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	<title>अर्थव्यवथा &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/अर्थव्यवथा/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "अर्थव्यवथा"</description>
	<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 15:13:09 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[इकनॉमिक टाइम्स अब हिंदी में भी]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2008/02/19/%e0%a4%87%e0%a4%95%e0%a4%a8%e0%a5%89%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%9f%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%b8-%e0%a4%85%e0%a4%ac-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%ae/</link>
<pubDate>Tue, 19 Feb 2008 04:03:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
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<description><![CDATA[आज सुबह उठ जब बाहर से अखबार उठाये तो एक ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3">आज सुबह उठ जब बाहर से अखबार उठाये तो एक सुखद एहसास मेरा इंतजार कर रहा था। रोज के अखबारों के साथ एक अखबार अतिरिक्त था। यह था इकनॉमिक टाइम्स का हिंदी संस्करण। </font></p>
<p><font size="3"></font></p>
<p><font size="3"><a target="_blank" href="http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/2793312.cms">इकनॉमिक टाइम्स का हिंदी में छपना </a>केवल एक नये अखबार का लॉंच नहीं है, यह देश के बदलते आर्थिक परिदृश्य और हिंदी को अर्थ और बाजार में मिलते महत्व को भी दर्शाता है। </font></p>
<p><font size="3"></font></p>
<p><font size="3">यूटीवी पर होगा डिज्नी का कब्जा, टीवीएस  की नयी बाइक पर विवाद, फरारी की भारत में शुरुआत, ग्राहकों को लुभाने के लिये ब्लॉग का इस्तेमाल और डीवीडी बाजार में छा रही ब्ल्यूरे तकनीक। इस तरह के समाचारों को हिंदी में पढ़ने का अलग ही मजा है।</font></p>
<p><font size="3"></font></p>
<p><font size="3">उम्मीद है कि शेयर बाजार जैसे विषय अब केवल अंग्रेजी जानने वालों के लिये ही नहीं होंगे और अंग्रेजी न जानने वाले भी अब शेयर बाजारों में अधिक मात्रा में अपने हाथ आजमायेंगे। </font></p>
<p><font size="3">अब हिंदी पढ़ने वाले इस अखबार से समृद्ध हों या नहीं इतना तय है कि इस संस्करण से हिंदी कुछ और समृद्ध हुई है। </font></p>
<p><font size="3">हां, मुझको एक और अखबार पढ़ने के लिये सुबह सुबह थोड़ा और समय जरूर निकालना पड़ेगा।</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बदलाव की हवायें हिंदी की ओर]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/10/29/winds-of-change/</link>
<pubDate>Mon, 29 Oct 2007 07:59:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
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<description><![CDATA[बदलाव की हवायें किस तरह इंडिया और भारत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3">बदलाव की हवायें किस तरह इंडिया और भारत को एक दूसरे के करीब ला रही हैं इसका एक उदाहरण देखने को मिला है।</font></p>
<p><font size="3"><a href="http://economictimes.indiatimes.com/?in_leftnav">इकॉनॉमिक्स टाइम्स</a> हर साल अपने अखबार के साथ बांटने के लिये एक पत्रिका निकालता है ET500  जिसमें उस साल की 500 टॉप कंपनियों से परिचय करवाया जाता है और आर्थिक बदलावों की झांकी भी पेश की जाती है। इस साल के अंक में जो कि कल यानि 30 अक्टूबर को वितरित किया जायेगा इस पत्रिका की थीम है Winds of Change यानि बदलाव की हवायें।</font></p>
<p><font size="3">कैसा बदलाव आ रहा है यह आपको यहां इस पत्रिका का कवर देख कर ही पता चल जायेगा</font></p>
<p><a href="http://aaina2.files.wordpress.com/2007/10/windowslivewriterwindsofchange-bc68getimage2.png"><img width="286" src="http://aaina2.files.wordpress.com/2007/10/windowslivewriterwindsofchange-bc68getimage-thumb.png" height="480" style="border:0;" /></a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कैसे बढ़ती शेयर मार्किट कर रही है गरीब के आटा और दाल महंगे]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/06/02/inflation-and-share-market/</link>
