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	<title>अभिव्यक्ति &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/अभिव्यक्ति/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "अभिव्यक्ति"</description>
	<pubDate>Tue, 13 May 2008 19:07:14 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[बिना शक्ति दिखाये कौन यकीन करेगा-आलेख]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=374</link>
<pubDate>Tue, 13 May 2008 16:43:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
बहुत सरल भाव रखने पर लोग सीदा-सादा समझ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h3>
बहुत सरल भाव रखने पर लोग सीदा-सादा समझकर अपमान करने लगते हैं। अगर मान का मोह छोड़कर किसी के अभियान में निष्काम भाव से सहायता की जाये तो फिर वह लोग  लाभ उठाकर भी अपमान करने से नहीं चूकते।</h3>
<h3>हां, यह दोष कई लोगों को इस बात की अनुभूति होती  है कि वह जितना सहज  होकर अपना कार्य करते हुए दूसरों को प्रसन्नता प्रदान करते  है उतना ही लोग उनको लाचार समझने लगते हैं। कहते हैं जो शांत रहता है उसका क्रोध बहुत विकट होता है जो मौन है उसकी शक्ति बहुत अधिक होती है। यह तभी प्रमाणि हो सकता है जब शांति से रहने वाला व्यक्ति अपने कार्य में बाधा आने पर क्रोध का प्रदर्शन करे और मौन रहकर जीवन साधना में रहने वाला व्यक्ति समय पड़ने पर उसकी शक्ति दिखाये।</h3>
<h3>जीवन के प्रति सरल, सहज और सकारात्मक भाव रखो पर यह भी मत भूलो कि लोगों के लिये तभी आदर्श बन पाओगे जब सतर्क, सजग, और सक्षम होकर अपने सामने आने वाली चुनौतियों  और व्यक्तियों के आक्रमण अपनी शक्ति से  प्रतिकार करोगे। अगर हमने सरलता और सहजता से किसी का उपकार किया अच्छी बात है पर अगर वह पीठ पीछे वार करता है और हम  उसका प्रतिकार नहीं करते तो फिर हमारी शक्ति पर कौन यकीन करेगा? हमें अपनी संघर्ष क्षमता और  शक्ति का उपयोग कर उनका प्रतिवाद और प्रतिकार करना चाहिए ताकि दूसरे देख सकें कि सरलता, सहजता और सकारात्मकता की क्या शक्ति होती है।<br />
आजकल तप और ज्ञान यज्ञ से शक्ति अर्जित करने वाले गुरू नहीं मिलते। धर्मग्रंथों में से ज्ञान को रटकर दूसरों को ज्ञान देने वाले गुरू ऐसे सक्षम शिष्य नहीं दे सकते जो समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए तत्पर हों। उन्हें तो ऐसे शिष्य चाहिए जो उनको दान देते रहें-हमारे धर्म ग्रंथों के अनंुासार ज्ञान केवल सुपात्र को ही दिया जाता है-और उनकी महिमा दूसरों को सुनाकर अन्य शिष्य जुटाते रहें। ऐसे में सात्विक प्रवृत्ति के लोगों का मिलना अत्यंत कठिन है और जो मिलते है वह कुछ देर सौम्यता दिखाकर ठगने का प्रयास करते हैं। उसके बाद सारी दुनियां में ढिंढोरा पीटते हैं कि देखो अमुक को हमने कैसे मूर्ख बनाया या हमने कैसे अपना काम निकलवाया।</h3>
<h3>सामूहिक रूप से अभियान चलाने की बातें तो केवल धोखा देने के लिये होती हैं। अमुक जगह धार्मिक स्थान बनाना है या अमुक जगह कोई सामाजिक  कार्यक्रम कराना है, भाषा, जाति और वर्ग के आधार पर कोई लक्ष्य पूरा करना है या कोई ऐसी बात जिससे हमारे मन में  मोह पैदा हो और हम तन, मन और धन से त्याग करने के तैयार हो जायें। यहां हर व्यक्ति अपने आपको त्यागी और परमार्थी साबित करने का प्रयास करता है पर उनको  परखे बिना कर हम उन पर विश्वास कर भारी भूल कर बैठते है।ं वह हमारे से प्राप्त सहयोग का दुरूपयोग दूसरों को हानि पहुंचाने और अन्य पापकर्म में भी कर सकते हैं और उसका पाप हमारे माथे ही आता है-इसलिये ही शायद कहा जाता है कि सुपात्र को दान दो।</h3>
<h3>लोगों के चरित्र ठीक नहीं है। कला, साहित्य, फिल्म और अन्य जो भी आकर्षण का क्षेत्र हैं वहां ऐसे लोगों की भरमार है जो वहां शिखर पर  विराजमान होकर अभियान या आंदोलन चलाकर हमें भीड़ में भेड़ की तरह एकत्रित करते हैं। नारे लगाते हैं</h3>
<h3>‘आओ जुट जाओ। यह आंदोलन संफल करना है’<br />
‘आओ कुछ ऐसा करो कि यह अभियान सफल हो जाये’</h3>
<h3>ऐसे नारे लगाने वाले स्वयं कुछ नहीं करते। अपने परिवार की रोटी जुटायें तो ठीक वह अपने लिये अय्याशी के साधन जुटाते हैं। अपना नाम रोशन करने के लिये वह अपनी सूरतें मासूम बना लेते पर उनके मन में क्रूरता का भाव होता है। हम सोचते हैं कि मनुष्य हैं पर वह ऐसे देखते हैं जैसे कि उनके लिये कोई  शिकार है। सदियों से चलता आ रहा है यह सिलसिला। कभी नहीं थमेगा। लड़ता सिपाही है नाम सेनापति का होता है। गाता है गवैया नाम बादशाह का होता है। लिखता है लेखक नाम संपादक का होता है। बनाते हैं मजदूर महल नाम शाहजहां का होता है।</h3>
<h3>कर्म करो। स्वतंत्र भाव से करो। निष्काम होकर करो। हंसते रहो ऐसे लोगों को देखकर। जो मन में आये करो पर किसी की हानि न करो तो किसी ऐसे को भी लाभ नहीं लेने दो उसका लाभ उठाकर समाज और राष्ट्र के साथ छल करे। खुलकर लिखो, खुलकर बोला और खुलकर देखो ऐसे लोगों के नाटक । परिवार हो या बाहर लोग एक दूसरे का उपयोग करना चाहते हैं। अपने कर्तव्य का निर्वाह करो पर फल को भूल जाओ। अपने मन को स्वतंत्र और पुष्ट कर लो। भीड़ में चलो मगर भेड़ की तरह नहीं। बोलो तो चूहे की तरह चीं-चीं नहीं वरन् शेर की तरह गरजो। अपने सार्वजनिक रूप से किये गये अपमान पर शोर मचा दो। लोग तभी विश्वास करेंगे तुम्हारी भक्ति और शक्ति पर।</h3>
<h3></h3>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[स्टार्ट अप को समोसा मान लेते हैं-व्यंग्य चिंतन]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=155</link>
<pubDate>Tue, 13 May 2008 15:10:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=155</guid>
<description><![CDATA[ 
गूगल के अंग्रेजी हिंदी टूल आने का भार]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> </p>
<p>गूगल के अंग्रेजी हिंदी टूल आने का भारत के अनेक क्षेत्रों के प्रतीक्षा थी। भारत मेें भी हिंदी ब्लाग जगत पर इसकी चर्चा कुछ समय से हो रही  थी।मेरे एक ब्लाग पर एक  अंग्रेजी ब्लाग लेखक ने अपनी टिप्पणी में लिखा था कि एसा टूल आ रहा है इससे भाषा की दीवार समाप्त हो जायेगी।  अब इस टूल के प्रयोग ने कई लोगों को निराश कर दिया है। हिंदी में अंतर्जाल पर लिखने वाले हिंदी ब्लाग ही नहीं वरन् अनेक वह पाठक भी निराश हुए हैं जिनको अंग्रेजी भाषा का ज्ञान नहीं है पर उसके विषयों को पढ़ने का बहुत आकर्षण है। उन्हें लगता है कि अंग्रेजी में शायद हिंदी से बेहतर लिखा जाता है। इससे पहले भी अनेक लोग इंटरनेट पर अंग्रेजी वेब साईटों के सामने आंखें लगाकर  अपने को विश्वास दिलाते हैं कि वह उसे पढ़ रहे हैं और फिर अपने मित्रों को बताते हैं। जब उन्होंने अनुवाद टूल  के बारे में सुना तो चेहरे खिल उठे होंगे पर अब तमाम स्त्रोतों से पता चलता है कि वह निराश है।</p>
<p>हिंदी ब्लाग जगत के नियमित सदस्य होने के कारण मेरे पास इस टूल का बहुत शीघ्र पहुंचना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी और मैंने भी इसके हाथ लगते ही उसके आजमाने का प्रयास किया। मैंने इस टूल को खोला और अग्रेजी के एक ब्लाग की विषय सामग्री की प्रतिलिपि उठाकर अपने ब्लाग पर चिपका दी। फिर परिवर्तित बटन दबाया। कुछ ही सेकण्ड में ही हिंदी में पूरी विषय सामग्री कुछ अस्वीकृत शब्दों साथ  मेरे सामने थी। उसे मैं पढ़ सक पर समझ नहीं सकता था। इसलिये सामने ही अंग्रेजी की सामग्री को पढ़ता और फिर हिंदी को देखता। इस काम में मेहनत कुछ अधिक है पर अंग्रेजी को पूरी तरह नहीं पढ़ने आने की  यह सजा कोई बुरी भी नहीं लगी। मैं अंग्रेजी का पढ़ा समझ पा रहा था इसी से मैं संतुष्ट था। अंग्रेजी व्याकरण की अच्छी जानकारी है इसलिये मुझे पढ़ने और समझने में आ रहा था। हां, शतप्रतिशत नहीं कह सकता पर यह तो अंग्रेजी वाले भी नहीं कह सकते। अंग्रेजी क्या किसी भी भाषा में पढ़ने वाला व्यक्ति यह दावा नहीं कर सकता।</p>
