा था। अंग्रेजी में तो स्टार्ट अप (start up) जैसा था उसे परिवर्तित टूल ने देवनागरी में करने से मना कर दिया। वह कोई खाने की वस्तु होगी ऐसा मेरा अनुमान है। वह अपने मित्र और उसके परिवार साथ कहीं पिकनिक मनाने गया और वहां के दृश्यों के बारे में लिखा। उसके बारे में लिखते हुए भी स्टार्ट अप (start up)खाने की बात कर रहा था। अनुवाद टूल अगर उसे हिंदी में बता देता तो कोई बात नहीं पर हम अभी मान लेते हैं कि स्टार्ट अप कोई समोसे जैसी चीज होगी। समोसा भी तो खाने के काम आता हैं। अब खाने की कोई भी चीज है चाहे जो नाम दे दो। क्या अंतर पड़ता है? बहरहाल उसका पाठ ठीकठाक और दिलचस्प लगा। उसके ब्लाग पर आठ लाख व्यूज थे और तय बात है कि हम अगल दस वर्ष तक तो इतनी पाठक संख्या में सोच भी नहीं सकते।</p>
<p>फिर एक दूसरे ब्लाग की सामग्री लाया। वह पूर्वी एशिया-चीन, जापान या किसी अन्य देश-की किसी महिला ब्लाग लेखक की थी। उसने भारतीय गेहूं के आटे पर वह पोस्ट लिखी थी और उसमें भारतीय आटे के गेहूं की बोरी का फोटो भी था। उसने ऐसा करना अपने मां से सीखा था और उसने अपनी मां के प्रति बहुत भावुक होकर वैसे ही प्रेम व्यक्त किया था जैसे अपने देश की महिलायें व्यक्त करतीं हैं। हां, अंग्रेजी में कुछ कठिनाई से पढ़ते हुए यह जरूर लगा कि इससे तो हमारे हिंदी ब्लाग जगत की महिला लेखिकाएं बहुत अच्छा लिख लेतीं हैं। उनके विषयों में भी व्यापकता होती है।</p>
<p>फिर एक तीसरा ब्लाग बिना सोचे समझे उठा लाये। पता लगा कि वह तो खाद्य पदार्थ बनाने की विधियों से ही भरा पड़ा था। वह किसी भारतीय का नहीं लगा पर उसमें भारतीय खाद्य पदार्थ बनाने के विधियां ही थीं।</p>
<p>उस समय भारत के लोगों द्वारा अधिक मात्रा में भोजन खाने की बात सब जगह चर्चा का विषय थी और हम सोच रहे थे कि जो आदमी जिस विषय के अधिक अपना दिमाग निकट रखता है उसी पर ही वह लिख सकता है। हिंदी ब्लाग लेखक इस तरह कहां खाने पर अपना पाठ लिखते हैं? इसकी आशय तो  यह कि कि सभी सादा और कम खाने वाले हैं तभी तो इतना इस विषय पर नहीं लिखते। व्यंग्य, कहानी, कविता और आलेख हर विषय पर लिखे जाते हैं। </p>
<p>हम आजकल भी अंग्रेजी ब्लोग देखते हैं पर कोई ऐसा विषय उन पर नहीं दिखता कि उसे पढ़ें। राजनीतिक विषयों कह भरमार है पर वह अपने देश से संबंधित नहीं होते। अब किसे पड़ी है कि अमेरिकी के राष्ट्रपति चुनाव में क्या चल रहा है? इस पर बहुंत आलेख देखे। ऐसा भी हो सकता है कि जब हम जाते हों ऐसे विषय न मिलते हों जिनको हम पढ़ना चाहते हैं। </p>
<p>हिंदी के लेखक-चाहे वह अंतर्जाल पर हों या बाहर-उन्हें इस बात से दुःखी नहीं होना चाहिए कि हिंदी अंग्रेजी का टूल शतप्रतिशत परिणाम नहीं दे रहा। दरअसल यह अभी तक जो चर्चा हमने सुनी वह अग्रेजी से हिंदी अनुवाद पर सुनी। हिंदी से अंग्रेजी के अनुवाद पर अभी हम प्रतीक्षा कर रहे हैं-जिसके बारे में मेरा मानना है कि हम अपने पाठों में हिंदी से अंग्रेजी में  अधिकतम शुद्धता के प्रयास हम कर सकते है।  जिस तरह चारों तरफ उसकी निराशा की बात सुन रहे हैं उससे तो यही लगता है कि अगर यह टूल अंग्रेजी का हिंदी में शुद्धता से अनुवाद कर देता है तो फिर इतने पाठक भी नहीं मिलेंगे जितने अब मिल रहे हैं। कभी अपने आसपास मैंने इस बात से लोगों को प्रसन्न होते नहीं देखा कि अंतर्जाल पर हिंदी में भी लिखा जा रहा है इस पर किसी को प्रसन्न होते नहीं देखा पर इस टूल के निरुपयोगी होने से दुःख व्यक्त करते हुए  कुछ लोगों को देखा है। हां, देश की पत्र-पत्रिकाओं के संपादक अवश्य निराश हुए होंगे कि अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद की गयी सीधी सामग्री मिलना अभी मुश्किल है। कुछ ब्लाग लेखक भी दुःखी हो सकते हैं कि अगर यह सफल होता तो वहां से सीधे सामग्री उठाकर ब्लाग पर रख देते देखो अमुक  अमेरिकी ब्लाग लेखक का शानदार पाठ।</p>
<p> वैसे भी हिंदी के कम प्रसिद्ध (मैं लेखक को छोटा बड़ा नहीं मानता) लेखकों को प्रसिद्धि देने के उद्देश्य से कोई भी उनको प्रकाशित नहीं करता। यहां प्रकाशन के लिए जरूरी है कि आप कभी फिल्मी पटकथा लेखक, अभिनेता, निर्देशक, किसी पत्र-पत्रिका के संपादक या कोई स्तंभकार रह चुके हों। फिर भी कभी किसी को महत्वहीन कालमों में छपने का अवसर मिल ही जाता है। अगर यह टूल शत प्रतिशत सफल हो जाता तो शायद इससे भी जाते।</p>
<p>हां, मैं प्रयोगजीवी आदमी हूं और ऐसा  प्रयास करूंगा कि मेरा हिंदी में लिखा अंग्रेजी में इस तरह अनुवाद हो कि वह कुछ पढ़ने और समझने योग्य हो। इसके लिये हम प्रयास कर सकते हैं। इसके लिये अपने कुछ पाठ मैं वहां जाकर अनुवाद कर देखता हूं। कुछ वैकल्पिक शब्दों के साथ वहां शतप्रतिशत परिणाम प्रतीत होता है और वाक्य भी समझ में आते  है- कुछ पोस्टें रखीं हैं पर परिणाम से स्वयं भी अनभिज्ञ हूं। अगर कुछ ब्लाग लेखकों ने कहीं ऐसा प्रयास किया तो हो सकता है कि उनको अंग्रेजी में भी सफलता मिले। हां,  तब भी  यह जरूर हो सकता है कि यहां हिंदी में लिखने के लिये इनाम और सम्मान कोई पा रहा है और अमेरिका और ब्रिटेन में नाम किसी और का हो रहा है। हिंदी के कल्याण से जुड़े शीर्षस्थ लोगों को वही लोग इनाम और सम्मान के लिये उपयुक्त लगते हैं जिससे उनका स्वयं का प्रचार होता हो। हिंदी के लेखकों को भूखा रखकर उससे लिखवाने की प्रवृत्ति रखने वाले लोगों को आगे चुनौती भी मिल सकती है और अगर शतप्रतिशत परिणाम वाला टूल आया तो हिंदी के लेखक भी संकट में आ सकते हैं। <br />
 </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जब लोग अपने दिल की बात लिख देते हैं-आलेख ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=405</link>
<pubDate>Mon, 12 May 2008 14:40:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=405</guid>
<description><![CDATA[कल  मीनाक्षी ने मुझे हतप्रभ कर दिया क्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कल  मीनाक्षी ने मुझे हतप्रभ कर दिया क्योंकि अपने ब्लाग (शब्द पत्रिका) पर मैंने जो लेख रखा था उस पर मुझे कोई टिप्पणी अपेक्षित नहीं थी, पर महेंद्र मिश्र जी और मीनाक्षी जी ने त्वरित टिप्पणी देकर मुझे यह सोचने को बाध्य किया कि आखिर मैं इस हिंदी ब्लाग जगत को क्या समझूं?</p>
<p>पिछले दिनों श्री समीरलाल जी की बात को ध्यान में रखते हुए मैंने आज एक योजना बनाई। सोचा कि चलो आज  से दूसरों के ब्लाग सामने रखकर कविता लिखेंगे और टिप्पणी के रूप में भी रखेंगे और अपनी पोस्ट भी तैयार हो जायेगी। दूसरा लक्ष्य था कि जरा आज हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाने वाले एग्रीगेटर ब्लागवाणी को जरा ध्यान से भी देखें क्योंकि मैं किसी एक एग्रीगेटर  पर ब्लाग देखने को कभी वरीयता नहीं देता। सभी जगह अपने विचार के अनुसार जाता ही रहता हूं। सबसे पहला ब्लाग श्री अनिल रघुराज जी का सामने आया। मैने उसे ध्यान से पढ़ा। मुझे लगा कि इस पर मेरे लिये भी कुछ लिखने को है। इसीलिये एक कविता लिखी और वहां कमेंट के रूप में रख दी। वहां से लौटकर मैंने सोचा लोग चालाकी समझ जायेंगे इसलिये एक कविता और जोड़कर अपनी पोस्ट बनायी।</p>
<p>इसी बीच थोड़ा काम से चला गया और फिर आकर ब्लागवाणी खोली। मैंने सोचा कि चलो कोई और विषय देख लें। वहां देखा तो मदर डे पर अधिक पोस्टें थीं और सोचा कि बना लें कोई हास्य कविता और सब जगह पेस्ट कर दें पर फिर लगा कि उसमें कुछ ऐसा वैसा भी  आ सकता है कि जो किसी कि भावना आहत हो। हालांकि मैं उसमें ऐसा कुछ नहीं लिखता पर हास्य कविता ही अपने आप में ऐसी चीज है कि किसी को भी लग सकता है कि देखो हम तो कितना गंभीर हैं और यह हंस रहा है। अनेक पोस्टें देखीं और लगा कि चलो यह नुस्खा आगे भी आजमायेंगे।  कुल मिलाकर निराश होकर वहां से लौटे। उसी समय एक दोस्त का फोन आया कि आज कुछ ब्लाग पर लिख रहे हो? तो हम देखें। यार, तुम्हारे साथ एक मुसीबत यह है कि इतने ब्लाग मना रखें पता हीं नहीं पड़ता कि किस पर नयी पोस्ट है? मैं तो वह बीस हजार वाली शब्द पत्रिका ही खोलता हूं।’</p>
<p>हमें कुछ नहीं सूझा हमने कह दिया-‘‘आज कहीं घूमे आओ। हम चिंतन लिख रहे हैं और यह शब्द पत्रिका पर ही आयेगा। वैसे तुम कोई भी ब्लाग खोलकर पीछे भी पढ़ा करो। वैसे भी तुम भुगतान के रूप में छहःपोस्ट पढ़ते हो एक टिप्पणी लगाते हो। हमारे मित्रों के ब्लाग पढ़कर हमें उनके बारे में पूछते हो। हमारे कहने के बावजूद वहां टिप्पणियां नहीं लगाते। अगर चाहते हो कि अंतर्जाल पर अच्छा पढ़ा जाय तो उस पर कमेंट लगाओ। अब क्या हम लेखक ही इसका भी दायित्व उठायें? हमें भी क्या मिलता है।’</p>
