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	<title>अर्थशास्त्र &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/अर्थशास्त्र/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "अर्थशास्त्र"</description>
	<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 15:19:25 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[सदियों से धोखा देता आया चांद-कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=162</link>
<pubDate>Tue, 20 May 2008 16:05:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=162</guid>
<description><![CDATA[ 
आज महक जी  के ब्लाग पर एक फोटो और अच्छ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> </p>
<p>आज <a href="http://mehhekk.wordpress.com/2008/05/20/hazaron-naqaab/">महक जी</a>  के ब्लाग पर एक फोटो और अच्छी गजल देखी। ऐसे में मेरा कवित्व मन जाग उठा। कुछ पंक्तियां मेरे हृदय में इस तरह आईं-</p>
<blockquote>
<h4 style="padding-left:30px;">
समंदर किनारे खड़े होकर<br />
चंद्रमा को देखते हुए मत बहक जाना<br />
अपने हृदय का समंदर भी कम गहरा नहीं<br />
उसमें ही डूब कर आनंद उठाओ<br />
वहां  से फिर भी निकल सकते हो<br />
अपनी सोच के दायरे से निकलकर<br />
आगे  चलते-चलते कहीं समंदर में डूब न जाना<br />
अभी कई गीतों और गजलों के फूल<br />
इस इस जहां* में  तुम्हें है महकाना</h4>
</blockquote>
<h4 style="padding-left:30px;">वहां मैंने "अंतर्जाल" लिखा था पर जहां लिख दिया</h4>
<h4>कभी कभी अंतर्जाल पर ऐसे पाठ आ जाते हैं जिन पर लिखने का मन करता है। तब वहां लिखने के विचार से जब अपना विंडो खोलता हूं और सहजता पूर्वक जो विचार आते हैं लिखता हूं। मैं हमेशा यही सोचता हूं कि अंतर्जाल पर अब मनोरंजक और ज्ञानवद्र्धक मिल जाता है तब उसके लिये कहीं और हाथ पांव क्यों मारे जायें?</h4>
<h4>इसी कविता पर एक फिर कुछ और विचार आये</h4>
<blockquote>
<h3 style="padding-left:30px;">समंदर के किनारे<br />
चमकता चांद पुकारे<br />
ऊपर निहारते हुए<br />
एक कदम उठाए खड़े हो<br />
जैसे तुम उसे पकड़ लोगे<br />
पर अपना दूसरा कदम<br />
तुम आगे मत बढ़ाना<br />
सदियों से धोखा देता आया है चांद<br />
किसी के हाथ नहीं आया<br />
इसने कई प्रेमियों को ललचाया<br />
शायरों को रिझाया<br />
पर कोई उसे छू नहीं पाया<br />
उसकी चमक एक भ्रम है<br />
जो पाता है वह सूर्य से<br />
यह हमारी बात पहले सुनते जाना</h3>
</blockquote>
<h4>महक जी अपने ब्लाग पर कई बार ऐसा पाठ प्रकाशित करतीं है कि मन प्रसन्न हो जाता है। हां, मुझे याद आया एक बार उन्होंने अपने पाठ चोरी होने की शिकायत की थी और मुझे तब बहुत गुस्सा आया और उनके बताये पते जब गया था तो वहां उन्होंने अपनी प्यार भरी टिप्पणी रखी थी जिसमें कहीं गुस्सा नहीं बल्कि स्नेहपूर्ण उलाहना थी। तब लगा कि वह बहुत भावुक होकर लिखतीं हैं। यही कारण है कि उनके लिखे से जहां आनंद प्राप्त होता है वही लिखने की भी प्रेरणा मिलती है।<br />
..............................................</h4>
<p> </p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[महिला बुद्धिजीवी सम्मेलन-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=152</link>
<pubDate>Sat, 10 May 2008 13:16:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=152</guid>
<description><![CDATA[सम्मेलनों के आयोजने करने के आदी लोगों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सम्मेलनों के आयोजने करने के आदी लोगों की संस्था के पदाधिकारियों के  दिमाग  में ‘बुद्धिजीवी महिला सम्मेलन’ करवाने का विचार आया। कुछ लोगों ने इसका विरोध किया और कुछ लोगों ने समझाया। एक समझदार ने कहा-‘‘इस देश की शिक्षा पद्धति ने लोगों को गहरे ज्ञान से वंचित किया है और सभी प्रकार के बुद्धिजीवी चाहे वह  महिला हो या पुरुष केवल वाद का नाम और नारे लगाकर ही चलते हैं और फिर आपस में झगड़ा करते हैं। सामान्य आदमी तो बैठक आदि में जाता नहीं और जाता है तो खामोशी से चला जाता है और चार बुद्धिजीवी पूरुष जहां मिलते है लड़ पड़ते है, उनको हाथ पकड़ कर या धमकी देकर समझाया जा सकता है  कहीं महिला बुद्धिजीवी कहीं झगड़ा कर बैठीं  तो उनको समझाना कठिन हो जायेगा।’</p>
<p>   मगर संस्था के लोग नहीं माने। सम्मेलन कराने का नशा उन पर सवार था। उनका विचार था कि इस बहाने संस्था का नाम पुनः चमकेगा जो पहले ही डूब रहा है।</p>
<p>सम्मेलन घोषित हो गया। ढूंढ-ढूंढकर बुद्धिजीवी महिलाओं को आमंत्रण भेजा गया और फिर विषय रखा गया ‘सास-बहु और ननद-भाभी  के मधुर संबंध कैसे हों’?</p>
<p>संस्था के सभी लोग आयोजन कर चंदा वसूलने और फिर आत्मप्रचार के काम में महारात हासिल किये हुए थे पर फिर भी उनमें से कुछ कच्चे पड़ गये और उन्होंने फैसला किया कि वह इस आयोजन से दूर रहेंगे। वजह यह थी कि उनके घर की महिलायें भी इन आयोजनों में आतीं थीं और उनको लगा कि इस तरह के आयोजन से उनके घरेलू विवाद सबके सामने आयेंगे।</p>
<p>हालांकि संस्था के लोगों ने इस बात का पुख्ता इंतजाम किया कि उनके घर की महिला सदस्य इनमें शामिल न हों और वह बुद्धिजीवी भी हों तो उनको सूचना नहीं भेजी जाये। इसलिये जिसका नाम भी आमंत्रण पत्र पर लिखा जाता था पहले इस बात की तस्दीक कर ली जाती थीं कि वह संस्थो के सदस्यों की घर से संबद्ध न हों।</p>
<p>सम्मेलन का दिन आया तमाम महिलायें कार्यक्रम में पहुंची। कुछ को भाषण देना था तो कुछ को केवल सुनकर तालियां बजानीं थीं। तालियां बजाने के लिये भी बकायदा पैसे देने का आश्वासन दिया गया था। आयोजक जानते थे कि बोलने के लिये बुद्धिजीवी महिलायें तो मिल जायेंगी पर ताली बजाने के लिये उनकी उपलब्धता संदिग्ध है। इसलिये कुछ पुरुंष भी किराये पर बुलाये गये और उनको महिला अधिकारों के लिये लड़ने वाले जुझारू कार्यकर्ता कर प्रचारित किया गया।</p>
<p>तमाम सावधानियों के बावजूद आयोजक आमंत्रण पत्र भेजने में गल्तियां कर गये। उन्होने कई ऐसी बुद्धिजीवी महिलाओं को बोलने के लिये आमंत्रण भेज दिया जिनके आपस में सास बहु और ननद-भाभी के रिश्ते थे। उनको इस बात का ध्यान ही नहीं रहा कि बुद्धिजीवी घरों में ‘बुद्धिजीवी’ बहु की मांग ही होती है यह अलग बात है कि कोई भी बुद्धिजीवी सास दहेज की राशि को लेकर वैसे ही कोई समझौता नहीं करती जैसे कि कोई सामान्य सास।</p>
<p>सम्मेलन शूरू कराने के लिये एक पुरुष सदस्य माइक पर आया और बोला-‘‘आज हम अपने पहले बुद्धिजीवी सम्मेलन.........................’’</p>
<p>उसकी बात पूरी होने से पहले ही एक महिला कुर्सी से उठ कर खड़ी हो गयी और बोली-‘क्या इस काम के लिये कोई महिला नहीं थी। हटो मैं संचालन करती हूं।’</p>
<p>वह मंच पर चढ़कर आ गयी और उससे माइक लेकर स्वयं डट गयी।उस संचालक पर तो जैसे वज्रपात हुआ क्योंकि वह उस संस्था का अध्यक्ष था और उसी ने ही इस सम्मेलन के प्रस्ताव को रखा था और पास कराया था। उसका मूंह उतर गया तो संस्था में उसके वह प्रतिद्वंद्वी खुश हो गये जो इस सम्मेलन को कराने के विरोधी थे।</p>