<p>वह ब्लाग शायद किसी ब्रिटेन या अमेरिकी ब्लाग लेखक का होगा। वह कहीं इजरायल अपने व्यवसायिक कार्य से गया था और स्टार्ट अप(start up) खाने की बात लिख रहा था। अंग्रेजी में तो स्टार्ट अप (start up) जैसा था उसे परिवर्तित टूल ने देवनागरी में करने से मना कर दिया। वह कोई खाने की वस्तु होगी ऐसा मेरा अनुमान है। वह अपने मित्र और उसके परिवार साथ कहीं पिकनिक मनाने गया और वहां के दृश्यों के बारे में लिखा। उसके बारे में लिखते हुए भी स्टार्ट अप (start up)खाने की बात कर रहा था। अनुवाद टूल अगर उसे हिंदी में बता देता तो कोई बात नहीं पर हम अभी मान लेते हैं कि स्टार्ट अप कोई समोसे जैसी चीज होगी। समोसा भी तो खाने के काम आता हैं। अब खाने की कोई भी चीज है चाहे जो नाम दे दो। क्या अंतर पड़ता है? बहरहाल उसका पाठ ठीकठाक और दिलचस्प लगा। उसके ब्लाग पर आठ लाख व्यूज थे और तय बात है कि हम अगल दस वर्ष तक तो इतनी पाठक संख्या में सोच भी नहीं सकते।</p>
<p>फिर एक दूसरे ब्लाग की सामग्री लाया। वह पूर्वी एशिया-चीन, जापान या किसी अन्य देश-की किसी महिला ब्लाग लेखक की थी। उसने भारतीय गेहूं के आटे पर वह पोस्ट लिखी थी और उसमें भारतीय आटे के गेहूं की बोरी का फोटो भी था। उसने ऐसा करना अपने मां से सीखा था और उसने अपनी मां के प्रति बहुत भावुक होकर वैसे ही प्रेम व्यक्त किया था जैसे अपने देश की महिलायें व्यक्त करतीं हैं। हां, अंग्रेजी में कुछ कठिनाई से पढ़ते हुए यह जरूर लगा कि इससे तो हमारे हिंदी ब्लाग जगत की महिला लेखिकाएं बहुत अच्छा लिख लेतीं हैं। उनके विषयों में भी व्यापकता होती है।</p>
<p>फिर एक तीसरा ब्लाग बिना सोचे समझे उठा लाये। पता लगा कि वह तो खाद्य पदार्थ बनाने की विधियों से ही भरा पड़ा था। वह किसी भारतीय का नहीं लगा पर उसमें भारतीय खाद्य पदार्थ बनाने के विधियां ही थीं।</p>
<p>उस समय भारत के लोगों द्वारा अधिक मात्रा में भोजन खाने की बात सब जगह चर्चा का विषय थी और हम सोच रहे थे कि जो आदमी जिस विषय के अधिक अपना दिमाग निकट रखता है उसी पर ही वह लिख सकता है। हिंदी ब्लाग लेखक इस तरह कहां खाने पर अपना पाठ लिखते हैं? इसकी आशय तो  यह कि कि सभी सादा और कम खाने वाले हैं तभी तो इतना इस विषय पर नहीं लिखते। व्यंग्य, कहानी, कविता और आलेख हर विषय पर लिखे जाते हैं। </p>
<p>हम आजकल भी अंग्रेजी ब्लोग देखते हैं पर कोई ऐसा विषय उन पर नहीं दिखता कि उसे पढ़ें। राजनीतिक विषयों कह भरमार है पर वह अपने देश से संबंधित नहीं होते। अब किसे पड़ी है कि अमेरिकी के राष्ट्रपति चुनाव में क्या चल रहा है? इस पर बहुंत आलेख देखे। ऐसा भी हो सकता है कि जब हम जाते हों ऐसे विषय न मिलते हों जिनको हम पढ़ना चाहते हैं। </p>
<p>हिंदी के लेखक-चाहे वह अंतर्जाल पर हों या बाहर-उन्हें इस बात से दुःखी नहीं होना चाहिए कि हिंदी अंग्रेजी का टूल शतप्रतिशत परिणाम नहीं दे रहा। दरअसल यह अभी तक जो चर्चा हमने सुनी वह अग्रेजी से हिंदी अनुवाद पर सुनी। हिंदी से अंग्रेजी के अनुवाद पर अभी हम प्रतीक्षा कर रहे हैं-जिसके बारे में मेरा मानना है कि हम अपने पाठों में हिंदी से अंग्रेजी में  अधिकतम शुद्धता के प्रयास हम कर सकते है।  जिस तरह चारों तरफ उसकी निराशा की बात सुन रहे हैं उससे तो यही लगता है कि अगर यह टूल अंग्रेजी का हिंदी में शुद्धता से अनुवाद कर देता है तो फिर इतने पाठक भी नहीं मिलेंगे जितने अब मिल रहे हैं। कभी अपने आसपास मैंने इस बात से लोगों को प्रसन्न होते नहीं देखा कि अंतर्जाल पर हिंदी में भी लिखा जा रहा है इस पर किसी को प्रसन्न होते नहीं देखा पर इस टूल के निरुपयोगी होने से दुःख व्यक्त करते हुए  कुछ लोगों को देखा है। हां, देश की पत्र-पत्रिकाओं के संपादक अवश्य निराश हुए होंगे कि अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद की गयी सीधी सामग्री मिलना अभी मुश्किल है। कुछ ब्लाग लेखक भी दुःखी हो सकते हैं कि अगर यह सफल होता तो वहां से सीधे सामग्री उठाकर ब्लाग पर रख देते देखो अमुक  अमेरिकी ब्लाग लेखक का शानदार पाठ।</p>
<p> वैसे भी हिंदी के कम प्रसिद्ध (मैं लेखक को छोटा बड़ा नहीं मानता) लेखकों को प्रसिद्धि देने के उद्देश्य से कोई भी उनको प्रकाशित नहीं करता। यहां प्रकाशन के लिए जरूरी है कि आप कभी फिल्मी पटकथा लेखक, अभिनेता, निर्देशक, किसी पत्र-पत्रिका के संपादक या कोई स्तंभकार रह चुके हों। फिर भी कभी किसी को महत्वहीन कालमों में छपने का अवसर मिल ही जाता है। अगर यह टूल शत प्रतिशत सफल हो जाता तो शायद इससे भी जाते।</p>
<p>हां, मैं प्रयोगजीवी आदमी हूं और ऐसा  प्रयास करूंगा कि मेरा हिंदी में लिखा अंग्रेजी में इस तरह अनुवाद हो कि वह कुछ पढ़ने और समझने योग्य हो। इसके लिये हम प्रयास कर सकते हैं। इसके लिये अपने कुछ पाठ मैं वहां जाकर अनुवाद कर देखता हूं। कुछ वैकल्पिक शब्दों के साथ वहां शतप्रतिशत परिणाम प्रतीत होता है और वाक्य भी समझ में आते  है- कुछ पोस्टें रखीं हैं पर परिणाम से स्वयं भी अनभिज्ञ हूं। अगर कुछ ब्लाग लेखकों ने कहीं ऐसा प्रयास किया तो हो सकता है कि उनको अंग्रेजी में भी सफलता मिले। हां,  तब भी  यह जरूर हो सकता है कि यहां हिंदी में लिखने के लिये इनाम और सम्मान कोई पा रहा है और अमेरिका और ब्रिटेन में नाम किसी और का हो रहा है। हिंदी के कल्याण से जुड़े शीर्षस्थ लोगों को वही लोग इनाम और सम्मान के लिये उपयुक्त लगते हैं जिससे उनका स्वयं का प्रचार होता हो। हिंदी के लेखकों को भूखा रखकर उससे लिखवाने की प्रवृत्ति रखने वाले लोगों को आगे चुनौती भी मिल सकती है और अगर शतप्रतिशत परिणाम वाला टूल आया तो हिंदी के लेखक भी संकट में आ सकते हैं। <br />
 </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[लिखने और प्रयोग करने में क्या हर्ज है- व्यंग्य]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=154</link>
<pubDate>Mon, 12 May 2008 16:04:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=154</guid>
<description><![CDATA[बहुत दिन से लोगों ने ऐसी हिंदी लिखी नह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h4>बहुत दिन से लोगों ने ऐसी हिंदी लिखी नहीं होगी जैसी उसे अंग्रेजी में अनुवाद टूल देखने का इच्छुक है। मैने गूगल के हिंदी टूल से समझौता करने का निर्णय किया तो मुझे जितना आसान लग रहा था उतना है नहीं।</h4>
<h4>पिछले कई वर्षों से मन में हिंदी का विख्यात लेखक बनने की इच्छा रही जो कभी पूर्ण नहीं हो सकी। विषय सामग्री की प्रशंसा तो अनेक लोगों से मिली पर ख्याति फिर भी नहीं मिली। भटकते हुए इस अंतर्जाल (अनुवाद वाला टूल इसे  इंटरनेट नहीं करता) पर आ गये। वर्डप्रेस का ब्लाग लिखने बैठ गये तो अपने देव और कृतिदेव में टाईप कर रख दिया। दो दिन तक इस बात   प्रतीक्षा की कि  यह उसको हिंदी के कर देगा। उसने नहीं किया तो हम हैरान रह गये। आखिर दूसरे लोग किस तरह लिख रहे हैं यह सोचकर हैरानी होती थी। पता नहीं कैसे हमने वर्डप्रेस में  हिंदी श्रेणी में अपना ब्लाग घुसेड दिया। इससे वहां सक्रिय अन्य ब्लाग लेखकों की उस पर वक्रदृष्टि पड़ गयी। हिंदी के सब ब्लाग एक जगह दिखाने वाले नारद फोरम के ब्लाग लेखक आखें तरेर रहे थे। ‘यह कौनसी भाषा है’, ‘इसे यूनिकोड में करो’, वगैरह....वगैरह।<br />
हमने समझा कि यह लोग जल रहे हैं पर आगे घटनाक्रम ऐसा हुआ कि हम यूनिकोड में ही लिखने लगे। एक मित्र ने इंडिक का हिंदी टूल दिया जो रोमन लिपि में लिखी हिंदी को देवनागरी रूप देता था। देखा जाये तो एक तरह से यूनिकोड में लिखने की वजह से हम भी ब्लाग लेखक बन गये। यह तो बाद में पता लगा कि हम तो इतने बड़े साहित्यक लेखक से ब्लाग लेखक बनकर रह गये। </h4>
<h4>इधर ब्लाग लेखक ऐसा टूल बता गये जिससे कृतिदेव बता गये जो उसे यूनिकोड में परिवर्तित करता  था। हम उस टूल को उठा तो लाये पर यकीन नहीं था कि सफल होगा। वह हुआ और हम अब ब्लाग लेखक नहीं रहे थे। जिन मित्रों ने हमें ब्लाग लेखक बनाने की गलती की थी यह टूल बताकर उसका प्रायश्चित कर दिया। कहें तो हमसे तंग होकर ब्लाग जगत से बाहर का मार्ग दिखा दिया।  अब हो गये लेखक।</h4>
<h4>एक महीना भी नहीं बीता कि एक और टूल का पता फिर यह ब्लाग मित्र ले आये-हिंदी को अंग्रेजी भाषा में बदलने का। कई पाठक अभी शायद इस बात पर यकीन नहीं करे पर यह सत्य है कि ऐसा टूल आ गया है। हमें एक लेखक की तरह हिंदी ब्लाग जगत में लिखते हुए अधिक समय नही बीता पर पुराने धाव कभी कभी हरे हो ही जाते हैं।</h4>
