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	<title>कथा-साहित्य &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/कथा-साहित्य/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "कथा-साहित्य"</description>
	<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 15:09:57 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[क्या प्रसिद्धि पाने का विचार बुरा है-इस पत्रिका का द्वितीय अंक]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/?p=158</link>
<pubDate>Sat, 05 Jul 2008 06:40:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/?p=158</guid>
<description><![CDATA[जब आप किसी ऐसे विषय पर लिखते हैं जिसका ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जब आप किसी ऐसे विषय पर लिखते हैं जिसका संबंध लेखकों से होता है तो उसकी प्रतिक्रिया जन सामान्य में कम होने के बावजूद अधिक प्रतिध्वनित होती है। ऐसे विषयों पर चूंकि लेखक ही अपनी प्रतिक्रिया देते हैं तो संख्या कम होने के बावजूद उनमें वजन अधिक  होता और जन सामान्य तो स्वयं प्रभावित होने के बावजूद मुखर होकर  अपनी प्रतिक्रिया नहीं देता इसलिये उसकी प्रतिध्वनि का सुनाई देती है।</p>
<p>कल मेरे द्वारा लिखे गये एक लेख<a href="http://deepakraj.wordpress.com/2008/07/04/in-hindi-urdu-words-of-caution-must-use-stories/">-जो हिंदी में उर्दू शब्दों के उपयोग को लेकर था</a>-पर प्रतिक्रियायें आयीं वह ऐसे ब्लाग लेखकों की आयी जो वाकई गंभीर लेखक हैं और इसलिये मैंने अपने अंदर उनकी प्रतिध्वनि अधिक महसूस की। ऐसी बहसें तो कई बरसों से चल रहीं हैं पर निष्कर्ष निकलना कठिन होता है पर इससे लिखने वाले अपनी भाषा पर नियंत्रण रखने का मन बनाते हैं इसलिये भाषा के मूल स्वभाव बने रहने की आशा पैदा होती है।<br />
साहित्य में ऐसी बहसें भले ही निर्णायक न हों पर वह भाषा का स्तर बनाये रखने में सहायक होती हैं पर अन्य क्षेत्रों में ऐसी बहसें केवल मुद्दे बनाये रखने के लिये होती हैं और उनका कोई निष्कर्ष इसलिये नहीं निकाला जाता क्योकि बहस करने वालों की रुचि लोगों को उसमें उलझाकर अपने हित साधने होते हें। मेरा इसी सप्ताह लिखा गया एक लेख-<a href="http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/07/04/written-on-the-subjects-of-politics-is-quickly-losing-its-influence-stories/">जिसमें मैंने राजनीतिक विषयों पर लिखने के कारण बताये थे</a>-फ्लाप हो गया। उसी तरह एक अन्य लेख-<a href="http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/07/05/the-difference-in-terms-of-great-scholars-stories/">जो मैंने ऐसे ही भेदात्मक दृष्टि वाले विद्वानों पर लिखा था</a> -उसे भी अधिक समर्थन नहीं मिला। मुझे भी लग रहा है कि वह हिट होने लायक नहीं था।<br />
मेरे एक मित्र श्री ललितमोहन त्रिवेदी ने ब्लाग लिखना शूरू किया। उस पर मैंने एक <a href="http://dpkraj.blogspot.com/2008/06/blog-post_29.html">समीक्षा लिखी</a> जिसे वाकई मैंने दिल से लिखा है।<br />
वैसे इस सप्ताह कोई बहुत जोरदार हिट पाठ नहीं आया। पुराने हिट पर ही नाम चल रहा है और अमेरिका-भारत संबंधों पर लिखा गया एक लेख अभी तक लोगों को पढ़ता हुआ देख अच्छा लग रहा है वह आज भी प्रासंगिक है यही कारण है कि मैंने अभी तक इस पर कुछ नहंी लिखा।<br />