<pubDate>Sat, 02 Jun 2007 13:14:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक ओर जहां शेयर बाजार के जानकार यहां न]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3">एक ओर जहां शेयर बाजार के जानकार यहां निवेश करके मालामाल हो रहे हैं वहीं बेचारा आम आदमी जिसका इस शेयर बाजार से कुछ लेना देना नहीं है और जो कि अपनी दो जून की रोटी मुशकिलों से जुगाड़ पाता है उस पर इस सब का उल्टा असर हो रहा है और उस गरीब को अपने रोज के आटा दाल के लिये अधिक कीमतें देनी पड़ रही हैं। इस सब की वजह यह है कि अर्थव्यवस्था में बढ़ते मुद्रा विस्तार का प्रबंधन सरकार ठीक से नहीं कर पा रही है और साथ ही सराकार तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में किसानों को (जो की देश की आबादी का साठ प्रतिशत हैं) शामिल नहीं कर पायी है। कृषी के विकास की निचली दर का सीधा असर खाद्य पदार्थों की पूर्ती पर पड़ा है जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतों में बेतहाशा वृद्धी हुई है। गरीब अपनी आय का आधा खर्च अपने खान पान पर करता है जबकी अमीर अपनी आय का दस प्रतिशत से भी कम अपने खान पान पर खर्च करता है, इससे आप समझ सकते हैं कि बढ़ती महंगाई किस पर ज्यादा असर दिखाती है।</font><font size="3">यह सब कैसे होता है इसे समझने के लिये आईये देसी तथा विदेशी निवेश, मुद्रा के विस्तार, ब्याज की दर और मंहगाई के आपस में रिश्ते को जरा आसान भाषा में समझने की कोशिश करते हैं। जब अर्थव्यवस्था का विकास तेजी से होता है तो अर्थव्यवस्था में मुद्रा का विस्तार भी होने लगता है क्योंकि अर्थव्यवस्था का विस्तार होता है उद्योगों, <img align="left" src="http://aaina2.files.wordpress.com/2007/06/graph120.png" alt="graph120.png" />सेवाओं, नौकरियों और उत्पादों में विस्तार से। इस विस्तार से लोगों को अधिक धन मिलता है जो कि मांग को बढ़ाता है और फिर पूर्ती बढ़ाने के लिये और विस्तार होता है। इस विस्तार में सहयोगी होते है निवेश और ऋण। यहां ध्यान दें कि यह निवेश और ऋण देसी और विदेशी दोनो तरह के हो सकते हैं। इस सब के कारण अर्थव्यवस्था में जयादा लिक्विडिटी(तरलता) आ जाती है यानी मुद्रा का विस्तार अर्थात मुद्रास्फीति। लोगों के हाथ में ज्यादा पैसा अर्थात ज्यादा उत्पादों और सेवाओं की मांग। अब जब इस मांग के बराबर पूर्ती नहीं हो पाती है और बाकी सारे घटक नहीं बदलते हैं तो मंहगाई बढ़ती है। इस महंगाई की बढ़ती दर को रोकने के लिये हाल ही में सरकार नें <a href="http://www.moneycontrol.com/india/news/market-outlook/further-rate-hikes-by-rbi-not-ruled-out-experts/284582">CRR की दरें बढ़ाईं</a>। CRR यानी कैश रिजर्व रेशो, बैंकों को प्राप्त जमाओं का वह हिस्सा होता है जिसे बैंक, रिजर्व बैंक के पास रखते हैं। मान लीजिये यदि CRR की दर 7 % है और बैंको के पास 100 रुपये जमा हैं तो वे केवल 93 रु का ऋण ही दे पायेंगे। इस प्रकार सरकार मुद्रा के प्रसार में कमी करके अर्थव्यवस्था में मांग की कमी करती है। जब बैंकों के पास ऋण देने के लिये कम पैसा होगा तो बैंक ऋण पर ब्याज की दरें बढा देंगे और साथ ही बचत पर भी ब्याज की दरें बढ़ा देंगे। (जैसा की अभी हाल ही में दो बार हुआ।) इससे मंहगाई पर तो तत्कालीन असर हो जाता है मगर दीर्ध अवधी में मंहगे ऋणों के कारण उद्योगों के विस्तार पर असर पड़ता है जो कि अर्थव्यवस्था की तेजी को धीमा कर देता है।</font></p>
<p><font size="3">इसके अलावा विदेशों से अप्रवासियों तथा विदेशी संस्थानों द्वारा तेजी से बढ़ते निवेश का प्रबंधन भी रिजर्व बैंक को करना होता है क्योंकि अर्थव्यवस्था की तेजी के कारण इन विदेशी निवेशों में बेतहाशा वृद्धी हुई है। विदेशी निवेश अपने साथ विदेशी मुद्रा ले कर आते हैं। रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा को रुपयों के बदले खरीदता है जिससे और अधिक मुद्रा का विस्तार होता है। पिछले दो बार में CRR की बढ़ोत्तरी से जो मुद्रा के विस्तार में कमी की गयी उसका असर विदेशों से आते निवेश तथा ऋणों ने समाप्त कर दिया। जहां 0.5% की CRR दर में वृद्धी ने अर्थव्यवस्था से14000 करोड़ रु की मुद्रा को कम किया वहीं इस वर्ष के पहले चार महीनों में अर्थव्यवस्था में लगभग 46000 करोड़ रुपये विदेशी मुद्रा के रूप में आ गये। इसका असर यह हुआ कि रिजर्व बैंक ने विदेशी मुद्रा की खरीद में कमी कर दी <a href="http://www.hinduonnet.com/fline/stories/20070601001604500.htm">जिससे रुपया मजबूत होने</a> लगा। रुपये की कम समय में इतनी मजबूती निर्यातकों के लिये तो मारक होती ही है, सस्ते आयात घरेलू उद्योगों पर भी बुरा असर डालते हैं।</font></p>
<p><font size="3">आप यह जान कर हैरान न हों कि अब अर्थशास्त्र के ज्ञाता भी इस अर्थव्यवस्था की <a href="http://www.blonnet.com/2007/02/21/stories/2007022100050800.htm">इस तेजी से डरने लगे</a> हैं। जहां चीन कई वर्षों से लगातार 10% से अधिक की विकास दर होने पर भी मुद्रास्फीती को 2-2.5% के आसपास रखने में कामयाब रहा है वहीं खराब मुद्रा प्रबंधन के कारण हम 9.4% के विकास पर ही हांफने लगे हैं।</font></p>
<p><strong>भारतीय अर्थव्यवस्था और विकास पर अन्य लेख</strong><br />
<a href="http://aaina2.wordpress.com/2006/12/04/yahbhivikas/">यह भी रंग विकास के</a><br />
<a href="http://aaina2.wordpress.com/2006/12/01/gdp/">आम आदमी के साथ….?</a><br />
<a href="http://aaina2.wordpress.com/2006/11/28/vikas/">विकास के यह रंग</a><br />
<a href="http://aaina2.wordpress.com/2006/12/29/2007/">वर्ष 2007 होगा भारत का</a><br />
<a href="http://aaina2.wordpress.com/2007/01/10/india/">यह भी है हमारा भारत</a><br />