<h4>हमें कई वर्षों से इस बात का अनुभव रहा है कि  हम हिंदी में लिखकर विख्यात नहीं हो सकते। उल्टे कई बार विख्यात होने के चक्कर में हमारे झगड़े और हो जाते हैं जिसमें सिवाय कुख्यात होने के हमारे हाथ कुछ भी नहीं आता। ऐसे में इस टूल के जरिये अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विख्यात होने का विचार आया और अपनी कुछ पाठ-मित्रों की इस चेतावनी के बावजूद कि इसके परिणाम की संभावना का प्रतिशत बहुत कम है-हमने इस टूल का प्रयोग आरंभ किया। पहले पाठ  में कम से कम उसने बीस अक्षर परिवर्तित करने की बजाय वैसे के वैसे ही रखकर यह बता दिया कि यह काम आसान नहीं है।मैने एक-एक कर वैकल्पिक अक्षरों का इस्तेमाल किया और अपना पाठ  तैयार की और चिपका दिया। जब पढ़ने बैठा तो दंग रह गया। ‘मैं खाना खाता हूं’ में वह खाता को एकांउट कर देता है। साइकिल उसके समझ में आता है पर सायकल को मानने से मना कर देता है। पोस्ट नहीं पाठ लिखो तो समझता है। हिंदी के अधिकतर व्यंग्यकारों की यह आदत होती है कि वह ‘मैं’ की बजाय ‘हम’ शब्द का प्रयोग करते है पर इस अनुवाद के टूल से मत पढ़ कर अंग्रेजी पढ़ने वाले भ्रमित हो जायेंगे। यह टूल इतना हिंदी प्रेमी है कि उर्दू या अंगेजी शब्द को स्वीकार करने को तैयार नहीं है।</h4>
<h4>अभी लोगों ने इसका उपयोग किया नहीं है पर जितना मैंने किया है उसके अनुसार अगर शुद्ध हिंदी में लिखा जाये तो बहुत हद तक इस टूल से अपना पाठ इस तरह प्रस्तुत किया जा सकता है जिससे अंग्रेजी भाषा के पाठक भी पढ़ सकें। हिंदी में लेखक रहे या ब्लाग लेखक कोई सम्मान नहीं मिला। पहले भी मैं बहुत प्रयास करता था कि अंग्रेजी में अपनी रचनाएं लिखूं पर लिख नहीं पाया। अब विचार मेरे मस्तिष्क में आ रहा है कि क्यों न इस टूल से अंग्रेजी में घुसपैठ  की जाये। जब अंग्रेजी वाले हमारे हिंदी में हमारे अनुवादकों की सहायता से घुस सकते हैं तो फिर उनके इस टूल से उन्हींे की क्षेत्र में उसी तरह प्रवेश किया जाये।</h4>
<h4>आने वाला समय बहुत दिलचस्प है। सबसे बड़ी बात यह है कि जिस तरह अंतर्जाल पर भाषा की दीवार टूट रही है तो साथ ही कई भ्रम भी टूटने वाले हैं। अभी तक हिंदी के ठेकेदार  और मालिक  हिंदी के लेखकों को अपनी जागीर समझते थे। जिसे कोई पुरस्कार या सम्मान मिला वही प्रसिद्ध हुआ। लिखने के साथ किसी बड़े संगठन या व्यक्ति की चाटुकारिता करना आवश्यक है।  हिंदी पढ़ने वाले पाठकों की कमी है पर अब यह विषय नहीं रहने वाला कि किस भाषा में लिखा गया बल्कि क्या लिख गया यह महत्वपूर्ण होने वाला है।</h4>
<h4>पिछले बहुत समय से मुझे अपने ब्लाग पर अंग्रेजी भाषा के ब्लाग लेखकों की उपस्थिति के संकेत देखे थे पर मैंने उनकी उपेक्षा की यह सोचकर कि भला उनके साथ क्या संपर्क बन पायेगा? अब संभव है कि अंतर्भाषीय ब्लाग संपर्क बनने लगें। जिस गति परिवर्तन आ रहे हैं उससे मुझे लगता है कि एक वर्ष में बहुत सारे ऐसे दृश्य हमारे समक्ष प्रस्तुत होंगे जिसकी कल्पना भी हम अभी नहीं कर सकते। मेरी दिलचस्पी अब इस ब्लाग जगत में लेखक की तरह कम एक दृष्टा की तरह अधिक है-लेखक होने के कारण मुझे भी सुखद अनुभूतियां होंगी, यह एक अलग से उपहार होगा।</h4>
<h4>अभी इस टूल के प्रयोग को सीखा जाना है और जो लेखक नये हैं और वह इस पर अपनी पोस्टों का अनुवाद जरूर कर देखें कि वह अंग्रेजी में कैसे आ रहीं हैं। हालांकि लोग उछल रहे हैं कि ‘हिंदी अंग्रेजी अनुवाद टूल‘ आ गया तो हमें अंग्रेजी में भी पढ़ा जायेगा तो उन्हें पहले यह भी तो देखना चाहिए कि उनके पाठ अनुवाद होकर अंग्रेजी में पढ़ने योग्य हैं कि नहीं। इसके साथ अभ्यास करने से हो सकता कि कुछ लोग अपने पाठ इस तरह बना लें कि अंग्रेजी के पाठक उनको आसानी से पढ़ सकें। महत्वपूर्ण बात यह है कि जो शायद हिंदी के लेखक कभी अंग्रेजी और उर्दू शब्दों के प्रयोग करने की आदत से पीछा नहीं छुड़ा सके वही काम यह टूल उनसे करा लेगा, अगर वह यह चाहते हैं कि अंग्रेजी के पाठक भी उन्हें पढ़ें। कुल मिलाकर आने वाला समय बहुत दिलचस्प रहने वाला है। हम तो लिखते रहेंगे जब तक अवसर मिल रहा है। आखिर हमें लिखने और प्रयोग करने में क्या हर्ज है?  </h4>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जब लोग अपने दिल की बात लिख देते हैं-आलेख ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=405</link>
<pubDate>Mon, 12 May 2008 14:40:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[कल  मीनाक्षी ने मुझे हतप्रभ कर दिया क्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कल  मीनाक्षी ने मुझे हतप्रभ कर दिया क्योंकि अपने ब्लाग (शब्द पत्रिका) पर मैंने जो लेख रखा था उस पर मुझे कोई टिप्पणी अपेक्षित नहीं थी, पर महेंद्र मिश्र जी और मीनाक्षी जी ने त्वरित टिप्पणी देकर मुझे यह सोचने को बाध्य किया कि आखिर मैं इस हिंदी ब्लाग जगत को क्या समझूं?</p>
<p>पिछले दिनों श्री समीरलाल जी की बात को ध्यान में रखते हुए मैंने आज एक योजना बनाई। सोचा कि चलो आज  से दूसरों के ब्लाग सामने रखकर कविता लिखेंगे और टिप्पणी के रूप में भी रखेंगे और अपनी पोस्ट भी तैयार हो जायेगी। दूसरा लक्ष्य था कि जरा आज हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाने वाले एग्रीगेटर ब्लागवाणी को जरा ध्यान से भी देखें क्योंकि मैं किसी एक एग्रीगेटर  पर ब्लाग देखने को कभी वरीयता नहीं देता। सभी जगह अपने विचार के अनुसार जाता ही रहता हूं। सबसे पहला ब्लाग श्री अनिल रघुराज जी का सामने आया। मैने उसे ध्यान से पढ़ा। मुझे लगा कि इस पर मेरे लिये भी कुछ लिखने को है। इसीलिये एक कविता लिखी और वहां कमेंट के रूप में रख दी। वहां से लौटकर मैंने सोचा लोग चालाकी समझ जायेंगे इसलिये एक कविता और जोड़कर अपनी पोस्ट बनायी।</p>
<p>इसी बीच थोड़ा काम से चला गया और फिर आकर ब्लागवाणी खोली। मैंने सोचा कि चलो कोई और विषय देख लें। वहां देखा तो मदर डे पर अधिक पोस्टें थीं और सोचा कि बना लें कोई हास्य कविता और सब जगह पेस्ट कर दें पर फिर लगा कि उसमें कुछ ऐसा वैसा भी  आ सकता है कि जो किसी कि भावना आहत हो। हालांकि मैं उसमें ऐसा कुछ नहीं लिखता पर हास्य कविता ही अपने आप में ऐसी चीज है कि किसी को भी लग सकता है कि देखो हम तो कितना गंभीर हैं और यह हंस रहा है। अनेक पोस्टें देखीं और लगा कि चलो यह नुस्खा आगे भी आजमायेंगे।  कुल मिलाकर निराश होकर वहां से लौटे। उसी समय एक दोस्त का फोन आया कि आज कुछ ब्लाग पर लिख रहे हो? तो हम देखें। यार, तुम्हारे साथ एक मुसीबत यह है कि इतने ब्लाग मना रखें पता हीं नहीं पड़ता कि किस पर नयी पोस्ट है? मैं तो वह बीस हजार वाली शब्द पत्रिका ही खोलता हूं।’</p>
<p>हमें कुछ नहीं सूझा हमने कह दिया-‘‘आज कहीं घूमे आओ। हम चिंतन लिख रहे हैं और यह शब्द पत्रिका पर ही आयेगा। वैसे तुम कोई भी ब्लाग खोलकर पीछे भी पढ़ा करो। वैसे भी तुम भुगतान के रूप में छहःपोस्ट पढ़ते हो एक टिप्पणी लगाते हो। हमारे मित्रों के ब्लाग पढ़कर हमें उनके बारे में पूछते हो। हमारे कहने के बावजूद वहां टिप्पणियां नहीं लगाते। अगर चाहते हो कि अंतर्जाल पर अच्छा पढ़ा जाय तो उस पर कमेंट लगाओ। अब क्या हम लेखक ही इसका भी दायित्व उठायें? हमें भी क्या मिलता है।’</p>
<p>मित्र का फोन रखते ही हमारे मुख से निकला चिंतन शब्द हमारे दिमाग में घुस गया और फिर बिना किसी संदर्भ के लिखने का मन बनाया। आंखें बंद कीं(कृतिदेव पर लिखते समय ऐसा ही करता हूं) और लिखने बैठ गया। मन में विचारों का क्रम तो सुबह से चल रहा था और एक बार आया कि इसे रोककर दूसरी पोस्ट लिखें पर फिर मैंने सोचा कि अब बहुत हो गया अस्वाभाविक रूप से लिखते हुए। मैनें अपनी पोस्ट लिखी। पोस्ट रखते समय मैं यह अनुमान कर रहा था कि ब्लागवाणी पर अधिकतम पांच का आंकड़ा शायद ही छू पाये। सामान्य शीर्षक और फिर साथ में आलेख का संकेत ब्लागवाणी पर हिट दिलाएगा यह आशा मैं नहीं कर रहा था। न ही अपने मित्र ब्लाग लेखकों से यह आशा कर रहा था कि वह टिप्पणी लिखने के लिए इसे पढ़ेंगे क्योंकि इसके लिये कोई और पोस्ट भी आ सकती है। रखते समय यह भी जानता था कि यह पोस्ट आगे चलकर लंबे समय तक हिट लेती रहेगी और इस पर टिप्पणियां आतीं रहेंगी।</p>
<p>मैं अब ऐसी पोस्टें नहीं लिखना चाहता जो सामयिक विषयों से संबंधित हों। उसमें मेरा परिश्रम हो समय व्यर्थ ही नष्ट होता है।</p>
<blockquote><p><strong>मीनाक्षी जी ने लिखा<br />
"पढ़ते तो हमेशा है और सोचते हैं कि आप के लेख टिप्पणी के<br />