<p>मित्र का फोन रखते ही हमारे मुख से निकला चिंतन शब्द हमारे दिमाग में घुस गया और फिर बिना किसी संदर्भ के लिखने का मन बनाया। आंखें बंद कीं(कृतिदेव पर लिखते समय ऐसा ही करता हूं) और लिखने बैठ गया। मन में विचारों का क्रम तो सुबह से चल रहा था और एक बार आया कि इसे रोककर दूसरी पोस्ट लिखें पर फिर मैंने सोचा कि अब बहुत हो गया अस्वाभाविक रूप से लिखते हुए। मैनें अपनी पोस्ट लिखी। पोस्ट रखते समय मैं यह अनुमान कर रहा था कि ब्लागवाणी पर अधिकतम पांच का आंकड़ा शायद ही छू पाये। सामान्य शीर्षक और फिर साथ में आलेख का संकेत ब्लागवाणी पर हिट दिलाएगा यह आशा मैं नहीं कर रहा था। न ही अपने मित्र ब्लाग लेखकों से यह आशा कर रहा था कि वह टिप्पणी लिखने के लिए इसे पढ़ेंगे क्योंकि इसके लिये कोई और पोस्ट भी आ सकती है। रखते समय यह भी जानता था कि यह पोस्ट आगे चलकर लंबे समय तक हिट लेती रहेगी और इस पर टिप्पणियां आतीं रहेंगी।</p>
<p>मैं अब ऐसी पोस्टें नहीं लिखना चाहता जो सामयिक विषयों से संबंधित हों। उसमें मेरा परिश्रम हो समय व्यर्थ ही नष्ट होता है।</p>
<blockquote><p><strong>मीनाक्षी जी ने लिखा<br />
"पढ़ते तो हमेशा है और सोचते हैं कि आप के लेख टिप्पणी के<br />
मोहताज़ नहीं . आज अनायास जी चाहा कि अपने मन के भाव<br />
लिख डालें. आपके सभी  ब्लॉग एक से बढ़कर एक हैं. जीवन को<br />
आसान बनाने के छोटे छोटे मंत्र यहाँ हैं जो बड़ी गहरी बात समझा<br />
जाते हैं. आभार"</strong></p></blockquote>
<blockquote><p><strong>महेंद्र मिश्रा जी ने लिखा<br />
"अपने अंदर ही यह अहसास होता हैं कि हम केवल अपने मुख से अपनी झूठी प्रशंसा  कर रहे हैं।<br />
बहुत बढ़िया आलेख प्रस्तुति के लिए धन्यवाद"</strong></p></blockquote>
<p>टिप्पणियां बहुत आतीं हैं पर कुछ लोग अपने मन की बात इस तरह रख देते हैं तब मैं सोचता हूं कि इनके लिए लिखते रहना चाहिए। कुछ दिनों से मेरा विचार तो यह भी बनता और बिगड़ता  रहा है कि नारद और चिट्ठा जगत ने मेरे जो दो ब्लाग मुझसे पूछे बगैर ही अपने यहां दिखाने शुरू किये हैं अब उन पर ही लिखूं-क्योंकि ब्लागवाणी पर जब कोई हिट की चर्चा मेरे ब्लाग पर करता है तो मुझे अपना ध्यान भंग होता नजर आता है। आज मीनाक्षी जी की टिप्पणी ने मेरे इस विचार को समाप्त ही कर दिया है। मेरा लक्ष्य आम पाठक है और अपनी बात वहां तक पहुंचाने से ही मुझे संतुष्टि होती है। टिप्पणियां लिखता हूं और लोग मुझे देते हैं। इसे मैं एक सामाजिक व्यवहार की तरह मानता हूं-जैसे एक दूसरे से नमस्कार या प्रणाम करना। मेरी अनेक पोस्टें बिना टिप्पणी के आतीं हैं।  आम पाठक की तरह ब्लाग लेखकों में भी विविध रुचि वाले लोग हैं पर चिंतन भी कोई पसंद करता हूं यह मुझे आज पता लगा।<br />
कुछ ऐसी भी घटनाऐं हुईं है कि मैं किसी वरिष्ठ ब्लाग लेखक की पोस्ट पर टिप्पणियां रखकर आया क्योंकि उनका लेखकर मुझे पसंद आया। उन्होने मेरी पंद्रह-पंद्रह दिन पुरानी पोस्ट पर टिप्पणी लिख कर जो कहा उसे यहां दोहराने से कोई मतलब नहीं है। एक ब्लाग लेखक ने लिखा कि‘आपकी हास्य कविता देखकर तो मैं यह समझा कि आप को आम हास्य कवि हैं पर आपका इस ब्लाग की यह  इतनी गहन चिंतन वाली पोस्ट देखकर तो मै हैरान रह गया हूं।’</p>
<p>मैं बहुत पोस्टें लिखता हूं और मुझे नियमित टिप्पणियां देने वाले मित्र सभी पर आयें यह संभव नहीं है और आयें तो मुझे यह लगेगा कि यह मेरी वजह से कष्ट उठा रहे है।</p>
<p>अगर मेरा अनुमान सही है तो अनेक आम पाठक भी टिप्पणियां लिख रहे हैं। कुछ लोगों के पास हिंदी टूल मैंने भिजवाया है। इस समय ब्लाग लेखकों में तमाम तरह की निराशाजनक बातों की चर्चा चल रही है। ऐसे में आम पाठक अगर यह सोचता है कि उसे और अच्छा लिख हुआ पढ़ने को मिले तो उसे भी अब टिप्पणियों को बोझ उठाना होगा। आम पाठकों से सहयोग के बिना अंतर्जाल पर हिंदी में बहुत अच्छा और सार्थक लिखना कठिन है। मेरे ब्लाग पर आने वाले पाठक साइडबार से दूसरे के ब्लाग पर जाते हैं तो मेरी उनसे अपेक्षा रहती है कि वहां वह कोई टिप्पणी जरूय लिखें। सभी ब्लाग पर कमेंट के कालम हैं।</p>
<p>अब हिंदी ब्लाग जगत पर अनेक लेखक साहित्य-व्यंग्य, कहानी, कविता और आलेख-लिख रहे हैं और अंग्रेजी-हिंदी अनुवाद टूल को जिस तरह गूगल हिंदी पृष्ठों के साथ जोड़ रहा है उससे लग रहा है कि हिंदी के कई नये लेखक  अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना और भाषा का नाम रोशन करेंगे।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मैं इमरान हाशमी बनना चाहता हूँ ]]></title>
<link>http://apurn.wordpress.com/?p=159</link>
<pubDate>Mon, 12 May 2008 06:25:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>Shubhashish Pandey</dc:creator>
<guid>http://apurn.wordpress.com/?p=159</guid>
<description><![CDATA[ (अपने बी.टेक. फाइनल इयर में जब मैंने ये ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://apurn.files.wordpress.com/2008/05/image003.gif"><img class="alignleft size-medium wp-image-160" src="http://apurn.wordpress.com/files/2008/05/image003.gif?w=128" alt="" width="128" height="128" /></a> (अपने बी.टेक. फाइनल इयर में जब मैंने ये कविता लिखी थी उस वक़्त unicode जैसी सहूलियत नहीं थी इसलिए मेरे दोस्त कुमार वरुण, जो की इस कविता के प्रेरणा भी थे (क्युकी वो कभी कभी बोलता की यार मैं इमरान हाश्मी बनना चाहता हूँ :P ) ने इसे हिंदी पैड पे लिख के jpeg फॉर्मेट में मेल में attach किया! आज मैं इसे unicode में यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ )</p>
<p> </p>
<p> </p>
<p><strong> मैं इमरान हाशमी बनना चाहता हूँ</strong> </p>
<p>पांचवी कक्षा की एक क्लास मे मास्टर ने बच्चों से पूछा<br />
बताओ क्या बनोगे, कैसे करोंगे अपने माँ-बाप का नाम ऊँचा<br />
किसी ने IAS. किसी ने PCS. किसी ने कहा अच्छा आदमी बनाना चाहता हूँ<br />
तभी पीछे की सीट से उठकर एक बच्चे ने कहा<br />
Sir! मैं इमरान हाशमी बनना चाहता हूँ</p>
<p>ऐसे जवाब की ख्वाब मे भी नही की थी कभी कल्पना<br />
पर Teacher को लगा शायद हो ये लडके का बचपना<br />
समझाया की बेटा गलती की है तुने Carrier को चुनने मे<br />
ये तो बता क्या प्रॉब्लम है तुझे और कुछ बनने मे ???</p>
<p>लड़का बोला Sir! जॉब मे अभी कहाँ इतना पैसा है<br />
और Business करना मुझे लगता बेवकूफों जैसा है<br />
नेता फस जाते हैं Akshar स्टिंग ऑपरेशन के जंजाल मे<br />
खेल मे Zahar भर दिया मैच फिक्सिंग के बवाल ने<br />
पर फ़िल्म इंडस्ट्री मे प्रोफिट की लाइन हमेशा ऊपर चढ़ती है<br />
बढ़िया काम से Price-Value तो बुरे से Popularity बढ़ती है<br />
और इस बात को तो ख़ुद कई बड़े फ़िल्म समीक्षक माने है<br />
MMS Clips से भी ज्यादा बिकते इमरान के फिल्मो के गाने है</p>
<p>मै भी ऐसे गाने कर अपनी लाइफ बदलना चाहता हूँ<br />
इसीलिए तो Sir! मैं इमरान हाशमी बनाना चाहता हूँ</p>
<p>हुंह!!!! आज कल के लडके जाने पढ़ते हैं किस किताब से<br />
Teacher का भी सर चक्र गया बच्चे के इस जवाब से<br />
Teacher ने फ़िर भी पूछा उसमे ऐसी क्या बात समाई है<br />
ये तो बता अभिषेक बच्चन बनने मे क्या बुराई है ???</p>
<p>सिर्फ़ दो फिल्मो से इतना नाम नही कमाया अभिषेक के बाप ने<br />
Murder किया लड़किया फ़िर भी कहती .Aashiq Banaya Aap Ne...<br />
मल्लिका,तनुश्री, उदिता निपटी पिछली फिल्मों की साइन मे<br />
सुनाने मे आया है की अब सेलिना हृषिता भी है लाइन मे<br />
मै भी ऐसे टेस्टी CHOCOLATE का स्वाद चखाना चाहता हूँ<br />
इसीलिए तो Sir मैं इमरान हाशमी बनाना चाहता हूँ</p>
<p>अब मास्टर का गुस्सा पहुच गया सातवे आसमान पे<br />
बोले.. सिवाय लड़किया घुमाने के क्या किया इमरान ने ??<br />
Sir! लड़कियों को पीछे घुमाना कोई आसान काम नही<br />
वरना बड़े Powerful लोगो का होता ये अंजाम नहीं</p>
<p>क्या नही जानते आप America के पूर्व राष्ट्रपति को ??<br />
कैसे प्राप्त हुए मोनिका के चक्कर मे .वीरगति को<br />