इस बार दो व्यंग्य अच्छे लिखे पर वह भी फ्लाप रहे पर आगे पाठक उसे आम पाठक हिट बनायेंगे। एक तो था <a href="http://rajlekh.wordpress.com/2008/07/02/mud-on-the-fly-no-thought-was-sweet-will-comic-satire/">कीचड़ उछालने पर मिठाई मिलने पर</a>, दूसरा था <a href="http://deepakraj.wordpress.com/2008/06/26/it-is-satire-a-sort-of-ad-comic-satire/">व्यंग्य को विज्ञापन की तरह सजाने का</a>। इन दोनों को आगे पाठक हिट बनायेंगे इसमें कोई संशय नहीं है।<br />
कुछ कवितायें लिखीं। इनमें कुछ संजीदा थीं तो कुछ हास्य से सराबोर। थोड़े बहुत हिट लेकर मैं संतुष्ट था। आखिर मुझ जैसे लेखक को इससे अधिक हिट मिल भी कहां सकते है।<br />
कुल मिलाकर यह सप्ताह ठीक ठाक ही रहा। अब इस पत्रिका को बहुत गंभीरता से लिखने का विचार बना रहा हूं क्योंकि यहां अंतर्जाल पर मुझे कोई घास भी नहीं डाल रहा। लोग सम्मान तो देंगे नहीं, इसलिये मैंने महाकवि की उपाधि स्वयं ही धारण कर ली। इस पर लिखी कविता पर मेरे एक मित्र की टिप्पणी थी कि‘ अरे, नहीं आप अकेले नहीं। यह पदवी धारण करने वाले’। वह स्वयं भी इसमें शामिल हैं यह बात मुझे मालुम हैं पर स्वयं डरेंगे क्योंकि वह इस अंतर्जाल पर हिंदी के प्रसिद्ध ब्लाग लेखक बन चुके हैं पर हमें तो फोरमों पर अधिक लोग पढ़ते नहीं और आम पाठक कौन हमसे कहने वाला है कि आपने हमसे पूछ बगैर यह उपाधि क्यों धारण कर ली। बहुत समय तक लेखक के रूप में लिखते रहने के बाद मुझे प्रसिद्धि नहीं मिली तो हो सकता है कि संपादक  के रूप में मिल जाये। क्या प्रसिद्धि पाने का विचार कोई बुरा है? मेरे ख्याल से तो नहीं!<br />
--------------------------------------------------------------------</p>
<p><strong>अपनी कुछ कवितायें यहां प्रस्तुत कर रहा हूं<br />
दीपक भारतदीप</strong></p>
<p>बेजान पत्थरों में ढूंढते हैं आसरा<br />
फिर भी नहीं जिंदगी में मसले हल नहीं होते<br />
कोई हमसफर नहीं होता इस जिंदगी में<br />
अपने दिल की तसल्ली के लिये<br />
हमदर्दों की टोली होने का भ्रम ढोते<br />
सभी जानते हैं यह सच कि<br />
अकेले ही चलना है सभी जगह<br />
पर रिश्तों के साथ होने का<br />
जबरन दिल को अहसास करा रहे होते<br />
कहें महाकवि दीपक बापू<br />
क्यों नहीं कर लेते अपने अंदर बैठे<br />
शख्स से दोस्ती<br />
जिससे हमेशा दूर होते<br />
वह तुम ही होते</p>
<p>-----------------<br />
इश्क में भी अब आ गया है इंकलाब<br />
हसीनाएं ढूंढती है अपने लिए कोई<br />
बड़ी नौकरी वाला साहब<br />
छोटे काम वाले देखते रहते हैं<br />
बस माशुका पाने का ख्वाब</p>
<p>वह दिन गये जब<br />
बगीचों में आशिक और हसीना<br />
चले जाते थे<br />
अपने घर की छत पर ही<br />
इशारों ही इशारों में प्यार जताते थे<br />
अब तो मोबाइल और इंटरनेट चाट<br />
पर ही चलता है इश्क का काम<br />
कौन कहता है<br />
इश्क और मुश्क छिपाये नहीं छिपते<br />
मुश्क वाले तो वैसे हुए लापता<br />
इश्क हवा में उडता है अदृश्य जनाब<br />
जाकर कौन देख सकता है<br />
जब करने वाले ही नहीं देख पाते<br />
चालीस का छोकरा अटठारह की छोकरी को<br />