<p>उस महिला ने अखबारों की कटिंग दिखाकर  कुछ ऐसी खबरें जिनमें महिलाओं के खिलाफ अपराध किये गये थे उनको पढ़ना और उसके लिये पुरुष प्रधान समाज को जिम्मेदार ठहराने का सिलसिला शुरू किया। </p>
<p>तब एक दूसरी महिला खड़ी होकर बोली-‘‘यहां हमें  बताया गया है कि आज की चर्चा का विषय है ‘सास-बहु और ननद-भाभी  के मधुर संबंध कैसे हों’? आप तो विषय से हटकर बोल रहीं हैं।’</p>
<p>उसके पास ही उसकी बहु भी बैठी थी वह अपनी सास से बोली-‘‘अत्याचार तो अत्याचार है। खबर बतायेंगी तभी तो यह पता लगेगा कि कहां-कहां बहुओं पर अत्याचार हुए।’</p>
<p>तब दूसरी बुद्धिजीवी महिला भी माइक पर पहुंच गयी और उससे छीनकर बोली-‘हम पुरुषों द्वारा तय किये गये विषय पर नहीं बोलेंगे। हमें अपना विषय तय स्वयं करना चाहिए।’</p>
<p>अब तो वहां हलचल मच गयी। बहुएं और भाभियां चाहतीं थीं कि उनके साथ जो दुव्र्यवहार घर में होता है उस पर चर्चा की जाये और सास और ननदें चाहतीं थीं कि इसमें बहुओं द्वारा अपने अधिकारों के दुरुपयोग पर विचार किया  जाये।</p>
<p>माहौल गर्मा गया था और आयोजकों की घिग्घी बंध गयी थी। संस्था के एक सदस्य ने कहा-‘आज का किसी के मरने की खबर देकर स्थगित करते हैं और अगली तारीख पर आयोजित करेंगे। अभी जो नाश्ते का समय घोषित करते हैं फिर इसे स्थगित कर देते हैं।’</p>
<p>संस्था का अध्यक्ष बोला-‘‘पर वहां यह घोषित करने के लिये भी तो कोई महिला चाहिए। देखा नहीं मुझे किस तरह वहां से भगा दिया।</p>
<p>माहौल तनाव से भरा था। अब आयोजकों के समझ में नही आ रहा था कि क्या करें? किसकी मदद लें? सब बुद्धिजीवी महिलायें तो जोर-जोर से बोल रहीं थीं। अचानक उनकी नजर एक व्यंग्यकार महिला पर पड़ गयी। उस सभा में वही एक खामोश बैठी थी और मंद-मंद मुस्करा रही थी। मजे की बात यह कि उसे नहीं बुलाया गया था वह तो कहीं से सुनकर वहां आयी थी। अध्यक्ष उसके पास गया और बोला-‘‘आप हमारी कुछ मदद करे। पहले सबके लिये नाश्ते की घोषणा करें थोड़ी देर बाद किसी बहाने इस स्थगित कर दें।’</p>
<p>व्यंग्यकार महिला ने कहा-‘‘पर मैं तो यहां बिना बुलाये आयी हूं।  वैसे भी मैं केाई बुद्धिजीवी नहीं हूं बल्कि व्यंग्यकार हूं। नहीं.....नहीं............तुम क्या समझते हो कि मेरा कोई सम्मान नहीं है।’</p>
<p>उसने जब अधिक याचना की तो वह तैयार हो गयी। उसने मंच संभाला और पहले नाश्ते की घोषणा कर माहौल को ठंडा किया फिर थोड़ी देर बाद माइक पर आयी और बोली-‘‘ अब हम सब लोगों ने नाश्ता कर लिया है पर हमारा विषय तय नहीं है इसलिये अगली तारीख पर विषय तय कर लेंगे तब आपको सूचना दी जायेगी। हम फिर मिलेंगे।’</p>
<p>सब महिलायें  थोड़ा बहुत विरोध कर वहां से चलीं गयीं। थोड़ी देर बाद वह व्यंग्यकार महिला बाहर निकली तो देखा एक खाकी पेंट, सफेद शर्ट और सिर पर टोपी पहने एक आदमी खड़ा उसे देख रहा था और जैसे ही नजरें मिलीं तो वह खिसकने को हुआ तो वह पीछे से चिल्लाकर  बोली-‘अरे, तुम व्यंग्यकार होकर इस तरह यहां क्यों खड़े हो। अच्छा अपने लिये विषय तलाशने चपरासी की भूमिका में आये हो। अगर मुझे पता होता तो सब महिलाओं को बता देती और तुम्हारी धुलाई करवाती। तुम्हारे व्यंग्य वैसे ही मेरे समझ में नहीं आते पर तुम हो कि लिखना बंद नहीं करते।</p>
<p>वह अपनी साइकिल उठाकर बोला-‘‘अब हम दोनों ही यहां से निकल लें तो अच्छा रहेगा। मै इस वेश में इसलिये आया था कि चपरासी तो चपरासी होता है उसकी उपस्थिति पर भला कौन आपत्ति करता है पर अगर सूटबूट पहनकर आता तो हो सकता है कि बाहर भी कोई खड़ा नहीं रहने देता। यहां दोनों ही बिना बुलाये आये हैं अगर मैं इस पर व्यंग्य लिख दूं और महिलाओं का तुम्हारे बिना आमंत्रण के यहां आगमन की बात बता दू तो कैसा रहेगा? और बुद्धिजीवी और व्यंग्यकार में अंतर होता है ऐसा मैंने तुम्हारे व्यंग्यों में ही पढ़ा है।</p>
<p>महिला व्यंग्यकार ने कहा-‘ महिलायें अभी भी दूर नहीं हैं बुलवा लूं। खैर छोड़ो..............फिर उनको भी यह पता चल जायेगा कि मैं भी यहां बिना बुलाये आयी हूं और आयोजकों कहने से उनका सम्मेलन खत्म कराया गया है।’’</p>
<p>अगले दिन अखबार में सम्मेलन के उल्लास से संपन्न होने का समाचार था और व्यंग्यकार महिला का नाम तक उसमें नहीं था। <br />
<strong>यह हास्य व्यंग्य काल्पनिक रचना है और किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई लेना देना नहीं हैं अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा। इन पंक्तियों को लेखक किसी भी महिला व्यंग्यकार से कभी नहीं मिला<br />
</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[समाज से कमाने वालों, बांटकर खाना सीखो ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2008/01/03/samaj-se-kamane-valon/</link>
<pubDate>Thu, 03 Jan 2008 16:29:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2008/01/03/samaj-se-kamane-valon/</guid>
<description><![CDATA[
अमीरों के घर और होटलों पर
मनाते जश्न भ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code></p>
<blockquote><p><strong>अमीरों के घर और होटलों पर<br />
मनाते जश्न भला<br />
गरीब कहाँ  देख पाते हैं<br />
पर भरते हैं जो आहें<br />
अपनी गरीबी देखकर<br />
उसे अमीर भी कहाँ सुन पाते हैं<br />
दौलत से खुशियाँ खरीदी<br />
जा सकती हैं पर दुआएं नहीं<br />
पर आहें भी व्यर्थ नहीं जातीं<br />
कहीं मन में ही रहतीं तो<br />
कहीं अपराध के रूप में सामने आते हैं<br />
============================<br />
जब दौलतमंद हो जाते हैं तंगदिल<br />
तब गरीब भी हो जाते हैं बेदिल<br />
समाज से कमाने वालों<br />
बांटकर खाना सीखो<br />
समाज पर आने वाली  मुसीबतें<br />
सबसे पहले दौलत के शिखर पर बैठे<br />
लोगों पर ही करती हैं हमला<br />
तब हमदर्द नहीं बनता किसी का दिल<br />
-----------------------------------------</p>
<p> </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृति:एक दिन से अधिक ठहरने वाला अतिथि नहीं]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/25/ek-din-adhik-thahrne-valaa-atithi-naheen/</link>
<pubDate>Tue, 25 Dec 2007 03:15:49 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/25/ek-din-adhik-thahrne-valaa-atithi-naheen/</guid>
<description><![CDATA[1.एक सज्जन व्यक्ति के घर से बैठने या विश]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.एक सज्जन व्यक्ति के घर से बैठने या विश्राम के लिए भूमि, तिनकों से बने आसन, जल तथा मृदु वचन कभी दूर नहीं रहते। यह सब आसानी से उपलब्ध रहते हैं। अत: अतिथि को यदि अन्न, फल-फूल और दूध आदि से सेवा करना संभव नहीं हो तो उसे सही स्थान पर आसन पर आदर सहित बैठाकर जल तथा मृदु वचनों से संतुष्ट करना चाहिऐ।<br />
2.एक रात गृहस्थ के घर ठहरने वाला व्यक्ति ही अतिथि कहलाता है क्योंकि उसके आने की कोई तिथि निश्चित नहीं होती। एक रात से अधिक ठहरने वाला अतिथि कहलाने का अधिकारी नहीं होता।<br />