मोहताज़ नहीं . आज अनायास जी चाहा कि अपने मन के भाव<br />
लिख डालें. आपके सभी  ब्लॉग एक से बढ़कर एक हैं. जीवन को<br />
आसान बनाने के छोटे छोटे मंत्र यहाँ हैं जो बड़ी गहरी बात समझा<br />
जाते हैं. आभार"</strong></p></blockquote>
<blockquote><p><strong>महेंद्र मिश्रा जी ने लिखा<br />
"अपने अंदर ही यह अहसास होता हैं कि हम केवल अपने मुख से अपनी झूठी प्रशंसा  कर रहे हैं।<br />
बहुत बढ़िया आलेख प्रस्तुति के लिए धन्यवाद"</strong></p></blockquote>
<p>टिप्पणियां बहुत आतीं हैं पर कुछ लोग अपने मन की बात इस तरह रख देते हैं तब मैं सोचता हूं कि इनके लिए लिखते रहना चाहिए। कुछ दिनों से मेरा विचार तो यह भी बनता और बिगड़ता  रहा है कि नारद और चिट्ठा जगत ने मेरे जो दो ब्लाग मुझसे पूछे बगैर ही अपने यहां दिखाने शुरू किये हैं अब उन पर ही लिखूं-क्योंकि ब्लागवाणी पर जब कोई हिट की चर्चा मेरे ब्लाग पर करता है तो मुझे अपना ध्यान भंग होता नजर आता है। आज मीनाक्षी जी की टिप्पणी ने मेरे इस विचार को समाप्त ही कर दिया है। मेरा लक्ष्य आम पाठक है और अपनी बात वहां तक पहुंचाने से ही मुझे संतुष्टि होती है। टिप्पणियां लिखता हूं और लोग मुझे देते हैं। इसे मैं एक सामाजिक व्यवहार की तरह मानता हूं-जैसे एक दूसरे से नमस्कार या प्रणाम करना। मेरी अनेक पोस्टें बिना टिप्पणी के आतीं हैं।  आम पाठक की तरह ब्लाग लेखकों में भी विविध रुचि वाले लोग हैं पर चिंतन भी कोई पसंद करता हूं यह मुझे आज पता लगा।<br />
कुछ ऐसी भी घटनाऐं हुईं है कि मैं किसी वरिष्ठ ब्लाग लेखक की पोस्ट पर टिप्पणियां रखकर आया क्योंकि उनका लेखकर मुझे पसंद आया। उन्होने मेरी पंद्रह-पंद्रह दिन पुरानी पोस्ट पर टिप्पणी लिख कर जो कहा उसे यहां दोहराने से कोई मतलब नहीं है। एक ब्लाग लेखक ने लिखा कि‘आपकी हास्य कविता देखकर तो मैं यह समझा कि आप को आम हास्य कवि हैं पर आपका इस ब्लाग की यह  इतनी गहन चिंतन वाली पोस्ट देखकर तो मै हैरान रह गया हूं।’</p>
<p>मैं बहुत पोस्टें लिखता हूं और मुझे नियमित टिप्पणियां देने वाले मित्र सभी पर आयें यह संभव नहीं है और आयें तो मुझे यह लगेगा कि यह मेरी वजह से कष्ट उठा रहे है।</p>
<p>अगर मेरा अनुमान सही है तो अनेक आम पाठक भी टिप्पणियां लिख रहे हैं। कुछ लोगों के पास हिंदी टूल मैंने भिजवाया है। इस समय ब्लाग लेखकों में तमाम तरह की निराशाजनक बातों की चर्चा चल रही है। ऐसे में आम पाठक अगर यह सोचता है कि उसे और अच्छा लिख हुआ पढ़ने को मिले तो उसे भी अब टिप्पणियों को बोझ उठाना होगा। आम पाठकों से सहयोग के बिना अंतर्जाल पर हिंदी में बहुत अच्छा और सार्थक लिखना कठिन है। मेरे ब्लाग पर आने वाले पाठक साइडबार से दूसरे के ब्लाग पर जाते हैं तो मेरी उनसे अपेक्षा रहती है कि वहां वह कोई टिप्पणी जरूय लिखें। सभी ब्लाग पर कमेंट के कालम हैं।</p>
<p>अब हिंदी ब्लाग जगत पर अनेक लेखक साहित्य-व्यंग्य, कहानी, कविता और आलेख-लिख रहे हैं और अंग्रेजी-हिंदी अनुवाद टूल को जिस तरह गूगल हिंदी पृष्ठों के साथ जोड़ रहा है उससे लग रहा है कि हिंदी के कई नये लेखक  अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना और भाषा का नाम रोशन करेंगे।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नारद और चिट्ठा जगत के मित्रों,जरा ब्लोगवाणी को चेक करें]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=23</link>
<pubDate>Sun, 11 May 2008 17:35:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=23</guid>
<description><![CDATA[आज अनिल रघुराज की एक पोस्ट ^एक हिंदुस्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आज अनिल रघुराज की एक पोस्ट<a href="http://diaryofanindian.blogspot.com/"> ^एक हिंदुस्तानी की डायरी में^ </a> पर मैंने एक कमेंट लगाई। यह कमेंट दूसरे नंबर पर लगायी थी। अभी शाम को मैं जब ब्लागवाणी चेक कर रहा था तो अनिल रधुराज जी की पोस्ट पर चार कमेंट चमक रहे थे। इसमे सबसे ऊपर कोई एक महिला ब्लाग लेखिका का नाम था और सबसे आखिरी एक ब्लाग लेखक का। मैंने पुनः ब्लाग खोलकर देखा तो ब्लाग लेखक ने सातवें और आठवें नंबर पर था। </p>
<p>मैं अपना नाम देखकर यह सोच रहा था कि यह नीचे से ऊपर के क्रम में होंगे पर जब ब्लाग खोलकर देखा तो मुझे हैरानी हुई। आखिर यह क्या माजरा है? एक तरफ कुछ लोग कहते फिर रहे है कि टिप्पणियां करो और दूसरी तरफ ऐसा? अब यह कैसे संभव है। अभी जब यह पोस्ट मैं लिख रहा था तब लाईट चली गयी और लौटकर आया तो देखा कि उड़ल तश्तरी जी की कमेंट वहां दूसरे नंबर पर चमक रही है। क्या एग्रीगेटर को यह अधिकार है कि चाहे जिसकी टिप्पणियां दिखायेगा? नारद और चिट्ठा जगत वाले चेक करें बतायें यार, यह क्या गड़बड़झाला है? मै भ्रम में हूं या ब्लागवाणी वाले खुशफहमी में।<br />
अपनी बात अपने नाम से रखें तो बेहतर है क्योंकि अनामों का साथ मेरे लिये उपयोगी नहीं होगा क्योंकि यह बात निकली है तो दूर तक जायेगी। वैसे मैं किसी प्रकार के विवाद पसंद नहीं करता पर मेहनत कर लिखता हूं और एक मजदूरी की तरह ही हूं। जब कोई किसी की मेहनत पर आक्षेप करता है तब मुझे मजबूर होकर संघर्ष करना पड़ता है अब कोई यह मत कहना कि ज्ञानी होकर ऐसी बात कर रहा है। अब यह बात मत कहना कि दूसरों को प्रोत्साहन की जरूरत है तुम्हें नहीं। याद रखना अपनी मेहनत का मजाक उड़ाने वालों पर मुझे हास्य कविता बरसाने का अभ्यास इसी अंतर्जाल पर हुआ है। कोई तकनीकी गड़बड़ी बताने से पहले यह भी सोच लेना 1983 में कंप्यूटर पर हाथ रखा था। </p>
<p>-------------------------------------------------------------------------<br />
एक हिंदुस्तानी की डायरी में अनिल रघुराज 39 बार पढ़ा गया </p>
<p>--------------------------------------------------------------------------------<br />
टिप्पणियां (कुल: 8)<br />
बोधिसत्व-जय हो भाई..पर यह साहित्यकार कौन है जो नामर्द है......<br />
Udan Tashtari-हमारी आवाज ने जगा ही दिया. बात में तो दम है मगर हम...<br />
आभा-तेरहवी की बात क्यों कर रहे हैं...हमें तो आपकी पोस्...<br />
विजयशंकर चतुर्वेदी-रघुराज भाई, अपन तो सोच रहे थे कि आप गर्मियों की छु... </p>
<p>---------------------------------------------------------------------------<br />
यह मेरा ब्लोग केवल नारद और चिट्ठजगत पर ही है इसलिए इस पर लिख कर तसदीक करना चाहता हूँ । फिर आगे कुछ और भी लिखेंगे।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आम आदमी बने रहने की कोई नहीं सोचता-आलेख]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=404</link>
<pubDate>Sun, 11 May 2008 09:58:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=404</guid>
<description><![CDATA[कहने को कई लोग आपसी वार्तालाप में ऐसी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कहने को कई लोग आपसी वार्तालाप में ऐसी टिप्पणियां कर जाते हैं जो उनके स्वयं के समझ में नहीं आतीं तो किसी अन्य व्यक्ति के समझ में क्या आ जातीं  हैं।</p>
<p>एक सज्जन ने कहा कि‘नेता बनने की बजाय मैं भिखारी बनना चाहूंगा।’</p>
<p>एक सज्जन को मैने कहते सुना-‘मैं संत की बजाय वैश्या बनना चाहूंगा।’</p>
<p>किसी ने कहा-‘मैं पुलिस वाला बनने की बजाय मूंगफली बेचने वाला बनना चाहूंगा।</p>
<p>मतलब यह कि किसी खास आदमी से नाराज होने के कारण  कोई व्यक्ति वैसा नहीं बनना चाहता-इस बात की घोषणा तो वह करता है पर आम आदमी बने रहने की कोई इच्छा छोड़कर वह कुछ बनना चाहता है।<br />
हर कोई अपने पास शक्ति के स्त्रोत बनाये रखना चाहता है। पद, पैसा और प्रतिष्ठा पाने के मोह में सब अंधी दौड़ प्रतियोगिता के धावक है। हर कोई आम आदमी की जमात से बाहर  निकलकर खास आदमी की तरह चमकना चाहता है। अपने से दूर उसे आकर्षण का केंद्र दृष्टिगोचर होता है। वहां पहुंचता है तो उसे फिर वही अंधेरा दिखाई देता है। वह फिर दूसरी जगह आकर्षण की तलाश करता है। कोई पद मिल गया तो उससे संतोष नहीं होता उसके साथ अन्य लाभ भी होना चाहिए। धन का लाभ होता है तो वह अन्य प्रकार के लालच भी करता है। घर के बाहर किसी अन्य महिला से संपर्क बने यह भी कुछ लोग अपने अंदर विचार करते हैं। कोई व्यक्ति उसके सामने सच न कहे यह अहंकार का भाव उसमें आता है। अपने ही बनाये गये जाल में पकड़ा   जाता है और फिर  कहता है कि ‘‘मेरे पास सब है पर शांति नहीं है जिसके पास शांति है वही सुखी है।‘</p>