बदल गया कप्तान देश का सौरभ-नग्मा के टक्कर मे<br />
Cricket खेलना भूल गया वो .नए खेल के चक्कर मे<br />
मेरी इतनी बातों का मतलब बिलकुल सीधा-साफ है<br />
काबिलियेत मे भी इमरान हाशमी. बिल क्लिंटन का बाप है</p>
<p>मैं भी एक Demanded और काबिल आदमी बनाना चाहता हूँ<br />
इसीलिए तो Sir! मैं इमरान हाशमी बनाना चाहता हूँ</p>
<p>................................. Shubhashish ( 2006)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[माँ]]></title>
<link>http://apurn.wordpress.com/?p=161</link>
<pubDate>Sun, 11 May 2008 10:57:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>Shubhashish Pandey</dc:creator>
<guid>http://apurn.wordpress.com/?p=161</guid>
<description><![CDATA[जो भी जॉब के लिए घर से दूर हैं शायद उन स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जो भी जॉब के लिए घर से दूर हैं शायद उन सब के दिल में यही जज्बात होंगे &#124; <br />
ये चार लाईने मैं अपनी माँ के लिए लिखा हूँ, वैसे माँ को याद करने को लिए कोई दिन नहीं होता है माँ तो हमेशा हमारे दिल में रहती हैं  हैं लेकिन आज Mother's Day के बहाने जरुर इन भावनाओ को यहाँ व्यक्त कर रहा हूँ  </p>
<p>कभी-कभी खुद अपनी तरक्की से भी हो जाता नाराज हूँ मैं<br />
इसी भाग दौड़ में खुद अपनों से दूर हो गया आज हूँ मैं<br />
जिस आंचल के साये में रह के किसी लायक बन पाया<br />
उस माँ से ही मिलने को चन्द छुट्टी का मोहताज हूँ मैं<br />
...................................... Shubhashish</p>
<p> </p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आम आदमी बने रहने की कोई नहीं सोचता-आलेख]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=404</link>
<pubDate>Sun, 11 May 2008 09:58:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=404</guid>
<description><![CDATA[कहने को कई लोग आपसी वार्तालाप में ऐसी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कहने को कई लोग आपसी वार्तालाप में ऐसी टिप्पणियां कर जाते हैं जो उनके स्वयं के समझ में नहीं आतीं तो किसी अन्य व्यक्ति के समझ में क्या आ जातीं  हैं।</p>
<p>एक सज्जन ने कहा कि‘नेता बनने की बजाय मैं भिखारी बनना चाहूंगा।’</p>
<p>एक सज्जन को मैने कहते सुना-‘मैं संत की बजाय वैश्या बनना चाहूंगा।’</p>
<p>किसी ने कहा-‘मैं पुलिस वाला बनने की बजाय मूंगफली बेचने वाला बनना चाहूंगा।</p>
<p>मतलब यह कि किसी खास आदमी से नाराज होने के कारण  कोई व्यक्ति वैसा नहीं बनना चाहता-इस बात की घोषणा तो वह करता है पर आम आदमी बने रहने की कोई इच्छा छोड़कर वह कुछ बनना चाहता है।<br />
हर कोई अपने पास शक्ति के स्त्रोत बनाये रखना चाहता है। पद, पैसा और प्रतिष्ठा पाने के मोह में सब अंधी दौड़ प्रतियोगिता के धावक है। हर कोई आम आदमी की जमात से बाहर  निकलकर खास आदमी की तरह चमकना चाहता है। अपने से दूर उसे आकर्षण का केंद्र दृष्टिगोचर होता है। वहां पहुंचता है तो उसे फिर वही अंधेरा दिखाई देता है। वह फिर दूसरी जगह आकर्षण की तलाश करता है। कोई पद मिल गया तो उससे संतोष नहीं होता उसके साथ अन्य लाभ भी होना चाहिए। धन का लाभ होता है तो वह अन्य प्रकार के लालच भी करता है। घर के बाहर किसी अन्य महिला से संपर्क बने यह भी कुछ लोग अपने अंदर विचार करते हैं। कोई व्यक्ति उसके सामने सच न कहे यह अहंकार का भाव उसमें आता है। अपने ही बनाये गये जाल में पकड़ा   जाता है और फिर  कहता है कि ‘‘मेरे पास सब है पर शांति नहीं है जिसके पास शांति है वही सुखी है।‘</p>
<p>जिसके पास धन प्रचुर मात्रा में नहीं है, न वह किसी उच्च  पद पर विराजमान है, न किसी उच्च पद वाले व्यक्ति का हाथ उसके ऊपर है और न ही वह देह से बलवान होता  है, उसे भी अपने ऐसे गुणों का बखान करने की आदत होती है जो उसमें है ही नहीं। वह अपने को खास आदमी साबित करना चाहता है। हर आदमी  आम है पर खास कहलाना चाहता है। यह भाव  है आदमी के चरित्र और विचारों में पतन का कारण ।</p>
<p>एक बार आम आदमी होने का बोध धारण कर लो और खास आदमी को दूर से देखकर ही अपनी नजर फेर लो। ऐसा नहीं कर सकते  तो पहले उस खास आदमी की दिनचर्या देखो उसमें ऐसा कुछ नहीं होता जो आम आदमी में नहीं होता। उसमें भी  वैसे ही गुण और अवगुण होते हैं जैसे आम आदमी में होते हैं। जब अपने आम आदमी की तरह अनुभव करोगे तुम्हारे ज्ञान चक्षु खुल जायेंगे। यह अनुभव कर सकते हो कि उसके और तुम्हारे अंतर्मन में कोई अंतर नहीं है। आम आदमी होने को अर्थ है जीवन के प्रति दृष्टा भाव रखना। जब हम दृष्टा भाव से देखेंगे तब हमारे मन की बेचैनी दूर हो जायेगी। हमारे जैसी हालत में सब जी रहे हैं। हां, कुछ बाहरी दिखावा करते हैं और उनके देखकर हम भी उन जैसा करने लग जाते हैं फिर अपने अंदर ही यह अहसास होता हैं कि हम केवल अपने मुख से अपनी झूठी प्रशंसा  कर रहे हैं। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कुछ दृश्य निगाहों से पढ़े जाते हैं-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=373</link>
<pubDate>Sat, 10 May 2008 18:14:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=373</guid>
<description><![CDATA[
कुछ दृश्य इस तरह सामने आते हैं
कि शब्द ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="padding-left:30px;">
<strong><span style="color:#003300;">कुछ दृश्य इस तरह सामने आते हैं<br />
कि शब्द हो जाते  खामोश<br />
निगाहों से वह पढ़े जाते हैं<br />
लिखकर कोई क्या बतायेगा<br />
तस्वीरों में चेहरे<br />
सारा माजरा बयां कर जाते हैं<br />
जो देखकर भी न समझे<br />
वह पढ़कर भी क्या समझेंगे<br />
हृदय में बसता हो जीवन<br />
संवेदनाओं की बहती हो जब पवन<br />
चक्षुओं से देखकर ही<br />
स्पर्श अनुभव किये जाते हैं<br />
जागते हुए भी सोते हैं कई लोग<br />
उनको समझाने से मतलब बेमानी हो जाते हैं</span></strong></p>
<p style="padding-left:30px;"><strong><span style="color:#003300;">..........................<br />
दीपक भारतदीप<br />
</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[महिला बुद्धिजीवी सम्मेलन-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=152</link>
<pubDate>Sat, 10 May 2008 13:16:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=152</guid>
<description><![CDATA[सम्मेलनों के आयोजने करने के आदी लोगों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सम्मेलनों के आयोजने करने के आदी लोगों की संस्था के पदाधिकारियों के  दिमाग  में ‘बुद्धिजीवी महिला सम्मेलन’ करवाने का विचार आया। कुछ लोगों ने इसका विरोध किया और कुछ लोगों ने समझाया। एक समझदार ने कहा-‘‘इस देश की शिक्षा पद्धति ने लोगों को गहरे ज्ञान से वंचित किया है और सभी प्रकार के बुद्धिजीवी चाहे वह  महिला हो या पुरुष केवल वाद का नाम और नारे लगाकर ही चलते हैं और फिर आपस में झगड़ा करते हैं। सामान्य आदमी तो बैठक आदि में जाता नहीं और जाता है तो खामोशी से चला जाता है और चार बुद्धिजीवी पूरुष जहां मिलते है लड़ पड़ते है, उनको हाथ पकड़ कर या धमकी देकर समझाया जा सकता है  कहीं महिला बुद्धिजीवी कहीं झगड़ा कर बैठीं  तो उनको समझाना कठिन हो जायेगा।’</p>
<p>   मगर संस्था के लोग नहीं माने। सम्मेलन कराने का नशा उन पर सवार था। उनका विचार था कि इस बहाने संस्था का नाम पुनः चमकेगा जो पहले ही डूब रहा है।</p>
<p>सम्मेलन घोषित हो गया। ढूंढ-ढूंढकर बुद्धिजीवी महिलाओं को आमंत्रण भेजा गया और फिर विषय रखा गया ‘सास-बहु और ननद-भाभी  के मधुर संबंध कैसे हों’?</p>
<p>संस्था के सभी लोग आयोजन कर चंदा वसूलने और फिर आत्मप्रचार के काम में महारात हासिल किये हुए थे पर फिर भी उनमें से कुछ कच्चे पड़ गये और उन्होंने फैसला किया कि वह इस आयोजन से दूर रहेंगे। वजह यह थी कि उनके घर की महिलायें भी इन आयोजनों में आतीं थीं और उनको लगा कि इस तरह के आयोजन से उनके घरेलू विवाद सबके सामने आयेंगे।</p>
<p>हालांकि संस्था के लोगों ने इस बात का पुख्ता इंतजाम किया कि उनके घर की महिला सदस्य इनमें शामिल न हों और वह बुद्धिजीवी भी हों तो उनको सूचना नहीं भेजी जाये। इसलिये जिसका नाम भी आमंत्रण पत्र पर लिखा जाता था पहले इस बात की तस्दीक कर ली जाती थीं कि वह संस्थो के सदस्यों की घर से संबद्ध न हों।</p>