<a href="http://aaina2.wordpress.com/2007/01/09/economicreforms/">15 वर्षों के आर्थिक सुधार- कितने मोबाईल</a><br />
<a href="http://aaina2.wordpress.com/2007/01/14/budget/">हट सकती है करों में छूट</a><br />
<a href="http://aaina2.wordpress.com/2007/01/27/budget-2/">जहां आम आदमी देते हैं टैक्स और अमीर बच कर निकलते हैं</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बजट अपडेट लाईव Budget live update]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/02/28/%e0%a4%ac%e0%a4%9c%e0%a4%9f-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a1%e0%a5%87%e0%a4%9f-%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%88%e0%a4%b5-budget-live-update/</link>
<pubDate>Wed, 28 Feb 2007 04:00:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
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<description><![CDATA[	बजट पेश करने का आज से खराब दिन पी चिदंब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>	<font size="3">बजट पेश करने का आज से खराब दिन पी चिदंबरम जी के लिये कोई नहीं हो सकता था। दुनिया भर के शेयर बाजार आज सुबह से धड़ा धड़ गिर रहे हैं। लग रहा है कि आज हमारे शेयर बाजारों पर भी खून बहेगा। :(<br />
एक दिन पहले कांग्रेस उत्तराखंड और पंजाब में हार गयी। मंहगाई से लोग त्रस्त हैं। वैसे जब सारे टी वी चैनल और समाचार पत्र कांग्रेस की हार के लिये मंहगाई को जिम्मेदार बता रहे हैं, शहरों में कांग्रेस की हार के पीछे आरक्षण और अर्जुन सिंह कितने जिम्मेदार हैं, यह भी सोचने की बात होगी।</p>
<p>आपको हिंदी में बजट के मुख्य बिंदू लगातार यहां बताये जायेंगे। उम्मीद है कि वित्तमंत्री जी महंगाई को काबू करने के उपाय करेंगे और कृषि क्षेत्र को बढ़ावा दिये जाने की कोशिश की जायेगी। यदि आपको इस विषय में रुचि है तो इस पेज को रिफ्रेश करते रहें।<br />
सेंसेक्स ४३३ प्वाईट नीचे खुला<br />
निफ्टी १५७ प्वाईंट नीचे खुला<br />
गैहूं और चावल की फ्यूचर ट्रेडिंग पर प्रतिबंध लगा।<br />
(मगर अफसोस दो राज्यों को खोने के बाद। लगता है दो राज्य खोने के बाद सरकार बदहवासी में कदम उठा रही है)<br />
<strong>बजट प्रावधान</strong><br />
शिक्षा बजट में ३५ % वृद्धी<br />
स्वास्थ्य के बजट में २२% वृद्धी<br />
आयुर्वेद पर खास ध्यान (आयुर्वेद FMCG के लिये अच्छा)<br />
कृषि को खास ध्यान<br />
अच्छे बीजों के लिये निजी कंपनियों से सहयोग लिया जायेगा<br />
खाद सब्सिडी सीधे किसानों को दिये जाने का तरीका खोजा जायेगा। सिंचाई पर खास ध्यान।<br />
गरीब ग्रामीन भूमीहीनों के लिये आम आदमी जीवन बीमा योजना, आधा प्रीमियम केंद्र सरकार देगी, बाकी आधा राज्य सरकारें।<br />
अनओर्गनाईज सेक्टर के लिये सामाजिक सुरक्षा योजना<br />
शेयर बाजार में ट्रेडिंग के लिये सभी को PAN  जरूरी<br />
रक्षा पर 96000 करोड़ की वृद्धी<br />
म्यूचल फंड के जरिये आम आदमी विदेशों में निवेश कर सकेंगे ( कीमतों को कम करने में सहायक)<br />
मुंबई को विश्व स्तर की फाईनेंशल सिटी बनाया जायेगा<br />
विकलांगों को एक लाख सरकारी नौकरियां<br />
दिल्ली कामेनवेल्थ गेम के लिये ५०० करोड़<br />
बाजार कुछ संभले<br />
सेंसेक्स अब २५० प्वाईंट नीचे (१२.१० बजे)<br />
टैक्स क्लेक्शन २७ % बढ़ा<br />
कस्टम (गैर कृषी चीजों के लिये)ड्यूटी पीक रेट १२.५ से घटा कर १० % ( कीमतों को कम करने में सहायक)<br />
सर्विस टैक्स रेट में बदलाव नहीं<br />
कुत्ते बिल्लियों के खाने का सामान सस्ता (इन्सानो का भी ध्यान करें मंत्री जी) :(<br />
पोलियेस्टर, खाने का तेल, सिंचाई उपकरण और पाईप्स  सस्ते<br />
सर्विस टैक्स में और सेवाएं शामिल</p>
<p>निजी आयकर में कुछ राहत<br />
आयकर में छूट १०००० रु से बढ़ी (आम कर देने वालों को एक हजार रु की बचत)<br />
जम्मू कश्मीर में उद्योगों को और पांच वर्ष तक करों में छूट<br />
कार्पोरेट टैक्स रेट में बदलाव नहीं<br />
एजुकेशन सेस २% से बढ़ कर ३% हुआ<br />
डिविडेंड डिस्ट्रिब्यूशन टैक्स बढ़ कर १५%<br />
IT कंपनियों पर MAT लगा<br />
IT कंपनियों में ESOP पर FBT लगा<br />
एक करोड तक के लाभ कमाने वाले कार्पोरेट्स पर सरचार्ज नहीं<br />
(बजट फुस्स लग रहा है<br />
बाजार फिर फिसले)<br />
ना आम आदमी को कुछ मिला न ही खास आदमी को<br />
बाजार लुड़के<br />
आधा घंटा तक कृषि पर बोले पर कोई बड़ी घोषणा नहीं की। कृषि का योगदान जीडीपी में घट रहा है मगर इसे बढ़ाने के लिये कुछ नहीं क्या है।<br />
कंपनियों पर टैक्स का बोझ बढ़ेगा। कुछ रिफार्म्स नहीं किये। ज्यादा ले लिया पर दिया कुछ भी नहीं।</p>
<p><strong>मेरी राय</strong></p>
<p>यह एक दिशा हीन बजट है। उम्मीद थी कि कीमतें कम करने तथा कृषि के विकास के लिये कुछ क्रांतिकारी कदम उठाये जायेंगे मगर इस दिशा में साधारण कदम भी नहीं उठाये गये। एक मौका गंवा दिया। वित्त मंत्री दबाव में लग रहे हैं। दस साल पहले वाले चिदंबरम का जलवा नहीं दिखा सके।<br />
मुझे कभी कभी लगता है कि मैडम जी, प्र मं जी, वि मं जी तथा वाम पक्ष में जबर्दस्त संवाद हीनता है। ना कोई विजन है और न ही कोई दिशा। :(<br />