<p>जिसके पास धन प्रचुर मात्रा में नहीं है, न वह किसी उच्च  पद पर विराजमान है, न किसी उच्च पद वाले व्यक्ति का हाथ उसके ऊपर है और न ही वह देह से बलवान होता  है, उसे भी अपने ऐसे गुणों का बखान करने की आदत होती है जो उसमें है ही नहीं। वह अपने को खास आदमी साबित करना चाहता है। हर आदमी  आम है पर खास कहलाना चाहता है। यह भाव  है आदमी के चरित्र और विचारों में पतन का कारण ।</p>
<p>एक बार आम आदमी होने का बोध धारण कर लो और खास आदमी को दूर से देखकर ही अपनी नजर फेर लो। ऐसा नहीं कर सकते  तो पहले उस खास आदमी की दिनचर्या देखो उसमें ऐसा कुछ नहीं होता जो आम आदमी में नहीं होता। उसमें भी  वैसे ही गुण और अवगुण होते हैं जैसे आम आदमी में होते हैं। जब अपने आम आदमी की तरह अनुभव करोगे तुम्हारे ज्ञान चक्षु खुल जायेंगे। यह अनुभव कर सकते हो कि उसके और तुम्हारे अंतर्मन में कोई अंतर नहीं है। आम आदमी होने को अर्थ है जीवन के प्रति दृष्टा भाव रखना। जब हम दृष्टा भाव से देखेंगे तब हमारे मन की बेचैनी दूर हो जायेगी। हमारे जैसी हालत में सब जी रहे हैं। हां, कुछ बाहरी दिखावा करते हैं और उनके देखकर हम भी उन जैसा करने लग जाते हैं फिर अपने अंदर ही यह अहसास होता हैं कि हम केवल अपने मुख से अपनी झूठी प्रशंसा  कर रहे हैं। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इंसान तो कठपुतली है-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=153</link>
<pubDate>Sun, 11 May 2008 06:55:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=153</guid>
<description><![CDATA[आदमी के पंख नहीं होते
जो वह आसमान में उ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;">आदमी के पंख नहीं होते<br />
जो वह आसमान में उड़ सके<br />
पर उसका मन बिना पंख के ही<br />
उड़ता चला जाता है<br />
उसके पांव आदमी की काबू में होते नहीं<br />
पंरिदे बनाते हैं लोगों के घर में भी घरोंदे<br />
पर उनके बिस्तर पर सोते नहीं<br />
खुशी में झूमकर नाचता इंसान<br />
दुःख  में अपने ही आंखो से बहती<br />
अश्रुधारा में करता स्नान<br />
पर परिंदे कभी रोते नहीं<br />
अपने मन के इशारे पर<br />
कठपुतली की तरह नाचता<br />
कितने भी दावे करे कि<br />
खुद ही चल रहा है इस जीवन पथ पर<br />
अपनी अक्ल पर है उसका काबू<br />
कराती है इंसान की  जुबान दावे आजाद होने के<br />
पर कभी वह सच्चे होते नहीं<br />
अपनी जरूरतों से आगे नहीं उड़ते<br />
इसलिये परिंदे कठपुतली नहीं होते<br />
यह सच है<br />
अपनी ख्वाहिशों के हमेशा गुलाम<br />
रहने वाले  इंसानों के लिये<br />
साबित करना बहुत मुश्किल है कि<br />
वह कठपुतली होते नहीं<br />
..............................................................</span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;">कठपुतली ने चिडि़या से कहा<br />
‘देखो, मैं नाच  और गा सकती हूं<br />
पर तुम ऐसा नहीं कर सकती<br />
मुझे तुम पर तरस आता है’</span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;">चिडि़या ने उसकी डोर पकड़ने वाल  नट की<br />
गर्दन पर चांेच मारी तो वह चिल्लाया<br />
छूट गयी उसके हाथ से  डोर<br />
उसने कठपुतली को इस तरह नीचे गिराया<br />
चिडि़या ने लौटकर चिड़े से कहा<br />
‘आदमी कठपुतली को आगे कर बोलता<br />
अपने मन के इशारे पर डोलता <br />
बोलने से पहले कभी शब्द नहीं तोलता <br />
दावे करता है आकाश में उड़ने का<br />
कभी ऐसा नहीं करता तब  मचा रहा है शोर<br />
उड़ता तो क्या हाल करता<br />
सर्वशक्तिमान ने इसलिये इसको पंख नहीं लगाया<br />
उड़ने के ख्वाब देखता रहे इसलिये<br />
इंसान को मन की कठपुतली बनाया<br />
..............................................................</span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;">दीपक भारतदीप</span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;">my other web page</span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;"><a href="http://dpkraj.blogspot.com">http://dpkraj.blogspot.com</a> </span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;"><a href="http://deepkraj.blogspot.com">http://deepkraj.blogspot.com</a></span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;"><a href="http://teradipak.blogspot.com">http://teradipak.blogspot.com</a></span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;"><a href="http://terahdeep.blogspot.com">http://terahdeep.blogspot.com</a></span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;"><a href="http://zeedipak.blogspot.com">http://zeedipak.blogspot.com</a>  </span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कुछ दृश्य निगाहों से पढ़े जाते हैं-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=373</link>
<pubDate>Sat, 10 May 2008 18:14:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=373</guid>
<description><![CDATA[
कुछ दृश्य इस तरह सामने आते हैं
कि शब्द ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="padding-left:30px;">
<strong><span style="color:#003300;">कुछ दृश्य इस तरह सामने आते हैं<br />
कि शब्द हो जाते  खामोश<br />
निगाहों से वह पढ़े जाते हैं<br />
लिखकर कोई क्या बतायेगा<br />
तस्वीरों में चेहरे<br />
सारा माजरा बयां कर जाते हैं<br />
जो देखकर भी न समझे<br />
वह पढ़कर भी क्या समझेंगे<br />
हृदय में बसता हो जीवन<br />
संवेदनाओं की बहती हो जब पवन<br />
चक्षुओं से देखकर ही<br />
स्पर्श अनुभव किये जाते हैं<br />
जागते हुए भी सोते हैं कई लोग<br />
उनको समझाने से मतलब बेमानी हो जाते हैं</span></strong></p>
<p style="padding-left:30px;"><strong><span style="color:#003300;">..........................<br />
दीपक भारतदीप<br />
</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[महिला बुद्धिजीवी सम्मेलन-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=152</link>
<pubDate>Sat, 10 May 2008 13:16:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=152</guid>
<description><![CDATA[सम्मेलनों के आयोजने करने के आदी लोगों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सम्मेलनों के आयोजने करने के आदी लोगों की संस्था के पदाधिकारियों के  दिमाग  में ‘बुद्धिजीवी महिला सम्मेलन’ करवाने का विचार आया। कुछ लोगों ने इसका विरोध किया और कुछ लोगों ने समझाया। एक समझदार ने कहा-‘‘इस देश की शिक्षा पद्धति ने लोगों को गहरे ज्ञान से वंचित किया है और सभी प्रकार के बुद्धिजीवी चाहे वह  महिला हो या पुरुष केवल वाद का नाम और नारे लगाकर ही चलते हैं और फिर आपस में झगड़ा करते हैं। सामान्य आदमी तो बैठक आदि में जाता नहीं और जाता है तो खामोशी से चला जाता है और चार बुद्धिजीवी पूरुष जहां मिलते है लड़ पड़ते है, उनको हाथ पकड़ कर या धमकी देकर समझाया जा सकता है  कहीं महिला बुद्धिजीवी कहीं झगड़ा कर बैठीं  तो उनको समझाना कठिन हो जायेगा।’</p>
<p>   मगर संस्था के लोग नहीं माने। सम्मेलन कराने का नशा उन पर सवार था। उनका विचार था कि इस बहाने संस्था का नाम पुनः चमकेगा जो पहले ही डूब रहा है।</p>
<p>सम्मेलन घोषित हो गया। ढूंढ-ढूंढकर बुद्धिजीवी महिलाओं को आमंत्रण भेजा गया और फिर विषय रखा गया ‘सास-बहु और ननद-भाभी  के मधुर संबंध कैसे हों’?</p>
<p>संस्था के सभी लोग आयोजन कर चंदा वसूलने और फिर आत्मप्रचार के काम में महारात हासिल किये हुए थे पर फिर भी उनमें से कुछ कच्चे पड़ गये और उन्होंने फैसला किया कि वह इस आयोजन से दूर रहेंगे। वजह यह थी कि उनके घर की महिलायें भी इन आयोजनों में आतीं थीं और उनको लगा कि इस तरह के आयोजन से उनके घरेलू विवाद सबके सामने आयेंगे।</p>