<p>सम्मेलन का दिन आया तमाम महिलायें कार्यक्रम में पहुंची। कुछ को भाषण देना था तो कुछ को केवल सुनकर तालियां बजानीं थीं। तालियां बजाने के लिये भी बकायदा पैसे देने का आश्वासन दिया गया था। आयोजक जानते थे कि बोलने के लिये बुद्धिजीवी महिलायें तो मिल जायेंगी पर ताली बजाने के लिये उनकी उपलब्धता संदिग्ध है। इसलिये कुछ पुरुंष भी किराये पर बुलाये गये और उनको महिला अधिकारों के लिये लड़ने वाले जुझारू कार्यकर्ता कर प्रचारित किया गया।</p>
<p>तमाम सावधानियों के बावजूद आयोजक आमंत्रण पत्र भेजने में गल्तियां कर गये। उन्होने कई ऐसी बुद्धिजीवी महिलाओं को बोलने के लिये आमंत्रण भेज दिया जिनके आपस में सास बहु और ननद-भाभी के रिश्ते थे। उनको इस बात का ध्यान ही नहीं रहा कि बुद्धिजीवी घरों में ‘बुद्धिजीवी’ बहु की मांग ही होती है यह अलग बात है कि कोई भी बुद्धिजीवी सास दहेज की राशि को लेकर वैसे ही कोई समझौता नहीं करती जैसे कि कोई सामान्य सास।</p>
<p>सम्मेलन शूरू कराने के लिये एक पुरुष सदस्य माइक पर आया और बोला-‘‘आज हम अपने पहले बुद्धिजीवी सम्मेलन.........................’’</p>
<p>उसकी बात पूरी होने से पहले ही एक महिला कुर्सी से उठ कर खड़ी हो गयी और बोली-‘क्या इस काम के लिये कोई महिला नहीं थी। हटो मैं संचालन करती हूं।’</p>
<p>वह मंच पर चढ़कर आ गयी और उससे माइक लेकर स्वयं डट गयी।उस संचालक पर तो जैसे वज्रपात हुआ क्योंकि वह उस संस्था का अध्यक्ष था और उसी ने ही इस सम्मेलन के प्रस्ताव को रखा था और पास कराया था। उसका मूंह उतर गया तो संस्था में उसके वह प्रतिद्वंद्वी खुश हो गये जो इस सम्मेलन को कराने के विरोधी थे।</p>
<p>उस महिला ने अखबारों की कटिंग दिखाकर  कुछ ऐसी खबरें जिनमें महिलाओं के खिलाफ अपराध किये गये थे उनको पढ़ना और उसके लिये पुरुष प्रधान समाज को जिम्मेदार ठहराने का सिलसिला शुरू किया। </p>
<p>तब एक दूसरी महिला खड़ी होकर बोली-‘‘यहां हमें  बताया गया है कि आज की चर्चा का विषय है ‘सास-बहु और ननद-भाभी  के मधुर संबंध कैसे हों’? आप तो विषय से हटकर बोल रहीं हैं।’</p>
<p>उसके पास ही उसकी बहु भी बैठी थी वह अपनी सास से बोली-‘‘अत्याचार तो अत्याचार है। खबर बतायेंगी तभी तो यह पता लगेगा कि कहां-कहां बहुओं पर अत्याचार हुए।’</p>
<p>तब दूसरी बुद्धिजीवी महिला भी माइक पर पहुंच गयी और उससे छीनकर बोली-‘हम पुरुषों द्वारा तय किये गये विषय पर नहीं बोलेंगे। हमें अपना विषय तय स्वयं करना चाहिए।’</p>
<p>अब तो वहां हलचल मच गयी। बहुएं और भाभियां चाहतीं थीं कि उनके साथ जो दुव्र्यवहार घर में होता है उस पर चर्चा की जाये और सास और ननदें चाहतीं थीं कि इसमें बहुओं द्वारा अपने अधिकारों के दुरुपयोग पर विचार किया  जाये।</p>
<p>माहौल गर्मा गया था और आयोजकों की घिग्घी बंध गयी थी। संस्था के एक सदस्य ने कहा-‘आज का किसी के मरने की खबर देकर स्थगित करते हैं और अगली तारीख पर आयोजित करेंगे। अभी जो नाश्ते का समय घोषित करते हैं फिर इसे स्थगित कर देते हैं।’</p>
<p>संस्था का अध्यक्ष बोला-‘‘पर वहां यह घोषित करने के लिये भी तो कोई महिला चाहिए। देखा नहीं मुझे किस तरह वहां से भगा दिया।</p>
<p>माहौल तनाव से भरा था। अब आयोजकों के समझ में नही आ रहा था कि क्या करें? किसकी मदद लें? सब बुद्धिजीवी महिलायें तो जोर-जोर से बोल रहीं थीं। अचानक उनकी नजर एक व्यंग्यकार महिला पर पड़ गयी। उस सभा में वही एक खामोश बैठी थी और मंद-मंद मुस्करा रही थी। मजे की बात यह कि उसे नहीं बुलाया गया था वह तो कहीं से सुनकर वहां आयी थी। अध्यक्ष उसके पास गया और बोला-‘‘आप हमारी कुछ मदद करे। पहले सबके लिये नाश्ते की घोषणा करें थोड़ी देर बाद किसी बहाने इस स्थगित कर दें।’</p>
<p>व्यंग्यकार महिला ने कहा-‘‘पर मैं तो यहां बिना बुलाये आयी हूं।  वैसे भी मैं केाई बुद्धिजीवी नहीं हूं बल्कि व्यंग्यकार हूं। नहीं.....नहीं............तुम क्या समझते हो कि मेरा कोई सम्मान नहीं है।’</p>
<p>उसने जब अधिक याचना की तो वह तैयार हो गयी। उसने मंच संभाला और पहले नाश्ते की घोषणा कर माहौल को ठंडा किया फिर थोड़ी देर बाद माइक पर आयी और बोली-‘‘ अब हम सब लोगों ने नाश्ता कर लिया है पर हमारा विषय तय नहीं है इसलिये अगली तारीख पर विषय तय कर लेंगे तब आपको सूचना दी जायेगी। हम फिर मिलेंगे।’</p>
<p>सब महिलायें  थोड़ा बहुत विरोध कर वहां से चलीं गयीं। थोड़ी देर बाद वह व्यंग्यकार महिला बाहर निकली तो देखा एक खाकी पेंट, सफेद शर्ट और सिर पर टोपी पहने एक आदमी खड़ा उसे देख रहा था और जैसे ही नजरें मिलीं तो वह खिसकने को हुआ तो वह पीछे से चिल्लाकर  बोली-‘अरे, तुम व्यंग्यकार होकर इस तरह यहां क्यों खड़े हो। अच्छा अपने लिये विषय तलाशने चपरासी की भूमिका में आये हो। अगर मुझे पता होता तो सब महिलाओं को बता देती और तुम्हारी धुलाई करवाती। तुम्हारे व्यंग्य वैसे ही मेरे समझ में नहीं आते पर तुम हो कि लिखना बंद नहीं करते।</p>
<p>वह अपनी साइकिल उठाकर बोला-‘‘अब हम दोनों ही यहां से निकल लें तो अच्छा रहेगा। मै इस वेश में इसलिये आया था कि चपरासी तो चपरासी होता है उसकी उपस्थिति पर भला कौन आपत्ति करता है पर अगर सूटबूट पहनकर आता तो हो सकता है कि बाहर भी कोई खड़ा नहीं रहने देता। यहां दोनों ही बिना बुलाये आये हैं अगर मैं इस पर व्यंग्य लिख दूं और महिलाओं का तुम्हारे बिना आमंत्रण के यहां आगमन की बात बता दू तो कैसा रहेगा? और बुद्धिजीवी और व्यंग्यकार में अंतर होता है ऐसा मैंने तुम्हारे व्यंग्यों में ही पढ़ा है।</p>
<p>महिला व्यंग्यकार ने कहा-‘ महिलायें अभी भी दूर नहीं हैं बुलवा लूं। खैर छोड़ो..............फिर उनको भी यह पता चल जायेगा कि मैं भी यहां बिना बुलाये आयी हूं और आयोजकों कहने से उनका सम्मेलन खत्म कराया गया है।’’</p>
<p>अगले दिन अखबार में सम्मेलन के उल्लास से संपन्न होने का समाचार था और व्यंग्यकार महिला का नाम तक उसमें नहीं था। <br />
<strong>यह हास्य व्यंग्य काल्पनिक रचना है और किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई लेना देना नहीं हैं अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा। इन पंक्तियों को लेखक किसी भी महिला व्यंग्यकार से कभी नहीं मिला<br />
</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इतनी गैरत नहीं]]></title>
<link>http://apurn.wordpress.com/?p=158</link>
<pubDate>Sat, 10 May 2008 11:16:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>Shubhashish Pandey</dc:creator>
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<description><![CDATA[इस ज़िन्दगी में तुने पूरी की मेरी कोई ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इस ज़िन्दगी में तुने पूरी की मेरी कोई हसरत नहीं,<br />
मेरी खुशियों के लिए तू कुछ करे इतनी तुझे गैरत नहीं,<br />
पर हम तो आखिरी दम तक तुझे दुवाएं ही देते जायेंगे,<br />
क्यूंकि धोखा खाना तो मेरी किस्मत है पर धोखा देना मेरी फितरत नहीं&#124;<br />
.............................................. Shubhashish(2005) </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[उनका नाम ही दरियादिल हो जाता-कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=372</link>
<pubDate>Fri, 09 May 2008 16:16:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=372</guid>
<description><![CDATA[अपने दिल का बयां कभी कभी
दूसरे के अल्फ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">अपने दिल का बयां कभी कभी</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">दूसरे के अल्फाजों में नजर आता है</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">वह दिल को छू जाता है</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">इसलिए कहते हैं </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">दर्द और खुशी दोनो ही</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">बांट लिया करो दोस्तों से<br />
 <br />