3.यदि एक स्थान से दूसरे स्थान या नगर में रोजी-रोटी कमाने के उद्देश्य से जाकर कोई व्यक्ति बस जाता है तथा उसके गृह क्षेत्र का कोई दूसरा व्यक्ति उसके यहाँ ठहरता है या वह स्वयं अपने गृहक्षेत्र में जाकर ठहरता है तो उसे अतिथि नहीं माना जाता। इसी प्रकार मित्र, सहपाठी और यज्ञ आदि कराने वाला पुरोहित भी अतिथि नहीं कहलाता।<br />
4.जो मंद बुद्धि गृहस्थ उत्तम भोजन के लालच में दूसरे गाँव में जाकर दूसरे व्यक्ति के घर अतिथि बनकर रहता है वह मरने के बाद अन्न खिलाने वाले के घर पशु के रूप में उस भोजन का प्रतिफल चुकाता है।<br />
सूर्यास्त हो जाने के बाद असमय आने वाले मेहमान को भी घर से बिना 5.भोजन कराए वापस भेजना अनुचित है। अतिथि समय पर आये या असमय पर उसे भोजन कराना ही गृहस्थ का धर्म है।<br />
6.जो खाद्य पदार्थ अतिथि को नहीं परोसे गए हों उन्हें गृहस्थ स्वयं न ग्रहण करे। अतिथि का भोजन आदि से आदर सत्कार करने से धन, यश, आयु एवं स्वर्ग की प्राप्ति होती है।<br />
7.उत्तम, मध्यम एवं हीन स्तर के अतिथियों को उनकी अवस्था के अनुसार स्थान, विश्राम के लिए शय्या और अभिवादन प्रदान कर उनकी पूजा करना चाहिऐ। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:अपनी हानि किसी को नहीं बतानी ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/24/chankya-neeti-3/</link>
<pubDate>Mon, 24 Dec 2007 01:20:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/24/chankya-neeti-3/</guid>
<description><![CDATA[१.बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह अपन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने धन की हानि, अपने मानसिक संताप, अपने घर-परिवार के सदस्यों के दोष तथा  किसी दुष्ट द्वारा अपने पर किये गए प्रहार और अपमान की भूलकर किसी से भी चर्चा किसी अन्य व्यक्ति से चर्चा न करे. इन सब बातों को यथासंभव गुप्त रखना चाहिए.<br />
२.बुद्धिमान पुरुष को भय से तब तक डरना चाहिए जब तक वह सामने नहीं आ जाता. जब वह सामने आ जाता है तो उसका सामना करने के लिए मनस्थिति बना लेनी चाहिऐ.<br />
३.बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिऐ  कि वह अपने अपनी स्थिति  पर विचार करता रहे कि उसके कितने मित्र है, उसका समय कैसा है, उसका निवास कैसा है और उसकी आय कितनी है और व्यय कितना है.<br />
४.बुद्धिमान को चाहिऐ कि वह अपनी स्त्री से ही संतोष करे चाहे वह रूपवती हो अथवा साधारण, वह सुशिक्षित हो अथवा निरक्षर. इसी प्रकार  को जो भोजन प्राप्त हो जाये, उसी से संतोष करना चाहिऐ. आजीविका से प्राप्त धन के संबंध में भी विचार करना चाहिए.<br />
५.बुद्धिमान व्यक्ति  को स्वाध्याय करते रहना चाहिए और शास्त्रों के अध्ययन, प्रभु के नाम का स्मरण और दान करने से कभी संतोष नहीं करना चाहिए.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृति:अपराधियों  को अनदेखा न करे राज्य]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/23/manu-smrutiapradhiyon-ko-andekhaa-na-akare-raajy/</link>
<pubDate>Sun, 23 Dec 2007 09:03:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/23/manu-smrutiapradhiyon-ko-andekhaa-na-akare-raajy/</guid>
<description><![CDATA[


१.अपनी क्षीण वृति, अर्थात आय की कमी से ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><!--chitthajagat claim code--><br />
<a href="http://www.chitthajagat.in/?claim=h7v4uhzq0kv8" title="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी"><img src="http://www.chitthajagat.in/images/claim.gif" border="0" alt="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी"></a><br />
<!--chitthajagat claim code--></p>
<p>१.अपनी क्षीण वृति, अर्थात आय की कमी से तंग होकर जो व्यक्ति  रास्ते में पड़ने  वाले खेत से कुछ कंद-मूल अथवा गन्ना  ले लेता हैं उस पर दंड नहीं लगाना चाहिए.</p>
<p>२.जो व्यक्ति दुसरे के पशुओं को बांधता है, बंधे हुए पशुओं को खोल देता है तथा दासों, घोडों और रथों को हर लेता है, वह निश्चय ही दंडनीय है.</p>
<p>३.इस प्रकार जो राज्य प्रमुख चोरों को दण्डित कर चोरी का निग्रह करता है वह इस लोक में यश प्राप्त करता है तथा परलोक में दिव्य सुखों को भोगता है.</p>
<p>४.जो राज्य प्रमुख  इस लोक में अक्षय यश व मृत्यु के बाद  दिव्य लोक चाहता है  उसे चोरों और डकैतों के अपराध को कभी अनदेखा नहीं करना चाहिए.</p>
<p>५. वह व्यक्ति जो अप्रिय वचन बोलता है, चोरी करता है और हिंसा में लिप्त होता है. उसे महापापी मानना चाहिए.</p>
<p>६.यदि राज्य  दुस्साहस करने वाले व्यक्ति को क्षमा कर देता है या उसके कृत्य को अनदेखा कर देता है तो अतिशीघ्र उसका विनाश हो जाता है क्योंकि लोगों को उसके प्रति  विद्वेष की भावना पैदा हो जाती है.</p>
<p>७.राज्य प्रमुख को चाहिए के वह स्नेह वश अथवा लालच वश भी प्रजाजन में डर उत्पन्न करने वाले अपराधियों को बन्धन मुक्त न करे.</p>
<p>८.यदि गुरु, बालक,वृद्ध व विद्वान भी किसी पर अत्याचार करता है तो उसे बिना विचार किये  उपयुक्त दंड दिया जाना चाहिए.   </p>
<p>९.अपने  आत्म रक्षार्थ तथा  किसी स्त्री और विद्वान पर संकट आने पर उसकी रक्षा के लिए जो व्यक्ति किसी दुष्ट व्यक्ति का संहार करता है उसे हत्या के पाप का भागीदार नहीं माना जाता.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:मन का लगाव न हो तो आत्मीयता नहीं बन पाती ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/19/chankya-neetiman-n-ho-to/</link>
<pubDate>Wed, 19 Dec 2007 03:53:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/19/chankya-neetiman-n-ho-to/</guid>
<description><![CDATA[1.जिसके प्रति लगाव(सच्चा प्यार) वह दूर ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.जिसके प्रति लगाव(सच्चा प्यार) वह दूर होते हुए भी पास रहता है। इसके विपरीत जिसके प्रति लगाव नहीं है वह प्राणी समीप होते हुए भी दूर रहता है। मन का लगाव न होने पर आत्मीयता बन ही नहीं पाती और किसी प्रकार का संबंध बन ही नहीं पाता।<br />
2.जिस किसी प्राणी से मनुष्य को किसी भी प्रकार के लाभ मिलने की आशा है उससे सदैव और प्रिय व्यवहार करना चाहिए। मृग का शिकार करने की इच्छा रखने वाला चालाक शिकारी उसे मोहित करने के लिए उसके पास रहकर मधुर स्वर में गीत गाता रहता है।<br />
3.विद्वान व्यक्ति वही है जो अपने व्यक्तित्व के अनुकूल ऎसी बात करता हो जो प्रसंग के भी अनुकूल हो। अच्छी से अच्छी बात अप्रान्सगिक होकर प्रभावहीन हो जाती है। यदि वह बात अप्रिय हो और उसमें क्रोध की अभिव्यक्ति आवश्यक हो तो वह भी उतना ही प्रदर्शित करना चाहिए जितना निभा सकें। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:अपनी योजना गुप्त रखने पर ही सफलता संभव ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/17/chankya-nitigopneeyta-barten/</link>