फंसा लेता है अपने जाल में<br />
किसी दूसरे की फोटो दिखाकर<br />
सुनाता है माशुका को दूसरे से गीत लिखाकर<br />
मोहब्बत तो बस नाम है<br />
नाम दिल का है<br />
सवाल तो बाजार से खरीदे उपहार और<br />
होटल में खाने के बिल का है<br />
बेमेल रिश्ते पर पहले माता पिता<br />
होते थे बदनाम<br />
अब तो लडकियां खुद ही फंस रही सरेआम<br />
लड़कों को तो कुछ नहीं बिगड़ता<br />
कई लड़कियों की हो गयी है जिंदगी खराब<br />
------------------------------</p>
<p>यूं तुम अपने लिये<br />
कुछ भी मांग लिया करो<br />
सिवाय प्यार के<br />
क्योंकि यह मांगने की नहीं<br />
अहसास कराने की शय है<br />
अगर होती किसी के लिये दिल में जगह कही<br />
आंखों से जाहिर हो जाता है<br />
जिनके दर्द से आंखों में आंसू आयें नहीं<br />
जिनकी खुशी पर होंठ मुस्कराये नहीं<br />
लफ्जों में चाहे कितनी भी जतायें<br />
झूठी हमदर्दी का बयां जगजाहिर हो जाता है<br />
किसी के दिल में लिखा कौन पढ़ पाया<br />
लफ्जों के मतलब गहरे हैं या उथले<br />
सुरों की धारा से पता चल जाता<br />
चाहे जितनी भी कोशिश कर लो<br />
जब तक दिल में है<br />
प्यार को सलामत समझ लो<br />
जो जुबां से निकला तो कभी कभी<br />
वहां से भी बाहर हो जाता है<br />
फिर लौटकर नहीं आता<br />
अहसास भी बदन से निकल कर<br />
बाहर बदहाल हो जाता है<br />
प्यार है वह अहसास जो बस किया जाता है<br />
........................................<br />
गीत और संगीत से<br />
दिल मिल जाते हैं पर<br />
अब तो उसकी परख के लिये<br />
प्रतियोगितायें को अब वह<br />
महायुद्ध कहकर जमकर प्रचार कराते<br />
वाद्ययंत्र हथियारों की तरह सजाये जाते<br />
जिन सुरों से खिलना चाहिये मन<br />
उससे हमले कराये जाते<br />
मद्धिम संगीत और गीत से<br />
तन्मय होने की चाहत है जिनके ख्याल में<br />
उन पर शोर के बादल बरसाये जाते</p>
<p>कहें महाकवि दीपक बापू<br />
‘अब गीत और संगीत<br />
में लयताल कहां ढूंढे<br />
बाजार में तो ताल ठोंककर बजाये जाते<br />
महफिलें तो बस नाम है<br />
श्रोता तो वहां भाड़े के स</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अंतर्जाल पर सम्मान-हिन्दी हास्य कविता ]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/?p=150</link>
<pubDate>Mon, 28 Jan 2008 15:31:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/?p=150</guid>
<description><![CDATA[बहुत शोर सुनते थे
कोई तरकश चलता
ब्लोग ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत शोर सुनते थे<br />
कोई तरकश चलता<br />
ब्लोग जगत में सजा रहा है<br />
किसी सम्मान की दुकान<br />
देखा तो निकले दस तीर<br />
निकले उसमें थे दस वीर<br />
दावा यह किया कि बस<br />
यही लिखते हैं अंतर्जाल पर अच्छा<br />
बाकी   पेश करते हैं कच्चा<br />
बस इनका ब्लोग ही हमें<br />
ब्लोग की तरह हमेशा फबता  </p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
चल पडी हैं हिन्दी ब्लोग में<br />
एक और दुकान<br />
अंतर्जाल पर आयी है हिन्दी तो<br />
साथ लाई है साहित्य से वैसे  लोग भी<br />
जो हर साल बाटेंगे और<br />
बटोरेंगे कई इनाम<br />
लिखने से अधिक पायेंगे सम्मान<br />