जश्न का मौका हो तो </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">मजा हो जाता दुगुना </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">गम आधा रह जाता है </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">खोये रहोगे अपने ही दिल में </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">तो रोशनी कहीं से नहीं आयेगी</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">जो सुनोगे किसी और की आवाज </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">तभी कोई मिलेगा आसरा </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">वरना कहते हैं कि </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">अकेला चना कभी भाड़ नहीं फोड़ पाता है</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">अपने लिये तो जिंदा हैं सब</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">बांटकर खाते हैं जो लोगों से मिलकर</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">उनका नाम ही दरियादिल हो जाता है<br />
............................<br />
</span></h3>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[करते थे बातें इशारों पे जान देने की]]></title>
<link>http://apurn.wordpress.com/?p=157</link>
<pubDate>Fri, 09 May 2008 04:47:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>Shubhashish Pandey</dc:creator>
<guid>http://apurn.wordpress.com/?p=157</guid>
<description><![CDATA[अब चाहता हूँ तो जिन्दगी रुसवाई नही देत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अब चाहता हूँ तो जिन्दगी रुसवाई नही देती,<br />
अन्धेरे मे अपनी परछाई भी दिखाई नही देती,<br />
जो अब तक करते थे बातें इशारों पे जान देने की,<br />
क्या अब उन्हें हमारी आवाज भी सुनाई नहीं देती?<br />
....................................... Shubhashish(2005)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जरुरत किसको नहीं होती]]></title>
<link>http://apurn.wordpress.com/?p=156</link>
<pubDate>Thu, 08 May 2008 04:46:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>Shubhashish Pandey</dc:creator>
<guid>http://apurn.wordpress.com/?p=156</guid>
<description><![CDATA[एतबार की जरुरत किसको नहीं होती,
एक यार ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एतबार की जरुरत किसको नहीं होती,<br />
एक यार की जरुरत किसको नहीं होती,<br />
मिलता नहीं कोइ हमसफर साथ निभाने के लिये,<br />
वरना प्यार की जरुरत किसको नहीं होती&#124;<br />
............................... Shubhashish(2005)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मोबाइल मोहब्बत हो गई-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=150</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 17:50:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=150</guid>
<description><![CDATA[प्रेमी ने प्रेमिका के मोबाइल की
घंटी ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">प्रेमी ने प्रेमिका के मोबाइल की<br />
घंटी बड़ी उम्मीद से बजाई<br />
जा रही थी वह गाड़ी पर<br />
चलते चलते ही उसने<br />
अपने मार्ग में होने की बात उसे बताई<br />
फिर भी वह बातें करता रहा<br />
वह भी सुनती रही<br />
सफर गाड़ी पर उसका चलता रहा<br />
अचानक वह कार  से टकराई<br />
प्रेमी को भी फोन पर आवाज आई<br />
प्रेमी ने पूछा<br />
‘क्या हुआ प्रिये<br />
यह कैसी आवाज आई<br />
कोई ऐसी बात हो तो मोटर साइकिल पर<br />
चढ़कर वहीं आ जाऊं<br />
मुझे बहुत चिंता घिर आई’<br />
प्रेमिका ने कहा<br />
‘घबड़ाओ नहीं कार से<br />
मेरी गाड़ी यूं ही टकराई<br />
अपनी मरहम पट्टी कराकर अभी आई<br />
करा देगा यह कार वाला उसकी भरपाई+’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">प्रेमी करता रहा इंतजार<br />
फिर नहीं प्रेमिका की कोई खबर आई<br />
एक दिन भेजा संदेश<br />
‘जिससे मेरी गाड़ी टकराई<br />
उसी कार वाले से हो गयी  मेरी सगाई<br />
बहुत हैंडसम और स्मार्ट है<br />
उसने मुझ पर बहुत दया दिखाई<br />
इन दो पहियों की गाड़ी से<br />
तो अब हो गयी ऊब<br />
चार पहियों वाली गाड़ी में ही<br />
अब घूमने की इच्छा आई’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">प्रेमी सुनकर चीखा<br />
‘यह कैसा मोबाइल है<br />
जिसने मोहब्बत को भी बनाया<br />
अपने जैसा<br />
कितना बुरा किया मैंने जो<br />
उस दिन मोबाइल की घंटी बजाइ<br />
..............................................</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">नोट-यह हास्य कविता काल्पनिक है तथा इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।<br />
</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पसीना ही कविता लिखवाता है]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=520</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 16:51:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=520</guid>
<description><![CDATA[बदलते मौसम के साथ
मन भी यूं बदल जाता है
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बदलते मौसम के साथ<br />
मन भी यूं बदल जाता है<br />
जैसे उसके साथ बंधे हों हाथ<br />
ग्रीष्म के जलती दोपहर में<br />
व्यग्रता इतनी बढ़ जाती है<br />
नरक लगता हो  जीवन<br />
शाम होते बहती ठंडी हवा का<br />
एक झौंका भी शीतल कर देता है<br />
मौसम और मन के पहिये<br />
घूमते देख कौन कह सकता है<br />
हमारा मन भी होता है कभी हमारे साथ<br />
..........................</p>
<p>गर्मी की दोपहर में<br />
साइकिल पर चलते हुए<br />
पसीने में नहाए मैंने उसे देखा है<br />
लिखता है कविता वह हसंते  हुए<br />
कभी  उसे रोते नहीं देखा है<br />
पूछने पर बताता है<br />
उसके दोपहर का पसीना ही<br />
रात में शीतलता देकर उससे कविता लिखवाता है<br />
मैं उसे केवल आईने में ही देख पाता हूं<br />
क्योंकि वह चेहरा<br />
केवल उसी में नजर आता है </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इस ब्लाग (पत्रिका) की पाठक संख्या बीस हजार के पार]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=371</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 14:15:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=371</guid>
<description><![CDATA[12 दिसंबर 2007 को इस हजार की संख्या पार कर च]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>12 दिसंबर 2007 को इस हजार की संख्या पार कर चुके इस ब्लाग ने कल बीस हजार की पाठक संख्या को पार कर लिया। इस संख्या को पार करने वाला यह मेरा  दूसरा ब्लाग है।<br />
इस ब्लाग के साथ मेरी दिलचस्प याद जुड़ी हुई है। ब्लागस्पाट पर टाईप करते हुए यूनिकोड में अपनी पहली पोस्ट छोटी कविता के रूप  में इसी पर रखी-क्योंकि मुझे उसमें बड़ी पोस्ट लिखने में दिक्कत आ रही थी-और सबसे पहला कमेंट भी इस पर आया। उससे पहले मैंने सभी तीनों ब्लाग पर कृतिदेव की पोस्ट रखी थी और मैं मानकर चल रहा था कि अब उसी से आगे जाना है। जब कुछ ब्लाग  लेखक उन ब्लाग पर मुझसे यूनिकोड में लिखने को कह रहे थे तो भी मैं उसकी परवाह नहीं कर रहा था। ऐसे में कोई महिला ब्लाग लेखिका (जिससे  बाद में  फिर संपर्क नहीं हो सका) ने मुझे इस  बारे में ईमेल भेजकर रोमन हिंदी में लिख रही थी कि मेरे ब्लाग पढ़ने मेंे नही आ रहे तब मैंने उसे इस ब्लाग का पता दिया। उसने लिखा-‘वहां तो सब पढ़ने में आ रहा है। वाह,वाह बढ़िया  । मगर उसने कोई कमेंट इस पर नहीं लिखी। हां, मैने तब यूनिकोड में लिखने का निर्णय लिया।</p>
<p>नारद पर उसी समय इसे पंजीकृत नहीं कराया पर ब्लागवाणी के अभ्युदय के साथ ही दोनों जगह इसे पहुंचाया और हिंदी ब्लाग पर तो यह पहले से ही था। यह मेरा ऐसा ब्लाग रहा है जो बिना फोरम पर दिखे भी वर्डप्रेस के डेशबोर्ड पर नंबर एक पर आया था। फोरमों पर दिखने से पहले ही यह ब्लाग अपने लिये तीन  हजार पाठक जुटा चुका था। तब अनुभव की कमी के कारण मुझे समझ में कुछ नहीं आता था पर बाद में यह बात समझ में आयी कि ब्लाग का मार्ग फोरमों से आगे भी जाता है। ब्लाग की डालरों में बताने वाली वेब साईट के मुताबिक यह मेरा सबसे महंगा ब्लाग है। हालांकि फिर भी यह अन्य ब्लाग लेखकों के ब्लाग के मुकाबले बहुत सस्ता है पर फिर भी मैं इससे संतुष्ट हूं। मुझे इस ब्लाग से एक ही संदेश मिलता है‘डटे रहो, तुम जिस रास्ते पर चल रहे हो उससे विचलित नहीं हो’। जिस तरह से पिछले पंद्रह दिन से यह ब्लाग व्यूज ले रहा था उससे मुझे लग रहा था कि  आज शाम तक यह जादूई आंकड़ा पार करेगा पर कल इसने अपने पुराने तेवर दिखाये जब मैं इस पर पोस्ट डालने लगा तो उसी समय यह इस आंकड़े को पार करने की तैयारी में लग रहा  था और आज तो यह उससे भी आगे जा रहा है।</p>