<pubDate>Mon, 17 Dec 2007 04:15:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/17/chankya-nitigopneeyta-barten/</guid>
<description><![CDATA[१. यदि आप सफलता हासिल करना चाहते हैं तो ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१. यदि आप सफलता हासिल करना चाहते हैं तो गोपनीयता रखना सीख लें. जब किसी कार्य की सिद्धि के लिए कोई योजना बना रहे हैं तो उसके कार्यान्वयन और सफल होने तक उसे गुप्त रखने का मन्त्र आना चाहिए. अन्य लोगों की जानकारी में अगर  आपकी योजना आ गयी तो वह उसमें  सफलता संदिग्ध हो जायेगी.</p>
<p>२.प्रत्येक व्यक्ति को स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए. उसे प्रतिदिन धर्म शास्त्रों का कम से कम एक श्लोक  अवश्य पढ़ना चाहिए. इससे व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त होता है और उसका भला होता है.</p>
<p>३.विवेकवान मनुष्य को जन्मदाता, दीक्षा देकर ज्ञान देने वाले गुरु, रोजगार देने वाले स्वामी एवं विपत्ति में सहायता करने वाले संरक्षक को सदा आदर देना चाहिए. </p>
<p>४.मनुष्य को चाहिए की कोई कार्य छोटा हो या बड़ा उसे मन लगाकर करे. आधे  दिल व उत्साह से किये गए कार्य में कभी सफलता नहीं मिलती. पूरी शक्ति लगाकर अपने प्राणों की बाजी लगाकर कार्य करने का भाव शेर से सीखना चाहिए. </p>
<p>५.अपनी सारी इन्द्रियों को नियंत्रण में कर स्थान, समय और अपनी शक्ति का अनुमान लगाकर कार्य सिद्धि के लिए जुटना बगुले से सीखना चाहिए.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:मन शुद्ध हो तो प्रतिमा में भी भगवान् ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/16/chankya-nitiman-shuddh-ho-to-pratima-men-bhee-bhagvaan/</link>
<pubDate>Sun, 16 Dec 2007 08:10:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/16/chankya-nitiman-shuddh-ho-to-pratima-men-bhee-bhagvaan/</guid>
<description><![CDATA[1.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की भी गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य का  जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य को  शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।<br />
<strong>संपादकीय अभिमत-</strong>विश्व में अनेक प्रकार के ग्रंथ हैं और सबको पढ़ना और उनका ज्ञान धारण करना संभव नहीं है इसलिए सार अपनी दिमाग में रखना चाहिए. अनेक पुस्तकों में कहानियां और उदाहरण दिए जाते हैं पर उनके सन्देश का सार बहुत संक्षिप्त होता है और उसे ही ध्यान में रखान चाहिऐ </p>
<p>2.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है ।<br />
 3. सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है।<br />
<strong><strong>संपादकीय अभिमत-</strong></strong>यह सच है की प्रतिमा में भगवान् का अस्तित्व नही दिखता पर इस उसमें उसके होने की अनुभूति हमारे मन होती है. आदमी का मन ही उसका मूल है इसलिए उसे मनुष्य कहा जाता है. जब किसी प्रतिमा  के सामने बहुत श्रद्धा से प्रणाम करते हैं तो कुछ देर इस दुनिया से विरक्त हो जाते हैं और हमारा ध्यान थोडी  देर के लिए पवित्र भाव को प्राप्त होता है. यह बहुत महत्वपूर्ण होता है. हाँ, इसके लिए हमें मन में शुद्ध भावना को स्थापित करना पडेगा तभी हम प्रसन्नता प्राप्त कर सकते हैं.  </p>
<p>4.इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। बाल्यकाल, युवावस्था और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही उन्हें अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।<br />
5.जिस प्रकार सोने की चार विधियों-घिसना, काटना, तपाना तथा पीटने-से जांच की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की श्रेष्ठता की जांच भी चार विधियों-त्यागवृति, शील, गुण तथा सतकर्मो -से की जाती है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:बुद्धिमान अपने  आहार की चिंता नहीं करते ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/15/chanky-neetibudhimaan-apne-ahar-ke-chinta-nahin-karte/</link>
<pubDate>Sat, 15 Dec 2007 05:17:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१.बुद्धिमान पुरुष को आहार जुटाने के चि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.बुद्धिमान पुरुष को आहार जुटाने के चिंता नहीं करना चाहिए, उसे तो केवल  अपने धर्म और अनुष्ठान में लगना चाहिए क्योंकि उसका आहार तो उसके मनुष्य जन्म लेते ही उत्पन्न हो जाता है.</p>
<p>अभिप्राय-इसका अभिप्राय यह है कि परमपिता परमात्मा ने जिसे जन्म दिया है उसके लिए आहार का इंतजाम तो उसके भाग्य में लिख दिया है, कहा भी जाता है कि दाने-दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम. आदमी में यह अहंकार रहता है कि में खुद अर्जित कर रहा हूँ जबकि वह  तो उसके भाग्य में लिखा है.</p>
<p> लोगों से जब कहा जाता है कि 'भाई,. धर्म कर्म और भगवान् की भक्ति कर लो.' तो वह कहते हैं कि समय ही कहाँ मिल पाता. परिवार के लिए रोटी कमाने से फुरसत ही कहाँ  है?</p>
<p>ऐसा कहकर अपने को धोखा देते हैं. यहाँ कोई किसी को नहीं पाल सकता. सब अपने लिए नियत भाग्य का खा रहे  हैं. आपने देखा होगा कि कोइ व्यक्ति जब मार जाता है तो उसके पीछे कोई  और मरने नहीं जाता कि अब तो अमुक मर  गया है और अब में कहाँ से रोटी खाऊंगा. अब जिंदा लोग यह खुशफहमी पालें के में किसी को भोजन  और वस्त्र और अन्य  वस्तुएं उपलब्ध करा रहा हूँ तो उसे भ्रमित नहीं तो क्या कहा जायेगा. यह भ्रम नहीं तो और क्या है कि लोग  अपना पूरा जीवन अपने जिस  परिवार को अर्पित करते हुए  धर्म-कर्म और अनुष्टान से दूर रहकर गुजार देते हैं और वह उनके बाद भी यथावत चलता है.   </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:परिवार का सुख उसके स्वरूप पर निर्भर ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/10/chankya-neetiparivar-ka-sukh/</link>
<pubDate>Mon, 10 Dec 2007 04:25:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१.सुखद गृहस्थी और परिवार की सुख समृद्ध]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.सुखद गृहस्थी और परिवार की सुख समृद्धि इस बात पर निर्भर करती है की परिवार का स्वरूप कैसा है. जहाँ परिवार के सदस्य एक दूसरे के मनोभावों को समझते और सम्मान करे हैं वहीं शांति रह पाती है और शांति से ही सुख समृद्धि आती है.<br />
2. यह मनुष्य का स्वभाव है की यदि वह दूसरे के गुण और श्रेष्ठता को नहीं जानता तो वह हमेशा उसकी निंदा करता रहता है. इस बात से ज़रा भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए.</p>
<p>उदाहरण- यदि किसी भीलनी को गजमुक्ता (हाथी के कपाल में पाया जाने वाला काले रंग का मूल्यवान मोती) मिल जाये तो उसका मूल्य न जानने के कारण वह उसे साधारण मानकर माला में पिरो देती है और गले में पहनती है.  </p>