</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जहां आम आदमी देते हैं टैक्स और अमीर बच कर निकलते हैं ]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/01/27/budget-2/</link>
<pubDate>Sat, 27 Jan 2007 17:03:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
<guid>http://aaina2.wordpress.com/2007/01/27/budget-2/</guid>
<description><![CDATA[हट सकती है करों में छूट - २हमारे देश में]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"><strong>हट सकती है करों में छूट - २</strong></font><font size="3">हमारे देश में यही होता है कि आम आदमी को तो टैक्स देने पड़ते है और अमीर कई तरह की छूटों का लाभ लेकर टैक्स देने से बच निकलते हैं।</p>
<p>सर्विस टैक्स एक ऐसा टैक्स है जो कि सरकार ने लगभग 95 प्रकार की सेवाओं पर लगाया हुआ है। इनमें कई सेवाएं जैसे कि मोबाईल तथा फिक्सड फोन, कुरियर, तार भेजना, केबल, स्कूटर का बीमा, रेल टिकट एजेंट, ड्राईक्लीनिंग जैसी अन्य कई सेवाएं ऐसी हैं जो कि आम आदमी के प्रयोग की हैं। यदि आप माह में पांच हजार रुपये इन 95 सेवाओं पर खर्चते हैं तो 12.24% की दर से 612 रु हर माह सरकार को सर्विस टैक्स देते हैं। यानि साल में 7344 रु। हैरानी की बात यह है कि जहां कम्पनियों और अमीरों पर लगने वाले टैक्स घट रहे हैं, सर्विस टैक्स जो कि 1994 में केवल 5% की दर से शुरू किया गया था, बढ़ कर 12.24% हो गया। यही नहीं लगातार कर योग्य सेवाओं का दायरा भी बढता जा रहा है। अब तो शायद ही कोई सेवा बची हो जो कि करों के दायरे में न आई हो।<br />
<img align="absMiddle" src="http://aaina2.wordpress.com/files/2007/01/india-economy1.jpg" /><br />
जैसा कि मैंने अपने पिछले लेख <a href="http://aaina2.wordpress.com/2007/01/14/budget/">हट सकती है करों में छूट</a> में लिखा था 2006-07 में सरकार को विभिन्न छूटों से राजस्व हानि हुई 1,58,661 करोड़ रुपये। इसमें से बहुत बड़ा भाग बचाया बड़ी कम्पनियों ने। निजी करदाताओं को दी जाने वाली छूट से हुई हानी केवल 11,695 करोड़ रुपये ही थी।</p>
<p>निजी करदाताओं को जो छूट मिलती हैं उनमें शामिल हैं गृह ऋण पर दी जाने वाली छूट, विभिन्न बचत योजनाओं में निवेश पर छूट तथा कृषि आय पर छूट।</p>
<p>कृषि आय पर दी जाने वाली छूट को शायद ही सरकार छेड़ पाये। आने वाले राज्यों के चुनावों को देखते हुए तो यह और भी कठिन लगता है। यह एक ऐसा विषय है जिस पर अलग से एक लेख लिखा जा सकता है, वैसे साथी चिट्ठाकर इस बारे में क्या सोचते हैं यह जानना रुचिकर होगा।</p>
<p>हाउसिंग लोन पर करों में छूट देने से हाउसिंग को बढ़ावा मिलता है। इससे अर्थव्यव्स्था के मूल घटकों जैसे कि सीमेंट तथा स्टील क्षेत्रों के साथ साथ बैंकिंग को भी बढ़ावा मिलता है। कुछ हजार करोड़ बचाने के लिये हाउसिंग बूम को रोकने का काम सरकार कर पाती है या नहीं आने वाले बजट में यह देखना रुचिकर होगा।</p>
<p>छोटे करदाताओं को बचत योजनाओं में निवेश पर दी जाने वाली छूट नौकरीपेशा लोगों के लिये परेशानी का कारण हो सकती है। हो सकता है कि अभी निवेश करने पर मिलने वाली छूट जारी रहे मगर इन निवेशों में मैच्योरिटी पर मिलने वाली रकम पर टैक्स लगना शुरू हो जाये।</p>
<p>यानि लगता है कि कुल मिला सरकार को अधिक से अधिक टैक्स जुटाने के लिये आम आदमी ही मिलेगा तथा बड़े लोग एवम कम्पनियां बचते ही रहेंगे।</p>
<p>दुनिया में कई देश हैं जहां टैक्स या तो हैं ही नहीं अथवा इतने कम हैं कि इन देशों को टैक्स हैवन कहा जाता है। इनके बारे में <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Tax_haven">अंग्रेजी विकीपीडिया पर यहां</a> पढ़ें।</p>
<p></font><strong>भारतीय अर्थव्यवस्था और विकास पर अन्य लेख</strong><br />
<a href="http://aaina2.wordpress.com/2006/12/04/yahbhivikas/">यह भी रंग विकास के</a><br />
<a href="http://aaina2.wordpress.com/2006/12/01/gdp/">आम आदमी के साथ….?</a><br />
<a href="http://aaina2.wordpress.com/2006/11/28/vikas/">विकास के यह रंग</a><br />
<a href="http://aaina2.wordpress.com/2006/12/29/2007/">वर्ष 2007 होगा भारत का</a><br />
<a href="http://aaina2.wordpress.com/2007/01/10/india/">यह भी है हमारा भारत</a><br />
<a href="http://aaina2.wordpress.com/2007/01/09/economicreforms/">15 वर्षों के आर्थिक सुधार- कितने मोबाईल</a><br />
<a href="http://aaina2.wordpress.com/2007/01/14/budget/">हट सकती है करों में छूट</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हट सकती है करों में छूट]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/01/14/budget/</link>
<pubDate>Sun, 14 Jan 2007 14:17:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
<guid>http://aaina2.wordpress.com/2007/01/14/budget/</guid>
<description><![CDATA[
जल्द ही बजट आने वाला है। बजट के आने तक ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://aaina2.wordpress.com/files/2007/01/india-economy1.jpg" alt="" /></ol>