<p>नीचे इस ब्लाग की प्रथम बीस पोस्ट जिन्हें अधिक पाठकों ने देखा और विभिन्न फोरमों से मिलने वाले व्यूज की संख्या। यह स्पष्ट संदेश कि अध्यात्म और व्यंग्य पर ही मुझे लिखते रहना चाहिए। अपने ब्लाग लेखक मित्रों, पाठकों और समय समय पर तकनीकी विषय पर सहायता देने वाले मित्रों का मैं हृदय से आभारी रहूंगा। दूसरों को बहुत लघु लगने वाली यह उपलब्धि मेरे लिये बहुत महत्वपूर्ण है।</p>
<p><strong>प्रथम बीस पोस्ट</strong></p>
<p><strong>------------------</strong><br />
रहीम के दोहे:सुख में अंहकार दु:ख में कुं 244 <br />
चाणक्य नीति:विद्या की शोभा उसकी सिद्धि  205 <br />
मेरा परिचय=दीपक भारतदीप, ग्वालियर  202 <br />
चाणक्य नीति:परोपकार मधुमक्खी से सीखें  175 <br />
पहले आतंकवाद आया कि पर्यावरण प्रदूषण  175 <br />
रहीम के दोहे:जहाँ उम्मीद हो वहीं जाएं  146 <br />
रहीम के दोहे:मछली का जल प्रेम प्रशंसनीय  142 <br />
चाणक्य नीति: कुत्ते और कौवे से गुण ग्रहण 126 <br />
चतुराई से मुट्ठी में कर लो-हास्य कविता  123 <br />
चलना ज़रा संभल कर-हास्य कविता  119 <br />
आज नवमी-भक्तों के रक्षक हैं भगवान् श्रीर 117 <br />
रहीम के दोहे:परिश्रम कर भोजन ग्रहण करें  115 <br />
चाणक्य नीति:पांच वस्तुओं का संग्रह अवश्य 115 <br />
चाणक्य नीति:बेमौसम राग अलापना हास्यास्पद 115 <br />
दादा-पोते की राजनीति और मनोरंजन  112 <br />
मन के बहरों के आगे क्या बीन बजाना  111 <br />
चाणक्य नीति:क्रोध उतना ही करें जितना निभ 104 <br />
दिल हुआ इधर से उधर  103 <br />
असल पर नक़ल का राज  101 <br />
चाणक्य नीति:प्रेम और व्यवहार बराबरी वाले १००<br />
चाणक्य नीति:मनुष्य को हर विधा में पारंगत 100</p>
<p><strong>Referrer Views (पाठकों के आने के मार्ग)</strong></p>
<p><strong>---------------------------------</strong><br />
blogvani.com 718<br />
narad.akshargram.com 369<br />
hi.wordpress.com/tag/%E0%A4%9A%E0%A4%… 223<br />
filmyblogs.com/hindi.jsp 187<br />
botd.wordpress.com 165<br />
chitthajagat.in 151<br />
 </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इम्तेहां हो गई]]></title>
<link>http://apurn.wordpress.com/?p=155</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 08:19:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>Shubhashish Pandey</dc:creator>
<guid>http://apurn.wordpress.com/?p=155</guid>
<description><![CDATA[मोहब्बत की मेरे इम्तेहां हो गई,
सारी ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मोहब्बत की मेरे इम्तेहां हो गई,<br />
सारी बातें खत्म बस यहां हो गई,<br />
क्या से क्या हो गये जिनकी खातिर,<br />
बातें अब ये उनके लिये बचपना हो गयीं&#124;<br />
.................................. Shubhashish(2005)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[श्रेयसचे एक नवीन चित्र]]></title>
<link>http://majhimarathi.wordpress.com/2008/05/07/%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%af%e0%a4%b8%e0%a4%9a%e0%a5%87-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 08:12:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>माझी दुनिया</dc:creator>
<guid>http://majhimarathi.wordpress.com/2008/05/07/%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%af%e0%a4%b8%e0%a4%9a%e0%a5%87-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/</guid>
<description><![CDATA[&nbsp;
माझ्या १० वर्षाच्या लेकाची चित्र त]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://img214.imageshack.us/img214/7234/20080507pu9.jpg" target="_blank"><img style="margin:5px 95px;" height="150" src="http://img214.imageshack.us/img214/7234/20080507pu9.th.jpg" width="155"></a>&#160;</p>
<p>माझ्या १० वर्षाच्या लेकाची चित्र तुम्ही या पूर्वी&#160; [ <a href="http://majhigallery.wordpress.com/2006/07/11/drawings-by-shreyas/" target="_blank">१</a> ,<a href="http://majhigallery.wordpress.com/2007/08/17/by-shreyas-2/" target="_blank">२</a> ] पाहिली असतीलच. कालच काढलेलं हे एक नवीन ताजं चित्र. आता ही बया कोण मला माहीत नाही.....कारण त्याने ते पुस्तकात पाहून काढायचा प्रयत्न केलाय. पहा कसा काय जमलाय !</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दर्द की बजाय  लिखना  पसंद है संघर्ष पर]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=370</link>
<pubDate>Tue, 06 May 2008 15:18:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=370</guid>
<description><![CDATA[अंतर्र्जाल पर मैं लिखता हूं इसका अर्थ ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अंतर्र्जाल पर मैं लिखता हूं इसका अर्थ यह कदापि नहीं लिया जाना चाहिए कि मै किसी उच्च मध्यम परिवार से हूं। सत्य तो यह है कि मेरा जन्म निम्न मध्यम वर्ग में हुआ और बोर्ड की परीक्षा के बाद भी मैंने मजदूरी की और ठेला चलाया। जिस दुकान पर मैं नौकरी  करता था वह थोक की दुकान थी और सामान दूसरी दुकान पर पहुंचाने  के लिये मुझे कई बार ठेला चलाना पड़ता था। यह बात मैने अपने पिताजी से भी छिपाई थी। कई बार मेरे पैरों में कीलें घुसकर खून निकाल चुकीं हैं। अपने उस नौकरी के दौरान भी दोपहर जब मैं घर पर आता था तो लिखता था-उसमें कोई पीड़ा नहीं बल्कि जीवन के प्रति आशावाद होता था। आज नहीं तो कल मेरा होगा-यह विश्वास मेरे जीवन की अनमोल पूंजी रहा है।  </p>
<p>मैं आजकल आपने काम पर स्कूटर पर जाता हूं पर मेरा साइकिल से अभी भी नाता हैं। मेरा काम भी अब शारीरिक श्रम करने का नहीं है पर फिर मैं उसमें कोई अपनी तरफ से नहीं रखता। शारीरिक श्रम करने वाले  को बेचारा या गरीब कहना शायद  कुछ लोगों को सहज लगता है पर मुझे नहीं। इसलिये जो लोग गरीब के दर्द पर कहानियां या कविताएं लिखकर वाह’-वाह जुटाते हैं उनमें मेरी रुचि नहीं रही। इस देश में परिश्रम करने वालों की कमी नहीं है पर वह भी ऐसे दर्द भरी रचनाओं को पसंद नहीं करते। हां, एसी कमरों तथा होटलों के भोजन करने वालों को एकांत में बैठकर उनके हृदय में ऐसी संवेदनशील रचनाएं दर्द का रस पैदा करतीं हैं तो वह खुश हो जाते हैं।  दर्द भी एक रस है और जिनके पास सब कुछ है पर दर्द नहीं है वह इस रस से वंचित रहते हैं और इसी कारण उनको गरीबों के दर्द पर बनीं फिल्में और रचनाएं पसंद आती हैं। हमारे देश के कुछ विख्यात फिल्मकार और लेखक इसी दर्द के सहारे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर चुके हैं पर उनको यहां कोई पूछता भी नहीं था। हां, जब उनको इस देश से बाहर ख्याति मिली तो यहां भी उनको पुरस्कारों प्रदान किये गये पर आम आदमी भावनात्मक रूप से कभी उनसे नहीं जुड़ा।</p>
<p>मैने एक मजदूर के रूप में देखा है मुझे रोटी या सहानुभूति की नहीं सम्मान और प्यार की आवश्यकता  होती है और ऐसे में और लोगों की बात क्या करें  अपने भी पीछे हट जाते हैं।  अपने जीवन में हर चीज अपने परिश्रम से बनाते हुए मैंने एक बात देखी है कि गरीब और मजदूर के दर्द और भावनाओं पर कुछ लोग व्यापार करते हैं। भले ही उनको पैसा अधिक नहीं मिलता पर सम्मान और नाम उन्होंने खूब कमाया। किसी गरीब मजदूर के बीमार होने पर उस पर कुछ असली तो कुछ नकली कथा लिखकर लोगों को दर्द का रस बेचा।<br />