<p>3.बसंत ऋतू में फलने वाले आम्रमंजरी के स्वाद से प्राणी को पुलकित करने वाले कोयल की वाणी जब तक मधु और कर्ण प्रिय नहीं हो जाती तबतक मौन रहकर ही अपना जीवन व्यतीत करती है.<br />
इसका आशय यह है हर मनुष्य को किसी भी कार्य को करने के लिए उचित समय की प्रतीक्षा करना चाहिए अन्यथा असफलता का भय बना रहता है.<br />
4.राजा , अग्नि, गुरु और स्त्री इन चारों से न अधिक दूर रहना चाहिऐ न अधिक पास अर्थात इनकी अत्यधिक समीपता विनाश का कारण बनती है और इनसे दूर रहने पर भी कोई लाभ नहीं होता. अत: विनाश से बचने के लिए बीच का रास्ता अपनाना चाहिऐ.<br />
५.अधिक लाड प्यार बच्चे में  में दोष उत्पन्न करता है और प्रताड़ना से ही उसमें सुधार आता है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ चाणक्य नीति:धर्म का नियम ही शाश्वत ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/08/chankya-neetidharam-kaa-niyam-hee-shashvat/</link>
<pubDate>Sat, 08 Dec 2007 04:02:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/08/chankya-neetidharam-kaa-niyam-hee-shashvat/</guid>
<description><![CDATA[१.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की भी गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य का  जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य को  शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।</p>
<p>२.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है । इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। बाल्यकाल, युवावस्था और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही उन्हें अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है।<br />
३.जिस प्रकार सोने की चार विधियों-घिसना, काटना, तपाना तथा पीटने-से जांच की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की श्रेष्ठता की जांच भी चार विधियों-त्यागवृति, शील, गुण तथा सतकर्मो -से की जाती है।</p>
<p>४.अज्ञानी व्यक्ति को कोई भी बात समझायी जा सकती है क्योंकि  उसे  किसी बात का ज्ञान तो है नहीं। अत: उसे जो कुछ समझाया जाएगा वह समझ सकता है, ज्ञानी को तो कोई बात बिल्कुल सही तौर पर समझायी जा सकते है। परन्तु अल्पज्ञानी को कोई भी बात नही समझायी क्योंकि अल्पज्ञान के रुप में अधकचरे ज्ञान का समावेश होता है जो किसी भी बात को उसके मस्तिष्क तक पहुंचने ही नहीं देता। </p>
<p>*संकलनकर्ता  का मत है कि अल्पज्ञानी को अपने ज्ञान का अहंकार हो जाता है इसलिये वह कुछ सीखना ही नहीं चाहता, वह केवल अपने प्रदर्शन में ही लगा रहता है।<br />
<strong>नोट-रहीम, चाणक्य, कबीर और कौटिल्य की त्वरित पोस्टें नारद और ब्लोगवाणी पर अभी उपलब्ध हैं, अत: वहाँ देखने का प्रयास करें. </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विकास यानि वाहनों की चौडाई बढना सड़क की कम होना ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/06/vikas-yani-vahanon-kee-chaudaaee-bahdnaa-aur-sadkon-kee-kam-honaa/</link>
<pubDate>Thu, 06 Dec 2007 14:27:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[बहुत समय से देश के विकास होने के   प्रचा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत समय से देश के विकास होने के   प्रचार का मैं टीवी चैनलों और अख़बारों में सुनता आ रहा हूँ. तमाम तरह के आंकडे भी दिए जाते हैं पर जब मैं रास्तों से उन रास्तों से गुजरता हूँ-जहाँ चलते हुए वर्षों हो गयी है-तो उनकी हालत देखकर यह ख्याल आता है कि आखिर वह विकास हुआ कहाँ है. अगर इसे विकास कहते हैं तो वह इंसान के लिए बहुत तकलीफ देह होने वाला है.</p>
<p>पेट्रोल, धुएं और रेत से पटे पड़े रास्ते राहगीरों की साँसों में जो विष घोल रहे हैं उससे  अनेक बार तो सांस बंद करना पड़ती हैं कि यह थोडा आगे चलकर यह विष भरा धुआं और गंध कम हो तो फिर लें. टेलीफोन, जल और सीवर की लाईने डालने और उनको सुधारने के लिए खुदाई हो जाती है पर सड़क को पहले वाली  शक्ल-जो पहले भी कम बुरी नहीं थी-फिर वैसी नहीं हो पाती. अपने  टीवी चैनल और अखबार चीन के विकास की खबरें दिखाते हुए चमचमाती सड़कें और ऊंची-ऊंची गगनचुंबी इमारतें दिखा कर यह बताते हैं कि हम उससे बहुत पीछे हैं-पर यह मानते हैं  कि अपने देश में विकास हो रहा है पर धीमी गति से. मैं जब वास्तविक धरातल पह देखता हूँ तो पानी और पैसे के लिए देश का बहुत बड़ा वर्ग अब भी जूझ रहा है. कमबख्त विकास कहीं तो नजर आये. </p>
<p>आज एक अखबार में पढ़ रहा था कि भारत में पुरुषों से मोबाइल अधिक महिलाओं के पास बहुत हैं. मोबाइल से औरतें  अधिक लाभप्रद स्थिति में दिखतीं  हैं क्योंकि अब किसी से बात करना है तो उसके घर जाने की जरूरत ही नहीं है मोबाइल पर ही बात कर ली, पर पुरुषों की समस्या यह है कि उनको अपने कार्यस्थल तक घर से सड़क मार्ग से ही जाना  है और उनके लिए यह रास्ते कोई सरल नहीं रहे. साथ में मोबाइल लेकर उनके लिए चलना वैसे भी ठीक नहीं है. रास्ते में  मोबाइल की घंटी मस्तिष्क में कितनी बाधा पहुचाती है यह मैं जानता हूँ. उस दिन बीच सड़क पर स्कूटर पर घंटी बजी और मेरे  इर्द-गिर्द वाहनों की गति बहुत तेज थी कि एक तरफ रूकने के लिए मुझे समय लग गया. जब एक तरफ रुका तो जेब से मोबाइल निकाला तो देखा कि 'विज्ञापन' था. उस समय झल्लाहट हुई पर मैं क्या कर सकता था? फिर मैंने स्कूटर भी सड़क से ढलान से उतरकर  ऐसी जगह रोका था  जहाँ सड़क पर लाने के लिए शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन करना पडा. </p>
<p>आपने देखा होगा कि जो आंकडे विकास के रूप में दिए जाते हैं उनमें देशों में मोबाइल, कंप्यूटर और टीवी के उपभोक्ता की संख्या  शामिल रहती है. अब विकास का अर्थ प्रति व्यक्ति की आय-व्यय की जगह  धन की बर्बादी से है. यह नहीं देखते कि उनका उपयोग क्या है? मैं तो आज तक समझ नहीं पाया कि लोग मोबाइल पर इतनी लंबी बात करते क्या हैं. फालतू, एकदम फालतू? फिर तमाम ऍफ़ एम् रेडियो, और टीवी पर ऐसे सवाल करते है ( उस पर एस.एम्.एस करने के लिए कहा जाता है) जो एक दम साधारण होते हैं. लोग जानते हैं कि यह सब उनका धन खींचने के लिए किया जा रहा है पर अपने को रोक नहीं पाते क्योंकि उन्हें क्षेत्र, धर्म, और भाषा के नाम पर बौद्धिक रूप से गुलाम बना दिया  गया है कि वह उससे मुक्त नहीं हो पाता. </p>
<p>अगर मुझसे पूछें तो विकास का मतलब है कि वाहनों की चौडाई बढना और सड़क की कम होना. जब भी कहीं जाम में फंसता हूँ तो मुझे नहीं लगता कि वह लोगों और उनके वाहनों की संख्या की वजह से है. दो सौ मीटर के दायरे में सौ लोग और पच्चीस वाहन भी नहीं होंगे पर जाम फिर भी लग जाता है. वहाँ कारें, ट्रेक्टर और मोटर साइकलों पर एक-एक व्यक्ति सवार हैं पर सड़क तंग है तो रास्ता जाम हो जाता है. सड़कें भी जो पहले चौड़ी थी वहाँ इस  तरह निर्माण  किये गए हैं कि पता नहीं कि कब यह हो गए. जहाँ पहले पेड़ थे वहाँ गुमटियाँ, ठेले और कहीं पक्के निर्माण हो गए हैं और सड़क छोटी हो गयी और वाहन जहाँ साइकिल और स्कूटर थे वहाँ आजकल कारों का झुंड हो गया है. यह विकास और उत्थान  है तो फिर विनाश और पतन   किसे कहते हैं यह मेरे लिए  अभी भी एक पहेली है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कौटिल्य का अर्थशास्त्र: कायर की संगति भी बुरी ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/30/kautilya-kaa-arthshaastrakayar-ki-sangati-buri/</link>