<p><font size="3">जल्द ही बजट आने वाला है। बजट के आने तक हम चर्चा करेंगे कि बजट में क्या होने की संभावना है और यह समझने की कोशिश करेंगे कि इसका हमारे ऊपर क्या असर हो सकता है एक निवेशक के रूप में, एक करदाता के रूप में तथा एक उपभोक्ता के रूप में। 'आईना' के इन पन्नों पर हम बजट तक इस सब की चर्चा करेंगे तथा बजट के बाद कोशिश करेंगे वास्तविक बजट प्रस्तावों को समझने की। बजट में क्या होगा इसका पहले से अनुमान लगाना बहुत कठिन होता है मगर प्रधान मंत्री तथा वित्त मंत्री के होंठों को पढ़ कर संभावित बदलावों के अनुमान लगाये जा सकते हैं।</p>
<p>प्रधान मंत्री जी ने हाल ही में कहा कि करों को तर्क संगत बनाने के लिये करों में दी जाने वाली छूटों को हटाने का समय आ गया है। इससे हम यह अंदाजा लगा सकते हैं कि करों में दी जाने वाली  भिन्न प्रकार की कर रियायतें बजट में हट सकती हैं। बजट से पहले दिये जाने वाले एस प्रकार के बयानों के केवल शाब्दिक अर्थों को ही नहीं समझना चाहिये अपितु इससे जुड़े अन्य पहलूओं पर भी विचार किया जाना चाहिये। जबकी बजट को पूर्णयता गोपनीय रखा जाता है, बजट पूर्व इस प्रकार की इशारेबाजी के कई अर्थ निकाले जा सकते हैं। हो सकता है कि सरकार कुछ बड़े परिवर्तन करना चाहती है और अचानक हुई घोषणा से लोगों को अप्रत्याशित झटका न लगे इसलियये यह इशारा किया गया। कई बार इस प्रकार के बयान लोगों कि राय जानने के लिये भी दिये जाते हैं जिससे अंतिम फैसला लेने में लोगों कि राय को भी शामिल किया जा सके। (वैसे सरकारें तब तक आमराय को इतना महत्व नहीं देतीं जबतक कि इससे उन्हें कोई राजनैतिक लाभ न हो) । क्योंकि आम चुनाव अभी दो वर्ष दूर हैं, तो किसी लोक लुभावन बजट की उम्मीद वित्त मंत्री जी से न करें। इसके विपरीत सरकार के पास यह आखिरी मौका होगा कुछ कड़वे निर्णय लेने का। </p>
<p>यहां यह भी स्पष्ट कर दूं कि सरकारें यदि कोई अच्छी घॊषणा करनी हो तो छिपा कर रखती हैं तथा बजट से पहले हमेशा इस प्रकार के बयान देने से बचतीं हैं जिनसे आम लोगों को अथवा उद्योगों या पूंजी बाजारों को बजट से बहुत अधिक सकरात्मक उम्मीदें हो जायें, क्यों कि अगर बजट इन सब की उम्मीदों पर खरा न उतरे (और ऐसा हमेशा होता है) तो इसकी नकरात्मक प्रतिक्रिया (जैसे शेयर बाजार में गिरावट) भी हो सकती है।</p>
<p>तो आइये प्रधानमंत्री जी कि इस बात को समझें और यदि ऐसा हुआ तो इसका क्या असर होगा इसे भी समझने की कोशिश करें। सबसे पहले उद्योगों द्वारा दिये जाने वाले करों की बात करते हैं। पिछले वर्ष वित्तमंत्री जी ने बजट पेश करते हुए करों में 19.3%  की वृद्धी का अनुमान लगाया था। आगामी 28 फरवरी को जब वित्तमंत्री जी बजट पेश करेंगे तो अपने ही अनुमानों से 20.000 करोड़ रु अघिक एकत्र कर चुके होंगे। यह सब संभव होगा  अर्थवयवस्था में होते तेज विकास के कारण। अब यदि सरकार इतना अधिक धन इकट्ठा कर रही है तो करों में छूट वापिस क्यों ली जा रही है। ऐसा लगता है कि सरकार छूटों को हटा कर करों की दरों को भी कम करना चाहती है जिससे करों की गणना आसान हो जाये तथा दरें तर्कसंगत और इसके साथ ही कंपनियां करों मे छूट की आड़ में टैक्स देने से बचती न रहें। </p>
<p>2006-07 में करों से राजस्व आय थी 3,17,733 करोड़ रुपये तथा विभिन्न छूटों से राजस्व हानि थी 1,58,661 करोड़ रुपये। यानि लगभग 50%&#124;<br />
करों से छूट हटा लेने का अर्थ होगा कंपनियां  अपने लाभ से सरकार को अधिक कर देंगी जिससे उनके पास शेयरधरकों को दिये जाने वाले लभांश में  कमी होगी। इसका अधिक असर बड़ी कंपनियों पर पड़ेगा।</p>
<p>करों की दरों में कमी का अर्थ होगा कंपनियों के पास लभांश देने के लिये तथा विस्तार करने के लिये अधिक धन। इसका व्यापक सकरात्मक असर होगा तथा  उम्मीद है कि बाजार हर्ष के साथ इसका स्वागत करेंगे।<br />
इससे उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में भी कमी आने की संभावना है। </p>
<p>अगले लेख में हम चर्चा करेंगे निजी आयकर में छूट के हटने से होने वाले प्रभावों की ।</font><br />
(आंकड़े आज की टाइम्स ऑफ ईंडिया से)</p>
<p><strong>भारतीय अर्थव्यवस्था और विकास पर अन्य लेख</strong><br />
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<a href="http://aaina2.wordpress.com/2007/01/10/india/">यह भी है हमारा भारत</a><br />
<a href="http://aaina2.wordpress.com/2007/01/09/economicreforms/">15 वर्षों के आर्थिक सुधार- कितने मोबाईल</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[यह भी है हमारा भारत]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/01/10/%e0%a4%af%e0%a4%b9-%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4/</link>
<pubDate>Wed, 10 Jan 2007 16:57:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
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<description><![CDATA[15 वर्षों के आर्थिक सुधार- कितनों को साफ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"><em><strong>15 वर्षों के आर्थिक सुधार- कितनों को साफ पानी</strong></em></font><br />