मैं अपनी कविताओं और कविताओं के हमेशा संघर्ष के भाव इसलिये स्थापित कर पाता हूं क्योंकि मेरा यह अनुभव रहा है कि परिश्रम करने से आत्मविश्वास बढ़ता है। इस देश में गरीब और मजदूर के कल्याण के नारे लगाने वाले बुद्धिजीवियों का लंबे समय तक वर्चस्व रहा है और उन्होंने शैक्षणिक तथा सामाजिक संस्थानों इस तरह घुसपैठ कर ली कि उनके ढांचे से बने समाज में लोग आज भी दर्द  के रस में प्रफुल्लित  होना चाहते हैं-उनमें आत्मविश्वास की कमी है क्योंकि वह परिश्रम नहीं करते और इसलिये दर्द का रस उनमे पैदा ही नहीं होता। जिनके पास धन की कमी है उन्हें जीवित रहने के लिये संघर्ष करना पड़ता है और बीमारी और अन्य सामाजिक संकटों में भी उसे कोई संवेदना न तो कोई देता है न वह चाहता है। वह थोड़ा सम्मान और प्रेम चाहता है और वह कोई नहीं देता। </p>
<p>मेरी पत्नी कई बार ठेला वालों से सामान खरीदते समय मोलभाव करती है तो मैं उसे मना करते हुए कहता हूं कि-‘यह मेहनत कर रहा है तो समाज पर उसे उपकार ही समझो क्योंकि अगर वह ऐसा न करता तो पेट पालने के लिये अपराध भी कर सकता है।’</p>
<p>यह मेरे अंदर मौजूद कोई दर्द नहीं है बल्कि यह अपने जीवन संघर्ष के अनुभव से मिला  एक यथार्थ है। अपने जीवन के संघर्ष में मैंने इस बात का अनुभव किया है कि अधिकतर लोग परिश्रम इसलिये करते हैं कि उनका सम्मान किसी के पैरो के तले कुचला न जाये। मैं यह दावा भी नहीं करता कि मैं परिश्रम करने वालों के प्रति मै बहुत संवेदनशील  हैं क्योंकि इसका अर्थ यह है कि उनके श्रम को कम कर  देखना।<br />
मै आजकल इतना शारीरिक श्रम नहीं करता। जब मैं जमकर शारीरिक श्रम करता था तब भी मै हास्य व्यंग्य लिखता था और जब भी कभी पसीना नहा जाता  हूं तब भी मुझे वैसा ही लिखने में मजा आता है। इसलिये जिन लेखकों को यह भ्रम हो कि वह दर्द पर लिखकर लोकप्रियता अर्जित करेंगे उन्हें इस भ्रम का निवारण कर लेना चाहिए। इस देश के परिश्रम करने वाला भी वैसा ही अच्छा पढ़ना चाहता है जैसा कभी कभी कुर्सियों पर काम करने वाले लोग-जो दर्द की फिल्म देखकर या रचना पढ़कर उसके रस से प्रफुल्लित  हो जाते है-कभी पढ़ने को इच्छुक होते हैं। इसलिये मुझे दर्द की बजाय संघर्ष पर लिखना पसंद है। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कभी अकेला नही छोडा]]></title>
<link>http://apurn.wordpress.com/?p=154</link>
<pubDate>Tue, 06 May 2008 11:54:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>Shubhashish Pandey</dc:creator>
<guid>http://apurn.wordpress.com/?p=154</guid>
<description><![CDATA[ढूढता था कि कौन मेरा साथ निभायेगा साये]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ढूढता था कि कौन मेरा साथ निभायेगा साये की तरह,<br />
सोचता था कि कौन मेरे जज्बातों को समझेगा यहाँ,<br />
पर जब खयाल आया उनका जिन्होने हमे कभी अकेला नही छोडा,<br />
तो लगा इन ' तन्हाइयों ' से अच्छा साथी मुझे मिलेगा कहाँ&#124;<br />
........................................ Shubhashish(2005)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कभी लडखडा के तो देख]]></title>
<link>http://apurn.wordpress.com/?p=153</link>
<pubDate>Mon, 05 May 2008 05:59:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>Shubhashish Pandey</dc:creator>
<guid>http://apurn.wordpress.com/?p=153</guid>
<description><![CDATA[यूँ तो हर चाहने वाला तेरे सपने सजाता न]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>यूँ तो हर चाहने वाला तेरे सपने सजाता निगाहों मे है,<br />
पर कभी सोचा कि ये फूल बिखेरता कौन तेरी राहों में है,<br />
तुझे बस अपनी ओर बुलाते हैं ये जमाने भर के हाथ,<br />
पर कभी लडखडा के तो देख तु गिरती किसकी बाहों मे है&#124;<br />
................................ Shubhashish(2005)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अच्छा हुआ खबर नहीं पढ़ी-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=369</link>
<pubDate>Sun, 04 May 2008 10:08:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=369</guid>
<description><![CDATA[श्रीमतीजी ने रात को पूछा-‘‘क्या खाना ख]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>श्रीमतीजी ने रात को पूछा-‘‘क्या खाना खाओगे?’’<br />
हमने कहा-‘‘हम रात को कहां खाते हैं?तुम दूध का एक कप ले आओ तो उसके साथ एक छोटा टोस्ट खाकर सो जायेंगे। वैसे तुमने यह पूछा क्यों?’<br />
कहने लगीं-‘तुम अभी कुछ खाने पर लिख रहे थे। मैने देखा तो सोचा कि शायद तुम्हें भूख लग जाये। जब रात को खाना नहीं खाते तो उस पर लिखते क्यों हो?’<br />
मैने कहा-‘अपने लिये तो लिखते नहीं है जो यह सोचें। पढ़ने वाले तो रात को खाते होंगे न! फिर कितनी गंभीर बात है कि अपने देश के लोगों पर अधिक खाने का आरोप लग रहा है तो यह समझाना जरूरी है कि ऐसी कोई बात नहीं है।’<br />
हमारी श्रीमती जी बोली-‘‘लगाने वाला भी तुम जैसा कोई आदमी रहा होगा। सारी दुनियां से कहते हो कि एक समय खाना खाता हूं पर तुम रात को घर आते ही चाय के साथ  दो से चार बिस्कुट  खाते हो और रात को दूध के कप के साथ एक दो टोस्ट उदरस्थ कर जाते हो। यह खाना नहीं तो और क्या है? और लोगों से कहते हो कि एक समय खाता हूं।’</p>
<p>हमने कहा-‘‘तो क्या लोगों का बताता फिरूं कि मैं यह खाता हूं और वह खाता हूं। यह तो तय बात है कि रात को हमारे घर पर खाना नहीं बनता।’’</p>
<p>हमारी श्रीमती जी चुप हो गयीं। सुबह ही एक सज्जन आये और बोले-‘‘देखो यार, अपने देश के  बाहर के लोग क्या कह रहे हैं  भारत के लोग अधिक खाते हैं इसलिये दुनियां में खाद्यान्न का संकट है। अब बताओ, इस देश के लोग गरीब थे तो झंडे और डंडे लेकर इस देश पर विचाराधाराओं के साथ हमला करते थे। सरकारीकरण खत्म करो उदारीकरण चलो। अब कह रहे हैं कि अधिक खाते हैं। अब क्या रोटी भी पेट भरकर  नहीं खायें?’</p>
<p>हमने कहा-‘‘भरपेट तो खाना नहीं चाहिए। जरूरत से एक रोटी कम खाना चाहिए।<br />
वह सज्जन बोले-‘‘यार तुम जैसा तो कोई हो नहीं सकता कि एक समय खाना खाये।’<br />
हमने कहा-‘‘हम आजकल शारीरिक मेहनत कम कर रहे हैं इसलिये कम खाते हैं।<br />
हमारी श्रीमती उनसे परिचित थीं और उनसे बोलीं-‘‘कहां एक समय खाते हैं? रात को आते ही चाय के साथ बिस्किट और रात को दूध के कप के साथ टोस्ट जरूर खाते हैं। वह क्या खाने से कम है?’</p>
<p>हमने सोचा झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है और हमने कहा-‘हम कम कहते हैं कि नहीं लेते?’<br />
वह सज्जन बोले-‘यह तो हम भी करते है पर फिर भी खाना खाते हैं। खाने के बाद दूध का ग्लास जरूर लेते हैं। हा, उसके साथ टोस्ट वगैरह नहीं लेते। भाभीजी, आप क्या समझ रही हो कि केवल आप लोग ही दूध पीते हैं। खाने के बाद हम दूध न पियें तो नींद ही नहीं आये।’<br />
हमने कहा-‘पर आप खाने को लेकर इतने परेशान क्यों हो रहे हैं? आपके लड़के की शादी में आयेंगे तो जरूर हम भी जमकर खायेंगे जैसे दूसरे। ऐसी कोई कसम नहीं खा रखी कि रात को कभी नहीं खायेंगे। हां, जबसे योग साधना शूरू की है तब से रात को खाने की चिंता से मुक्त हो गये हैं पर आपको कभी यह नहीं कहेंगे कि रात का भोजन लेना छोड़ दें। कहने वाला कुछ भी कहता रहे।’</p>
<p>वह बोले-‘मुद्दे की बात यह है कि क्या वाकई हम बहुत खाते हैं?’<br />
हमने कहा-‘‘अधिक मत सोचो? पहले ही तुम मधुमेह की शिकायत करते हो  और उसमें फायदा उन कंपनियों का ही होगा जो बाहर की हैं क्योंकि उनकी गोलियों से ही तुम खाना पचा पाते हो। हो सकता है कि योग साधना के प्रचार से  अब स्वस्थ लोगों की संख्या बढ़ रही हो और उन पर ‘अधिक खाने’ के शगूफे से तनाव बढ़ाकर फिर उनको बीमार बनाया जाये यही इसके पीछे यही चाल हो सकती है।<br />
वह सज्जन बोले-‘‘पर तुमने यह अभी तक नहीं बताया कि क्या हम भारतीय अधिक खाते हैं?’<br />
हमने कहा-‘‘इस देश में एक सौ पांच करोड़ लोग रहते हैं। कहीं लोग गेंहूं अधिक खाते हैं तो कही चावल तो कहीं कुछ और। किसी के पास कोई पैमाना नहीं है। घर में चार एक आयु वर्ग के चार सदस्य होते हैं पर उनके खाने की मात्रा अलग-अलग होती है। अब कैसे कहें कि इस देश के लोग अधिक खाते हैं या कम।’<br />
वह सज्जल बोले-‘हम तो पिछले दस साल से देख रहे हैं कि अपने घर में जितना गेंहूं आता है उससे अधिक कभी लेते नहीं है। बल्कि बाहर के खाने से उसकी खपत कम होती जा रही है। छोटे बच्चे तो तमाम तरह की चिप्स वगैरह खाकर पेट भरते हैं, पीजा, बर्गर और पैट्रीज खाकर पेट भरेंगे तो फिर घर में कहां खायेंगे?’<br />