<p>हालांकि संस्था के लोगों ने इस बात का पुख्ता इंतजाम किया कि उनके घर की महिला सदस्य इनमें शामिल न हों और वह बुद्धिजीवी भी हों तो उनको सूचना नहीं भेजी जाये। इसलिये जिसका नाम भी आमंत्रण पत्र पर लिखा जाता था पहले इस बात की तस्दीक कर ली जाती थीं कि वह संस्थो के सदस्यों की घर से संबद्ध न हों।</p>
<p>सम्मेलन का दिन आया तमाम महिलायें कार्यक्रम में पहुंची। कुछ को भाषण देना था तो कुछ को केवल सुनकर तालियां बजानीं थीं। तालियां बजाने के लिये भी बकायदा पैसे देने का आश्वासन दिया गया था। आयोजक जानते थे कि बोलने के लिये बुद्धिजीवी महिलायें तो मिल जायेंगी पर ताली बजाने के लिये उनकी उपलब्धता संदिग्ध है। इसलिये कुछ पुरुंष भी किराये पर बुलाये गये और उनको महिला अधिकारों के लिये लड़ने वाले जुझारू कार्यकर्ता कर प्रचारित किया गया।</p>
<p>तमाम सावधानियों के बावजूद आयोजक आमंत्रण पत्र भेजने में गल्तियां कर गये। उन्होने कई ऐसी बुद्धिजीवी महिलाओं को बोलने के लिये आमंत्रण भेज दिया जिनके आपस में सास बहु और ननद-भाभी के रिश्ते थे। उनको इस बात का ध्यान ही नहीं रहा कि बुद्धिजीवी घरों में ‘बुद्धिजीवी’ बहु की मांग ही होती है यह अलग बात है कि कोई भी बुद्धिजीवी सास दहेज की राशि को लेकर वैसे ही कोई समझौता नहीं करती जैसे कि कोई सामान्य सास।</p>
<p>सम्मेलन शूरू कराने के लिये एक पुरुष सदस्य माइक पर आया और बोला-‘‘आज हम अपने पहले बुद्धिजीवी सम्मेलन.........................’’</p>
<p>उसकी बात पूरी होने से पहले ही एक महिला कुर्सी से उठ कर खड़ी हो गयी और बोली-‘क्या इस काम के लिये कोई महिला नहीं थी। हटो मैं संचालन करती हूं।’</p>
<p>वह मंच पर चढ़कर आ गयी और उससे माइक लेकर स्वयं डट गयी।उस संचालक पर तो जैसे वज्रपात हुआ क्योंकि वह उस संस्था का अध्यक्ष था और उसी ने ही इस सम्मेलन के प्रस्ताव को रखा था और पास कराया था। उसका मूंह उतर गया तो संस्था में उसके वह प्रतिद्वंद्वी खुश हो गये जो इस सम्मेलन को कराने के विरोधी थे।</p>
<p>उस महिला ने अखबारों की कटिंग दिखाकर  कुछ ऐसी खबरें जिनमें महिलाओं के खिलाफ अपराध किये गये थे उनको पढ़ना और उसके लिये पुरुष प्रधान समाज को जिम्मेदार ठहराने का सिलसिला शुरू किया। </p>
<p>तब एक दूसरी महिला खड़ी होकर बोली-‘‘यहां हमें  बताया गया है कि आज की चर्चा का विषय है ‘सास-बहु और ननद-भाभी  के मधुर संबंध कैसे हों’? आप तो विषय से हटकर बोल रहीं हैं।’</p>
<p>उसके पास ही उसकी बहु भी बैठी थी वह अपनी सास से बोली-‘‘अत्याचार तो अत्याचार है। खबर बतायेंगी तभी तो यह पता लगेगा कि कहां-कहां बहुओं पर अत्याचार हुए।’</p>
<p>तब दूसरी बुद्धिजीवी महिला भी माइक पर पहुंच गयी और उससे छीनकर बोली-‘हम पुरुषों द्वारा तय किये गये विषय पर नहीं बोलेंगे। हमें अपना विषय तय स्वयं करना चाहिए।’</p>
<p>अब तो वहां हलचल मच गयी। बहुएं और भाभियां चाहतीं थीं कि उनके साथ जो दुव्र्यवहार घर में होता है उस पर चर्चा की जाये और सास और ननदें चाहतीं थीं कि इसमें बहुओं द्वारा अपने अधिकारों के दुरुपयोग पर विचार किया  जाये।</p>
<p>माहौल गर्मा गया था और आयोजकों की घिग्घी बंध गयी थी। संस्था के एक सदस्य ने कहा-‘आज का किसी के मरने की खबर देकर स्थगित करते हैं और अगली तारीख पर आयोजित करेंगे। अभी जो नाश्ते का समय घोषित करते हैं फिर इसे स्थगित कर देते हैं।’</p>
<p>संस्था का अध्यक्ष बोला-‘‘पर वहां यह घोषित करने के लिये भी तो कोई महिला चाहिए। देखा नहीं मुझे किस तरह वहां से भगा दिया।</p>
<p>माहौल तनाव से भरा था। अब आयोजकों के समझ में नही आ रहा था कि क्या करें? किसकी मदद लें? सब बुद्धिजीवी महिलायें तो जोर-जोर से बोल रहीं थीं। अचानक उनकी नजर एक व्यंग्यकार महिला पर पड़ गयी। उस सभा में वही एक खामोश बैठी थी और मंद-मंद मुस्करा रही थी। मजे की बात यह कि उसे नहीं बुलाया गया था वह तो कहीं से सुनकर वहां आयी थी। अध्यक्ष उसके पास गया और बोला-‘‘आप हमारी कुछ मदद करे। पहले सबके लिये नाश्ते की घोषणा करें थोड़ी देर बाद किसी बहाने इस स्थगित कर दें।’</p>
<p>व्यंग्यकार महिला ने कहा-‘‘पर मैं तो यहां बिना बुलाये आयी हूं।  वैसे भी मैं केाई बुद्धिजीवी नहीं हूं बल्कि व्यंग्यकार हूं। नहीं.....नहीं............तुम क्या समझते हो कि मेरा कोई सम्मान नहीं है।’</p>
<p>उसने जब अधिक याचना की तो वह तैयार हो गयी। उसने मंच संभाला और पहले नाश्ते की घोषणा कर माहौल को ठंडा किया फिर थोड़ी देर बाद माइक पर आयी और बोली-‘‘ अब हम सब लोगों ने नाश्ता कर लिया है पर हमारा विषय तय नहीं है इसलिये अगली तारीख पर विषय तय कर लेंगे तब आपको सूचना दी जायेगी। हम फिर मिलेंगे।’</p>
<p>सब महिलायें  थोड़ा बहुत विरोध कर वहां से चलीं गयीं। थोड़ी देर बाद वह व्यंग्यकार महिला बाहर निकली तो देखा एक खाकी पेंट, सफेद शर्ट और सिर पर टोपी पहने एक आदमी खड़ा उसे देख रहा था और जैसे ही नजरें मिलीं तो वह खिसकने को हुआ तो वह पीछे से चिल्लाकर  बोली-‘अरे, तुम व्यंग्यकार होकर इस तरह यहां क्यों खड़े हो। अच्छा अपने लिये विषय तलाशने चपरासी की भूमिका में आये हो। अगर मुझे पता होता तो सब महिलाओं को बता देती और तुम्हारी धुलाई करवाती। तुम्हारे व्यंग्य वैसे ही मेरे समझ में नहीं आते पर तुम हो कि लिखना बंद नहीं करते।</p>
<p>वह अपनी साइकिल उठाकर बोला-‘‘अब हम दोनों ही यहां से निकल लें तो अच्छा रहेगा। मै इस वेश में इसलिये आया था कि चपरासी तो चपरासी होता है उसकी उपस्थिति पर भला कौन आपत्ति करता है पर अगर सूटबूट पहनकर आता तो हो सकता है कि बाहर भी कोई खड़ा नहीं रहने देता। यहां दोनों ही बिना बुलाये आये हैं अगर मैं इस पर व्यंग्य लिख दूं और महिलाओं का तुम्हारे बिना आमंत्रण के यहां आगमन की बात बता दू तो कैसा रहेगा? और बुद्धिजीवी और व्यंग्यकार में अंतर होता है ऐसा मैंने तुम्हारे व्यंग्यों में ही पढ़ा है।</p>
<p>महिला व्यंग्यकार ने कहा-‘ महिलायें अभी भी दूर नहीं हैं बुलवा लूं। खैर छोड़ो..............फिर उनको भी यह पता चल जायेगा कि मैं भी यहां बिना बुलाये आयी हूं और आयोजकों कहने से उनका सम्मेलन खत्म कराया गया है।’’</p>
<p>अगले दिन अखबार में सम्मेलन के उल्लास से संपन्न होने का समाचार था और व्यंग्यकार महिला का नाम तक उसमें नहीं था। <br />
<strong>यह हास्य व्यंग्य काल्पनिक रचना है और किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई लेना देना नहीं हैं अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा। इन पंक्तियों को लेखक किसी भी महिला व्यंग्यकार से कभी नहीं मिला<br />
</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अंग्रेजी नाम, हिंदी नाम-आलेख ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=151</link>
<pubDate>Fri, 09 May 2008 17:08:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=151</guid>
<description><![CDATA[अंतर्र्जाल पर हिंदी लिखते हुए मुझे एक ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h3>अंतर्र्जाल पर हिंदी लिखते हुए मुझे एक बात अनुभव हो रही है कि यहां रूढ़ता का भाव अपने हृदय में रखने को कोई मायने नहीं है। अंतर्जाल पर अनेक वेब साइटों और ब्लाग पर निकल रही हिंदी  पत्र-पत्रिकाओं के नाम हिंदी में है तो अंग्रेजी में नहीं और अंग्रेजी में है तो हिंदी में नहीं। मैं दोनों से संबंध रखता हूं और मेरी रुचि इस बात में है कि किस तरह अंतर्जाल पर हिंदी के पाठक अधिक से अधिक सक्रिय हों। मेरी कुछ पत्रिकाएं ब्लाग पर हैं और कुछ वेब साईटों की पत्रिकाओं पर मैं लिखता हूं। मैंरे अपने वेब पृष्ठों (ब्लाग) पर बनी पत्रिकाओं के नाम हिंदी में रखे हैं। बीच में मैंने अपनी इन पत्रिकाओं का अंग्रेजी नाम भी रखा था पर हिंदी एग्रीगेटरों से उनके जुड़ने  के बाद अंग्रेजी नाम हटा लिये। इसका पछतावा मुझे आज तक है।</h3>