<font size="3">यह एक विडंबना ही है कि पिछले 15 वर्षों में जहां हमारी अर्थव्यवस्था ने नयी नयी ऊंचाईयों को छुआ है वहीं इस अवधि में कृषि क्षेत्र लु्ड़कता चला गया। यह क्षेत्र इतनी बुरी तरह पिछड़ा कि इस वर्ष हमें रिकार्ड 60 लाख टन गैहूं आयात करना पड़ेगा। हमें बहुत जल्द जाग जाना होगा। कृषी क्षेत्र में सुधारों की तत्काल जरुरत है जिसमें भूमी सुधार, सिंचाई, किसानों को नयी तकनीक की जानकारी तथा ऋण शामिल है। इस पर तुरंत ध्यान न दिया गया तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। साठ प्रतिशत आबादी जो कि कृषि पर आधारित है का हिस्सा अर्थ्व्यवस्था में लगातार घटता चला जा रहा है जिससे देश में अमीरी और गरीबी में दूरी बढ़्ती चली जा रही है क्योंकि सेवा क्षेत्र में हो रहे तेज विकास के कारण मध्य वर्ग बहुत तेजी से विकास कर रहा है। </font><font size="3">यह सच है कि आर्थिक सुधारों ने लाखों पढ़े लिखे भारतीयों को लाभ पहुंचाया है मगर अभी भी बहुत बड़े वर्ग तक इसका असर नहीं पहुंचा है। साफ पानी, स्वास्थ्य सुविधाएं तथा शिक्षा इनके लिये सपना ही है। कुछ उदाहरण देखिये:</p>
<p><img src="http://aaina2.wordpress.com/files/2007/01/social.JPG" alt="social.JPG" /></p>
<p>प्राईमरी स्कूलों के केवल 25% टीचर ही ग्रेजुएट है।<br />
केवल 28 % स्कूलों में बिजली है तथा आधे से ज्यादा स्कूलों में दो से ज्यादा टीचर या दो से ज्यादा क्लासरूम नहीं हैं।<br />
56% ग्रामीण घरों में बिजली नहीं है।<br />
1,20,000 गांवों को अभी बिजली का बल्ब देखना बाकी है।<br />
उड़ीसा के 80% गांवों में बिजली नहीं है।<br />
देश में टीबी, एच आई वी मरीज तो बढ़ ही रहे हैं, कुपोषन के शिकार बच्चे तथा महिलायें भी बढ़ रही हैं।<br />
केवल 38% हेल्थ सेंटरों के पास ही पूरा स्टाफ है तथा केवल 31% के पास इलाज के लिये जरूरी सामान।<br />
पीने का पानी एक चौथाई ग्रामीणों की पहुंच से बाहर है।<br />
मुम्बई की 54 % आबादी स्लम में रह्ती है।</p>
<p>एशिया के सबसे बड़े स्लम धारावी में जहां सूरज की रोशनी नहीं जाती क्योंकि घर एक दूसरे के इतने नजदीक बने है, जिसकी गलियों से आप बिना बांहों को सिकोड़े निकल नहीं सकते, जहां एक टायलेट को औसतन 1440 लोग इस्तेमाल करते हैं ऐसी जगह पर 10 X 10 की झोपड़ी का किराया 1500 रु महीना है।</p>
<p><img src="http://aaina2.wordpress.com/files/2007/01/justdoit.jpg" alt="justdoit.jpg" /></p>
<p>फिर भी लोग गांवों को छोड़ छोड़ कर शहरों को पलायन कर रहे हैं और इन स्लम्स पर और दबाव बना रहे हैं।</p>
<p>अब बताइये गरीब क्या करे? उन गांवों मे रहे जहां न रोजगार है, न बिजली है, न पानी है, न शिक्षा और न स्वास्थ्य या शाहरों में आकर इन स्लम्स में रहे?</p>
<p>चीन ने जब आर्थिक सुधार शुरु किये उससे पहले अपने हर नागरीक को रोटी कपड़ा और मकान दिया। हम जो शहरों में कमा रहे हैं उससे शहर भी नहीं सुधार पा रहे, गांवों की तो बात ही क्या।</p>
<p>अब बताइये, क्या हम सही जा रहे हैं?</p>
<p></font>(लेख के आंकड़े तथा चित्र बिजनेस टुडे के ताजा अंक से)</p>
<p>इस लेख का पहला भाग<br />
<a href="http://aaina2.wordpress.com/2007/01/09/economicreforms/">15 वर्षों के आर्थिक सुधार- कितने मोबाईल</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[15 वर्षों के आर्थिक सुधार- कितने मोबाईल]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/01/09/economicreforms/</link>
<pubDate>Tue, 09 Jan 2007 16:14:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
<guid>http://aaina2.wordpress.com/2007/01/09/economicreforms/</guid>
<description><![CDATA[बिजनेस टुडे पत्रिका के ताजा अंक में 15 व]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3">बिजनेस टुडे पत्रिका के ताजा अंक में 15 वर्षों के आर्थिक सुधारों पर विशेष सामग्री दी गई है। आर्थिक सुधारों का विस्तार से अध्ययन किया गया है तथा इसके सामाजिक असर को भी बखूबी उठाया गया है।<br />
संभाल कर रखने लायक 282 पेज का यह  अंक 15 रु का है। बिजनेस टुडे के इसी अंक से चुन कर कुछ मजेदार आंकड़े यहां दे रहा हूं:</p>
<p>इन 15 वर्षों में प्रति व्यक्ति आय 9193 रु से बढ़ कर 15357 रु  हो गयी।<br />
जीडीपी में कृषी का हिस्सा 28.52% से घट कर 17 % रह गया।<br />
निर्यात 17856 मिलियन डालर से बढ़ कर 102725 मिलियन डालर हुआ।<br />
जीडीपी विकास दर 1.3 % से बढ़ कर 8.4 % हुई।<br />
विदेशी मुद्रा कोष 1.1 बिलियन डालर से बढ़ कर 156 बिलियन डालर हुआ<br />
गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों का प्रतिशत 38 % से घट कर 22 % हुआ।<br />
मुद्रास्फीति 16.9% से घट कर 5.3% हुई।<br />
शेयर बाजार पूंजी 90800 करोड़ रु से बढ़ कर 35,00,000 करोड़ रु हुई।<br />
विदेशी निवेश FDI 133 मिलियन डालर से बढ़ कर 20243 मिलियन डालर हुई।<br />
आईटी एक्सपोर्ट 250 करोड़ रु से बढ़ कर 105300 करोड़ रु हुआ।</p>