<pubDate>Fri, 30 Nov 2007 07:41:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/30/kautilya-kaa-arthshaastrakayar-ki-sangati-buri/</guid>
<description><![CDATA[   1. दूर्भिक्ष और आपत्तिग्रस्त स्वयं ही]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<li>   1. दूर्भिक्ष और आपत्तिग्रस्त स्वयं ही नष्ट होता है और सेना का व्यसन को प्राप्त हुआ राज प्रमुख युद्ध की शक्ति नहीं रखता।<br />
  2. विदेश में स्थित राज प्रमुख छोटे शत्रु से भी परास्त हो जाता है। थोड़े जल में स्थित ग्राह हाथी को खींचकर चला जाता है।<br />
  3. बहुत शत्रुओं से भयभीत हुआ राजा गिद्धों के मध्य में कबूतर के समान   जिस मार्ग में गमन करता है, उसी में वह शीघ्र नष्ट हो जाता है।<br />
  4.सत्य धर्म से रहित व्यक्ति के साथ कभी संधि न करें। दुष्ट व्यक्ति संधि करने पर भी अपनी प्रवृति के कारण हमला करता ही है।<br />
  5.डरपोक युद्ध के त्याग से स्वयं ही नष्ट होता है। वीर पुरुष भी कायर पुरुषों के साथ हौं तो संग्राम में वह भी उनके समान हो जाता है।अत: वीर पुरुषों को कायरों की संगत नहीं करना चाहिऐ।<br />
  6.धर्मात्मा राजप्रमुख पर आपत्ति आने पर सभी उसके लिए युद्ध करते हैं। जिसे प्रजा प्यार करती है वह राजप्रमुख बहुत मुश्किल से परास्त होता है।<br />
 7.संधि कर भी बुद्धिमान किसी का विश्वास न करे। 'मैं वैर नहीं करूंगा' यह कहकर भी इंद्र ने वृत्रासुर को मार डाला।<br />
  8.समय आने पर पराक्रम प्रकट करने वाले तथा नम्र होने वाले बलवान पुरुष की संपत्ति कभी नहीं जाती। जैसे ढलान के ओर बहने वाली नदियां कभी नीचे जाना नहीं छोडती।
</li>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कौटिल्य का अर्थशास्त्र:अग्नि के समान असहनशील भी होना चाहिये ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/29/%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%85/</link>
<pubDate>Thu, 29 Nov 2007 05:48:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१.कछुए के समान अंग संकोचकर शत्रु का प्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.कछुए के समान अंग संकोचकर शत्रु का प्रहार भी सहन करे और बुद्धिमान फिर समय  देखकर  क्रूर सर्प के समान डटकर लडे.<br />
२.समय पर पर्वत के समान सहनशील हो और अग्नि के समान असहनशील हो और समय पर प्रिय वचन कहता हुआ कंधे पर भी शत्रु को उठावे.<br />
३.मत्त और प्रमत्त के समान बाहरी दिखावे से स्थित बुद्धिमान आक्रमण करे, जैसे कि सिंह ऐसा कूदकर प्रहार करता है वह खाले वार नहीं जाता.<br />
४.प्रसन्नता  की वृत्ति से लोक की हितकारी वृत्ति से शत्रु के हृदय में निरन्तर प्रवेश का समय पर नीति के हाथों से प्रहार कर  उसकी लक्ष्मी के केश ग्रहण करें.</p>
<p>५.विद्वान् को उचित है कि प्राप्त हुए उपायों से विग्रह को शांत करे. विजय की प्राप्ति अचल नहीं है. एकाएक किसी प्रकार पर प्रहार न करे.<br />
६.बुद्धिमान को कोई भी वस्तु असाध्य नहीं है, लोहा अभेद्य होता है पर लोहार बुद्धिमानी से उसे गला डालता है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कौटिल्य का अर्थशास्त्र:अब तो उपेक्षासन भी सीख लें ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/26/kautilya-ka-artshastra-ab-to-upekshaasan-bhee-seekh-len/</link>
<pubDate>Mon, 26 Nov 2007 05:22:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/26/kautilya-ka-artshastra-ab-to-upekshaasan-bhee-seekh-len/</guid>
<description><![CDATA[१.शत्रु को अपने से अधिक जानकर उसके बल क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.शत्रु को अपने से अधिक जानकर उसके बल के कारण उपेक्षा कर स्थिर ही रहता है उसको उपेक्षासन कहते हैं। जैसे भगवान् श्री कृष्ण ने सत्यभामा के लिए स्वर्ग से कल्पवृक्ष उठा लिया तब देवराज इन्द्र ने अपनी पूरी शक्ति का प्रदर्शन न कर उपेक्षा की-अर्थात उनसे युद्ध नहीं किया।<br />
२.दूसरों से उपेक्षित होने से रुक्मी ने भी उपेक्षासन किया। जब कृष्ण से युद्ध करने के उपरांत रुक्मी को किसी ने सहायता नहीं दी तो वह उपेक्षासन कर बैठ गया।</p>
<p>कौटिल्य के इन गूढ़ रहस्यों को समझे तो उनमें बहुत सारे अर्थ निहित हैं। आज एक सभ्य समाज निर्मित हो चुका है और बाहुबल के उपयोग के अवसर बहुत कम रह गए हैं। ऐसे में उनकी नीतियों का अनुसरण और अधिक आवश्यक हो गया है। हम देखते हैं कि हमें उत्तेजित करने के लिए कई विषय उपस्थित किये जाते हैं ताकि हम अपना विवेक खो दें और दूसरे इसका लाभ उठा सकें।</p>
<p>त्योहारों के मौके पर ही देखें। उनका व्यवसायीकरण इस तरह किया गया है कि लगता है कि पैसे खर्च करना ही त्यौहार है और भक्ति, ध्यान और एकांत चिंतन का उनसे कोई संबंध नहीं है। एक से बढ़कर एक विज्ञापन टीवी और अखबारों में आते हैं-यह खरीदो, वह खरीदो और अपना त्यौहार मनाओ। लोग इनको देखकर बहक जाते हैं और अपना पैसा खर्च करते हैं। और तो और इस अवसर पर कर्जों की भी आफर होती है। जिनके पास पैसा नहीं है वह कर्ज लेकर कीमती सामान खरीदने लगते हैं-यह सोचकर के उसे चुका देंगे पर ऐसा होता नहीं है और कर्ज जिसे मर्ज भी कहा जाता है एक दिन लाइलाज हो जाता है। हम दूसरों का आकर्षण देखकर उसको अपने मन में धारण कर लेते हैं और वही हमारे तनाम का कारण बन जाता है अगर हम उनकी उपेक्षा कर अपनी मस्ती में मस्त रहें तो लगेगा की इस दुनिया में बहुत सी चीजें दिखावे के लिए संग्रहित की जातीं है उनसे कोई सुख मिलता हो यह जरूरी नहीं है और जिनके पास सब कुछ है वह भी शांति नहीं है वरना वह भगवान् के घर मत्था टेकने क्यों जाते हैं?</p>
<p>यहाँ एक बात याद रखना होगी  कि विज्ञापन में काम करने वाले अपने कार्य को ''एड केंपैन"यानि विज्ञापन अभियान या युद्ध भी कहते हैं और इसे इस तरह बनाया जाता है कि समझदार से समझदार व्यक्ति अपनी बुद्धि हार जाये। इस समय हर क्षेत्र में तमाम तरह के प्रचार युद्ध छद्म रूप से हम पर थोपे गए हैं और हम उनसे हार राहे हैं, केवल वस्तुओं को खरीदने तक ही यह प्रचार युद्ध सीमित नहीं है बल्कि अन्य विषयों -जैसे आध्यात्मिक, साँस्कृतिक एवं सामाजिक- पर विचार न कर केवल मीडिया द्वारा सुझाए गए विषयों पर ही सोचें, इस तरह हम पर थोपे गए हैं।</p>