<h3>एक बात तय है कि विश्व में भाषा की दूरियां अब कम हो रही हैं और ऐसे में वेब साइटों और वेब पृष्ठोंं पर बनी पत्र-पत्रिकाओं को किसी भाषाई रूढ़ता से उबरना होगा तो साथ ही अपनी मौलिकता से निर्वाह करना होगा। मैं बात कर रहा हूं उनके वेब साईटों और वेब पृष्ठों पर बने पत्र-पत्रिकाओं के शीर्षक और  नाम की। कई जगह पत्र-पत्रिकाओं का नाम अंग्रेजी है पर हिंदी में न होने के कारण उसके शब्द सर्च इंजिन में डालने पर वह उसके सामने नहीं आती तो अंग्रेजी मेें न होने के कारण उसका भी यही हश्र होता है। अब अनुवाद  टूल आने से हमें अब इस संभावना पर भी विचार करना चाहिए कि देश विदेश के अन्य भाषी लोग हिंदी के लेखकों और संपादकों से अपना संपर्क रखना चाहेंगे और यकीन मानिए वह हिंदी शब्द सर्च इंजिन में डालकर तलाश नहीं करेंगे। ऐसे में कोई हिंदी भाषी पत्र-पत्रिका (जो वेब साईट या वेब पृष्ठों   पर हैं) अगर अपना नाम अंग्रेजी में रखती है तो उस पर आपत्ति नहीं है पर अगर वह हिंदी में भी रखें तो अच्छी बात है। वैसे यह आवश्यक नहीं है कि अंग्रेजी के पाठक हिंदी की अंतर्जाल पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ना चाहें पर यह एक संभावना है जो हाल ही में बनी है। वैसे  अंग्रेजी नाम की वजह से कई पत्र-पत्रिकाएं  अन्य भाषियों में ही क्या अपनी भाषा वालों मे भी पैठ भी नहीं बना पाईं।</h3>
<h3>एक बात और है कि हिंदी भाषी पत्र-पत्रिकाओं के अंग्रेजी शीर्षक या नाम रखने वालों को यह समझना चाहिए कि ‘हिंदी’ में नाम होने से ही उनकी मौलिकता प्रकट होगी न कि अंग्रेजी से। अगर कोई विदेशी पाठक हिंदी सामग्री  को पढ़ना चाहेगा तो उसकी दृष्टि में सम्मान तभी बढ़ेगा जब हिंदी में शीर्षक होगा भले ही वह सर्च इंजिन में अंग्रेजी शब्द डालकर वहां तक आया हो। इसलिये अंतर्जाल पर वेब साईटों और वेब पृष्ठों (ब्लाग) पर चल रहीं पत्र-पत्रिकाओं को अपने नाम अंग्रेजी नाम के साथ हिंदी में रखना चाहिए, जिनके शीर्षक हिंदी में है वह अगर सोचते हैं कि अन्य भाषियों तक उनके लिए पहुंचना संभव है तो वह उसमें अंग्रेजी नाम भी जोड़ सकते हैं। वैसे श्रेणियों और टैग लगाकर भी यह काम हो ही रहा है। </h3>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जो समझ में आया वही लिख दिया-आलेख ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=521</link>
<pubDate>Fri, 09 May 2008 15:21:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=521</guid>
<description><![CDATA[मेरे मित्र और उड़न तश्तरी ब्लाग के लेख]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मेरे मित्र और उड़न तश्तरी ब्लाग के लेखक श्री समीर लाल वाकई हिंदी ब्लाग जगत के उत्थान के लिए प्रयत्नशील हैं इसमें कोई संदेह नहीं है। वह मेरे ब्लागों पर सबसे अधिक टिप्पणी रखने वाले व्यक्ति हैं और मैं हृदय में उनके प्रति आत्मीयता का भाव रखता हूं पर उसका प्रदर्शन करना मुझे ठीक नहीं लगता। उनकी टिप्पणियां आमतौर से संक्षिप्त और औपचारिक  होती हैं पर उससे अपने अंदर एक प्रसन्नता की लहर दौड़ती है। मैं यह लेख उनकी प्रशंसा या समीक्षा के लिये नहीं लिख रहा हूं बल्कि कल उनकी टिप्पणी में जिस तरह दूसरे ब्लाग और टिप्पणियां लिखने के लिये अभियान चलाने की बात कही है उसी परिप्रेक्ष्य में मेरे मस्तिष्क में कुछ विचार आये जो शायद अलग प्रतीत हों पर  उनको रखना जरूरी समझता हूं। </p>
<p>श्री समीरलाल जी ने हिंदी में ब्लाग बढ़ाने तथा उन पर टिप्पणियां लिखने  की बात कहीं है वह मेरे अभियान का एक भाग है पर मैं हिंदी ब्लाग जगत लिये पाठक जुटाने के अभियान को भी कम वरीयता नहीं देता।  हिंदी ब्लाग में निराशाजनक स्थिति को मैं भी अनुभव करता हूं पर इसके लिये पाठकों की कमी भी एक महत्वपूर्ण पक्ष है। अंतर्जाल  हिंदी ब्लाग के लिये पाठकों की संख्या नगण्य है। इसलिये अनेक ब्लाग लेखक केवल हिंदी के ब्लाग सभी एक जगह दिखाने वाले एग्रीगेटरों पर हिंट पाने के लिये लिखते हैं और वहां साहित्य सृजन जैसा वातावरण अभी नहीं बन पाया है। अनेक ब्लाग लेखक अपने पाठों में यह बात लिख चुके हैं कि वह लिखने तो आये थे साहित्य और यहां अब कुछ अन्य लिख रहे हैं। मैं उनका लिखा पढ़कर यह बात मानता भी हूं कि वह वाकई साहित्य लिखते होंगे। देव और कृतिदेव फोंट में टाईप करने वाले अनेक लेखक यूनिकोड में लिखते हुए ब्लाग पर आये तो स्वयं मूल स्वरूप खो बैठे जिनमें मैं भी स्वयं भी शामिल हूं। अब देव और कृतिदेव को यूनिकोड मेंे बदलने वाला टूल आया है तब अनेक लोग खुश हुए क्योंकि उनको लगा कि वह अब पहले से अच्छे परिणाम निकाल सकते हैं। आज इतना बड़ा लेख लिखने का साहस मेरे अंदर केवल इसीलिये आया क्योंकि  सीधे कृतिदेव में लिख रहा हूं और यह टूल आये अभी अधिक वक्त नहीं हुआ। ऐसे में मुझे विश्वास है कि आगे और ब्लाग लेखक बेहतर लिखकर लेखक जुटाने का प्रयास करेंगे। इस समय जो हिंदी ब्लाग जगत पर लिखा जा रहा है उस पर दृष्टिपात किये बिना हम अगर किसी अभियान पर निकलेंगे तो शायद वहीं होंगे जहां अभी हैं। </p>
<p>शुरूआती दिनों में मैंने भी एग्रेगेटरों पर हिट पाने के लिये ऐसी पोस्टें लिखीं पर मुझे ध्यान आया कि एक लेखक के लिये अपने पाठकों की संख्या बढ़ाने वाले  व्यापक आधार वाले विषयों पर लिखना आवश्यक है। मैने हास्य कविताएं, आलेख, हास्य व्यंग्य, कहानियां, लघु कथाएं बहुत कठिनाई से यूनिकोड में लिखीं पर एग्रीगेटरों पर उनके हिट ने मुझे निराश किया।  फिर भी मैं आगे बढ़ता रहा यह सोचकर कि देखा जायेगा कि आगे क्या होता है? ब्लाग लेखक साथी हो सकते हैं पाठक नहीं यह बात मुझे अपने बढ़ते पाठक देखकर बहुत बाद में समझ आयी। तब मैंने तय किया कि अब आम पाठक को लक्ष्य कर लिखना चाहिए। फिर यह भी देखा कि मेरे ब्लाग पर आने वाला पाठक अन्य ब्लाग भी देखे ताकि वह अधिक से अधिक हिंदी भाषा के ब्लागों से परिचित हो सके इसलिये मैंने दूसरे ब्लाग लेखकों के भी ब्लाग लिंक किये ताकि अगर पाठक मुझसे  असंतुष्ट हो तो वह दूसरे का ब्लाग लेखकों  का लिखा पढ़कर वह यह समझ सके कि अंतर्जाल पर हिंदी में लिखने वाले भी कम नहीं है। यह मैने बहुत देर से किया फिर भी मेरे ब्लाग दूसरे ब्लागों  पर पाठक भेजते हैं। यह मैं बीस हजार की पाठक संख्या पार करने वाले ब्लाग की सूचनाओं में बता चुका हूं। उसमें यह भी बता चुका हूं कि किस तरह लोग जहां हास्य की सामग्री देखते ही  झपट पड़ते हैं। उसमें ‘हंसते रहो’ और ‘ठहाका’ ब्लाग को अधिक संख्या में मेरे ब्लाग से पाठक मिलना इसी बात का प्रमाण हैं। मेरे  ब्लाग से उड़न तश्तरी ब्लाग पर  भी पाठक जाते हैं और श्रीसमीरलाल जी के पास कोई काउंटर हो तो वह इसे देख सकते हैं। मैं श्रीसमीरलाल को बहुत पसंद करता हूं पर मेरे अज्ञात पाठक मेरी इस राय को नहीं जानते इसलिये उड़न तश्तरी के बाद लिंक किये गये ब्लागों पर अधिक गये-केवल इसलिये ही न कि  उसका नाम वहां किसी हास्य सामग्री होने का संदेश नहीं देता।<br />
केवल  नये ब्लाग बनवाने और टिप्पणियां लिखने से हिंदी ब्लाग जगत के लाभ की मैं संभावना नहीं देखता। सबसे बड़ी बात यह है कि विषय भी आम पाठक से सरोकार रखने वाला होना चाहिए। इस हिंदी ब्लाग जगत में मेरे कुछ मित्र हैं जो हमेशा ही कमेंट देते हैं और कुछ ब्लाग लेखक जब कोई जोरदार विषय होता है तो इस बात की परवाह नहीं करते कि मैंने उनको कभी टिप्पणी दी कि नहीं वह लिख जाते हैं।<br />
श्री समीरलाल जी अकेले ऐसे ब्लाग लेखक हैं जो ब्लाग से हटकर लिखे गये विषयों पर भी बहुत सारी टिप्पणियां प्राप्त कर लेते हैं पर इसका श्रेय उनके मधुर व्यवहार को जाता  है और टिप्पणियां तो इतनी करते हैं कि मैं भी सोचता हूं कि  यह व्यक्ति अगर ऐसा न करे तो मैं लिखूंगा कि नहीं। वह बहुत अच्छा लिखते हैं पर इतनी सारी हिट दिलाने के लिये यह अकेला कारण नहीं है। </p>
<p>        इस अंतर्जाल पर जो ब्लाग लेखक लंबे समय तक  लिखना चाहते हैं उनको सोचना अंतर्मुखी होगा पर लिखना बहिर्मुखी होगा। मेरे दिमाग में कुछ विचार हैं जो इस प्रकार हैं।</p>
<p>(1) अपने ब्लाग पर दूसरे के ब्लाग को भी लिंक दे। अकेले सफलता पाने का का विचार त्याग दें। कोई हमारा मित्र है या नियमित रूप से टिप्पणी करने वाला ब्लाग लेखक  तो लिंक दें अच्छी बात है पर यह भी देखें कि क्या कोई ऐसे ब्लाग लेखक भी हैं जो आपको कमेंट नहीं देते पर उनकी सामग्री पठनीय है तो उसे भी लिंक दें। हो सकता है उसकी वजह से  आपका ब्लाग पढ़ने आम पाठक आये क्योंकि वह सोचेगा कि यह आपके ब्लाग में लगा ब्लाग है वह ऊपर उसका पता थोड़े ही देखता है। मेरे मित्र उड़न तश्तरी और ममता श्रीवास्तव को पढ़ते हैं पर वह जाते मेरे ही ब्लाग से ही हैं-उनके ब्लाग का कोई अपने कंप्यूटर पर पता नहीं रखता।  हो सकता है कोई ऐसे भी लोग हैं जो मेरे ब्लाग पर इसलिये आते हों कि किसी दूसरे ब्लाग लेखक का ब्लाग मेरे ब्लाग से चिपका समझते होंं। जब तक नारद अभिव्यक्ति  पत्रिका से लिंक था मैं वहीं से उस पर जाता था-हो सकता है कि कुछ पाठक मेरे जैसे ही हों। अगर कोई अच्छा लिखने वाला ब्लाग लेखक है तो बिना किसी पूर्वाग्रह के उसका ब्लाग लिंक करें। इसके लिये आपको सभी ब्लाग पढ़ना पढ़ेंगे।<br />