<p>देश में इस समय प्रति 1000 आबादी पर 18 कम्यूटर हैं।<br />
देश में इस समय (अक्तूबर 2006 तक) 13.6 करोड़ मोबाईल, 11.2 करोड़ टीवी, 3.7 करोड़ इंटरनेट प्रयोक्ता, 6.8 करोड़ केबल कनेक्शन हैं।<br />
देश में इस साल अप्रेल से नवंबर तक 53 लाख दोपहिया तथा 4.6 लाख कारें बिकीं।<br />
इतने अच्छे अच्छे आंकड़े देख कर हो सकता है कि आप की आंखें खुशी से चमक उठी हों मगर यह केवल एक तरफ की सच्चाई है।</p>
<p>कल इस लेख के दूसरे भाग '15 वर्षों के आर्थिक सुधार- कितनों को साफ पानी'  में लिखूंगा सामाजिक सच्चाईयां तथा किसानों एवम गरीबों का हाल। कितने लोग साफ पानी, स्वास्थ्य सुविधाओं तथा शिक्षा से अभी भी वंचित हैं क्योंकि इतना कुछ होने के बावजूद देश में 35 % लोग केवल 45 रु प्रति दिन की कमाई पर जीते हैं तथा अन्य 45 % केवल 45 रु से 90 रु की दिहाड़ी पर।  </p>
<p>अपने बच्चे को जब हम पचास रु जेब खर्च देते हैं तो क्या कभी इस बात के लिये सोचते हैं?</p>
<p>मिलियन = 10 लाख<br />
बिलियन = 100 करोड़ = एक अरब<br />
डालर = लगभग 45 रु</font></p>
<p><strong>भारतीय अर्थव्यवस्था और विकास पर अन्य लेख</strong><br />
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<a href="http://aaina2.wordpress.com/2006/11/28/vikas/">विकास के यह रंग</a><br />
<a href="http://aaina2.wordpress.com/2006/12/29/2007/">वर्ष 2007 होगा भारत का</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वर्ष 2007 होगा भारत का]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2006/12/29/2007/</link>
<pubDate>Fri, 29 Dec 2006 13:53:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
<guid>http://aaina2.wordpress.com/2006/12/29/2007/</guid>
<description><![CDATA[आइये 2007 का स्वागत करें भारत की चमकती हु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3">आइये 2007 का स्वागत करें भारत की चमकती हुई तस्वीर से। आने वाले साल का स्वागत किया है आज के इकानामिक टाइम्स ने <a href="http://economictimes.indiatimes.com/It_is_Indias__time_to_shine_fair__square/articleshow/969161.cms">पक्के तौर पर समय हमारा है</a></strong> की उद्घोषणा के साथ। लेख में लिखा है<br />
जिस तरह से आगे बढ़ते हुए अरबों डालर के सौदे  हमारी कंपनियां कर रही हैं और अपने ब्रांडों की पहुंच को दुनिया भर में हर ओर फैला रही हैं हैरान न हों यदि विश्व बाजार के प्रतीक <em>टाईम स्क्येर </em>पर केवल भारतीय ब्रांड ही चमकते दिखायी दें।</p>
<p><img src='http://aaina2.wordpress.com/files/2006/12/getimagest.JPG' alt='getimagest.JPG' /></p>
<p>स्वामिनाथन अय्यर के इस लेख में आगे लिखा है कि एक समय था जब दुनिया भर में भारत अव्वल नंबर था - भुखमरी में, खाद्य सहायता मांगने में, विदेशी सहायता मांगने में और <em>ट्रांसप्येरेंसी इंटरनेशनल </em>के अनुसार - रिशवत देने में भी। पर अचानक, दो दशकों तक कुछ और राग अलापने वाले <em>क्रेडिट सुइस </em>जैसे विश्लेषक अब कह रहे हैं कि भारत जो कि चीन के बाद विकास गति में दूसरे नंबर पर है 2007 में चीन को पीछे छोड़ पहले नंबर पर आ जायेगा। एक देश जिसकी पहचान एक ऐसे  कूंएं की तरह थी जहां जितनी भी सहायता भेजी जाये उसे पाटना मुश्किल था वही देश आज दुनिया भर में विकास की गति में सबसे आगे खड़ा है। </p>
<p>आज विश्व की अर्थव्यवस्था बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है। विकासशील देशों की औसत विकास दर 7% है। अफ्रीका भी पिछले चार सालों से औसतन 5.3% की दर से विकास कर रहा है। ऐसी तेजी में 8-9% की विकास दर इतना मायने शायद नहीं रखती मगर भारत अब विश्व अर्थव्यवस्था के केंद्र की ओर बहुत तेजी से बढ़ रहा है और वैश्विकरण का महत्वपूर्ण भागिदार भी  है। यह एक बहुत बड़ा बदलाव है। </p>
<p>पिछले तीन वर्षों में सकल घरेलू उत्पाद के मुकाबले हमारे निर्यात का अनुपात 14.6% से उछल  कर 20.5% हो गया है। दुनिया के व्यापार में हमारे निर्यात की हिस्सेदारी दोगुना हो कर 0.5% से 1% हो गयी  है। विश्व भर में  सेवाओं के निर्यात (इसे BPO पढ़ें) में हमारा हिस्सा भी केवल दो वर्षों में दोगुना हो कर 2.5% पर आगया हैं। भारत के लोग युरोप और अमेरिका के लोगों से लाखों की संख्या में नौकरियां छीन लेंगे यही   सोच कर वहां के नेताओं की आंखें भी पत्थरा रही हैं। </p>
<p>यही नहीं अगर डालरों में गणना करें तो भारतीय सकल घरेलू उत्पाद पिछले तीन सालों में 16% प्रति वर्ष की जबर्दस्त तेजी से आगे बढ़ रहा है (क्योंकि डालर के मुकाबले रुपया मजबूत हो रहा है)। यदि यही विकास दर रही तो भारतीय अर्थव्यवस्था  केवल 22 सालों में अमेरीकी अर्थव्यवस्था की बराबरी कर लेगी जो होगी 11 ट्रिलियन डालर।  </p>
<p>तो तैयार हो जाइये 2007 में भारत को विश्वभर में सबसे तेज गति से विकास करते हुए देखने के लिये।</font></p>
<p><strong>भारतीय अर्थव्यवस्था और विकास पर अन्य लेख</strong><br />
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[यह भी रंग विकास के]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2006/12/04/yahbhivikas/</link>