<p>हम चूंकि बाजार उदारीकरण के पक्ष में हैं इसलिए उनको रोक नहीं सकते पर उनके प्रति उपेक्षासन का भाव अपनाना चाहिए। यह अब हमारे लिए चुनौती है। इसलिए मैं हमेशा कहता हूँ कि हमारे प्राचीन मनीषियों ने जो सोच इस समाज को दिया था उसकी परवाह तत्कालीन समाज ने इसलिए नहीं की क्योंकि उस समय इसकी अधिक आवश्यकता नहीं थी, और वह अब अधिक प्रासंगिक है क्योंकि ऐसे प्रसंग आ रहे हैं जिनमें उनके नियम और सिद्धांत बहुत नये लगते हैं। यह देखकर आश्चर्य होता है कि हमारे प्राचीन मनीषी और विद्वान कितने दूरदर्शी थे।दरअसल हमारे समाज  की वास्तविक परीक्षा का समय अब आ गया है और हमें अपने अन्दर ऐसे विचार और नियम स्थापित करना चाहिए जिससे विजय पा सकें।<br />
हमारे सामने किसी विज्ञापन में कोई वस्तु या कोई विषय होता है तो उस पर गहराई से विचार करना चाहिए, और अगर उसमें अपना और समाज का लाभ न दिखे तो उपेक्षा का भाव बरतना चाहिऐ. हमें किसी विषय, वस्तु या व्यक्ति पसंद नहीं है तो उसे बुरा कहने की बजाय उपेक्षासन करना चाहिए. अगर हम उसे बुरा कहेंगे तो चार लोग उसे अच्छा भी कहेंगे-उसका विज्ञापन स्वत: होगा. हम उपेक्षा करेंगे तो हमारे चित को शांति मिलेगी.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वह भगवान् बुद्ध की प्रतिमा से क्यों डरते हैं ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/22/vah-bhagvan-buddh-kee-pratima-se-darte-kyon-hain/</link>
<pubDate>Thu, 22 Nov 2007 14:37:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/22/vah-bhagvan-buddh-kee-pratima-se-darte-kyon-hain/</guid>
<description><![CDATA[चीन की सेना ने भारतीय सीमा में घुसकर ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>चीन की सेना ने भारतीय सीमा में घुसकर बुद्ध के प्रतिमा नष्ट की है ऐसी खबर अख़बार में छपी हैं। क्योंकि दोनों के बीच अभी कोई सीमांकन नहीं हुआ है इसलिए ऐसी घुसपैठ हो जाती है ऐसा सरकार का मानना है। मैं यहाँ घुसपैठ की बात नहीं कर रहा क्योंकि उसका कोई आधार प्रमाणिक नहीं है पर मैं भगवान बुद्ध की प्रतिमाओं को तोड जाने की  खबरों को देखकर हैरान हो जाता हूँ। यह कोई पहली  घटना नहीं है और अफगानिस्तान के बामियान शहर में तो उनकी पहाड़ को काटकर बनायी गयी प्रतिमा को तोपों से उड़ाया गया था। अब पिछले दिनों पाकिस्तान के सीमाप्रान्त में भी भगवान बुद्ध की प्रतिमा को तोडा गया था और उसके पीछे  आतंकवादियों का हाथ माना गया था।  अब जब चीनी सेना के द्वारा इस तरह प्रतिमा तोड जाने की खबर आयी तो हैरानी हुई क्योंकि जब बामियान में बुद्ध की प्रतिमा तोडी जा रही थी तो बुद्ध धर्म का बाहुल्य होने से लोगों को यह अपेक्षा थी की चीन उसका विरोध करेगा पर उसने नहीं किया पर अब समझ में आ रहा है की लाल रंग में रंगा चीन भी उसी तरह बुद्ध के दर्शन ने भय खाता है जैसे आतंकवादी।</p>
<p>आखिर ऐसा क्यों  हो रहा है कि भगवान बुद्ध की प्रतिमाओं से वह क्यों घबडा रहे हैं? भगवान बुद्ध के दर्शन से वह लोग क्यों खौफ खा रहे हैं? अगर वह ऐसा प्रचार के लिए कर रहे हैं तो इसके लिए  और भी तरीके हो सकते हैं। दरअसल बुद्ध का दर्शन कहता है कि  सब लोग समान है और किसी को हिंसा में लिप्त नहीं होना चाहिए। उन्हें अहिंसा का प्रवर्तक भी माना जाता है। जब आदमी के मन में अहिंसा का भाव आता है तो वह दुनिया भर के पाप, लोभ। लालच और चाटुकारिता की  प्रवृति से दूर हो जाता है और केवल निरंकार ईश्वर की आराधना में लग जाता है।<br />
एक समय बुद्ध धर्म अफगानिस्तान तक फैला था पर उसकी सीमा के बाहर रहने वाले मठाधीशों को यह मंजूर नहीं था। अधिकतर हमले मध्य एशिया से हुए जहाँ प्रकृति की दया भारत से कम  ही है। और इतिहासकार मानते हैं कि वहाँ की गरीबी और अशिक्षा से भरे समाज के लोगों पर राज करना आसान नहीं है इसलिए उन्हें युद्धों में व्यस्त करने के लिए वहाँ के राजाओं  ने भारत भूमि पर हमले किये। जब यहाँ शांति के पाठ पढे लोगों की ताकत देखी तो अपने लोगों को अशांति और हिंसा का पाठ पढाकर युद्ध के लिए यहाँ लाये। </p>
<p>फिर इस देश के लोग  जिनके पास अपने भगवान अनेक स्वरूपों में ह्रदय में इस क़द्र मौजूद हैं और राज्य किसी का भी हो उसके अधिपति को भगवान मानने को तैयार नहीं हुए तो उनकी मूर्तियाँ तोडी गयीं। अफगानिस्तान में बुद्ध मठों में रहने वाले भिक्षु धीरे-धीरे पलायन कर गए और आक्रमणकारी और आगे बढ़ते रहे। उन्होने इस देश पर हमले किये पर इस देश की आत्मा को नहीं जीत सके। वह मिट गए पर उनकी वर्तमान पीढियां अब भी उस काम को अंजाम दे रहीं हैं। तात्पर्य यही है कि जिसके लिए  हम कहते हैं उसे  भगवान मानो। लाल रंग  से रंगा चीन भी अपने लाल पुरुष भारत में पूजते देखना चाहता है। यह संभव नहीं है।</p>
<p>जिन लोगों की दाल नहीं गली  और  बरसों से भारत में ही प्रज्वलित धर्म की ज्योति को कोई बुझा नहीं पाया   तो वह मूर्तियों पर हमला करते हैं। सच तो यह है कि मूर्तिपूजा का विरोध दो ही कारणों से होता है एक तो अज्ञान की वजह से दूसरा अहंकार की वजह से। जो मूर्ति पूजा करते हैं वह भी जानते हैं  कि मूर्ति तो किसी प्रथ्वी पर उत्पन्न वस्तु से बनीं हुई है पर उसमें वह ध्यान लगाकर अपना मन साफ करने में सफल रहते हैं। मेरा मानना  है कि मूर्ति पूजा अगर शुद्ध मन से की जाये तो वह भी ध्यान जैसे लाभ देती है। </p>
<p>बात हम बुद्ध प्रतिमाओं  को तोड़ने की कर रहे हैं तो उनके विरोधी अपने मन में व्याप्त अज्ञानता  और अंहकार के वशीभूत होकर निराशा के घनघोर अंधेरों में रहते हैं। उन्हें अपने राज्य में भूखे और नंगों से बड़ा डर लगता है और कहीं वह जीवन का सत्य जानकर उनसे विमुख न हो जाएं उन्हें ऐसी प्रतिमाओं को तोड़ने के लिए उकसाते हैं। वह गरीबी और शोषित को धन और समाज में सम्मान दिलाने का भ्रम दिखाकर उसे संघर्ष के लिए  प्रेरित करते हैं और फिर अपना राज्य कायम करते हैं। फिर भी उनका मन नहीं भरता और हर पल उन्हें कोई न कोई चीज अपने लोगों के सामने एक दुश्मन की तरह रखनी पड़ती है ताकि वह उनका राज्य बनाए रखें। </p>
<p>उनका अज्ञान  और अन्धकार उन्हें हमेशा जीवन में त्रस्त किये  रहता है। उन्हें पता ही नहीं प्रतिमा टूटने से भगवान बुद्ध द्वारा खोजा गया सच टूट नहीं सकता। विश्व के लोगों के मन में जो उनकी प्रतिमा है उसे कोई तोड़ नहीं सकता। यह उनके अज्ञान का प्रतीक है और उन्हें यह अंहकार है कि उनकी प्रतिमा टूटने से लोग उनको भूल जायेंगे और वह भी नहीं होता तो भगवान बुद्ध की प्रतिमाओं की और प्रतिमाओं को तोड़ने लगती हैं क्योंकि वह चाहे कुछ भी कर लें न वह खुद न उनके नकली भगवान उन जैसे नहीं बन सकते यह सच उन्हें और डरा देता है और वह और उग्र हो जाते हैं।    </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कौटिल्य का अर्थशास्त्र:व्यसनी राजा संकट का कारण ]]></title>