(2)ब्लाग लेखकों को ऐसे विषयों पर ही ध्यान देना चाहिए जो सार्वजनिक हों। अगर कोई समाचार दे रहें हैं तो उसके साथ एक संपादक के रूप में भी विचार व्यक्त करें। याद रखिये जो आम पाठक यहां आते हैं वह उस ब्लाग लेखक की मौलिकता देखना चाहते हैं। महापुरुषों के संदेश लिखने वाली पोस्टों पर अनेक लोगों ने टिप्पणी लिखी थी कि अगर आप इनके साथ अपने विचार रखते तो बहुत अच्छा होता।<br />
(3)अपनी पोस्ट के साथ अधिकतम श्रेणियां रखें। कभी-कभी अंग्रेजी में भी टिप्पणियां रखें। हमारा  ब्लाग अंग्रेजी वालें भी पढ़ें यह तो चाहते हैं पर इस बात का ध्यान नहीं रखते कि अंग्रेजी वाले वहां कैसे आयेंगे। इसके अलावा अंग्रेजी शब्दों से भी हिंदी पाठक ब्लाग पर आते हैं<br />
(4)आलेख, निबंध, कविता, हास्य कविता, व्यंग्य और कहानी जैसे शब्द शीर्षक में लिख दें तो बढिया। मेरी वही हास्य कविताएं लोग पढ़ रहे हैं जिन पर मैंने ऊपर ही लिख दिया है।<br />
मैं जैसा हूं सबके सामने हैं। एग्रीगेटरों पर मैं हिट नहीं पाता यह सच है पर मुझे लगता है कि आम पाठकों का कुछ रुझान मेरी तरफ है। आम पाठकों की बात तो मैं ही लिखता हूं बाकी तो कोई नहीं बताता कि उसकी तरफ कैसा रुझान है? यह सबसे महत्वपूर्ण है। एग्रीगेटरों पर अनेक ब्लाग लेखकों से मित्रता मेरे लिए एक बोनस है क्योंकि मेरा मुख्य लक्ष्य पाठकों तक पहुंचना है। अभी सफलता दूर है पर मैंने भी ऐसा क्या लिख दिया है कि उछलता फिरूं। सच तो यह है कि कृतिदेव का यूनिकोड टूल मिलने के बाद तो मैंने सहज भाव से लिखना शुरू किया है और मैं जानता हूं कि यह सफलता अकेले चलने से नहीं मिलेगी इसलिये चाहता हूं कि अन्य ब्लाग लेखक भारी सफलता पायेंगे तो कुछ मेरे हिस्से में भी आयेगी। आखिरी बात यह है कि मैं कोई सिद्ध व्यक्ति नहीं हूं जो यह कहूं कि जो मैने लिखा है वही सही है। जो अनुभव किया वही लिख रहा हूं और हो सकता है कई इससे सहमत न हों और इसकी संभावना रहेगी भी क्योंकि ब्लागवाणी के हिट इस बात का प्रमाण है कि मेरे हाथ से कोई हिट पोस्ट नहीं निकली। वैसे भी मैं अपने कंप्यूटर की समस्याओं से एक महीने से परेशान हूँ और इधर कही बिजली तो कभी आंधी मेरी पोस्ट को रोक देती हैं।शेष फिर कभी	</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मोबाइल मोहब्बत हो गई-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=150</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 17:50:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=150</guid>
<description><![CDATA[प्रेमी ने प्रेमिका के मोबाइल की
घंटी ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">प्रेमी ने प्रेमिका के मोबाइल की<br />
घंटी बड़ी उम्मीद से बजाई<br />
जा रही थी वह गाड़ी पर<br />
चलते चलते ही उसने<br />
अपने मार्ग में होने की बात उसे बताई<br />
फिर भी वह बातें करता रहा<br />
वह भी सुनती रही<br />
सफर गाड़ी पर उसका चलता रहा<br />
अचानक वह कार  से टकराई<br />
प्रेमी को भी फोन पर आवाज आई<br />
प्रेमी ने पूछा<br />
‘क्या हुआ प्रिये<br />
यह कैसी आवाज आई<br />
कोई ऐसी बात हो तो मोटर साइकिल पर<br />
चढ़कर वहीं आ जाऊं<br />
मुझे बहुत चिंता घिर आई’<br />
प्रेमिका ने कहा<br />
‘घबड़ाओ नहीं कार से<br />
मेरी गाड़ी यूं ही टकराई<br />
अपनी मरहम पट्टी कराकर अभी आई<br />
करा देगा यह कार वाला उसकी भरपाई+’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">प्रेमी करता रहा इंतजार<br />
फिर नहीं प्रेमिका की कोई खबर आई<br />
एक दिन भेजा संदेश<br />
‘जिससे मेरी गाड़ी टकराई<br />
उसी कार वाले से हो गयी  मेरी सगाई<br />
बहुत हैंडसम और स्मार्ट है<br />
उसने मुझ पर बहुत दया दिखाई<br />
इन दो पहियों की गाड़ी से<br />
तो अब हो गयी ऊब<br />
चार पहियों वाली गाड़ी में ही<br />
अब घूमने की इच्छा आई’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">प्रेमी सुनकर चीखा<br />
‘यह कैसा मोबाइल है<br />
जिसने मोहब्बत को भी बनाया<br />
अपने जैसा<br />
कितना बुरा किया मैंने जो<br />
उस दिन मोबाइल की घंटी बजाइ<br />
..............................................</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">नोट-यह हास्य कविता काल्पनिक है तथा इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।<br />
</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पसीना ही कविता लिखवाता है]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=520</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 16:51:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=520</guid>
<description><![CDATA[बदलते मौसम के साथ
मन भी यूं बदल जाता है
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बदलते मौसम के साथ<br />
मन भी यूं बदल जाता है<br />
जैसे उसके साथ बंधे हों हाथ<br />
ग्रीष्म के जलती दोपहर में<br />
व्यग्रता इतनी बढ़ जाती है<br />
नरक लगता हो  जीवन<br />
शाम होते बहती ठंडी हवा का<br />
एक झौंका भी शीतल कर देता है<br />
मौसम और मन के पहिये<br />
घूमते देख कौन कह सकता है<br />
हमारा मन भी होता है कभी हमारे साथ<br />
..........................</p>
<p>गर्मी की दोपहर में<br />
साइकिल पर चलते हुए<br />
पसीने में नहाए मैंने उसे देखा है<br />
लिखता है कविता वह हसंते  हुए<br />
कभी  उसे रोते नहीं देखा है<br />
पूछने पर बताता है<br />
उसके दोपहर का पसीना ही<br />
रात में शीतलता देकर उससे कविता लिखवाता है<br />
मैं उसे केवल आईने में ही देख पाता हूं<br />
क्योंकि वह चेहरा<br />
केवल उसी में नजर आता है </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इस ब्लाग (पत्रिका) की पाठक संख्या बीस हजार के पार]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=371</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 14:15:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=371</guid>
<description><![CDATA[12 दिसंबर 2007 को इस हजार की संख्या पार कर च]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>12 दिसंबर 2007 को इस हजार की संख्या पार कर चुके इस ब्लाग ने कल बीस हजार की पाठक संख्या को पार कर लिया। इस संख्या को पार करने वाला यह मेरा  दूसरा ब्लाग है।<br />
इस ब्लाग के साथ मेरी दिलचस्प याद जुड़ी हुई है। ब्लागस्पाट पर टाईप करते हुए यूनिकोड में अपनी पहली पोस्ट छोटी कविता के रूप  में इसी पर रखी-क्योंकि मुझे उसमें बड़ी पोस्ट लिखने में दिक्कत आ रही थी-और सबसे पहला कमेंट भी इस पर आया। उससे पहले मैंने सभी तीनों ब्लाग पर कृतिदेव की पोस्ट रखी थी और मैं मानकर चल रहा था कि अब उसी से आगे जाना है। जब कुछ ब्लाग  लेखक उन ब्लाग पर मुझसे यूनिकोड में लिखने को कह रहे थे तो भी मैं उसकी परवाह नहीं कर रहा था। ऐसे में कोई महिला ब्लाग लेखिका (जिससे  बाद में  फिर संपर्क नहीं हो सका) ने मुझे इस  बारे में ईमेल भेजकर रोमन हिंदी में लिख रही थी कि मेरे ब्लाग पढ़ने मेंे नही आ रहे तब मैंने उसे इस ब्लाग का पता दिया। उसने लिखा-‘वहां तो सब पढ़ने में आ रहा है। वाह,वाह बढ़िया  । मगर उसने कोई कमेंट इस पर नहीं लिखी। हां, मैने तब यूनिकोड में लिखने का निर्णय लिया।</p>
<p>नारद पर उसी समय इसे पंजीकृत नहीं कराया पर ब्लागवाणी के अभ्युदय के साथ ही दोनों जगह इसे पहुंचाया और हिंदी ब्लाग पर तो यह पहले से ही था। यह मेरा ऐसा ब्लाग रहा है जो बिना फोरम पर दिखे भी वर्डप्रेस के डेशबोर्ड पर नंबर एक पर आया था। फोरमों पर दिखने से पहले ही यह ब्लाग अपने लिये तीन  हजार पाठक जुटा चुका था। तब अनुभव की कमी के कारण मुझे समझ में कुछ नहीं आता था पर बाद में यह बात समझ में आयी कि ब्लाग का मार्ग फोरमों से आगे भी जाता है। ब्लाग की डालरों में बताने वाली वेब साईट के मुताबिक यह मेरा सबसे महंगा ब्लाग है। हालांकि फिर भी यह अन्य ब्लाग लेखकों के ब्लाग के मुक