<pubDate>Mon, 04 Dec 2006 16:53:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
<guid>http://aaina2.wordpress.com/2006/12/04/yahbhivikas/</guid>
<description><![CDATA[
14 वर्षिय आरती धवन अपनी अत्मविश्वास से ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://aaina2.wordpress.com/files/2006/12/image_294.jpg" alt="image_294.jpg" /><br />
<font size="3">14 वर्षिय आरती धवन अपनी अत्मविश्वास से भरी मुस्कुराहट के साथ अपने काम्पेक के काले लैपटॉप पर कभी पावर प्वाईंट पर कोइ स्लाईड दिखाती है और कभी एक्सेल पर अपने 33 वर्षिय चाचा संतोष धवन के महीने के खर्चे का हिसाब दिखाती है। गन्ने का खेत यह सब करने के लिये शायद ठीक जगह नहीं है मगर यदि आप महाराष्ट्र के बारामती में हैं तो आपको इससे अच्छी कोइ जगह नहीं मिलेगी।<br />
नवीं कक्षा में पढ़ने वाली इस शर्मीली सी लड़की ने कम्प्यूटर केवल दो साल पहले अपने स्कूल की कम्प्यूटर लैब में देखा था। इतने से समय में आरती न सिर्फ वर्ड, एक्सेल और पावर प्वाइंट सीख गई है, उसने 30 एकड़ खेत के मालिक अपने किसान चाचा को इमेल करना और इंटरनेट चलाना भी सिखा दिया है। एक साल पहले इन लोगों ने एक डेस्कटाप कम्प्यूटर खरीदा था जिसका प्रयोग ये लोग नेट पर कृषि संबंधी जानकारी लेने के लिये करते हैं। "हम नेट पर खोजते हैं कि अंगूर की अलग अलग जातियों की अच्छी देखभाल कैसे की जाये" मुस्कुराते हुए आरती बताती है।<br />
काम्पेक के जिस लैपटॉप को खुश होते हुए आरती दिखा रही है, वह लैपटॉप उसे उपहार में दिया इंटेल के चेयरमैन Craig Barrett ने पिछले महीने जब वो धवन के घर आये । धवन घर के आहाते में बंधी अपनी वो गाय दिखाना नहीं भूलते जिसका दूध Craig Barrett ने भी पिया।<br />
यह है भारत के बारामती और बहुत से कई दूसरे ग्रामीण क्षेत्रों का वह सच जिस पर सहजता से विश्वास नहीं होता।<br />
बारामती के लगभग सौ गांव मुख्यतः खेती और पशुपालन से अपना गुजारा करते हैं। यह सब गांव इंटेरनेट मय हो गये हैं। पूने से 120 किमी दूर इस तालुके में जब आप प्रवेश करते हैं तो चिकनी सड़कें आपका स्वागत करती हैं। इंटेल ने अपने अनूठे <a href="http://www.intel.com/netcomms/technologies/wimax/index.htm">Wimax</a> प्रोजेक्ट को लागू करने के लिये <a href="http://www.thehindubusinessline.com/2006/11/03/stories/2006110303861000.htm">बारामती को चुना है</a>।</p>
<p>(बिजनेस टुडे के 17 दिसंबर अंक में छपे एक लेख के एक भाग का मेरे द्वारा किया हिंदी रूपांतर)</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आम आदमी के साथ....?]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2006/12/01/%e0%a4%86%e0%a4%ae-%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a5/</link>
<pubDate>Fri, 01 Dec 2006 04:06:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
<guid>http://aaina2.wordpress.com/2006/12/01/%e0%a4%86%e0%a4%ae-%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a5/</guid>
<description><![CDATA[आज के समाचरपत्रों में मौजूदा वित्त वर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3">आज के समाचरपत्रों में मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही (जुलाई से सितंबर) में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) यानी आर्थिक <a href="http://economictimes.indiatimes.com/articleshow/660432.cms">विकास के आंकड़े छपे </a>हैं। आइये इसके पीछे छिपे सामाजिक संदेश को समझने की कोशिश करते हैं। इस दौरान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) यानी आर्थिक विकास की बढ़ोतरी दर ९.२ फीसदी रही है। पहली तिमाही में यह ८.९ फीसदी थी। इस साल की पहली छमाही में औसत बढ़ोतरी दर ९.१ फीसदी रही है। यह पिछले १५ साल में पहली छमाही में हासिल सबसे अधिक बढ़ोतरी दर है। यदि यह बढ़ोतरी ८% भी होती रही तो अगले ११ सालों में देश में प्रति व्यक्ति आय दोगुनि हो जायेगी (और वह भी मुद्रास्फीति के प्रभाव को हटाने के बाद)।<br />
अब कुछ चौंकाने वाली बातें, इस तिमाही में कृषि विकास दर रही केवल १.७% और जीडीपी में कृषि उत्पादों की हिस्सेदारी घट कर रह गई है मात्र १७.२% । जी हां, हमारी अर्थव्यवस्था में कृषि का सहयोग अब मात्र १७.२% ही रह गया है जो कि १९९०-९१ के मुकाबले आधे से भी कम है। अब कोई यह नहीं कह सकता कि हम एक कृषि प्रधान देश हैं। जीडीपी को उद्योग, कृषि तथा सेवा के तीन क्षेत्रों में बांट कर देखा जाता है। उल्लेखनीय है कि १९८८-८९ में कृषि की विकास दर १५.४% थी। आपको यह भी जानकर हैरानी होगी कि इस १७.२% की हिस्सेदारी पर हमारी ६०% आबादी निर्भर करती है। जिस असमान विकास की बात हमारे कुछ चिट्ठाकार बंधू करते रहे हैं उसका सबूत हैं वित्त मंत्री जी के यह आंकड़े।</p>
<p>लगता है अब 'आम आदमी' की परिभाषा ही बदल रही है !</font></p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
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