अपने  ही तर्कों का करेंगे  अपमान<br />
जो वेब साईट नहीं उठा पा रही<br />
अपने पाठको को बोझ<br />
उन्हें ही ब्लोग जगत पर सजाएंगे<br />
इनाम पाने के लिए ब्लोगर  कहलायेंगे<br />
आज यह सम्मानित करेंगे तो<br />
तो  कल  उनसे सम्मानित हो जायेंगे<br />
हम तो ठहरे छोटे शहर के ब्लोगर<br />
भला कहाँ बडे शहर वालों से जीते पायेंगे<br />
पर देख-देख कर अपना मन बहलायेंगे<br />
हास्य का रस यहाँ बिखेरते जायेंगे<br />
उन्मुक्त हास्य भाव दिखाएँगे<br />
उनके एक  तरकश में है<br />
केवल तीर दस<br />
हमारे बारह तरकश में<br />
कई हैं शब्दों के तीर<br />
हमने पसंद  उनकी  चलते देखना<br />
सम्मान पाना तो उनको ही फबता<br />
--------------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हम छोड़ आये अंतर्जाल की वह गलियाँ-हास्य आलेख ]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/2008/01/27/ham-chhod-aaye-antarjaal-kee-vah-galiyaan/</link>
<pubDate>Sun, 27 Jan 2008 08:25:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/2008/01/27/ham-chhod-aaye-antarjaal-kee-vah-galiyaan/</guid>
<description><![CDATA[जब मैंने शुरू  में अंतर्जाल पर लिखना श]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जब मैंने शुरू  में अंतर्जाल पर लिखना शुरू किया तब पता नहीं था की ब्लोग क्या होता है पर इस पर हमारे लिखे को दूसरे भी पढ़ सकते हैं यह सोचकर मैंने इसे अपनी पत्रिका की तरह उपयोग करने का निश्चय किया. इसकी वजह यह थी कि हम जिन अंतर्जाल पत्रिकाओं को अपनी रचनाएं भेज रहे थे वह अपने अंकों में हमेशा ही स्थान नहीं दे सकतीं थी, और फिर हम कुछ ऐसे सम-सामायिक विषयों पर लिखते हैं जिन्हें साहित्य तो माना ही नहीं जा सकता. इसलिए अपने इसी ब्लोग पर भी  नियमित रूप से लिखना शुरू किया. इन सब ब्लोग को एक जगह दिखाने के लिए फोरम बना हुआ था नारद. </p>
<p>हम नारद को अंतर्जाल की पत्रिका 'अभिव्यक्ति' पर लिंक देखते थे. इसमें कई लोगों के ब्लोग थे पर हम यह समझे थे कि इनको कोई स्तंभ दिया गया है. तब हमने इसके लिए अपना एक व्यंग्य भेजा. इधर हम ब्लोग स्पॉट और वर्डप्रेस पर भी पता नहीं कैसे जुट गए.  पता नहीं हमारी नजर ब्लोग स्पॉट काम के ब्लोग पर  पड़ गयी. उसका लेखक कोई मुस्लिम ही था. इस्लाम मजहब के प्रवर्तक हजरत पैगंबर के कार्टून को लेकर जब प्रदर्शन हो रहे थे तब उस संबंध में उस मुस्लिम लेखक ने व्यंग्य लिखा था कि किस तरह इसके लिए भीड़ जुटाई जा रही थी. उसके लेखन में शब्दों की बहुत त्रुटियाँ थीं पर कथ्य इतना दमदार लगा कि हमने सोचा कि यह अपनी अभिव्यक्ति का  एक बहुत बढिया साधन है. हमने ब्लोग बनाने के प्रयास शुरू किये. उसमें लगभग एक माह लग गया. ब्लोग बना तो समझ में आया कि नारद पर उसे फोरम पर दिखाना जरूरी है-तभी पाठक मिल पायेंगे. हमें इसके लिए प्रयास शुरू किये. हमारा ब्लोग सादा हिन्दी फॉण्ट में था और दूसरे लोग इसे यूनीकोड में लिख रहे थे. दूसरी समस्या यह थी कि हमें तो ब्लोग का पता लिखना ही नहीं आता था. इसी अफरातफरी में हम पता नहीं क्या  करते थे कि दूसरों को परेशानी होने लगी. नारद ने हमारा ईमेल बैन करने की धमकी दी. हम चुप कर अपना ब्लोग लिखने लगे. इसी बीच कोई एक महिला की नजर में हमारा ब्लोग आया. उसने बताया कि हमारा लिखा उसकी पढाई में नहीं आ रहा है. तब हमने सोचा कि मजाक कर रही होगी. इसी बीच हमारा ब्लागस्पाट के हिन्दी टूल पर  पर नजर पड़ गयी पर उससे हम अपने लेख का पहला पैर लिखते थे ताकि वर्डप्रेस के डैशबोर्ड पर लोगों को पढाई आये. लोगों की नजर पड़ती तो वह उसे खोलते और फिर कहते थे कि बाकी तो कूडा ही दिखाई दे रहा है.