हमने कहा-‘फिर बाहर खाने से दूसरे लोगों को खाते दिखते हैं। पैसे की आवाजाही सड़क पर होने से बाहर के लोगों को दिख रही हैं इसलिये ऐसी बातें कर रहे हैं। उनको बाजार में खाने के स्थानों पर लोगों की भीड़ और पैसे का बहाव देखकर ऐसा  लगता है कि यह देश बहुत खाता है।’<br />
वह सज्जन चिंता में पड़े रहे तो आखिर हमारी श्रीमती जी ने कहा-‘भाई साहब, इतनी चिंता में आप पड़े क्यों हैं? इस देश के लोग खाते हैं तो किसी से छीनकर थोड़े ही खाते हैं। किसी के खाने में नजर तो नहीं डालते। किसी को सुखी देखकर उससे छीनते तो नहीं हैं? किसी के घर पर जाकर लूटपाट तो नहीं करते। आप यह बताईये हम आपके घर रात के खाने पर कब आयें? आप तो भाभीजी और बच्चों को लेकर कभी खाने पर लेकर  आते ही नहीं।’<br />
 <br />
वह सज्जन बोले-‘आप कमाल कर रही हो? इतनी बहस हो गयी खाने पर और आप फिर खाने की बात  लेकर बैठ गयीं। कभी आयेंगे चाय पीने पर आप खाने के जबरदस्ती करतीं हैं इसीलिये नहीं हम परिवार सहित आपके घर नहीं आते। हां, आप एक बार खाने पर आयें तो फिर सोचेंगे।’<br />
फिर हमने बातचीत का विषय बदला और वह चले गये तो श्रीमतीजी ने कहा-‘‘पर यह कहा किसने है कि भारत के लोग खाते अधिक हैं?’</p>
<p>हमने कहा-‘‘हमें पता है पर तुम जानने की कोशिश कर अपनी चिंता क्यों बढ़ा रही हो। अधिक चिंता शरीर को हानि पहुंचाती है।’<br />
वह बाहर जाते हुए बोलीं-हां यह तो बात है। वैसे आज अखबार में ऐसा कोई ऐसा शीर्षक तो देखा था पर खबर पूरी नहीं पढ़ी। अच्छा हुआ नहीं पढ़ी। बिना मतलब की खबर पढ़ने से क्या फायदा?’</p>
<blockquote><p><strong>The comic satire on </strong><a href="http://rajdpk1.wordpress.com"><strong>http://rajdpk1.wordpress.com</strong></a><strong> to be read in English</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[प्यार प्यार बस प्यार ]]></title>
<link>http://indialovestory.wordpress.com/?p=8</link>
<pubDate>Sun, 04 May 2008 02:45:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>ramkissme</dc:creator>
<guid>http://indialovestory.wordpress.com/?p=8</guid>
<description><![CDATA[
लड़का लड़की का प्यार बहुत समय से चला आ ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h3>
लड़का लड़की का प्यार बहुत समय से चला आ रहा हैं यह प्यार हमारे देश की शान हैं क्योकी प्यार से बढ़ कर कुछ भी नही मन जाता इसलिए प्यार से कभी भी  नही डरना चाहिए प्यार तो हर उमर में हो सकता हैं वो चाहे जवानी हो या बुढापा इसलिए प्यार ही सब कुछ हैं</h3>
<h3>ये न हो तो कुछ भी नही सब बेकार है</h3>
<h3>~~~~~~~~~~~~~</h3>
<h3>
और भगवान ने भी प्यार को सर्व पर्थ्म मन हैं इसलिए मेरी राय से सबको प्यार करना चाहिए</h3>
<h3></h3>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मेरा प्यार खत्म हो जाएगा ]]></title>
<link>http://ramlove.wordpress.com/?p=45</link>
<pubDate>Sun, 04 May 2008 02:20:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>ramlove</dc:creator>
<guid>http://ramlove.wordpress.com/?p=45</guid>
<description><![CDATA[मेने बहुत सोचा और अब जन की मेरा प्यार क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h3>मेने बहुत सोचा और अब जन की मेरा प्यार कहातम होने वाला हैं कोयिकी मेने अपने प्यार का सही से इस्तेमाल नही किया और इसका नतीजा यह निकला की</h3>
<h3>मेरा प्यार अब मेरे से दूर जा रहा हैं</h3>
<h3>~~~~~~~~~~~~~~~~</h3>
<h3>अब में उसे रोक भी नही सकता</h3>
<h3>~~~~~~~~~~~~~~~~</h3>
<h3>आप ही बताओ में अब क्या करू मुझे आपकी राय लिखो!!</h3>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मौसम]]></title>
<link>http://apurn.wordpress.com/?p=148</link>
<pubDate>Sat, 03 May 2008 12:14:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>Shubhashish Pandey</dc:creator>
<guid>http://apurn.wordpress.com/?p=148</guid>
<description><![CDATA[ &#8230;Unfortunately a true Love story 
 
अजीब सी खामोशी के साथ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Times New Roman;"><span><a href="http://apurn.files.wordpress.com/2008/05/mausam2.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-151" src="http://apurn.wordpress.com/files/2008/05/mausam2.jpg?w=140" alt="" width="140" height="105" /></a> ...</span>Unfortunately a true <span style="text-decoration:line-through;">Love</span> story </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:right;margin:0;"> </p>
<p>अजीब सी खामोशी के साथ धीमी बरसात है<br />
शायद आज फिर से एक लम्बी रात है<br />
निहारती हैं एक टक आँखे बाहर के मौसम को,<br />
फिर से याद आ रही किसी मौसम की हर बात है</p>
<p>वो सुरूर मोहब्बत का, वो आँखों की प्यास<br />
वो बेताब धड़कने, वो मिलने की आस<br />
वो तन्हाईयों में अक्सर उनकी तस्वीर से बातें,<br />
उनसे आँखे टकराने पर वो अजीब सा एहसास</p>
<p>उनके खयालो से मेरा दिल महकता था हर पल<br />
उनके दिखने से मेरे खुशियों में होती थी हलचल<br />
एक झलक के लिए पागल हम कोई अकेले नहीं थे<br />
देख के मौसम को मौसम भी हो जाता था चंचल</p>
<p>जिंदगी खुश थी और मौसम खुशगवार था<br />
पर शायद इतनी खुशियों से वक़्त को इंकार था<br />
जाने क्या सोच कर ठुकरा दिया मौसम ने मुझे<br />
मेरे सामने तो बस सवालों का अंबार था</p>
<p>मौसम में कई नए फूल खिलने लगे थे<br />
जैसे तैसे हम अपने ज़ख्म सिलने लगे थे<br />
अब मौसम के दिल का कुमार कोई और था<br />
कई सवालों के जवाब भी हमे मिलने लगे थे</p>
<p>खैर!!<br />
अब बहुत दूर हो चुके हैं अपनी जिंदगी के रास्ते<br />
शायद दर्द भी ढल जाये यूँ ही आस्ते आस्ते<br />
जाने क्यूँ समझ नहीं पाया इस छोटी सी बात को<br />
अरे! मौसम तो होता ही है बदलने के वास्ते ...<br />
................................. Shubhashish(2005)</p>
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<title><![CDATA[हिंदी-अंग्रेजी टूल बहुत दिलचस्प लगा-आलेख (2)]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=519</link>
<pubDate>Sat, 03 May 2008 11:44:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[हिंदी -अंग्रेजी अनुवाद  टूल का मैं कल स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हिंदी -अंग्रेजी अनुवाद  टूल का मैं कल से उपयोग कर रहा देख रहा हूं तो उसमें सुखद आश्चर्य का  अनुभव हो रहा है। प्रथम तो यह कि यदि शुद्ध हिंदी भाषा को लिखेंगे तो ही वह स्वीकार करेगा। कहीं पाठ को लिखने के दौरान उर्दू या इंग्लिश शब्द का उपयोग किया तो वह उसे स्वीकार नहीं करेगा। जैसे भावनाओं को जजबात नहीं लिख सकते। धर्म को मजहब नहीं लिख सकते । भ्रम को गलतफहमी लिखेंगे तो वह कोई नहीं पढ़ पायेगा। अगर कोई हिंदी शब्द लिखने में गलती कर जाते हैं तो अंग्रेजी में अनुवाद करने वाला टूल उसे अनुवाद करने की बजाय वैसे का वैसे ही प्रस्तुत कर देता है। </p>
<p>मै अंग्रेजी में अनुवाद से पहले अपनी देवनागरी भाषा  में पाठ लिखने के बाद उसे यूनिकोड टूल में ले जाता हूं फिर उसे अनुवाद टूल में रखता हूं और जब उसमें कोई लिख गया शब्द नहीं बदला होता है तो उसे पहले अपने मूल पाठ में सही करता हूं। एक से अधिक शब्द होने पर सभी शब्दों को पुनः लिखने के बाद फिर उसे यूनिकोड में बदलने वाले टूल पर लाता हूं वहां से फिर अनुवाद वाले टूल पर कर देखता पड़ता है कि सही हुआ कि नहीं। बहरहाल अब यह तो इग्लिश में पढ़ने वाले ही तय करेंगे कि उसका परिणाम कैसा है पर एक बात निश्चित है कि वह अगर ऐसे टूलों से ही हिंदी पढ़ने वाले हैं तो उसके लिये मेरे द्वारा किये गये थोड़े प्रयास भी मेरे द्वारा रचित पाठ को अधिक पढ़ने योग्य बना देंगे बनिस्बत अन्य हिंदी ब्लाग के उन पाठों  के जो इस अनुवाद वाले टूल पर परीक्षण करके नहीं रखे गये। कल कुछ ब्लागर लिख रहे थे कि इसमें कुछ कमियां है और इसका उपाय यह है कि जो ब्लागर चाहते हैं तो उनके सामने दो रास्ते हैं कि वह अपने पाठ का इस अनुवाद टूल पर परीक्षण कर देखें कि उसमें पूरे शब्द अंग्रेजी में आ रहे हैं कि नहीं, जो नहीं आ रहे उनमें परिवर्तन कर फिर देखें और अपनी पोस्ट रखें दूसरा यह कि  छोड़ दे पढ़ने के इच्छुक पाठक के लिये जो इस टूल से वैसा ही पढ़ेगा जैसा क