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<pubDate>Sat, 10 Nov 2007 06:03:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[1.विशेष ज्ञान से संपन्न सत्त्वगुण और द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.विशेष ज्ञान से संपन्न सत्त्वगुण और दैव की अनुकूलता लिए उधोग और सत असत का विचार का शत्रु पर उपाय का प्रयोग करे। चतुरंगिनी सेना को छोड़कर जहाँ कोष और मन्त्र से ही युद्ध होता वही श्रेष्ठ मन्त्र है, जिसमें कोष और मंत्री से ही शत्रु को जीता जा सकता है। * यहाँ आशय यह है कि अगर कहीं शत्रु के की सेनाओं के साथ सीधे युद्ध नहीं हो रहा पर उसकी गतिविधियां ऎसी हैं जिससे देश को क्षति हो रही हो तो वहां धन और अपने चतुर सहयोगियों की चालाकी(मन्त्र) से भी शत्रु को हराया जा सकता है३.साम, दाम, दण्ड, भेद, माया, उपेक्षा, इन्द्रजाल यह सात उपाय विजय के हैं।*यहाँ कौटिल्य का आशय यह है साम, दाम, दण्ड और भेद के अलावा माया(छल-कपट और चालाकी) उपेक्षा का भाव दिखाकर और इन्द्रजाल (हाथ की सफाई) द्वारा भी शत्रु को हराया जा सकता है।</p>
<p>2.मंत्री और मित्र राज्य के सहायक हैं पर राज्य के व्यसन से अधिक भारी राजा का व्यसन है।जो राजा स्वयं व्यसन से ग्रस्त न हो वही राज्य के व्यसन दूर कर सकता है। वाणी का दण्ड, कठोरता, अर्थ दूषण यह तीन व्यसन क्रोध से उत्पन्न बताये हैं।जो पुरुष वाणी की कठोरता करता है उससे लोग उतेजित होते हैं, वह अनर्थकारी है, इस कारण ऎसी वाणी न बोले। मधुर वाणी से जगत को अपने वश में करेजो अकस्मात ही क्रोध से बहुत कुछ कहने लगता है उससे लोग विपरीत हो जाते हैं जैसे चिंगारी उड़ाने वाली से अग्नि से लोग उतेजित हो जाते हैं।</p>
]]></content:encoded>
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<item>
<title><![CDATA[कौटिल्य अर्थशास्त्र: प्रजा को विरक्त न होने दे राज्य]]></title>
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<pubDate>Sun, 21 Oct 2007 06:54:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
        १. जो पुरुष वाणी में कठोरता दिखाता ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>
        १. जो पुरुष वाणी में कठोरता दिखाता है उससे लोग उतेजित होते हैं यह अनर्थकारी है, इसलिए ऐसी  वाणी कभी  न बोले.</p>
<p>         २. जो अकस्मांत ही क्रोध में आकर बहुत कुछ कहने लगता है उससे लोग विरुद्ध हो जाते है, जैसे चिंगारी उडाने  वाले अग्नि से लोग उत्तेजित हो जाते हैं.</p>
<p>        ३.वाणी रुपी तलवार हृदय में लगाकर मर्म का छेदन करती है, उससे खिन्न और क्रोधित हुआ पुरुष सदा वैर के योग्य होता है अर्थात राजा से सदा वैरभाव रखता है.</p>
<p>        ४.रूखी वाणी से जगत  को उद्वेलित न करें.सदा मीठी वाणी बोलें. बात अगर कठोर भी हो तो उसके प्रिय लगाने वाली वाणी प्रयोग करें.</p>
<p>     ५.दंड शासन असिद्ध शासन है. ये अनीति से युक्त दंड दिया जाता है तो वह थी नहीं होता. अत नीति से युक्त ही दंड दिया जाये तो अच्छा रहेगा.</p>
<p>    ६.अनीति से दंड  देने वाला तथा कठोर वचन कहने वाला राज्य  प्राणियों को विरक्त कर देता है, और विरक्त हुए प्राणी शत्रुओं से मिल जाते हैं.</p>
<p>    ७.विरक्त हुई प्रजा की मदद से शत्रु की शक्ति बढ़ती है और वह राज्य का नाश कर देता है. अत: राज्य को चाहिऐ की वह प्रजा को विरक्त न होने दे.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कौटिल्य अर्थशास्त्र:दुष्ट के साथ संधि न करें]]></title>
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<pubDate>Sun, 07 Oct 2007 03:33:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[   1. दूर्भिक्ष और आपत्तिग्रस्त स्वयं ही]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<li>   1. दूर्भिक्ष और आपत्तिग्रस्त स्वयं ही नष्ट होता है और सेना का व्यसन को प्राप्त हुआ राज प्रमुख युद्ध की शक्ति नहीं रखता।<br />
  2. विदेश में स्थित राज प्रमुख छोटे शत्रु से भी परास्त हो जाता है। थोड़े जल में स्थित ग्राह हाथी को खींचकर चला जाता है।<br />
  3. बहुत शत्रुओं से भयभीत हुआ राजा गिद्धों के मध्य में कबूतर के समान   जिस मार्ग में गमन करता है, उसी में वह शीघ्र नष्ट हो जाता है।<br />
  4.सत्य धर्म से रहित व्यक्ति के साथ कभी संधि न करें। दुष्ट व्यक्ति संधि करने पर भी अपनी प्रवृति के कारण हमला करता ही है।<br />
  5.डरपोक युद्ध के त्याग से स्वयं ही नष्ट होता है। वीर पुरुष भी कायर पुरुषों के साथ हौं तो संग्राम मैं वह भी उनके समान हो जाता है।अत: वीर पुरुषों को कायरों की संगत नहीं करना चाहिऐ।<br />
  6.धर्मात्मा राजप्रमुख पर आपत्ति आने पर सभी उसके लिए युद्ध करते हैं। जिसे प्रजा प्यार करती है वह राजप्रमुख बहुत मुश्किल से परास्त होता है।<br />
 7.संधि कर भी बुद्धिमान किसी का विश्वास न करे। 'मैं वैर नहीं करूंगा' यह कहकर भी इंद्र ने वृत्रासुर को मार डाला।<br />
  8.समय आने पर पराक्रम प्रकट करने वाले तथा नम्र होने वाले बलवान पुरुष की संपत्ति कभी नहीं जाती। जैसे ढलान के ओर बहने वाली नदियां कभी नीचे जाना नहीं छोडती।
</li>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कौटिल्य अर्थशास्त्र:राजप्रमुख अपने पुत्रों पर दृष्टि रखें ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/26/%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%85%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%aa/</link>
<pubDate>Wed, 26 Sep 2007 03:27:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[



मदोन्मत्त हुए राजप्रमुख (राजा) के पु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://deepakbapukahin.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/narad"><img border="1" src="http://i204.photobucket.com/albums/bb146/jitu9968/public/narad.jpg" /></a><!-- Blogvani Link Ends --><br />
<a href="http://www.chitthajagat.in/" title="चिट्ठाजगत"><img border="0" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagat.png" alt="चिट्ठाजगत" /></a><a href="http://www.hindiblogs.com/"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a></p>
<p class="post-body entry-content">
<ol>
<li>मदोन्मत्त हुए राजप्रमुख (राजा) के पुत्र निरंकुश हाथी का समान अभिमानी होकर भ्राता तथा पिता की ह्त्या कर डालते हैं।</li>
<li>ऐसे पुत्र अनेक विषयों में अपने आग्रह करते हैं जिससे राज्य की रक्षा में बहुत कठिनाई आती है, जैसे व्याघ्र द्वारा भक्षित मांस की व्याघ्र के रहते हुए रक्षा नहीं हो सकती है।</li>
<li>राजप्रमुख को चाहिए कि वह अपने पुत्रो तथा अपने सहायकों को विनम्रता सिखाये, यी वह विनम्र नहीं होंगे तो कुल और राज्य भी नष्ट हो सकता है।</li>
<li>दुर्बुद्धि पुत्र का त्याग भी नहीं करना चाहिऐ। यदि उसे निकाला जायेगा तो शत्रु से मिलकर वह पिता की भी ह्त्या कर सकता है</li>
<li>अगर राजपुत्र व्यसनों में पडा हो तो उसमें पडे अन्य व्यक्तियों के द्वारा उसे परेशान करवाए ताकि वह व्याकुल होकर उनसे विरक्त हो जाये।</li>
</ol>
<p>नोट-इसमें राजा शब्द की जगह आज के संदर्भों में राजप्रमुख शब्द प्रयोग किया गया है।</p>
<p class="post-footer">
<p class="post-footer-line post-footer-line-1">&#160;</p>
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