तब हमने ब्लागस्पाट कॉम के ही हिन्दी टूल से कवितायेँ लिखकर वर्डप्रेस पर रखने लगे. पहली ही कविता पर ही हमें कमेन्ट मिला. तब तो फिर धीरे-धीर हम यूनीकोड में ही लिखने लगे. इतना लिख गए कि लोग आये कि आप इसे नारद पर पंजीकृत क्यों नहीं करा रहे. तब हमें ईमेल किया और नारद पर एक नहीं तीन ब्लोग पंजीकृत कराये.</p>
<p>इस तरह हम लेखक से ब्लोगर बन गए. शुरूआत में हमें लगा कि शायद यह अभिव्यक्ति का ही भाग है पर बाद में यह साफ समझ में आ गया कि कुछ उत्साही लोगों का समूह है जो इस तरह की  चौपाल बनाकर हिन्दी के ब्लोगरों को एकत्रित कर रहा है. हमनें  लिखना शुरू किया तो मजा आने लगा. पंजीकरण के १० माह तक निर्बाध रूप से लिखते रहे. वहाँ दरअसल बहुत सारी चीजें हमारे स्वभाव के विपरीत थी पर हम सोचते थे हमें क्या? लोगों का प्यार मिलता रहा तो लिखते चले जा रहे थे. कई बार सोचा कि छोड़ जाएं पर फिर सोचा कि यार इतना सारा प्यार करने वाले लोगों को किस कारण से छोडें. क्या बताएं?फिर सोच रहे थे कि धीरे-धीरे लिखना कम करते चले जाएं पर वह भी नहीं हो रहा था. इससे हमारा रचनात्मक लेखन प्रभावित हो रहा था. </p>
<p>आखिर वह अवसर आया और हमने पतली गली से निकलने का विचार बनाया. इस तरह कि कोई मित्र फिर हमें यह कहने नहीं आये कि तुमने लिखना बंद कर दिया है. वह जगह छोड़ने का कारण यह था कि हमें वहाँ से आगे के लिए कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था. ऐसा लगा रहा है कि हम रुक गए हैं. के तरह भीड़ में बैठकर लिख रहे हैं जो कि संभव नहीं है. अब होना यह है कि हमारे लिखे को पाठक एकदम नहीं मिलेंगे पर मिलेंगे जरूर. हालांकि आम पाठक इस पर प्रतिक्रिया नहीं दे पाते पर हम भी क्या करते?  वहाँ हमें कोई गंभीरता से पढ़ने वाला नहीं था और इस चक्कर में हमारा ध्यान अपने पाठको से हट रहा था. (क्रमश:)   </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नकली खोये की मिठाई, हो गयी प्यार से जुदाई-हास्य व्यंग्य ]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/2008/01/26/nakali-khoye-ki-mithae-pyar-se-ho-gayi-judai-hasya-vyangya/</link>
<pubDate>Sat, 26 Jan 2008 12:22:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/2008/01/26/nakali-khoye-ki-mithae-pyar-se-ho-gayi-judai-hasya-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[वह सड़क पर रोज खडा होकर उस लड़की से प्रे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>वह सड़क पर रोज खडा होकर उस लड़की से प्रेम का इजहार करता था और कहता''-आई लव यू।<br />
''कभी कहता-''मेरे प्रपोजल का उत्तर क्यों नहीं देती।'<br />
वह  चली जाती और वह देखता रह जाता था। आखिर एक दिन उसने कहा कहा-''मुझे ना कर दो, कम से कम अपना वक्त खराब तो नहीं करूं।''<br />
वह लडकी आगे बढ़ गयी और फिर पीछे लौटी-''तुम्हारे पास प्यार लायक पैसा है।''<br />
वह बोला-''हाँ, गिफ्ट में मोबाइल, कान की बाली और दो ड्रेस तो आज ही दिलवा सकता हूँ।''<br />
लड़की ने पूछा-''तुम्हारे पास गाडी है।''<br />
लड़के न कहा-''हाँ मेरे पास अपनी मोटर साइकिल है, वैसे मेरी मम्मी और पापा के पास अलग-अलग कार हैं। मम्मी की कार मैं ला सकता हूँ।''<br />
लड़की ने पूछा-"तुम्हारे पास अक्ल है?"<br />
लड़के ने कहा-''हाँ बहुत है, तभी तो इतने दिन से तुम्हारे साथ प्रेम प्रसंग चलाने का प्रयास कर रहा हूँ। और चाहो तुम आजमा लो।"<br />
लड़की ने कहा-''ठीक है। धन तेरस को बाजार में घूमेंगे, तब पता लगेगा की तुम्हें खरीददारी की अक्ल है कि नहीं। हालांकि तुम्हें थोडा धन का त्रास झेलना पडेगा, और बात नहीं भी बन सकती है।''<br />
लड़का खुश हो गया और बोला-''ठीक, आजमा लेना।धन तेरस को दोनों खूब बाजार में घूमें। लड़के ने गिफ्ट में उसे मोबाइल,कान की बाली और ड्रेस दिलवाई। जब वह घर जाने लगी तो उसने पूछा-''क्या ख्याल है मेरे बारे में?''<br />
लड़की ने कहा-''अभी पूरी तरह तय नहीं कर पायी। अब तुम दिवाली को घर आना और मेरी माँ से मिलना तब सोचेंगे। वहाँ कुछ और लोग भी आने वाले हैं।''<br />
लड़का खुश होता हुआ चला गया। दीपावली के दिन वह बाजार से महंगी खोवे की मिठाई का डिब्बा लेकर उसके घर पहुंचा। वहाँ और भी दो लड़के बैठे थे। लड़की ने उसका स्वागत किया और बोली-''आओ मैं तुम्हारा ही इन्तजार कर रही थी, आओ बैठो।''<br />
लड़का दूसरे प्रतिद्वंदियों को देखकर घबडा गया था और बोला -''नहीं मैं जल्दी में हूँ। मेरी यह मिठाई लो और खाओ तो मेरे दिल को तसल्ली हो जाये।''<br />
लड़की ने कहा-''पहले मैं चेक करूंगी की मिठाई असली खोये की की या नकली की। यह दो और   भी लड़के  बैठे हैं इनकी  भी मिठाई  चेक कर करनी है। यही तुम्हारे अक्ल की परीक्षा होगी। ''<br />
लड़के ने कहा-''असली खोवे की है, उसमे बादाम और काजू भी हैं। ''<br />
लडकी ने आँखें नाचते और उसकी मिठाई की पेटी खोलते हुए पूछा-''खोवा तुम्हारे घर पर बनता है।''<br />
 लड़का सीना तान कर बोला-''नहीं, पर मुझे पहचान है।''<br />
लडकी ने मिठाई का टुकडा मुहँ पर रखा और फिर उसे थूक दिया और चिल्लाने लगी-''यह नकली खोवे की है।''<br />
लड़का घबडा गया और बोला-''पर मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ।''<br />
लडकी ने कहा-'तभी यह नकली खोवे की मिठाई लाये हो। तुम फेल हो गए। अब तुम जाओ इन दो परीक्षार्थियों की भी परीक्षा लेनी है।''<br />
लड़का अपना मुहँ लेकर लौट आया और बाहर खडा रहा। बाद में एक-एक कर दोनों प्रतिद्वंद्वी भी ऐसे ही मुहँ लटका कर लौट आये। तीनों एक स्वर में चिल्लाए-''इससे तो मिठाई की जगह कुछ और लाते, कम से कम जुदाई का गम तो नहीं पाते।''<br />
हालांकि तीनों को मन ही मन में इस बात की तसल्ली थी की उनमें से कोई भी पास नहीं हुआ था।<br />
नोट- यह  एक काल्पनिक व्यंग्य है और किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई लेना-देना नहीं है और किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिए जिम्मेदार होगा।</p>
]]></content:encoded>
</item>

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